Friday, 27 March 2020


 एक भरसाँय साहित्य का
जिसमें हाशिये का हसुआ
समय को कउर रहा है

जी हाँ हारे हाथ से
कुछ दाना दनादन छाना
शोषितों के छलनी से

जो फूटा उसे भी
जो नहीं फूटा उसे भी
बालू बकवास तो

झर झर झर गया
खो अपना अपनत्व
कुछ तो महत्व

अभी भी रख रहा है
फूटे टूटे मन से
बालू-बात-बतंगड़

कडाही को कष्ट नहीं है
इन सब तथ्य से
आँच आँत तक पहुँच

आदमी के पेट में नगाड़ा बजा रहा है
उस ध्वनि को केवल साहित्यकार सुनता है
श्रोता राजा  नहीं!!
-गोलेन्द्र पटेल

No comments:

Post a Comment

लोकतंत्र बचाओ सप्ताह

लोकतंत्र बचाओ सप्ताह सत्य जब संघर्ष के बीज बोता है तो बदलाव का अंकुर फूटता है और जब विपक्ष कमज़ोर पड़ जाता है तब संसद की सड़कों पर विद्यार्थ...