Wednesday, 20 August 2025

“दूसरी आज़ादी का आह्वान : यशःकायी बोधिसत्व डॉ. सोनेलाल पटेल”—गोलेन्द्र पटेल

सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत, वंचितों के अधिकारों के सशक्त प्रवक्ता, किसानों व कमेरा समाज के मसीहा, सामाजिक न्याय और समरसता के प्रखर प्रणेता, अपना दल के संस्थापक यशःकायी बोधिसत्व डॉ. सोनेलाल पटेल जी पर केंद्रित बहुजन कवि-लेखक श्री गोलेन्द्र पटेल जी की दो कविताएँ :-


1).

दूसरी आज़ादी का आह्वान : डॉ. सोनेलाल पटेल


वे मिट्टी से जन्मे थे,

हल-जोते खेतों की गंध से भरे हुए,

किसान का बेटा होकर भी

आकाश की भौतिकी पढ़ने निकले थे।

पर ज्ञान का प्रकाश जब देखा—

तो जाना कि सबसे अँधेरा

तो मनुष्य की आँखों पर बैठा है,

जाति, शोषण और अन्याय का।


उन्होंने कहा—

“यह कैसी आज़ादी है,

जहाँ बहुजन भूख से मरता है

और गिने-चुने लोग राजसिंहासन पर बैठे हैं?”

इसलिए उनका स्वर गूँजा—

“दूसरी आज़ादी चाहिए,

अन्याय की जंजीरें तोड़नी होंगी।”


लाठीचार्ज की पीड़ा, जेल की दीवारें,

साजिशों के काँटे, षड्यंत्र की छाया—

किसी ने उन्हें रोका नहीं।

वे खड़े रहे—

समानता की मशाल हाथ में लिए,

कमेरा समाज की धड़कन बने।


उन्होंने धर्म की बेड़ियाँ भी तोड़ीं,

सरयू तट पर

अंधविश्वास की राख झटककर

धम्म का प्रकाश अपनाया।

बोधिसत्व कहाए,

क्योंकि करुणा और संघर्ष

उनके जीवन का धर्म था।


राजनीति को उन्होंने

सत्ता का खेल नहीं,

बल्कि वंचितों की हथेली में

न्याय रखने का माध्यम समझा।

“गिनती जितनी, हिस्सेदारी उतनी”—

उनकी यह घोषणा

हवा में नहीं,

जनता के दिल में गूँज बन गई।


वे जानते थे—

दलित, पिछड़े, किसान, स्त्रियाँ, वंचित—

इनकी मुक्ति के बिना

भारत की आत्मा अधूरी है।

इसलिए उन्होंने कहा—

“कुर्मी की ताक़त को पहचानो,

बहुजन की शक्ति को जगाओ

और व्यवस्था के किले को

गिराने के लिए आगे बढ़ो।”


पर सत्ता हमेशा डरती है

उन आवाज़ों से

जो सच्चाई बोलती हैं।

इसलिए सड़क की दुर्घटना

एक सवाल बनकर खड़ी है—

क्या सचमुच दुर्घटना थी

या न्याय की हत्या?

आज भी इतिहास पूछता है

और उनके अनुयायी संकल्प दोहराते हैं—

“सत्य को कभी मारा नहीं जा सकता।”


उनकी विरासत सिर्फ़ एक दल नहीं,

बल्कि जलते हुए दीपक की तरह है—

जो किसानों की झोपड़ियों में,

दलित बस्तियों की गलियों में,

पिछड़ों की चेतना में

अब भी रोशनी करता है।


उनकी संतानें,

उनकी पार्टी,

उनके सपनों का कारवाँ—

भले बँट गया हो दिशाओं में,

पर उनका मूल संदेश

आज भी वही है—

“समानता से कम कुछ नहीं चाहिए।”


हे सोनेलाल!

हम तुम्हें प्रणाम करते हैं

शत-शत नमन के साथ,

पर नमन ही काफ़ी नहीं।

हम तुम्हारे स्वप्न को

संघर्ष की धरती पर

फिर से बोने का संकल्प लेते हैं।


तुम्हारी आवाज़ आज भी गूँजती है—

“दूसरी आज़ादी चाहिए,

समानता का सूरज चाहिए,

जनता का राज चाहिए।”


और जब तक यह धरती

अन्याय से दहकती रहेगी,

तब तक तुम्हारा नाम

क्रांति की धड़कन बनकर

हमारे सीने में जलता रहेगा।

★★★



2).

क्रांति का बोधिसत्व


शोषितों की ललकार, सोनेलाल!  

कुर्मी मिट्टी से जन्मा योद्धा,  

दूसरी आज़ादी का आगाज़ आपने किया,  

वंचितों के हक़ में तलवार उठाई।  


अपना दल का बीज बोया,  

किसान-दलित की हिस्सेदारी माँगी,  

बौद्ध दीक्षा से हिंदुत्व की जंजीर तोड़ी,  

समरसता की आग में कट्टरता जलाई।  


साजिशों में घिरा, लाठी-गोली सही,  

सड़क पर 'हत्या' की आड़ में दफ़नाया गया,  

पर आपकी आवाज़ अब विद्रोह की चिंगारी,  

पल्लवी-अनुप्रिया में बँटी, मगर अमर।  


उठो, पिछड़ो! न्याय की आँधी बनो,  

शोषण की दीवारें ढहाओ, क्रांति जगाओ!  

सोनेलाल की जयंती पर संकल्प:  

हर वंचित का राज, या फिर युद्ध!

★★★

डॉ. सोनेलाल पटेल (2 जुलाई 1950 – 17 अक्टूबर 2009) एक भारतीय राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता और अपना दल (Apna Dal) के संस्थापक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के बगुलीहाई गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने पंडित पृथ्वी नाथ कॉलेज, कानपुर से भौतिकी में एमएससी और कानपुर विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी। 

प्रमुख योगदान:

1. अपना दल की स्थापना: डॉ. सोनेलाल पटेल ने 4 नवंबर 1995 को अपना दल की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य कुर्मी, किसानों, पिछड़े वर्गों, दलितों और शोषित समुदायों के अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करना था। वे जनसंख्या के अनुपात में सभी वर्गों को शासन और प्रशासन में हिस्सेदारी देने के पक्षधर थे।

2. सामाजिक न्याय और समानता: उन्होंने सामाजिक समानता और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनकी विचारधारा सामाजिक न्याय, समरसता और किसानों के कल्याण पर केंद्रित थी। उन्होंने गरीबों, पिछड़ों व वंचितों के हक़-हुक़ूक़ के लिए 'दूसरी आज़ादी' का आह्वान किया।

