Thursday, 22 July 2021

बिना पढ़ें किसी स्त्री साहित्यकार का कैसे करें मूल्यांकन : केंद्र में रश्मि भारद्वाज : गोलेन्द्र पटेल

 

बिना पढ़ें किसी स्त्री साहित्यकार का कैसे करें मूल्यांकन : केंद्र में रश्मि भारद्वाज

                       -गोलेन्द्र पटेल


आओ सीखें कि कैसे एक स्त्री साहित्यकार को बिना पढ़ें स्त्री विमर्श, स्त्री-अस्मिता, 'मैं' की चिंता, अस्मिता का बोध-शोध, सिसकियों के स्वर में मानवीय संवेदना की खोज, चेतना की चिंता और चिंतन, अभिव्यक्ति की आजादी का प्रश्न इत्यादि बिंदुओं को केंद्र में रखकर मूल्यांकन करते हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि समाज में समय के साथ परिवर्तन होता रहता है। पर प्राचीन काल से अब तक स्त्रियों की दशा में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। जैसा शोषण सूत्र उस वक्त था कुछ वैसा ही अब भी समाज में मौजूद है।


              वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल से लेकर आज तक के साहित्य में स्त्री को एक विशिष्ट स्थान दे दिया गया है ; जैसे -मनुस्मृति में कहा गया है कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।/यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।" (मनुस्मृति ३/५६ ) कह कर उन्हें आसमान के आसान पर बैठाया गया तो भक्तिकाल में तुलसीदास जैसे जनधर्मी चिंतक यह कहकर सम्मानित किये हैं कि "ढोल , गवार, पशु , शूद्र , नारी ये सब है ताडन के अधिकारी " इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए द्विवेदी युग में मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं कि "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी!, आँचल में है दूध और आँखों में पानी!!"('यशोधरा' से) आगामी स्वर्ण युग में जयशंकर प्रसाद अपने कामायनी महाकाव्य में दर्ज करते हैं कि "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो" ('लज्जा' सर्ग से) 


                            ये तो रहा नारी को शील और सौंदर्य की कसौटी पर उन्हें साहित्यिक समाज में गढ़ने का प्रमुख काम । खैर जब से मैं साहित्य को समझना शुरू किया हूँ तब से यही वाक्य सुन रहा हूँ कि 'साहित्य समाज का दर्पण है और सिनेमा आईना।' कोई साहित्यकार इसमें अपना शक्ल देखता है तो कोई अपने अक्ल की आखों से उसके पीछे का यथार्थ।


         सजग सर्जक इस सामाजिक दर्पण के पीछे के यथार्थ में समय की सच्चाई का सजीव तस्वीर अपने सोच के अनुसार गढ़ता है और उसे अपनी बुद्धि के रंगों से रंगता है। उसमें हम जीवन के वास्तविक छवि का दर्शन करते हुए यह कहते हैं कि साहित्य एक नदी  है। जिसका जल जमीन के अनुसार कलकल निनाद करता हुआ बहता चला जा रहा है समय के सागर की ओर। जिसके तट पर एक सहृदय समाज सुन रहा है कि "सिसकन के स्वर में उपजी मानवीय संवेदना सम्भावना की सैक्सोफोन और 'स्व' की सरसराहट बुद्धि की बैंजो विमर्श के नाव में एक नारी के लिए बजा रही है।"


                 जिसे समकालीन साहित्य में मृदुला गर्ग,प्रभा खेतान, उषा प्रियंवदा, मन्नु भंडारी, ममता कालिया,सूर्यबाला,रजनी पन्नीकर, चित्रा मुद्गल,शिवानी,राजी सेठ, गीताश्री, कृष्णा अग्निहोत्री, कृष्णा सोबती,मणिका मोहनी,शशिप्रभा शास्त्री,मृणाल पाण्डेय,नासिरा शर्मा,मैत्रयी पुष्पा,मंजूल भगत,मेहरुन्निसा परवेज़,दीप्ति खंडेलवाल,कुसुम अंचल, अनामिका, सुधा सिंह, सुधा उपाध्याय, चंद्रकला त्रिपाठी, शशिकला त्रिपाठी, रचना शर्मा, अनुराधा 'ओस', रश्मि भारद्वाज, जसिंता कैरकेट्टा एवं प्रतिभा श्री इत्यादि महिला साहित्यकारों ने शब्दबद्ध किया है जिसे हम उनकी रचनाओं में सुन सकते हैं।


इन लेखिकाओं ने बड़े वैचारिक ढ़ंग से स्त्री विमर्श, स्त्री अस्मिता और 'स्व' की पहचान को उद्घाटित किया है। साथ ही साथ नारी सशक्तिकरण के सार्थक समीकरण को भी गढ़ा है और समय के साथ गढ़ रही हैं। उल्लेखित प्रतिष्ठित साहित्यकारों का विमर्श आधुनिकता बोध की उपज है जहाँ गहन चिन्तन-मनन, सोच-विचार, विचार-विनिमय, वाद-विवाद-संवाद से साहित्य के वे सुमन खिले हैं जो कभी न मुर्झानेवाले हैं, सदैव सुगंध देनावाले हैं।


         भाषा वैज्ञानिक भोलानाथ तिवारी का मानना है कि विमर्श का अर्थ है "तबादला-ए-ख्याल, पारामर्श, मशविरा, राय-बात, विचार विमर्श सोच। अतः इसी विमर्श को केंद्र में रखते हुए रश्मि भारद्वाज का मूल्यांकन :-


                रश्मि भारद्वाज का जन्म 11 अगस्त 1983ई. को मुजफ़्फ़रपुर, बिहार में हुआ है । इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं क्रमशः "एक अतिरिक्त अ", "मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है" (कविता संग्रह)। जिन आधुनिक कवयित्रियों (लेखिकाओं) ने बदलते संदर्भ में स्त्री की बदलती मानसिकता, स्त्री-अस्मिता के प्रश्न और स्त्री की समस्याओं को केंद्र रखकर अपनी रचना संसार समृद्धि करते हुए स्त्री संवेदना को  सशक्त स्वर रूप में प्रस्तुत किया है और कर रही हैं उनमें से एक नाम रश्मि भारद्वाज का है । इनकी कविता में इनकी संवेदनशीलता ही इनकी सबसे बड़ी पहचान है।

     "आसान है कुछ उजले दिनों में दोहराना/वही उकताए हुए शब्द/जिनमें आँच देह की तीली से सुलगती हो/जल कर तुरन्त बुझ जाने के लिए/..../हमारे एकान्त का संगीत बन जाए/तुम राग कहना/तुम साज कहना/हम सब गुनेंगे, सब कहेंगे/बस, प्रेम के सिवा/प्रेम हमें गढ़ लेगा" (कविता 'बस, प्रेम के सिवा' से)


रश्मि अपनी कविताओं में स्त्री की बात, स्त्री मुक्ति की प्रतिरोधी स्वर बेबाक ढंग से सहजता के संस्कार में प्रस्तुत करती हुई कहती हैं कि "आग की लौ हर बार कुछ नया रचती है/संहार में भी सृजन के कण दीप्त किए/अपने फ़ैसलों का भार मुझ पर ज़्यादा है/अब एक बार इन्हें तुम सबके हवाले कर/मैं मुक्त होना चाहती हूँ।"(कविता: 'भारहीन' से)


रश्मि अपनी "चरित्रहीन" शीर्षक नामक कविता में स्त्री के बेहयापन को विमर्श के बंजर भूमि में उगाकर मानवीयता एवं मनुष्यता का फल देनेवाला पेड़ के रूप में स्त्री के वास्तविक पीड़ा को प्रस्तुत करते हुए उस ओर संकेत किया है जिस ओर यशपाल की चर्चित पात्र दिव्या सामाजिक विडंबनाओं ,विसंगतियों,कुरितियों, रूढ़ियों,परंपराओं से तंग आ कर सभी को चुनौती देती हुई "स्व" के पहचान के लिए वेश्यावृत्ति को धारण करती है और कहती है कि "वेश्य स्वतंत्र नारी है।" या हम यह कहें कि कृष्णा सोबती के मित्रो की तरह अल्हड़पन और आवारेपन में औरत के अस्मिता की आवाज है रश्मि की यह कविता :-

              "बड़ी बेहया होती है वे औरतें-जो लिखी गई भूमिकाओं में/बड़े शातिराना तरीके से कर देती है तब्दीली/..../बड़ी चालाक होती है ये बेहया औरतें/..../सुनते हैं, ज़िन्दगी को लूटने की कला जानती हैं यह आवारा औरतें/इतिहास में लिखवा जाती हैं अपना नाम/मरती नहीं अतृप्त।"


मानवीयता, एकांगिता, वैयक्तिकता, सहिष्णुता, सहजता के साँचे में औरत के आजादी के आन्दोलन का अनुगूँज से ओतप्रोत हैं रश्मि की रचनाएँ। अतः अपनी रचनाओं में स्त्री को स्त्री के रूप में चित्रित करना,उसकी व्यापकता को यथार्थ के धरातल पर खड़े होकर देखना और परखना,...अपने समय को अभिव्यक्त करनेवाली,सच को साहस के साथ कहनेवाली सजग सर्जक हैं रश्मि भारद्वाज।

      


             दिनांक : 22-07-2021

                                 लेखक : गोलेन्द्र पटेल

नोट:-

रश्मि भारद्वाज मैम का मैं क्षमा प्रार्थी हूँ क्योंकि मैं आपको बिना पढ़े और बिना पूछे ही उदाहरण के लिए चुना हूँ खैर जब आपको अध्ययन अनुशीलन के साथ पढ़ूँगा तब आपका मूल्यांकन करुंगा।


            ■★■

 संपादक : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

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Tuesday, 13 July 2021

श्री सुरेंद्र प्रजापति को "मसि कागद छुयो नहिं" सम्मान 2021 से सम्मानित किया गया : गोलेन्द्र पटेल

 मसि कागद छुयो नहिं, कलम गह्यो नहि हाथ।

चारों जुग कै महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात।।

         ~कबीरदास

                                  प्रथम सम्मान
आ. सुरेंद्र प्रजापति जी को मसि कागद छुयो नहिं सम्मान से सम्मानित किया जाता है। हम आपके उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य की कामना करते हैं।

                                     कवि परिचय :-
नाम- सुरेन्द्र प्रजापति

जन्म-8 अप्रैल 1985
जन्म स्थान :-
ग्राम- असनी
पोस्ट-बलिया
थाना-गुरारू
जिला-गया, बिहार
पिन न.-824205

पिता-स्वर्गीय श्री जगदीश प्रजापत
माता-स्वर्गीय श्रीमती मैना देवी
पाँच भाई, दो बहनें
अपने माता पिता का तृतीय पुत्र
पिता से हमेशा संघर्ष शील बने रहने की प्रेरणा, वही माँ से विनम्र बने रहने का पाठ

"शिक्षा"-प्राइमरी स्कूल पांचवी तक, पढ़ाई छोड़ने के आठ वर्ष बाद किसी तरह मैट्रिक
"पेशा" इंटरनेशनल मार्केटिंग कम्पनी में स्वतंत्र डिस्ट्रीब्यूटर
"शौक" साहित्य पढ़ना, कहानी, कविताएँ लिखना

साहित्यिक उपलब्धि :-
कुछ कविताएँ समाचार पत्रों में प्रकाशित

एक कहानी संग्रह "सूरज क्षितिज में" प्रकाशित

संपर्क सूत्र:-
मोबाइल न.-
7061821603, 9006248245
ईमेल-
surendraprar01@gmail. Com


श्री सुरेंद्र प्रजापति जी दस कविताएँ प्रस्तुत हैं :-


1).

