Monday, 30 March 2026

“माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज (योनि पूजा और शिवलिंग पूजा)” || योनि से लिंग तक: काम, शक्ति, समता और चेतना का समन्वित भारतीय दर्शन || लेखक: गोलेन्द्र पटेल

योनि से लिंग तक: काम, शक्ति, समता और चेतना का समन्वित भारतीय दर्शन


भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में सृष्टि के रहस्य को समझने के लिए जिन प्रतीकों और साधनाओं का विकास हुआ, उनमें शक्ति और शिव का समन्वय सबसे गहन और व्यापक है। यह समन्वय केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व, प्रकृति और ब्रह्मांड की मूल संरचना को समझने का एक दार्शनिक प्रयास है। “माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज (योनि पूजा और शिवलिंग पूजा)” इसी समन्वित दृष्टि के दो अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम हैं, जिनमें सृजन और चेतना का अद्वैत संबंध व्यक्त होता है।

पूर्वोत्तर भारत के एक प्राचीन पर्वतीय क्षेत्र में प्रतिष्ठित कामाख्या परंपरा भारतीय शक्ति साधना का अद्वितीय केंद्र मानी जाती है। यहाँ देवी को किसी मूर्त रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति के मूल स्रोत “योनि” के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है। यह प्रतीक केवल जैविक संरचना का संकेत नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि की उत्पत्ति का दार्शनिक बिंब है। यहाँ यह भाव स्थापित होता है कि जीवन की हर शुरुआत स्त्री ऊर्जा से होती है, और वही ऊर्जा संपूर्ण जगत को धारण करती है। इस दृष्टि में स्त्री केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय सृजन का मूलाधार बन जाती है।

कामाख्या परंपरा का एक विशेष पक्ष यह है कि वह प्रकृति के चक्रों को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करती है। स्त्री के रजस्वला होने की प्रक्रिया, जिसे सामान्यतः सामाजिक वर्जनाओं से जोड़ा गया, यहाँ सृजन शक्ति के उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित होती है। यह दृष्टिकोण भारतीय तांत्रिक परंपरा की उस वैज्ञानिक संवेदनशीलता को उजागर करता है, जिसमें शरीर, प्रकृति और चेतना के बीच किसी प्रकार का विरोध नहीं माना गया, बल्कि उन्हें एक ही ऊर्जा के विभिन्न रूपों के रूप में समझा गया।

योनि पूजा का तांत्रिक अर्थ बाह्य अनुष्ठानों से कहीं अधिक आंतरिक साधना से जुड़ा है। साधक के लिए यह केवल प्रतीक की पूजा नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित सृजनात्मक शक्ति का जागरण है। यह जागरण कुंडलिनी के रूप में वर्णित किया गया है, जो मनुष्य के भीतर सुप्त अवस्था में विद्यमान रहती है। जब यह ऊर्जा जागृत होती है, तो साधक चेतना के उच्चतर स्तरों का अनुभव करता है। इस प्रकार योनि पूजा केवल भक्ति नहीं, बल्कि आत्मानुभूति की एक प्रक्रिया बन जाती है।

दूसरी ओर, शिव के लिंग रूप की उपासना भारतीय दर्शन में निराकार ब्रह्म की अवधारणा को मूर्त संकेत प्रदान करती है। शिवलिंग कोई साधारण प्रतीक नहीं, बल्कि उस अनंत सत्ता का द्योतक है, जो सृष्टि के आरंभ, मध्य और अंत तीनों को समाहित करती है। यहाँ “लिंग” का अर्थ चिह्न या संकेत है, जो यह दर्शाता है कि परम सत्य को पूरी तरह रूप में बाँधा नहीं जा सकता, केवल उसकी अनुभूति की जा सकती है।

लिंगेश्वर महाराज की अवधारणा इसी शिवतत्व की महिमा को व्यापक रूप में प्रस्तुत करती है। विभिन्न स्थानों पर स्वयंभू शिवलिंगों के रूप में जो आस्था विकसित हुई, वह इस विश्वास को मजबूत करती है कि शिव कोई दूरस्थ देवता नहीं, बल्कि प्रकृति और अस्तित्व के भीतर ही उपस्थित चेतना हैं। लिंगेश्वर का अर्थ ही है—लिंगों के स्वामी, अर्थात वह मूल सत्ता जिससे समस्त रूपों की उत्पत्ति होती है। यह रूप मनुष्य को यह समझने की प्रेरणा देता है कि जीवन का अंतिम सत्य स्थूल नहीं, बल्कि सूक्ष्म और अनंत है।

