“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
सांत्वना समय का सत्य है
भूख के जमीन पर भय है
भोजन मिले तो विजय है
भावी चुनाव में नेताजी!
भूखा नहीं किसी का
चाटूकार सूनो सरकार
समाजिक व्यक्ति दो चार
वह जीना चहता निर्भय
पेट के ध्वनि को शब्द दे।
एक कर्षित कटोरी ले
गाता जाता सहृदय से
सामर्थ्यवानों के सामने
मानवता के तत्व पाने :
दया करुणा अनुकंपा।
आज कोविड19 का कहर है
झूठा वादा तंबाकू सा जहर है
हंता का जनक चूहा घर घर है
जनता कर्फ्यू से डरा हर नर हैं
भूखे मजदूरों के दर्द मेरे अंदर हैं...
-गोलेन्द्र पटेल
आज 7-8 साल बाद गुल्ली-डंडा खेला, आश्चर्य हो रहा है, खेल-खेल में 4-5 घंटे बीत गया पता भी नहीं चला। जैसे रोज़-रोज़ खेलनेवाले खेल रहे थे, वैसे ही मैं भी, या लम्बे-लम्बे शाट लगाया अब नहीं खेलूंगा क्योंकि लक्ष्य के करीब है मेरा समय।।
तन के ,मन के व हृदय के स्वास्थ के लिए जरूरी होता है खेलना
पर अब खेलने का मेरा उम्र नहीं यह वक्त है अपने गंतव्य-मंतव्य तक पहुँचने का जुनून को जिद्द में बदल कर भागीरथ प्रयास करने का
ठीक है भोर में नहीं उठता जब रात-दिन है अपने साथ तब क्यों न दें देह के लिए कुछ समय
देह से दिमाग का संबंध एक संधि है सड़क पर टहलते समय और स्वाँस के बीच दक्खिनहिया हवा में
जो प्रायः प्रातःकाल नहीं 3 से 4 के बीच चलती है अद्भुत औषधियों का स्पर्श कर
लेकिन आज वो हमें "स्पर्श" का वास्तविक परिभाषा देना चाहती है इंसानों के विरुद्ध
अब मैं जगूँगा इसके चुबंन के लिए रात में कुछ पुसप कुछ डंड बैठकी कुछ व्यायाम कुछ प्राणायाम कुछ योगा कुछ और होगा अगले दिन से अंदर-बाहर वात-बात
गाँव का बगीचा कट गया जहाँ खेला करता था लड़कपन में होलापाती-आइसपाइस-डाकूपुलिस-एकलव्य का खेल बाँस के कईंन का धनुष था तीर सन-सरसों के लकड़ियों का जिसके मुख बिंदु पर लगाया करता था खजूर का काँटा जिसका लक्ष्य था उड़ती चिड़ियों में कबूतर पेढ़की तोता मैना निलकंठ शब्द भेदी अभ्यास के लिए उल्लू व चमगादड़
जो पोखरा-पोखरी प्रायमरी स्कूल के बगल में हैं उसमें बचपन में नग्गा नहाया करता था और गुरुजी वस्त्र हरण कर कृष्ण बन जाते थे मेरे नजरों में पिताजी पिटते थे और माताजी कहती थीं बेटा उसमें बूलुआ रहता है जो बच्चों को ढुँबो कर मुआँ देता है मत जाना उसमें नहाने
परंतु "मत" का असर हम और हमारे प्रथम सहपाठियों पर उलटा पड़ता था हम बार बार कई बार उसमें नहाते एक ही दिन में कटिए से मच्छलियाँ मारते थे मैं शाकाहारी था फिर भी दोस्तों के लिए मारने में मज़ा आता था
आज पोखरे बउली से भी गंदे हो गए हैं क्योंकि उसमें सारे घरों के मल-मूत्र बहते हैं और लोग बहाते हैं निर्भय हो कर
नहीं तैरता अब कहीं कभी कभार गंङ्गा में किसी का चिता जलाने के बाद तैरता हूँ तो बस काव्यसरिता में या कल्पना के महासागर में क्षीरसागर में नहीं क्योंकि वहाँ सोए हैं सतफनवें साँप पर विष्णु जिससे मुझे डर लगता है और विष्णु को नींद से जगाने पर जो मिलेगा डंड उससे भी
खेल था गुल्ली-डंडा का खेत में चाँप कर खेला पहले पहल में सौ का ताड़ पेला एक सहस्र बना बन गया पड्डो हो गया जीत हमारे पक्षों का
अब जीतना है जीवन धैर्य को धारण कर , खेलों के भाँति नहीं दलित वाल्मीकि व मृत्युंजय कर्ण के भाँति जीने के उम्मीद में मरने का प्रथम पथ है कर्मपथ जिस पर जीना मरना है महामोक्ष इस समय।।
*प्रेम में ब्रह्मचर्य* -------------------- मैं उसका था वह मेरी नहीं क्योंकि उसने प्रेम से पहले ही सून लिया है ब्रह्मचर्य पर उपदेश
मैं था कि दिल से दिमाग पर प्रहार करता रहा बार बार कई बार एक ही संदेश
भेज भोजन परोसने के वक्त
अचानक सामने चुप्पी बिल्ली चीखती चिल्लाती गुर्राती बर्राती दूध से भरे दूधनहड़ी पर पंजा मारी
समय शून्य-सा शेष प्रतीत होने लगा पहले प्रेम में
है भय समुद्र को नदी से और नदी को नाले से या कहूँ मुझसे उससे
ऐ लय कंठ के कर्णप्रिय उतर जा अंबर से अवनि पर मेरे प्रिये के पास
जिसे देखता हूँ आँखें मुद आठों पहर
उसके देह हैं दीये जिसके छाया में दो पल जीये : प्रथमप्रेम
अभी अभी ताज़ा मैसेज आया लिखा है : "फूल को पत्थर से प्यार है"
प्रति-उत्तर में भेज रहा हूँ : "पत्थर को हथौड़ी से"
पर्वत गिट्टी हो पूछ रहे हैं दिल्ली शहर के सड़कों पर मेरे आशिक गए कहाँ
कब तक दबने दोगे? लालची लोगों के लोकतंत्र के पैरों के नीचे
सुना है प्रियतम तुम सोते हो संसद सदन के सयन कक्ष है में निडर लिडर बन अब नहीं आओगे तो मेरे करीबी जंगल तुम्हें निर्लज्ज नेता कहेंगे
यह गीत गा रही है एक चतुर चिडिया बैठ मुंडेर पर
पुनः मैसेज आया ब्रह्मचर्यार्थ जानते हो या नहीं?
जी नहीं! न ब्रह्मचर्य ,न प्रेमशास्त्र ,न कामशास्त्र.......
तो आज जान जाओ प्रेम ही ब्रह्मचर्य है
जो अर्थ के अभिव्यक्ति का शब्द नहीं वही वास्तव में प्रेमशास्त्र है
इसके शब्दकोश मौन या नवजात शिशु का संकेत या हमारे-तुम्हारे नैनों की भाषा
कामशास्त्र मैं भी नहीं जानती? न ही जानना चाहती समय से पहले....
जब कुछ दिन बीत गए न फोन आया न मैसेज तो मैं भी बेचैन होने लगा अनयास आपा खोने लगा अपने आदर्श आदत से मजबूर एक बार भी पहले न फोन किया न मैसेज सीधे छः महीने बाद हृदय से हृदय को ह्वाट्सएप हुआ शुभ निमंत्रण : मेरे विवाह में आना जी
तब मेरे भीतर से सहसा निकला मैं था उसका वह मेरी नहीं -गोलेन्द्र पटेल रचना : 25-04-2020 (काल्पनिक प्यार से)
*प्रश्न-कोरोना : हुक्म-ए-लोकतंत्र* १. सृष्टि के सृजन गर्भ में एक नहीं अनेक अंतरिक्षाकाश भर अनंत अद्भुत आश्चर्यमयी-रहस्यमयी-महाविनाशी प्रश्न छुपे हैं जैसे अद्यतन प्रश्न "प्रश्न-कोरोना"
अब साहित्यिक समाज को स्वीकार है
यह युद्ध नहीं महासंग्राम है संसार के श्यामपट्ट पर समय के स्याही से उत्कीर्ण होने के लिए जिसका जनक जन हैं प्रकृति नहीं!
