Thursday, 20 August 2026

बेगमपुर से आधुनिक भारत तक : अमरदेसवा, रामराज्य और लोकतांत्रिक राष्ट्र की अंतःयात्रा || गोलेन्द्र पटेल

बेगमपुर से आधुनिक भारत तक : अमरदेसवा, रामराज्य और लोकतांत्रिक राष्ट्र की अंतःयात्रा

सारांश

भारतीय साहित्य में आदर्श समाज की कल्पना किसी एक परंपरा या एक दार्शनिक धारा तक सीमित नहीं रहती। मध्यकालीन संत-काव्य से आधुनिक राष्ट्रवादी काव्य तक यह कल्पना अलग-अलग रूपों में विकसित होती है। बनारस की सांस्कृतिक भूमि इस विकास की एक विशेष प्रयोगभूमि दिखाई देती है। संत रविदास का ‘बेगमपुर’, संत कबीर का ‘अमरदेसवा’, गोस्वामी तुलसीदास का ‘रामराज्य’ और जयशंकर प्रसाद का ‘मधुमय देश’—चारों अपने-अपने समय की सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक आकांक्षाओं को व्यक्त करते हैं। इनके बीच समानता भी है और बुनियादी वैचारिक भिन्नता भी। रविदास का बेगमपुर दुख, भय, भेदभाव और आर्थिक शोषण से मुक्त समतामूलक समाज की कल्पना करता है। कबीर का अमरदेसवा जाति-वर्ण, धार्मिक पहचान और सांसारिक विभाजनों से परे सत्य-धर्म के आध्यात्मिक-सामाजिक लोक का संकेत देता है। तुलसीदास का रामराज्य शांति, पारस्परिक प्रेम और लोककल्याण का आदर्श प्रस्तुत करता है, किंतु वह वर्णाश्रम-व्यवस्था को भी स्वीकार करता है। जयशंकर प्रसाद का ‘मधुमय देश’ इन मध्यकालीन यूटोपियाई कल्पनाओं से आगे बढ़कर आधुनिक राष्ट्रीय चेतना, प्रकृति, करुणा, आश्रय और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का काव्यात्मक रूप निर्मित करता है। आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक संविधान के संदर्भ में इन चारों कल्पनाओं का पुनर्पाठ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेगमपुर की सामाजिक-आर्थिक समानता, अमरदेसवा की जाति-विहीनता, रामराज्य का लोककल्याण और प्रसाद के मधुमय देश की मानवीय-राष्ट्रीय संवेदना—इन सभी को संविधान के न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के मूल्यों के साथ संवाद में रखकर देखा जा सकता है। इस दृष्टि से आधुनिक भारत किसी एक प्राचीन आदर्श की पुनर्स्थापना नहीं, बल्कि विविध मानवीय आकांक्षाओं के लोकतांत्रिक समन्वय का आधुनिक रूप है।

बीज-शब्द : बेगमपुर, अमरदेसवा, रामराज्य, मधुमय देश, आधुनिक भारत, रविदास, कबीर, तुलसीदास, जयशंकर प्रसाद, सामाजिक समानता, लोकतंत्र, संविधान, यूटोपिया, मानवतावाद।

1. प्रस्तावना : बनारस की मिट्टी और आदर्श समाज की कल्पना

यूटोपिया ऐसे काल्पनिक आदर्श समाज या राज्य की संकल्पना है, जहाँ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था न्यायपूर्ण, समतामूलक और दोषरहित मानी जाती है। भारतीय साहित्य में विभिन्न कालों के कवियों ने अपने समय की विषमताओं के बरक्स आदर्श राज्य, समाज और देश की कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।” अतः साहित्य और समाज के साथ राजनीति का संबंध भी अविच्छिन्न है। समकालीन भारत में संत रविदास और तुलसीदास जैसे महत्त्वपूर्ण कवि राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के रूप में भी प्रयुक्त होते हैं। हम समग्रता में देखते हैं कि रविदास की वाणी में जातीय अस्मिता की गहन और जीवंत प्रतिध्वनि है, जबकि कबीरदास की वाणी में धार्मिक अस्मिता का तीक्ष्ण और प्रश्नाकुल स्वर। बहरहाल, 2026 में काशी के सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास जन्मस्थली से आरंभ ‘समरसता संकल्प अभियान’ इसी राजनीतिक-सांस्कृतिक संदर्भ को रेखांकित करता है। ऐसे समय में रविदास को केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं, बल्कि ‘बेगमपुरा’ के जाति-विरोधी, श्रम-सम्मानित और समतामूलक स्वप्न के संदर्भ में पढ़ना अधिक आवश्यक हो जाता है।

भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में बनारस केवल धार्मिक नगर नहीं है; वह वैचारिक संघर्ष, आध्यात्मिक खोज, लोकभाषा, शिल्प, श्रम और साहित्य का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र है। इसी सांस्कृतिक भूगोल में संत रविदास, संत कबीरदास और गोस्वामी तुलसीदास जैसी महत्त्वपूर्ण काव्य-प्रतिभाएँ अपनी-अपनी दृष्टि से समाज और मनुष्य के प्रश्नों को संबोधित करती हैं। आधुनिक काल में जयशंकर प्रसाद भी इसी काशी की साहित्यिक परंपरा को आधुनिक राष्ट्रीय चेतना से जोड़ते हैं। इन रचनाकारों की कल्पनाओं में ‘देश’, ‘नगर’, ‘राज्य’ या ‘लोक’ केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं हैं। वे एक ऐसे जीवन-संसार के प्रतीक हैं जिसमें मनुष्य अपने समय की पीड़ा से मुक्ति की आकांक्षा करता है। इसलिए बेगमपुर, अमरदेसवा, रामराज्य और प्रसाद का ‘मधुमय देश’ चार अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों में निर्मित आदर्श समाज की काव्यात्मक अवधारणाएँ हैं। इनका तुलनात्मक अध्ययन करते समय सबसे आवश्यक बात यह है कि इन्हें एक-दूसरे का पर्याय न माना जाए। समानता के बावजूद इनके सामाजिक दर्शन अलग हैं। विशेषतः कबीर और रविदास की समतामूलक चेतना तथा तुलसी के वर्णाश्रम-आधारित रामराज्य के बीच महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर है।

2. बेगमपुर : भूख, भय और भेदभाव से मुक्ति

प्रो. सदानंद शाही ने लिखा है:—

“संत रैदास भारतीय मन की आवाज हैं। उन्होंने अपनी कविता में हर तरह के भेद से मुक्त एक वैकल्पिक समाज का सपना दिया था- 'बेगमपुर का सपना'। संत रैदास और कबीर मिलकर एक नया शहर बसाना चाहते थे। वह शहर था 'बेगमपुर'। रैदास इस शहर के मुख्य आर्किटेक्ट थे। उन्होंने बेगमपुर का नक्शा बनाया था। उन्होंने अपने कल्पना के शहर बे-गमपुर की खूबियाँ बताई हैं।” और बेगमपुरा पर विचार करते हुए प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने लिखा है —

“बेगमपुरा सहर को नाउ....’ पद मध्यकाल के भीतर एक दलित कवि का 'यूटोपिया' है जिसने पन्द्रहवीं सदी से लेकर इक्कीसवीं सदी के वर्तमान समय तक अपनी उपस्थिति न केवल बनाये रखी है बल्कि दलित चेतना के विकास के साथ लगातार प्रासंगिक भी होता गया है। गेल ओमवेट ने सही लिखा है कि ‘भारत में पहली यूटोपिया की अवधारणा किसी सम्प्रभु वर्ग से नहीं, जाति विरोधी बौद्धिक वर्ग से आयी है और बेगमपुरा की अवधारणा देने वाले पन्द्रहवीं सदी के ये सन्त रविदास थे। उन्होंने आगे लिखा है दूख विहीन यह बेगमपुरा एक जाति विहीन, वर्ग विहीन समाज है, यह मन्दिर विहीन एक आधुनिक समाज है यह एक नगर समाज है जो गांधी के रामराज्य से अलग है। और ऐसा उच्चवर्ग के बौद्धिकों द्वारा निम्नवर्ग द्वारा लगातार उपस्थित की गयी चुनौतियों को दरकिनार और कई बार अपने में मिला लेने की तमाम कोशिशों के बावजूद सम्भव हुआ है। यह यूटोपिया दुनिया में एक वैकल्पिक मॉडल रहा है जो आइडियोलॉजी से अलग है। आइडियोलॉजी जहाँ अपने शासक समूह के हितों की रक्षा करती है वहीं यूटोपिया शासित वर्ग का एक वैकल्पिक मॉडल है जो प्रदत्त को नष्ट कर एक नयी व्यवस्था देने का पक्षधर है। ये यूटोपिया सामाजिक परिवर्तन का माध्यम होते हैं, जो यूँ यथार्थ पर आश्रित होते हैं, लेकिन मुख्य आधार 'इनका यथार्थ की सम्भाव्यता" होता है जिसमें पहले एक लौकिक व्यवस्था को धरती पर परिकल्पित किया जाता है और कर उसे शोषित लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें उत्साह और तर्क के दो तत्त्व शामिल रहते हैं।” रविदास के काव्य में आदर्श समाज का सबसे प्रखर पक्ष सामाजिक समानता और आर्थिक सुरक्षा है। उनका कथन—

“ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसे रविदास रहे प्रसन्न।।”