शिवलिंग पूजा की विधि में अभिषेक का विशेष महत्व है, जिसमें जल, दूध या अन्य पदार्थों के माध्यम से लिंग को स्नान कराया जाता है। यह प्रक्रिया केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक क्रिया है, जो मनुष्य के भीतर के विकारों को शुद्ध करने का संकेत देती है। बेलपत्र, धतूरा, चंदन आदि का अर्पण भी प्रकृति के साथ एकात्मता का भाव प्रकट करता है। यहाँ पूजा का उद्देश्य बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और संतुलन की प्राप्ति है।

जब कामाख्या की योनि पूजा और लिंगेश्वर की शिवलिंग पूजा को एक साथ देखा जाता है, तो एक गहरा दार्शनिक सत्य उद्घाटित होता है। यह सत्य है शक्ति और शिव का अभिन्न संबंध। शक्ति ऊर्जा है, गति है, सृजन है; जबकि शिव चेतना हैं, शून्यता हैं, आधार हैं। बिना शक्ति के शिव निष्क्रिय हैं और बिना शिव के शक्ति अनियंत्रित। दोनों का मिलन ही सृष्टि का कारण है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में लिंग और योनि को साथ-साथ पूजने की परंपरा विकसित हुई, जो जीवन के संतुलन का प्रतीक है।

यह समन्वय केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी अपनी छाप छोड़ता है। यह दृष्टि स्त्री और पुरुष के बीच समानता और परस्पर निर्भरता का संदेश देती है। यहाँ कोई भी तत्व श्रेष्ठ या हीन नहीं, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इस प्रकार यह दर्शन मानव समाज को संतुलित, समावेशी और सामंजस्यपूर्ण बनाने की दिशा में प्रेरित करता है।

तांत्रिक और शैव परंपराओं का यह संयुक्त स्वरूप मनुष्य को बाहरी आडंबरों से मुक्त होकर भीतर की यात्रा करने का मार्ग दिखाता है। यह सिखाता है कि वास्तविक साधना मंदिरों या तीर्थों तक सीमित नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित ऊर्जा और चेतना को पहचानने में है। जब मनुष्य इस आंतरिक सत्य को समझ लेता है, तो उसके लिए समस्त जगत एक ही ऊर्जा और चेतना का विस्तार बन जाता है।

अतः “माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज” की उपासना हमें यह बोध कराती है कि सृष्टि का मूल तत्व द्वैत नहीं, बल्कि अद्वैत है। ‘सृजन और संहार’, ‘स्त्री और पुरुष’, ‘ऊर्जा और चेतना’ ये सभी एक ही सत्य के विभिन्न रूप हैं। इस सत्य को स्वीकार करना ही आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ है। यही वह बिंदु है, जहाँ आस्था, दर्शन और जीवन एक-दूसरे में विलीन होकर एक समग्र अनुभूति का निर्माण करते हैं।

“कामसूत्र” और “कामशास्त्र” की दृष्टि से यदि “माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज (योनि पूजा और शिवलिंग पूजा)” को देखा जाए, तो यह विषय केवल आध्यात्मिक या धार्मिक न रहकर एक गहरे मानवीय, सांस्कृतिक और दार्शनिक विमर्श का रूप ले लेता है। यहाँ ‘काम’ को केवल इंद्रिय-सुख या शारीरिक क्रिया के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की एक मूल प्रवृत्ति, सृजन की ऊर्जा और अस्तित्व की निरंतरता के आधार के रूप में समझा जाता है।

भारतीय चिंतन में ‘काम’ चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। इसका अर्थ है कि काम या इच्छा जीवन के संतुलित विकास के लिए आवश्यक है। “कामसूत्र” इस ‘काम’ को संयमित, सौंदर्यबोधपूर्ण और सांस्कृतिक ढंग से जीने की कला के रूप में प्रस्तुत करता है। वहीं “कामशास्त्र” इसे व्यापक अर्थों में मनुष्य की रचनात्मक, भावनात्मक और जैविक ऊर्जा के रूप में देखता है। इस दृष्टि से कामाख्या और शिवलिंग की पूजा, काम के दार्शनिक और प्रतीकात्मक रूपों की अभिव्यक्ति बन जाती है।