एक सुंदर कविता

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गुलाब काँटो में

कैसे खिलता है?

सूर्य की प्रखर किरणो में

तपकर भी-

सुगन्ध कहाँ से लाता है?

कैसे बनती है

एक सुंदर कविता


पूछो इससे 

बंजर मिट्टी को तोड़ते

पसीने को जलाते

इंसान को पढ़ो

क्या तुम सुन रहे हो,

कि यह टूटते पत्थर का

रुदन है या

मिट्टी में सने

खून का चीत्कार


शब्दों में ढूंढो, 

जीवन की एक मुकम्मल तस्वीर

पढ़ो, संवेदना की गूँज

समर्पण का उच्छवास

सत्य का प्रकाश।



2).

फसल मुस्कुराया

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देखो, भूमिपुत्र...!

उषा की बेला में

उम्मीद की लौ से सिंचित

मिट्टी में दुबका बीज

धरती की नमी को सोखकर

आकाश में हँस रहा है

तुम्हारे थकान को

उर्वरक का ताप दिखाकर

ऊसर में बरस रहा है


ऐ खेत के देवता...

तुम्हारी वेदना, तुम्हारा सन्ताप

बहते श्वेद कण का प्रताप

शख्त मिट्टी में मिलकर

ओस की बूंदों में सनकर

जगा रहा है कंठ का प्यास

उपज में सोंधी मिठास


आस की भूख सता रही है 

कई-कई दिनों से निर्मित

आत्मा की फीकी मुस्कुराहट

जीवन का रहस्य बता रही है

कि कसैला स्वाद चखने वाला

चीख-हार कर, गम खानेवाला

बासमती धान का भात कैसे खाए

जिसपर संसद का कैमरा

फोकस करता है...

जिसपर शाही हुक्मरान

प्रबल राजनीत करता है...



3).

वह नियति को कोसता है

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किसान!

मिट्टी की खुश्बू से

पहचान लेता है

धरती की नमीं, 

उष्णता की मिठास

फसल की गरमी


कि कौन सा फसल उपयुक्त है

मिट्टी के किस रंग में

कौन सा उपज लगेगा


जैसे एक गर्भवती माँ

अपने पेट में पलते शिशु के

झिलसागर में तैरते

हलचल को महसूस करती है

अपने लोरियों में पिरोती है

नवजात शिशु की थपकी

मुस्कानों में अंकित करती है

ममत्व का चुम्बन


जैसे सता के तलबगार लोग

अपने षडयंत्रो के चाबुक से

थाह लेता है 

प्रजा का भूख

और तैयार करता है

नफरत के अग्नि पर

एक छलता हुआ सुख


किसान प्रकृति के प्रत्येक थपेड़ों से

निर्भयता के साथ सामना करता है

लड़ता है झंझा के तूफानों से

लेकिन सत्ता के गलियारे से

उसके खिलाफ किए गए फैसले का

सामना नहीं करता

सिर्फ नियति को कोसता रहता है



4).

जीवन का कर्ज

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संध्या समय में, जब घर लौटा

थकान, दर्द से विलाप करते

कुछ टुटे स्वप्नों, निराशाओं से हाथ मलते

निढाल ढोते निर्बल शरीर के साथ

अपनी साँसों को नियंत्रित कर रहा था


आसमान में पुरी चन्द्रमा

अपनी स्निग्ध शीतलता उड़ेल रही थी

मैं, उसके चंचल उजाले में बैठ

शीतल सुधामय वायु के साथ

अपने जख्मों को लगाना चाहा मलहम

ताकि प्राण लहरियों में फिर से

हरियाली आ जा सके


तभी, दरवाजे पर दस्तक हुआ

और मैं उस ओर थथम कर देखने लगा

उस महाजन को, जिसका मैं कर्जदार था

वह मुझे ऐसे घुर रहा था जैसे

उसके सबसे अनमोल धरोहर पर

मैं किसी घिनौने जीव की भांति

घात लगाए बैठा हूँ


मेरी आँखों में व्याप्त कातरता

उसके चेहरे पर उत्पन्न भर्त्सना में

थोड़ी सी मोहलत और याचना के

निर्बल, निःशब्द गुहार लगा रही थी

उसने तीखे शब्दों का प्रहार किया

मेरी विवशता थी, उसे स्वीकार किया

उसने अपशब्दों, कुशब्दों का चाबुक फेंका

मेरी दीनता थी, उसे मुक सुनता रहा

निर्लजों की तरह, पुरी हया को भुलकर


उसने कहा 'कामचोर'

और मेरा कठोर श्रम

संघर्षों में ईमानदार पसीना बहाते

लहूलुहान होकर बिखर गया


मेरी वफादारी, मेरी विनम्रता

मेरी ही आत्मा से सवाल करने लगा

उद्धार हो जाओ,

साहुकार से, बेचारी किस्मत से

जिंदगी भी एक साहुकार है

उसका भी कर्ज चुकाने होंगे, बन्धु !


5).

ग्राम-जीवन

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मैं मलिन बस्तियों में गया

सड़ांध और बदबुदार 

रोशनी को देखा

और जी भर कर रोया


वहाँ जीवन कैसे रचता है

अपना कौतुक?

उत्सुकता से ठहर कर 

जानना चाहा


वहाँ गांव का गंवईपन

निर्लिप्त उज्ज्डता

गंवार और भोले-भाले 

लोगों की आत्मीयता


कि वे रात्रि के पिछले प्रहर से ही

करते हैं, ईश्वर भजन

साझा करते हैं 

एक दूसरे के सुख-दुःख


मिट्टी की सुगंध लिए

वायु की आत्ममुग्धता में

अपने हृदय की व्यथा को धोया

और मीठे स्वप्न में

मैं नींद भर सोया।


6).

आँसू और मुस्कान

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जब-जब आँखों में आँसू

दिल मचल-मचल छलकता है,

पीड़ा का क्रंदन होता है

अंतर में टिस उभरता है।


किस दुःख का व्यापार हुआ

कौन रूठा, किया कौन प्रस्थान,

किस विरह में मोती टूटा

या हुआ, जीवन का अवसान।


मित्र, कुटुम्ब चकित होते

प्रश्नाकुल! दृष्टि पुछती है,

कोलाहल भीड़ स्तब्ध हुआ

हर व्यथा संशय में दिखती है।


स्वप्न बिखरा, उम्मीद पिटी

आशाएँ जीवन की अवरुद्ध,

उमंग मौन, उत्साह क्षीण

फफोले  जीवन के विरुद्ध।


बेसुध हृदय, नित्य रागरंग

मुस्कान तड़पकर सोती है,

चंचल, चपल और शोख किरण

आहें धिक-धिक कर रोती है।


मुस्कान सजाता मुखमंडल

आँखों में तेज चमकता है,

शृंगार छेड़ता तान मधुर

जीवन का दीप दमकता है।


आकाश में तारे सजते हैं

वीणा के तार श्रृंखलित होते,

आशा दीप जगमग करता

सृजन पल्लव विकसित होते।


लहरों में उन्माद सजाता

हर स्वप्न नीर सी बहती है,

मुस्कान आत्मा का वैभव

कण-कण में नूपुर सी बजती है।


आँसू है दुःख का वियोग-

विरह गीत, रति का विलाप,

मुस्कान सुख का आभूषण

चन्द्रकला, मन का मिलाप।



7).

कल्पने, धीरे-धीरे बोल

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कल्पने, धीरे-धीरे बोल।


बोल रही जो स्वप्न उबलकर

विह्वल दर्दीले स्वर में,

कुछ वैसी ही आग सोई है 

मेरे, लघु अंतर में।

इस पुण्य धरा पर देखो, 

खड़ा मृत्यु मुख खोल

           कल्पने धीरे-धीरे बोल


फल्गु का जल सुख गया,

धारा में पड़ी दरारें,

मन्दिर के देवता ऊंघ रहे हैं

मन्त्र करती चित्कारें।

शिखा सुलग रही है मन मे

जीवन रहा है डोल,

       कल्पने! धीरे-धीरे बोल।


श्री विष्णु का चरणचिह्न

अमृत से भय खाता,

अंधेरों का दीप जलाकर

वेदना का गीत गाता।

सुधामयी पवन में संक्रमण

विष रहा है घोल,

       कल्पने! धीरे-धीरे बोल।


आज प्रभात की किरनें  भयभीत

सुलग रहे हैं तारे,

फूलों से खुश्बू निर्वासित

झड़ते तप्त अँगारे।

मन की दीप्ति संभाल,

अब जीवन का बोलो मोल

       कल्पने! धीरे-धीरे बोल।


जल रही है रजनी दाह से

सुलग उठी चिंगारी,

जल रही चिताएं तट पर

जलता केशर क्यारी।

वीणा की लय में, काँप रहा 

है, सारा विश्व भूगोल

       कल्पने! धीरे-धीरे बोल।


भाग्य विचित्र खेल खेलता

छूट गए हैं अपने,

साध-साधना दहक रही है

टूट गए हैं सपने।

किसी दुष्ट दानव की ईर्ष्या

विष, रहा है खौल

       कल्पने! धीरे-धीरे बोल।


दया शांति का संदेश,

तेरा वसन जला जाता है,

मानव, मानव के स्वर में

प्रलय घिर-घिर आता है।

आंसुओं के आवेग से जग का

हृदय रहा है डोल

       कल्पने! धीरे-धीरे बोल।


लाखों मानव के आंखों से

झरने रोज बहेगें,

अंतर की पगडंडियां टूटी

शिखा की व्याल दहेंगे।

जीवन की घावों को कुरेदना

लगा पाप का बोल,

कल्पने! धीरे-धीरे बोल।


एक युक्ति है सुनो मित्रवर!

दर्द में तुम हंस लो,

मन की पीड़ा, विश्वास से जीतो

विपत्तियों में बस लो।

शृंगार करेगी व्यथा, कथा में

होंगे मीठे बोल,

       कल्पने! धीरे-धीरे बोल।



8).

आँख का स्वप्न

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आँख सिर्फ आँसू बहाने के लिए

कहाँ होती है ?

वह स्वप्न भी देखती है, चमकदार

उसके जबड़े होते हैं, शिल्पगत कारगर

हाथ जुड़ते हैं, दाता के सामने

तो बंदूक भी सम्हालते हैं

आतिशबाजियां करनेवाली अंगुलियाँ

स्वतंत्र शब्द भी रचती है

नसों में बहने वाली लहु

क्या जमीन को नहीं रंगती ?


सुमनों की चंचल सुरभि से

मुग्ध होने वाले मस्तिष्क में

क्या विचारों की चिंगारी नही उड़ती ?


दाता कहने वाला मुख

अपना भाग्य विधाता भी कहता है

स्थिर जल में कंकड़ डालो तुम

उसमें, तरंगे फुफकरता है 

लपकता है, लहलहाते आग की तरह

तिस पर मैं एक मनुष्य हूँ

क्रिया करता हूँ 

तो क्या प्रतिक्रिया करने का

अधिकार नहीं है मेरा ?

