Sunday, 5 September 2021

शिक्षक का स्वप्न : प्रो. प्रभाकर सिंह {बीएचयू}

 शिक्षक का स्वप्न                  

                           {प्रो. प्रभाकर सिंह , हिन्दी विभाग, बीएचयू}


 "मेरे लिए शिक्षक होने का स्वप्न है जो विद्यार्थियों को साहसी और संवादी बनाए। प्रतिरोध करने से पहले प्रेम करने का गुर सिखाए। किताब में दर्ज जिंदगी की पहचान करने की समझ  तो पैदा करे पर उसके बाहर  प्रकृति, कला, संगीत और ज्ञान की तमाम दुनियावी बातों को महसूस करने और समझने का सहूर पैदा कर सके। किसी बड़े मंजिल में पहुंचने की सीख भले ना दे पर मंजिल में आने वाले रास्ते में फैली जिंदगी को जिंदादिली से जी लेने की अदा विकसित करने में सहयोगी बने। विश्वविद्यालय के क्लासरूम और पुस्तकालय में बिखरे ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता को  विकसित करने के साथ  विश्वविद्यालय के परिसर के स्थापत्य, पेड़, पौधे, चिड़ियों ,दुकानों,  आंदोलनधर्मी कोनों, संवादी अड्डों की पहचान करने  का हुनर दे पाए जिससे विद्यार्थी शिक्षा और  ज्ञान के ईन औजारों से समाज को खूबसूरत और लोकतांत्रिक बनाने  के लिए व्यावहारिक  रास्ते  तलाश सके। एक शिक्षक किसी विद्यार्थी को कक्षा में अव्वल आने का पाठ भले न पढ़ा सके पर उसको कुछ मौलिक रचने की सृजनात्मक और वैचारिक संवेदना जरूर सिखा पाए जिसकी स्मृतियां उसे मुस्कुराने और कभी ना हारने का बहाना दे सकें।" 


"बस कुछ ऐसा ही।"


प्रभाकर सिंह

प्रोफेसर ,हिंदी विभाग 

काशी हिन्दू विश्व, वाराणसी


                                                             {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com



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Saturday, 4 September 2021

शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल (बीएचयू)


 शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य //


वैसे आमतौर पर यही कहा जाता है कि पहला गुरु माँ होती है! लेकिन मेरी माँ कहती है। पहला गुरु भूख होती है। चलिये! मैं आप लोगों को कुछ समय के लिए अपने बचपन में ले चलता हूँ। गदहिया गोल से लेकर पहली कक्षा तक मैं पहाड़ी इलाके के एक प्राथमिक विद्यालय (घासीपुर-बसाढ़ी ,अधवारे ,मिर्जापुर) में शिक्षा ग्रहण किया हूँ। उस समय इस विद्यालय की एक विशेषता, यह थी कि इसका प्रत्येक विद्यार्थी दशरथ मांझी था। क्योंकि सभी के पास भूख थी। सभी सहपाठी पहाड़ों में गिट्टी फोड़ा करते थे। और कुछ मेरे सहपाठी आज भी पहाड़ों में काम रहे हैं। कुछ पत्थर प्लांट पर पत्थर चीर रहे हैं। मैं अक्सर इन लोगों से बातचीत करता रहता हूँ। मैं यहाँ उन सभी सहपाठियों के विषय में चर्चा न करके बल्कि एक ऐसे महात्मा सहपाठी का जिक्र करना चाहता हूँ जिन्होंने सर्वप्रथम अपने हिस्से की रोटी मुझे खाने को दिया है। और मेरी माँ बताती है कि उनकी माता ने मुझे अपना स्तन पान कराया है। बहरहाल, साधु स्वभाव के साथी थे। इसलिए मैं उन्हें महंत कहता था। परंतु वास्तविक नाम है इंद्रजीत सिंह। इनके गाँव के लोग इन्हें सुखु व सुखुआ नाम से संबोधित करते हैं। परंतु अब हमउम्र के लोग महंत ही कहते हैं। उम्र में मुझसे कम से कम डेढ़-दू साल बड़े हैं। इंद्रजीत पहाड़ों में काम करते हुए स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर लिए हैं। आगे की पढ़ाई इसलिए छूटी है कि हालात ने भयंकर लात मारी है। बातचीत के दौरान वे अक्सर कहते हैं कि हालात ठीक होने पर आगे की पढ़ाई जारी कर दूँगा। आप निश्चिंत रहिये।...आप से माफी चाहुँगा। आज मुझे तो अपने शिक्षकों को याद करना है और मैं अपने सहपाठियों को याद कर रहा हूँ।


अब आई दूसरी से तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई मैं अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय से ग्रहण किया हूँ। यहाँ के गुरुजनों में कोई खास बात नहीं थी। न ही इस विद्यालय से जुड़ी कोई दिलचस्प प्रसंग ही है। बस एक घटना याद आ रही है कि 26 जनवरी के कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी तभी कुछ लड़कियों ने मुझे अपना पहरेदार बना लिया था। वे सब मिलकर स्काउट गाइड का कमर बेल्ट चुराने के लिए मुझे दरवाजे पर खड़ा कर के करीब 20 बेल्ट गायब कर दीं। दो हप्ते तक सभी की धुलाई होती रही। इस पिटाई की वजह से लगभग एक दर्जन बेल्ट लड़कियों ने लौटाई। पर मुझे जो मिला था मैं तो उसी दिन प्राइवेट स्कूल के एक विद्यार्थी को बेच दिया था। लेकिन मैं बच गया क्योंकि वह बेल्ट उस गुरुजी के निगरानी में नहीं था। वह किसी और अत्यंत संवदेनशील शिक्षक के निगरानी में था जिनका केवल एक खोया था और वही मुझे मिला था पहरेदारी का पुरस्कार।


लेकिन गुरुजी मुझसे बहुत ही खफा थे। स्कूल से सटी एक पोखरी है। उन दिनों मेरे गाँव के विद्यालय में शौचालय नहीं था। शौच के लिए हम सब बाहर, यानी खेतों में और सड़कों पर जाते थे। एक दिन शौच के बहाने मैं और मेरे लंगोटी यार उसी पोखरी में बुल्ली-क-बुल्ला (यानी पानी के अंदर छुपा-छुपाई खेल) खेल रहे थे। बिल्कुल नग्न होकर। इस सुनहरा अवसर को आँसुओं में बदलने के लिए दूसरे गोल के एक विद्यार्थी ने हेड सर को खबर लगाई कि हम लोग मैदान के लिए नहीं बल्कि स्नान के लिए छुट्टी माँगे हैं। फिर क्या वहीं हुआ जो नहीं होना चाहिए था। सारा वस्त्र गुरुजी के हाथ में और हम लोगों बिल्कुल नंगा (निर्वस्त्र) मंदिर में लुका गये थे। हम सभी के गार्जियन आये और पिटाई हुई। फिर मैं तीसरी कक्षा के बाद एक प्राइवेट स्कूल में चला गया। मेरे गाँव में कई टोले हैं उसी में से चमरौटी टोला (हरिजन बस्ती) के एक प्राइवेट गुरुजी थे। उनका नाम राजेश है। पिताजी के मित्र थे। इसलिए मुझे अपने विद्यालय में पढ़ने के लिए ले गये। नाम लिखा गया। दो तीन महीने पढ़ाई हुई फिर स्कूल ही बंद हो गया। सब विद्यार्थी भिन्न भिन्न स्कूलों में नाम लिखवा लिए। कुछ दिन बाद प्राथमिक विद्यालय ऐकौनी (नियमताबाद, चंदौली) मेरे घर से करीब तीन-साढ़े तीन किमी. दूरी पर है। इसी स्कूल के चौथी कक्षा में मेरा दाखिल हुआ। वहाँ मुझे तीन गुरुजन मिलें। मनोज सर , ओझा सर और अजय सर से क्रमशः अंग्रेजी-विज्ञान ,हिंदी और गणित हम पढ़ाते थे। हमारा परिवेश और अन्य विषयों को भी तीनों लोग पारी पारा पढ़ाते थे। 