एक ऐसे समाज की आधारभूत आवश्यकता को सामने रखता है जिसमें किसी मनुष्य को भूख से संघर्ष न करना पड़े। यहाँ आदर्श राज्य का मूल्यांकन उसकी धार्मिक भव्यता से नहीं, बल्कि इस बात से होता है कि उसमें मनुष्य को अन्न, सम्मान और समानता प्राप्त होती है या नहीं।

संत रविदास का बेगमपुरा ऐसा आदर्श समाज है जहाँ दुःख, भय, चिंता, शोषण और भेदभाव नहीं हैं। वहाँ सब समान, स्वतंत्र और सुखी हैं। किसी पर कर या अन्याय का बोझ नहीं है। सभी को अन्न-पानी, सम्मान और निर्बाध जीवन मिलता है तथा प्रेम और मैत्री सामाजिक संबंधों का आधार हैं। रविदास कहते हैं:-

“बेगम पुरा शहर कौ नांउ, दुखू अंदोह नहीं तिहिं ठांउ।
नां तसवीस खिराजु न मालु, खउफु न खता न तरसु जवालु
॥”

‘बेगमपुरा’ इस दृष्टि को और व्यापक बनाता है। उसके नाम में ही ‘बे-ग़म’ अर्थात् ग़म से मुक्ति का अर्थ निहित है। वहाँ दुःख और चिंता नहीं है; कर, भय और उत्पीड़न का दबाव नहीं है; सामाजिक स्तरों का भेद मिट जाता है। रविदास स्वयं अपनी सामाजिक पहचान को छिपाते नहीं, बल्कि उसी पहचान से मुक्ति और समान नागरिकता की कल्पना करते हैं। वे निष्ठुर, अविवेकी अन्याय पूर्ण सामाजिक यथार्थ के बरक्स एक न्याय संगत, मानवीय, समतामूलक और उदात्त समाज का सपना प्रस्तावित करते हैं।

इसलिए बेगमपुर को केवल आध्यात्मिक स्वर्ग मानना उसके सामाजिक अर्थ को सीमित करना होगा। यह जातिगत अपमान, आर्थिक असुरक्षा और सत्ता-जनित भय के विरुद्ध एक वैकल्पिक सामाजिक कल्पना भी है।

3. अमरदेसवा : जाति और पहचान से परे मनुष्य

‘भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में कबीरदास ऐसे महान विचारक एवं प्रतिभाशाली महाकवि हैं, जिन्होंने शताब्दियों की सीमा का उल्लंघन कर दीर्घ काल तक भारतीय जनता का पथ आलोकित किया और सच्चे अर्थों में जनजीवन का नायकत्व किया।’ कबीर का ‘अमरदेसवा’ बेगमपुर से एक अलग दिशा में जाता है। कबीर कहते हैं—

“बाम्हन छत्री न सूद्र बैसवा, मुगल पठान न सैयद सेखवा।
आदि जोति नहि गौर-गनेसवा, ब्रह्मा-बिस्नु-महेस न सेसवा।”

यह पंक्ति अमरदेसवा की सामाजिक संरचना को समझने की कुंजी है। यहाँ केवल हिंदू वर्ण-व्यवस्था का निषेध नहीं है; धार्मिक-सामुदायिक पहचान से पैदा होने वाले विभाजन भी अप्रासंगिक हो जाते हैं।

कबीर के अमरदेस में धरती, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और दिन-रात तक के पारंपरिक भौतिक संकेत अनुपस्थित हैं। इस कारण यह कोई व्यावहारिक प्रशासनिक राज्य-योजना नहीं है। यह एक गहन आध्यात्मिक और सामाजिक यूटोपिया है, जिसमें सांसारिक द्वैतों का अतिक्रमण किया जाता है।

लेकिन इस आध्यात्मिकता का सामाजिक परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। कबीर के लिए परम सत्य तक पहुँचने के मार्ग में जाति, पद, पंथ और जन्माधारित श्रेष्ठता बाधक नहीं हो सकती। इसलिए अमरदेसवा को जाति-वर्ण-विहीन मानवीय लोक की काव्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ा जा सकता है।

कबीर का ‘बेगम देस’ ऐसा आदर्श लोक है जहाँ दुःख, भय, भेद और सांसारिक विभाजन नहीं हैं। राजा-रंक सभी समान हैं। वहाँ मनुष्य मानसिक बोझ से मुक्त होकर सत्य-धर्म को अपनाता है। कबीर के लिए यह देश बाहरी भूगोल नहीं, बल्कि सत्य, समता, शांति और आध्यात्मिक मुक्ति का प्रतीक है। कबीर कहते हैं:-

“अवधू बेगम देस हमारा।
राजा-रंक-फ़क़ीर-बादसा सबसे कहौं पुकारा।”

रविदास के बेगमपुर में जहाँ सामाजिक-आर्थिक मुक्ति अधिक स्पष्ट है, वहीं कबीर के अमरदेसवा में जातिगत और धार्मिक पहचान के विघटन की चेतना अधिक तीव्र है। रैदास के बेगमपुर और कबीर के अमरदेसवा की परंपरा में तुकाराम का पंढरपुर ‘भू-वैकुण्ठ’ है। “खेळ मांडियेला वाळवंटी घाई” में चंद्रभागा तट पर विट्ठल-भक्त समान भाव से नाचते हैं; वहाँ जाति, ऊँच-नीच, भेदभाव और कष्ट का कोई स्थान नहीं है।

4. रामराज्य : लोककल्याण और परंपरागत सामाजिक व्यवस्था का द्वंद्व

प्रो. सदानंद शाही ने लिखा है:—“तुलसीदास हिंदी के सबसे बड़े कवि माने जाते हैं इसके मूल में इस (रामराज्य) यूटोपिया की बड़ी भूमिका है। रामराज्य हमारे समाज की वृहत्तर आकांक्षाओं में से एक है। जमाने से रामराज्य कायम करने के लिए यत्न होते रहे हैं। हम एक बड़े राजनैतिक नारे के रूप में इसका उपयोग सुनते-करते आए हैं। लेकिन बेगमपुर की चर्चा कहीं नहीं होती।”

तुलसीदास का रामराज्य भारतीय राजनीतिक-सांस्कृतिक कल्पना में अत्यंत प्रभावशाली आदर्श है। इसमें—

“बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप बिषमता खोई॥”
और
“सबु नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥।”

जैसी पंक्तियाँ सामाजिक शांति और पारस्परिक प्रेम की आकांक्षा व्यक्त करती हैं। दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति, भय और शोक का अभाव तथा लोकजीवन में सुख—ये सभी कल्याणकारी राज्य की विशेषताएँ हैं।

लेकिन तुलसी का रामराज्य आधुनिक अर्थ में जाति-विहीन या वर्ण-विहीन समाज नहीं है। तुलसीदास ने स्पष्ट कहा है—

“वरनाश्रम निज निज धरम, निरत वेद-पथ लोक।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं, नहिं भय रोग न सोक॥”

अर्थात् सामाजिक व्यवस्था का आदर्श वर्णाश्रम के कर्तव्य-आधारित ढाँचे में स्थापित है।

यहीं बेगमपुर और अमरदेसवा के साथ रामराज्य का सबसे महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। रविदास का “छोट बड़ो सब सम बसे” जन्माधारित सामाजिक ऊँच-नीच को चुनौती देता है। कबीर तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य तथा विभिन्न धार्मिक पहचान तक को अमरदेस से बाहर कर देते हैं। तुलसीदास दूसरी ओर सामाजिक शांति और पारस्परिक प्रेम को वर्णाश्रम-धर्म के साथ जोड़ते हैं।

अतः रामराज्य को आधुनिक समानता के सीधे पर्याय के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक और पाठगत दोनों स्तरों पर सरलीकरण होगा। फिर भी उसमें लोककल्याण, भय-मुक्ति, सामाजिक सद्भाव और परस्पर प्रेम जैसी ऐसी आकांक्षाएँ हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की कल्याणकारी अवधारणा से संवाद कर सकती हैं।

5. प्रसाद का मधुमय देश : आध्यात्मिक लोक से आधुनिक राष्ट्र तक

‘चंद्रगुप्त’ नाटक में जयशंकर प्रसाद ने लिखा है—

“अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।”

ये पंक्तियाँ भारतीय आदर्श-देश की कल्पना को आधुनिक राष्ट्रीय चेतना में रूपांतरित करती हैं। यहाँ देश केवल आध्यात्मिक मुक्ति का अमूर्त लोक नहीं है। यहाँ प्रकृति है, हरियाली है, पक्षियों के लिए नीड़ है, करुणा है, आश्रय है और अनंत को किनारा देने वाली मानवीय संवेदना है।

प्रसाद के देश में—

“उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।।”

जैसी कल्पना सुरक्षा और अपनत्व की अनुभूति कराती है। इसी तरह “बरसाती आँखों के बादल” करुणा के जल में बदलते हैं। यह राष्ट्रवाद केवल भूमि-पूजा नहीं है; इसमें प्रकृति, करुणा, आश्रय और जीवन-सौंदर्य का समावेश है।

यहाँ मध्यकालीन ‘परलोक’ या ‘आदर्श राज्य’ की तुलना में आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा उभरती है। प्रसाद का देश ऐतिहासिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़ता है, लेकिन उसका भाव-संसार मनुष्य-विरोधी या हिंसक राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि जीवनदायी सांस्कृतिक चेतना का है।

6. चार आदर्शों का अंतःसंबंध

इन चारों काव्य-कल्पनाओं को एक विकास-रेखा में रखने के बजाय उन्हें चार परस्पर संवादरत आयामों के रूप में देखना अधिक उचित है।

