Wednesday, 25 March 2026

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की 15 बहुजन कविताएँ

 युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की 15 बहुजन कविताएँ:-


“बुद्ध, कबीर, रैदास, तुकाराम एवं पलटूदास मेरे जीवन की पञ्चवाणी हैं। बुद्ध, गोरख, सरहपा, रैदास, कबीर, तुकाराम, पलटूदास मेरे जीवन के सप्त स्वर हैं, सप्त ऋषि हैं।”



1).
युद्ध की तुक बुद्ध

जब-जब युद्ध हुआ है
तब-तब याद आये हैं बुद्ध
सिर्फ़ तुक भर

बुद्ध पर केंद्रित है कविता
किन्तु बुद्ध
पूरी तरह से गायब हैं

जैसे बुद्ध
युद्ध से पहले गायब होते हैं
लेकिन युद्ध में उपस्थित
और
युद्ध के बाद पुनः गायब हो जाते हैं

बोधभूमि में बोया गया बीज
बोधिवृक्ष में तब्दील हो चुका है
उसकी जटाएँ चूम रही हैं
जड़ों को और
बगल में बैसाख का बादल झुका है

बुद्ध की धरती पर
जिस भिक्षुणी के पात्र में पीड़ा है
क्रुद्ध भाषा में शुद्ध करुणा
उसके लिए कीड़ा है

वह त्रिपिटक में स्वयं को ढूँढ रही है
उसकी मुक्ति से पहले ही बंकर में बुद्ध 
युद्ध के विरुद्ध
अहिंसा के अस्त्र और शांति के शस्त्र
तैयार कर रहे हैं

बुद्ध 
अब बुद्ध नहीं,
ईश्वर हैं यह उनकी प्रतिमाएँ बोलती हैं
बुद्ध पूर्णिमा के दिन
लेकिन रचनाओं में रोज़!


2).
भाषा का दर्द


भाषा का भी होता है दर्द
यह मैंने पालि से जाना

जो त्रिपिटकाचार्य हैं
मानो उन्होंने ठान लिया हो
कि पालि लँगड़ी ही रहे
उसकी बैसाखी भी
विद्यार्थियों के हाथ न लगे।

नहीं तो वह भी चल पड़ती
धीरे-धीरे, स्वच्छन्द
बुद्ध-वचनों को गुनगुनाती हुई
गाँव की पगडंडियों पर
संघाटी और चीवर संग
सरसराती समीर के सहारे
प्रातः-सायं
स्वस्थ होने की ओर।

हिन्दी मुझसे बोली,
“वत्स!
पालि के साथ संस्कृत भी पढ़ो
तभी ‘हिन्दी साहित्य में बुद्ध’
विषय पर शोध कर पाओगे
अन्यथा आज के भिक्षुओं-से
भटकते रहोगे
एक द्वार से दूसरे द्वार।”

मैं भी तो बीएचयू में
बी.ए. कोर में पालि
और डिप्लोमा में संस्कृत पढ़ रहा हूँ
किन्तु लगता है
मुझे भी बुद्ध ही बनना होगा
जैसे वे सिद्धार्थ से बुद्ध बने
बिना गुरु के।

क्या मैं समझ पाऊँगा
उनका उपदेश
तत्कालीन समाज का सत्य
बिना किसी पालि-गुरु के?

उत्तर खोजते-खोजते
न जाने कब पहुँच गया
तुलसी बाबा के पास
वहाँ से बाबा नागार्जुन तक
मीरा से आधुनिक मीरा तक
अज्ञेय से आधुनिक शुक्ल तक
परन्तु उलझनों में भटकने से अच्छा है
पुनः अपने विषय पर लौट आऊँ।

पालि-अध्ययन की समस्याएँ अनेक हैं
पुस्तकों का अभाव
सही मार्गदर्शन का न होना
स्नातक स्तर से नीचे
लगभग नगण्य उपस्थिति
इस भाषा पर संगोष्ठियों का अभाव
विद्यार्थियों और बौद्धाचार्यों के बीच
संवाद का न होना
इत्यादि, इत्यादि।

बुद्ध पर विमर्श
अन्य भाषाओं में अधिक होता है
इसलिए उनका साहित्य
समाज का दर्पण बन गया है

और हमारा पालि-साहित्य
चुपचाप
किसी आलमारी में
बैठा रो रहा है।

यह कितनी शर्म की बात है
हम सबके लिए
जो इसे पढ़ते और पढ़ाते हैं!