मुक्त बहती हवाएँ

अविरल बहती जलधारा

किसने रोका कभी


फिर तुम मुझे जंजीरों में बाँधोगे,

हरियाली को सींचती बाग

बगैर, रक्तरंजित होते रह सका है

किसी युग, किसी काल में


अपमान, घृणा और जिल्लत भरी

कसमसाती जिंदगी की आँखों मे झाँको

मुक्ति का बवंडर चलेगा वहाँ भी

और हिला देगा तुम्हारी

स्याह में डूबी सता को

और मैं अपने कविता की

एक-एक पंक्ति की 

प्रत्येक शब्द की तरह

अपने एक-एक कतरे खुन को

न्योछावर कर दूँगा


मैं दिनकर के प्रचंड ताप पर

और तपाउँगा अपनी महत्वाकांक्षा को

अपने जीवन की उर्बर मिट्टी पर

मानव नद के निर्मल तटों पर

हरियाली का मौसम

जल के लाल कणों में ही सींचेग्गे



9).

जीवन जगमग कर दे

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ज्ञान प्रकाश का अमृत देकर

जीवन जगमग कर दे,

वीणा की तारों को कसकर, माँ

दे वरदान! सरल कर दे।


बसंत के अनुनय प्यार भरे हैं

सुमन दल के अनुराग बहे हैं,

नव पल्लव के कोमल नेह में

शब्दों के नवीन श्रृंगार बहे हैं।


है अभिलाषा माँ! पगडंडी का

गान अचल कर दे,

ज्ञान प्रकाश का अमृत देकर

जीवन जगमग कर दे।


घोर अंधेरे में, चंचल स्वर चहका

ग्राम-प्रवासिनी, प्रभात कर दहका,

भावो में घुलता श्रद्धा भक्ति का

निश्छल बिनोद, कलरव में महका।


कविता में माँ प्यार लिखूँगा

मान धवल कर दे,

ज्ञान प्रकाश का अमृत देकर

जीवन जगमग कर दे।


सुर-साधिका, मधुर भाषिणी

दो वर प्रखर, माँ वर दायिनी,

मेरे काव्य में, तेरी आराधना

स्वर दो शिखा का, यही कामना।


तेरे स्वर्ण द्वार पर याचक आया

झंकार प्रबल कर दे,

ज्ञान प्रकाश का अमृत देकर

जीवन जगमग कर दे।


10).

मैं कहीं भी होता हुँ

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मैं कभी भी, कहीं भी होता हूँ   

जिम्मेवारियों के साथ होता हूँ         

बच्चों की जरूरतें, गृहस्थी का बोझ,  

चाहे जहाँ भी होता हूँ,      

उत्तरदायित्वों के साथ होता हूँ।    


पसीना बहाते, खेतों में।                  

गीत गाते, खलिहानों में                    

सरिता के तट पर , 

या उदासी लिपे, रेगिस्तानों में।


आश्चर्य ये कि...वहां--

जीवन के तमाम लिपि के वावजूद 

कविता  नहीं  होती जैसे---

राम राज्याभिषेक के समय, सीता नहीं होती।


हाँ उस वक्त...

जब, मैं भी नहीं होता हूँ, वहाँ पर 

कहीं भी नहीं, 

न घर-न बाहर, गांव, न नगर 

जब मैं कविता  लिखता हूँ, 


एक एक शब्दों से लड़ता, झगड़ता,  

जीवन के अर्थ ढूंढता  

कलाबाजियां करता, कभी पिटता 

मैं यदा, कदा मुस्कुरा पड़ता हूँ     


जब मैं कविता के शूक्ष्म तारों को छूता  

कहीं और ही होता हूँ 

अक्षरों की गलबाहीं करता, 

अभ्यस्त होता हूँ....


एक आदत की फितरत में दम  भरता

मैं जाना चाहता हूँ...

एक ही समय में अंतरिक्ष तक, विचित्र ग्रहों पर 

सागर की अनन्त गहराइयो में 

ज्वालामुखी के वृहत खाइयों में  


फिर मैं अपने में लौटना हूँ 

एक साथ सबमें लौटता हूँ 

जैसे लाल, नीले ग्रहों से छूकर लौटती है, 

जीवन की तरंग, 

कई कई सम्भावनाओं के संग........

                                             ©सुरेन्द्र प्रजापति

                                        संपादक

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

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◆ मारीशस , सिंगापुर व अन्य स्थान(विदेश) के साहित्यिक साथीगण/मित्रगण प्रिय कवि सुरेंद्र प्रजापति जी से बेझिझक बातें कर सकते हैं।

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#सुरेंद्रप्रजापति #मसि_कागद_छुयो_नहिं_सम्मान




Saturday, 10 July 2021

कोरोजीवी प्रश्न (corojivi quetion) || कोरोनाकाल के साहित्यिक प्रश्न || कोरोजयी प्रश्न

 

कोरोजीवी प्रश्न दृष्टिबाधित साथियों के कहने पर तैयार किया जा रहा है अतः आप सहयोग करने की कृपा करें!

प्रश्न-१ : "उत्तर कोरोना' (आत्माएं होंगी, आत्मीयता न होगी)" कविता के रचनाकार कौन है ?


अ) मदन कश्यप

ब) सुभाष राय

स) सदानंद शाही

द) श्रीप्रकाश शुक्ल



प्रश्न-२ : "एक चिट्ठी ज्योति बेटी के नाम" कविता के रचनाकार कौन है ?


अ) सुभाष राय

ब) जितेंद्र श्रीवास्तव

स) स्वप्निल श्रीवास्तव

द) संजय कुंदन



प्रश्न-३ : निम्नलिखित पंक्तियाँ किसकी है ?

"वह एक तुम्हारा स्पर्श ही तो था

कि जिससे ईश्वर के होने की अनुभूति होती थी

कोरोना ने मुझे निरीश्वर कर दिया!"


अ) मंगलेश डबराल

ब) मदन कश्यप

स) मनोज जैन

द) बोधिसत्व



प्रश्न-४ : "तिमिर में ज्योति जैसी" काव्य-संग्रह का संपादक कौन है ?

अ) अरुण होता

ब) अरुण कमल

स) अरुणाभ सौरभ

द) अनिल पाण्डेय



प्रश्न-५ : "बुद्धम् शरणम् गच्छामि" कहानी का लेखक कौन है ?

अ) शैलेंद्र शांत

ब) चंद्रेश्वर

स) पंकज श्रीवास्तव

द) स्वप्निल श्रीवास्तव


नोट:- मित्रों! अभी हमारी परीक्षाएं हो रही हैं इसलिए हम कुछ दिन बाद कोरोजीवी प्रश्न बनाएंगे। साथ ही साथ सभी प्रश्नों को दृष्टिबाधित(दिव्यांग) साथियों के निम्नलिखित चैनल पर हल किया जाएगा। अतः आप से निवेदन है कि आप चैनल से जुड़ें रहें। जो मित्र एवं सुधीजन प्रश्न बनाकर हमें भेजना चाहते हैं वे निम्न संपर्क पर भेज सकते हैं।


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Saturday, 26 June 2021

हिन्दी भाषा एवं साहित्य साहित्य 📚 हिंदी साहित्य : बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर

 📚 *हिन्दी भाषा एवं साहित्य साहित्य*📚


https://youtube.com/c/GolendraGyan

•तुलसीदास को हिंदी का धर्मध्वज किसने कहा है?- 

उत्तर::::-------चतुरसेन शास्त्री

•नाथों की भाषा को फक्कडी भाषा किसने कहा है?

उत्तर:::::--------चतुरसेन शास्त्री

•सिद्धों की भाषा को आलो आंधारी भाषा किसने कहा है?

उत्तर:::------हरप्रसाद शास्त्री

•यह तो जगजाहिर है की रामानंद के बारह शिष्य थे 

लेकिन किस आलोचक ने कहा की रामानंद के बारह नहीं साढे बारह शिष्य थे?

उत्तर::::--------नागरी प्रचारणी पत्रिका मे ।

•पृथ्वीराज रासो को हिंदी का वृहत् महाभारत किसने कहा है?

उतर-::::::---------दशरथ शर्मा


•कबीर को अवधी का प्रथम कवि किसने माना है

उतर :::::::---------बाबूराम सक्सेना

•मिश्रबंधुओं ने हिंदी का सबसे उद्दण्ड कवि किसे माना है?

उतर:::---------बेताल बंदीजन

•मिश्रबंधुओं ने किस रीतिमुक्त कवि को ओऊल नंबर का रसिया कहा है?

उतर::--------- ठाकुर जी

•मिश्रबंधुओं ने अष्टछाप का नौवां कवि किसे माना है?

उतर::::--------नागरीदास

•मिश्रबंधुओं ने पुर्वालंकृतकाल का सबसे बडा आचार्य किसे माना है?

उत्तर::::::-------चिंतामणि


•मिश्रबंधुओं ने उत्तरालंकृत काल का सबसे बडा.कवि किसे माना है?

उतर::::::------भिखारीदास जी

•मिश्रबंधुओं ने पुर्वालंकृतकाल का सबसे बडा कवि किसे माना है?

उतर:::------सेनापति

•मिश्रबंधु विनोद को हिंदी साहित्य का पंचांग किसने कहा है?

उत्तर::---डॉ नामवर सिंह

•शिवसिंह सरोज किस भाषा मे लिखा गया है

उत्तर::----हिंदी में

•गुरुग्रंथ साहब में कुल कितने संत कवियो के पद है?

उतर:---17


•नंददास जडिया और कवि गढिया यह तो जगजाहिर है

लेकिन वो एक भक्त कवि कौन है जिसे 'जडिया और गढियां' भक्त कवि कहा जाता है?

उतर:::------तुलसीदास जी

•रीतिकाल का वह कवि जिसने खडी बोली हिंदी में सीतवसंत नामक (प्रबन्धरूप में)कहानी लिखी थी?

उतर:::------चन्दन कवि

•रीतिकाल के किस कवि का उपनाम 'काष्ठ जिह्वा स्वामी' था?

उतर::------देव बनारस वाले

•हिंदी का प्रथम जयकाव्य कौनसा है?

उतर::-----खुमाण रासो

•मिश्रबंधुओं ने हिंदी का प्रथम नाटककार किसे माना है?

उतर::------विद्यापति जी को


•मिश्रबंधुओ ने हिंदी का प्रथम इतिहास सहायक किसे माना है

एवं किस ग्रंथ को प्रथम प्रथम इतिहास सहायक ग्रंथ माना है?

उतर:::---------शिव सिंह सरोज

•कहा जाता है कि सेनापति ने अपने अंतिम समय मे क्षैत्रसन्न्यास ले लिया था 

यहा क्षैत्र सन्न्यास का क्या मतलब है?

उतर:::-------अपने निवास स्थान से बाहर न निकलना ।सेनापति ने वृन्दावन से निकलना बन्द कर दिया था ।

•मिश्रबंधुओं ने किस कवि को हिंदी का प्राचीन समालोचक माना है?

उतर:::------भिखारीदास जी को


•मिश्रबंधुओ ने हिंदी का चासर किसे कहा है?

उतर:::------चन्दबरदाई जी को

•"देव हिन्दी के भिखारी कवि है|" वाक्य किस विद्वान का है?

उतर------लाला भगवानदीन

•बिहारी सतसई को आजमशाही किसने कहा था और क्यू कहा था?

उतर::-------मिस्रबन्धुओ ने कहा :-----आज बिहारी सतसई दोहों का जो क्रम मिलता है वो सर्वप्रथम आजमशाह ने करवाया था ।

•पल्लव को छायावाद का घोषणा पत्र किसने कहा?