कामाख्या परंपरा में योनि का पूजन सृजन के मूल स्रोत की स्वीकृति है। कामशास्त्रीय दृष्टि से योनि केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि जीवन के उद्भव का केंद्र है। यह ‘प्रकृति’ का प्रतीक है, वह शक्ति जो धारण करती है, जन्म देती है और पोषण करती है। यहाँ ‘काम’ का अर्थ वासना नहीं, बल्कि वह रचनात्मक शक्ति है, जिससे जीवन उत्पन्न होता है। इसीलिए कामाख्या परंपरा में स्त्री शरीर और उसकी जैविक प्रक्रियाओं को पवित्रता के साथ देखा जाता है। यह दृष्टि कामसूत्र की उस संवेदनशीलता से जुड़ती है, जिसमें स्त्री को केवल भोग की वस्तु नहीं, बल्कि सह-अनुभूति और समान भागीदारी का केंद्र माना गया है।

दूसरी ओर, शिवलिंग का स्वरूप ‘पुरुष तत्व’ का प्रतीक है, जिसे कामशास्त्र में चेतना, स्थिरता और दिशा के रूप में समझा जाता है। लिंग यहाँ केवल जैविक संकेत नहीं, बल्कि उस ऊर्जा का प्रतीक है जो सृजन की प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करती है। जब लिंग और योनि का मिलन होता है, तो वह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक दार्शनिक संकेत बन जाता है, चेतना और ऊर्जा के संयोग का, जिससे समस्त सृष्टि का विस्तार होता है।

कामसूत्र इस संयोग को कला, संतुलन और परस्पर सम्मान के साथ देखने की शिक्षा देता है। इसमें ‘काम’ को अराजक या अनियंत्रित नहीं, बल्कि एक सुसंस्कृत अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार, तांत्रिक परंपरा में योनि और लिंग की संयुक्त पूजा भी इस मिलन को पवित्र और ब्रह्मांडीय घटना के रूप में स्वीकार करती है। यहाँ यह समझ विकसित होती है कि सृजन केवल शरीर का कार्य नहीं, बल्कि चेतना और ऊर्जा के गहरे संतुलन का परिणाम है।

कामशास्त्र की दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है कि ‘काम’ को दबाने या नकारने के बजाय उसे समझा और रूपांतरित किया जाए। कामाख्या और शिवलिंग की पूजा इसी रूपांतरण की प्रक्रिया को दर्शाती है, जहाँ जैविक ऊर्जा आध्यात्मिक ऊर्जा में परिवर्तित होती है। तंत्र साधना में इसे कुंडलिनी जागरण के रूप में देखा जाता है, जहाँ मूलाधार की शक्ति ऊपर उठकर चेतना के उच्च स्तरों तक पहुँचती है।

इस समग्र दृष्टि में ‘काम’ पाप या वर्जना नहीं, बल्कि जीवन का एक स्वाभाविक और आवश्यक आयाम है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इसे केवल भौतिक या उपभोग की वस्तु बना दिया जाता है। कामसूत्र और कामशास्त्र दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि काम का सही अर्थ समझे बिना जीवन अधूरा रह जाता है। इसलिए वे काम को नैतिकता, सौंदर्य और संतुलन के साथ जोड़ते हैं।

कामाख्या और लिंगेश्वर की परंपराएँ इस बात को और गहराई से स्पष्ट करती हैं कि सृष्टि का मूल सिद्धांत द्वैत में नहीं, बल्कि समन्वय में है। ‘स्त्री और पुरुष’, ‘योनि और लिंग’, ‘शक्ति और शिव’ ये सभी विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इनका संतुलित मिलन ही जीवन को पूर्णता देता है। यह दृष्टि न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि सामाजिक और मानवीय स्तर पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समानता, सम्मान और सह-अस्तित्व का संदेश देती है।

अतः कामसूत्र और कामशास्त्र की दृष्टि से “माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज” का अर्थ यह है कि ‘काम’ को उसके व्यापक, रचनात्मक और आध्यात्मिक संदर्भ में समझा जाए। यह केवल इंद्रिय-सुख नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल ऊर्जा है। जिसे समझकर, संतुलित करके और रूपांतरित करके मनुष्य अपने जीवन को अधिक समृद्ध, संतुलित और जागरूक बना सकता है।