मैं इनके टेस्ट में प्रथम आता था इसलिए वे मुझे मानते थे। कुछ खाने पीने को भी कभी कभी देते थे। लड़कियों का टोली या लड़कों का टोली जब कुकिंग (खाना वगैरह बनाते थे) करते थे तो गुरुजन मुझे भी शिक्षक की तरह बैठा देते थे। मैं खुद को कभी क्लास का मनीटर नहीं समझता था। क्योंकि दूसरे पोजीशन से लेकर चौथे पोजीशन तक मेरे लंगोटी यार ही थे। यहाँ एक प्रसंग मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकत्था की याद आ रही है कि उनसे उनके गुरुजन झाडू लगवाते थे और पानी छिड़कवाते थे। खैर, मेरे जीवन में भी ऐसा हुआ है। मैं भी झाडू लगाया हूँ और पानी छिड़का हूँ। 


छठवीं कक्षा के लिए मैं अपने पोस्ट के पूर्व माध्यमिक विद्यालय महदेवाँ (साहुपुरी, चंदौली) में दाखिला लिया।  वहाँ कोई खास गुरु नहीं थे। सब खबुआहा थे। एक मैम थी खेत्री मिश्रा। वे दिन भर रसोइयाँ झाँकती रहती थीं। यहाँ का खाना (यानी दोपहर का भोजन) सब जगह से अच्छा था। पर पढ़ाई सबसे घटिया। मैं और मेरे मित्र दोपहर को भागकर, बावन बिगहवा में फुटबॉल खेला करते थे। चमकिल्ला में हम लोग कॉपी-किताब-कलम लेकर जाया करते थे। इसलिए भागने में आसानी भी होती थी। इसी बीच पूर्व माध्यमिक विद्यालय ऐकौनी (नियमताबाद, चंदौली) में दो नये अध्यापक आयें। क्रमशः राम अवध यादव और मुमताज अहमद। इन गुरुओं ने मेरी खोजी की। मेरे मित्रों से मुझे संदेशा भेजवायें कि वे मुझसे मिलना चाहते हैं। फिर क्या इसी का लाभ उठाते हुए। मैं महदेवाँ छोड़ दिया। महदेवाँ के हेड सर से कहा था कि गुरुजी मेरे माता पिता नानी के यहाँ जा रहे हैं मैं वहीं पढ़ूँगा। नाक-नूँक करते हुए उन्होंने एक दिन जुलाई में टीस काट दी। मैं ऐकौनी सातवीं कक्षा में एडमिशन ले लिया। पढ़ाई-लिखाई अच्छे से चलने लगी। एक दिन किसी काम से हेड सर ऐकौनी आये हुए थे और मैं ऑफिस में जा पहुंचा। देखते ही सर ने कहा कि क्या गोलेन्द्र इधर ही तुम्हारा ननिआउर है। मैं झूठ बोल दिया कि हाँ।


मुमताज सर और राम अवध सर कभी कभी टेस्ट लेते थे और पुरस्कृत करते थे। इनके पुरस्कारों को पाने में मैं गुरुवर विकास चौहान (एम.ए.पास एक मजदूर पर मेरे गुरु) का सहायता लेता था। वे अक्सर सुबह पाँच बजे मुझे अपने पास बुला लेते थे। और मेरा मार्गदर्शन करते थे। जो भी सवाल होता था उसका उत्तर अति सहजता से देते थे। शिघ्र ही समझ में आ जाता था क्योंकि मैं मजदूर का भाषा जानता हूँ। यह मेरे डीएनए में ही है। मैं नरेगा/मनरेगा वगैरह में काम करता था। वे यह बात जानते थे। उनके साथ भी मजदूरी किया हूँ। तब तक मैं कवि के रूप में आस पास के गाँवों में प्रसिद्ध हो चुका था। विकास सर के साथ गीत वगैरह भी लिखा। इसी दौर में भोजपुरी के कई दिग्गज कलाकारों से मेरा परिचय हुआ। पर वे जैसा गाना/गीत मुझसे लिखवाना चाहते थे। मेरी आत्मा को मंजूर नहीं था। वैसा लिखने के लिए। पर हालात कुछ ऐसी थी कि मैंने लिखा।


आठवीं के बाद मैं रामनगर के सरकारी कॉलेज यानी प्रभु नारायण राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ना चाहता था। जो घर से लगभग दस किमी. दूरी पर है। इसके लिए मुझे एक साइकिल की जरुरत थी। पैसा तो मेरे पास था नहीं। फिर सहपाठी साथियों के साथ लेबरई (यानी मकान का काम) किया। लेबर मंडी में हम सब खड़े थे। वहाँ से सब इधर-उधर, कहीं और चले गए। मैं बस हल्का काम चाहता था क्योंकि उस समय तो मुझे यह भी नहीं पता था कि क-एक-क मलासा बनता है जुड़ाई या ढ़लाई के लिए। बहरहाल, दस बजे के आपपास एक रिटायर्ड कर्नल आये। और पूछा कि छूटू मेरे यहाँ काम करोगे? उत्तर में मैंने प्रश्न किया 'सर' काम क्या है? उन्होंने आश्चर्य से मेरे ओर ताका जैसे मैं उनसे कोई बहुत ही जटिल प्रश्न किया हूँ। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। उन्होंने कहा कि बाबू अब तक सब लेबर 'चाचा' वगैरह से मुझे संबोधित किये हैं पर तुम 'सर'। मुझे नहीं लगता है कि तुम मजदूर हो। तब मैंने कहा कि सर! 'मैं कलम का मजदूर नहीं बल्कि कमल के लिए मजदूर हूँ। फिलहाल एक विद्यार्थी हूँ। और लेबरई का मुझे कोई अनुभव नहीं है। नरेगा/मनरेगा से भली भांति परिचित हूँ।' उनसे कुछ ऐसा ही कहा था। 17 दिन उनके यहाँ काम किया। संयोग से वे भी पटेल थे। मकान का डिजाइन किया जा रहा था। मिस्त्री भी पटेल थे और वे भी बनारस के ही थे। एक लेबर और थे जो गाजीपुर के थे और यादव थे। उन्हीं से मैं अपने हिस्से का भारी काम करता था। वैसे , दिन भर में मिस्त्री दादा 51 ईंटें ही जोड़ते थे। बस, सुबह में थोड़ा कठिन काम होता था। लेबरई आखिर लेबरई ही है। जब जादा भारी काम आया तो मैं धीरे से निकल लिया। तब तक काम भर पैसे हो चुके थे।


फिर मैं एक साइकिल खरीदा। उसके बाद रामनगर के राजकीय कॉलेज में एडमिशन लिया। वहाँ मैं चार साल पढ़ा। इस कॉलेज का कोई भी अध्यापक मुझे प्रभावित नहीं किया। हाँ, फिजिक्स जब फँसता था तो गंगा सर से पूछ लेता था तो वे बता देते थे। इसी क्रम में में इंद्रजीत सर और आर.पी. सर से हिन्दी , डॉ. कृपानाथ यादव सर से अंग्रेजी और फिरोज सर से कमेस्ट्री। और अन्य अध्यापकों ने भी कभी कभी मेरी कक्षाएं ली। यहाँ विद्यार्थीगण फेल बहुत जादा होते थे। इसलिए मैं गुरुवर विनोद पटेल सर (सैदपुर, साहुपुरी के निवासी) से सहायता ली। विनोद सर गणित और फिजिक्स पढ़ते हैं। वैसे हैं तो प्राइमरी के शिक्षक। ज्ञान इतना है कि इनसे पढ़कर कोई भी विद्यार्थी आई.आई.टी. आसानी से क्लियर कर सकता है। मुझे तो इनसे बहुत ही कम पढ़ने का अवसर मिला है। बहुत सारे बीटेक की परीक्षाओं को इन्हीं के आशीर्वाद से क्वालिफाई किया हूँ। वैसे विनोद सर दिलेर मनुष्य हैं। बस एक दोष यह है कि कभी भी टाइम पर नहीं आते थे। इनका मार्गदर्शन पाने का अर्थ है आपके पास धैर्य है। आप इंतजार करने में सक्षम हैं। बहुत इंतजार करवाते हैं। इन्हीं के एक मित्र हैं कल्लू गुरुजी। वे भी ऐसे ही हैं। सहज सरल हसमुख प्रकृति के धनी व्यक्ति।