जो चाईना के हैं.....।।
दो वक्त के रोटी के लिए संर्घष शब्द विश्व-विख्यात है जिसे गणित विज्ञान में समुच्चय कहते हैं भूख के अवयवों के
और साहित्य में समन्वय चिखने चिल्लाने गुर्राने बर्राने रोने के।
कान-कान से अफवाह का आवाज़ "कहर-ए-कोरोना" काल में सोशल मीडिया पर सनसनीखेज़ ख़बर बन रहा
धीरज-धैर्य सड़क शुन्य फार्मूला से "लॉकडाउन" का लालटेन जला संसद सदन में है उजाला जनता जन्नत देखने जा रही अंधेरे घरों के भीतर "एकांतवास" का चादर ओढ़
सीख है चमगादड़ के चाम से सूप के विरुद्ध ढोल बनाना जिसके ध्वनि शंखनाद से वायरस भीतर से बाहर भागेगा तन से मन से जीवन से वतन से.....।। २. चमचमाती धूप में चिल्ला चिल्ला फेरी लगाने वाले महामजदूर महामौन के महासागर में अपने आँसुओं के एकैक बूंद को सतह पर तैरते देख रहे आँखें बंद कर उपजीवी उम्मीद के स्वप्न में कहर कहर कुछ पिता छुप छुप इधर उधर डगर पर डर डर मर मर गाँव आ रहे शहर से
जिनके स्वागत के लिए सड़क पर पत्तें उपस्थित हैं कुछ पत्तें मालूम होते हैं धरने के लिए उन्हें रोकना चाहते हैं अपने पास
जो स्वयं सूख रहे हैं धरने पर बैठ
बच्चें खिडकियों से देख रहे गलियों में पिता की राह अंतःअंदर अनंत सपने सजाकर चिंता की चाह देह के डकची में पकाते पकाते थक हार पत्नी भी
गर्भ के रक्षक रोटी जिस मुहर वाले ठप्पे युक्त कागज़ से मिलते हैं उसे दिल्ली के दीमक चाट गयें इसलिए एक-एक दो-दो किलो चावल बाट रहें ऐसा सोच रही गर्भवती मजदूरीन
कोविड-१९ कर्ज़ को काल बनाने आया है ऐसा कह रहे हैं किसान और भूखे इंसान
लॉकडाउन में लक्ष्मणरेखा घर का ड्योढ़ी अब हुआ सड़क पर स्वर्णमृग पकड़ने वाले सैनिक हुए राम सीता के लिए लक्ष्मण का आदेश - "हुक्म-ए-लोकतंत्र"
-गोलेन्द्र पटेल नोट : आधा भेजा हूँ कैसा लगा यह कविता सम्पूर्ण "कविता का पाठ " विडिओ में भेजूंगा
नामवरसिंह पर एकाग्र ' साक्षात्कार के विशेषांक में प्रकाशित
नामवरजी की आलोचना नयी और अलग है, लेकिन उनके यहाँ इसके उगने–बढ़ने का खाद-पानी परंपरा से आता है। नामवरजी ने अपने समय के ‘प्रचलित’ और ‘मान्य’ से अलग और नया किया और खास बात यह है कि उन्होंने हिंदी समाज में ‘अलग’ और ‘नये’ का स्वागत और सम्मान करने की आदत भी डाली। उन्होंने जब आलोचना में कदम रखा, तो उसमें खूँटोंवाली आलोचना का वर्चस्व था। यह ऐसी आलोचना थी, जिसमें इधर-उधर या आसपास था, लेकिन अलग और नये के लिए गुंजाइश बिल्कुल नहीं थी। उस समय माहौल ऐसा भी था कि परंपरा के नाम पर कुछ लोग अतीत में ही ठहर गए थे, जबकि कुछ लोग ऐसे थे, जो परंपरा और विरासत की चेतना और संस्कार को दकियानूसी मानकर हवा में ‘आधुनिक’ हो गए थे। नामवरजी के अलग और नये आलोचक की खास बात यह है कि इसका उगना-बढना परंपरा की जमीन पर हुआ और वह किसी खूँटे से बँधकर उसके बाड़े में कैद भी नहीं हुआ। नामवरजी में परंपरा की चेतना थी, लेकिन अतीत उनके लिए श्रद्धेय कभी नहीं रहा। अतीत के साथ उनका संबंध द्वंद्व का था। दरअसल परंपरा की चेतना और संस्कारवाले सभी लोगों का अतीत से संबंध, यदि यह स्वस्थ संबंध है, तो हमेशा द्वंद्व का ही होता है। परंपरा इसी श्रद्धा संबंध के कारण कई आलोचकों के यहाँ मृत या ठहरी हुई है। नामवरजी के यहाँ यह जीवंत है- इसका बदलना-बनना नामवरजी की आलोचना में साफ दिखता है।
नामवरजी की आलोचकीय पहचान अपनी समकालीनता के ‘अलग’ और ‘नये’ मूल्यांकन के कारण बनी, लेकिन परंपरा की चेतना और संस्कार उनमें निरंतर और गहरा था। परंपरा की स्मृति और संस्कार उनके आलोचकीय प्रस्थान में ही थे। उनके आरंभिक दोनों काम- ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ और ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ हमारी परंपरा की पहचान और मूल्यांकन से संबंधित थे। परंपरा को लेकर नामवरजी के यहाँ कोई आग्रह नहीं था- यह उनकी चेतना और संस्कार में अनायास थी। आलोचना नये की हो, या प्राचीन की, यह चेतना और संस्कार उनकी आलोचना में दिखता है। वे हवा में आधुनिक होनेवाले आलोचको से अलग थे- उन्हें साहित्य की भारतीय और उसमें भी खास तौर पर संस्कृत साहित्य की परंपरा का ज्ञान था, वे परवर्ती पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और देश भाषाओं के साहित्य के भी जानकर थे। उनके ‘आधुनिक‘ की जड़ें इसीलिए इस दीर्घकालीन और विविध प्रकार की पंरपरा में थीं। अन्य कई आलोचको की तरह नामवरजी पश्चिम की ओर पीठ करके कभी खड़े नहीं हुए- वे आधुनिक और उसमें भी उसके नवीनतम को हमेशा अपने सम्मुख रखते थे। हिंदी में हवा में होने वाले आधुनिक तो कई हैं, लेकिन अपनी परपंरा और विरासत में रच-बसकर पूरे आधुनिक होनेवाले नामवरजी ही थे।
नामवरजी से मिलना थोड़ा दुर्लभ, लेकिन बहुत सुखद और समृद्धकारी था। वे संवाद व्यग्र लोगों में से थे- वे संवाद में सोत्साह हस्तक्षेप करते थे और सामनेवाले को भी इसके लिए प्रोत्साहित करते थे। सामनेवाले के लिए उनके पास उसकी रुचि के अनुसार गुजांइश थी और वे उसको ध्यान से सुनते-गुनते थे। अंतिम बार दो विख्यात सम्माननीय कवियों- अरुण कमलजी और लीलाधर जगूड़ीजी के साथ उनके यहाँ गया। यह उनके जीवन का अंतिम चरण था, स्मृति उनका साथ छोड़ रही थी, लेकिन उनकी विद्वत्ता और संवाद व्यग्रता बरकरार थी। वे संवाद की पहल करके आपको अपने साथ जोड़ लेते थे। उनके परिचितों का दायरा बहुत बड़ा था- वे सभी के आत्मीय और अपने थे। अपने सभी परिचितों के लिए उनकी स्मृति में कुछ-न-कुछ था। वे उन लोगों से बहुत अलग थे, जो मिलते ही सामनेवाले पर अपने भारी-भरकम बोझ के साथ लद जाते हैं और उसको छोटा कर देते हैं। वे मिलते ही आपकी लाई किताब, पत्रिका, लेख आदि की उन्मुक्त भाव से सराहना करते और इस तरह आपके खुलने-खिलने और सहज हो जाने की जगह निकालते थे। वे शीर्ष पर थे- उनका कद और हैसियत बहुत बड़ी थी, लेकिन उनसे मिलकर अपने छोटे होने का अहसास कभी नहीं हुआ। उनसे मिलकर, उनके यहाँ से निकलकर अपने को हमेशा आश्वस्त और भरा-भरा पाया।
नामवरजी को पाठ्यचर्या में पढा-पढ़ाया, कई बार सुना और कई बार उनसे आमना-सामना हुआ, लेकिन सही मायने में उनके साथ बैठकर इत्मिनान से बातचीत का मौका विश्वविद्यालय में आने के बाद मिला, जब वे उदयपुर व्याख्यान देने आए। उनसे यह पहली अनौपाचारिक मुलाकात लगभग दो-तीन दिन की थी। विश्वविद्यालय ने मोहनलाल सुखाड़िया स्मृति व्याख्यान देने के लिए नामवरजी को निमंत्रित करने का निश्चय किया। यह विश्वविद्यालय का प्रतिष्ठित वार्षिक आयोजन था। किसी अनुशासन या विषय का कोई शीर्ष विद्वान यह व्याख्यान देता था। युवा आलोचक और संपादक पल्लव उनके स्नेहभाजन थे, इसलिए उनको नामवरजी को राजी करने का दायित्व सौंपा। वे आए। हम थोड़े भयभीत थे, लेकिन उनके बहुत सहज और सामान्य व्यवहार ने हमको भी सहज-सामान्य कर दिया। व्याख्यान दूसरे दिन था, इसलिए रात्रि को भोजन के लिए एक रिसोर्ट पर गए। खुले में बैठे थे, सुनसान था और हवा चल रही थी। चाँद ने निकलना शुरू किया। नामवरजी की निगाहें उसी पर टिकी हुई थी। वे बातचीत में केवल हाँ-हूँ कर रहे थे। एकाएक