मानवीय दृष्टि से “माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज (योनि पूजा और शिवलिंग पूजा)” का अध्ययन हमें भारतीय परंपरा के भीतर मौजूद गहरे अंतर्विरोधों, संभावनाओं और पुनर्व्याख्याओं की दिशा में ले जाता है। यह विषय केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि सत्ता, शरीर, लैंगिकता और सामाजिक संरचना के विमर्श से भी जुड़ा हुआ है।

हमारी दृष्टि सबसे पहले इस तथ्य को रेखांकित करती है कि कामाख्या परंपरा में स्त्री-देह, विशेषतः योनि, को सृजन के पवित्र स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है। यह स्वीकृति अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं में स्त्री शरीर को या तो नियंत्रण का विषय बनाया गया या उसे शर्म और वर्जना से जोड़ा गया। यहाँ इसके विपरीत, स्त्री के ‘जैविक पक्ष’ विशेषकर ‘मासिक धर्म’ को भी पवित्र और उत्सवधर्मी रूप में देखा जाता है। यह दृष्टि स्त्री विमर्श के उस आग्रह से मेल खाती है, जो स्त्री-देह की गरिमा, उसकी स्वायत्तता और उसकी जैविक प्रक्रियाओं के सम्मान की मांग करता है।

किन्तु हमारी आलोचनात्मक दृष्टि यहीं रुकती नहीं। वह यह भी प्रश्न उठाती है कि क्या स्त्री को केवल ‘सृजन-शक्ति’ के रूप में महिमामंडित कर देना, उसे एक प्रतीक में सीमित कर देना नहीं है? क्या वास्तविक समाज में स्त्रियों को वही सम्मान, अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त है, जो देवी के रूप में उन्हें दी जाती है? इस मानवीय दृष्टि से कामाख्या की योनि पूजा एक ओर स्त्री शक्ति का उत्सव है, तो दूसरी ओर यह चुनौती भी देती है कि इस प्रतीकात्मक सम्मान को सामाजिक यथार्थ में कैसे रूपांतरित किया जाए।

इसी प्रकार, शिवलिंग पूजा को मानवीय दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह पुरुष-तत्व या चेतना का प्रतीक है, जो शक्ति के बिना अधूरा है। यहाँ एक संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत होता है ‘स्त्री और पुरुष’, दोनों की समान आवश्यकता। परंतु ऐतिहासिक रूप से समाज में यह संतुलन अक्सर पुरुष-प्रधानता की ओर झुका रहा है। मानवतावादी विचारक इस असंतुलन की आलोचना करते हुए यह कहते हैं कि यदि दर्शन में शिव और शक्ति का समन्वय स्वीकार किया गया है, तो समाज में भी लैंगिक समानता उसी अनुपात में क्यों नहीं दिखती?

गोलेन्द्रवादी दृष्टि इस विमर्श में एक और महत्वपूर्ण आयाम जोड़ती है सामाजिक न्याय और समानता का। गोलेन्द्रवाद ने धर्म और परंपरा की आलोचना करते हुए यह स्पष्ट किया है कि कोई भी धार्मिक व्यवस्था तब तक मान्य नहीं हो सकती, जब तक वह मनुष्य की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता की रक्षा न करे। इस संदर्भ में हम यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या ये धार्मिक प्रतीक और अनुष्ठान समाज के सभी वर्गों विशेषकर दलितों, स्त्रियों और वंचित समुदायों के लिए समान रूप से खुले और सुलभ रहे हैं?

गोलेन्द्रवादी दृष्टि से देखा जाए तो शक्ति और शिव के ये प्रतीकात्मक रूप भले ही समता और संतुलन का संदेश देते हों, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इनसे जुड़े धार्मिक संस्थानों और अनुष्ठानों में अक्सर जातिगत भेदभाव और वर्चस्व की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती रही हैं। इसलिए हमारी दृष्टि केवल प्रतीकों की प्रशंसा नहीं करती, बल्कि उनके सामाजिक उपयोग और प्रभाव की आलोचनात्मक जांच भी करती है।

एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि हमारी विचारधारा मनुष्य को केंद्र में रखती है, न कि किसी देवी-देवता या मिथक को। इस दृष्टि से योनि और लिंग के प्रतीक को मानव-शरीर और प्रकृति के वैज्ञानिक, जैविक और सामाजिक संदर्भों में समझना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यहाँ यह आग्रह किया जाता है कि इन प्रतीकों को अंधविश्वास या चमत्कारवाद से मुक्त कर, एक तर्कसंगत और मानवतावादी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए।

हमारी अंतर्दृष्टि यह भी संकेत देती है कि ‘पूजा’ का अर्थ केवल अनुष्ठानिक क्रिया नहीं होना चाहिए, बल्कि सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन होना चाहिए। यदि योनि को सृजन का स्रोत मानकर पूजा जाता है, तो स्त्रियों के शरीर, उनकी स्वतंत्रता और उनके अधिकारों का भी उतना ही सम्मान होना चाहिए। यदि शिवलिंग को चेतना और संतुलन का प्रतीक माना जाता है, तो समाज में भी न्याय, समानता और बौद्धिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

इस प्रकार, हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक सोच से कामाख्या और लिंगेश्वर की परंपराएँ एक दोहरी भूमिका निभाती हैं, एक ओर वे संभावनाओं के द्वार खोलती हैं, जहाँ स्त्री-पुरुष समानता, सृजन और संतुलन का आदर्श मौजूद है; वहीं दूसरी ओर वे समाज की वास्तविक असमानताओं और विसंगतियों को उजागर भी करती हैं। यह द्वंद्व ही आलोचनात्मक चिंतन को जन्म देता है और परंपरा को नए अर्थों में समझने की प्रेरणा देता है।

अतः गोलेन्द्रवादी दृष्टि यह कहती है कि किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक की वास्तविक प्रासंगिकता तभी है, जब वह मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता को सुदृढ़ करे। “माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज” के संदर्भ में यह चुनौती स्पष्ट है, क्या हम इन प्रतीकों को केवल आस्था के रूप में देखेंगे, या उन्हें सामाजिक परिवर्तन और न्याय की दिशा में एक सक्रिय प्रेरणा में रूपांतरित कर पाएँगे? यही प्रश्न इस पूरे विमर्श का सबसे सार्थक निष्कर्ष बनकर उभरता है।

गोलेन्द्रवादी दृष्टि से “माता कामाख्या देवी और लिंगेश्वर महाराज (योनि पूजा और शिवलिंग पूजा)” को किसी संकीर्ण धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि मानव जीवन, प्रकृति और चेतना के समन्वित दर्शन के रूप में देखा जाता है। यहाँ ‘योनि’ और ‘लिंग’ केवल प्रतीक हैं—सृजन और चेतना के, ऊर्जा और संतुलन के, जीवन और उसके निरंतर विस्तार के।

गोलेन्द्रवाद का मूल आग्रह मानवता, समानता, स्वतंत्रता और वैज्ञानिक चेतना पर है। इस दृष्टि से कामाख्या की योनि पूजा स्त्री-देह की गरिमा, सृजन-शक्ति और प्रकृति के चक्रों के सम्मान का संकेत देती है। यह नारी को पवित्र मानने भर की बात नहीं, बल्कि उसके वास्तविक सामाजिक सम्मान, स्वतंत्रता और बराबरी की माँग भी करती है। वहीं लिंगेश्वर की शिवलिंग पूजा चेतना, विवेक और संतुलन का प्रतीक बनकर सामने आती है, जो मनुष्य को आत्मानुशासन, करुणा और व्यापक दृष्टि की ओर ले जाती है।

गोलेन्द्रवादी परिप्रेक्ष्य इन दोनों को मिलाकर एक समग्र मानवीय संदेश देता है कि जीवन ऊर्जा (शक्ति) और चेतना (शिव) के संतुलन से ही संभव है। लेकिन यह संतुलन केवल प्रतीकों में नहीं, बल्कि समाज में भी दिखना चाहिए। जहाँ स्त्री-पुरुष, ऊँच-नीच, जाति-धर्म के भेद मिटें और मनुष्य केंद्र में आए।

इस प्रकार, गोलेन्द्रवाद इन परंपराओं को आस्था से आगे बढ़ाकर मानवतावादी, तर्कसंगत और समतामूलक जीवन-दर्शन में रूपांतरित करता है, जहाँ पूजा का अर्थ है—मानव गरिमा, समानता और जागरूक चेतना का विकास।
★★★

रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com










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