किसके लिए
और क्यों?
व्यंग्य या व्यय
या पूर्व निश्चय
जो किया!
भय ज्यों का त्यों!
भौरों ने सम्पूर्ण रस का पान कर
खो दिया!
खुद की वादा
तो लिया!
एक कवयित्रीत्व का
धो हिया!
परमपुरुषार्थ
को जिया!
सृष्टि-पहचान
रो धिया!
महापीड़ा का आज भी
समय और समाज की!
जिसे देख चीखूँ
चिरंजीवी हो!
यह सदैव दुःख ही देगा
बुद्धिजीवी को!!



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