नामवरजी मुखर हो गए- कालिदास के श्लोक एक बाद एक उनके मुँह से झरने लगे। उन्होंने एक श्लोक के कई निहितार्थ हमारे सामने रख दिए। अंग्रेजी और संस्कृत के प्रोफ़ेसर मित्र प्रदीप त्रिखा और नीरज शर्मा साथ थे- वे आश्चर्यचकित थे। अगले दिन सुबह व्याख्यान हुआ। विषय था- ‘भारतीयता की अवधारणा’। सामान्य औपचारिकताओं के बाद उन्होंने बोलना शुरू किया। एकदम धाराप्रवाह- वाक्य एक के बाद एक ढलकर आ रहे थे। उनकी स्थापनाएँ शास्त्रों से पुष्ट थीं। विश्वविद्यालय का अकादमिक समाज, बुद्धिजीवी और नगर के साहित्यप्रेमी मंत्रमुग्ध थे। उनका विचार था कि हमारे देश के लिए ‘भारत’ नाम इसकी बुनियाद रखनेवालों ने इसके धर्मनिरपेक्ष चरित्र को ध्यान में रखकर बहुत सोच-विचार के बाद रखा। उन्होंने व्याख्यान में कहा कि “आप यही देखें कि भारत नाम है पुराना, लेकिन स्वाधीनता जब मिली, तो सबसे बड़ी चुनौती थी कि पाकिस्तान ने तो अपना नाम रख लिया- पाकिस्तान, तो उसके जवाब में कायदे से इसको हिन्दुस्तान होना चाहिए था, हिन्दुस्तान शब्द चलता भी था। लेकिन क्या बात थी कि पाकिस्तान के बरक्स हमने हिन्दुस्तान नहीं चुना। आप को याद होगा गांधी ने जो पहले किताब लिखी थी ‘हिन्द स्वराज’ थी। गांधीजी ने भारत का इस्तेमाल नहीं किया। जवाहरलाल नेहरू ने जो किताब सौभाग्य से इंग्लिश में लिखी थी तो उसका नाम ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ रखा। ‘भारत एक खोज’ ये नाम अनुवाद करके लिया गया था, जवाहरलाल नेहरू ने तो ये नाम नहीं लिया था। बाद में देखें तो कई अखबार ऐसे हैं। अंग्रेजी में जो अखबार निकलता है वो ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ है, हिन्दी में उसका संस्करण है वो ‘हिन्दुस्तान’ है। ...आज भी ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जो अंग्रेजी का निकलता है वो ‘इंडिया’ से काम चलाता है। ....बावजूद इसके हमने पाकिस्तान के बरक्स हिन्दुस्तान नहीं चुना। क्योंकि यह हिन्दुओं का देश न लगे, न माना जाए। बल्कि हमने तय किया था कि पाकिस्तान भले ही इस्लामिक स्टेट हो, लेकिन हम हिन्दुस्तान के बरक्स हिन्दुओं का राज्य नहीं कायम करेंगे।” भारतीयता के संबंध में उनकी धारणा थी कि यह लेने-देने की नहीं, खोजने की चीज है और हर व्यक्ति और हर पीढ़ी अपनी भारतीयता, अपनी तरह से खोजती है। उन्होंने व्याख्यान में इसको उदाहरण से स्पष्ट करते हुए कहा कि “जन्म लेने से ही यह प्रमाण पत्र नहीं मिल जाता कि हम भारत को जानते और समझते हैं। अगर ऐसा होता तो जवाहरलाल नेहरू इतने दिनों तक आम जनता के बीच संघर्ष करते रहे, देश की स्वाधीनता के लिए लड़ते भी रहे और इस काफी लंबी लड़ाई के बाद जेल में आकर चालीस के दशक के बाद, एक लम्बा जीवन बिताने के बाद, उन्होंने जो किताब लिखी उसका नाम था ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’। जाहिर है उन्होंने डिस्कवरी की, खोज की। अनुवाद उसका ‘भारत एक खोज’ होना चाहिए था, इसलिए कि इतने दिनों तक भारत में रहने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू की यह किताब इशारा करती है कि भारत सहज सुलभ नहीं है। ये वो जानते थे। एक लंबी उमर के बाद भी उन्होंने भारत को नये सिरे से खोजा। ये खोज की उन्होंने भारत का तूफानी दौरा करते हुए। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान, चुनाव के दौरान वे गाँव गए। सब कुछ देखा, रहन-सहन, खान-पान सब देखा।” उनका यह भी मानना था कि हमारे साहित्य ने भारतीयता की खोज की है। उन्होंने इस पर विस्तार से रोशनी डालते हुए हुए कहा कि “भारत की खोज होती रही। कविताओं के द्वारा, कहानियों के द्वारा, उपन्यास के द्वारा। क्योंकि भारत एक भूगोल नहीं हैं। भारत केवल नदियों, पहाड़ों, जंगलों का देश नही है। न यह बड़े–बड़े महानगरों, कल-कारखानों का देश है। बल्कि जो स्वयं ये भारत में रहनेवाले जो लोग हैं, जो जनता है, उस जनता की अपनी जिंदगी है, अपनी कहानी है, उसके अपने दुखःदर्द हैं, संघर्ष है, हास है उल्लास है, जो कभी-कभी उसके त्योहारों में अभिव्यक्त होते हैं, उसके अलावा व्यक्त होते हैं- ग्राम-गीतों में, लोककलाओं में।” जाहिर है, यह बातें कट्टरपंथी रुझानवाले लोगों को अच्छी नहीं लगी। बाद में उनमें से एक राजनेता ने मंच पर जाकर अपनी असहमति व्यक्त की। नामवरजी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। दूसरे दिन यह मामला अखबारों में उछला। अखबार उन्हें दिखाए- वे निर्द्धन्द्ध थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा। बाद में हम कीर्तिशेष कवि नंद चतुर्वेदी के यहाँ मिलने गए- दोनों ने बहुत देर तक घर-परिवार और सुखःदुख की बातें कीं। नंदबाबू ने उनके व्याख्यान पर विवाद का प्रसंग भी छेड़ा, लेकिन उन्होंने इसे बहुत महत्त्व नहीं दिया। बहुत बाद में समझ में आया कि वे अपनी धारणाओं में साफ थे- उनकी राय दो टूक थी और वे इस पर किसी ऐसी-वैसी प्रतिक्रिया पर टिप्पणी करने से परहेज कर रहे थे।
बाद में एक-दो अवसरों पर और प्रिय पल्लव के साथ उनके पास गया। बातचीत हुई- हमने इस बीच अपना किया-धरा उनको दिया, उन्होंने देखा और हमेशा की तरह इसकी सराहना की और प्रोत्साहित किया। नामवरजी से हुई अंतिम भेंट सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। इस भेंट से लगा कि नामवरजी को प्राचीन साहित्य से कितना गहरा लगाव था, वे इसके संरक्षण और प्रकाशन के लिए कितने चिंतित थे और यह भी कि उनका आलोचकीय प्रस्थान कितना संघर्षपूर्ण था। यह भेंट तब की है जब उनकी स्मृति धुँधली होने लग गई थी। खास बात यह है कि धुँधली स्मृति के बाबजूद राजस्थान के प्राचीन साहित्य और संस्कृति के लिए उसमें कितनी गहरी और मजबूत जगह बनी हुई थी। साहित्य अकादेमी के एक आयोजन में थे। आग्रह अरुण कमलजी का था कि आज नामवरजी के पास चला जाए। नामवरजी के लिए उनके मन में असाधारण किस्म का सम्मान था। उनके दिल्ली में होने का एक मतलब नामवरजी से मिलना भी था। वे अक्सर बातचीत में नामवरजी घर जाने को तीर्थाटन कहते थे। लीलाधर जगूड़ीजी को साथ लेकर दोपहर के बाद हम तीनों शिवालिक आपर्टमेंट पहुँचे। बाहर ताला लगा हुआ था। गर्मी बहुत थी- हम पसीने में लथपथ थे। निराशा हुई- हम तीनों ने बारी-बारी से ताले को हाथ लगाकर परखा-तोला और पाया कि यह लगा हुआ था। अरुण कमलजी ने मोबाइल पर डायल किया, तो मोबाइल अंदर बज रहा था। अरुण कमलजी बहुत चिंतित और व्यग्र थे, उन्होंने दरवाजा खटखटाया, आवाजें दीं, पर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। हम सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आ गए। हम तीनों बहुत देर तक ऊहापोह में खड़े रहे। अंततः अरुण कमलजी फिर ऊपर गए। उन्होंने इधर-उधर तलाश की और अंततः दरवाजे के पास दीवार पर लिखा हुआ एक मोबाइल नम्बर लेकर नीचे आए। नीचे आकर उन्होंने लगाया, तो पता लगा यह नामवरजी की सेवा करनेवाली एक युवती का नंबर है। कुछ देर में वह आ भी गई। उसने ताला खोला, नामवरजी आए और हमको देखकर बहुत प्रसन्न हुए। साहित्य अकादेमी से