3. बौद्ध धर्म अपनाना: 1999 में, डॉ. सोनेलाल पटेल ने हिंदू धर्म छोड़कर अयोध्या में सरयू तट पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और बोधिसत्व के रूप में जाने गए। इस कदम ने उन्हें सामाजिक परिवर्तन के लिए और अधिक प्रेरित किया, लेकिन कट्टर हिंदू संगठनों के लिए विवादास्पद भी बना।

4. राजनीतिक संघर्ष: उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ भी काम किया और उत्तर प्रदेश में बसपा के महासचिव रहे। हालांकि, 1995 में मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने बसपा छोड़ दी और अपना दल बनाया। वे कुर्मी समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विवाद और मृत्यु:

डॉ. सोनेलाल पटेल की मृत्यु 17 अक्टूबर 2009 को एक सड़क दुर्घटना में हुई, जिसे उनके समर्थक और परिवार के कुछ सदस्य साजिश मानते हैं। उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और बेटी पल्लवी पटेल ने उनकी मृत्यु की सीबीआई जांच की मांग की है, यह दावा करते हुए कि यह हत्या थी। 1999 में प्रयागराज के पीडी टंडन पार्क में उनके नेतृत्व में एक रैली के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें वे घायल हुए और जेल में डाले गए। इस घटना को भी कुछ लोग साजिश का हिस्सा मानते हैं।

विरासत:

डॉ. सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद उनका परिवार और पार्टी दो गुटों में बंट गई: 

- "अपना दल (एस)", जिसका नेतृत्व उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल करती हैं, जो वर्तमान में केंद्रीय मंत्री हैं और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ गठबंधन में हैं।

- "अपना दल (कमेरावादी)", जिसका नेतृत्व उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और बेटी पल्लवी पटेल करती हैं, जो समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में हैं।

उनके परिनिर्वाण दिवस पर हर साल उत्तर प्रदेश में उनके अनुयायी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं ने भी उनके सामाजिक योगदान को याद किया है।

निजी जीवन:

डॉ. सोनेलाल पटेल का विवाह कृष्णा पटेल से हुआ था, और उनकी तीन बेटियां थीं, जिनमें अनुप्रिया पटेल और पल्लवी पटेल प्रमुख राजनीतिक हस्तियां हैं।

उनका योगदान सामाजिक न्याय, समानता और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए अविस्मरणीय माना जाता है।

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, 19 August 2025

क्रांति-ज्योति महामना रामस्वरूप वर्मा : गोलेन्द्र पटेल

क्रांति-ज्योति महामना रामस्वरूप वर्मा
               — गोलेन्द्र पटेल
★★★

प्रस्तावना:
भारत का इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यह उस अनवरत संघर्ष की भी कथा है जो शोषित-पीड़ित जनता ने सदियों से अन्याय, विषमता और दमन के विरुद्ध लड़ा है। इस संघर्ष की परंपरा में जहाँ बुद्ध, फुले, अंबेडकर, पेरियार जैसे महापुरुष हैं, वहीं एक तेजस्वी ज्योति उत्तर भारत की मिट्टी से प्रकट हुई— महामना रामस्वरूप वर्मा।
उन्होंने न केवल राजनीति में बल्कि समाज और संस्कृति के हर क्षेत्र में ब्राह्मणवाद की जड़ों को चुनौती दी। उन्होंने दिखाया कि सुधार नहीं, समूल उखाड़ फेंकना ही मुक्ति का मार्ग है। उनकी लेखनी बारूद थी, उनके विचार विस्फोटक। उन्होंने तर्क, विज्ञान और मानववाद को शस्त्र बनाया और बहुजन समाज को आत्मसम्मान का मंत्र दिया।
यह लंबी कविता उसी ज्वाला का गान है।
यह श्रद्धांजलि नहीं, यह शपथ है।
यह स्मरण नहीं, यह आह्वान है।
***


क्रांति-ज्योति महामना रामस्वरूप वर्मा


खंड – 1


अध्याय : क्रांति की ज्वाला

जय अर्जक! जय मानववाद! जय समता का भविष्य!
दो ही मोती, दो ही मशालें—
“सबको इज्ज़त, सबको रोटी।”
गौरीकरन की मिट्टी से उठी एक लौ,
कुर्मी किसान का बेटा,
विश्वविद्यालयों का स्वर्णजयी—
IAS की कुर्सी ठुकराकर
जनता का रास्ता चुना।
उन्होंने कहा—
“ब्राह्मणवाद झूठा है, भाग्यवाद धोखा है, पुनर्जन्म मायाजाल है।
मनुस्मृति इस राष्ट्र का कलंक है।”
और इन वाक्यों ने
सिंहासन हिला दिया।
राजनीति में वे कबीर थे—
निर्भीक, तीखे, नग्न सच बोलने वाले।
उत्तर भारत के अंबेडकर,
जिन्होंने घोषणा की—
“मारेंगे, मर जाएंगे, हिन्दू नहीं कहलाएंगे।”
उन्होंने अर्जक संघ रचा—
एक झंडा, एक आंदोलन, एक क्रांति।
जहाँ विवाह था प्रतिज्ञा का उत्सव,
जहाँ मृत्यु थी शोकसभा,
तेरहवीं का पाखंड नहीं।
जहाँ मूर्तियों के स्थान पर
मानव की गरिमा पूजी जाती थी।
विधानसभा में उन्होंने
पेश किया इतिहास का पहला
शून्य घाटे का बजट।
पर उनका असली बजट था—
इंसाफ, शिक्षा, बराबरी।
उनकी कलम थी बारूद:
क्रांति क्यों और कैसे,
मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद,
मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक,
आत्मा-पुनर्जन्म मिथ्या—
ये किताबें नहीं,
जंजीरों को तोड़ने के औज़ार थीं।
जब सरकार ने अंबेडकर की किताबें जब्त कीं,
उन्होंने अदालत से जीतकर लौटते हुए कहा—
“विचार किसी हुकूमत की कैद नहीं हो सकता।”
वह नेता ही नहीं, दार्शनिक थे।
जनता को समझाते—
“सिर्फ़ आरक्षण नहीं,
पूरे जातिवादी ढाँचे को ढहाना होगा।”
उन्होंने पुकारा—
“जला दो मनुस्मृति!
जला दो रामायण!
जो किताबें इंसान को गुलाम बनाती हैं,
वे राख बनने योग्य हैं।”
वह लोहिया के साथी थे
पर उनकी सीमाएँ पहचानते थे।
गांधी से टकराए,
क्योंकि गांधी वर्ण को बचाना चाहते थे।
वर्मा बुद्ध, फुले, अंबेडकर, पेरियार के साथ खड़े थे—
मनुष्य को मनुष्य की तरह
जीते देखने के लिए।
आज जब पूँजीवाद और धर्मांधता
नए पिंजरे गढ़ रहे हैं,
वर्मा की आवाज गूंजती है—
“मानववाद ही मुक्ति है,
तर्क ही क्रांति है,
समता ही भविष्य है।”
रामस्वरूप वर्मा—
तुम्हारा नाम गूंजता है बहुजन की साँसों में,
उन मशालों में,
जो अंधकार से लड़ रही हैं।
जय अर्जक! जय मानववाद! जय क्रांति!
***