हे तथागत!
हे युगप्रवर्तक बुद्ध!
राग, द्वेष, लोभ और दोष से
चित्त को शुद्ध करो।

हे सत्यसाधक, महाश्रमण!
हमें पालि का ज्ञान दो
हमें योग्य गुरु दो
हे पालि-संरक्षक!
पालि पर अपना ध्यान दो!!


“नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स” (पालि मंत्र) का अर्थ है “उस भगवन्, अरहंत, पूर्ण सम्यक् बुद्ध को मैं नमस्कार करता हूँ।”

नमो = नमस्कार / वंदना

तस्स = उस (उनके)

भगवतो = भगवन् (गुणों से संपन्न)

अरहतो = अरहंत (क्लेशों का नाश करने वाले)

सम्मासम्बुद्धस्स = पूर्णतः सम्यक् ज्ञान प्राप्त बुद्ध

यह बौद्ध परंपरा में अत्यंत पवित्र वंदना है, जो बुद्ध के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करती है।




3).

महाछठ पर्व

थेरवाद मौन नहीं है 
घाट पर देखा हमने वैचारिक युद्ध
कि पालि-प्राकृत के शब्दों के बीच 
अगरौटा कहे ठेकुआ से 
कि छठ पूजा बौद्ध का महापर्व है 
छठी माई हैं महामाया 
और सूर्य हैं तथागत बुद्ध!


4).
बुद्ध की धरती कहाँ है?

सुख को साझा करने से 
दुख दीपक बन जाता है

भाषा में भय से मुक्त कौन है?

किसी ने कहा 
कि बुद्ध की धरती युद्ध नहीं,
शांति में विश्वास करती है

हम सोचने लगे 
कि बुद्ध की धरती कहाँ है?
हम खोजने लगे 
उनका धम्म कहाँ है?
ध्यान, ज्ञान और बोध कहाँ हैं?
और पाया 
कि प्रेम जीवन का सबसे मूल्यवान अनुभव है
प्रज्ञा करुणा से उपजती है 
सत्य से आगाह करना 
तथागत होना है 
और तृष्णा का भंजन करना 
भगवान होना है 

वज्रयानियों ने बुद्ध को भगवान में तब्दील किया 
बुद्ध गुफाओं में पथरा गये 

बुद्ध को धीरे-धीरे 
धरती से गायब किया गया
बुद्ध बन गए 
देवी-देवता 
अब बुद्ध किसी और धर्म की पूज्य प्रतिमा हैं 
उनके अवतार हैं, मुक्तिदाता हैं 
जिनके उपासक हमें मनुष्य नहीं समझते 
जिनकी नज़र में हम ब्रह्मा के पाँव से पैदा हुये हैं 
माँ के पेट से नहीं!

जो बौद्धमठों के मुखिया हैं 
उनके लोग 
बुद्ध से इतनी नफ़रत क्यों करते हैं?
उन्हें सम्यक दृष्टि से इतनी परेशानी क्यों है?
वे नागवंशियों के अपमान क्यों करते हैं?
वे क्यों घोलते हैं ज़हर 
बना रस में
पूछ रहे हैं रैदास-कबीर!

इस समय 
बुद्ध ढकने के विरुद्ध उघर रहे हैं 
वे जनमानस के मार्गदाता है न!



“अप्प दीपो भव‌।”—तथागत बुद्ध 

“ज्ञान सरीखा गुरू न मिल्या। चित्त सरीखा चेला।।”—गोरखनाथ 

“कहत कबीर मैं सो गुरु पाया जा का नाऊ विवेकु रे।”—कबीरदास 

“अनुभव अद्वितीय आचार्य है।”—गोलेन्द्र पटेल



5). 

प्रगतिशील होना 

ठहरना 
जड़ होना है, 
लेकिन चलना 
जड़ता के विरुद्ध प्रगतिशील होना है! 
कोई भी कल्पना,
कोई भी यथार्थ, 
कोई भी धर्म, 
कोई भी दर्शन, 
कोई भी वाद, 
कोई भी विचारधारा, 
कोई भी इंसान, 
कोई भी विज्ञान मेरा स्थायी पड़ाव नहीं है।