इतना कुछ आप लोगों को बता दिया।  अब मैं बीएचयू  के गुरुजन की ओर बढ़ रहा हूँ। इस यूनिवर्सिटी में मेरा एडमिशन एक अजीब घटना है। मैं बीटेक, बीएससी, बीए की परीक्षाएं दिया था। सभी में क्वालीफाई हुआ था। बीएचयू में भी हो गया था। अब चिंता यह थी कि मैं क्या पढूं? मैं साइंस वर्ग का विद्यार्थी था। तो साइंस लेने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। पर मैंने महसूस किया कि सांइस में नहीं बल्कि साहित्य में मेरी रुचि है वास्तव में। साइंस तो समाज की वजह से जबरी पढ़ रहा हूँ।  क्योंकि हाईस्कूल के अधिकतर टॉपर समाज के भय से साइंस ले लेते हैं। उस वक्ता वे अपना नहीं, दूसरों का सुनते हैं। खैर, अंतिम तिथि 31 जुलाई को मैं एडमिशन ले लिया। मेरा फिस विकास साइबर रामनगर से जमा किया गया था। 


जैसा कि आप सभी कल के पोस्ट द्वारा यह बात जाने गये हैं कि मेरी पहली मार्गदर्शिका डॉ. शिल्पा सिंह मैम हैं। जिनसे मुझे मूलरामायण पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अब तक जितनी शिक्षिकाओं ने मुझे पढ़ाया है उसमें सबसे अधिक शिल्पा मैम ने मेरी कक्षाएँ ली हैं। और इस शिक्षक दिवस पर मेरी यही कामना है कि आगे भी शिल्पा मैम की तरह मार्गदर्शिकाएँ मुझे मिलें। बीएचयू में तमाम शिक्षक हैं पर गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल सर और गुरुवर सदानंद शाही सर बहुत ही जादा मुझे प्रभावित किये हैं। इन दोनों गुरुओ से मुझे साहित्यिक संस्कार प्राप्त हुआ है। इन गुरुओ पर यदि बातचीत करने लगूंगा तो दिन बीत जाएगा। बहरहाल, बस यह जान लीजिए कि "सद्गुरु के मुख का शब्द अनमोल/जो देता है लक्ष्य के द्वार को खोल।" साथियों! इसी क्रम में बतौर शिक्षक सुभाष राय सर भी मेरे लिए एक गुरु हैं। ठीक है। परीक्षा के बाद अपने शेष मार्गदर्शकों के विषय में चर्चा करूँगा। और उसी समय मैं आप लोगों को गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल सर और गुरुवर सदानंद शाही सर के विषय में विस्तार से सुनाउंगा। आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

©गोलेन्द्र पटेल

                                                           {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

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नोट :- मैं इस संस्मरण को पुनः संशोधित कर के प्रस्तुत करूंगा।



Wednesday, 25 August 2021

उपजीव्य कवि श्रीप्रकाश शुक्ल : गोलेन्द्र पटेल || संदर्भ के रचनाकार

उपजीव्य कवि श्रीप्रकाश शुक्ल : गोलेन्द्र पटेल

आलेख में संदर्भ के रूप में प्रयुक्त होने वाली रचनाएँ (संकलन जारी है):-


कविताएँ :-


1).

बुरा एक सपना देखा


रात बुरा एक सपना देखा

सूखी नदी के घाट को देखा

पाट सटी टूटी नाव को देखा

तिथिहीन पतवार को देखा

नाविक के अंत:घाव को देखा


रात बुरा-बुरा एक सपना देखा

सूखी नदी को सड़क बनते देखा

सरपट भगती मोटर कार को देखा

घाट को बस-स्टॉप में बदलते देखा

पतवार को खाक़ी लिबास होते देखा

नाविक को बस-ड्राइवर बनते देखा


बुरा स्वप्न बनारस में साकार देखा

असि-अस्थियों की सड़क को देखा

नदी के रक्त-कणों को धूल उड़ते देखा

'रेत में आकृतियाँ' की हर उकेर को देखा

श्रीप्रकाश शुक्ल की आँखों में मर्म को देखा

कि असि* को अस्सी घाट उतरते  न देखा !


( असि एक विलुप्त नदी है। बनारस में गंगा में मिलती थी। असि के नाम से ही अस्सी घाट है)


                                           ©वसंत सकरगाए

                                               10/04/2021


2).

बाढ़ में कवि


लड़कपन से बच गए
जवानी के सैलाब तक में ना फँसे
पर दो हजार सोलह की बाढ़ में
आखिर फँस ही गए
कवि श्रीप्रकाश शुक्ल
हतप्रभ हैं लोग
जो कभी किसी रमणी में न फँसा
दमड़ी में ना फँसा
आखिर वो बाढ़ में कैसे फँस गया?
बाढ़ में बवाल काटते
जनवादी कवि शशिधर से
इस बाबत जब पूछा गया
तो भुजा उठाकर कहा उन्होंने -
'असंभव है कवि का बाढ़ में फँस जाना
भगवा अफवाह है ये
उनका अगल-बगल
अड़ोस-पड़ोस
आकाश-पाताल
सब बाढ़ में डूब सकता है
पर वे नहीं
उनका घर नहीं
क्योंकि नहीं है उनकी कविता में सूखा
ना ही वह किसी गीलेपन के खिलाफ ही है
और फिर नामवर की जिस धरती पर वे रहते हैं
वहाँ बाढ़ का पानी
वो भी गंगा का
भला क्या बहाने और भिगोने जाएगा भाई?'
कहना उनका यह भी
कि पक्की कारपोरेट साजिश है यह
क्योंकि जो आज तक किसी भी
जल-जाल से बचा और बचता रहा
भला बाढ़ में उसका फँसना क्या!
और बचना क्या!
जो भी हो
पर कविता में सच यही है
कि धीरे-धीरे प्यारे कवि
बहुत प्यारे कवि
बाढ़ में फँसते गए
बढ़ती गंगा का पानी
उनकी ओर
कांग्रेसी राजनीति की तरह बढ़ा
सबसे पहले उनके दुआर को चपेटा
फिर चौहद्दी को
फिर दलान से घुसते हुए वहाँ पहुँचा
जहाँ मेज पर फैली उनकी कविता थी
और फिर उसी की ऊँचाई पर
अपनी संपूर्ण गहराई के साथ ठहर गया
किंतु बाढ़ के पानी से
सिमटते-सिमटते वे
भागे नहीं
रोए नहीं
हाथ नहीं जोड़ा
मंत्र नहीं पढ़ा
कोई अनुष्ठान नहीं किया
पीछे नहीं गए
बल्कि ऊपर
और ऊपर चढ़ते गए
और मेरी पुख्ता जानकारी में
फिलहाल ओरहन का वह कवि
ठीक इसी बाढ़ की आँच पर
एक काली धामिन की चकाडुब्ब सुनते
घर के ऊपरी आसमान में रहता है
इधर शहर में उनको लेकर कई कयास हैं
कोई कहता है कि वे बाढ़ में डूब गए
कोई यह कि अच्छा हो कि डूब ही जाएँ
कोई यह कि बह कर कहीं और चले जाएँ
कोई यह कि आखिर जरूरत क्या है
इस शहर को
रेत और पानी के कवि की
खर-पतवार से अधिक वह भला है ही क्या?
कोई-कोई तो यह भी कहते सुना गया है
कि अच्छा होता की बाढ़ हुमचकर
उनके ऊपर सदा-सर्वदा चढ़ी रहती
लोग तो अब खुलकर यह भी कहने लगे हैं
कि काश! इसी बाढ़ में
कब्र बन जाए इन मरगिल्ले हिंदी कवियों की
क्योंकि इन्ही ससुरों की वजह से
काशी नहीं बन पा रहा है क्योटो
दिल्ली की लाख कोशिशों के बावजूद
उधर गंगा के पानियों के बीच
घुप्प अँधेरे में बैठे कवि
फिलहाल मोबाइल की रोशनी में
अखबार पढ़ते हैं
ताजा खबर यह है
कि गंगा को अजीर्ण हो गया है
इसीलिए यह बाढ़ आई है
और अब बार-बार आएगी
यह पढ़ कवि का माथा गरम हो उठता है
आवेश में वे छत पर चढ़ आते हैं
और जोर-जोर से
न जाने किसको
ओरहन देते हैं
कि अजीर्ण, गंगा को नहीं
ज्ञान को हो गया है
सरकार को हो गया है
विद्वान को हो गया है
बवाल काटने वाले
केंद्रोन्मुखी भौकाल
अजीर्णता को भला क्या जाने
क्या समझें
जानता समझता और सहता
तो केवल कवि है
ज्ञान को
विद्वान को
सत्ता को
और पतितपावनी गंगा की बाढ़ को भी
बस वही जानता है
वही सहता है
और फिर सिरजता भी तो वह ही है
भले ही चाहे खुद फँसा
या फँसा दिया गया हो
बाढ़ में एक कवि!
 