आदर्श केंद्रीय आकांक्षा प्रमुख सामाजिक संकेत
बेगमपुर दुःख और आर्थिक शोषण से मुक्ति अन्न, समानता, भय-मुक्ति
अमरदेसवा जाति-पंथ से परे सत्यलोक जाति-वर्ण और धार्मिक पहचान का अतिक्रमण
रामराज्य लोककल्याण और सामाजिक शांति प्रेम, सुख, भय-मुक्ति, परंपरागत धर्म-व्यवस्था
मधुमय देश आधुनिक राष्ट्रीय-सांस्कृतिक जीवन आश्रय, प्रकृति, करुणा, राष्ट्रीय आत्मबोध

इस तुलना से स्पष्ट होता है कि चारों की मूल चिंता मनुष्य के बेहतर जीवन की है, किंतु उसके लिए अपनाए गए रास्ते अलग हैं।

रविदास भूख और सामाजिक अपमान को देखते हैं।
कबीर जाति और धार्मिक विभाजन को चुनौती देते हैं।
तुलसी सामाजिक अव्यवस्था के स्थान पर नैतिक और लोककल्याणकारी शासन की कल्पना करते हैं।
प्रसाद आधुनिक राष्ट्र को करुणा, प्रकृति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ देखते हैं।

इस अर्थ में इन चारों कल्पनाओं के बीच एक गहरी अंतर्धारा दिखाई देती है—दुःख से मुक्ति, भय से मुक्ति, विभाजन से मुक्ति और बेहतर सामूहिक जीवन की आकांक्षा।

7. आधुनिक भारत : इन कल्पनाओं का लोकतांत्रिक पुनर्पाठ

आधुनिक भारत इन मध्यकालीन और आधुनिक काव्य-कल्पनाओं की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं करता। भारत के संविधान की प्रस्तावना भारत को संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने तथा नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता प्रदान करने का संकल्प व्यक्त करती है। यह संविधान के मूल दर्शन, मूल्यों और उद्देश्यों को स्पष्ट करती है तथा राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करती है। अर्थात् भारतीय संविधान आधुनिक राज्य के लिए एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और अधिकार-आधारित ढाँचा प्रस्तुत करता है। इसलिए आज बेगमपुर, अमरदेसवा, रामराज्य और मधुमय देश को संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर पुनर्पाठ करना अधिक सार्थक है।

बेगमपुर का “सबन को अन्न” आधुनिक भारत में खाद्य-सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक न्याय की आकांक्षा से संवाद करता है।

“छोट बड़ो सब सम बसे” समानता और गरिमा की आधुनिक संवैधानिक भावना के निकट दिखाई देता है।

अमरदेसवा का जाति-वर्ण-विहीन समाज सामाजिक भेदभाव के उन्मूलन तथा समान नागरिकता की आधुनिक अवधारणा से गहरा संबंध स्थापित करता है।

रामराज्य का भय-मुक्त, रोग-शोक से मुक्त और परस्पर प्रेमपूर्ण समाज आधुनिक कल्याणकारी राज्य की आकांक्षा से जुड़ सकता है; किंतु उसका वर्णाश्रम-आधार आधुनिक संवैधानिक समानता से स्वीकार्य रूप में तभी संवाद करता है जब उसे जन्माधारित पदानुक्रम के बजाय लोककल्याण, नैतिक शासन और सामाजिक सद्भाव के व्यापक मूल्य के रूप में पढ़ा जाए।

प्रसाद का “मधुमय देश” आधुनिक भारत के उस राष्ट्रबोध से जुड़ता है जिसमें देश नागरिकों के लिए आश्रय, अवसर, करुणा और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का स्थल बनता है।

8. बेगमपुर और अमरदेसवा से संविधान तक

इन चारों कल्पनाओं का आधुनिक पुनर्पाठ करते समय संविधान एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। संविधान का लोकतांत्रिक आदर्श किसी एक धार्मिक, जातीय या सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्र की अनिवार्य पहचान नहीं बनाता। वह नागरिकों की समान गरिमा और अधिकारों को आधार देता है।

इस संदर्भ में कबीर का अमरदेसवा और रविदास का बेगमपुर विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देते हैं। दोनों की काव्य-दृष्टि जन्माधारित ऊँच-नीच की आलोचना करती है। आधुनिक भारत में यही आकांक्षा नागरिक समानता, सामाजिक न्याय और भेदभाव-विरोधी व्यवस्था के रूप में संस्थागत रूप ग्रहण करती है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर भी है। संत-कवियों का आदर्श मूलतः काव्यात्मक और नैतिक है, जबकि आधुनिक संविधान एक कानूनी-राजनीतिक संस्थागत व्यवस्था निर्मित करता है। इसलिए बेगमपुर या अमरदेसवा को संविधान का प्रत्यक्ष पूर्वरूप कहना उचित नहीं है; किंतु उनके मानवीय और समतामूलक तत्वों को आधुनिक लोकतंत्र के साथ संवादरत अवश्य माना जा सकता है।

9. ‘रामराज्य’ बनाम ‘अमरदेसवा’ : एक आवश्यक वैचारिक प्रश्न

भारतीय आधुनिकता के संदर्भ में रामराज्य और अमरदेसवा का तुलनात्मक प्रश्न विशेष महत्त्व रखता है। दोनों में दुःखरहित समाज की आकांक्षा है, लेकिन सामाजिक संरचना की दृष्टि से दोनों एक नहीं हैं।

तुलसी का आदर्श परंपरा के भीतर व्यवस्था और सामंजस्य खोजता है। कबीर का आदर्श स्थापित सामाजिक पहचानों को ही प्रश्नांकित करता है। तुलसी के यहाँ वर्णाश्रम सामाजिक संगठन का अंग है; कबीर के अमरदेस में “बाम्हन”, “छत्री”, “सूद्र”, “बैस”, “मुगल”, “पठान”, “सैयद” और “सेख” जैसी पहचानें ही अप्रासंगिक हो जाती हैं।

इसलिए आधुनिक लोकतांत्रिक भारत के लिए इन दोनों का चयनात्मक पुनर्पाठ आवश्यक है। यदि रामराज्य से न्यायपूर्ण शासन, लोककल्याण, भय-मुक्ति और पारस्परिक प्रेम ग्रहण किए जाएँ और अमरदेसवा से जाति-विहीनता, समानता और मानवीय एकता, तो दोनों की सकारात्मक आकांक्षाएँ आधुनिक लोकतांत्रिक आदर्श को समृद्ध कर सकती हैं। लेकिन किसी भी पारंपरिक सामाजिक पदानुक्रम को आधुनिक नागरिक समानता के ऊपर नहीं रखा जा सकता।

10. बनारस की सांस्कृतिक परंपरा और आधुनिक भारत

बाबा साहब आंबेडकर भारतीय इतिहास को क्रांति और प्रतिक्रांति के सतत संघर्ष के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार बहुजन-श्रमण परंपरा समानता, तर्क, श्रम और जाति-विरोध की वाहक रही, जबकि वैदिक-ब्राह्मणवादी व्यवस्था वर्णाश्रम और जन्माधारित श्रेष्ठता को प्रतिष्ठित करती रही। यह वैचारिक टकराव प्राचीन काल से मध्यकाल तक विभिन्न रूपों में दिखाई देता है। निर्गुण संत परंपरा के रैदास और कबीर सामाजिक समता तथा गुण-कर्म की प्रतिष्ठा करते हैं, जबकि सगुण परंपरा के तुलसीदास वर्णव्यवस्था को स्वीकार करते हैं। इस दृष्टि से भारतीय इतिहास केवल धार्मिक मतभेदों का इतिहास नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, श्रम और मनुष्य की गरिमा के लिए चले संघर्ष का इतिहास भी है।

बेगमपुर, अमरदेसवा और रामराज्य में ज्ञान और गुण बनाम जन्माधारित जाति का प्रश्न प्रमुख है, किंतु दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर है। तुलसीदास की पंक्ति—“पूजहिं विप्र सकल गुणहीना, / सूद्र न पूजहिं ज्ञान प्रवीना।”—वर्णव्यवस्था के भीतर ब्राह्मण-श्रेष्ठता को स्वीकार करती दिखाई देती है। इसके विपरीत रैदास कहते हैं—“रैदास बाभन मत पूजिए जो होवे गुनहीन। / पूजिए चरन चंडाल के जो हो गुन परवीन।।” यहाँ जन्म नहीं, गुण सम्मान का आधार बनता है। कबीर और आगे बढ़कर कहते हैं—“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।” अतः रैदास और कबीर जातिगत श्रेष्ठता को चुनौती देते हैं। रैदास और कबीर की समतावादी चेतना तथागत बुद्ध के मानवतावादी विचारों से गहरा साम्य रखती है। बुद्ध कहते हैं— “न जच्चा होति ब्राह्मणो, न जच्चा होति अब्राह्मणो; कम्मना ब्राह्मणो होति, कम्मना होति अब्राह्मणो।” अर्थात जन्म नहीं, कर्म मनुष्य की पहचान और श्रेष्ठता का आधार है, जबकि तुलसी की उक्त पंक्ति वर्णाधारित सामाजिक पदक्रम का समर्थन करती है।

रविदास, कबीर और तुलसी को एक ही भौगोलिक सांस्कृतिक क्षेत्र से जोड़ना केवल साहित्यिक संयोग नहीं है। बनारस की बहुलतापूर्ण संस्कृति में शास्त्र और लोक, धर्म और तर्क, कर्म और ज्ञान, शिल्प और साहित्य, परंपरा और विद्रोह निरंतर संवाद करते हैं।

