Friday, 27 March 2020



★स्मृति★
आह! आज मेरे
मृत मन में स्मृत
हुआ वेदों के ऋत
कृतकृत्य हो हृदय
नृत्य कर रहा :
एक वृत्त पर
भृत्य नर कहा :
एक कृत पर

अपने अन्तःकरण में
जो लोककृति हैं
पावन-मनभावन

उसी दर्पण में
आ आकृति अक्ल रेखता
साहित्य का शक्ल देखता

पूर्वजों के काव्यकृति में
पूज्य परंपरा रीति में
एकचित्त हो स्मृति में
-गोलेन्द्र पटेल






सूखी छाती
चूचकी चाम
चमचमाती
घाम
राम!राम!राम!...
नाम
जपती
जननी
नन्हा शिशु थाम
सुबह-शाम
चूचुक चिंचोड़ता
चुपचाप
जैसे पका आम
आप!
देव-पत्थर
    या
शिवलिंग पर

चढ़ा दूध
नाली-गटर
पथ धर
हरि-हर
तक जाता है
बढ़ा बुद्ध
विवेक-ज्ञान
विद्वान
इंसान
भिक्षादान : जिसे वे आँसू देते हैं
वही दयाभिक्षुणी कर्षित माता है
देवी हैं!!देवी हैं!देवी हैं!...
जन्म जीव सेवी हैं : महतारी
लाचारी-बेचारी-नारी
आज वक्त से है हारी
मदद करो बारी-बारी
मनःआदमी अवतारी
कविगण करुणाधारी
-गोलेन्द्र पटेल
रचना : ०९-०१-२०२०



खेतिहर खेत से
खोट-खाट बथुआ
लाया घर!
चीर-चार चूरऽ चुल्हे पर
चीख-चाख कहा हुआ
साग!
आओ बच्चों जाग
साग-भात खाने
काग!
आ गया मुरेड़ पर
और आ रहा सुआ
बाग-बात गाने
ताप आग
कपकपी भगाने
चुल्हे के पास
गौरैया पहले से ही आई है
कुछ चावल चूर्ण चुन पाई है
जब तुम्हें गया था जगाने
अब देखो कौआ कटोरी का भात
जुठार न दे कितना करीब रूका है
आज पीने का पानी जुठार चुका है
भावी भोज्यपदार्थों के अगणनीय अंग
माड़ में सने साग-भात को मूली के संग
खाने में बहुत मस्त लग रहा है : पिताजी
इस पके हुए साग में क्या है?
वत्स! इसमें कुछ खास घास :
बथुआ-पालक सरसों के पत्तें हैं
परन्तु बथुआ का औसत अधिक है
क्योंकि इसे आइरन पूर्ति औषधि रूप में
आपको खिलाना और खुद खाना चाहता हूँ
लिवर-त्रिदोष-भूख-मलमूत्र जैसी त्रुटि आदि में
प्रमुख प्रख्यात संजीवनी जड़ी-बूटी है : बथुआ
पेशाब रोग के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ
आधुनिक आयुर्वेद विज्ञान के नव संधान से
पता चला लाल वाला अधिक लाभदाई है
जिसे माता सीता ने लव-कूश के जन्म से पूर्व
वनवास के वक्त वाल्मीकि के आश्रम में खाई थी
वही बथुआ चील कहलाई और औरतों के लिए
अद्भुत पीलिया रोग नाशक औषधीय आशीर्वाद
बह्मा ने दिया बथुआ को , एक अन्य किंवदंती है
कि गेहूँ और जौ के बुआ को , एक खेत में
शंकर ने पार्वती के कहने पर कृषक चेत में
बथुए का महत्व भेज कहा यह है एक साग
जिसे मैं स्वयं खाता हूँ इस घास का अनुराग
अद्भुत है जो ऊँच कुली या सूत है बाग-बाग
होते इसका शाक खाकर वे धन्य हैं मूर्धन्य हैं
उनका स्वास्थ्य-मस्तिष्कीय और जो अन्य हैं
जीवन के सत्य का रहस्य संन्यासी के वन्य हैं
पुत्रों अब पानी पी लो हाथ-मुँह धोकर
कल पुनः बथुआ लाऊँगा हर्षित होकर
पूर्णकथा सुनाऊँगा भूख का रोटी पोकर
रचना : ०९-०१-२०२०
-गोलेन्द्र पटेल