मुनि जिनविजय पर प्रकाशित विनिबंध की प्रति उनको दी। देखकर उन्होंने कहा- मुनिजी पर मोनोग्राफ आ गया, अकादेमी ने यह अच्छा काम किया। मुनि जिनविजय से उनकी अपने गुरु हजारीप्रसाद द्धिवेदी के कारण आत्मीयता थी। आदिकाल की अवधारणा के विकास में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिन साहित्यिक रचनाओं का इस्तेमाल किया किया है, उनमें से अधिकांश मुनि जिनविजय के द्वारा अन्वेषित और संपादित-प्रकाशित थीं। उन्होंने हजारीप्रसाद द्विवेदी से सुना मुनि जिनविजय संबंधी एक प्रकरण भी हमें सुनाया। उन्होंने बताया कि शांतिनिकेतन में आचार्य क्षितिमोहन सेन, हजारीप्रसाद द्विवेदी और मुनि जिनविजय के बीच में किसी विषय को विचार-विमर्श चल रहा था। एक युवक विद्वान पर्याप्त तर्क देने के बाद भी असहमत था। उसकी असहमति में विनम्रता कम और दंभ ज्यादा था। अंततः कृशकाय मुनि जिनविजय ने लकड़ी उठाई और कहा कि वे केवल विद्वान नहीं हैं, वे जाति से राजपूत हैं और तदनुसार उत्तर देने की क्षमता भी रखते हैं। उन्होंने बताया कि वृद्धावस्था और कमजोर आँखों के बावजूद मुनिजी पांडुलिपियाँ सामान्य किताबों की तरह पढ़ते थे। फिर उन्हें अपने शोधकार्य के सिलसिले में किए गए राजस्थान प्रवास की स्मृति हो आई। वे अपने शोधकार्य के सिलसिले में राजस्थान और उसमें भी खास तौर पर बीकानेर में लंबे प्रवास पर रहे। उन्होंने बताया कि बीकानेर उस समय प्राचीन साहित्य के संरक्षण और शोध का केंद्र था। प्राचीन साहित्य की अधिकांश पांडुलिपियाँ वहीं थीं। यह वहाँ सक्रिय दो विद्याव्यसनी और प्राचीन साहित्य के विशेषज्ञ, अगरचंद नाहटा और नरोत्तम स्वामी के कारण संभव हुआ। उन्होंने यह भी बताया कि इटली के विख्यात राजस्थानी साहित्य के विद्वान एलपी तेस्सीतोरी का शोध कार्य का क्षेत्र भी बीकानेर ही था। अगरचंद नाहटा और नरोत्तनम स्वामी के प्राचीन साहित्य के संरक्षण और शोधकार्यों की उन्होंने सराहना की और दुःखी हुए कि अब नई पीढ़ी तो उनके संबंध में जानती तक नहीं है। ‘पृथ्वीराज रासो’ की पांडुलिपियाँ उनको इन दोनों विद्वानों से ही मिलीं और उन्होंने यहीं रहकर इन पांडुलिपियों की प्रतिलिपियाँ भी कीं ।
राजस्थान की संस्कृति और उसमें भी खासतौर पर यहाँ के आतिथ्य-सत्कार की उन्होंने जमकर सराहना की। उन्होंने बताया कि अपने शोधकार्य के लिए वे लगभग पूरा राजस्थान घूमे। यहाँ के लोगों से मिले प्रेम और आतिथ्य-सत्कार से वे अभिभूत थे। उन्होंने बातचीत में यह भी जोड़ा कि उस समय आज की तरह फैलोशिप वगैरह नहीं मिलती थी और उनके पास इतने पैसे नहीं थे, लेकिन राजस्थान के आतिथ्यप्रेमी लोगों के कारण उनको यहाँ कोई असुविधा नहीं हुई। शोधकार्य के लिए किए गए इस प्रवास और यात्रा में सहयोगी रहे अपने एक पुस्तक व्यवसायी मित्र चंपालाल रांका के संबध में उन्होंने हमें विस्तार से बताया। रांकाजी को उन्होंने बहुत प्रेम और आदर के साथ स्मरण किया। राजस्थान के ग्रंथागारों में संग्रहीत पांडुलिपियों की दुर्दशा और उन पर कोई काम नहीं हो पाने के कारण वे दुःखी थे। उन्होंने कहा कि इस दिशा में कुछ होना चाहिए। बातचीत में और भी कई प्रसंग आए। उस समय उन्हें साहित्य अकादमी द्वारा दी गई महत्तर सदस्यता का प्रसंग ताजा था। अरुण कमलजी ने स्मरण करवाया, उन्होंने निर्लिप्त भाव से सुन लिया, इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। अब वे इन सब से ऊपर उठ चुके थे। उन्होंने अपनी सेविका से कहा कि हमारा एक फोटो लो। वे हमारे बीच में बैठे और चित्र लिया गया। हमने चाय पी, अंत में उनके चरण स्पर्श किए और नीचे आए। अरुण कमलजी ने कहा कि आज की यह भेंट तो असाधारण है- नामवरजी इतना खुलकर अपने अतीत को कम स्मरण करते हैं।
हिंदी में माहौल शुरू से ही कुछ ऐसा बना कि परंपरा और आधुनिकता में ही छत्तीस का आँकड़ा हो गया। यह नासमझी थी। दरअसल परंपरा ही अपनी निरंतरता में आधुनिक भी होती है और जो परंपरा अपनी निरंतरता में आधुनिक नहीं होती वह सही मायने में परंपरा नहीं है। नामवरजी की आधुनिक आलोचना परंपरा की निरंतरता का विस्तार और पल्लवन है। परंपरा में असहमति को भी अच्छा नहीं मानने का चलन हिन्दी में रहा, लेकिन असहमति भी परंपरा की निरंतरता का ही हिस्सा है। परंपरा असहमति से ही जीवंत और पुनर्नवा रह पाती है। यदि असहमति नहीं है, तो परंपरा ठहर जाएगी और यह परंपरा नहीं रहेगी। नामवरजी के तमाम आलोचना कर्म में इसीलिए असहमति भी निरंतर है। खास बात यह है कि कई जगह तो वे अपने गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी से भी असहमत होते हैं।
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हुई नामवरी सुबह की सांझ….
हिन्दी के शीर्षस्थ शोधकार-समालोचक नामवर सिंह (जन्म: 1 मई 1927- मृत्यु: 19 फ़रवरी 2019) को युवा लेखिका अर्पिता राठौर की भावांजलि। सम्पा.
वर्तमान ‘साहित्य और आलोचना’ के युग पुरुष ‘दूसरी परंपरा की खोज’ कर ‘हिंदी में अपभ्रंश का योग’ जता कर ‘कविता की ज़मीन, ज़मीन की कविता’ को ‘कविता के नए प्रतिमान’ प्रदान करते हैं| आज उनका जाना भले ही एक युग का अंत हो लेकिन जब तक इस ज़माने में अभिव्यक्ति का प्रश्न बना रहेगा तब तक नामवर सिंह भी हमारे बीच मौजूद रहेंगे|
समकालीन जगत के तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद भी नामवर जी की लेखनी में दृढ़ता है| एक ऐसी दृढ़ता जो अपने समय को और अपने समय के साहित्यकारों को तो चुनौती देती ही है, साथ ही उन चुनौतियों का समाधान भी लेकर आती है| या यूं कहें कि ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’ से अस्मिता की खोज करने वाले ‘बकलम खुद’ आलोचकों के मध्य स्वयं प्रतिपक्ष खड़ा करते हैं और ‘वाद विवाद संवाद’ के ज़रिए अपने तर्क शास्त्र से साहित्य जगत को हतप्रभ कर देते हैं। एक अन्वेषी के रूप में नामवर जी की दृष्टि उन अनछुए आयामों पर भी जाती है जो साहित्य जगत में नवीन परिभाषा की मांग करते हैं। वे ‘भावबोध’, ‘तनाव’, ‘द्वंद्वात्मक प्रणाली’, ‘बहुलतावाद’, ‘सपाटबयानी’ जैसे नए शब्द तो गढते ही हैं, पर साथ ही कुछ सामान्य शब्दों में अद्भुत रंग सम्मिश्रित कर उन्हें अपनी आलोचना का एक अहम हिस्सा बनाते हैं। इसीलिए यहां यह कहना आवश्यक है कि जिस प्रगतिशीलता और मानवतावाद की परिकल्पना हज़ारी प्रसाद द्विवेदी करते हैं, उसमें समय के साथ जो विकृतियां शामिल होती गई हैं उस पर डॉ. नामवर सिंह पहले चोट करते हैं और फिर प्रगतिशीलता के नए मुहावरे भी गढ़ते हैं।