रविदास श्रमशील सामाजिक जीवन से बोलते हैं। कबीर रूढ़ि और पाखंड पर प्रहार करते हैं। तुलसी लोकभाषा में व्यापक सांस्कृतिक आख्यान रचते हैं। प्रसाद इसी काशी की आधुनिक साहित्यिक चेतना में इतिहास, संस्कृति और राष्ट्र को नए ढंग से रूपायित करते हैं।

इस दृष्टि से बनारस की साहित्यिक परंपरा किसी एक विचारधारा की रेखीय परंपरा नहीं, बल्कि विचारों के संघर्ष और संवाद की परंपरा है। बेगमपुर, अमरदेसवा, रामराज्य और मधुमय देश इसी बहस के चार अलग-अलग पड़ाव हैं।

11. मानवतावादी परिप्रेक्ष्य से पुनर्पाठ

समकालीन संदर्भ में इन चारों आदर्शों को मानवीय समानता के व्यापक धरातल पर पढ़ने से एक नया संश्लेषण संभव होता है। यदि किसी आधुनिक मानवतावादी दृष्टि का केंद्रीय सूत्र “मानव-मानव एकसमान” है, तो रविदास की सामाजिक समानता और कबीर की जाति-पंथ-विहीनता उसके मूल सामाजिक आधार को मजबूत करती हैं। तुलसी का लोककल्याणकारी पक्ष सामूहिक जीवन में प्रेम और नैतिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता को सामने लाता है, जबकि प्रसाद का मधुमय देश प्रकृति, करुणा और सांस्कृतिक आत्मीयता को जोड़ता है।

इस पुनर्पाठ में किसी महापुरुष को अंतिम सत्य का स्वामी मानना आवश्यक नहीं है। उनके विचारों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में समझकर वर्तमान की समस्याओं पर लागू करना अधिक उत्पादक है। यही दृष्टि परंपरा को जड़ अनुकरण के बजाय सृजनात्मक संवाद में बदलती है।

12. निष्कर्ष : आधुनिक भारत का बेगमपुर

बेगमपुर, अमरदेसवा, रामराज्य और मधुमय देश चार अलग-अलग कवियों की कल्पनाएँ होते हुए भी मनुष्य के बेहतर संसार की साझा खोज से जुड़े हैं। रविदास भूख और सामाजिक अपमान से मुक्त समाज चाहते हैं। कबीर जाति, वर्ण और धार्मिक पहचान के पार सत्य और समानता का लोक रचते हैं। तुलसीदास शांति, प्रेम, लोककल्याण और नैतिक व्यवस्था से युक्त राज्य की कल्पना करते हैं, यद्यपि वह वर्णाश्रम-व्यवस्था से संबद्ध है। जयशंकर प्रसाद आधुनिक राष्ट्रीय चेतना को प्रकृति, करुणा और आश्रय के सौंदर्य से जोड़ते हैं।

आधुनिक भारत के लिए इन चारों का सबसे सार्थक अर्थ किसी एक आदर्श की राजनीतिक स्थापना में नहीं, बल्कि उनके मानवीय तत्वों के आलोचनात्मक समन्वय में निहित है।

बेगमपुर हमें भूख और असमानता के विरुद्ध खड़ा करता है।
अमरदेसवा हमें जाति और पहचान के अहंकार से मुक्त करता है।
रामराज्य हमें लोककल्याण और पारस्परिक प्रेम की आवश्यकता बताता है।
मधुमय देश हमें करुणा, प्रकृति, आश्रय और राष्ट्रीय आत्मीयता का बोध कराता है।

इन चारों को आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के साथ पढ़ने पर भारत की एक ऐसी कल्पना उभरती है जिसमें राष्ट्र किसी एक जाति, धर्म या वर्ण का नहीं, बल्कि समान गरिमा वाले मनुष्यों का साझा घर बनता है।

इसलिए आधुनिक भारत का स्वप्न न तो केवल बेगमपुर की पुनर्रचना है, न अमरदेसवा की आध्यात्मिक पुनर्स्थापना, न रामराज्य की यांत्रिक वापसी और न केवल मधुमय राष्ट्र की रोमांटिक कल्पना। आधुनिक भारत का लोकतांत्रिक आदर्श इन सभी से संवाद करते हुए एक ऐसे समाज की ओर संकेत करता है जहाँ अन्न सबको मिले, मनुष्य बराबर हो, शासन लोककल्याणकारी हो, भय और भेदभाव घटें, प्रकृति और करुणा सुरक्षित रहें और प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीने की स्वतंत्रता मिले।

यही वह बिंदु है जहाँ संत-काव्य की मुक्ति-आकांक्षा, भक्ति की मानवीयता, आधुनिक राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक चेतना और संविधान की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता एक व्यापक मानवीय क्षितिज पर मिलती हैं।

अंततः बेगमपुर से अमरदेसवा, अमरदेसवा से रामराज्य, रामराज्य से मधुमय देश और वहाँ से आधुनिक लोकतांत्रिक भारत तक की यात्रा किसी एक विचार की विजय नहीं, बल्कि भारतीय समाज की निरंतर चलती हुई न्याय, समानता, शांति और मानवीय गरिमा की खोज है।

संदर्भ ग्रंथ सूची:—
1).
आचार्य रामचंद्र शुक्ल (भूमिका - रामस्वरूप चतुर्वेदी) — लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, अठारहवाँ संस्करण, 2022
2).
सदानंद शाही — मेरे राम का रंग मजीठ है (गुरु ग्रंथ साहब में संकलित रैदास बानी का काव्यान्तरण) — लोकायत प्रकाशन, वाराणसी, प्रथम संस्करण, 2021, पृष्ठ संख्या —13
3).
श्रीप्रकाश शुक्ल — राग रविदास — वाग्देवी प्रकाशन, नोएडा (उत्तर प्रदेश), प्रथम संस्करण, 2023, पृष्ठ संख्या — 71
4).
श्रीप्रकाश शुक्ल — भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई — सेतु प्रकाशन, नोएडा (उत्तर प्रदेश), प्रथम संस्करण, 2025, पृष्ठ संख्या — 151, 152
5).
श्याम सिंह — संत रैदास की मूल विचारधारा — सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, पाँचवा संस्करण, 2022
6).
रैदास ग्रंथावली —  साहित्य संस्थान प्रकाशन, संस्करण : 2011, पृष्ठ संख्या —181
7).
अली सरदार जाफ़री — कबीर बानी  रचनाकार — राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., संस्करण : 2010, पृष्ठ संख्या — 87
8).
सं. टेकचंद शास्त्री — पुष्प-पराग (रचनाकार : तुलसीदास) — भारती सदन प्रकाशन — दिल्ली, संस्करण : 1955, पृष्ठ संख्या —77
9).
जयशंकर प्रसाद — चंद्रगुप्त (ऐतिहासिक नाटक) — साहित्य सेवा प्रकाशन, परमानंदपुर (वाराणसी), छात्र संस्करण, पृष्ठ संख्या — 78, द्वितीय अंक, दृश्य: एक, गायन — कार्नेलिया
10).

प्र.सं. डॉ. नगेन्द्र/सं. डॉ. हरदयाल — हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर बुक्स प्रकाशन, नयी दिल्ली, 70 वाँ संस्करण, 2019, पृष्ठ संख्या — 118


परिशिष्ट :—
1).
बेगमपुरा शहर कौ नांउ, दुखू अंदोह नहीं तिहिं ठांउ।
नां तसवीस खिराजु न मालु, खउफु न खता न तरसु जवालु॥
अब मोहि खूद वतन गह पाई, ऊंहा खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु दाइमु सदा पातसाही, दोम न सेम एक सो आही॥
आबादानु सदा मसहूर, ऊँहा गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै, महरम महल न कौ अटकावै।
कहि रैदास खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीत हमारा॥

[स्रोत :पुस्तक : रैदास ग्रंथावली (पृष्ठ 181) प्रकाशन : साहित्य संस्थान संस्करण : 2011]
***

2).
अवधू बेगम देस हमारा।
राजा-रंक-फ़क़ीर-बादसा सबसे कहौं पुकारा।
जो तुम चाहो परम पद को, बसिहो देस हमारा॥
जो तुम आये झीने होके, तजो मन की भारा।
धरन-अकास-गगन कछु नाहीं, नहीं चंद्र नहिं तारा॥
सत्त-धर्म की हैं महताबें, साहेब के दरबारा।
कहैं कबीर सुनो हो प्यारे, सत्त-धर्म है सारा॥

[स्रोत :पुस्तक : कबीर बानी (पृष्ठ 87) रचनाकार : अली सरदार जाफ़री प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. संस्करण : 2010]

3).
जहवाँ से आयो अमर वह देसवा
पानी न पान धरती अकसवा, चाँद न सूर न रैन दिवसवा।
बाम्हन छत्री न सूद्र बैसवा, मुगल पठान न सैयद सेखवा।
आदि जोति नहि गौर-गनेसवा, ब्रह्मा-बिस्नु-महेस न सेसवा।
जोगी न जंगम मुनि दुर्बेसवा, आदि न अंत न काल कलेसवा।
दास कबीर ले आये संदेसवा, सारसब्द गहि चलो ओहि देसवा।
***

4).
राम राज बैठे त्रैलोका।
हर्षित भए गए सब सोका॥
बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप बिषमता खोई॥

