Tuesday, 3 February 2026

बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक || गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप — गोलेन्द्र पटेल

बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक

बहुजन आंदोलन किसी एक काल या व्यक्ति की उपज नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे उस प्रतिरोध की निरंतरता है, जो बुद्ध की करुणा से शुरू होकर कबीर–रविदास की निर्भीक वाणी, फुले–सावित्रीबाई की शिक्षा-दृष्टि, शाहू की सामाजिक न्याय नीति और डॉ. अंबेडकर के संवैधानिक संघर्ष तक विकसित हुआ। पेरियार और कांशीराम ने इसे वैचारिक और राजनीतिक धार दी—जहाँ आत्मसम्मान, शिक्षा और सत्ता बहुजन मुक्ति के केंद्रीय औज़ार बने।

इसी ऐतिहासिक परंपरा में गोल्डेन दास एक समकालीन हस्तक्षेप के रूप में सामने आते हैं। वे बिहार में सक्रिय उस बहुजन नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सड़क, थाना और अदालत—तीनों स्तरों पर व्यवस्था से सीधा संवाद करता है। अनेक मुकदमे, बार-बार की जेल यात्राएँ और निरंतर विवाद—दरअसल उनके संघर्ष की सामाजिक कीमत हैं। गोल्डेन दास का नेतृत्व बहुजन समाज के उस आक्रोश को स्वर देता है, जो पुलिसिया दमन, जातिवादी अन्याय और संस्थागत चुप्पी के विरुद्ध खड़ा है।

बहुजन आंदोलन का लक्ष्य आज भी वही है—सामाजिक समानता, राजनीतिक भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक प्राप्ति। यह आंदोलन न तो स्मृति है, न नारा; यह एक जीवित संघर्ष है, जो नए समय में नए रूप लेकर सामने आ रहा है। गोल्डेन दास जैसे युवा नेता, सामाजिक योद्धा इसी परिवर्तनशील बहुजन चेतना के समकालीन संकेत हैं।

गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप

यह कोई एक नाम की कथा नहीं है
यह सदियों की चलती हुई पदचाप है
जिसमें तथागत की मौन करुणा है
और कबीर की आँखों में जलता प्रश्न।

रैदास ने सपने को
चर्मकार की झोपड़ी से उठाया
तुकाराम ने भक्ति को
ब्राह्मणवाद की कैद से छुड़ाया
फुले ने इतिहास को
पहली बार
शूद्र की आँख से पढ़ा
और सावित्रीबाई ने
ज्ञान को
स्त्री के हाथों में सौंप दिया।

शाहू ने सत्ता को
नीचे झुकना सिखाया
अंबेडकर ने संविधान में
बहुजन का हस्ताक्षर दर्ज किया
पेरियार ने ईश्वर से सवाल किया
कांशीराम ने कहा,
सत्ता ही सबसे बड़ा धर्म है।

यह परंपरा
किसी मंदिर में नहीं ठहरी
यह सड़क पर उतरी
थानों में दाख़िल हुई
और अदालतों से आँख मिलाकर बोली।

इसी परंपरा में
एक नाम और जुड़ता है
गोल्डेन दास।

वे किताब नहीं हैं
वे फ़ाइल भी नहीं
वे एफआईआर के पन्नों में
लिखा हुआ प्रतिरोध हैं
सत्तर मुक़दमे
दरअसल सत्तर बार
सिस्टम से की गई पूछताछ हैं
बीस जेल यात्राएँ
दरअसल बीस बार
अन्याय को दी गई चुनौती हैं।

वे थाने में जाते हैं
डर के साथ नहीं
संविधान लेकर
वे पूछते हैं
कानून किसके लिए है?
और जवाब न मिले तो
आवाज़ को और ऊँचा कर देते हैं।

बिहार की गलियों में
जब उनका नाम गूँजता है
तो दलित स्त्री की आँख
थोड़ी कम डरी होती है
पिछड़े मज़दूर की पीठ
थोड़ी कम झुकी होती है
अल्पसंख्यक बच्चे
थोड़ा सीधा चलते हैं।

वे विवाद हैं
क्योंकि अन्याय को
शांति पसंद नहीं आती
वे आक्रामक हैं
क्योंकि सदियों का अपमान
नरमी से नहीं टूटता।

बहुजन आंदोलन
कोई बीता हुआ अध्याय नहीं
यह वर्तमान का खुला घाव है
जो शिक्षा माँगता है
सम्मान माँगता है
और सत्ता में हिस्सेदारी माँगता है।

यह आंदोलन कहता है
हम 85 प्रतिशत हैं
फिर भी हाशिए पर क्यों?
यह आंदोलन कहता है
बहुजन हिताय
अब सिर्फ नारा नहीं
बहुजन सुखाय
अब नीति बनेगा।

इसलिए गोल्डेन दास
कोई अकेला व्यक्ति नहीं
वे एक निरंतरता हैं
बुद्ध से अंबेडकर तक
और अंबेडकर से
आज की सड़क तक।

यह क्रांतिकारी आवाज़ 
किसी महिमा का गीत नहीं
यह एक घोषणा है
कि बहुजन
अब इतिहास में नहीं
इतिहास के केंद्र में
खड़े होने आ रहे हैं

और यह यात्रा
अब लौटने वाली नहीं।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Monday, 2 February 2026