उतर:::------रामधारी सिंह दिनकर जी

•निराला को छंदो का राजा किसने कहा ?

उतर::------डॉ नामवर सिंह जी ने ।


•बिहारी की कविता(सतसई) को हिंदी का श्रृंगार किसने कहा है?

उत्तर::-------आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी

•बिहारी को भाषा का पण्डित किसने कहा है? 

उतर::------विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जी ने

•मिश्रबंधुओं ने हिंदी का सर्वश्रेष्ठ वर्तमान गद्य लेखक किसे माना है?

उतर::-----आचार्य चतुसेन शास्त्री

•रामकुमार वर्मा रचित 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' ग्रंथ को किसने हिंदी सआहित्य का एक रिसर्च वर्क -डाक्टरेट के लिए लिखा गया एक थीसेस कहा है?

उत्तर:::-----मिस्रबन्धु

•कृष्ण काव्य धारा में स्वच्छंद काव्य धारा के प्रवर्त्तक कवि है??

उतर::::--------रसखान


•कबीर का वह शिष्य कौन था जो बीजक को लेखर भाग गया था?

उत्तर::-----भगवानदास

•किस विद्वान ने सूर के ग्रंथ सूरसारावली को एक वृहत् होली गीत कहा है?

उतर:::-------मुंशी राम शर्मा ।


◆◆◆


..हिन्दी स्मरण एवं रेखाचित्र : कालक्रमानुसार...........

संकलनकर्ता-रविन्द्र पुनियां..........

1905 अनुमोदन का अन्त (महावीरप्रसाद द्विवेदी)

1907 इंग्लैंड के देहात में महाराज बनारस का कुआं (काशीप्रसाद जायसवाल)

1907 सभा की सभ्यता (महावीरप्रसाद द्विवेदी)

1908 लन्दन का फाग या कुहरा (प्यारेलाल मिश्र)

1909 मेरी नई दुनिया सम्बन्धिनी रामकहानी (भोलदत्त पांडेय)

1911 अमेरिका में आनेवाले विद्यार्थियों की सूचना (जगन्नाथ खन्ना)

1913 मेरी छुट्टियों का प्रथम सप्ताह (जगदीश बिहारी सेठ)

1913 वाशिंगटन महाविद्यालय का संस्थापन दिनोत्सव (पांडुरंग खानखोजे)

1918 इधर-उधर की बातें (रामकुमार खेमका)

1921 कुछ संस्मरण (वृन्दालाल वर्मा, सुधा 1921 में प्रकाशित)

1921 मेरे प्राथमिक जीवन की स्मृतियां (इलाचन्द्र जोशी, सुधा 1921 में प्रकाशित)

1929 पदम पराग (पदमसिंह शर्मा)

1930 रामा (महादेवी वर्मा)

1932 मदन मोहन के सम्बन्ध की कुछ पुरानी स्मृतियां (शिवराम पांडेय)

1934 बिन्दा (महादेवी वर्मा)

1935 घीसा (महादेवी वर्मा)

1935 बिट्टो (महादेवी वर्मा)

1935 सबिया (महादेवी वर्मा)

1936 शिकार (श्रीराम शर्मा)

1937 बोलती प्रतिमा (श्रीराम शर्मा, भाई जगन्नाथ इस संकलन का सर्वश्रेष्ठ संस्मरण)

1937 साहित्यिकों के संस्मरण (ज्योतिलाल भार्गव, हंस के प्रेमचन्द स्मृति अंक 1937 सं. पराड़कर)

1937 क्रान्तियुग के संस्मरण (मन्मथनाथ गुप्त)

1938 झलक (शिवनारायण टंडन)

1938 लाल तारा (रामवृक्ष बेनीपुरी)

1939 प्राणों का सौदा (श्रीराम शर्मा)

1940 रेखाचित्र (प्रकाशचन्द्र गुप्त)

1940 टूटा तारा (संस्मरण : मौलवी साहब, देवी बाबा, राजा राधिकारमण प्र. सिंह)

1941 अतीत के चलचित्र (महादेवी वर्मा)

1942 तीस दिन मालवीय जी के साथ (रामनरेश त्रिपाठी)

1942 गोर्की के संस्मरण (इलाचन्द्र जोशी)

1943 स्मृति की रेखाएं (महादेवी वर्मा)

1943 चरित्र रेखा (जनार्दन प्रसाद द्विज)

1946 माटी की मूरतें (रामवृक्ष बेनीपुरी)

1946 वे दिन वे लोग (शिवपूजन सहाय)

1946 पंच चिह्न (शांतिप्रसाद द्विवेदी)

1947 मिट्टी के पुतले (प्रकाशचन्द्र गुप्त)

1947 पुरानी स्मृतियां और नए स्केच (प्रकाशचन्द्र गुप्त)

1947 स्मृति की रेखाएं (महादेवी वर्मा)

1948 सन् बयालीस के संस्मरण (श्रीराम शर्मा)

1949 माटी हो गई सोना (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

1949 एलबम (सत्यजीवन वर्मा ‘भारतीय’)

1949 रेखाएं बोल उठीं (देवेन्द्र सत्यार्थी)

1949 दीप जले शंख बजे (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

1949 ज़्यादा अपनी, कम पराई (‘अश्क’)

1949 जंगल के जीव (श्रीराम शर्मा)

1950 गेहूं और गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)

1950 क्या गोरी क्या सांवरी (देवेन्द्र सत्यार्थी)

1950 लंका महाराजिन (ओंकार शरद)

1951 अमिट रेखाएं (सत्यवती मल्लिक)

1952 हमारे आराध्य (बनारसीदास चतुर्वेदी)

1952 संस्मरण (बनारसीदास चतुर्वेदी)

रेखाचित्र (बनारसीदास चतुर्वेदी)

1952 सेतुबन्ध (बनारसीदास चतुर्वेदी)

1953 संस्मरण (बनारसीदास चतुर्वेदी)

1954 ज़िन्दगी मुस्कायी (कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर)

1954 गांधी कुछ स्मृतियां (जैनेन्द्र)।

1954 ये और वे (जैनेन्द्र)

1955 बचपन की स्मृतियां (राहुल सांकृत्यायन)

1955 मैं भूल नहीं सकता (कैलाशनाथ काटजू)

1955 रेखाएं और चित्र (उपेन्द्रनाथ अश्क)

1955 रेखा और रंग (विनय मोहन शर्मा)

1956 मंटो मेरा दुश्मन या मेरा दोस्त मेरा दुश्मन (उपेन्द्रनाथ अश्क)

1956 पथ के साथी (महादेवी

1957 जिनका मैं कृतज्ञ (राहुल सांकृत्यायन)

1957 वे जीते कैसे हैं (श्रीराम शर्मा)

1957 माटी हो गई सोना (कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर)

1958 दीप जले, शंख बजे (कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर)

1958 बाजे पायलिया के घुंघरू (कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर)

1959 रेखाचित्र (प्रेमनारायण टंडन)

1959 स्मृति-कण (सेठ गोविन्ददास)

1959 ज़्यादा अपनी कम परायी (अश्क)

1959 मैं इनका ऋणी हूं (इन्द्र विद्यावाचस्पती)

1960 प्रसाद और उनके समकालीन (विनोद शंकर व्यास)

1962 जाने-अनजाने (विष्णु प्रभाकर)

1962 कुछ स्मृतियां और स्फुट विचार (डॉ॰ सम्पूर्णानन्द)

1962 समय के पांव (माखनलाल चतुर्वेदी)

1962 नए-पुराने झरोखे (हरिवंशराय बच्चन)

1962 अतीत की परछाइयां (अमृता प्रीतम)

1963 दस तस्वीरें (जगदीशचन्द्र माथुर)

1963 साठ वर्ष : एक रेखांकन (सुमित्रानन्दन पन्त)

1963 जैसा हमने देखा (क्षेमचन्द्र सुमन)

1965 कुछ शब्द : कुछ रेखाएं (विष्णु प्रभाकर)

1965 मेरे हृदय देव (हरिभाऊ उपाध्याय)

1965 वे दिन वे लोग (शिवपूजन सहाय)

1965 जवाहर भाई : उनकी आत्मीयता और सहृदयता (रायकृष्ण दास)

1965 लोकदेव नेहरू (रामधारीसिंह दिनकर)

1966 विकृत रेखाएं : धुंधले चित्र (महेन्द्र भटनागर)

1966 स्मृतियां और कृतियां (शान्तिप्रय द्विवेदी)

1966 चेहरे जाने-पहचाने (सेठ गोविन्ददास)

1967 कुछ रेखाएं : कुछ चित्र (कुन्तल गोयल)

1967 चेतना के बिम्ब (डॉ॰ नगेन्द्र)

1968 बच्चन निकट से (अजित कुमार एवं ओंकारनाथ श्रीवास्तव)

1968 संस्मरण और विचार (काका साहेब कालेलकर)

1968 स्मृति के वातायन (जानकीवल्लभ शास्त्री)

1968 घेरे के भीतर और बाहर (डाॅ॰ हरगुलाल)

1969 संस्मरण और श्रद्धांजलियां (रामधारी सिंह दिनकर)

1969 चांद (पद्मिनी मेनन)

1970 व्यक्तित्व की झांकियां (लक्ष्मीनारायण सुधांशु)

1971 जिन्होंने जीना जाना (जगदीशचन्द्र माथुर)

1971 स्मारिका (महादेवी वर्मा)

1972 मेरा परिवार (महादेवी वर्मा)

1972 अन्तिम अध्याय (पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी)

1973 जिनके साथ जिया (अमृतलाल नागर)

1974 स्मृति की त्रिवेणिका (लक्ष्मी शंकर व्यास)

1975 चन्द सतरें और (अनीता राकेश)

1975 मेरा हमदम मेरा दोस्त (कमलेश्वर)

1975 रेखाएं और संस्मरण (क्षेमचन्द्र सुमन)

1976 बीती बातें (परिपूर्णानन्द)

1976 मैंने स्मृति के दीप जलाए (रामनाथ सुमन)

1977 मेरे क्रान्तिकारी साथी (भगतसिंह)

1977 हम हशमत (कृष्णा सोबती)

1978 संस्मरण को पाथेय बनने दो (विष्णुकान्त शास्त्री)

1978 कुछ ख़्वाबों में कुछ ख़यालों में (शंकर दयाल सिंह)

1979 अतीत के गर्त से (भगवतीचरण वर्मा)

1979 श्रद्धांजलि संस्मरण (मैथिलीशरण गुप्त)

1979 पुनः (सुलोचना रांगेय राघव)

1980 यादों के झरोखे (कुंवर सुरेश सिंह)

1980 लीक-अलीक (भारतभूषण अग्रवाल)

1981 यादों की तीर्थयात्रा (विष्णु प्रभाकर)

1981 औरों के बहाने (राजेन्द्र यादव)

1981 जिनके साथ जिया (अमृतलाल नागर)

1981 सृजन का सुख-दुख (प्रतिभा अग्रवाल)

1982 संस्मरणों के सुमन (रामकुमार वर्मा)

1982 स्मृति-लेखा (अज्ञेय)

1082 आदमी से आदमी तक (भीमसेन त्यागी)

1983 मेरे अग्रज : मेरे मीत (विष्णु प्रभाकर)

1983 युगपुरुष (रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’)

1983 निराला जीवन और संघर्ष के मूर्तिमान रूप (डॉ॰ ये॰ पे॰ चेलीशेव)

1984 बन तुलसी की गन्ध (रेणु)