वरनाश्रम निज निज धरम, निरत वेद-पथ लोक।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं, नहिं भय रोग न सोक॥

दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहिं व्यापा॥
सबु नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं।
पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
रामभगति रत नर अरु नारी।
सकल परम गति के अधिकारी॥

[स्रोत :पुस्तक : पुष्प-पराग (पृष्ठ 77) संपादक : टेकचंद शास्त्री रचनाकार : तुलसीदास प्रकाशन : भारती सदन, दिल्ली संस्करण : 1955]
***

5).
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुम्भ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मंदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा।।

[स्रोत :पुस्तक : चंद्रगुप्त (पृष्ठ 92) रचनाकार : जयशंकर प्रसाद प्रकाशन : भारती भंडार, लीडर प्रेस संस्करण : 1958]
***

6). 
तुकाराम का पद :—

खेळ मांडीयेला वाळवंटी घाई |
नाचती वैष्णव भाईं रे |
क्रोध अभिमान गेला पावटणी |
एक एका लागतील पायीं रे ||धृ||

गोपीचंदनउटी तुळसीच्या माळा |
हार मिरविती गळां |
टाळ मृदुंग घाई पुष्प वर्षाव |
अनुपम्य सुखसोंहळा रे ||1||

वर्णअभिमान विसरली याती |
एकएकां लोटांगणीं जाती |
निर्मळ चित्तें जालीं नवनीतें |
पाषाणा पाझर सुटती रे ||2||

होतो जयजयकार गर्जत अंबर |
मातले हे वैष्णव वीर रे ।
तुका ह्मणे सोपी केली पायवाट |
उतरावया भवसागर रे ||3||
★★★
शोधार्थी: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, क्रांतिकारी जनपक्षधर्मी मूलनिवासी बहुजन किसान अर्जक कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Sunday, 16 August 2026

बौद्ध नाग पंचशील पर्व || गोलेन्द्र पटेल

बौद्ध नाग पंचशील पर्व

नमो बुद्धाय। घर-घर बुद्ध, हर घर बुद्ध।

श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाए जाने वाले बौद्ध नाग पंचशील पर्व को बौद्ध परंपरा में नागवंश, बुद्ध-धम्म, पंचशील, वर्षावास और सामुदायिक नैतिक जीवन की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। इस दृष्टि में यह पर्व केवल सर्प-पूजा तक सीमित न होकर करुणा, अहिंसा, शील, समता और मानवता का संदेश देता है। ‘नाग’ शब्द को केवल सर्प के अर्थ में देखना उचित नहीं माना जाता। भारतीय इतिहास, बौद्ध साहित्य और लोकपरंपराओं में नाग एक प्राचीन समुदाय और राजवंश के रूप में भी वर्णित हैं। बुद्ध से जुड़े अनेक कलात्मक रूपों में नाग-छत्र दिखाई देता है। बौद्ध परंपरा में मूचुलिंद नाग की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें वे ध्यानमग्न बुद्ध की वर्षा से रक्षा करते हैं। इसलिए नाग-प्रतीक को बुद्ध-धम्म की करुणा, संरक्षण और लोकस्मृति के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।बौद्ध नाग पंचशील पर्व की लोक-स्मृति में शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नागवंशी राजाओं का उल्लेख मिलता है। परंपरा के अनुसार इन पाँच राजाओं को बुद्ध-रक्षक पंचमुखी नाग के प्रतीक से जोड़ा जाता है। व्यापक नाग-परंपरा में अनंत, वासुकी, तक्षक, करकोटक और ऐरावत सहित अनेक नागराजाओं के नाम भी मिलते हैं। इन ऐतिहासिक एवं लोकपरंपरागत स्मृतियों को प्रमाणों के साथ समझना नागवंश की विरासत के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण आधार है।

बुद्धकालीन वर्षावास भी इस पर्व की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने में महत्त्वपूर्ण है। वर्षा ऋतु में भिक्खु एक स्थान पर निवास करते, धम्म का अध्ययन-मनन करते और गृहस्थों को नैतिक जीवन का मार्ग बताते थे। ऐसे सामुदायिक वातावरण में पंचशील—प्राणी-हिंसा से विरति, चोरी से विरति, काम-दुराचार से विरति, असत्य वचन से विरति और मादक पदार्थों से विरति—व्यक्तिगत तथा सामाजिक अनुशासन का आधार बनता था। नाग पंचशील की स्मृति को इसी नैतिक चेतना से जोड़कर देखने पर पर्व का मूल संदेश अधिक व्यापक हो जाता है। इसका केंद्र किसी जीव के प्रति भय या अंधविश्वास नहीं, बल्कि दया, करुणा, शांति, अहिंसा और सह-अस्तित्व होना चाहिए। साँपों को दूध पिलाने जैसी प्रथाओं के बजाय वैज्ञानिक समझ के साथ वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार आवश्यक है। इस पर्व का एक सुंदर लोक-संदेश पक्षी संरक्षण भी हो सकता है। सावन-भादों में पक्षियों के लिए दाना और स्वच्छ जल उपलब्ध कराना, पेड़-पौधों तथा प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना और जीव-जगत के प्रति करुणा रखना बुद्ध की करुणा-दृष्टि को व्यवहार में उतारने का सरल माध्यम है।

नागवंश से जुड़े अनेक ऐतिहासिक दावे लोकपरंपराओं और वैकल्पिक इतिहास-दृष्टियों में मिलते हैं। शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नामों तथा कन्हेरी आदि स्थलों से जुड़े नाग-प्रतीकों का उल्लेख भी मिलता है। किंतु ऐसे विशिष्ट ऐतिहासिक दावों को पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर अलग-अलग जाँचना आवश्यक है। लोकस्मृति और इतिहास दोनों का सम्मान तभी सार्थक है, जब आस्था के साथ प्रमाण और तर्क को भी स्थान दिया जाए। इसी प्रकार जातक कथाओं की संख्या से सीधे अठारह पुराणों की संख्या निकलने का दावा ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में स्वीकार करने से पहले प्रमाण की अपेक्षा करता है। इतिहास का पुनर्पाठ आवश्यक है, लेकिन पुनर्पाठ का आधार प्रमाण, तर्क और आलोचनात्मक विवेक होना चाहिए। आज नाग पंचशील पर्व को इसी व्यापक अर्थ में पुनर्जीवित किया जा सकता है—अतीत की स्मृति, बुद्ध का धम्म, पंचशील का आचरण, प्रकृति के प्रति करुणा और मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता। पर्व तभी सार्थक है, जब वह केवल अनुष्ठान न रहकर जीवन-व्यवहार में दिखाई दे।

नाग पंचशील का संदेश यही हो—
अहिंसा हमारे कर्म में, सत्य हमारे वचन में,
करुणा हमारे हृदय में और मानवता हमारे जीवन में हो।

नमो बुद्धाय।
जय करुणा। जय समता। जय मानवता।

नाग पंचशील : बुद्ध, नाग और मानवता का महापर्व

नमो बुद्ध, करुणा-धन, नमो धम्म उजियार।
नमो संघ समता-सुधा, मिटे तिमिर-अंधकार॥

घर-घर बुद्ध-विचार हो, हर आँगन हो ज्ञान।
मित्रता, मुहब्बत, मनुजता—यही बने अभियान॥

दया धर्म का मूल है, करुणा जीवन-प्राण।
अहिंसा से विश्व में, जागे नव सम्मान॥

श्रावण शुक्ल की पंचमी, पर्व पुरातन गान।
नाग-पंचशील नाम से, जागे बुद्ध-विधान॥

बुद्ध-वचन की छाँह में, हो जीवन अनुशास।
शील-साधना से मिटे, मन का तम और त्रास॥

नागवंश की लोक-स्मृति, रखे पुराना मान।
इतिहासों की धूल में, खोजे अपना ज्ञान॥

कथा-कहानी के परे, देखो मानव रूप।
नाग कहे जिस जाति को, उसमें मन का धूप॥

जो भी मानव जन्म ले, मानव उसका नाम।
जाति-वर्ण की दीवारें, करतीं जग बदनाम॥

शेष भोगिन चंद्रांशु, धम्मवर्मन वंगार।
अनंत वासुकी तक्षक, करकोटक ऐरावत॥

बुद्ध धम्म की राह में, नाग हुए अनुरक्त।
समता, मैत्री, शील से, जीवन हुआ आसक्त॥

कहीं शेष की गाथा है, कहीं वासुकी नाम।
अनंत, पद्म, कंबलादि—लोक-स्मृति में धाम॥

कालिय, शंखपाल भी, कथाओं में विख्यात।
नागवीरों की लोक में, गूँज रही सौगात॥

परंपराओं के अर्थ को, पढ़ना होगा आज।
साँपों के मिथ में कहीं, छिपा हुआ है राज॥

रूपक के आवरण तले, इतिहासों की छाप।
पढ़ने वाला खोलता, सदियों का संताप॥

बुद्ध-मूर्ति के शीश पर, नाग-छत्र जब होय।
करुणा-रक्षक स्मृति का, अर्थ नया तब होय॥

मूचुलिंद की लोककथा, देती यही संदेश।
बुद्ध-विचार की छाँह में, सेवा सबसे विशेष॥

प्राणी-हिंसा से रहो, मन-वचन-कर्म विरत।
सत्य-वचन को धारकर, जीवन रखो निर्मल॥

दुराचार से दूर रहो, संयम अपना धर्म।
लोभ-मोह के बंधनों, से रखो जीवन वर्म॥

मदिरा-मादक से बचो, जाग्रत रखो विवेक।
पंचशील की साधना, मन को करती नेक॥

नहीं किसी पर क्रोध हो, नहीं किसी से द्वेष।
मैत्री का दीपक जले, मिटे हृदय का क्लेश॥