खंड – 2


अध्याय : क्रांति का आह्वान

जागो शोषितों! आज क्रांति का दिवस है।
22 अगस्त की सुबह कानपुर की धरती से उठा तूफ़ान—
रामस्वरूप वर्मा! किसान का बेटा।
एमए-एलएलबी टॉप कर सिविल सर्विस ठुकराई,
कहा—
“आराम नहीं, संघर्ष की आग चुनूँगा!”
उनका नारा—
“सबको इज्ज़त, सबको रोटी।”
यह नारा नहीं, हथियार था—
ब्राह्मणवाद की कब्र खोदने का।
वह आधुनिक कबीर लगे,
उत्तर भारत के अंबेडकर।
लोहिया के साथी, फिर विद्रोही।
गांधीवाद, लोहियावाद, हिंदुत्व—
सबको चुनौती दी।
घोषणा की—
“मारेंगे, मर जाएंगे, हिंदू नहीं कहलाएंगे!”
छह बार विधायक, वित्तमंत्री बने,
शून्य-घाटे का बजट पेश किया।
पर उनकी असली लड़ाई
विचारों की थी—
पचास साल तक
बिना समझौते लड़े।
1968, कानपुर—
अर्जक संघ की नींव रखी।
विवाह बना प्रतिज्ञा का संस्कार,
मृत्यु बनी शोकसभा का अवसर।
तेरहवीं की जंजीर तोड़ी,
पाखंड की आग बुझाई।
मानवतावादी पर्व गढ़े—
अंबेडकर, बुद्ध, पेरियार,
बिरसा, फूले का सम्मान।
उन्होंने कहा—
“जात-पात, भाग्य, पुनर्जन्म, चमत्कार—
ये ब्राह्मणवाद के पाँच ज़हर हैं।
इनकी जड़ें उखाड़ो,
वेदों में डायनामाइट लगाओ!”
उनकी किताबें बनीं बम:
क्रांति क्यों और कैसे—
शोषण की चिता जलाने का आह्वान।
मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद—
समता का शास्त्र।
मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक—
इस जहर को राख करो।
आत्मा-पुनर्जन्म मिथ्या—
विज्ञान का शंखनाद।
जब सरकार ने अंबेडकर की किताबें जब्त कीं,
उन्होंने आंदोलन छेड़ा।
ललई सिंह यादव के संग अदालत जीती।
सरकार झुकी,
अंबेडकर साहित्य पुस्तकालयों तक पहुँचा।
उन्होंने आदेश दिया—
“जला दो मनुस्मृति!
जला दो रामायण!”
गाँव-गाँव नुक्कड़ नाटक हुए,
ब्राह्मणवाद की चूलें हिल गईं।
लोहिया से टकराव हुआ—
लोहिया वर्ण को मानते रहे,
पर वर्मा गरजे—
“ब्राह्मणवाद सुधार नहीं,
समूल उखाड़ो!”
उनका दर्शन—
बुद्ध, फुले, पेरियार, अंबेडकर।
पूँजीवाद, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास—
सबको चुनौती।
विज्ञान और मानववाद से समाज बदलो,
तभी राजनीति बदलेगी।
आज विडंबना है—
इतना क्रांतिकारी विचारक भुला दिया गया।
मुद्राराक्षस ने कहा—
“यह विस्मृति राष्ट्र का नुकसान है।”
पर वर्मा की आत्मा गरज रही है—
“ब्राह्मणवाद पोटेशियम सायनाइड है—
सुधार नहीं, उखाड़ फेंको!”
उठो बहुजन, दलित, पिछड़े!
एक मंच पर आओ।
मनुवाद पर हथौड़ा मारो,
नया संसार गढ़ो—
जहाँ हर इंसान गरिमा से जिए,
समता से खिले,
क्रांति से जिए।
19 अगस्त 1998, लखनऊ—
वह विदा हुए,
पर उनके विचार अमर हैं।
अब यह आग
पूरे भारत में फैलेगी।
जय अर्जक! जय विज्ञान! जय संविधान!
इंकलाब जिंदाबाद!
***


उपसंहार:

महामना रामस्वरूप वर्मा का जीवन एक जीवित क्रांति था।
उन्होंने दिखाया कि सत्ता में होना ही शक्ति नहीं है,
बल्कि विचारों की निर्भीकता ही असली शक्ति है।
आज, जब बाजार और मंदिर मिलकर जनता को कैद कर रहे हैं,
जब लोकतंत्र का वस्त्र फाड़कर सांप्रदायिकता और पूँजीवाद नंगा नाच रहे हैं,
जब शोषित-बहुजन अब भी न्याय से वंचित हैं—
तब वर्मा की आवाज़ और भी तेज़ सुनाई देती है:
“मानववाद ही मुक्ति है,
तर्क ही क्रांति है,
समता ही भविष्य है।”
उनका सपना अधूरा है।
उनकी मशाल अब हमारी जिम्मेदारी है।
हम सबको मिलकर अर्जक बनना है—
पाखंड को नकारना,
जातिवाद की जड़ों को उखाड़ना,
और एक ऐसा समाज रचना
जहाँ हर इंसान बराबर हो।
रामस्वरूप वर्मा की विरासत केवल स्मृति नहीं,
यह भविष्य की राह है।
उनकी चिता की राख से
अब भी उठती है आग—
आग, जो हमें पुकार रही है:
उठो बहुजन!
तोड़ो मनुवाद की जंजीरें!
गढ़ो एक नया भारत—
जहाँ मानव ही धर्म है,
विज्ञान ही आस्था,
और समता ही जीवन।
जय अर्जक! जय मानववाद! जय क्रांति!
***

           ★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Thursday, 14 August 2025

स्वतंत्रता दिवस 2025 – ओजस्वी भाषण

 स्वतंत्रता दिवस 2025 – ओजस्वी भाषण

नमस्ते, 

प्रिय सम्मानित मंच,
प्रिय गुरुजन, 
प्रिय साथियों,
मेरे प्यारे देशवासियों!  