इतिहास और आलोचना के समन्वय से निर्मित नामवर सिंह, हर युग और उसकी हर परिस्थिति को तब तक कुरेदते हैं जब तक उसका मूल कलेवर सामने ना आए। इसीलिए छायावाद के संदर्भ में नवीनतम दृष्टि लाने वाले वे पहले आलोचक बनते हैं जो उसको परत-दर-परत खोल कर उसकी वास्तविकता को हमारे सामने प्रस्तुत कर देते हैं। जब वे कहते हैं- “छायावाद का स्थायित्व उसके व्यक्तिवाद में नहीं, उसकी आत्मीयता में है, काल्पनिक उड़ान में नहीं आत्मप्रसार में है……… दृष्टिकोण में नहीं दृष्टि में है…”1- तो यहां यह बात केवल छायावाद तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि व्यापक अर्थ में एक ऐसा वाक्य बन जाता है जो संपूर्ण साहित्य को समझने का एक विवेक विकसित करता है, एक ऐसा विवेक जो किसी पूर्वाग्रह से रहित हो। मौखिक परंपरा को आगे बढ़ा आलोचना के नए अफसाने गढ़ने वाले नामवर सिंह यदि किसी के प्रति सबसे अधिक प्रतिबद्ध हुए हैं तो केवल और केवल अपने समय के प्रति। उस समय को ही केंद्रित करते हुए वे लेखकों और वादों के पुनर्प्रतिष्ठापन के पक्षधर रहे हैं। वे बात करते हैं ‘रिअडैप्टेशन’ की, मांग उठाते हैं इतिहास के पुनर्लेखन की, एक ऐसा इतिहास जो पारंपरिक रूप से चली आ रही औपनिवेशिक दृष्टि से कोसों दूर हो।
नामवर सिंह के साथ साथ एक नया युग अपने कदम बढ़ा रहा था। इस युग में एक ओर पंचवर्षीय योजना की विफलता झलकती है, तो दूसरी ओर यहां वैश्विक स्तर पर दो महागुटों की टकराहट की तस्वीरें है, कहीं विचारधाराओं में प्रतिस्पर्धा जारी है तो कहीं आंतरिक द्वंद्व की आहट महसूस होती है। ऐसे दौर के साथ नामवर जी हाथ तो मिलाते हैं पर उसके साथ कभी समझौता नहीं करते। वे तो उन रास्तों में पैठ बनाते तमाम अंतर्विरोधों में भी नई राहे खोजते हैं। विचार दृष्टि अथवा प्रतिमानों के प्रति प्रतिबद्ध आलोचक उनके बाद शायद ही कोई दूसरा हुआ होगा। युगबोध और भावबोध के बीच समन्वय करने वाले आलोचक नामवर सिंह ‘अच्छे’ या ‘बुरे’ जैसे शब्दों को साहित्य की परिधि से दूर ही रखते हैं। उनके लिए साहित्य की अपनी कुछ रूढ़ियां हैं, कुछ प्रतिमान हैं जिनके आधार पर या तो कोई रचना खरी उतरती है या नहीं। इन सब के बीच नामवर सिंह इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि समकालीन जगत में साहित्य के प्रतिमानों में बदलाव की आवश्यकता है। समय की इस ज़ोर जरूरत के चलते नामवर जी की सफलता भी तभी है जब आज का आलोचक उस दूसरी परंपरा के मध्य में से किसी नई परंपरा का अन्वेषण करे जो अपने युगबोध के साथ तालमेल बैठा पाए।
तमाम विरोध और समर्थन के बावजूद भी नामवर जी तटस्थता के पक्षधर रहे हैं। वे अस्मिता की खोज को अभिव्यक्ति की खोज मानते हैं जिसके चलते नई कहानी के संदर्भ में निर्मल वर्मा कृत ‘परिंदे’ को और नई कविता के संदर्भ में ‘मुक्तिबोध’ को सही ढंग से समझने और समझाने का प्रयास करते हैं। वे एक ऐसे आलोचक के रूप में हमारे समक्ष आते हैं जो लगातार अपने समय के साथ तर्क की कसौटी पर बहस करता है। ‘वाद विवाद संवाद’ में उनकी यही बात सामने आती है जहां वे समकालीन भाषा, साहित्य और आलोचना कर्म की बुनियादी समस्याओं को उजागर करते हैं। यहाँ एक ओर वे प्रगतिशील साहित्यधारा में अंधलोकवादी रुझान पर विचार करते हैं तो वहीं दूसरी ओर नव्यऔपनिवेशीकरण जैसी गंभीर समस्या के प्रति भी चिंतनशील रहते हैं। अतः नामवर सिंह एक ऐसी नवीन परंपरा का नाम है जो अपने समय के साथ संवाद स्थापित करती हुई कॉलोनियल डिसकोर्सेज से अलग खड़ी होती है।
19 फरवरी, 2019 की सांझ सृष्टि की क्रूरता लिये हुए आई और आधुनिक हिंदी आलोचना के एक युग को लील गई,। इससे नामवरी आलोचना का ‘वाद विवाद सम्वाद’ थम-सा गया….
“नभ के नीले सूनेपन में हैं टूट रहे बरसे बादर जाने क्यों टूट रहा है तन !
बन में चिड़ियों के चलने से हैं टूट रहे पत्ते चरमर जाने क्यों टूट रहा है मन !
घर के बर्तन की खन-खन में हैं टूट रहे दुपहर के स्वर जाने कैसा लगता जीवन !
(नामवर सिंह)
(नोट : यह लेख मेरा नहीं है अर्थात् अपना नहीं अपने लिए है।-गोलेन्द्र पटेल)
सृष्टि में केदारनाथ सिंह' इसी नाम से 'चौपाल' का विशेषांक आया है। प्रिय कामेश्वर प्रसाद सिंह ने बहुत महत्वपूर्ण और बड़ा काम किया है। मेहनत दिखती है।व्यवस्थित ढंग से सामग्री प्रस्तुत की गयी है। कवि गुरू केदार की स्मृतियाँ, मित्र मंडली में केदार, घर-परिवार में केदार, कृतियों में कवि केदार, कवि का संसार, कसौटी पर कविता-एक कविता:एक आलोचक, कविताओं में कवि, धरोहर और पत्र शीर्षक अनेक खंडों में लगभग छह सौ पृष्ठ की सामग्री। अपने संपादकीय में कामेश्वर प्रसाद सिंह केदारनाथ सिंह को याद करते हुए कहते हैं कि वे अब भी हैं, अपने होने की बहुत-बहुत सी जगहों पर, उतने ही जीवंत, उतने ही सजग, उतने ही उत्फुल्ल। होकर भी न होने की तरह और न होकर भी होने की तरह। कामेश्वर जी की इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि यह अंक उनके न होने के बाद उनको महसूसने के रोमांचक आमंत्रण की तरह है। यूं तो केदारनाथ सिंह पर बातें तब तक होती रहेंगी, जब तक कविता पर बातें होती रहेंगी लेकिन इस अंक में उन्हें और उनकी कविता को समझने की एक बड़ी और व्यापक कोशिश दिखाई पड़ती है। इसमें एक आलेख मेरा भी है।
जड़ों की ओर वापसी के लिए 'विद्रोह'
सुभाष राय
यथास्थिति, जड़ता, विनाश और तबाही के विरुद्ध न केवल मनुष्य बल्कि प्रकृति भी निरन्तर सक्रिय रहती है। धरती पर जीवित-अजीवित, नदी, जंगल, पहाड़, वनस्पति तथा जीवन के अन्य अनगिनत रूपों में आंतरिक स्तर पर एक उद्वेलन, आंदोलन चलता रहता है, जिसकी दिशा हमेशा बदतर से बेहतर, असुंदर से सुंदर की ओर रहती है। कई बार बदलाव की यह प्रक्रिया अचानक शुरू होती है और बहुत तीव्र गति से आगे बढ़ती है, एक ‘विद्रोह’ की शक्ल में। ‘विद्रोह’ शब्द जीवन में तमाम अर्थों में व्यक्त होता आया है। दुनिया भर की अनेक भाषाओं में लेखकों, कवियों, रचनाकारों के लिए यह एक आकर्षक और सम्मोहक शब्द रहा है। इस पर सैकड़ों कविताएं लिखी गई हैं, इसे तरह-तरह से समझने और व्याख्यायित करने की कोशिशें भी की गई हैं। केदारनाथ सिंह जी ने भी इसी शब्द शीर्षक से एक कविता लिखी है, ‘विद्रोह।' आइए पहले वह कविता पढ़ते हैं-
आज जब घर में घुसा/ तो वहां अजब दृश्य था/ सुनिये-मेरे बिस्तर ने कहा/ यह रहा मेरा इस्तीफा/मैं अपने कपास के भीतर/ वापस जाना चाहता हूँ। उधर कुर्सी और मेज का/ एक संयुक्त मोर्चा था/ दोनों तड़पकर बोले-/ जी हां, अब बहुत हो चुका/ आप को सहते-सहते/ हमें बेतरह याद आ रहे हैं/ हमारे पेड़ और उसके भीतर का/ वह जिंदा द्रव/ जिसकी हत्या कर दी है आप ने। उधर आलमारी में बंद/ किताबें चिल्ला रही थीं / खोल दो-हमें खोल दो/ हम जाना चाहती हैं अपने / बाँस का जंगल और मिलना चाहती है/ अपने बिच्छुओं के डंक/ और सांपों के चुंबन से। पर सबसे अधिक नाराज थी/ वह शाल, जिसे अभी कुछ दिन पहले/ कुल्लू से खरीद लाया था/ बोली-साहब/ आप तो बड़े साहब निकले/ मेरा दुम्बा भेड़ा मुझे कब से पुकार रहा है/ और आप है कि अपनी देह की कैद में/ लपेटे हुए हैं मुझे। उधर टीवी और फोन का बुरा हाल था/ जोर-जोर से कुछ कह रहे थे वे/ पर उनकी भाषा मेरी समझ से परे थी/ कि तभी नल से टपकता पानी तड़पा-/ अब तो हद से गयी साहब/ अगर सुन सकें तो सुन लीजिए/ इन बूंदों की आवाज-/ कि अब हम यानी आपके सारे के सारे कैदी/ आदमी की जेल से मुक्त होना चाहते हैं। अब कहां जा रहे हैं-/ मेरा दरवाजा कड़का/ जब मैं बाहर निकल रहा था।