शील जहाँ व्यवहार में, वहीं धम्म साकार।
केवल पूजा से नहीं, बदलो जीवन-व्यवहार॥

बरखा आई, राह में, नदियाँ उठीं उफान।
भिक्खु एक ही स्थान पर, करते धम्म-ध्यान॥

वर्षावास के समय में, रुकता था परिव्राज।
सुनते जन उपदेश तब, खुलता मन का राज॥

गाँव-गाँव में बैठकर, बुद्ध-वचन पर बात।
शील, करुणा, मैत्री की, होती थी बरसात॥

घर-घर जागे चेतना, जन-जन पाए ज्ञान।
मानवता की साधना, बने लोक-अभियान॥

श्रावण की उस साधना, में सामूहिक भाव।
एक-दूसरे के लिए, बढ़ता प्रेम-सद्भाव॥

नगर बसाने वालों की, स्मृति कहती बात।
नाग-नाम से जुड़ गए, नगर और भू-भाग॥

इतिहासों में खोजिए, लोक-स्मृति के सूत्र।
नाम, शिलालेख, कथाएँ—सब हैं अपने पूरक॥

राज्य, गण और संघ में, चलता था व्यवहार।
योग्य व्यक्ति को चुनने का, होता था अधिकार॥

कहीं कुश्ती, कहीं धनुष, कहीं अश्व की चाल।
साहस, कौशल, शक्ति का, होता था प्रतिपाल॥

आज दंगल, खेल और, कौशल के उत्सव।
लोक-स्मृति में जीवित हैं, बीते युग के स्वर॥

वीरता का अर्थ है, निर्बल का सम्मान।
शक्ति वही सार्थक बने, जो रखती कल्याण॥

इतिहासों की धूल में, दबे अनेक प्रसंग।
पढ़ने से खुलते कभी, स्मृति-ग्रंथ के रंग॥

किताबें चेतन-मन की, धूल हटातीं आज।
प्राचीनों से जोड़तीं, वर्तमान का राज॥

तर्क-प्रमाण की रोशनी, रखो सदैव साथ।
अंधविश्वासों से नहीं, सत्य बनेगा पथ॥

जो प्रमाण से सिद्ध हो, उसको दो सम्मान।
जो केवल आख्यान हो, उसको मानो ज्ञान॥

प्रश्न करो निर्भीक हो, यही विवेक-विधान।
जिज्ञासा से ही खुले, इतिहासों का ज्ञान॥

नाग शब्द के अर्थ को, केवल सर्प न मान।
लोक-परंपरा में मिले, अर्थ अनेक महान॥

कथा जहाँ प्रतीक बने, अर्थ वहाँ बहुतेर।
रूपक के भीतर छिपे, इतिहासों के फेर॥

सर्पों को दूध पिलाना, तर्क नहीं स्वीकार।
प्रकृति-विज्ञान समझकर, करो जीव से प्यार॥

जीव-जगत के प्राणियों, पर मत करना अत्याचार।
दूध चढ़ाने से अधिक, दया करो अपार॥

साँप भी धरती के जीव हैं, उनका भी संसार।
अंधविश्वासों से उन्हें, मत देना उपहार॥

नाग कहे तो मानव हो, सर्प कहे तो जीव।
दोनों की अपनी जगह, दोनों के अधिकार॥

शेष, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन, वंगर नाम।
लोक-स्मृति में आज भी, गूँज रहे हैं धाम॥

राजाओं की गाथा को, प्रमाणों से परखो।
सिक्के, शिलालेख, पुरातत्त्व—सबसे सत्य परखो॥

कन्हेरी की गुफाओं में, नाग-छत्र का रूप।
बुद्ध-प्रतिमा के साथ है, स्मृति का सुंदर धूप॥

पाँच फनों की छाँह में, पाँच प्रतीकों की बात।
लोककथा और इतिहास में, खोजो उनके अर्थ॥

सात-फनों की छवि मिले, तो भी प्रश्न करो।
प्रतीकों के मूल अर्थ को, तर्क-ज्योति से धरो॥

नागकन्या का अर्थ हो, केवल सर्प न जान।
लोक-संदर्भ के भीतर, देखो मानव-प्राण॥

नागमणि की चमक से अधिक, ज्ञान-मणि अनमोल।
मुनि बने जो साधना से, उसका ऊँचा मोल॥

नागमुनि की लोककथा, साधक की पहचान।
ज्ञान-ध्यान से श्रेष्ठ हो, ऐसा हो इंसान॥

मिथक अगर मनुष्य को, बाँटें ऊँच-नीच।
ऐसी कथा पर प्रश्न हो, विवेक रहे सदा नींव॥

मानव को मानव समझना, सबसे ऊँचा धर्म।
दया, शांति, समता बने, जीवन का सत्कर्म॥

आज पर्व का अर्थ हो, केवल पूजा-पाठ।
जीव-जगत की रक्षा में, बढ़े मनुष्य का हाथ॥

आँगन में दाना रखो, छत पर रखो अन्न।
वृक्ष तले जल भी रखो, जीव रहें प्रसन्न॥

चावल, गेहूँ, चना रखो, मटर रखो सम्मान।
भूखे पंछी लौटकर, पाएँ अपना स्थान॥

बरखा में जब अन्न कम, तब बनो उनका मित्र।
दाना देकर बचाइए, जीवन का यह चित्र॥

जो पंछी कल दिखते थे, आज न दिखते पास।
उनकी घटती संख्या पर, मन में जागे आस॥

बचे हुए जो जीव हैं, उनको दो संरक्षण।
करुणा ही सच्चा बने, मानव का आभूषण॥

नहीं किसी को मारना, नहीं किसी को छल।
सत्य-संयम साथ लेकर, जीवन करना सफल॥

लोभ-मोह से दूर हो, निर्मल हो व्यवहार।
मादकता से मुक्त मन, जागे विवेक-विचार॥

जाति-वर्ण का भेद मिटे, मिटे घृणा-अभिमान।
मानव-मानव एक हों, यही धर्म की शान॥

नारी, नर, श्रमिक, कृषक, सबका हो सम्मान।
जिसके श्रम से जग चले, उसका ऊँचा मान॥

धर्म वही जो जोड़ता, धर्म वही जो शील।
धर्म वही जो दुख हरे, करुणा जिसकी नील॥

धम्म-ज्योति फिर जल उठे, मिटे अज्ञान-तम।
बुद्ध-विचारों से बने, मानवता का क्रम॥

नहीं किसी के वर्चस्व की, चाह रहे संसार।
समता, न्याय, बंधुत्व से, हो जन-जन उद्धार॥

बुद्ध न केवल नाम हैं, बुद्ध विचार महान।
तर्क, करुणा, शील से, निर्मित हो इंसान॥

नहीं अतीत की अंधभक्ति, नहीं वर्तमान-विस्मार।
सत्य जहाँ प्रमाणित हो, उसको दें स्वीकार॥

अतीत से सीखें मगर, भविष्य करें निर्माण।
ज्ञान-विवेक के दीप से, रोशन हो जहान॥

नाग पंचशील पर्व पर, यही रहे संकल्प।
मन में बुद्ध-विचार हो, जीवन हो निष्कलंक॥

घर-घर बुद्ध-विचार हो, हर घर पंचशील।
द्वेष-दंभ सब दूर हों, मन हो निर्मल-नील॥

पक्षी, पशु, वन, जल, धरा—सबका हो अधिकार।
जीवन के हर रूप पर, बरसे प्रेम अपार॥

जाति-धर्म की सीम से, ऊपर उठता मानव।
करुणा जिसकी शक्ति हो, सत्य बने उसका धन॥

मित्रता में मूल हो, मुहब्बत में विस्तार।
मानवता में सार हो, मुक्ति बने उद्गार॥

बुद्ध-वचन की राह पर, चलना हो अभियान।
मानव-मानव एकसम, यही हमारा गान॥

नमो बुद्धाय मंत्र से, जागे जन-जन प्राण।
नमो धम्म, नमो संघ, नमो मानव सम्मान॥

नागवंश की लोक-स्मृति, बुद्ध धम्म का मान।
तर्क, करुणा, शील से, गढ़ें नया इंसान॥

जय करुणा, जय शांति हो, जय समता का ज्ञान।
घर-घर बुद्ध, हर घर बुद्ध—मानवता महान॥
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, क्रांतिकारी जनपक्षधर्मी मूलनिवासी बहुजन किसान अर्जक कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

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Saturday, 15 August 2026

कुर्मी एकता : उपजातियों से ऊपर उठने का समय || अर्जक कवि गोलेन्द्र पटेल

कुर्मी एकता : उपजातियों से ऊपर उठने का समय


“जब जनता एक हो जाती है, तब उसके सामने क्रूर से क्रूर शासन भी नहीं टिक सकता। अतः जात-पांत के ऊँच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सब एक हो जाइए।” और “आज हमें ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेदभावों को समाप्त कर देना चाहिए, तभी हम एक उन्नत देश की कल्पना कर सकते हैं।” लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के इन विचारों पर कुर्मी समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि इन शब्दों में केवल राष्ट्र की एकता का संदेश नहीं, बल्कि सामाजिक बिखराव से बाहर निकलने की प्रेरणा भी निहित है। निःसंदेह सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय एकता के महानायक हैं। उन्होंने 562 रियासतों को भारत में एकीकृत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और बिखरी हुई राजनीतिक शक्तियों को एक राष्ट्र की भावना से जोड़ने का असाधारण कार्य किया। इसलिए कुर्मी समाज के सामने आज एक आत्ममंथन का प्रश्न खड़ा होता है। जिस महापुरुष को हम अपना महानायक मानते हैं, उनकी एकता की भावना को हम अपने सामाजिक जीवन में कितना उतारते हैं?