1
**कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ**
दिल से दिल का दीपक जला रहा हूँ
युवा संदेश साध हाथ हल चला रहा हूँ
सृष्टि संकेत शोषितों का सूत्र हूँ मैं
कविता के खेत का कृषक पुत्र हूँ मैं।

चुप्पी के खिलाफ़ संर्घष का आवाज़ हूँ
आज पूर्वज कविराज कवित्व का अनाज हूँ
स्पर्श से शब्द की सृजन कर्ता कलम हूँ मैं
मृदुल मातृभाषा हिन्दी-हृदय का शम हूँ मैं।

करुणा से उपजा साहित्य का सागर हूँ
महामना मानवता का पुण्य एक घर हूँ
कविता व संगीत के परिवार का सदस्य हूँ मैं
सार्थक शब्द समुच्चय की उठती हुई लय हूँ मैं।

गन्ना धान के पत्तों पर पड़ी ओस मणि हूँ
गौ गाँव गंगा व गुरु से खड़ा जोश हूँ
आज एक आँसू का जनकवि बना हूँ मैं
जगत  जीव  दर्द  की  संवेदना  हूँ  मैं ।

साहित्यकार से पहले विद्यार्थी हूँ
समय और समाज का सारथी हूँ
मनुष्य के मुक्ति का अभिव्यक्ति हूँ मैं
शिष्य-आचार्य परंपरा का शक्ति हूँ मैं।

ऊपर सदैव उठने वाला उमंग हूँ
जीवन के जगमग समुद्र की तरंग हूँ
कवियों के प्रयोगशाला का अंग हूँ मैं
काव्यगुरु *श्रीप्रकाश शुक्ल* के संग हूँ मैं।

हवनकुण्ड का ह्रस्व स्वर मंत्र हूँ
भविष्य-हविष्य-हृदय का लोकतंत्र हूँ
कालजयी काव्यकला का तंत्र हूँ मैं
कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ मैं।
-18/09/2019

2
**काव्य खेत का खेतिहर हूँ**
काव्य खेत का खेतिहर हूँ
धान गेहूँ बाजरा रहर हूँ
पूज्य पूर्वजों का वंशजचन्द्र हूँ मैं
हिन्दी कविता का हरिश्चन्द्र हूँ मैं।

सरसों  तीसी  चना  मटर  हूँ
ककरी केराव मसूर टमाटर हूँ
नेनुआ केदुआ चढ़ानेवाला घर हूँ मैं
महाकृति  का  मधुर  स्वर  हूँ  मैं ।

मीर्च लेहसुन प्याज़ चुकंदर हूँ
चौराई पालक धनिया क्षर हूँ
आदेश्वर कवि का अक्षर हूँ मैं
आदि  से  ही  अमर  हूँ  मैं।

आलू मूली गोभी गाजर हूँ
तरबूज़ खीरा बेल कटहर हूँ
आम अमरुद बेर का पेड़ हूँ मैं
पके ताड़ खजूर का पेड़ हूँ मैं।

कौमुदी कमल गुलाब गुड़हल हूँ
खाड़ गुड़ चीनी मिश्रित कल हूँ
दिव्य सरिता निर्मल शीतल हूँ मैं
साहित्य का सोमरस जल हूँ मैं।।
-20/10/2019

3
**कविता के क्यारी का कर्षित कली**
नई कविता के क्यारी में घास नेर रहा हूँ
कई कर्षित कलियों का कपार हेर कहा हूँ
सहृदय से साहित्य सोहने वाला खुरपा हूँ मैं
संवेदना और संघर्ष के शब्दों को तुरपा हूँ मैं।

मन! महाकृति के मणिमाला में मंत्र हूँ
सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में फैला युग-युवा-यंत्र हूँ
कवि के कल्पना का फूल-फल-फ़सल हूँ मैं
गऊ गंगा गाँव व गद्य का महान मसल हूँ मैं।

अद्भुत अमन के कथन का गहन गंध हूँ
काव्य और संवेदना के सुमन का सुगंध हूँ
पूज्य पूर्वजों के इस(काव्य) मिट्टी में निर्भय हूँ मैं
संस्कृति और संस्कार का समन्वय हूँ मैं।

स्वच्छ वृष्टि से सिंचा हुआ सृष्टि का सत्य हूँ
सूखी बंजर भूमि के हाशिए का साहित्य हूँ
पंक्ति-पंक्ति में संवेदना और दृष्टि का संबंध हूँ मैं
कहती कविता काव्यशास्त्र सूत्र से अबंध हूँ मैं।