[मैं अल्लाह-ईश्वर, ईसा-यीशु, देवी-देवता, गॉड, ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव), गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, भगवती, हनुमान, राम, कृष्ण से लेकर तथागत बुद्ध, महावीर स्वामी, रविदास, कबीरदास, तुकाराम, तुलसीदास, सूरदास, जायसी, चंदनबाला, मीराँबाई, आंडाल, अक्क महादेवी, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, बाबा साहब अम्बेडकर, ई०वी० रामास्वामी नायकर पेरियार, कांशीराम, बिरसा मुंडा, तिलका माँझी, बसवन्ना, मोहनदास कर्मचंद गाँधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, कार्ल मार्क्स, लेनिन, फ्रायड, सार्त्र, डार्विन, कोपरनिकस, अल्बर्ट आइंस्टीन, न्यूटन, एडिशन, सी०वी० रमन, रविन्द्र नाथ टैगोर, पिताश्री नन्दलाल पटेल इत्यादि का केवल और केवल पाठक हूँ,  मैं किसी का भी पुजारी नहीं हूँ। इनके पास जो भी मेरे काम की चीज़ें होंगी, उन्हें कृतज्ञ भाव से ग्रहण करूँगा और आगे बढूँगा।]


6).

बुद्धत्व 
प्रेम  मेरी  आत्मा  है  
और  ज्ञान शरीर।
मन में हैं रैदास 
और अंतर्मन में कबीर।।


7).

भयावह समय

कोई बुद्ध का चीवर लपेटे है,
पर भीतर हिंसा का साँप पाले हुए।
कोई कबीर की झीनी चादर में,
जात की गाँठें कसकर बाँधे हुए।

कोई अंबेडकर का चोला पहने,
पर संविधान को गिरवी रखे।
कोई मार्क्स का मुखौटा लगाए,
पर पूँजी के चरणों में झुके।

कोई अशोक का मुकुट चमकाए,
पर युद्ध की भूख न छोड़े।
कोई प्रगतिशीलता का पैरहन पहने,
पर मन के कोने में सामंती जोड़े।

कोई सावित्रीबाई फुले की साड़ी में,
पर लड़कियों की कलम तोड़े।
कोई वर्जीनिया वुल्फ के वस्त्र में,
पर स्त्री-स्वर को दबा छोड़े।

कोई तलवा चाटते हुए चोटी काटने का सौदा कर रहा है,
कोई पत्थर पूजकर पाखंड-मुक्त होने का नाटक।
कोई रविदास के रव में मनुष्य होने का दावा,
पर गली में जात पूछकर रास्ता काटे।

कोई तुकोबा की वाणी का जप करे,
पर भूखे पेट को नहीं देखे।
कोई नांगेली-निर्भया का आँसू रचे,
पर स्त्री के घाव पर नमक छिड़के।

कोई अक्क महादेवी का अध्यात्म बेचता है,
कोई अंडाल के नाम पर शोषण ढकता है।
कोई मीराँ पर भजन गाता है,
पर बेड़ियाँ पाँव में ही रखता है।

कोई संकीर्णता की कोठरी में सनातनी है,
कोई भाषा की जेल में भारतीय।
और इस तरह
सज-धज, मुखौटे, प्रतीकों के मेले में
हम जी रहे हैं
सबसे भयावह समय में।


8).
पिता शब्द संवाहक श्रमिक हैं

इस फ़ादर्स डे पर पिता ने कहा,
उजड्ड और उद्दंड भी उदात्त चरित्र हो जाते हैं समय आने पर 
पर, इस समय हर संबंध कमज़ोर नज़र आ रहे हैं 

पिता कबीर तो नहीं हैं 
पर, वे "मसि कागद छुयौ नाहिं,
कलम गह्यौ नाहिं हाथ" वाली परंपरा में आते हैं 
उनके पास जीवन का अनुभव है 
बिल्कुल कबीर की तरह 
रव है 

उनका पेशा भी कबीर का पेशा रहा 
वे बोलते भी कबीर की तरह हैं
पर, वे कबीर नहीं हैं 
न ही वे कबीर का वारिस होने का दावा करते हैं 

हाँ, यह ज़रूर दावा करते हैं 
कि जितना कबीर उनके कंठ में हैं
उतना ही तुलसी भी हैं 
उनकी नस-नस में उनके दोहे और चौपाइयाँ हैं 

पर, वे तुलसी की तरह तंदुरुस्त नहीं हैं
क्योंकि वे कबीर की भाँति कर्मी हैं, लोकधर्मी हैं!