1984 दीवान ख़ाना (पद्मा सचदेव)

1986 रस गगन गुफा में (भगवतीशरण उपाध्याय)

1988 हज़ारीप्रसाद द्विवेदी : कुछ संस्मरण (कमल किशोर गोयनका)

1989 भारत भूषण अग्रवाल : कुछ यादें, कुछ चर्चाएं (बिन्दु अग्रवाल)

1990 सृजन के सेतु (विष्णु प्रभाकर)

1992 याद हो कि न याद हो (काशीनाथ सिंह)

1992 निकट मन में (अजित कुमार)

1992 जिनकी याद हमेशा रहेगी (अमृत राय)

1992 सुधियां उस चन्दन के वन की (विष्णुकान्त शास्त्री)

1994 लाहौर से लखनऊ तक (प्रकाशवती पाल)

1994 सप्तवर्णी (गिरिराज किशोर)

1995 लौट आ ओ धार (दूधनाथ सिंह)

1995 स्मृतियों के छंद (रामदरश मिश्र)

1995 मितवा घर (पदमा सचदेव)

1995 अग्निजीवी (प्रफुल्लचन्द्र ओझा)

1996 सृजन के सहयात्री (रवीन्द्र कालिया)

1996 अभिन्न (विष्णुचन्द्र शर्मा)

1998 यादें और बातें (बिन्दु अग्रवाल)

1998 हम हशमत (भाग-2, कृष्णा सोबती)

2000 अमराई (पदमा सचदेव)

2000 वे देवता नहीं हैं (राजेन्द्र यादव)

2000 यादों के काफिले (देवेन्द्र सत्यार्थी)

2000 नेपथ्य नायक लक्ष्मीचन्द्र जैन (मोहनकिशोर दीवान)

2000 याद आते हैं (रमानाथ अवस्थी)

2001 अपने-अपने रास्ते (रामदरश मिश्र)

2001 अंतरंग संस्मरणों में प्रसाद (सं॰ पुरुषोंत्तमदास मोदी)

2001 एक नाव के यात्री (विश्वनाथप्रसाद तिवारी)

2001 प्रदक्षिणा अपने समय की (नरेश मेहता)

2002 चिडि़या रैन बसेरा (विद्यानिवास मिश्र)

2002 लखनऊ मेरा लखनऊ (मनोहर श्याम जोशी)

2002 काशी का अस्सी (काशीनाथ सिंह)

2002 लौट कर आना नहीं होगा (कान्तिकुमार जैन)

2002 नेह के नाते अनेक (कृष्णविहारी मिश्र)

2002 स्मृतियों का शुक्ल पक्ष (डॉ॰ रामकमल राय)

2003 आंगन के वंदनवार (विवेकी राय)

2003 रघुवीर सहाय : रचनाओं के बहाने एक संस्मरण (मनोहर श्याम जोशी)

2004 तुम्हारा परसाई (कान्तिकुमार जैन)

2004 पर साथ-साथ चली रही याद विष्णुकान्त शास्त्री)

2004 नंगा तलाई का गांव (डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी)

2004 लाई हयात आए (लक्ष्मीधर मालवीय)

2004 आछे दिन पाछे गए (काशीनाथ सिंह)

2005 सुमिरन को बहानो (केशवचन्द्र वर्मा)

2005 मेरे सुहृद : मेरे श्रद्धेय (विवेकी राय)

2006 ये जो आईना है (मधुरेश)

2006 जो कहूंगा सच कहूंगा (डाॅ॰ कान्ति कुमार जैन)

2006 घर का जोगी जोगड़ा (काशीनाथ सिंह)

2007 एक दुनिया अपनी (डॉ॰ रामदरश मिश्र)

2007 अब तो बात फैल गई (कान्तिकुमार जैन)

2009 कुछ यादें : कुछ बातें (अमरकान्त)

2009 दिल्ली शहर दर शहर (डॉ॰ निर्मला जैन)

2009 कालातीत (मुद्राराक्षस)

2009 कितने शहरों में कितनी बार (ममता कालिया)

2009 हाशिए की इबारतें (चन्द्रकान्ता)

2009 मेरे भोजपत्र (चन्द्रकान्ता)

2009 कविवर बच्चन के साथ (अजीत कुमार)

2010 जे॰ एन॰ यू॰ में नामवर सिंह (सं॰ सुमन केशरी)

2010 अंधेरे में जुगनू (अजीत कुमार)

2010 बैकुंठ में बचपन (कान्तिकुमार जैन)

2010 अ से लेकर ह तक (यानी अज्ञेय से लेकर हृदयेश तक, डॉ॰ वीरेन्द्र सक्सेना)

2011 कल परसों बरसों (ममता कालिया)

2011 स्मृति में रहेंगे वे (शेखर जोशी)

2011 अतीत राग (नन्द चतुर्वेदी)

2012 स्मृतियों के गलियारे से (नरेन्द्र कोहली)

2012 गंगा स्नान करने चलोगे (डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी)

2012 आलोचक का आकाश (मधुरेश)

2012 माफ़ करना यार (बलराम)

2012 अपने-अपने अज्ञेय (दो खंड, ओम थानवी)

2012 यादों का सफ़र (प्रकाश मनु)

2012 हम हशमत (भाग-3, कृष्णा सोबती)

2013 मेरी यादों का पहाड़ (देवेंद्र मेवाड़ी)

साभार: हिंदी दर्पण

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भारतीय काव्यशास्त्र महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | काव्यशास्त्र | हिंदी साहित्य : काव्यशास्त्र ~ BHU & JNU


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1. भारतीय काव्यशास्त्र महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर


वास्तविक काव्यलक्षण का प्रारंभ किस आचार्य से होता है जिन्होंने शब्द और अर्थ के सहभाव (शब्दार्थोसहितौ काव्यम् ) को काव्य की संज्ञा दी है --> भामह से

शब्द अर्थ संगम सहित भरे चमत्कृत भाय।

जग अद्भुत में अद्भुतहिँ , सुखदा काव्य बनाए ॥

पंक्ति है --> ग्वाल कवि (रसिकानंद)

प्रतिभा के दो भेद (सहजा और उत्पाद्या ) किसने किये --> रुद्रट ने

प्रतिभा को काव्य निर्माण का एकमात्र हेतु मानने के कारण किस आचार्य के प्रतिभावादी कहा जाता है --> पंडितराज जगन्नाथ को

प्रतिभा के दो भेद 'कारयित्री' और 'भावयित्री' किस आचार्य ने किए हैं --> राजशेखर ने

भावयित्री प्रतिभा किसमे होती है --> सहृदय में

भारतीय काव्यशात्र में 'भावक' से अभिप्राय है? --> सहृदय या आलोचक से

"शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली" कथन किसका है--> दण्डी का

रीति सिद्धांत की उपलब्धि है --> शैली तत्वों को महत्व देना

वामन के अनुसार गुण और रिति का संबंध है --> अभेद

आचार्य कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति के कितने भेद हैे --> 6

वक्रोक्ति सिद्धांत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है--> कलावाद की प्रतिष्ठा

कवः कर्म काव्यम् , (कवि का कर्म ही काव्य है ) कथन किसका है --> कुन्तक का

औचित्य विचार चर्चा , ग्रंथ किस आचार्य का है --> क्षेमेंद्र का

क्षेमेंद्र के अनुसार औचित्य के प्रधान भेद हैं--> 27

क्षेमेंद्र ने रस का प्राण किसे माना है --> औचित्य को

ध्वन्यालोक की टीका 'ध्वन्यालोकलोचन' किसने लिखी --> अभिनवगुप्त ने

ध्वनि सिद्धांत का प्रादुर्भाव व्याकरण के स्पोट सिद्धांत से हुआ है

वैयाकरण ने वाक् (वाणी) के कितने प्रकार माने है?--> 4

१• परा, 2• पश्यंती, ३• मध्यम, ४• बैखरी

आनन्दवर्धन का समय है --> नवीं शती का मध्य

आनन्दवर्धन ने व्यंग्यार्थ के तारतम्य के आधार पर काव्य के कितने भेद किये है--> 3 ; ध्वनि, गुणिभूत व्यंग, चित्र

आनन्दवर्धन ने ध्वनि के कितने प्रकार माने है--> 3 ; वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि,रसध्वनि

आनंद वर्धन के अनुसार रीति के चार नियामक है --> वक्त्रोचित्य , वाच्योचित्य , विषयोचित्य , रसोचित्य

अभिनव गुप्त ने ध्वनि के कितने भेद किए हैं --> 35

मम्मट ने के ध्वनि के शुद्ध भेदों की संख्या स्वीकार की है --> 51

पंडित राज जगन्नाथ काव्य के कितने भेद किए हैं --> 4

उत्तमोत्तम--> उत्तम--> मध्यम--> अधम

आचार्यो ने व्यंग्यार्थ की प्रधानता गौणता एवं अभाव के आधार पर काव्य के कितने भेद किए हैं --> 3 ; उत्तम --> मध्यम--> अधम

आधुनिक काल के प्रारंभिक समय में से सेठ कन्हैयालाल पौद्दार ने काव्यकल्पद्रुम नामक ग्रंथ की रचना की जो आगे चलकर रसमंजरी और अलंकार मंजरी के रुप में प्रकाशित हुआ

हृदयदर्पण नामक ग्रंथ की रचना किसने की --> भट्टनायक ने

हिंदी वक्रोक्ति जीवित की भूमिका किसने लिखी --> नगेंद्र ने

रस निरुपण के प्रथम व्याख्याता और रस निरुपण का प्रथम ग्रंथ किसे माना जाता है --> भरत मुनि व उनके नाट्यशास्त्र को

भरत ने 8 स्थाई भाव , 8 सात्विक भाव, 33 संचारी भावों का उल्लेख किया है

किस आचार्य ने रीती को काव्य की आत्मा मान कर रस के गुण के अंतर्गत स्थान दिया है और कांति गुण का वर्णन करते हुए रस से युक्त माना है --> वामन

आचार्य रुद्रट ने शांत रस का स्थाई भाव किसे माना है --> समयक ज्ञान

रस को ध्वनि के साथ युक्त करने का श्रेय किसे है --> आनंद वर्धन को

भोज ने 12 रसों का विवेचन किया है जिनमें चार नवीन है --> प्रेयस--> शांत--> उदात्त--> उध्दात

भोज ने रस का मूल किसे माना है--> अहंकार को

वाक्य रसात्मक काव्यम् कथन किसका है --> विश्वनाथ का

आचार्य शुक्ल ने काव्य की आत्मा किसे माना है--> रस को

भट्टलोल्लक ने रस की अवस्थिति किसमें मानी है--> अनुकार्य में

किस आचार्य ने रस सूत्र की व्याख्या के संधर्भ में काव्य में तीन शक्तियों की कल्पना की (अभिधा, भावक्त्व, भोजकत्व) -->भट्टनायक ने

अभिनव गुप्त रस को मानते हैं --> व्यंग

किस आलोचक के मतानुसार साधारणीकरण कवि की अनुभूति का होता है --> नगेंद्र के अनुसार

भारतीय काव्यशास्त्र में भावक से अभिप्राय है --> सहृदय या आलोचक से

भावक(सहदय्) के कितने प्रकार माने गए है --> 4

१ अरोचकी [विवेकी], २ सतृणाभ्यव्हारि [अविवेकी], ३ मत्सरी [पक्षपात पूर्ण आलोचना करने वाला], ४ तत्त्वाभिनिवेशी