इसके क्यारी का कुड़ा-करकट हटानेवाला कवि हूँ
इसके प्रत्येक पंक्ति में प्रकाश पहुँचानेवाला रवि हूँ
समाज को सूर्योदय के समान जगानेवाला छवि हूँ मैं
दोहरे दुःख-दर्द के हवन यज्ञ में जानेवाला हवि हूँ मैं।

फटें खतों के दरार और खेतिहरों के दर्द का दर्पण हूँ
शोषितों के सेवा में शोषित माता-पिता का समर्पण हूँ
गाँव के गृहस्थ जीवन के विषमताओं का रेखांकन हूँ मैं
आस-पास के ढहते हुए भीत-भवन का चित्रांकन हूँ मैं।
-15/12/2019
कविता हूँ मैं....
**कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ** से
-गोलेन्द्र पटेल


किंवदंती कविता सार :
रामांश और उनके अनुज लक्ष्मणांश का पुनः माता धरती पर अवतार कथासार निम्न हैं :- कौशल्यांश देवी जो एक वनदेवी थी।वह वनदेवी वास्तव में एक गाँव की कन्या थी जिसकी जन्म एक कुवाँरी कन्या के गर्भ से हुई थी।उसकी हालात कुन्ती के जैसा था दोनों समकालीन भी थी।कौशल्यांश कर्ण के जन्म के समय ही जन्मीं थी।कर्ण के हृदय को जितना कष्ट हस्तीनापुर दैता हैं उससे कई गुना कौशल्यांश को मिला।
कौशल्यांश : कुन्ती पाण्डवों के साथ जब वनवास जाती है तो कुछ दिन बाद अकेले एकांत नदी के तट पर कौशल्यांश से मिली। कौशल्यांश एक बूढ़ी वृक्ष के नीचे तपस्या कर रही थी।कुन्ती उन्हें प्रणाम कर उनसे पूछा अपने पुत्रों का भविष्य। कुन्ती के भविष्य के साथ भूत देख नयन नीर नदी में प्रवाहित करने लगी। कुन्ती कही : देवी! वनदेवी! आपके आँसू नदी में जा रही हैं ऐसा क्यों? क्या करणा हैं? तो कुन्ती को पाण्डवों के भविष्य के साथ साथ कर्ण की भविष्य सूनाई.....।नदी में अश्रुजल की तरंग गति और बढ़ गई।अब कौशल्यांश के साथ कुन्ती का नयन नीर भी नदी में जा मिला।कुन्ती के अन्दर अनंत जिज्ञासा जाग उठा और एक यह भी की कर्ण पुत्र के भविष्यवाणी के बाद देवी का नयन नीर नदी तीव्र गति से अभी तक क्यों प्रवाहित हो रही है।कुन्ती के विनम्र विनती पर कुन्ती के कष्ट को कम करने हेतु वनदेवी अपनी कथा सुनाती हैं।

रामांश और लक्ष्मणांश : अपने कुवाँरी अवस्था में भगवान विष्णु के भक्ति से उनके राम अवतार के रामांश रूप में उसका स्वयं पुत्र बन गए और साथ में उनका अनुज लक्ष्मणांश भी।
 बिन ब्याही स्त्री को बच्चा होना कर्षित समाज में पेट दर्द बोने के समान विष्णु का यह अवतार सिद्ध हुआ।
कुछ समय के लिए क्योंकि सत्य ने किए सत्य का पान।
कहानी जो भी हो पर किंवदंती की कथा कहती है कि  कर्ण को जिसे दिन राधे-आधिरथ त्यागते हैं उसी दिन रामांश और लक्ष्मणांश भी वनवासियों को छोड़ भीतरी वन में चले जाते हैं।मेरी निर्दयी आत्म आज्ञा से और मैं यहाँ एकांत में सत्य का तपस्या कर रही हूँ।