©सर्वेश सिंह



3).

 वापसी 

धाराएं लौट रही है नदी में

जैसे लौटती है रौनक बस्ती में 

प्रवासी से पथिक बन

गुरूश्रेष्ठ भी लौट रहें हैं

सूने गेह में जालाने को दीपक


दीपक जलने से पहले 

आ चुकी है बिजली

और जा चुकी है 

निर्जन में घुली काली रात


बाढ़ का जाते ही

काफी जद्दोजहद यानी

चंदा-चुटकी , घुस -पेच के बाद

सबसे पहले आती है लाइट

जिससे घरों में ऑक्सीजन पहुंचता है

क्योंकि कॉलोनी के घरों में

लाइट मतलब लाइफलाइन है


रास्ते पर केवल कीचड़ है

कमल की उम्मीद तक नहीं है

हां एक केवट है

जो स्नेहोपहार को संजो रहा है

जैसे संजो कर रहा था भुभुक्षु


अक्सर सावन बीतते बीतते 

बनारस में आ जाती है बाढ़

जैसे शिव स्वयं गंगा को विदा कराने

आ जाते हैं काशी के घरों में


बनारस में बाढ़ 

शिव - शक्ति का संगम है,

सहवास है ,और प्रवास  है

वे बखूबी समझेंगे

जिनका नदी क्षेत्र में निवास है

        ©दीपक आर्यपुत्र ( मुसाफ़िर )

4).

(कविवर एवं आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल सर को समर्पित कविता)

'रेत में आकृतियों' को 

मिटा रही है बाढ़ ।

कठिन समय में 

धैर्य की परीक्षा देते हुए

'एक जोड़ा दुख' के साथ भी

मुस्कुराता है कवि 

वह जानता है दुख का स्वाद ।


बाढ़ का आना कवि के लिए 

महज सूचना नहीं है ।

खतरे की घंटी है,

विस्थापन के दर्द का उभरना है ,

पुनः एक बार ।


न जाने कितने बाढ़ो का भुक्तभोगी रहा है कवि ।

कविता में लिखता रहा है इसका इतिहास |

वह जानता है कि -

 बाढ़ महज प्राकृतिक आपदा नहीं,

 राजनीतिक षड्यंत्र भी है ।

 कवि देखता है,

 रैदास के बेगमपुरा में ,

बाढ़ का ग़म पसर चुका है ।

©प्रतिभा श्री




संपादक : गोलेन्द्र पटेल

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

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Monday, 23 August 2021

बाढ़-दर्शन की कविताओं पर आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल

बाढ़-दर्शन की कविताओं पर आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल
{नोट : यह आलेख गुरुवर डॉ. कमलेश वर्मा के मार्गदर्शन में पुनः प्रस्तुत किया जाएगा}
{डॉ. कमलेश वर्मा }

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कविता क्या है? कविता क्या नहीं है? कविता कहाँ है? कविता कहाँ नहीं है?....इस तरह के तमाम प्रश्नों पर प्राचीन काल से लेकर आज तक के अनेक विद्वानों ने विचार किये हैं और करते रहेंगे। खैर, यहाँ किसी विशेष विद्वान के माध्यम से चर्चा न कर के खुद मैं कविता के विषय में क्या सोचता हूँ। मैं उसका कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

प्रत्येक जीव का जीवन एक लीला है जो ईश्वरीय सत्ता से संचालित होती है। इसी सत्ता से सृष्टि का जीवन है। अतः जीवन ही कविता है। दूसरे शब्दों में, कविता मानवीय प्रकृति की प्रतिक्रिया का प्रदीप है जिससे जिंदगी ज्योतिर्मय होती है। सच तो यह है कि कविता कवि की तीसरी दृष्टि है जिससे वह दुनिया को देखता है, परखता है, समझता है, अपने आप को जानता है और पहचानता है। अर्थात् कविता परिभाषा की परिधि से परे परिक्रमा करने वाली संवेदना से संचालित प्रकाशपुंज है। यह अनुभूति का आलोक है। यह संवेदनाओं का सार्थक गान है। यह अत्यंत संवेदनशील एवं गतिशील विधा है। वर्तमान की त्रासदी से पीड़ित आत्मा के लिए कविता एक प्रकार की औषधि है जिसकी कोरोजीविता उसे स्वस्थ और समृद्ध करने में अहम भूमिका अदा करती है। इस वैश्विक महामारी में वह समाज के विसंगतियों एवं मानसिक विकृतियों को दूर कर के मानवीय सुंगध को सार्वभौमिक करने में सफल रही है।

कविता और गीत के संदर्भ में कोरोजीवी कविता के सूत्रधार मेरे काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि "कविता मनुष्य की चेतना की उदात्त अभिव्यक्ति होती है जबकि गीत उसके भाव जगत का एक तकनीकी कौशल।" यही उदात्त अभिव्यक्ति और कौशल ही बाढ़ की विभीषिका में हमारे महामंत्र हैं। अतः कविता की कंठी को फेरते हुए हमारा समय इसी का उच्चारण कर रहा है।

मनुष्य की वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण आज इस कदर चढ़ गये हैं कि सोशल मीडिया पर कविताओं की बाढ़ हमें दिखाई दे रही है। अब एक अच्छे कवि और एक अच्छी कविता की खोज करना बहुत ही श्रमसाध्य कार्य हो गया है। इस संदर्भ में मुझे आचार्य रामचंद्र शुक्ल का सुप्रसिद्ध निबंध  ‘कविता क्या है?’ में लिखी आगामी पंक्ति याद आ रही है कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जायेंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि कर्म कठिन हो जाएगा।’ 