यह उपजातियों से ऊपर उठने का समय है। कुर्मी समाज की अनेक उपजातियाँ अपने-अपने नाम, क्षेत्र, परंपरा और स्थानीय पहचान रखती हैं। इन विविधताओं का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन विविधता तब दुर्बलता बन जाती है, जब वह आपसी श्रेष्ठता, दूरी और भेदभाव का आधार बन जाती है। यदि 500 से अधिक उपजातीय पहचानों में बँटा समाज एक-दूसरे को छोटा-बड़ा मानता रहता है, तो उसकी सामूहिक सामाजिक और राजनीतिक शक्ति स्वाभाविक रूप से कमजोर होती है। नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन संघर्ष, आकांक्षाएँ और भविष्य की चुनौतियाँ अनेक स्तरों पर साझा हैं। कुर्मी समाज को यह समझना होगा कि कोई भी उपजाति अकेले इतनी बड़ी नहीं होती कि वह अपने प्रत्येक सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्न का समाधान कर सके। सामूहिक शक्ति संगठन से पैदा होती है और संगठन समानता की भावना से मजबूत होता है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सी उपजाति बड़ी है और कौन-सी छोटी; सवाल यह होना चाहिए कि पूरा कुर्मी समाज कितना शिक्षित, संगठित, जागरूक, आत्मनिर्भर और न्यायप्रिय बन रहा है।

बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के कथन—“मेरे लिए मेरे व्यक्तिगत हितों से ज्यादा महत्वपूर्ण राष्ट्र हित हैं, किंतु यदि दलितों के हित और राष्ट्र-हित के बीच कोई टकराव की स्थिति आएगी, तो मैं दलितों के हित को वरीयता दूँगा।”—का प्रसंग भी यहाँ महत्त्वपूर्ण है। यह विचार हमें बताता है कि व्यापक हित की कल्पना करते समय अपने समुदाय के कमजोर और वंचित लोगों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुर्मी एकता का अर्थ केवल संख्या बढ़ाना या चुनावी शक्ति बनना नहीं है; इसका अर्थ समाज के भीतर शिक्षा, सम्मान, अवसर, समानता और न्याय को मजबूत करना भी है। कुर्मी एकता का अर्थ किसी दूसरी जाति के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। सच्ची एकता किसी के प्रति घृणा पर नहीं, बल्कि अपने समाज के भीतर समानता और पारस्परिक सहयोग पर खड़ी होती है। कुर्मी समाज यदि वास्तव में अपने महापुरुषों का सम्मान करना चाहता है, तो उसे उनके विचारों को केवल जयंतियों, मूर्तियों और नारों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। विचारों का सम्मान तभी सार्थक होता है, जब वे सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनते हैं।

इसलिए उपजातीय अहंकार से ऊपर उठना होगा। विवाह, खान-पान, सामाजिक संबंध, संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में संकीर्ण उपजातीय मानसिकता पर पुनर्विचार करना होगा। योग्य व्यक्ति को केवल उसकी उपजाति देखकर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, ईमानदारी, सामाजिक प्रतिबद्धता और सामूहिक हित के प्रति उसके योगदान के आधार पर सम्मान देना होगा। तभी एक व्यापक और मजबूत कुर्मी चेतना विकसित हो सकती है। कुर्मी समाज के युवाओं की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। नई पीढ़ी यदि पुराने उपजातीय पूर्वाग्रहों को ढोती रहेगी, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी विभाजन को विरासत में पाएँगी। लेकिन यदि युवा शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और पारस्परिक सहयोग को अपना आधार बनाते हैं, तो वे समाज की दिशा बदल सकते हैं। सोशल मीडिया और आधुनिक संचार के युग में उपजातीय दीवारों को और मजबूत करने के बजाय व्यापक संवाद और सामाजिक एकता का माध्यम बनाया जाना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि कुर्मी समाज अपने भीतर यह भावना विकसित करे; उपजाति हमारी स्थानीय पहचान हो सकती है, लेकिन हमारी सामूहिक पहचान हमें बाँटने का साधन नहीं बननी चाहिए। हम अलग-अलग उपनामों और परंपराओं के साथ रहते हुए भी एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बन सकते हैं। हम अपनी विविधता को बचाते हुए अपनी सामाजिक एकता को मजबूत कर सकते हैं।

रियासतों को जोड़ने वाले सरदार पटेल से यदि वास्तव में प्रेरणा लेनी है, तो पहले अपने भीतर खड़ी उपजातीय दीवारों को पहचानना होगा। संख्या तभी शक्ति बनती है, जब संख्या संगठन में बदलती है; संगठन तभी शक्ति बनता है, जब उसमें समानता होती है; और समानता तभी स्थायी होती है, जब उसमें शिक्षा, विवेक, न्याय और भाईचारा होता है। अब समय आ गया है कि कुर्मी समाज पूछे कि हम 500 से अधिक उपजातीय नामों में बँटे रहकर अपनी शक्ति को खंडित करते रहेंगे या अपनी विविध पहचानों का सम्मान करते हुए एक व्यापक कुर्मी एकता का निर्माण करेंगे? यदि सरदार पटेल ने सैकड़ों रियासतों को एक भारत की भावना में जोड़ने का साहस दिखाया, तो कुर्मी समाज भी अपनी उपजातीय दूरियों को कम करके एक मजबूत, शिक्षित, संगठित और न्यायप्रिय समाज का निर्माण कर सकता है। उपजातियाँ रहें, लेकिन उपजातीय विभाजन न रहे। पहचानें रहें, लेकिन पहचान के नाम पर भेदभाव न रहे। विविधता रहे, लेकिन मन में दूरी न रहे। कुर्मी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी संख्या में नहीं, उसकी एकता, शिक्षा, संगठन और सामाजिक चेतना में निहित है। वैसे, यदि आप अपने समाज के राष्ट्रसंत तुकाराम, राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज और महामना रामस्वरूप वर्मा जी के विचारों को आत्मसात करेंगे, तो संकीर्ण जातीय बंधनों से मुक्त होकर समानता, विवेक, मानवता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक उदार, प्रगतिशील और संवेदनशील नागरिक के रूप में विकसित होंगे।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (
पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन अर्जक कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

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बहुजन मुक्ति का प्रश्न: जातिगत विखंडन से बौद्धिक एकता तक || अर्जक कवि गोलेन्द्र पटेल

बहुजन मुक्ति का प्रश्न: जातिगत विखंडन से बौद्धिक एकता तक
मनुवादी, सामंती, ब्राह्मणवादी और हर प्रकार की सामाजिक वर्चस्ववादी व्यवस्था ने सदियों से आर्थिक रूप से कमजोर, शैक्षणिक रूप से वंचित और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों का शोषण किया है। यह इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान में भी अनेक रूपों में दिखाई देता है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि अक्षम्य अत्याचार,  असमानता और शोषण के बावजूद SC, ST और OBC समाज के भीतर व्यापक सामाजिक चेतना, संगठन और प्रतिरोध अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है मानो समाज नींद में नहीं, बल्कि अपनी सामूहिक चेतना खोकर निष्क्रियता की स्थिति में पहुँच गया है। बहुजन समाज को इस निष्क्रियता से बाहर निकलकर शिक्षा, संगठन, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संघर्ष के माध्यम से अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी। बहुजन मुक्ति किसी एक जाति की नहीं, बल्कि सभी वंचितों की सामूहिक चेतना, एकता और न्यायपूर्ण संघर्ष से संभव होती है। इस देश में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता है, जब जातिगत वर्चस्व, सामंती मानसिकता और सामाजिक भेदभाव के कारण किसी SC, ST या OBC समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा या हत्या की खबर सामने न आती हो। यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता और जातिगत वर्चस्व की गंभीर समस्या को उजागर करती है।

सबसे अधिक विचारणीय और चिंताजनक बात यह है कि कुर्मी समाज के लोगों पर भी लगातार हिंसा और हमले की घटनाएँ सामने आती हैं, लेकिन समाज के नाम पर नेतृत्व करने वाले अनेक नेता इन सवालों पर अपेक्षित गंभीरता, एकजुटता और सक्रियता नहीं दिखाते। जब बहुजन समाज के किसी व्यक्ति पर अत्याचार होता है, तब जाति, क्षेत्र और राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर न्याय की आवाज़ बुलंद करना आवश्यक है। बहुजन मुक्ति का अर्थ केवल अपनी जाति की चिंता करना नहीं, बल्कि हर शोषित, वंचित और पीड़ित मनुष्य के सम्मान, सुरक्षा और न्याय के लिए खड़ा होना है। इसलिए नेतृत्व का दायित्व आत्ममुग्धता नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, संगठन, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध लोकतांत्रिक संघर्ष को मजबूत करना है। मुझे तो कुर्मियों पर दया आती है! मनुवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने OBC समाज में सबसे अधिक कुर्मियों को उपजातियों में बाँटकर उन्हें अपनी पूँछ बना रखा है। कुर्मियों को अपने यादव-कुशवाहा भाइयों से सीखना चाहिए कि एकता क्या होती है! कुर्मी समाज की स्थिति पर विचार करते हुए चिंता होती है कि व्यापक बहुजन समाज को जातिगत और उपजातिगत विभाजनों में बाँटने वाली सामाजिक संरचनाओं ने उसकी सामूहिक शक्ति को लंबे समय से कमजोर किया है। किसी भी वर्चस्ववादी व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता यही होती है कि वह शोषित और वंचित समुदायों को आपस में विभाजित रखे, ताकि वे अपने साझा हितों और अधिकारों के लिए एकजुट होकर आवाज़ न उठा सकें।