नल से टपकता पानी केदारनाथ सिंह से जो कहना चाहता है, उसे समझने के लिए पहले हमें धरती की ओर, उसकी पीड़ा की ओर झांकना होगा। पृथ्वी अपनी धुरी से खिसकने के कगार पर है। जब भी वह अपनी धुरी से खिसकती है, अनतिक्रम्य विनाश लेकर आती है। बड़ी-बड़ी सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं, सतह के नीचे दफन हो जाती हैं। असंख्य जीवन, वनस्पतियां विलुप्त हो जाते हैं, धरती के गर्भ में उनकी काली जली हुई स्मृति भर रह जाती है। क्या सचमुच पृथ्वी करोड़ों वर्षों से चल रही एक बैलगाड़ी की तरह है, जिसकी धुरी को मरम्मत की जरूरत है? परन्तु धरती तो अपनी मरम्मत खुद ही करती रहती है, फिर ऐसी स्थिति क्यों आयी? वह अपनी मरम्मत करने में विफल क्यों हो रही है? क्या हुआ है जो नींद में पहाड़ रात-रात भर रोते रहते हैं? क्यों नदी अब घर में नहीं रह गयी है, कहां है जो दिखती नहीं? बाघ को क्यों डर लगता है कि एक दिन वह भी मार डाला जायेगा? सचमुच बहुत खतरनाक स्थिति है। तापमान बढ़ रहा है। समुद्र दिन-ब-दिन गरम हो रहा है। उसकी लहरें तटों से टकरा रही हैं। किनारे बसे खूबसूरत शहरों में प्रवेश कर रही हैं। पिछले कुछ दशकों में समुद्र के सीने पर बसे कई सुंदर द्वीप या तो डूब गये या डूबने के कगार पर है। बारिश अब मौसम के रास्ते नहीं आती। मौसम कई बार आसमान में टकटकी लगाये गुजर जाता है और एक बूंद भी नहीं गिरती। कई बार इतनी बारिश होती है कि गांव के गांव बह जाते हैं, डूब जाते हैं, सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। आंधियां भी अब पहले जैसे कहां आती हैं। लेकिन वे जब भी आती हैं, विनाश की अनगिनत तस्वीरें छोड़ जाती है। जंगल रहे नहीं। जितने बचे हैं, वहां रहने वाले जीवों के लिए पर्याप्त नहीं। उन्हें जब जंगल में खाने को नहीं मिलता, वे बस्तियों की ओर निकल आते हैं, तबाही मचाते हैं। पेड़ों में पहले जैसे फूल नहीं आते, फल नहीं लगते। परागण करने वाले छोटे-छोटे जीव, कीड़े-मकोड़े धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं। आधी सदी पहले सुबह-सुबह पक्षियों का जो संगीत सुनायी पड़ता था, अब कहां रहा। आदमी मंगल पर या अन्य ग्रहों पर अपनी पृथ्वी ढृूढ़ रहा है। सोचता है कि पृथ्वी पर प्राकृतिक कारणों से या मनुष्य की करतूतों से कभी बड़ा धमाका हुआ तो वह उड़कर दूसरे ग्रह पर चला जायेगा। यहां पृथ्वी पर पानी अब दुर्लभ होने के कगार पर है। केदारनाथ सिंह यह सारा विनाश, सारा ध्वंस बहुत उदास मन से देखते हैं। उसे अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं। उन्हें पता है कि उन्हें तो इसी धरती पर रहना है, चिड़ियों की उड़ान के साथ। इसलिए वे उम्मीद नहीं छोड़ते। कभी किसी बिंदु पर शायद मनुष्य को समझ में आ जाय। वह अपने मूल की ओर लौट चले।
मनुष्य समझता है कि उसने बहुत प्रगति कर ली है। उसने पहाड़ों को रौंदकर उन पर सड़कें बिछा दी हैं। नदियों को बांध लिया है। जंगलों को सूखी कटी लकड़ियों के ढेर में, घर में सजाने वाली चीजों में बदल दिया है। अपनी सुख सुविधाओं के हजार साधन जुटा लिये हैं। मौसम के विरुद्ध खुद को सुरक्षित रखने की तरकीबें ढूंढ ली है। समुद्र को कैद कर लिया है। पृथ्वी के गर्भ को चीरकर सारे कीमती संसाधन निकाल लिये हैँ और उसे अपने विकास की रफ्तार तेज करने में लगा दिया है। वह इस अंधाधुंध विकास के परिणाम को नहीं देख पा रहा। उसे चिंता नहीं है कि विकास के जहरीले धुएं ने ओजोन की परत में जो छेद कर दिया है, उससे सूरज की जानलेवा किरनें जमीन तक पहुंच रही है। उसे चिंता नहीं कि उसने हरे जंगलों को काटकर वहां जिस तरह कंक्रीट के बदरंग जंगल खड़े कर दिये हैं, उससे जंगल के असली रहवासियों का घर छिन गया है और तमाम जीवों एवं वनस्पतियों का जीवन खतरे में पड़ गया है। प्रकृति संतुलनधर्मा है। उसके साम्राज्य में हर जीवन की, हर वनस्पति की अपनी भूमिका है। सब अन्योन्याश्रित है। सब एक दूसरे के काम आते हैं। किसी एक का होना किसी दूसरे के होने का कारण है। यह बिल्कुल न समझा जाये कि कुछ जीव खत्म हो जायेंगे तो भी ऐसे ही चलने वाला है। यह एक चेन की तरह है, जो एक जगह भी टूटी तो पूरी बिखर जायेगी। एक तितली मरती है तो कई पौधों में फल नहीं आते। केदारनाथ सिंह की कविताएं प्रकृति, पृथ्वी और जीवन के पक्ष में खड़ी है। वे धरती पर जीवन के संतुलन के सूत्र को ठीक से समझते हैं। वे इस मर्म को जानते हैं कि सबका रहना जरूरी है, किसी का भी अस्तित्व किसी अन्य के विरुद्ध नहीं है और सभी मिलकर एक विराट अस्तित्व की रचना करते हैं। उस अस्तित्व में कोई भी सूराख धरती की धुरी को डांवाडोल कर सकता है, प्रकृति के संतुलन को डगमगा सकता है। वे इसीलिए बार-बार जड़ों की ओर, मूल की ओर, बीज की ओर लौटने की हिमायत करते हैं। वे यह भी जानते हैं कि सबसे बड़ी बाधा बाजार है। वह बीच में खड़ा है, रास्ते में खड़ा है। वे चुपके से बाजार को खबर हुए बगैर चावल से, नमक से और पुदीने से मिलना चाहते हैं। उन्हें कविता और बाजार की हल्की सी टक्कर भी रोमांचित करती है। वे गांव से शहर आते हैं पर शहर में चैन से रह नहीं पाते। लौटकर बार-बार गांव आते हैं। वे जानते हैं कि गाँव विकास के ध्वंस से अभी भी थोड़े बहुत बचे हुए है। अभी भी वहां जीवन है, प्रेम है, हवा है, पानी है। सांस है बची हुई। उन्हें विकास की शुष्क ऊंचाई पसंद नहीं। यह कितना खतरनाक है कि शहर की सारी सीढ़ियाँ मिलकर जिस महान ऊंचाई तक जाती है, वहां कोई नहीं रहता। वे समझ रहे हैं कि एक विकसित और सभ्य कहे जाने वाली दुनिया सर्वाधिक क्षुद्र, असहनशील, स्वार्थी और असभ्य होगी। वह केवल मनुष्य के लिए ही नहीं समूची धरती के लिए खतरनाक होगी, सबको नष्ट कर देगी।
केदारजी अपने चारों ओर बहुत ही गहरी नजर रखते हैं। जब विस्थापन का दौर हो, जब सारी चीजें अपनी जड़ों से छूट रही हों, जब सबके सब अपनी पहचान खो रहे हों, तब मनुष्य का भी अपने मूल यानी मनुष्यता से विलग हो जाना लाजिमी है । यह होता रहा है, आज भी हो रहा है। विकास की गति जितनी तेज हुई है, मनुष्य उतना ही लालची, पाखंडी और दंभी हो गया है। उसे अपने सिवा किसी और की परवाह नहीं है। उसने संवेदना, करुणा, प्रेम, दया सब कुछ छोड़ दिया है। उसने अपने मूल को तिलांजलि दे दी है। वह किसी के दुख से दुखी नहीं होता, किसी की पीड़ा से आहत नहीं होता। उसने अपनी सामूहिकता, सामाजिकता खो दी है। वह नितांत अकेला हो गया है और इसीलिए बहुत ही क्रूर, अमानवीय और असहिष्णु भी। वह अपनी जड़ों से अलग ही नहीं हुआ है, उस पर कुल्हाड़ी भी चला रहा है। वह नहीं जानता कि जिस दिन जड़ें पूरी तरह कट गयी, वह इस तरह गिरेगा कि फिर कभी उठ नहीं पायेगा। केदारनाथ सिंह इस संकट को समझ रहे हैं, इसीलिए वे अपनी जड़ों की बात करते हैं। लोक की, गांव की, नदी, पहाड़, जंगल की, पानी की, हवा की बात करते हैं। प्रख्यात आलोचक अरुण होता लिखते हैं, 'केदार जी की कविता अपनी जड़ों से उत्पन्न होती है। उससे ऊर्जा पाती है और उसके बल पर समय और समाज को विनिर्मित करती है। नागार्जुन, त्रिलोचन की तरह केदार जी का अपनी जड़ों के प्रति अपार लगाव है। जनपदीय चेतना से संबद्धता है। इसीलिए रोज-ब-रोज हमारी आंखों से दिखने वाली चीजें जो अक्सर हमसे छूट जाती हैं। यानी जिन पर नजर नहीं जाती, उन्हें यह कवि बड़ी शिद्दत के साथ प्रस्तुत कर देता है। उनमें छिपे जीवन रहस्य के मर्म को उद्घाटित कर देता है। ऐसा कर पाना कवि के अपनी मिट्टी, जमीन, जल, नदी, पेड़-पौधों से गहरी संपृक्तता का परिणाम है।'