इसी विडंबना को रेखांकित करते हुए मेरे मार्गदशक कवि सुभाष राय कहते हैं कि "केवल कवि होने से आप कवि रहेंगे। इस सूत्र पर अब कवियों का भरोसा बहुत कम रह गया है। जब से कविता के लिए छंद और लय की बंदिश ढीली पड़ी, किसी के लिए भी कवि बन जाना सहज हो गया। सोशल मीडिया पर बहुत सारे ऐसे लोग कविताएं पोस्ट करते नजर आते हैं, जो कवि नहीं हैं लेकिन उन्हें इतना ज्ञान हो गया है कवि होना कुछ विशिष्ट होना है। वे विशिष्ट होने के लिए कवि दिखना चाहते हैं और कवि दिखने के लिए हर संभव मारग अपनाते हैं।"

ऐसे में मैं खुद के भीतर के कवि को ढूँढ रहा हूँ और कविता लिखना सीख रहा हूँ। मैं कविता क्यों लिखना सीख रहा हूँ। यह मेरे लिए भी उतना ही जटिल एवं टेढ़ा सवाल है जितना कि इसका जवाब देना। बहरहाल, बस यह समझ लीजिए कि मैं कविता को लिख नहीं रहा हूँ बल्कि जी रहा हूँ। मेरे भीतर का कवि भीतरी आवाज के साथ साथ बाहरी आवाज बार बार सुनना चाह रहा है। और वह बिना बोर होये बार बार सुन रहा है। अर्थप्रवणता में धरती की धुन, हवा की सरसराहट, गगन का गर्जन, तरंगों का तर्जन, सन्नाटे की सिसकी,  चुप्पी की चीख, एवं गमी की गूँज सुन रहा है। और सुन रहा है समय के स्वर में तड़पती आत्मा की तान एवं रुदन का गान। जहाँ है निराशा में निराकरण के शब्द। जिससे मैं कविता गढ़ रहा हूँ।  मेरा काव्य संसार केवल मेरा नहीं है वह हर असहाय आदमी का है जिसकी आँखों में मैं अक्सर झाँका करता हूँ।

मेरा कवि मन कविता के लिए नये शब्दों की तलाश में लोक की ओर चला जाता है और वहाँ से गँवई गंध में सना हुआ शब्द चुन कर अनुभव के आकाश में जहाज की तरह उड़ना चाहता है। जिसमें मेरी जिज्ञासा एक पोयटिक पायलट की तरह बैठना चाहती है। सृजनात्मक सृष्टि की संवेदनाएँ मेरे साहित्यिक संस्कार को परिष्कृत कर रही हैं। इसलिए मेरी कविताओं की जड़ें जमीन में गहराई तक धँसी हुई हैं। और धँस रही हैं। सकारात्मक संभावनाओं के सुमन की तरह पुष्पित होने वाली औषधि है मेरी कविता। उसकी प्रत्येक पंखुड़ी में पीड़ा का पराग है। 
जिसका स्वाद चखना ही सहृदयों के लिए आनंद की अनुभूति है। तो उसके दर्द के लिए कड़वी दवा भी।

अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ कि कविता की बाढ़ में मेरी भी कुछ कविताएँ बहेंगी। इसका मुझे दुःख नहीं है। मुझे दुःख इस बात की है कि जिस सुंदर शब्द की तलाश मैं कर रहा हूँ वह अभी तक मुझे मिला ही नहीं। शायद यह खोज जिंदगी भर जारी रहेगी। समय का शब्द ही साहित्य है और कवि का काव्य भी। इस संदर्भ में मुझे रघुवीर सहाय के काव्य संकलन “सीढ़ियों पर धूप में” की भूमिका में कवि-चिंतक अज्ञेय द्वारा लिखी गयी पंक्ति याद आ रही है कि “काव्य सबसे पहले शब्द है। और सबसे अंत में भी यही बात बच जाती है कि काव्य शब्द है।”

बाढ़-दर्शन
(केंद्र में काव्यगुरु) //

प्रिय मित्रों! सहृदय साथियों!  
                                       विश्व के मानचित्र में भौगोलिक दृष्टि से हमारा प्यारा भारत एक प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश है। वृहद भौगोलिक आकार, पर्यावरणीय विविधताओं और सांस्कृतिक बहुलता के कारण भारत को "भारतीय उपमहाद्वीप" और "अनेकता में एकता वाली धरती" के संज्ञान से संबोधित किया जाता रहा है। भारत में अनेक तरह की प्राकृत आपदाएं हैं लेकिन इन आपदाओं में सबसे अधिक प्रभावशाली एवं प्रलयंकारी बाढ़ है। दुनिया के कई देश बाढ़ से प्रत्येक वर्ष ग्रसित होते हैं और उसके विभीषिका की अग्नि में जन-धन , जमीन-जंगल, एवं जान-माल सब कुछ जलकर चिता की राख की तरह जल में बह जाते हैं। सभी सपनें स्वाहा हो जाते हैं। जीवन को अत्यधिक क्षति पहुँचती है। इस होनी की हानि से उबरना बहुत ही कठिन हो जाता है किसी भी देश के लिए।

भारत में बाढ़ लगभग हर साल आती है। इसकी उत्पत्ति और इसके क्षेत्रीय फैलाव में कहीं न कहीं आधुनिक मानव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मानवीय क्रियाकलापों , अँधाधुँध वन कटाव, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, प्राकृतिक अपवाह तंत्रों का अवरुद्ध होना तथा नदी के तटीय क्षेत्रों में अवैध कब्जा और बाढ़ कृत मैदानों में मकानों की बनने की वजह से बाढ़ की तीव्रता, परिमाण और विध्वंसता बढ़ रही हैं। समय के साथ परिवर्तन होना नियति है जिसका सकारात्मक पक्ष जीवन के लिए जितना लाभदायक है उससे कहीं अधिक नकारात्मक पक्ष विनाशकारी है।  नदियाँ नहरों में परिवर्तित हो रही हैं और कुछ नालों में भी। गाँव के विशाल सरोवर बउली में तब्दील हो चुकी हैं। बहुत से ताल-तलई-तालाब पट गये हैं। जिसकी वजह से भी बारिश के मौसम में बाढ़ की विभीषिका को विनाशकारिता के लिए शक्ति प्राप्त होती है। 

असम, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तराखंड राज्य सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में से हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर-भारत की जादातर नदियाँ विशेषकर पंजाब और उत्तर प्रदेश में बाढ़ लाती हैं। इधर पिछले कुछ दशकों से आकास्मिक बारिश वगैरह की वजह से राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश में भी बाढ़ आई हैं। लौटती मानसूनों की वजह से दक्षिण भारत में भी कभी कभी अचानक तेज बारिश होती है और बाढ़ जैसी स्थितियाँ हमारे सामने नज़र आती हैं। वहाँ की नदियाँ जलमग्न होकर आसपास की तटीय जिंदगी को प्रभावित करती हैं। अतः बाढ़ का मुख्य कारण भारतीय मानसून की अनिश्चितता तथा वर्षा ऋतु के चार महीनों में भारी जलप्रवाह है।

बाढ़ की वजह से समाज का सबसे निचला तबका, गरीब, मजदूर एवं किसान प्रभावित होते हैं। बाढ़ जन-धन के साथ साथ प्रकृति को भी क्षति पहुचाती है। बाढ़ जब आती है तो वह संकट का संगीत और तबाही की तान कल-कलाहटी स्वर में सुनाती है। जहाँ नदियों की नाराजगी बजाती है बारिश की बाँसुरी। हमें रुदन का गान सुनाई देता है। और सरसराहटी धड़कन की धुन में असहाय की सिसकन भी। स्पष्ट हो जाता है स्वर। हमें पता चलता है कि किसानों के सपनों को और तटीय जिंदगी की उम्मीदों को डूबो देती है बाढ़।