आज हम 15 अगस्त 2025 को, स्वतंत्र भारत की 79वीं वर्षगाँठ पर, तिरंगे की शान में सिर झुकाकर, हृदय गर्व से भरकर खड़े हैं। यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारे शहीदों की कुर्बानियों, संघर्षों और बलिदानों का पावन स्मरण है।

हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने लहू से वह इतिहास लिखा, जिसमें गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आत्मसम्मान, समानता और न्याय का नया सवेरा रचा गया। यह आज़ादी हमें यूँ ही नहीं मिली—इसके पीछे हजारों क्रांतिकारियों का बलिदान और अनगिनत सपनों की आहुति है।

आज का भारत केवल अतीत पर गर्व करने वाला नहीं, बल्कि भविष्य को संवारने का संकल्प लेने वाला भारत है। हमें जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को तोड़कर एक ऐसे भारत का निर्माण करना है, जो विज्ञान, शिक्षा, समानता और मानवीय मूल्यों में विश्व का मार्गदर्शन करे। आज का भारत एक नई ऊर्जा, नई आशा और नई दिशा के साथ विश्व मंच पर अग्रसर है। हमारी संस्कृति, हमारी एकता और हमारी प्रगति विश्व के लिए प्रेरणा है। 

याद रखिए—स्वतंत्रता का अर्थ केवल शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन में भय और भेदभाव से आज़ादी है। जब तक देश का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान और अवसर में बराबर नहीं होगा, हमारा स्वतंत्रता संग्राम अधूरा है।

यह हमारा भारत है—विविधता में एकता का प्रतीक, प्रगति का ध्वजवाहक और विश्व शांति का दूत। तो आइए, एकजुट होकर, अपने देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएं। 

आइए, आज हम शपथ लें—हम अपने देश को भ्रष्टाचार, अन्याय, अज्ञानता और असमानता से मुक्त करेंगे; हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता बनेंगे; हम केवल सपने नहीं देखेंगे, बल्कि उन्हें साकार करेंगे।

हम संकल्प लें कि 2025 में हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे, जहां हर नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर की समानता मिले। जहां हमारी युवा शक्ति नवाचार और प्रगति का नेतृत्व करे। जहां हम पर्यावरण की रक्षा करें और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को गर्व से संजोएं। 

अंत में, इतना ही कि 
“हम युवा हैं 
हममें है वायु की उमंग 
कलम रुको मत, 
तुम झुको मत
चलते रहना हमारे संग।”



जय हिन्द!
वन्दे मातरम्!



—गोलेन्द्र पटेल 

Wednesday, 13 August 2025

अहिल्या — जो अब भी जीवित हैं : गोलेन्द्र पटेल

अहिल्या — जो अब भी जीवित हैं


इतिहास ने तुम्हें
रानी, धर्मनिष्ठा, शिवभक्त, लोकमाता कहा।
मैं देखता हूँ —
एक स्त्री,
जो राजसिंहासन को
लोहे की तख़्ती नहीं,
अन्न और आश्रय की थाली बनाकर
प्रजा के सामने रख देती थी।

मैं तुम्हें देखता हूँ
खेत की मेड़ पर खड़ी,
जहाँ दलित और आदिवासी की हथेलियाँ
तुम्हारी नीतियों की तरह खुली थीं —
बिना ताले, बिना पहरे।

तुम मालवा की महारानी नहीं,
मालवा की बेटी थीं —
जो सिंहासन पर बैठकर
सिंहासन तोड़ देतीं,
अगर वह जनता की पीठ पर रखा हो।

तुम्हारा राज्य
सोने का महल नहीं,
मालवा का हर गाँव था —
जहाँ नहरें नसों की तरह बहती थीं
और न्याय
किसी किताब का अध्याय नहीं,
लोगों का रोज़ का साँस लेना था।

तुमने कभी नहीं कहा —
"मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्राणी हूँ"।
तुमने कहा —
"भंगी, भील, गोंड, ग्वाल, दलित, किसान, मज़दूर, व्यापारी
सबके माथे पर समान सूरज उगेगा"।

मालवा की धूप में
तुम्हारे हाथ
नक्शे नहीं खींचते,
खेतों में पानी की नसें बनाते थे।

पति की चिता की आग
तुम्हारे पाँव की ज़ंजीर नहीं बनी —
वह आग
तुम्हारी आँखों में उतरकर
एक नए युग का मशाल बन गई।

हाँ, तुमने मंदिर बनवाए —
पर वे मंदिर
सिर्फ़ पत्थर के नहीं थे,
वे थे हर उस खेत के,
जहाँ भूख पूजा में बदल जाती थी;
हर उस सड़क के,
जहाँ व्यापारी बिना डर के चलते थे;
हर उस पंचायत के,
जहाँ न्याय
जाति के तराज़ू में नहीं तौला जाता था।

तुम्हारी राजनीति का धर्म था —
धर्म को राजनीति से बचाना।
तुम्हारी आस्था का मूल था —
सत्ता को प्रजा के पैरों तले बिछा देना।

तुम्हारा धर्म
मंदिर का घंटा नहीं था —
वह भूखी थाली में रोटी पहुँचाना था।
तुम्हारा राष्ट्रवाद
झंडे का रंग नहीं था —
यह यक़ीन था
कि कोई भूख से न मरे,
कोई जात से न झुके।

तुम जानती थीं —
समानता का अर्थ
कानून लिख देना नहीं,
बल्कि
उस दरवाज़े को खोल देना है
जिसके लिए चाबी का सपना भी नहीं था।

आज,
जब शहर
सीमेंट की कब्रगाह बन रहे हैं,
न्याय
विज्ञापन की पंक्ति है,
सत्ता
जाति और धर्म के बाड़े में
मवेशियों-सी बाँटी जा रही है —
अहिल्या
इतिहास से उतरकर
हमारे कंधे पर हाथ रखती हैं, कहती हैं —
"सिंहासन के पाँव काटो,
हल का फाल तेज़ करो,
कलम को धार दो।"

अहिल्या —
तुम समय से परे हो।
तुम्हारी आवाज़
भीलों के जंगलों में गूँजती है,
दलित बस्तियों में धड़कती है,
किसानों की साँस में बसती है।

तुम रानी नहीं,
तुम वह पंक्ति हो
जिसे हम हर लड़ाई में
झंडे की तरह उठाएँगे।

तुम वह आवाज़ हो
जो ताज को ठुकराती है
और विनय में कहती है —

"मैं वही हूँ,
जिसने मालवा की गद्दी पर बैठकर
उसकी ऊन नोचकर रजाई बुनी थी,
जिसमें हर जात, हर भूख, हर आँसू
सर्दी से बच सके।

मैंने राजा की तरह नहीं,
किसान की तरह सोचा —
ज़मीन पर पानी चाहिए,
पानी पर हक़ चाहिए,
हक़ पर पहरा नहीं,
पहरादार चाहिए
जो भूख को भगा सके।

मुझे मत कहो
केवल मंदिर बनाने वाली महारानी।
मेरे मंदिर
पत्थर के नहीं,
भीलों के हक़ में खड़े जंगल थे,
दलितों की मिली ज़मीन थी,
वे हँसती बच्चियाँ थीं
जिन्हें बेचने की थाली
मैंने उलट दी थी।