पिता गाँव में गणितज्ञ के रूप में जाने जाते हैं 
वे ग्रामकवि हैं
वे शब्द संवाहक श्रमिक हैं 
वे संतानों के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं 
वे बोधिसत्व हैं 
उनके पास कैवल्य का कुआँ है

उनको सुनना 
साक्षात रैदास व तुकाराम को सुनना है 
वे भाषा में महामानव हैं, बुद्ध हैं 

पिता जब जलते हैं 
तब माँ रोशनी बन जाती हैं
उनका प्रेम 
अँधेरे में प्रदीप है 
उनकी करुणा 
अमर प्रगीत है
हम उनकी वात्सल्यता के बारे में क्या कहें?
वे हमसे अमीर खुसरो की तरह पहेलियाँ पूछते हैं
वे हमारे लिए पानी की भाँति चट्टानों से जूझते हैं 

वे हमारे हीरो हैं 
हम उन्हें फॉलो करते हैं हृदय से

क्योंकि पिता संतान के संगीत के स्वर होते हैं!


9).
तीन जातियाँ

राजनीति की ऐसी-तैसी!

इस शोर-शराबा में परिवर्तन का बहुत मद्धिम रव है 
जाति समीकरण को समझे बिना 
चुनाव जीतना किसी भी पार्टी के लिए असंभव है

ख़ैर, खोज़ जारी है 

हिन्दी हैं हम 
लेकिन अभी तक हमें एक भी अमरदेसवा के नागरिक नहीं मिले
हाँ, कबीर के वक्ता ज़रूर मिले हैं 
मिले हैं बुद्ध के वारिस भी!

उस वक्त हम सबसे अधिक अपमानित महसूस करते हैं 
जब कोई हमारी जाति का ही हमें अछूत समझता है 

हमें जो तीन जातियाँ हर जगह मिलती हैं 
बी०एच०यू० से परास्नातक करने के बाद 
हम उन पर भरोसा नहीं करते हैं 
चाहें वे हमारी शुभचिंतक ही क्यों न हों?

वे भाषा में प्रगतिशील होती हैं 
लेकिन भाव में नहीं,
वे प्रगतिशीलता का पैरहन पहनकर मिलती हैं 

हमें लगता है कि वे हमारा शुभ चाहती हैं 
लेकिन वे भीतर से हमारा शत्रु होती हैं
यह हमें तब पता चलता है 
जब वे अपने दिनों को हमारे बेदिनों से जोड़ती हैं 

जब वे कहती हैं कि हमें तुम्हारी चिंता है
तुम संघर्ष जारी रखना
हमारी पृष्ठभूमि भी तुम्हारी जैसी थी 
ठीक उसी समय 
हम उनके चेहरे की चमक पढ़ते हैं 
और पाते हैं कि उधार की उदासी क्षणिक होती है 
कि वे संस्कार से सागर नहीं, सरोवर हैं 

हमें सुतही की बात याद आती है 
कि सरोवर में शंख नहीं, 
सिर्फ़ मोतीविहीन सीप पायी जाती है 

वे हमसे नदी की तरह मिलती हैं 
लेकिन वे भीतर से गड़ही होती हैं 
उनकी शुभकामना 
हमारे लिए शोककामना होती है 

यह जितना सनातन सच है, उतना ही अद्यतन सच भी 
वे पेशे से प्रखर प्रवक्ता हैं, हमारी शिक्षिकायें हैं
लेकिन वे कट्टर जातिवादी हैं, संकुचित सोच हैं
उनके बारे में यह हमारा ख़ुद का ही नहीं,
बल्कि एक समाज का अनुभव है 
क्या तुम जानते हो, वे तीनों कौन हैं?

जो भय और भूख की भूमि पर 
भटई भाषा के प्रतिनिधि हैं!


10).
राम भिक्षाटन पर हैं

राम जब कटोरा लेकर शिव की नगरी में भिक्षा माँग रहे हैं
तब मैंने करियायी गंगा के घाटों पर सोचा
कि वेदों के महानायक राम-कृष्ण नहीं,
इन्द्र हैं यानी मेरा प्रत्यय

वाल्मीकि के राम परमात्मा हैं,
और तुलसी के राम मर्यादापुरुषोत्तम,
निराला के राम पूज्य पुरुष हैं
और नरेश मेहता के राम संशयग्रस्त सामान्य पुरुष

देवों की भाषा से लोकभाषा में राम का आना
उनका ईश्वर से मनुष्य होना है
लेकिन अब वे राष्ट्रवाद का राग अलापने वाले हिंदुत्व के रूपक हैं

मैं नयी रामकथा का वाचक हूँ

मुझ पर भरोसा करो 
मैं राम नाम नहीं जप रहा
केवल उनके त्याग की ओर संकेत कर रहा हूँ;

जहाँ
कृष्ण—
राजनीति के हाथों में
धर्म के सिक्के हैं
और राम— 
जुआरियों के हाथों में
हुक्म के इक्के हैं

वहाँ भला कोई भक्त कैसे हो सकता है?