हम बाढ़ में बहुत से मंदिरों , महजीदों और मनुष्यों को भी डूबते देखते हैं और देखते हैं कि बेजुबान जानवर भी डूब-डूबकर बेमौत मर जाते हैं। इसी बीच नदियां अपनी यात्रा के दौरान व्यवस्था को आइना दिखाती हैं और राजनीति के वास्तविक रूप से हमारा परिचय भी कराती हैं। बहरहाल, हम  जलमग्न नदियों के बहाने असहाय आँखों में बाढ़ का दर्शन कर रहे हैं। आजकल आप देख-सुन रहे हैं कि खबरें आ रही हैं। यू.पी. में  वाराणसी-प्रयागराज समेत लगभग 24 जिलों के 1200+ गाँव बाढ़ के चपेट में हैं। बनारस में गंगा अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ दी है वह लगभग 72+ मीटर की ऊँचाई तय कर ली है। इस शहर में कुल 88 घाट हैं और सब डूब गये हैं। गंगा के तटीय गाँवों में पानी घूसने की वजह से हजारों एकड़ जमीन की फसलें बर्बाद हो गयी हैं। साथ ही साथ शहर की दुसरी नदी वरुणा किनारे रामेश्वर, लक्ष्मीपुर, परसीपुर, रसुलपुर, जगापट्टी, नेवादा, औसानपुर, पाण्डेपुर, खंडा, तेंदुई, सत्तनपुर, गोसाईपुर इत्यादि गाँव की फसलें भी जलमग्न हैं। 

बिहार से बनारस तक के बाढ़-दर्शन में हमने देखा कि कैसे बाढ़ में बेजुबान, भँवर में भगवान एवं आँसुओं में इंसान डूब रहे हैं। कोरोनाकाल में शहर से गाँव लौटे हुए मजदूरगण पुनः नये छत की तलाश में अन्यत्र विस्थापित हो रहे हैं। विस्थापन का दोहरा दर्द जनता सह रही है। और इसी विस्थापनी विभीषिका को रेखांकित करते हुए कवि केदारनाथ सिंह अपनी कविता 'पानी में घिरे हुए लोग' में लिखते हैं कि 
"पानी में घिरे हुए लोग/प्रार्थना नहीं करते /वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को/और एक दिन/बिना किसी सूचना के/खच्चर, बैल या भैंस की पीठ पर/घर-असबाब लादकर/चल देते हैं कहीं और।" 

इस दोहरी त्रासदी का शिकार पशुओं तक को होना पड़ा है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से पंक्षीगण जिन क्षेत्रों में विस्थापित हुए हैं। वहाँ उनके लिए चारा नहीं है। सब चहचहाने के बजाय चिहुँक रहे हैं। मेरे इलाकों में कौए उन पंक्षियों को नये घोंसले का निमार्ण करने से रोक रहे हैं। कर्कश काँव काँव से साफ स्पष्ट हो रहा है कि सब मिलकर उन्हें भगा रहे हैं।

विचारणीय बात यह है कि जिन लोगों का घर ढह गये हैं, अनाज नष्ट हो गये हैं। जीविका के सारे स्थाई साधन धाराप्रवाह में प्रवाहित हो गये, गाय-भैंस, बकरी-बकरा, मुर्गी-मुर्गा एवं सब कुछ नष्ट हो गये हैं। उनके ऊपर क्या बीत रही है। उनके दुःख-दर्द के कल्पना मात्र से हमारी रूह कांप जा रही है। जिसका कोई अपना डूब गया है। बहुत से बच्चे अनाथ हो गए हैं बहुत से माता पिता अपने बच्चे खो दिये इस बाढ़ में।
 दिल को चिर देने वाले दृश्य हमारी नजरों के सामने आ रही है। जैसे ढहे हुए घरों में दबी लाशें, डूब रही विधवा माता के साथ नवजात शिशु, एक अबोध बच्ची और एक छोटा बच्चा, हर दृश्य हृदय को झकझोर रहे हैं। हम इन्हीं दिल चिरने वाली चित्रों को, दृश्यों को देख रहे हैं। और उन्हें कविता में सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें कविताओं में खींच रहे हैं। मैं "बाढ़" शीर्षक नामक कविता लिख कर रो ही रहा था कि गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल की एक तस्वीर मेरे हाथ लगी। जिसमें वे एक ट्रैक्टर के इंजन पर बैठ कर अपने घर को अत्यंत आत्मीयता के साथ निहार रहे हैं और चारों ओर जल ही जल दिखाई दे रहा है। यानी गंगा स्वयं उनके द्वार पर आ गयी है। 

मैं अपने गुरु की उस अवस्था का अवलोकन करने का प्रयास कर हूँ और सोच रहा हूँ कि आखिर बाढ़ में कवि किस का दर्शन कर रहा है। अपने घर का जहाँ नदी कुछ क्षण विश्राम करना चाहती है। मैं कभी कल्पना में, तो कभी यथार्थ के नदी में गोता लगाने लगा। फिर ठहर कर मैंने देखा कि  "गंगा में गुरु" से लेकर "गुरु की आँखों में गंगा" का दर्शन कर रहा हूँ, मैं। उस दर्शन को, मैं कविता की वाटिका में औषधि के पौधों की तरह रोप रहा हूँ। जिसकी पत्तियाँ, जड़ें, फल-फूल एवं टहनियाँ आदि एक दिन हमें इसी तरह के दृश्यों के दर्द से छुटकारा दिलाएगी।

हिंदी के तमाम कवि अपनी कविताओं में 'काशी में आई बाढ़' का सजीव चित्रण किये हैं। बहुत ही आदर के साथ केदारनाथ सिंह, त्रिलोचन व ज्ञानेंद्रपति आदि कवियों का नाम लिया जा सकता है। "बनारस में बाढ़ और हिंदी कविता" नामक आलेख में इस बिंदु पर अलग से विचार-विमर्श व अध्ययन-अनुशीलन किया जाएगा।
(क्रमशः)
©गोलेन्द्र पटेल
प्रकाशन तिथि : 23/08/2021
                                                   {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com




Friday, 20 August 2021

बाढ़ और बनारस के कवि श्रीप्रकाश शुक्ल पर केंद्रित चार कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

 बाढ़ और श्रीप्रकाश शुक्ल पर केंद्रित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की चार कविताएँ :


1).


भँवर में भगवान//


इश्क में इनसान

भँवर में भगवान

डूब रहे हैं


डूब रहे हैं

दुःख में देश 

बुरे समय में संदेश


डूब रही हैं

पीड़ा में पहचान

आँसुओं में आन 


आह! डूब रही है

बाढ़ में बस्ती

मँझधार में मस्ती


डूब रही हैं

तकलीफ़ में तान

बारिश में शान


डूब रही हैं

जिंदगी-बंदगी

दुनिया-जहान


डूब रहे हैं

घर के रोशनदान

और साज़-सामान


डूब रहे हैं

गंगा में गान

पउड़ते पिता के कान

जिसमें एक नन्ही बच्ची

अपने पिता से कह रही है

मुझे छोड़ दीजिए

और खुद को बचाइए


लेकिन कोई पिता 

भला  पुत्री को  कैसे छोड़ सकता है

डूबने के लिए

और पिता  उसे लेकर साथ पउड़ पड़ते हैं

बीच नदी में!


ठीक इसी समय मुझे याद आतें हैं अपने गुरु के वे कथन

जो उन्होंने घाट पर कहे थे

इस पिता के संदर्भ में-


संघर्ष के शब्दों से बनी हुई कविता

बढ़ियाई सरिता में 

डूबते हुए  मनुष्य को

धारा के विपरीत तैरने के लिए ताकत देगी


और उम्मीद की उमंगें 

उसे तरंगों से अधिक बल देंगी


जिससे वह जल को पीछे ठेलता हुआ

किनारे की ओर आगे बढ़ेगा

और जान बचाने की संभावना बढ़ जायेगी ।


इस डूबते  पिता के पास थकान की थाप है

जो पानी पर थप-थप पड़ रही है

जिसके सहारे  मौत से लड़ते लड़ते

दोनों ही किनारे पर आ गये!