स्पष्ट जीवन दर्शन और रचना दृष्टि के बिना कोई बड़ा कवि नहीं हो सकता। केदारजी को समग्रता में पढ़ने पर पता चलता है कि उनकी अभिव्यक्ति में जहां जीवन से गहरे सरोकार की गूँज है, वहीं एक रचनात्मक दार्शनिक सौंदर्य की निरन्तरता भी है। वे गांव से शहर आ जाते हैं लेकिन गांव उनके भीतर बना रहता है। वह शहर में रहते हैं पर गांव में बसते हैं। जब भी समय मिलता है, गांव लौटते हैं। उनके समय में भी बाजार गांव को बदल रहा था। इस बदलाव में गांव की संस्कृति से, जीवन से बहुत सारी चीजें गायब हो रही थीं। केवल गांव आकर वे संतुष्ट नहीं होते। वे गांव में पैदा हो रही रिक्ति को बार-बार देखते हैं और गायब हो रही चीजों की ओर लौटते हैं। तुलसी का चौरा, वहां दीप जलाना, चिड़ियों का आंगन में उतरना, चहचहाना, पेड़ों पर या घरों में उनका घोंसला बनाना, कुआ-बावड़ी, यह कोई नास्टैल्जिया नहीं बल्कि एक समृद्ध, भरी-पूरी संस्कृति को सूखते हुए देखने की तरह है। केदारनाथ सिंह जानते थे कि स्थानीयता ही हमारी पूंजी है और यह स्थानीयता हमारी बोली में है, हमारी कृषि संस्कृति में, हमारे ग्राम्य जीवन के राग-रंग में, उल्लास में, उत्सव में है। ये सब ख़त्म हुआ तो हमारे पास कुछ बचेगा नहीं, हमारी अपनी धरती भी नहीं। बाजार लगातार लोकल को ग्लोबल से विस्थापित करने की कोशिश में जुटा है। वह गांव के खान-पान, रहन-सहन, बोली-भाषा, गीत-संगीत, इन सबको अपने आकर्षक किन्तु खोखले उपादानों से रिप्लेस कर देना चाहता है। यह पूंजी का षडयंत्र है और इसके खिलाफ हम तभी लड़ पायेंगे, जब अपनी समृद्ध स्थानीयता को सुरक्षित, संरक्षित रख सकेंगे। इसी अर्थ में केदार जी हमेशा उस तरफ लौटते हैं, जहां से चीजें गायब से रही है। इसे यथास्थिति बरकरार रखने के प्रयास के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आखिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि हम अपनी संस्कृति के साथ आधुनिकता को स्वीकार करें। आधुनिक होने का मतलब अपनी लंबी स्मृति से, अपनी उत्सवधर्मी संस्कृति से कट जाना नहीं है बल्कि परिष्कार के साथ उसका स्वीकार है। हम अंग्रेजी छोड़ें लेकिन अपनी बोली-भाषा से हीन होकर नहीं। हम नये स्वाद, नयी गंध को स्वीकार करें लेकिन अपने गांव के स्वाद, गंध की अस्वीकृति की कीमत पर नहीं। अगर हमने ऐसा नहीं किया तो हमारी स्मृति, संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन की बहुलता नष्ट हो जायेगी। यह एक ऐसा बुनियादी स्वर है जो केदार जी के व्यक्तित्व में है, उनके कृतित्व से भी। आशय यह है कि एक सतत विद्रोह उनके कविता संसार में मौजूद है। ‘विद्रोह’ कविता में उसका एक खास रूप ज्यादा मुखरता से व्यक्त हुआ है।
मनुष्य ने अपने पर्यावरण को जितना नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई लगभग नामुमकिन है। वह प्रकृति के साथ सहचर की भूमिका में रहता तो उसे कोई कठिनाई नहीं होती। धरती पर जितने भी जीव है, प्रकृति ने उन सबके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराया है। अगर वे सभी अपनी जरूरत भर का प्रकृति से लें तो धरती को, पर्यावरण को कोई क्षति नहीं होगी। प्रकृति अनंतकाल तक सबका पोषण करती रहेगी। लेकिन दुखद बात यह है कि मनुष्य ने, समृद्ध देशों ने अपने लिए संसाधनों का जखीरा जमा करने, अपने ऐश्वर्य के साधन जुटाने के लिए प्रकृति का जो अंधाधुंध दोहन किया है, उससे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचा है। केदार जी घर में, घर के बाहर इसे लगातार महसूस करते हैं। कविता में वे इसे अनोखे ढंग से कलात्मक नाटकीयता के साथ प्रस्तुत करते हैं। एक दिन जब वे अपने ही घर में घुसे तो एकदम अलग दृश्य था। उनको सवालों की बौछार का सामना करना पड़ा। मेज, कुर्सी, दरवाजे, पुस्तकें, नल का पानी, शाल, फोन सभी अपनी बात, अपनी पीड़ा कहना चाह रहे थ्रे। कहना तो वे बहुत दिनों से, वर्षोँ से, दशकों से चाह रहे थे लेकिन किन्हीं कारणों से कह नहीं पाते थे। पीड़ा, यातना सहने की भी एक सीमा होती है। एक दिन हद हो गयी। उनसे रहा नहीं गया और विद्रोह कर दिया सबने एक साथ। केदार जी मानवीकरण को इस कविता में एक खास उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हैं। घर में रखी सारी चीजें जीवित वस्तुओं की तरह व्यवहार करती है। वे केदारजी को घेर लेती है। शायद वे स्वयं ही स्वयं के प्रश्नों से घिरा हुआ महसूस करते हैं। प्रकृति को क्षतिग्रस्त करने का अपराध चाहे जिसने किया हो, जिन व्यक्तियों ने, जिन समूहों ने, जिन देशों ने, एक संवेदनशील मनुष्य के नाते कवि स्वयं को भी उस अपराध के लिए दोषी पाता है, स्वयं को उस अपराध में शामिल देखता है। उसने ऐसा अपराध क्यों किया, अब भी क्यों कर रहा है, उसके पास कोई जवाब भी नहीं है। वैसे तो यह एक छोटी सी कविता है लेकिन इसकी अर्थ संभावना इसे बहुत दूर तक ले जाती है। यह एक वैश्विक प्रतिरोध की कविता की शक्ल में खड़ी दिखती है। शब्दों के छोटे आयतन के भीतर विराट अर्थ दीप्ति के कारण यह एक बड़ी और समृद्ध कविता का रूप धारण कर लेती है। केदार जी की कविताओं पर बहुत बातें हुई है। उनकी छोटी-छोटी कविताएं अपने अकाट्य अर्थ वैभव के कारण बार-बार उद्धृत की जाती रही हैं लेकिन ‘विद्रोह’ को कभी इस नजीरिये से नहीं देखा गया। इसमें जिस तरह प्रकृति एवं पृथ्वी के साथ मनुष्य के छल को उजागर किया गया है, वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस कविता में पर्यावरण के खिलाफ क्रूरता से भिड़ंत के लिए एक बड़ा आंदोलन बनने की सामर्थ्य है।
केदार जी की कविताओं पर बात करते हुए प्रख्यात आलोचक अरूण होता ‘विद्रोह’ की भी चर्चा करते हैं और कहते हैं, 'इस कविता के विद्रोह के मूल में अपनी जड़ से मिलने की प्रबल आकांक्षा है। कवि ने अपनी संदेवना को व्यापक बनाते हुए यह चिन्हित किया है कि विद्रोह का एका केवल मनुष्य में ही नहीं होता है बल्कि विस्तर, कुर्सी, मेज, किताबें, शाल, टीवी, नल से टपकती पानी की बूंदों में भी होता है। मनुष्य के कारागार से सभी मुक्त होना चाहते हैं। सचमुच उम्दा कविता है यह।' ‘विद्रोह’ कविता इतनी सघन और मार्मिक अभिव्यक्ति से सम्पन्न है कि एक पाठ में इसका बहुत कम हिस्सा खुलता है। कई बार पढ़ने पर यह कविता खुद ही खुद को खोलती जाती है। कविता घर की वस्तुओं से कवि की सामान्य बातचीत से शुरू होती है। सवाल बढ़ते जाते हैं और गंभीर होते जाते हैं। कविता खत्म होने के पहले की एक महत्वपूर्ण पंक्ति पर नजर डालें, कितना तीखापन है उसमें।
अगर सुन सकें तो सुन
लीजिए
बूंदों की आवाज-
कि हम सब आपके सारे के सारे कैदी
आदमी की जेल से
मुक्त होना चाहते हैं