विभाव के कितने भेद हैं --> 2[आलम्बन और उद्दीपन ]

आलंबन विभाव के कितने भेद हैं --> 2 ; १•आलंबन २•आश्रय

सात्विक अनुभाव की संख्या कितनी मानी गई है --> आठ

आचार्य शुक्ल ने विरोध और अविरोध के आधार पर संचारियों के कितने वर्ग किये हैं --> चार ;

१• सुखात्मक २• दु:खात्मक ३• उभयात्मक ४• उदासीन

श्रृंगार को मूल रस किस आचार्य ने माना है--> भामह ने

भक्ति रस का रस को मूल रास किसने माना है--> मधुसूदन सरस्वती एव रूप गोस्वामी ने

शंकुक के अनुसार भरतमुनि के रस सूत्र में आये “संयोग ” शब्द का अर्थ है --> अनुमान

रस सिद्धांत के संब


ंध में तन्मयतावाद के प्रतिष्ठापक है--> अभिनव भरत

एक के बाद एनी अनेक भावों का उदय होता है तो उसे कहते है --> भाव सबलता

अवहित्था और अपस्मार क्या है ?--> संचारी भाव का एक प्रकार

किस आलोचक के मतानुसार साधारणीकरण कवि भावना का होता है --> नगेंद्र

अभिधा, भावकत्व और भोग काव्य के तीन व्यापार किस आचार्य ने माने हैं --> भट्टनायक ने

भाव-सन्धि, भाव सबलता तथा भाव-शांति किस भाव की प्रमुख स्थितियां है --> संचारी भाव की

अलंकार संप्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य है --> भामह

भरत मुनि ने कितने अलंकारों का उल्लेख किया है ? --> 4

१• उपमा २• रूपक ३• दीपक ४• यमक

अलंकार रत्नाकर नामक ग्रंथ के रचयिता है --> शोभाकर मित्र

दण्डी ने गुणों की संख्या कितनी मानी है --> 10

आचार्य भोज ने अनुसार गुणों की संख्या है --> 24

वामन ने गुणों की संख्या मानी है --> 20

मम्मट, भामह तथा आनंद वर्धन ने गुणों के भेद माने है --> 3

गुणों के प्रमुख भेद है --> 3

१• माधुर्य, १• औज, ३• प्रसाद

वृत्ति का सर्वप्रथम वर्णन किस ग्रंथ में मिलता है--> नाट्यशास्त्र में

भारतीय काव्यशास्त्र में कितनी काव्य वृत्तियां मानी ग मानी गई है --> 3

१• परुषा

२• कोमल

३• उपनागरी

सर्वप्रथम दोष की परिभाषा किस आचार्य ने प्रस्तुत की--> वामन ने

दंडी में कितने काव्य दोषों का वर्णन किया है --> 10

वामन ने कितने काव्य दोषों का वर्णन किया है --> 20

विश्वनाथ ने कितने दोषों का वर्णन किया है --> 70

काव्य दोषो का सर्वप्रथम निरुपण किस ग्रंथ में मिलता है --> भारत कृत नाट्य शास्त्र में

दस के स्थान पर तीन काव्य गुणों की स्वीकृति प्रथम किस आचार्य ने की--> भामह ने

प्रेयान नामक नवीन रस की उद्भावना किस आचार्य ने की।--> रुद्रट

आलोक का हिंदी भाष्य किसने लिखा--> आचार्य विश्वेश्वर ने

भावप्रकाश नामक ग्रंथ के रचयिता है--> शारदातनय

दण्डी ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• नैेसर्गिकी प्रतिभा

२• निर्मल शास्त्र ज्ञान

३• अमंद अभियोग [अभ्यास]

रुद्रट और कुंतक ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• शक्ति, २•व्युत्तपत्ति, ३• अभ्यास

वामन ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• लोक, २• विद्या , ३• प्रकीर्ण

व्यंग के तारत्मय के आधार पर काव्य के कितने भेद माने जाते है --> 3

१•ध्वनि, २• गुणीभूत व्यंगचित्र, ३• चित्र

काव्यरुप(इंद्रियगम्यता) के आधार पर काव्य के कितने भेद है --> 2

१• दृश्य काव्य, २•श्रव्यकाव्य


दृश्यकाव्य[ रूपक] के कितने प्रमुख भेद है --> 10

श्रव्यकाव्य के कितने भेद हैं --> 3

१•गद्य, •२ पद्य ,३ चंपू [ गद्य-पद्यमय काव्य]


लक्षणा के कुल कितने भेद माने जाते हैं --> 12

किस लक्षणा को अभिधा पुच्छभूता कहते है--> रूढ़ि लक्षणा को

किस आचार्य ने लक्षणा के 80 भेदों का उल्लेख किया है --> विश्वनाथ ने

मम्मट ने लक्षणा के कितने भेदों का उल्लेख किया है --> 12

किस काव्य को चित्रकाव्य कहा जाता है --> अधम काव्य को

बंध के आधार पर काव्य के कितने भेद हैं --> 2 ( १• प्रबंध २• मुक्त्तक)

पूर्वापर सम्बन्ध निरपेक्ष काव्य -रचना को कहते हैं--> मुक्त्तक

पूर्वापर सम्बन्ध निर्वाह -सापेक्ष रचना को कहते है --> प्रबंध

संस्कृत में साहित्य के लिए किस शब्द का प्रयोग होता है --> वाङ्मय

तात्पर्य, क्या है --> अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की तरह चौथे प्रकार की नई शब्द-शक्ति

भामह 'अभाववादी' कहलाते है क्योंकि --> उन्होंने काव्य में ध्वनि की सत्ता स्वीकार नहीं की है

प्रतिभा मात्र को ही काव्य का हेतु आवश्यक सर्वप्रथम किसने माना --> हेमचंद्र ने

गुणिभूत व्यंग के कितने भेद होते हैं --> 8

वाच्यता असह,का अन्य नाम है --> रस ध्वनि

भरत ने हास्य रस के कितने भेद माने हैं --> 6

कुंतक ने वक्रोति के भेद व उपभेद माने है --> 6 भेद व 41 उपभेद

हेतुर्न तु हेतव:’ पंक्ति है--> मम्मट की

जनश्रुति के आधार पर किस आचार्य कोरस के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया जाता है --> नंदिकेश्वर को

भरत के नाट्यशास्त्र में भावों की संख्या 49 गिनाई है -->

१• स्थाई भाव--> 8

२• व्याभिचारी भाव--> 33

३• सात्विक भाव--> 8

8+33+8--> 49

आचार्य भामह ने काव्य हेतु किसे माना है --> प्रतिभा को

किस आचार्य का कथन है कि संसार में जो कुछ पवित्र उज्जवल एव दर्शनीय है ,वह श्रृंगार के भीतर समाविष्ट हो सकता --> भरत मुनि

श्रृंगार रस को रसराज माना जाता हैे --> कार्य -व्यापार की व्यापकता के कारण

भरत मुनि के रस सूत्र के प्रथम व्याख्याता भटलोल्लट के रस- विवेचन का सैद्धांतिक आधार है --> मीमांसा

रस को दो वर्गो (सुखकारक व दुःख कारक )में बाँटकार किन आचार्य ने करुण ,भयानक,वीभत्स और रौद्र को दुःखकारक तथा शेष को सुख का कारक माना --> रामचंद्र एव गुणचन्द्र ने

नवरस नामक ग्रंथ के लेखक हे --> बाबू गुलामराय

'रस कलश' नामक ग्रंथ के लिए के लेखक है--> अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

सर्वप्रथम किस आचार्य ने रस को काव्य आत्मा घोषित किया--> विश्वनाथ

रुद्रट तथा कुंतक ने काव्य-हेतुओं


की संख्या मानी है--> 3

१• शक्ति, २•व्युत्पत्ति ”३•अभ्यास

राज शेखर ने रस का प्रतिष्ठाता किसे माना है --> नंदीकेश्वर को

भरत मुनि ने कितने रस, कितने गुण, कितने दोष तथा कितने अलंकारों का उल्लेख किया है --> रस--> 8, गुण--> 10, दोष--> 20, अलंकार--> 4

शब्दार्थो सहित काव्यम् , काव्य काव्य की इस परिभाषा में दोष है--> अतिव्याप्ति

प्रेयान नामक नवीन रस की उद्भावना किस आचार्य ने की।--> रुद्रट

आलोक का हिंदी भाष्य किसने लिखा--> आचार्य विश्वेश्वर ने

भावप्रकाश नामक ग्रंथ के रचयिता है--> शारदातनय

दण्डी ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• नैेसर्गिकी प्रतिभा

२• निर्मल शास्त्र ज्ञान

३•अमंद अभियोग[अभ्यास]

रुद्रट और कुंतक ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3


१•शक्ति

२•व्युत्तपत्ति

३• अभ्यास

वामन ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• लोक,

२•विद्या ,

३•प्रकीर्ण

व्यंग के तारत्मय के आधार पर काव्य के कितने भेद माने जाते है --> 3

१• ध्वनि,

२• गुणीभूत व्यंगचित्र ,

३• चित्र

काव्यरुप(इंद्रियगम्यता) के आधार पर काव्य के कितने भेद है --> 2

१• दृश्य काव्य,

२• श्रव्यकाव्य

दृश्यकाव्य[ रूपक] के कितने प्रमुख भेद है --> 10

श्रव्यकाव्य के कितने भेद हैं --> 3

१• गद्य,

२. पद्य ,

३. चंपू [गद्य-पद्यमय काव्य]

लक्षणा के कुल कितने भेद माने जाते हैं --> 12

किस लक्षणा को अभिधा पुच्छभूता कहते है--> रूढ़ि लक्षणा को

किस आचार्य ने लक्षणा के 80 भेदों का उल्लेख किया है --> विश्वनाथ ने

मम्मट ने लक्षणा के कितने भेदों का उल्लेख किया है --> 12

किस काव्य को चित्रकाव्य कहा जाता है --> अधम काव्य को

बंध के आधार पर काव्य के कितने भेद हैं --> 2

१• प्रबंध,

२• मुक्त्तक

पूर्वापर सम्बन्ध निरपेक्ष काव्य -रचना को कहते हैं--> मुक्त्तक

पूर्वापर सम्बन्ध निर्वाह -सापेक्ष रचना को कहते है --> प्रबंध

संस्कृत में साहित्य के लिए किस शब्द का प्रयोग होता है --> वाङ्मय

'तात्पर्य' क्या है --> अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की तरह चौथे प्रकार की नई शब्द-शक्ति

भामह 'अभाववादी' कहलाते है क्योंकि --> उन्होंने काव्य में ध्वनि की सत्ता स्वीकार नहीं की है

प्रतिभा मात्र को ही काव्य का हेतु आवश्यक सर्वप्रथम किसने माना --> हेमचंद्र ने

गुणिभूत व्यंग के कितने भेद होते हैं --> 8

वाच्यता असह, का अन्य नाम है --> रस ध्वनि

भरत ने हास्य रस के कितने भेद माने हैं --> 6

कुंतक ने वक्रोति के भेद व उपभेद माने है --> 6 भेद , व 41 उपभेद

'हेतुर्न तु हेतव:' पंक्ति है--> मम्मट की

जनश्रुति के आधार पर किस आचार्य कोरस के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया जाता है --> नंदिकेश्वर कोभारतीय काव्यशास्त्र महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