रचना : 20/08/2021

2).

मँझधार में माँ//


सावन में सत्ता के सेतु पर सेल्फी खींचने वाले 

बहुत हैं 

बाढ़ में डूबी बस्तियों को देखने वाले 

बहुत हैं

घड़ियाली आँसू बहाने वाले 

बहुत हैं 


और हां

कविता लिखने वाले भी बहुत हैं !

लेकिन परपीड़ा को प्रत्येक पंक्ति में 

दर्ज करने वाले कौन हैं

यह हम सब जानते हैं 


पानी का एक इतिहास यह भी है 

कि मनुष्यता का मरना

लाशों की गणना करना

उम्मीदों को अग्नि देना

और सुख को छीन लेना

यानी हर आन्दोलन का जड़ है पानी


मँझधार में माँ कह रही है

कि कुएँ का जल जहर है 

तो अमृत भी है


नदियाँ प्रश्न हैं

तो उत्तर भी!


बाढ़ की विभीषिका

मृत्यु का खेल खेलती है

लहरें आ रही हैं पास

सावधान! गड़बहना!

मुझे कसकर पकड़े रहना


माँ! मुझे जोर से भूख लगी है 

एक शिशु चिचोड़ रहा है चूचुक

एक को लगी है प्यास

पीड़ा की पतवार 

केले की बेड़ी को खे रही है

किनारे की ओर


बेचारी लाचारी वक्त की मारी विधवा नारी

फँसी है भय के भँवर में 

अपने बच्चों के साथ

हाथ में लिए लम्बा बाँस


मैं उसके दुःख को लिख नहीं पाऊँगा

आह! मेरा आँसू टपक रहा है

मैं एक गोताखोर की तरह 

गम की गंगा में डुबकी लगा रहा हूँ

जहाँ मुझे अपने गुरु से प्राप्त हो रही  है

श्वास रोकने की शक्ति

और वह रेत की आकृति भी 

जिसे उन्होंने गढ़ा है मेरे लिए


केवल कवि की कविता का ही नहीं

बल्कि इस वक्त रेत की माँ का कल-कल कराह भी

शामिल है इस माँ के दुःख में

इन बिलखते बच्चों के रुदन में!


रचना : 19/08/2021

3).

छत पर चिता //


इच्छाओं की इमारतें भहरा रही हैं

गम के गड्ढे में

इनसानियत देख रही है

तालिबान की आँखों में बढ़ियाई हुई है नदी


व्यवस्थाएं ख़ुश हैं

अपने अपने  मत पर


ढेर सारी आत्मा डूब चुकी हैं रक्त में

बची हुई डूब रही हैं 

आँसुओं में


आह! श्मशान घाट पर नहीं

न ही सड़क पर

लाशें जल रही हैं छत पर!


मेरे गुरु की गली में कीचड़ है

कमल उगेगा या नहीं

पर काशी में जिसका चिह्न है 

वह साला लीचड़ है


लोकतंत्र के लाल रंग में रंगा हुआ लंपट है

उसके द्वारा भाषणों में फेंका गया

आश्वासन का शब्द

दुःख के दरवाजे की चौखट है!


मेरी कविताएँ यात्रा कर रही हैं

शहर से गाँव की ओर

गड़ही में खिली है कुमुदिनी

और खिले हैं चहुंओर अनेक प्रकार के फूल

मुरेड़ पर बैठी हुई चिड़िया 

सुना रही है अपना हालचाल


इस गोधूलि वेला में 

धुएँ के साथ धूल

बारिश के विरुद्ध 

जा रही है वहाँ 

जहाँ उसे जाना है


खैर जैसे जंगल का शहंशाह

जब हथनी के बच्चे का करता है शिकार

तब वह चिंघाड़ती है

पूरी ताकत के साथ


ठीक वैसे ही

चिता के पास चिंघाड़ रही हैं इस समय हिलोरें!


रचना : 18/08/2021

4).

बाढ़ में बेचारा//


आने और जाने के बीच है

खतरनाक क्रिया का क्रंदन

कवि, कोविद और किसान के नयन में 

बढ़ियाई नदी का नहीं हुआ अभिनंदन


देख रही है कविता

और देख रही है

कि सीढ़ियों पर से जा रहा है सावन

जहां वसंत की प्रतिक्षा में बैठे हैं श्रीप्रकाश शुक्ल


संवेदना की सरिता में आई बाढ़

एक न एक दिन लौट जाती है

पर आँसुओं की बाढ़ डटी रहती है

ज्यों का त्यों दिल के दरवाजे पर


दिमाग का दीया जला रहा है दृश्य

मनुष्यता की मणि चमक रही है चहुंओर 

जिसकी किरणें तैर रही हैं नदी में

जहां स्नेह के गेह में फैल रहा है  उजास


हवा के विरुद्ध

उम्मीद की उमंग खे रही है नाव

घाव ताजा कर लौट चली है धार

अपने गंतव्य पथ पर


पर आह!घाट  'बेचारा' पर दोहरा घात

जहां गुरु के सजल नयन में देख रहा हूँ

कि  इस बार भी

आश्वासन की कटिया में चारा गूँथकर

उसे मारा जाएगा

बेमौत मछली की तरह


घर पर नहीं

इसी घाट पर


क्योंकि घर जो है उसका 

वह तो ढह गया है!


रचना : 17/08/2021

                                                              {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

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ईमेल : corojivi@gmail.com












Monday, 16 August 2021

बाढ़ में बनारस और श्रीप्रकाश शुक्ल : गोलेन्द्र पटेल || Golendra Patel

 बाढ़ और श्रीप्रकाश शुक्ल पर केंद्रित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की चार कविताएँ :-

                                  {तस्वीर साभार : अमन आलम , 
हिंदुस्तान : पत्रकार}
                           (अपने काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल को समर्पित चार कविताएँ)

1.
इस गोधूलि बेला में //

गंगा से बीहड़ गुरु के उर में उठ रही है तरंग 
उलझन, द्वंद्व और रहस्य तीनों बैठे हैं घाट पर  
काशी के कोरोजयी कवि के संग

इस पार
मनोभूमि से मणिभूमि तक फैल गयी है गंगधार
सांत्वना का सार सिद्ध हुआ निराधार
छिन्न भिन्न हुआ सुख का आधार
सब आश्वासन हुआ बेकार
जनता पड़ी  है लाचार
उधार का आटा सान रही है भूख
दुख! दुख! दु...ख...दु...ख
बूढ़ी आँखें उन सीढ़ियों पर गयी हैं झुक
जो डूब चुकी हैं आँसुओं के बाढ़ में
रुक रुक रु...क...रु...क
रो रही है केदारनाथ सिंह की आत्मा

मानसरोवर पर है रोष की रदी
आह! झोपड़ी उजाड़कर 
खुश है नदी?

लाशों की गंध गोधूलि बेला में
मणिकर्णिका से आयी है
पक्का महाल में महसूस कर रहे हैं श्रीप्रकाश शुक्ल
यानी मेरे गुरु गा रहे हैं वह गान
जो कभी तुलसी, तो कभी निराला की रही है तान

नूतन धुन और सरसराहटी स्वर में
यह तान सुन रहा है जहान
उनकी कविताओं में

चिहुँक रही है शोक में डूबी हुई सोनचिरई
और बारिश में भींगी उसकी सखी सिरोइल
समय के शीत से काँप रही है
भाँप रही है कि
धर्म की नगरी में धर्मराज का भिक्षुक रूप
आखिर क्यों है?