कुर्मी समाज को अपने इतिहास, श्रम और सामाजिक योगदान की चेतना के साथ अपने भीतर की उपजातिगत दूरियों को कम करना चाहिए। साथ ही यादव, कुशवाहा और अन्य OBC तथा बहुजन समुदायों से भी यह सीखने की आवश्यकता है कि सामाजिक एकता, संगठन और साझा अधिकारों के लिए सामूहिक चेतना कितनी महत्वपूर्ण होती है। बहुजन एकता किसी एक जाति की श्रेष्ठता पर नहीं, बल्कि समानता, पारस्परिक सम्मान, संवैधानिक अधिकार और साझा संघर्ष पर आधारित होती है। इसलिए आवश्यकता किसी समुदाय को नीचा दिखाने की नहीं, बल्कि सभी बहुजन समुदायों को विभाजनकारी मानसिकता से ऊपर उठाकर एक-दूसरे का सहयोगी बनाने की है। SC, ST, OBC एकता ज़िंदाबाद! बहुजन समाज की वास्तविक एकता केवल नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा और संगठन से मजबूत होती है। जब तक जाति के नाम पर समाज को बाँटने वाले स्वार्थी नेतृत्व और संकीर्ण मानसिकता में बदलाव नहीं आता, और जब तक बहुजन समाज अपने अधिकारों, इतिहास तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति बौद्धिक रूप से जागरूक नहीं होता, तब तक सामाजिक परिवर्तन अधूरा रहता है। वर्चस्ववादी और शोषणकारी सामाजिक संरचनाएँ तभी कमजोर होती हैं, जब बहुजन समाज विभाजन से ऊपर उठकर समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के लिए संगठित होता है। शिक्षित बनें, संगठित हों, संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष करें—बहुजन एकता ज़िंदाबाद!

बहुजन समाज ने लंबे समय से अपने बौद्धिक चिंतकों, अर्जक कवियों, लेखकों और विचारकों को वह महत्व नहीं दिया है, जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं। उसने अपने समाज के सृजनशील और वैचारिक नेतृत्व की अपेक्षा नेताओं, राजनेताओं, सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को अधिक महत्व दिया है। यही असंतुलन बहुजन समाज की वैचारिक प्रगति के मार्ग में एक बड़ी बाधा बनता है। बहुजन मुक्ति केवल सत्ता में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने से संभव नहीं होती; इसके लिए सामाजिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा, वैचारिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की समझ भी आवश्यक होती है। जब तक बहुजन समाज अपने अर्जक कवियों, लेखकों, चिंतकों और ज्ञान-सृजकों को सम्मान और महत्व नहीं देता, तब तक उसकी मुक्ति का संघर्ष अधूरा रहता है। जातिगत नेतृत्व समाज को संगठित कर सकता है, लेकिन बौद्धिक चेतना समाज को दिशा देती है। इसलिए बहुजन समाज को राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ अपने बौद्धिक और सांस्कृतिक नेतृत्व को भी मजबूत करना होगा। बहुजन मुक्ति का स्थायी आधार सत्ता नहीं, बल्कि जागरूक, शिक्षित, संगठित और वैज्ञानिक चेतना से संपन्न समाज है।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (
पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन अर्जक कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

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Friday, 14 August 2026

दोहरा मापदंड बंद करो — गोलेन्द्र पटेल || हत्या के ख़िलाफ़ कविता

दोहरा मापदंड बंद करो

इस देश में
जब एक नक्सली भरत तिवारी
पुलिस पर बंदूक तानकर
भगत सिंह या चंद्रशेखर आज़ाद हो सकता है
तो एक लक्ष्मण जैसा भाई राहुल चौधरी
अपने भाई का बदला लेकर
सुभाष चंद्र बोस या उधम सिंह
क्यों नहीं हो सकता?

सवाल किसी हत्या को सही ठहराने का नहीं
सवाल उस दोहरे मापदंड का है
जहाँ हिंसा के अलग-अलग चेहरों के लिए
अलग-अलग शब्द गढ़े जाते हैं।

सुप्रिया की हत्या हुई 
सवाल खड़ा रहा
हेमंत का लहू बहा
सवाल खड़ा रहा
कर्तव्य मारा गया
सवाल खड़ा रहा
अरुण की साँस रुकी
सवाल खड़ा रहा
केसपाल की हत्या हुई
सवाल खड़ा रहा।

कालीशंकर चला गया
प्रदीप चला गया
आदेश की भी साँस थम गई
मगर हर बार
एक ही सवाल
फाइलों के नीचे दबा रहा
हत्यारों पर NSA कहाँ था?
न्याय का वह कठोर हाथ
तब कहाँ था?

और जब
पुरानी रंजिश की आग में
एक और हत्या का आरोप सामने आया
तो कानून की पूरी ताकत
एक परिवार के दरवाजे पर आ गई
मैं हत्या का समर्थन नहीं करता
क्योंकि हत्या
न्याय का विकल्प नहीं है
पर मैं यह भी पूछता हूँ

न्याय समय पर क्यों नहीं मिलता?
शिकायत की आवाज
कब तक दीवारों से टकराती है?
कानून की आँख
हर नागरिक के लिए
एक जैसी क्यों नहीं होती?
यदि अपराध हुआ है
कानून अपना काम करे
मगर कानून
प्रतिशोध का दूसरा नाम न बने।

दोषी को सजा मिले
निर्दोष न कुचला जाए
आरोप हो तो निष्पक्ष जाँच हो
सत्ता का डंडा
जाति देखकर न उठे
और न जाति देखकर झुके
क्यों किसी की हत्या पर
सन्नाटा लंबा होता है
और किसी दूसरी घटना पर
राज्य की पूरी शक्ति
तुरंत जाग जाती है?

क्यों किसी परिवार का दर्द
समाचार बनकर रह जाता है
और किसी परिवार पर
कानूनी धाराओं की आँधी टूट पड़ती है?
यही तो सवाल है
दोहरा मापदंड बंद करो!

पटेल हो, चौधरी हो, यादव हो, तिवारी हो
या कोई और नाम
खून का रंग एक है
संविधान का अधिकार एक है
न्याय का तराजू एक होना चाहिए
किसी राहुल को
नायक बनाकर हत्या का महिमामंडन मत करो
लेकिन किसी राहुल को
न्याय से वंचित करके
हिंसा की राह पर धकेलने वाली
व्यवस्था से भी सवाल करो।

क्योंकि
जब न्याय देर करता है
तो समाज में
अविश्वास जन्म लेता है
और जब कानून
समान नहीं दिखता
तो व्यवस्था की नींव
कमजोर होती है
हमें बदला नहीं
न्याय चाहिए
हमें हिंसा नहीं
निष्पक्ष कानून चाहिए।

हमें किसी जाति के लिए
विशेष कृपा नहीं
हर नागरिक के लिए समान अधिकार चाहिए
और सत्ता से हमारा प्रश्न
आज भी वही है
कितने घर उजड़ेंगे
तब तुम्हें आँकड़े दिखाई देंगे?
कितने परिवार रोएँगे
तब तुम्हें न्याय याद आएगा?
कितनी बार कानून
अलग-अलग तराजुओं में तौला जाएगा?

अब सवाल दबेगा नहीं
अब आवाज रुकेगी नहीं
दोहरा मापदंड बंद करो!
कानून को निष्पक्ष करो!
न्याय को समान करो!

पटेल समाज पूछता है
हमारा न्याय कहाँ है?
कुर्मी समाज पूछता है
हमारे अधिकार कहाँ हैं?
और संविधान पूछता है
क्या न्याय सबके लिए बराबर है?
उत्तर देना होगा
क्योंकि लोकतंत्र में
किसी की हत्या का बदला
दूसरी हत्या नहीं होती
लोकतंत्र का असली उत्तर
निष्पक्ष न्याय होता है
दोहरा मापदंड बंद करो
न्याय का तराजू बराबर करो
मानव-मानव एकसमान।
★★★

रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


***
हेमंत पटेल (वाराणसी),  
कर्तव्य पटेल (बदायूं),  
अरुण पटेल (प्रयागराज),  
केसपाल पटेल (फतेहपुर),  
कालीशंकर उत्तम पटेल (जहानाबाद),  
सुप्रिया पटेल (अयोध्या),  
अंशिका वर्मा (सुल्तानपुर),  
प्रदीप पटेल (मिर्जापुर),  
आदेश चौधरी (गोरखपुर)… इत्यादि की हत्या पर मौन कौन थे?

शेष बातें निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है:-

बेगमपुर से आधुनिक भारत तक : अमरदेसवा, रामराज्य और लोकतांत्रिक राष्ट्र की अंतःयात्रा || गोलेन्द्र पटेल

बेगमपुर से आधुनिक भारत तक : अमरदेसवा, रामराज्य और लोकतांत्रिक राष्ट्र की अंतःयात्रा सारांश भारतीय साहित्य में आदर्श समाज की कल्पना किसी एक...