वास्तविक काव्यलक्षण का प्रारंभ किस आचार्य से होता है जिन्होंने शब्द और अर्थ के सहभाव (शब्दार्थोसहितौ काव्यम् ) को काव्य की संज्ञा दी है --> भामह से

शब्द अर्थ संगम सहित भरे चमत्कृत भाय।

जग अद्भुत में अद्भुतहिँ , सुखदा काव्य बनाए ॥

पंक्ति है --> ग्वाल कवि (रसिकानंद)

प्रतिभा के दो भेद (सहजा और उत्पाद्या ) किसने किये --> रुद्रट ने

प्रतिभा को काव्य निर्माण का एकमात्र हेतु मानने के कारण किस आचार्य के प्रतिभावादी कहा जाता है --> पंडितराज जगन्नाथ को

प्रतिभा के दो भेद 'कारयित्री' और 'भावयित्री' किस आचार्य ने किए हैं --> राजशेखर ने

भावयित्री प्रतिभा किसमे होती है --> सहृदय में

भारतीय काव्यशात्र में 'भावक' से अभिप्राय है? --> सहृदय या आलोचक से

"शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली" कथन किसका है--> दण्डी का

रीति सिद्धांत की उपलब्धि है --> शैली तत्वों को महत्व देना

वामन के अनुसार गुण और रिति का संबंध है --> अभेद

आचार्य कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति के कितने भेद हैे --> 6

वक्रोक्ति सिद्धांत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है--> कलावाद की प्रतिष्ठा

कवः कर्म काव्यम् , (कवि का कर्म ही काव्य है ) कथन किसका है --> कुन्तक का

औचित्य विचार चर्चा , ग्रंथ किस आचार्य का है --> क्षेमेंद्र का

क्षेमेंद्र के अनुसार औचित्य के प्रधान भेद हैं--> 27

क्षेमेंद्र ने रस का प्राण किसे माना है --> औचित्य को

ध्वन्यालोक की टीका 'ध्वन्यालोकलोचन' किसने लिखी --> अभिनवगुप्त ने

ध्वनि सिद्धांत का प्रादुर्भाव व्याकरण के स्पोट सिद्धांत से हुआ है

वैयाकरण ने वाक् (वाणी) के कितने प्रकार माने है?--> 4

१• परा, 2• पश्यंती, ३• मध्यम, ४• बैखरी

आनन्दवर्धन का समय है --> नवीं शती का मध्य

आनन्दवर्धन ने व्यंग्यार्थ के तारतम्य के आधार पर काव्य के कितने भेद किये है--> 3 ; ध्वनि, गुणिभूत व्यंग, चित्र

आनन्दवर्धन ने ध्वनि के कितने प्रकार माने है--> 3 ; वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि,रसध्वनि

आनंद वर्धन के अनुसार रीति के चार नियामक है --> वक्त्रोचित्य , वाच्योचित्य , विषयोचित्य , रसोचित्य

अभिनव गुप्त ने ध्वनि के कितने भेद किए हैं --> 35

मम्मट ने के ध्वनि के शुद्ध भेदों की संख्या स्वीकार की है --> 51

पंडित राज जगन्नाथ


ा असह, का अन्य नाम है --> रस ध्वनि

भरत ने हास्य रस के कितने भेद माने हैं --> 6

कुंतक ने वक्रोति के भेद व उपभेद माने है --> 6 भेद , व 41 उपभेद

'हेतुर्न तु हेतव:' पंक्ति है--> मम्मट की

जनश्रुति के आधार पर किस आचार्य कोरस के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया जाता है --> नंदिकेश्वर को


काव्य के कितने भेद किए हैं --> 4

उत्तमोत्तम--> उत्तम--> मध्यम--> अधम

आचार्यो ने व्यंग्यार्थ की प्रधानता गौणता एवं अभाव के आधार पर काव्य के कितने भेद किए हैं --> 3 ; उत्तम --> मध्यम--> अधम

आधुनिक काल के प्रारंभिक समय में से सेठ कन्हैयालाल पौद्दार ने काव्यकल्पद्रुम नामक ग्रंथ की रचना की जो आगे चलकर रसमंजरी और अलंकार मंजरी के रुप में प्रकाशित हुआ

हृदयदर्पण नामक ग्रंथ की रचना किसने की --> भट्टनायक ने

हिंदी वक्रोक्ति जीवित की भूमिका किसने लिखी --> नगेंद्र ने

रस निरुपण के प्रथम व्याख्याता और रस निरुपण का प्रथम ग्रंथ किसे माना जाता है --> भरत मुनि व उनके नाट्यशास्त्र को

भरत ने 8 स्थाई भाव , 8 सात्विक भाव, 33 संचारी भावों का उल्लेख किया है

किस आचार्य ने रीती को काव्य की आत्मा मान कर रस के गुण के अंतर्गत स्थान दिया है और कांति गुण का वर्णन करते हुए रस से युक्त माना है --> वामन

आचार्य रुद्रट ने शांत रस का स्थाई भाव किसे माना है --> समयक ज्ञान

रस को ध्वनि के साथ युक्त करने का श्रेय किसे है --> आनंद वर्धन को

भोज ने 12 रसों का विवेचन किया है जिनमें चार नवीन है --> प्रेयस--> शांत--> उदात्त--> उध्दात

भोज ने रस का मूल किसे माना है--> अहंकार को

वाक्य रसात्मक काव्यम् कथन किसका है --> विश्वनाथ का

आचार्य शुक्ल ने काव्य की आत्मा किसे माना है--> रस को

भट्टलोल्लक ने रस की अवस्थिति किसमें मानी है--> अनुकार्य में

किस आचार्य ने रस सूत्र की व्याख्या के संधर्भ में काव्य में तीन शक्तियों की कल्पना की (अभिधा, भावक्त्व, भोजकत्व) -->भट्टनायक ने

अभिनव गुप्त रस को मानते हैं --> व्यंग

किस आलोचक के मतानुसार साधारणीकरण कवि की अनुभूति का होता है --> नगेंद्र के अनुसार

भारतीय काव्यशास्त्र में भावक से अभिप्राय है --> सहृदय या आलोचक से

भावक(सहदय्) के कितने प्रकार माने गए है --> 4

१ अरोचकी [विवेकी], २ सतृणाभ्यव्हारि [अविवेकी], ३ मत्सरी [पक्षपात पूर्ण आलोचना करने वाला], ४ तत्त्वाभिनिवेशी

विभाव के कितने भेद हैं --> 2[आलम्बन और उद्दीपन ]

आलंबन विभाव के कितने भेद हैं --> 2 ; १•आलंबन २•आश्रय

सात्विक अनुभाव की संख्या कितनी मानी गई है --> आठ

आचार्य शुक्ल ने विरोध और अविरोध के आधार पर संचारियों के कितने वर्ग किये हैं --> चार ;

१• सुखात्मक २• दु:खात्मक ३• उभयात्मक ४• उदासीन

श्रृंगार को मूल रस किस आचार्य ने माना है--> भामह ने

भक्ति रस का रस को मूल रास किसने माना है--> मधुसूदन सरस्वती एव रूप गोस्वामी ने

शंकुक के अनुसार भरतमुनि के रस सूत्र में आये “संयोग ” शब्द का अर्थ है --> अनुमान

रस सिद्धांत के संबंध में तन्मयतावाद के प्रतिष्ठापक है--> अभिनव भरत

एक के बाद एनी अनेक भावों का उदय होता है तो उसे कहते है --> भाव सबलता

अवहित्था और अपस्मार क्या है ?--> संचारी भाव का एक प्रकार

किस आलोचक के मतानुसार साधारणीकरण कवि भावना का होता है --> नगेंद्र

अभिधा, भावकत्व और भोग काव्य के तीन व्यापार किस आचार्य ने माने हैं --> भट्टनायक ने

भाव-सन्धि, भाव सबलता तथा भाव-शांति किस भाव की प्रमुख स्थितियां है --> संचारी भाव की

अलंकार संप्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य है --> भामह

भरत मुनि ने कितने अलंकारों का उल्लेख किया है ? --> 4

१• उपमा २• रूपक ३• दीपक ४• यमक

अलंकार रत्नाकर नामक ग्रंथ के रचयिता है --> शोभाकर मित्र

दण्डी ने गुणों की संख्या कितनी मानी है --> 10

आचार्य भोज ने अनुसार गुणों की संख्या है --> 24

वामन ने गुणों की संख्या मानी है --> 20

मम्मट, भामह तथा आनंद वर्धन ने गुणों के भेद माने है --> 3

गुणों के प्रमुख भेद है --> 3

१• माधुर्य, १• औज, ३• प्रसाद

वृत्ति का सर्वप्रथम वर्णन किस ग्रंथ में मिलता है--> नाट्यशास्त्र में

भारतीय काव्यशास्त्र में कितनी काव्य वृत्तियां मानी ग मानी गई है --> 3

१• परुषा

२• कोमल

३• उपनागरी

सर्वप्रथम दोष की परिभाषा किस आचार्य ने प्रस्तुत की--> वामन ने

दंडी में कितने काव्य दोषों का वर्णन किया है --> 10

वामन ने कितने काव्य दोषों का वर्णन किया है --> 20

विश्वनाथ ने कितने दोषों का वर्णन किया है --> 70

काव्य दोषो का सर्वप्रथम निरुपण किस ग्रंथ में मिलता है --> भारत कृत नाट्य शास्त्र में

दस के स्थान पर तीन काव्य गुणों की स्वीकृति प्रथम किस आचार्य ने की--> भामह ने

प्रेयान नामक नवीन रस की उद्भावना किस आचार्य ने की।--> रुद्रट

आलोक का हिंदी भाष्य किसने लिखा--> आचार्य विश्वेश्वर ने

भावप्रकाश नामक ग्रंथ के रचयिता है--> शारदातनय

दण्डी ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• नैेसर्गिकी प्रतिभा

२• निर्मल शास्त्र ज्ञान

३• अमंद अभियोग [अभ्यास]

रुद्रट और कुंतक ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• शक्ति, २•व्युत्तपत्ति, ३• अभ्यास

वामन ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• लोक, २• विद्या , ३• प्रकीर्ण

व्यंग के तारत्मय के आधार पर काव्य के कितने भेद माने जाते है --> 3

१•ध्वनि, २• गुणीभूत व्यंगचित्र,


३• चित्र

काव्यरुप(इंद्रियगम्यता) के आधार पर काव्य के कितने भेद है --> 2

१• दृश्य काव्य, २•श्रव्यकाव्य


दृश्यकाव्य[ रूपक] के कितने प्रमुख भेद है --> 10

श्रव्यकाव्य के कितने भेद हैं --> 3

१•गद्य, •२ पद्य ,३ चंपू [ गद्य-पद्यमय काव्य]


लक्षणा के कुल कितने भेद माने जाते हैं --> 12

किस लक्षणा को अभिधा पुच्छभूता कहते है--> रूढ़ि लक्षणा को

किस आचार्य ने लक्षणा के 80 भेदों का उल्लेख किया है --> विश्वनाथ ने

मम्मट ने लक्षणा के कितने भेदों का उल्लेख किया है --> 12

किस काव्य को चित्रकाव्य कहा जाता है --> अधम काव्य को

बंध के आधार पर काव्य के कितने भेद हैं --> 2 ( १• प्रबंध २• मुक्त्तक)