रचना : 13/08/2021

                                              {तस्वीर : गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल}

2.

प्रस्ताव //

अगस्त के महीने में हिमालय ने
अपनी बेटी नदी को 
अपना वर चुनने को कहा 
तो वह बहुत ख़ुश हुई
इतनी ख़ुश कि
उसकी हर्षित हिलोरें हवा से हँसी ठिठोली करती 
पहुँच ही गईं  सागर के पास!

सागर ने प्रस्ताव रखा कि
मैं मई में करूँगा शादी
क्या तुम आओगी?

नदी चुप है आज तक!

रचना-14/08/2021

                                         {कुएँ से पानी खींच रहे हैं गोलेन्द्र पटेल}
3.

कुएं का दुःख //

बरसात में सरोवर ख़ुद को समुद्र समझता है
गड़ही अपने को गंगा
पर बेचारा कुआँ दुखी है
कि उसके जलीय ज़हर को क्यों पी रही है जनता!

मुझे मेंड़ पर याद आते हैं मेरे मार्गदशक
और उनके  लिखे हुए  वाक्य
जो वे लिखे हैं 
मचान पर बैठकर
मेरे लिए
रो रोकर!

रचना-14/08/2021

4.

बाढ़ में बनारस //

नदियाँ नाराज हैं उन नगरों से
जिनके सीवरों का झाग 
उन्हें चिता की आग की तरह झौंस रहा है
जैसे वे हैं कोई लाश

खास बात यह है कि किनारों पर
अवैध कब्जा जमाये विकास कर रही है सत्ता
जहां कंपनियाँ उसमें फेंक रही हैं 
कूड़ा कचरा 
और लत्ता...

हताश जनता देख रही है कि
उसके जल और चीनी से बना रस
अब हो चुका है जहर
ठीक वैसे ही है
जैसे बाढ़ में है अपना प्यारा शहर-
बनारस

पर  विकास के कचरे के विरुद्ध 
पर पीड़ा के पहरेदार 
अभी भी खड़े हैं कुछ लोग
कवि ,कोविद और हल योग

दीन-दुखियों के साथ खड़ी है हिंदी की कविता भी 
जहां दोहरी विस्थापित जिंदगी की गीता
लिख रहा हूँ मैं
अपने गुरु की आँखों में देखकर

रो रोकर!

रचना : 16-08-2021

                                                            {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com



Thursday, 12 August 2021

बाढ़ और श्रीप्रकाश शुक्ल पर केंद्रित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की चार कविताएँ

 

बाढ़ और श्रीप्रकाश शुक्ल पर केंद्रित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की चार कविताएँ :-

                                           {फोटो साभार : कुमार मंगलम}

1.

रेत डूब


वरुणा और असि के द्वाब में बसी काशी

अब हो चुकी है बासी

इन्हें सरकारी कागजों में घोषित कर दिया गया है नाला

धर्म की नगरी को नगरपालिका की गायों की तरह दुह रहा है साला


बच्चे माँ की कोख में ठूँस रहे हैं पत्थर

लोग अवैध कब्जा किये जा रहे हैं नदियों का किनारा

और दहाड़ मारकर रो रही है 

कबीर का लहरतारा


बुद्ध और रैदास सुन रहे हैं रुदन का स्वर

तुलसी घाट पर 'राग नया अनुराग नया'सुन रही है गंगा

अपने शब्दसाधक पुत्र श्रीप्रकाश शुक्ल से


मैं त्रिनेत्र की आँखों में देख रहा हूँ 

उत्तर  और दक्खिन का दुख

और सोच रहा हूँ

कि जैसे बाढ़ में डूब जाता है खेत

ठीक वैसे ही

अपने आँसू में 

डूब गयी है रेत

                                  {फोटो साभार : गुरुवर डॉ. विजयनाथ मिश्र}

हालात के मारे लोगों को 

लहरें लात मार रही हैं 

और टूट रहा है लोक का लय


जहां मेरे गुरु गढ़ रहे हैं पक्का महाल में मानस का मंदिर

जिसमें उस देवता की मूर्ति बसी है 

जो कभी मरा है बेघर होकर

रो..  रो.. कर!

रचना : 12/08/2021


                      {घर के सामने का दृश्य है। गुरुवर ट्रेक्टर पर से घर को देख रहें हैं।}

2

कभी- कभी दुख का चेहरा धरे आ जाता है उजास


घोंसलों में मौन पक्षी, चुप खड़े बबूल

चारों तरफ गंगधार, डूबा घर  दुआर

ट्रैक्टर पर बैठ निज घर को निहार रहा वो कवि 

जो तूफ़ानों से लड़ता रहा, लहरों से भी

अडिग, अविचलित श्रीप्रकाश शुक्ल


समय की आहट मिल रही नदी के कल कल में

आयी है शिव की सलाह मान कवि के घर

अनुग्रह जताने, उसका जो किया उसने

जब उजाड़ा जा रहा था तटग्राम धू-धू

अंधेरे के आक्रमण के विरुद्ध जो डटा रहा


वह गुरु मेरे, डूबते गांवों, घरों की पीड़ा

पर चिंतित, कुछ ऊंचाई से मुस्करा रहे

जान रहे वे, कि क्यों आयी है गंगा माई द्वार पास

कभी- कभी दुख का चेहरा धरे आ जाता है उजास

रचना : 11/08/2021

                           साभार : जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ (सं. डॉ. सुभाष राय)

3.

मल्लू मल्लाह

(अपने काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल को समर्पित)


मेरे समय के शब्द हैं मेरे गुरु

यह मैं नहीं

उनकी कविताएँ कह रही हैं

उस मल्लू मल्लाह से 

जिसकी नाव खड़ी है किनारे

और कुछ इधर-उधर औंधी पड़ी हैं


उसकी मँड़ई में लालटेन भभक रही है

भूख के भूगोल में जन्म ले रहा है भय

भकुआई भँवरी आ गयी है पास


हिलोरों से हताश हो रही है 

तटीय जिंदगी

नगर पालिका के कूड़े की मानिंद

बिखर गई है गंदगी


मणिकर्णिका पर धुआँ ही धुआँ है

घाटों पर पसर गया है दुख

आह! शिव! 

सावन में टूट जाता है विश्वास!


गंगा की गोद में हँसने वाले बच्चे रोने लगते हैं

बिलखते बिलखते भूखे पेट सोने लगते हैं


उसके जैसे अनेक लोगों का चूल्हा

विस्थापित हो रहा है

कोई कह रहा है कि

बाढ़ में बोझ है अपना आँसू

इसे छोड़ दो नदी में


मेरे गुरु वही आँसू 

कविता की कटोरी में इकट्ठा कर रहे हैं

जिसमें इनसानियत की इंक घोलकर

कभी लिखा जाएगा काशी का इतिहास।

रचना : 13/08/2021


4.

उस पार


सब्र का बाँध टूटते ही ध्वस्त होता है नदी का धैर्य

जन जन के जिगर में गूँजता है गर्जन तर्जन


हवा हँस हँस कहती है कि

हरियाने का हुनर दिखा रही हैं हिलोरें

सीख लो सरोवर 

बाढ़ में सागर से संस्कार


तरंगें होती हैं जिसकी ताकतवर

उसे नहीं होता है किसी भी प्रकार का कोई अहंकार


चेतना की चट्टान जब सह नहीं पा रही है पानी का प्रहार

शब्दसाधक श्रीप्रकाश शुक्ल समय के श्यामपट पर समझा रहे हैं

कि निराशा की नदी में जो खे रहे हैं  पतवार

लोगों की पीड़ा उन्हें  धक्का देकर पहुँचा रही है उस पार!

रचना : 12/08/2021

                                                 {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}


नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com



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