क्या रविदासिया रामनामी को कबीर के राम से ख़तरा है?
क्या हनुमान के राम सरकार को लेकर आ रहे हैं? 
क्या बौद्धों के राम चुप रहेंगे?
क्या जैनों के राम कुछ कहेंगे?
क्या सबके अपने-अपने राम हैं?
इस वक्त विपक्ष में खड़े कवि का क्या काम है?

राम मेरी कुटिया में कब आयेंगे?
मैंने पूछा
आत्मीय राम-भक्तिन से
तो उन्होंने बताया कि जब मेरी नौकरी लगेगी
तब आयेंगे राम मेरी कुटिया में
फिलहाल अयोध्या आ रहे हैं राम!

राम पर सवाल दागे जाएंगे
पर, राम मौन रहेंगे!

राम के बारे में विष्णु-भक्त नारद ने बताया है 
कि उनके जैसा न कोई उदार है
न कोई कृपालु है, न कोई प्रजापालक है, 
न कोई वीर है, न कोई सुंदर है, न कोई पत्नीव्रता है...

राम को बड़ा मन नहीं, बड़ा मंदिर चाहिए
उन्हें हृदय नहीं, हिदुस्तान चाहिए
वे धर्म के रक्षक कम, राजनीति के रक्षक अधिक हैं
उनके दर्शन हेतु काली पूँजी के पुजारी
इस ठंड में बर्फ़ीले पथ के पथिक हैं
उनको लेकर देशभर में अजीब सी दीवानगी है
वे नीति, नीयत, नेतृत्व और ट्रैक रिकॉर्ड की गारंटी हैं
इस सरकार के लिए

राजा राम से बड़ा दिख रहा है
वह नोट को छोड़कर सभी जगह दिख रहा है
वह पतंग पर दिख रहा है
वह पुल पर दिख रहा है
वह प्लेटफार्म पर दिख रहा है
वह सड़क पर दिख रहा है
वह सोशल मीडिया पर दिख रहा है
वह कलम पर दिख रहा है
वह कमल पर दिख रहा है

वह कमल पर ब्रह्मा जैसा दिख रहा है
उसने राम को अपने आगे तुच्छ सिद्ध कर दिया है
इस वक्त लोग राम-राम नहीं,
बल्कि उसी का नाम जप रहे हैं!


11).
“रैदास की कठौती और कबीर के करघे के बीच
तुलसी का दुख एक सेतु की तरह है
जिस पर से गुज़रने पर
हमें प्रसाद, प्रेमचंद व धूमिल आदि के दर्शन होते हैं!

यह काशी
बेगमपुरा, अमरदेसवा और रामराज्य की नाभि है।” 
(कवितांश : ‘कठौती और करघा’ से/ कवि : गोलेन्द्र पटेल)


12).
खजूरगाँव में बुद्ध के पदचिह्न हैं

निःसंदेह भाषा में मानवता की अथाह मात्रा है

एलोरा की गुफा-12 में कौन हैं?
अजंता की गुफा-9 में कौन हैं?
अर्धचंद्राकार में अजंता की गुफाएँ हैं 
अर्धचंद्राकार में बोधगया से सारनाथ की धम्म यात्रा है 

इसी यात्रा के दौरान बुद्ध रुके थे खजूरगाँव में 
यहाँ उनके पदचिह्न हैं, प्रभाव है 

पीपल में भूत नहीं रहते हैं
गूलर में दैत्य नहीं रहते हैं 
क्योंकि उनका संबंध बुद्धत्व से है 
उनके प्रत्येक पत्ते पर लिखा है— ‘अप्प दीपो भव।
चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय
लोकानुकंपाय...।’

बुद्ध कोई देवता नहीं हैं  
फिर भी वे हमारी आस्था की एकमात्र शरणस्थली हैं
उन्हें देखते ही मन श्रद्धा से भर उठता है
हृदय की शांति, दया, करुणा, मैत्री, ममता, प्रेम, प्रज्ञा और दुख अर्क बन जाते हैं 
लेकिन उनके पास ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्’ जैसा कुछ नहीं है 
वे ‘एहिपस्सिको’* के पक्षधर हैं 
उनसे संवाद करने का अर्थ है अनुभव को महत्त्व देना 
उदात्त चरित्र होना, बोधिसत्व होना 
उनका ‘अनित्य’ ही सनातन सत्य है!