पूर्वापर सम्बन्ध निरपेक्ष काव्य -रचना को कहते हैं--> मुक्त्तक

पूर्वापर सम्बन्ध निर्वाह -सापेक्ष रचना को कहते है --> प्रबंध

संस्कृत में साहित्य के लिए किस शब्द का प्रयोग होता है --> वाङ्मय

तात्पर्य, क्या है --> अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की तरह चौथे प्रकार की नई शब्द-शक्ति

भामह 'अभाववादी' कहलाते है क्योंकि --> उन्होंने काव्य में ध्वनि की सत्ता स्वीकार नहीं की है

प्रतिभा मात्र को ही काव्य का हेतु आवश्यक सर्वप्रथम किसने माना --> हेमचंद्र ने

गुणिभूत व्यंग के कितने भेद होते हैं --> 8

वाच्यता असह,का अन्य नाम है --> रस ध्वनि

भरत ने हास्य रस के कितने भेद माने हैं --> 6

कुंतक ने वक्रोति के भेद व उपभेद माने है --> 6 भेद व 41 उपभेद

हेतुर्न तु हेतव:’ पंक्ति है--> मम्मट की

जनश्रुति के आधार पर किस आचार्य कोरस के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया जाता है --> नंदिकेश्वर को

भरत के नाट्यशास्त्र में भावों की संख्या 49 गिनाई है -->

१• स्थाई भाव--> 8

२• व्याभिचारी भाव--> 33

३• सात्विक भाव--> 8

8+33+8--> 49

आचार्य भामह ने काव्य हेतु किसे माना है --> प्रतिभा को

किस आचार्य का कथन है कि संसार में जो कुछ पवित्र उज्जवल एव दर्शनीय है ,वह श्रृंगार के भीतर समाविष्ट हो सकता --> भरत मुनि

श्रृंगार रस को रसराज माना जाता हैे --> कार्य -व्यापार की व्यापकता के कारण

भरत मुनि के रस सूत्र के प्रथम व्याख्याता भटलोल्लट के रस- विवेचन का सैद्धांतिक आधार है --> मीमांसा

रस को दो वर्गो (सुखकारक व दुःख कारक )में बाँटकार किन आचार्य ने करुण ,भयानक,वीभत्स और रौद्र को दुःखकारक तथा शेष को सुख का कारक माना --> रामचंद्र एव गुणचन्द्र ने

नवरस नामक ग्रंथ के लेखक हे --> बाबू गुलामराय

'रस कलश' नामक ग्रंथ के लिए के लेखक है--> अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

सर्वप्रथम किस आचार्य ने रस को काव्य आत्मा घोषित किया--> विश्वनाथ

रुद्रट तथा कुंतक ने काव्य-हेतुओं की संख्या मानी है--> 3

१• शक्ति, २•व्युत्पत्ति ”३•अभ्यास

राज शेखर ने रस का प्रतिष्ठाता किसे माना है --> नंदीकेश्वर को

भरत मुनि ने कितने रस, कितने गुण, कितने दोष तथा कितने अलंकारों का उल्लेख किया है --> रस--> 8, गुण--> 10, दोष--> 20, अलंकार--> 4

शब्दार्थो सहित काव्यम् , काव्य काव्य की इस परिभाषा में दोष है--> अतिव्याप्ति

प्रेयान नामक नवीन रस की उद्भावना किस आचार्य ने की।--> रुद्रट

आलोक का हिंदी भाष्य किसने लिखा--> आचार्य विश्वेश्वर ने

भावप्रकाश नामक ग्रंथ के रचयिता है--> शारदातनय

दण्डी ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• नैेसर्गिकी प्रतिभा

२• निर्मल शास्त्र ज्ञान

३•अमंद अभियोग[अभ्यास]

रुद्रट और कुंतक ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3


१•शक्ति

२•व्युत्तपत्ति

३• अभ्यास

वामन ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3

१• लोक,

२•विद्या ,

३•प्रकीर्ण

व्यंग के तारत्मय के आधार पर काव्य के कितने भेद माने जाते है --> 3

१• ध्वनि,

२• गुणीभूत व्यंगचित्र ,

३• चित्र

काव्यरुप(इंद्रियगम्यता) के आधार पर काव्य के कितने भेद है --> 2

१• दृश्य काव्य,

२• श्रव्यकाव्य

दृश्यकाव्य[ रूपक] के कितने प्रमुख भेद है --> 10

श्रव्यकाव्य के कितने भेद हैं --> 3

१• गद्य,

२. पद्य ,

३. चंपू [गद्य-पद्यमय काव्य]

लक्षणा के कुल कितने भेद माने जाते हैं --> 12

किस लक्षणा को अभिधा पुच्छभूता कहते है--> रूढ़ि लक्षणा को

किस आचार्य ने लक्षणा के 80 भेदों का उल्लेख किया है --> विश्वनाथ ने

मम्मट ने लक्षणा के कितने भेदों का उल्लेख किया है --> 12

किस काव्य को चित्रकाव्य कहा जाता है --> अधम काव्य को

बंध के आधार पर काव्य के कितने भेद हैं --> 2

१• प्रबंध,

२• मुक्त्तक

पूर्वापर सम्बन्ध निरपेक्ष काव्य -रचना को कहते हैं--> मुक्त्तक

पूर्वापर सम्बन्ध निर्वाह -सापेक्ष रचना को कहते है --> प्रबंध

संस्कृत में साहित्य के लिए किस शब्द का प्रयोग होता है --> वाङ्मय

'तात्पर्य' क्या है --> अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की तरह चौथे प्रकार की नई शब्द-शक्ति

भामह 'अभाववादी' कहलाते है क्योंकि --> उन्होंने काव्य में ध्वनि की सत्ता स्वीकार नहीं की है

प्रतिभा मात्र को ही काव्य का हेतु आवश्यक सर्वप्रथम किसने माना --> हेमचंद्र ने

गुणिभूत व्यंग के कितने भेद होते हैं --> 8

वाच्यत

               साभार: हिंदी दर्पण

2. भारतीय काव्यशास्त्र महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

वास्तविक काव्यलक्षण का प्रारंभ किस आचार्य से होता है जिन्होंने शब्द और अर्थ के सहभाव (शब्दार्थोसहितौ काव्यम ) को काव्य की संज्ञा दी है --> भामह से

शब्द अर्थ संगम सहित भरे चमत्कृत भाय।

जग अद्भुत में अद्भुतहिँ , सुखदा काव्य बनाए ॥पंक्ति है --> ग्वाल कवि (रसिकानंद)

प्रतिभा के दो भेद (सहजा और उत्पाद्या ) किसने किये --> रुद्रट ने

प्रतिभा को काव्य निर्माण का एकमात्र हेतु मानने के कारण किस आचार्य के प्रतिभावादी कहा जाता है --> पंडितराज जगन्नाथ को

प्रतिभा के दो भेद 'कारयित्री' और 'भावयित्री' किस आचार्य ने किए हैं --> राजशेखर ने

भावयित्री प्रतिभा किसमे होती है --> सहृदय में

भारतीय काव्यशात्र में 'भावक' से अभिप्राय है? --> सहृदय या आलोचक से

"शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली" कथन किसका है--> दण्डी का

रीति सिद्धांत की उपलब्धि है --> शैली तत्वों को महत्व देना

वामन के अनुसार गुण और रिति का संबंध है --> अभेद

आचार्य कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति के कितने भेद हैे --> 6

वक्रोक्ति सिद्धांत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है--> कलावाद की प्रतिष्ठा

कवः कर्म काव्यम् , (कवि का कर्म ही काव्य है ) कथन किसका है --> कुन्तक का

औचित्य विचार चर्चा , ग्रंथ किस आचार्य का है --> क्षेमेंद्र का

क्षेमेंद्र के अनुसार औचित्य के प्रधान भेद हैं--> 27

क्षेमेंद्र ने रस का प्राण किसे माना है --> औचित्य को

ध्वन्यालोक की टीका 'ध्वन्यालोकलोचन' किसने लिखी --> अभिनवगुप्त ने

ध्वनि सिद्धांत का प्रादुर्भाव व्याकरण के स्पोट सिद्धांत से हुआ है

वैयाकरण ने वाक् (वाणी) के कितने प्रकार माने है?--> 4

१• परा, 2• पश्यंती, ३• मध्यम, ४• बैखरी

आनन्दवर्धन का समय है --> नवीं शती का मध्य

आनन्दवर्धन ने व्यंग्यार्थ के तारतम्य के आधार पर काव्य के कितने भेद किये है--> 3 ; ध्वनि, गुणिभूत व्यंग, चित्र

आनन्दवर्धन ने ध्वनि के कितने प्रकार माने है--> 3 ; वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि,रसध्वनि

आनंद वर्धन के अनुसार रीति के चार नियामक है -->वक्त्रोचित्य , वाच्योचित्य , विषयोचित्य , रसोचित्य

अभिनव गुप्त ने ध्वनि के कितने भेद किए हैं --> 35

मम्मट ने के ध्वनि के शुद्ध भेदों की संख्या स्वीकार की है --> 51

पंडित राज जगन्नाथ काव्य के कितने भेद किए हैं --> 4

उत्तमोत्तम--> उत्तम--> मध्यम-->

           साभार: हिंदी भाषा एवं साहित्य

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Monday, 14 June 2021

मजदूर थककर हो गए हैं चूर : गोलेन्द्र पटेल

 


मजदूर थककर हो गए हैं चूर//


मैं अपनी एक लुंगी पहनता हूँ

और एक ओढ़ता हूँ

और उसी से बाँधता हूँ पगड़ी

जब उससे टपकता है

श्रम का शहद 

और गमकती है 

जिंदगी की गंध

तब सब कहते हैं 

कि रब ने बनाया है मुझे मजदूरों का कवि

और मेरी कविता प्रस्तुत करती है 

शोषितों की छवि

जिसमें उन्हें हँसती हुई दिखाई देती है

हाशिए पर खड़ी नयी पीढ़ी

अचानक उनकी दृष्टि की सृष्टि कंपित होती है

और दीवार से फिसलने लगती है सीढ़ी

फिसलने वाले गाने लगते हैं

कि हर बार फिसलने पर सहारा देती है

शब्द की सत्ता

इस बार भी देगी


निर्भयता से बाँस की सड़ी सीढ़ी पर

कोई गिट्टी की भरी तगाड़ी 

तो कोई बालू की झउआ लेकर चढ़ रहा है

कोई लोक रहा है 

तो कोई नीचे से ऊपर फेंक रहा है ईंट

कोई मिला रहा है अढ़ाई एक कऽ मसाला

तो कोई करनी चला रहा है तेजी से

कोई बतिया रहा है साहुल-सूत के भाषा में

तो कोई खिसिया रहा है अपनी खिंचाई होते देखकर

ढलाई हो रही है ताबड़तोड़

जीतोड़ काम करने के बाद एक मजदूर दुःख की गठरी खोल रहा है

उसके चेहरे का रंग बोल रहा है

कि मजदूरी कम देने के लिए कमरतोड़ दाँव लगा रहे हैं साहब


सारे मजदूर थककर हो गए हैं चूर

हिसाब हो रहा है

पगड़ी में पोंछकर आँसू थाम रहे हैं पैसे

ऐसे लोगों का कैसे चलेता है परिवार

जो रोज़ कुआँ खोदकर पानी पीते हैं

क्या बताऊँ कि उनके बच्चे अक्सर भूखे सोते हैं

तो साहब दे देंगे पैसे?


(©गोलेन्द्र पटेल

14-06-2021)


मो.नं. : 8429249326

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