यहां ‘आप’ और ‘मनुष्य’, इन दो शब्दों में अर्थ विस्तार का एक अद्भुत संदर्भ है। पहले ‘आप’ केदार जी के लिए संबोधित है लेकिन दूसरी पंक्ति में ही केदार जी केवल आप नहीं रह जाते, वे पूरी मनुष्य जाति का प्रतिनिधि बन जाते हैं। आदमी ने सारी धरती को एक जेल में बदल दिया है। जंगल, पहाड़, नदी, प्रकृति की सारी संपदा का वह अपना आर्थिक वैभव बढ़ाने में क्रूरतापूर्वक इस्तेमाल कर रहा है। आधुनिकता और सभ्यता के नाम पर चल रहे विश्वव्यापी उद्योग निर्माण अभियान में प्रकृति के इन उपादानों का भयंकर दुरुपयोग हो रहा है। प्रकृति इतनी पीड़ा में है कि उसके तमाम हिस्से मनुष्य के चंगुल से छूटकर अपनी जड़ों की ओर लौट जाना चाहते हैं। पानी अपने स्रोत से अलग रहकर भी उससे अलग नहीं महसूस करता, मेज, कुर्सी खुद को पेड़ से अलग नहीं समझते, विस्तर खुद को कपास में देखता है, किताबें बांस के जंगल और विच्छुओं के डंक, सांपों के दंश से खुद को जोड़कर देखती हैं। शाल को याद आ रहा है वो दुम्बा भेड़ा, जिसके शरीर से ऊन उतारा गया है। कितने खूबसूरत तरीके से केदार जी इन सबको जीवित देखते हैं और महसूस करते हैं कि वे सब अपने मूल से अलग होकर दुखी हैं और वापस लौट जाना चाहते हैं। कवि उन्हें मनुष्य के कैदी के रूप में देखना है। कैदी को उसकी इच्छा के विरुद्ध जेल में रखा जाता है। घर में सजाकर रखी गई किसी भी वास्तु की इच्छा नहीं है इस तरह कैद में बने रहने की। हर कैदी की तरह वे भी मुक्त हो जाना चाहती हैं। कोई रास्ता नहीं दिखने पर वे ‘विद्रोह’ पर आमादा हो जाती हैं। पहले केदार जी अपने लिए उनके संबोधन को ‘आपके कैदी’ के रूप में इस्तेमाल करते हैं लेकिन अगली ही पंक्ति में अपने निजत्व को विसर्जित करते हुए कविता को एक बड़े फलक पर ले जाने के लिए ‘मनुष्य की कैद’ कहकर अपनी पीड़ा को सफलतापूर्वक एक वैश्विक धरातल पर ला खड़ा करते हैं। कवि संवाद की स्थिति में नहीं है, सुनने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि वह इस पीड़ा को उसके घनीभूत रूप में भीतर तक महसूस करता है। इन पंक्तियों में देखिये-
जी,हां अब बहुत हो चुका
आप को सहते-सहते
हमें बेतरह याद आ रहे हैं
हमारे पेड़ और उनके भीतर का
वह जिंदा द्रव
जिसकी हत्या कर दी है आपने
.... ....... ...... ...... .....
आप तो बड़े साहब निकले
मेरा दुम्बा भेड़ा मुझे कब से पुकार रहा है
और आप हैं कि अपने देह की कैद में
लपेटे हुए हैं मुझे
हम सभी जानते है किस तरह जंगलों को उजाड़ा गया है, किस तरह हरे पेड़ काटे गये हैं, किस तरह जिंदा उनकी हत्या की गयी है। निर्जीव समझी जाने वाली वस्तुओं के माध्यम से गहरे तक संवेदित करने वाली बातें कहलवाकर केदार जी किसी को भी बेचैन कर देते हैं। 'यह रहा मेरा इस्तीफा', ‘दोनों तड़प कर बोले’, ‘किताबें चिल्ला रही थी', 'खोल दो हमें खोल दो,' ‘दुम्बा भेड़ा कब से पुकार रहा है’, ‘नल से टपकता पानी तड़पा,’ 'दरवाजा कड़का' पूरी कविता में क्रियाओं का पीड़ा और गुस्से से भरा हुआ जो सख्त मिजाज दिखता है, वह यह बताने के लिए काफी है कि धरती और प्रकृति के निरन्तर विनाश से कवि कितना दुखी है, कितना क्रुद्ध है। यह कविता जितना कहती है, उसका कई गुना अनकहा छोड़ देती है। कवि घटनाओं और व्यौरों में न जाकर, तथ्यों के ढेर पर लोटने की जगह एक विराट हाहाकार को इस तरह के शब्द सूत्रों में जड़कर पेश करता है कि पढ़कर कोई भी दहल जाये। मुक्तिबोध ने कहा है, कविता केवल ज्ञान से नहीं होती, केवल संवेदना से भी नहीं। ज्ञान की आभा से कोई भी चमत्कृत कर सकता है। इसी तरह केवल संवेदना निष्क्रिय रुदन का कारण बन सकती है। कविता के लिए ज्ञान के साथ संवेदना और संवेदना के साथ ज्ञान की जरूरत होती है। ‘विद्रोह’ की बात करुं तो यह कविता ज्ञान और संवेदना दोनों से लैस है, इसीलिए केवल झकझोरती नहीं, बल्कि कार्रवाई के लिए उकसाती भी है।
केदार जी की कवितई में कला का बड़ा योगदान है। वे जानते थे कि बिना कला के कोई भी कविता संभव नहीं है क्योंकि यह केवल बयान नहीं है, वह लेख या कहानी भी नहीं है। वे कला को कविता पर छा जाने की भी इजाजत नहीं देते थे, उसे अभिव्यक्ति के एक कौशल की तरह ही इस्तेमाल करते थे। ‘विद्रोह’ में भी केदार जी की कलात्मक प्रतिभा का सौंदर्य देखा जा सकता है। कवि अपने घर की चीजों के साथ मृत चीजों जैसा व्यवहार नहीं करता। वह उन्हें जीवंत, बतियाती हुई प्राणवान देखता है। तभी तो वह विस्तर, कुर्सी, मेज, किताब, फोन, टीवी के दुख को, उनकी यातना को और इस तरह समूची प्रकृति की तड़प को सुन पाता है, समझ पाता है। उनके क्रोध, उनकी मुक्ति स्वप्न को महसूस कर पाता है। यह कोई शिकायत नहीं, यह ‘विद्रोह’ है। केदार जी के साथ रहते रहते वे सब आजिज आ गये हैं। केदार जी यानी मनुष्य उनका इस्तेमाल तो करता है लेकिन उनकी पीड़ा नहीं समझता। कभी उनसे पूछता नहीं कि वे कैसे हैं, किसी पीड़ा में तो नहीं है। सब कुछ अनसुना कर दिये जाने पर वे एक साथ धावा बोलते हैं, सवालों की बौछार कर देते हैं। वे महसूस करते हैं कि उन्हें मार दिया गया है। जब बिस्तर कपास में था, मेज-कुर्सी पेड़ में थे, किताबें बांस वन में थीं, शाल दुम्बा की त्वचा पर थी, टीवी और फोन अपने प्राकृतिक स्रोत में थे, बूंदें धरती में, बादल में, नदी में थीं, वे सभी मुक्त थीं, प्रकृति के जीवन द्रव्य से सीधे जुड़ी हुई लेकिन मनुष्य ने उन्हें उनकी सहजता और नैसर्गिकता से काटकर न केवल अपनी कैद में डाल दिया है बल्कि इस तरह प्रकृति को भी क्षत-विक्षत किया है। केदार जी स्वयं ही उनकी तरफ से सवाल करते हैं और उन्हीं सवालों से स्वयं घिर जाते हैं। घबड़ा जाते हैं, सोचते हैं, निकल जाने को। अभी तो निकल लो यार, स्थिति गंभीर है, थोड़ी देर बाद आना। तब तक शायद इनका गुस्सा शांत पड़ जाए। यह नाटकीयता उन्होंने स्वयं रची है। कविता को प्राणवान और प्रभावशाली बनाने के लिए वे पीछे लौटते हैं और निकल जाना चाहते हैं लेकिन दरवाजा उन्हें टोकता है...
अब कहां जा रहे हैं -
मेरा दरवाजा कड़का
जब मैं बाहर निकल रहा था।
यह दरवाजे का टोकना इस कविता की नाटकीयता का शिखर है। ऐसा लगता है कि जिन्हें मनुष्य ने कैद किया हुआ है, वे मिलकर मनुष्य को ही कैद कर लेंगे। खतरा है, दरवाजा कहीं खुद को बंद न कर ले। दरवाजे का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। यह समूचे मनुष्य जगत से प्रकृति का, धरती का प्रश्न है। बताओ, तुमने अपने छोटे स्वार्थ के लिए मुझे इतना नुकसान क्यों पहुंचाया? इस सवाल का जवाब तो देना ही पडेगा। इससे बचना मुश्किल है। कोई रास्ता नहीं भाग निकलने का। जवाब नहीं दिया तो दरवाजा तय करेगा कि उसे खुलना है या बंद हो जाना है। प्रकृति का दोहन जिस खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है, अगर मनुष्य ने इस पूरी प्रक्रिया को पलटने की नहीं सोचा तो धरती पर जीवन के विकास के सारे दरवाजे बंद हो जायेंगे। क्या दुनिया सुन रही है यह आवाज, यह सवाल या बचकर निकल जाना चाहती है? अब बचकर निकलने का कोई रास्ता बचा नहीं है। धरती को, प्रकृति को, जीवन की विविधता को,