हे महोपासक श्रमजीवी संत कबीर! 
हमने तुम्हारी निर्वाणभूमि ‘मगहर’ का सही मायने समझने की प्रक्रिया में जाना 
कि बनारस का रस सारनाथ है 

हे महामानव! महाभिक्खु! 
तुम्हरे ही वारिस हैं गुरु रैदास और गुरु तुकोबा
आज भी किसी अंगुलिमाल के अहिंसक होने में तुम्हारा ही हाथ है 
तुम्हारा वचन सार्थक ज्ञान है 
क्योंकि तुमने कहा है, 
मानव-मानव एक सामान है!


* स्वाक्खातो भगवतो धम्मो सन्दिट्ठीको अकालिको।एहिपस्सिको ओपनायिको पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूहीति।।

[ एहिपस्सिको ≠ एहि, पश्य ]



14).
रविदास का प्रकाश

ज्ञान की गुफा में
यह कैसा अंधेरा घुप है?
बेगमपुर में आया वाया बसंत
उड़ रहे हैं शब्दों के रंग
इस शिशिर की कठुआती धूप चुप है
राग अमर अनुराग अमर
इस नए समय में लहरा उठी रविदासी उमंग

ओ समुज्ज्वल भाषा के मुनीश्वर!
धर्म की ध्वनि, संत के स्वर
वेदना के वैभव, वाणी-वंदना प्रखर
जाति की ज्योति अक्षर-अक्षर
सहज चिंतन और सहज संवेदना के कवि
श्रम की प्रतिष्ठा करने वाले रवि
तुम्हारे संकल्प की डगर पर
चलना सीखला रहे हैं गुरुवर
तुम सदा जीवित रहना मेरे भीतर

ओ मृत्युंजय चर्मकार!
मैंने तुम्हें सच के सूत्र में साध ली है
नाम की प्रार्थना से पीड़ा के प्रगीत में बाध लिया है
मन के धागे में मुक्ति के मंत्र सा तुम्हारे विचार

मैंने अपने कंधे पर नाध लिया है
जीवन का जुआ
तुम्हारा लोकव्यवहार अद्वितीय है
तुम मेरी आत्मा को इसी तरह प्रकाशित करना
मैं तुम्हारा भक्त नहीं, साधक हूँ!


“चेतना के धरातल पर तुकाराम कबीर से अधिक रविदास के करीब हैं, उनके विठ्ठल रविदास के राम हैं, उनके पांडुरंग रविदास के निरंजन हैं और ये दोनों शब्द (पांडुरंग और निरंजन) बौद्ध साहित्य में बुद्ध के लिए प्रयोग हुए हैं। एक भयंकर साज़िश के तहत जैसे बुद्ध को विष्णु का अवतार बताया गया है, वैसे ही विठ्ठल को भी विष्णु का अवतार बताया गया है !”—गोलेन्द्र पटेल (चंदौली, उत्तर प्रदेश)

“कहते हैं गुरु रविदास 
कि सगुण का प्रकाश है निर्गुण का भास
कर्म पर करो विश्वास 
धम्म की धरती पर छुओ आकाश।”
―गोलेन्द्र पटेल 



15).
बुद्ध


अहिंसा के आलोक में 
विचारों के बीज अंकुरित हो रहे हैं 

मनोभूमि में 
एक ऐसा प्रज्ञा का पेड़ उगा है 
जिसमें दया, करुणा, ममता, मानवता
प्रेम, शांति और समानता फलती-फूलती है 
हर मौसम में, हर क्षण 

जिसके तने तर्क करना सिखाते हैं 
और पत्तियाँ प्रतीत्यसमुत्पाद की बातें 
जिसकी शाखाओं के पास सम्यक दृष्टि है 
और जड़ों में अनुभव का रस 

जिसकी खुराक है अँधेरा
जिसकी छाये में शांतिप्रिय और अहिंसक पथिक 
शील और सत्य से संवाद करते हैं
जो युद्ध की आँधियों के विरुद्ध खड़ा रहता है 
वह भावभूमि में कौन है?
जिसकी हरियाली को जानने के लिए 
हृदय में पीड़ा का होना 
अनिवार्य है!

©गोलेन्द्र पटेल

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com





















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