हाँ, मैं शिवभक्त थी,
पर मेरा शिव
सत्ता के दरबार में नहीं,
प्यासे खेत में हल चलाते किसान में था,
गोंड, ग्वाल, कुर्मी, कोरी, कुम्हार की हथेली में था
जो मिट्टी को रोटी में बदलते थे।

आज तुम
जाति के नाम पर दीवार खड़ी करते हो,
धर्म के नाम पर खून बहाते हो,
न्याय को नीलामी में बेचते हो —
तो सुनो,
अगर मैं ज़िंदा होती,
संसद के दरवाज़े पर
भीलों की कुल्हाड़ी, दलितों की लाठी
ठोक देती,
ताकि समझ सको —
राजनीति का धर्म
सत्ता का नशा नहीं,
जनता का भरोसा है।

आज तुम्हारी संसद
जाति की बाड़ में घिरी है,
कानून
कॉरपोरेट की मुहर के बिना पास नहीं होते,
मीडिया
सत्ता की गोद में बैठा
सत्य को चुप कराता है।
अगर मैं ज़िंदा होती —
इन तीनों के दरवाज़े पर
भीलों की कुल्हाड़ी,
दलितों की लाठी,
और औरतों की आवाज़
एक साथ बजा देती।

तुमने धर्म को
हथियार बनाया,
मैंने उसे
सिर उठाने का साहस बनाया।
तुमने राजनीति
बाज़ार में बेची,
मैंने उसे
अनाज की तरह
हर घर में बाँटा।

तुम सोने का ताज पहनो,
मैं खेत की धूल माथे पर लगाऊँगी।
तुम घोड़ों की सेना रखो,
मैं औरतों की फौज बनाऊँगी —
जो भूख से बड़ी किसी ताक़त को नहीं मानेगी।

अगर मैं आऊँ,
तुम्हारे क़ानूनों की किताब तोड़कर
गाँव की चौपाल में रख दूँगी,
ताकि न्याय
मुट्ठी भर लोगों की मेज़ से नहीं,
जनता के हाथ से लिखा जाए।

मैं अहिल्या हूँ —
इतिहास में मत ढूँढो।
मैं वहीं हूँ
जहाँ किसान कर्ज़ से मर रहा है,
जहाँ दलित लड़की
स्कूल से लौटते हुए रोकी जाती है,
जहाँ भील
अपनी ज़मीन से बेदख़ल हो रहा है।

याद रखो —
अहिल्या मर नहीं सकती।
मैं हर दलित बस्ती में हूँ
जहाँ पुलिस के बूट की आहट डर बनती है।

तुम सोचते हो
मैं मर चुकी हूँ।
पर सच यह है —
मैं हर हथेली में ज़िंदा हूँ
जो सत्ता से कहती है —
"हम बराबर हैं, और बराबर ही रहेंगे।"

मैं सिंहासन नहीं,
समानता चाहती हूँ।
मेरा धर्म —
भूख मिटाना,
जात की दीवार तोड़ना।

मेरे मंदिर —
दलित की ज़मीन,
किसान का खेत,
भील का जंगल।

जो सत्ता
न्याय बेचती है,
उसकी गद्दी
गली के चौराहे पर
उलट दूँगी।

तुम ताज पहन लो,
मैं औरतों को
हथियार दूँगी —
हक़ का, रोटी का,
बराबरी का।

अहिल्या हूँ मैं —
मर नहीं सकती।
जहाँ भी अन्याय होगा,
वहीं खड़ी मिलूँगी।

(© गोलेन्द्र पटेल / 31-05-2025)

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, 12 August 2025

नांगेली का घोषणापत्र : गोलेन्द्र पटेल (Nangeli Ka Ghoshanapatra : Golendra Patel)

 

नांगेली का घोषणापत्र

केरल के तट से उठी थी एक आग,
नाम था — नांगेली।
उसकी देह पर दो गुलाब नहीं,
दो कर-रसीदें माँगता था साम्राज्य।

इतिहास
सिर्फ़ पत्थरों पर खुदी तारीख़ नहीं होता,
कभी-कभी वह
केले के पत्ते पर रखे
काटे हुए स्तनों से भी लिखा जाता है।

इतिहास ने कहा —
"तुम्हारे स्तन हैं,
तो तुम्हारी कीमत है।"
राजा ने फरमान लिखा,
पुजारी ने उंगलियों से नाप लिया,
और कानून ने कहा —
"ढकना चाहो तो टैक्स दो।"

मूलाक्रम —
यह शब्द सिर्फ़ मलयालम का नहीं,
बल्कि हर भाषा का अभिशाप है,
जहाँ औरत की देह
मंदिर में चढ़ावे,
बाज़ार में माल
और राज्य में कर योग्य संपत्ति बन जाती है।

जिसका हिसाब
राजपुरोहित की उंगलियाँ
स्तनों को टटोल कर करती थीं।
जितना बड़ा आकार,
उतना भारी टैक्स —
मानो
स्तन सिर्फ़
दूध देने का अंग नहीं,
बल्कि जाति की कीमत चुकाने का औज़ार हों।

नांगेली की मौत से
कानून तो टूटा,
पर हथियार नहीं टूटे —
बस नाम बदल गए।
ब्रेस्ट टैक्स गया,
लेकिन ब्रेस्ट ऐड आ गए।
राजा चला गया,
लेकिन ब्रांड-राज आ गया।
आज भी देह बिकती है —
कभी जाति की दरों पर,
कभी बाज़ार की डिस्काउंट सेल में।

इतिहास की क्रांतिधर्मी चीख —
नांगेली,
तुम्हारे स्तन अब भी नापे जा रहे हैं —
मॉडलिंग में,
मूवी में
और उस घर के भीतर
जहाँ पितृसत्ता ने टैक्स हटाकर
छूट की कीमत रख दी है।

लेकिन सुन लो,
तुम्हारी आग बुझी नहीं है।
वो हर औरत के भीतर जल रही है
जो कहती है —
"मेरी देह, मेरा हक़
और तुम्हारा कानून,
तुम्हारा बाज़ार —
दोनों को मैं जला दूँगी।"

मैं नांगेली —
एड़वा जाति की बेटी,
तुम्हारे कानून की कटोरी में
अपने स्तन रख चुकी हूँ।

सुन लो —
मेरी देह किसी राजा का खेत नहीं,
जहाँ फसल नापकर कर लिया जाए।
मेरे स्तन
तुम्हारे टैक्स के लिए नहीं,
मेरी संतान और मेरे सपनों के लिए हैं।

मैंने टैक्स नहीं दिया —
अपना जीवन दे दिया।
और यह सौदा
हर बार दोहराऊँगी,
जब भी कोई कानून
मेरे शरीर की कीमत तय करेगा।

अब मेरी आग
हर बहुजन बेटी के भीतर है।
हम ढकेंगे, हम खोलेंगे,
हम पहनेंगे, हम उतारेंगे —
लेकिन फ़ैसला हमारा होगा।