राजकुमार यादव : बहुजन बिरहा की समकालीन चेतना — गोलेन्द्र पटेल

राजकुमार यादव : बहुजन बिरहा की समकालीन चेतना


राजकुमार यादव आज के समय में बिरहा को केवल लोकगायन नहीं, बल्कि बहुजन समाज की वैचारिक आवाज़ में रूपांतरित करते हैं। पूर्वांचल की मिट्टी से निकली उनकी गायकी मनोरंजन से आगे बढ़कर जागरण का मिशन बन जाती है। वे उस बिरहा परंपरा के गायक हैं, जहाँ विरह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक होता है।

उनके गीत तथागत बुद्ध, संत कबीरदास, संत रविदास, संत तुकाराम, राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज, विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर, पेरियार, कांशीराम, ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा की वैचारिकी से संचालित हैं। जाति-व्यवस्था, मनुवाद, धार्मिक पाखंड, मीडिया-सत्ता गठजोड़ और संविधान की अवहेलना—ये सभी विषय उनकी गायकी में प्रतिरोध की भाषा पाते हैं। मंच पर उठता “जय भीम” और “नमो बुद्धाय” केवल नारे नहीं, बल्कि बहुजन आत्मसम्मान की उद्घोषणा हैं।


राजकुमार यादव की बिरहा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अशिक्षित और ग्रामीण समाज तक भी सामाजिक न्याय की जटिल अवधारणाओं को भावनात्मक और संगीतमय ढंग से पहुँचाती है। यही कारण है कि उनकी गायकी समर्थन और विवाद—दोनों के केंद्र में रहती है। समर्थकों के लिए वे बहुजन की सच्ची आवाज़ हैं, और आलोचकों के लिए असुविधाजनक प्रश्न।

वस्तुतः राजकुमार यादव की बिरहा यह सिद्ध करती है कि लोक-संस्कृति जब चेतना से जुड़ती है, तो वह आंदोलन बन जाती है। बहुजन आंदोलन का दिमाग जहाँ विचार गढ़ता है, वहीं उनकी बिरहा उसकी वह आवाज़ है, जो समाज को सुनाई देती है।


मिशन बहुजन बिरहा गीत
(चाल: “मनुवाद की खटिया खड़ी कर देहला” – बहुजन बिरहा सम्राट राजकुमार यादव जी को समर्पित)

(ढोलक – ठेकेदार चाल, प्रवेश हुंकार)
अरे सुनो रे भाई सुनो,
आज बिरहा आग उगले!
जय भीम! नमो बुद्धाय!
मनुवाद का खेल न चले!


मुखड़ा (Hook Line – बार-बार आएगा)

खटिया हिल गई रे बाबा,
जब संविधान बोला,
जय भीम की गूँज पड़ी तो
झूठा भगवान डोला।



पूरब की माटी बोले आज,
आजमगढ़ से तान चली,
गाजीपुर–सुल्तानपुर
हर चौपाल में बात चली।

हम गाना नहीं आए साथी,
हम मिशन लेकर आए,
जो सदियों से दबा पड़ा था
आज वही सवाल उठाए।

मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब बहुजन जागा,
जिसने पचासी को लूटा था
उसका हिसाब माँगा।



पहले बिरहा साजन रोवे,
अब बिरहा समाज रोए,
भूख, जाति, अपमान की पीड़ा
सुर बनके बाहर होए।

बाबासाहेब जब उतरे स्वर में,
भीड़ नहीं—इतिहास खड़ा,
किसी की आँख में आग जली,
किसी का कलेजा फटा।


मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब भीम बोला,
संविधान की एक-एक पंक्ति
सत्ता को चुभोला।



कांशीराम जब रावण बनें,
मनुवाद काँप जाए,
जो झंडा ओढ़ के लूट करे
उसका नक़ाब उतर जाए।

रविदास बोले—सब एक समान,
फुले पूछें—ज्ञान किसका?
पेरियार तर्क की आग जलाएँ,
अंधविश्वास का दम घुटता।


मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब सवाल उठा,
जिस मूर्ति को खुद गढ़ा हमने,
उससे डर क्यों लगा।



(संवादात्मक बोल – राजकुमार यादव स्टाइल)
बताओ रे भाई बताओ,
कुम्भ से पेट भरता है?
या बाबा साहेब का संविधान
भूखे को रोटी देता है?



EVM सोए, मीडिया बिके,
दलाल धर्म बेचें,
संविधान की कमाई खाने वाले
जनता को कैसे देखें?

जो वोट को मंदिर में बेचे,
जो धर्म से राज चलाए,
उनकी खटिया यही मंच पर
बिरहा आज गिराए।

मुखड़ा (तेज़, हुंकार के साथ)
खटिया हिल गई रे बाबा,
अब गिरने वाली है,
बहुजन एक हुआ है अब
सरकार बदलने वाली है।



भीम आर्मी की नीली हवा
गीत बनके फैल जाए,
भीम पाठशाला की हर बच्ची
कल संविधान पढ़ाए।

नगीना से गूँजे पैग़ाम,
युवा कंधे से कंधा जोड़ें,
SC–ST–OBC–अल्पसंख्यक
एक ही सुर में बोलें।

अंतिम मुखड़ा (सबसे तेज़, क्लोज़िंग)
खटिया गिर गई रे बाबा,
अब राज नहीं चलेगा,
जय भीम! नमो बुद्धाय!
बहुजन ही देश संभालेगा।


(हुंकार)
जय भीम! जय भीम!
राजकुमार की तान,
यह बिरहा नहीं रे बाबा,
यह बहुजन की पहचान।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com





बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक || गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप — गोलेन्द्र पटेल

बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक बहुजन आंदोलन किसी एक काल या व्यक्ति की उपज नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे उस प्रतिरोध की निरंतरता है, जो...