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“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
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आज़ादी का अमृत महोत्सव
पचहत्तर साल बाद आज़ादी का अमृत महोत्सव
वहाँ मनाया जा रहा है
जहाँ हर आदमी नंगा है
उनका प्रधानमंत्री भिखमंगा है
उनके घर नहीं, तिरपाल पर तिरंगा है
जो धूमिल की आँखों में
सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है
सावन में बहुत घाम है
मानो किसान-मजदूर के लिए सुबह ही शाम है
उनके वोट का दाम सड़े हुए गेहूँ की एक रोटी है
उनका नारा है - 'तुम मुझे अन्न दो , मैं तुम्हें वोट दूँगा'
लोकतंत्र के लोक और लोग अब सवाल हैं
संविधान के शब्द संसद की सड़क पर उतर गये हैं
लेकिन संत और सिपाही उनके ढाल हैं
चारों ओर आश्वासन की आवाज़ गूँज रही है
धरती धधक रही है
सारे जंगल जल रहे हैं , गाँव-शहर सुलग रहे हैं
नदी-समुद्र के जल खौल रहे हैं
पर , आसमान में धुआँ तनिक भी नहीं है
मौसम मुस्कुरा रहा है मंद-मंद
भूख गुनगुना रही है आँत में आँसू का छंद
उनको चारण कवि का कलाकंद पसंद है
लेकिन वे समय सापेक्ष सत्य के स्वर से डरते हैं
पहाड़ की चीख से चौक चौंक रहा है
चाय की चुस्की से उत्पन्न
बहस की बातें लंबी उड़ान भर रही हैं
हृदय को चीरता हुआ चित्र अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर है
चूल्हा गर्भवती चुहिया को देखकर
लज्जा महसूस कर रहा है
उसकी दृष्टि में देश का नक्शा उसकी पीड़ा की परछाँई है
अँधेरे का आरा आज़ादी को तीन बराबर हिस्सों में काट चुका है
(आ-ज़ा-दी : एक खंड उनका है
दूसरा खंड इनका है
तीसरा खंड बाँटने वाली बिल्ली की है
कोई आवाज़ - दिल्ली की है!)
सहानुभूति बुरे समय में सूखे की पूँजी है
कतार में खड़े लोगों के हाथों में
सत्ता की सड़ी सूजी है
पेड़ के नीचे आदमी जब गहरी नींद में होता है
तब कुत्ता भी कभी-कभी मुँह पर मूत देता है
चिड़िया तो खैर दिनदहाड़े चेहरे पर हगती है
मैं मात्रा की यात्रा में सोचता हूँ___
क्या भारत की संतानें पेड़ के नीचे सोना छोड़ दें?
फिर चुपचाप चला जाता हूँ दिमाग से दिल में
जहाँ मासिकधर्म में डूबे हुए दो-चार विचार हैं
अजीब सी संबंध की गंध है
तीमार क्रियाएँ वक्ष के वक्तव्य में बीमार हैं
मैं अचानक जले हुए स्वप्नों के ढेर पर देखता हूँ
रंगा-सियार मस्त है
आज उसी का पन्द्रह अगस्त है
बगल में कोई आदमी उल्टी-दस्त से पस्त है
मानो वह अस्त है
सो, सभ्य सियार अपने में व्यस्त है!
फिर भी मृत्यु आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रही है
वह प्रश्न की पीठ पर आत्महत्या का बोझ लाद रही है
वह नीति की नाक को परंपरा की पालिश से चमका रही है
लेकिन चमड़े की मुहावरे से चुनाव का चेहरा
देखो, दृश्य में देवता का दोहरा चरित्र है
नफरत की नयी नज़र में बुद्ध, तुलसी व गाँधी वगैरह
सब मर चुके हैं बची हैं केवल घृणा-तृष्णा
सिर्फ़ एक अक्षर बीज-मन्त्र
चरैवेति, चरैवेति, अब भी कोई चीख
शब्द के भीतर गूँज रही है
बेचैन बुद्धि की ज़र्द जिरह में संभोग से सिद्ध तन्त्र
क्या जनतंत्र है?
जादुई जुल्म की दिशाएँ दुनिया में अनेक हैं
पर , आज भी कुछ इरादे नेक हैं
जो भाषा में अमर हैं!!
©गोलेन्द्र पटेल
रचना : 13-08-2022
जिज्ञासा
ओ उदात्त उच्चारण!
पृथ्वी, नदी, गाय व भाषा-साध्वी स्त्री सूचक संज्ञा
स्याह संवेदना के शब्द में डूब रही हैं
उनकी वेदना का विषय विचारणीय उदाहरण है
(शायद समुद्र का पानी मछलियों के रोने से खारा है
समय स्वयं हालात से हारा है)
आँसू के अर्थ को जानने की एक लंबी प्रक्रिया है
अँधेरे के आशिक आसमान में देखो
काल कवलित करुणा की क्रिया है
जहाँ औंधी नाव बादलों की धारा में बह रही है
लेकिन जिज्ञासा का जहाज़ विपरीत दिशा में जा रहा है!
सुबह की सरसराहट में सुलगते सपनों की साँसों के स्वर हैं
धूल के फूल चुप; रूप की धूप एकदम चुप
सुनो, घुप संबंध के स्तूप पर आत्मा के अक्षर हैं
भूख की भूमि में भय, डर और ख़ौफ़ के जन्म होते रहे हैं
पूरी उम्र मन की मिट्टी में मनुष्यता का बीज बोते रहे हैं
रव के रवि; प्रेम के प्रिय कवि
हे दर्द के दोस्त! देखो! दुख के दर्पण में दुनिया की छवि
हे हवि के अवि! ध्यान से सुनो
आँखों में अँखुआयी बातें बर्फ की बारिश सह लेती हैं
पसीने की बूँदें श्रम के सौंदर्यशास्त्र की सूक्ति कह देती हैं
दोहरी दोहित देह की माँदगी जानती है कि
जिरह जिज्ञासा की जननी है
जिजीविषा जीवटता की
किन्तु कहावत है कि जैसी करनी वैसी भरनी है!!
©गोलेन्द्र पटेल
संक्षिप्त परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल
उपनाम/उपाधि : गोलेंद्र ज्ञान , युवा किसान कवि, हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय, काशी में हिंदी का हीरा, आँसू के आशुकवि, आर्द्रता की आँच के कवि, निराशा में निराकरण के कवि, दूसरे धूमिल, अनुप्रासाधिराज एवं दिव्यांगसेवी
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : उत्तम देवी
पिता : नन्दलाल
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :
कविताएँ और आलेख - 'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।
विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।
ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-
गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।
प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)
अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित
काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।
सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र।
मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर हैं।
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--Golendra Patel
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बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास हमें खड़ा होने ...