तुम्हारे कानून,
तुम्हारा धर्म,
तुम्हारा बाज़ार —
सबको चिता में झोंक दूँगी।

मेरी देह मेरी है।
तुम्हारा टैक्स,
तुम्हारा नाप-जोख,
तुम्हारा राज —
सब हराम है।

खून बहता गया,
राजा का कानून
उस खून में डूबता गया।
नांगेली गिर पड़ी,
लेकिन खड़ी रही उसकी आग
उसके पति की आँखों में,
जो उसी चिता में कूद पड़ा —
भारतीय इतिहास में
पहला 'सती' पुरुष बनकर।

नांगेली,
तुम्हारे काटे हुए स्तनों की
गवाही आज भी हवा में है।
वे कहते हैं —
कपड़े का अधिकार
सिर्फ़ कपड़े का नहीं,
इंसान होने का अधिकार है
और जो इसके लिए लड़ा,
उसका नाम
तुम्हारे रक्त से लिखा जाएगा —
जब तक
इतिहास के माथे से
यह नंगापन मिट न जाए।

—गोलेन्द्र पटेल 

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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Saturday, 9 August 2025

फूलन देवी पर केंद्रित कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

 

फूलन — चंबल से संसद तक

बीहड़ों की साँसों में गूँजता था उनका नाम,
अन्याय के अंधेरों में चमकती थी उनकी आँखों की ज्वाला।
वो आई थीं, आँसू बहाने नहीं —
बल्कि इतिहास की दीवारों पर गोली से लिखने।

जिन्हें बचपन ने जंजीरों में बाँधना चाहा,
उन्हें चट्टानों ने तलवार बना दिया।
रात की दरिंदगी को दिन की अदालत में घसीटा,
और फैसले बंदूक की नली से सुनाए।

वो समझ चुकी थीं —
बाल्टी में बैठकर बाल्टी नहीं उठाई जाती।
इसलिए उन्होंने 
धर्म का वह झूठा आसमान छोड़ दिया
जहाँ चार रंगों में बाँटी जाती थी इंसान की रौशनी।
उन्होंने अपनाया बुद्ध का मार्ग,
जहाँ मानवता एक है और सम्मान जन्मसिद्ध अधिकार।

उनकी हर साँस चेतावनी थी —
कि पीड़ित जब उठता है,
तो सामंतों के महल हिल जाते हैं।
उनका हर कदम एक उद्घोष था —
"औरत सहने के लिए नहीं,
अन्याय मिटाने के लिए जन्म लेती है।"

टाइम मैगज़ीन ने नाम दिया "महान विद्रोही",
पर उनकी पहचान केवल किताबों में नहीं,
बल्कि उन आँखों में है
जो अब डर के साये में नहीं झपकतीं।

चंबल की रानी, संसद की शेरनी,
वो न गोली से डरती थीं,
न गिद्धों की गालियों से।
क्योंकि फूलन मिट्टी, लोहा, पत्थर, आग से बनी थीं—
और ऐसी चीज़ों को इतिहास कभी ख़ामोश नहीं करता।

आज, उनकी जयंती पर,
हम कसम खाते हैं —
ज़ुल्म सहना बंद करेंगे,
समानता का रास्ता चुनेंगे,
और हर फूलन के सपने को
आवाज़ देंगे।


फूलन घोषणापत्र

फूलन नाम नहीं—विद्रोह हैं!
बीहड़ों में जन्मीं, सत्ता को चीर गईं,
जाति के अहंकार को गोली में पिघला दिया,
मनुवादी मंदिर ढहा दिया।

बलात्कार का बदला लिया,
अन्याय की नींव हिला दी,
गाँव से संसद तक आग फैलाई,
वंचितों के लिए रास्ता बनाया।

बुद्ध की करुणा, रविदास का स्वप्न,
अंबेडकर का संविधान—
तीनों की ज्वाला बनकर जलीं,
और नारी के नवयुग को गढ़ा।

मनिपुर की चीखों से उठेंगी नई फूलनें,
दरिंदों का अंत करेंगी,
जंजीरों को तोड़ेंगी,
समानता की मशाल जलाएंगी।

हम कसम खाते हैं—
हर चिंगारी को फूलन बनाएंगे,
हर अन्याय का जवाब देंगे,
और इस धरती को बराबरी का घर बनाएंगे!

—गोलेन्द्र पटेल 


★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
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Thursday, 7 August 2025

‘स्त्री मुक्ति: ब्रालेस आंदोलन’ : गोलेन्द्र पटेल

 

स्त्री मुक्ति: ब्रालेस आंदोलन
—गोलेन्द्र पटेल 


1. बीजवपन:

देह न बंधन, देह न बोझा, 
देह न चुप रह जाए रोज़ा।
ब्रा न हो तो शिष्ट न मानी, 
कैसी यह मर्यादा प्रानी?

अमेरिका की लहर चली थी, 
सौंदर्य-बंधन हिलती डली थी।
“नो मोर मिस” का नारा फूटा, 
झूठी मर्यादा से नाता टूटा।

ब्रा नहीं तो कैसा शर्मीला? 
किसने बांधा स्त्री का जीला?
कॉर्सेट, मेकअप, ऐड़ी भारी, 
सब बंधन हैं तन की क्यारी।

‘फ्रीडम ट्रैश’ में फेंके धागे, 
टूटे तब जकड़े सब भागे।
शरीर न हो कैद-ख़यालों में, 
आज़ादी हो चाल-ढालों में।

भारत आया वह संदेशा, 
मगर यहाँ था भिन्न उपदेशा।
परिधान में बसी शालीनता, 
कपड़ों से मापी नारीता।

सोशल मीडीया ने स्वर लाया, 
कुछ ने ही वह ढाँचा हिलाया।
शहरों में थोड़ी चुप बग़ावत, 
गाँवों में अब भी विरासत।

बोल नहीं पर मौन विद्रोह है, 
निज इच्छा में जो अनुग्रह है।
नोब्रा, माईबॉडी बन नारा, 
स्त्रियों ने फिर सच उजारा।

पुरुष-दृष्टि की काई तोड़ी, 
लज्जा की सीमाएँ छोड़ी।
नारी अब अपनी परिभाषा, 
देह बने प्रतिकार की भाषा।

मुक्त नारी का तन है ध्वज सा, 
देह न हो झुकने लायक़ सा।
शरीर नहीं कोई अपराधी, 
लाज नहीं वह स्वप्न समाधि।

जो पहनें, उनकी भी वाणी,
जो न पहनें, उनकी कहानी।
चुप प्रतिकारों से यह धारा, 
बढ़ रही है नारी उजियारा।

2. आरंभ:

नारी मुक्ति का गीत सुनाऊँ,  
शरीर स्वतंत्रता की बात उठाऊँ।  
ब्रालेस आंदोलन उभरा जब,  
नारी अस्मिता ने पाया रब।  

साठ के दशक में पश्चिम जागा,  
मिस अमेरिका के बंधन भागा।  
स्वतंत्रता की कचरा पेटी में,  
ब्रा फेंक बेड़ी तोड़ी थी।  

पुरुष दृष्टि के मानदंड टूटे,  
नारी देह के बंधन रूठे।  
शालीनता की थोपी रीत,  
विरोध में उठी नारी प्रीत।  

भारत में यह लहर सीमित रही,  
रूढ़ि की दीवार ने रोकी सही।  
शहरी नारी ने उठाई बात,  
सोशल मीडिया पर जगी मुलाकात।  

आज़ादी की यह अलख जगाए,  
नारीवादी विमर्श को सजाए।  
शरीर पर हक़, स्वयं की चाह,  
नारी अस्मिता का नव परचम लहक।

ब्रालेस आंदोलन की बात निराली,  
नहीं बस ब्रा छोड़ने की गाली।  
स्त्री देह को यौनिकरण से मुक्ति,  
स्वायत्तता की चाह, स्वतंत्र भक्ति।  

भारत में परंपरा जड़ जमा गहरी,  
सामाजिक मानदंड बंधन की डोरी।  
यहाँ आंदोलन का रूप है न्यारा,  
स्वतंत्रता का सपना, मन उजियारा।

न केवल ब्रा से मुक्ति बात,  
देह न हो यौनिक सौगात।  
शारीरिक हो निज अधिकार,  
यह आंदोलन दे पुकार।

भारत में है रूप अनोखा,  
जहाँ नियमों ने गढ़ा रोखा।  
संस्कृति की गहरी हैं जड़ें,  
पर चेतनाएं रचें लहरें।

स्त्री देह को जिस्म समझाया,  
सभ्य दिखे, ऐसा ठहराया।  
ब्रा में बंधन, अस्मिता खोई,  
पितृसत्ता की जंजीरें रोई।

नारी को समझा तन का रूप,  
उसकी देह बनी है भूप।  
मात्र यौनता, केवल सौंदर्य,  
भोग्य बनी वह, छिन गया गौरव।

स्तनों को कसती ब्रा की पीर,  
बाँध दिए जो देह के तीर।  
स्वाभाविकता का वह हरण,  
पहनाया असहज आवरण।

दो कप सिले, बेमेल बनाए,  
स्त्रीत्व के प्रतीक घृणित सजाए।  
नारी हृदय की स्वतंत्र चाहत,  
ब्रा ठुँसे, दबे वह राहत।

3. वस्त्र और पितृदृष्टि:

देह सभ्य हो, यह चाहत क्यों?  
क्यों हर दृष्टि में दाहत क्यों?  
शब्द न बोले, बोली देह,  
इस मौन यंत्रणा की प्रेय।

सभ्यता की जो है परिभाषा,  
वह पितृसत्ता की अभिलाषा।  
कपड़े हों 'शालीन' सदा,  
कब तक ढोएँ ये विधि-खदा?

भारत देश में रूढ़ि गहरी,  
परंपराएँ बंधन की जंजीरी।  
साड़ी-कमीज में ब्रा अनिवार्य,  
स्वास्थ्य-आराम पर नियम भारी।

साठ के दशक, पश्चिम जागा,  
स्त्रीवादी लहर ने बंधन भागा।  
ब्रा बनी दमन का एक प्रतीक,  
जलाए गए, उभरा वह गीत।

4. ब्रालेस आंदोलन का स्वर:

ब्रालेस मूवमेंट, बंधन तोड़े,  
सामाजिक नियमों को झटकोरे।  
नारी स्वायत्त, स्वीकारे देह,  
सौंदर्य प्राकृत, न मानदंड नेह।

उठा सवाल यह स्त्रियों से,  
क्या ब्रा जरूरी है कद-कद से?  
कसावट, जलन, रक्त प्रवाह,  
स्वास्थ्य बना अब प्रतिरोध राह।

‘नो ब्रा डे’ की लहर चली,  
स्त्रियों की टोली में जली।  
‘फ्री द निप्पल’ हुआ प्रतीक,  
बोला ‘अब न सहें अधिक’।

मिस अमेरिका में विरोध हुआ था,  
दमनकारी वस्त्र जलाना चाहा।  
हालाँकि जलना था अतिशयोक्ति,  
स्वतंत्रता की थी वह सत्य भक्ति।

आइसलैंड में छात्राएँ जागीं,  
टॉपलेस होकर, बंधन को त्यागीं।  
नो ब्रा डे, तीस देशों में गाया,  
हैशटैग से नारी ने ठहराया। 

सबीना बोली, घुटन है ब्रा में,  
स्वतंत्र देह की चाहत सदा में।  
निप्पल सबके, शर्म कैसी आए,  
चुनाव नारी का, वह स्वीकार लाए।  

5. भारत में आंदोलन की गूंज:

भारत में चुनौती, नजरें ताने,  
‘अश्लील’ कह समाज ठहराने।  
सुरक्षा का डर, उत्पीड़न भारी,  
स्त्री की राह में रुकावट सारी।

परंपराओं की भूमि यह भारी,  
जहाँ लाज बनी है संसारी।  
साड़ी के भीतर भी अनिवार्य,  
ब्रा न हो तो अश्लील विचार।

घूरा जाता, कहा बेहया,  
स्त्री है क्या कोई दशा?  
‘संस्कृति’ का पहरा भारी,  
नारी कैसे हो खुदचारी?

सोशल मीडिया ने दी नई सैर,  
फ्रीथेनिपल बनी आवाज़ गैर।  
नारी देह को यौनिकरण मुक्त,  
स्वायत्तता की राह बनी सुखद।

नाइजीरिया में नियम अनघट,  
ब्रा बिना परीक्षा में रट।  
आक्रोश जगा, बहस छिड़ी भारी,  
नारी स्वतंत्रता की पुकार सारी। 

भारत में धारा दो नौ चार,  
‘अश्लील’ कह, देती उत्पीड़न मार।  
उर्वशी बुटालिया, लेखन में बोली,  
देह पर नियंत्रण, पितृसत्ता खोली।

मिशेल रॉबर्ट्स ने ठहराया,  
ब्रा बंधन, समाज ने बनाया।  
कैद की कहानी, देह की सजा,  
नारी अस्मिता का दर्द बजा।

ब्रालेस होना, स्वतंत्रता गाना,  
देह को अपनाना, मुक्ति ठाना।  
स्त्री की चाहत, बिना बंधन जीना,  
प्राकृतिक सौंदर्य, उसे अपनाना। 

6. वस्तुकरण और प्रतिरोध:


स्तनों को बना जो बाज़ार,  
उनकी देखभाल बना व्यापार।  
सुंदरता की एक कसौटी,  
ब्रह्मण-पावन ब्रा की बोटी।

पर नारी ने यह ठाना,  
अब निज तन पर ही है थाना।  
न होंगे झुकाव से परिभाषित,  
न ही वस्त्रों से अनुशासित।

आइरिस यंग की बात सुनाए,  
ब्रा बाधा, देह को मिटाए।  
प्राकृतिक हिलन, स्तन का सौंदर्य,  
नारी की चाहत, बने वह मंदर।

7. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

कंचुकी पुरानी, क्रोचेट भारी,  
रीढ़ को तोड़े, देह को मारी।  
विश्वयुद्ध में धातु की कमी आई,  
कपड़े की ब्रा, तब मुक्ति लाई।।  

कारखानों में नारी ने गाया,  
ब्रा की जरूरत, सबने ठहराया।  
सूती-नायलॉन, रेशम की सैर,  
आत्मविश्वास की बनी वह गैर।

औशवित्स में कैदी की पीड़ा,  
बोरे से सिली, ब्रा की क्रीड़ा।  
एस.एस. ने सजा दी थी भारी,  
नारी देह पर पितृसत्ता सारी।

क्रोचेट, कंचुकी, तार-पिंजरा,  
ब्रह्मा ने यह कब चाहा ज़रा?  
रीढ़ दबे, पर देह दिखे,  
यही था सौंदर्य का निकष लिखे।

युद्धों में भी औरत जिए,  
बिना सुविधा, चुपचाप सहे।  
कैंपों की पीड़ा, बोरे की ब्रा,  
क्या यह मानवता की कथा?

8. स्त्री का आत्मबोध:

पहला हुक जो पुरुष खोले,  
स्मृति बनी वह तन-मन तोले।  
वह क्षण, वह अनुभव की आंच,  
देती है नारी को पहचान।

स्त्री जो देह को समर्पित करे,  
उसमें लाज नहीं, बस विश्‍वास भरे।  
वह प्रेम हो या आत्म-प्रसाद,  
देह न बने कोई अपवाद।

एम्मा वॉटसन ने दी थी हुंकार,  
स्त्रीवाद है विकल्प, न मार-संघार।  
स्वतंत्रता की राह, समानता आधार,  
स्तन से क्या, मुक्ति का संसार।

सवाना ब्राउन की यूट्यूब सैर,  
‘फ्री द निप्पल’ बनी पुकार गैर।  
लीना एस्को ने फिल्म बनाई,  
नारी मुक्ति की राह दिखाई।

9. विज्ञापन और संस्कृति का यथार्थ:

विज्ञापन कहते, ब्रा है जरूरी,  
‘अपूर्ण’ बिना इसके नारी पूरी।  
दोहरा मापदंड पुरुष-नारी में,  
लैंगिक असमानता सदा भारी में।

बिना ब्रा हो ‘अपूर्ण’ दिखाई,  
यह सोच बनी है साजिश भाई।  
स्त्रीत्व की बनावट झूठ,  
जिससे हो नारी सदैव लूट।

विज्ञापन का झूठा रूप,  
नारी को बाँध रहा है खूब।  
बाजार बना है निर्णयकर्ता,  
स्त्री बने बस उपभोक्ता।

फिर भी बदला, जागी नारी,  
स्वास्थ्य की राह, बनी सारी।  
डिजाइनर कपड़े, बिना ब्रा सजे,  
आराम-स्वतंत्रता, अब वह बजे।

10. पितृसत्ता और अपराधबोध:

ब्रा न पहनने पर हो दंड,  
पता चले कौन है प्रचंड।  
धारा 294 से दफा,  
पहनावा बना अपराध वफा।

घरों में कपड़े सुखाए छिपा,  
स्त्री दिखाए नहीं तन-निपा।  
पुण्य न देखे मातृत्व में,  
लाज खोजे बस वस्त्र में।

स्त्री की निर्वस्त्रता, दर्द गहरा,  
लज्जा ढँकी, पत्तों से पहरा।  
सभ्यता ने बंधन को अपनाया,  
नारी के सौंदर्य को ठहराया। 

पुरुष नग्नता, पौरुष का गान,  
स्त्री की लज्जा, बनी बाजार ठान।  
म्यूजियम में, वस्त्र ना दिखाए,  
नारी सम्मान को, मृत्यु में पाए।।  

11. आत्मनिर्णय की चेतना:

नारी कहे यह मेरा तन,  
न ही कोई है वस्त्र-बंधन।  
क्या पहनूँ और क्या न पहनूँ,  
इसका निर्णय स्वयं में गहनूँ।

पितृसत्ता कहे यह राजनीति,  
हर आंदोलन को कहे कृति।  
पर आत्मा की यह पुकार,  
तन पर अधिकार हो खुद धार।

प्रेमी के लिए, देह का उपहार,  
सम्मान में बंधा, स्नेह आधार।  
स्त्री की प्रकृति, प्रेम में जीना,  
पितृसत्ता को, उसने ना साधा।

12. भविष्य का आह्वान:

धीरे-धीरे बदलेगा समय,  
फूटेगा तम का अंतर्द्वंद्व।  
कपड़े नहीं बनेंगे परख,  
स्वीकृति होगी नारी स्वच्छ।

स्त्री बन सकेगी वह जो चाहे,  
बिना झिझक और बिना राहे।  
नारीवाद न हो सिर्फ़ बात,  
बने व्यवहार में नई जात।

ब्रा का हुक, पहला स्पर्श प्यारा,  
नारी हृदय में, स्मृति वह न्यारा।  
संतान को दूध, देह की सैर,  
आत्मविश्वास में, नारी गौरव गैर।

13. मुक्ति की पुकार:

स्त्री मुक्ति की राह बनाए,  
ब्रालेस मूवमेंट, बंधन मिटाए।  
नारी अस्मिता, स्वतंत्रता गाना,  
समानता का, सपना सजाना।  

नारी की देह न हो पहरा,  
उस पर हो उसका ही बसेरा।  
ब्रालेस हो या वस्त्रयुक्त,  
स्वतंत्रता का हो यह युक्त।

बोलो साथ – “अब देह हमारी”,  
नहीं किसी की निगरानी सारी।  
हमें न चाहिए स्वीकृति, शपथ,  
बस देह की हो निज़ामत स्पष्ट।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


संदर्भ ग्रंथ सूची:-

1.

2.

3.

4.

5.

“दूसरी आज़ादी का आह्वान : यशःकायी बोधिसत्व डॉ. सोनेलाल पटेल”—गोलेन्द्र पटेल

सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत, वंचितों के अधिकारों के सशक्त प्रवक्ता, किसानों व कमेरा समाज के मसीहा, सामाजिक न्याय और समरसता के प्रखर प्रणेता,...