भक्ति और शक्ति : कब कैसे और किससे रामांश-लक्ष्मणांश को शिक्षा दीक्षा और अद्भुत आलौकिक शक्तियाँ प्राप्त हुआ पता नहीं।
क्योंकि यह किंवदंती है महाभारत का कोई प्रसंग नहीं।
यहाँ तक की अब सीतांश भी कब कहाँ से रामांश और लक्ष्मणांश के संग वहीं जा रही हैं जहाँ वे दोनों जाना चाहते हैं।अचानक पात्र का जुड़ना हो सकता है किंवदंती का कला हो।
जैसे चित्रा नामक कुतिया लक्ष्मणांश के भोजन में अचानक आ भयंकर मृत्युविष मिलाती है पर लक्ष्मणांश बच जाते हैं।
वास्तविक विष मिलवाने वाला का पता चला वह हैं एक अर्द्धमुंड राक्षस।जो सूर्य और इन्द्र तक जीत सकता है।सूर्य और इन्द्र इसके भय से रामांश के पास आये।रामांश प्रथम बार में उसे प्राजित नहीं कर पातें हैं।सभी देवता डरे जाते हैं कि अब क्या होगा।पर चित्रा उसकी मृत्यु का रहस्य बताती है।जो एक महर्षि के हृदय में बसा है।महर्षि कौन है यह सादे आप किंवदंती किंग से पूछे या ना पूछे।परन्तु पूज्य पूर्वज भली भांति जानते रहे।
यह वही महर्षि था जो महर्षि के महापद पर बैठने से पूर्व प्यासे धरती का प्यास बुझाया था।जिसके अन्न जल से रामांश को जीवन मिला है।इसलिए जीतते हुए सत्य को कुछ समय के लिए असत्य के चादर से ढक लिया।असत्य चादर बन ठिठुरता रहा और सत्य ओढ़ ओज ऊर्जा से सम्पन्न हो असत्य को एक प्रहार से प्राजित कर दिया। देवतागण रहस्य जानने में लगे हुए हैं कि आखिर ऐसा एक ही रात बाद कैसे हुआ।

रामांश जब महर्षि के कूटिया पहुँचे तो महर्षि की माता जो सत्य की जननी थी एक चार पर मृत्यु को रोक रामांश दर्शन हेतु रूकी हुई थी।रामांश देखे की यह मेरी माँ हैं पर इतनी जल्दी इतनी बुढ़ी कैसे।

तब से लक्ष्मणांश के संग सीतांश और कौशल्यांश भी आ गई।कौशल्यांश अपनी माता को छाती से लगा कही पुत्र ये आपकी नानी हैं।मेरी माता मेरी जननी।

अच्छा कुछ समय बाद नानी का भी अंतिम क्रिया क्रम कर अपने जन्म भूमि गाँव लौटे सब।

गाँव से पता चला कि हस्तीनापुर में पाण्डवों का सुखद राज्य हैं प्रजा-सैनिकों की पत्नियों ने महाभारत के रक्त से सिंचे हुए धरती पर सफेद वस्त्र उगा उससे अपनी अधपकी अंग को क्या सुख दे रही हैं?

उसी सुख को कुन्ती स्वयं और उसकी वधु-पौत्रवधु भी।पांचाली जानती थी कृष्ण ही इस सुख से मुक्त कसते है परंतु इस अद्भुत सुख को कृष्ण ने भी मुक्त नहीं कर सकता।अन्ततः सभी महाभारत के विधवा औरतें कौशल्यांश के पास श्वेत वस्त्र सुख से मुक्ति माँगी।
कौशल्यांश के एक आदेश पर रामांश और लक्ष्मणांश ने एक ही तीर तीसरे युग कलयुग का प्रारंभ कर सभी बैकुण्ठ चले गए।

यह कौशल्यांश, रामांश लक्ष्मणांश और सीतांश कौन थे हम सब बच्चे सुबह बुढ्ढीनानी से  पुछने वाले थे कि वह भी बैकुण्ठ जा चुकी थी।अब कौन बताया यह सब कौन थे?
-गोलेन्द्र पटेल



रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2020
12-01-2020 राहुल सभागार ,भोजपुरी अध्ययन केंद्र ,काशी हिंदी विश्वविद्यालय वाराणसी में 'डॉ. रविशंकर उपाध्याय स्मृति संस्थान ' के सचिव वंशीधर उपाध्याय एवं भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक  प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के नेतृत्व में पुरस्कार वितरण एवं कविता पाठ तथा चर्चा सम्पन्न हुई।
जिसके मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार एवं तद्भव पत्रिका के संपादक अखिलेश ,अध्यक्षता हिंदी के  प्रसिद्ध कवि ज्ञानेंद्रपति ,वरिष्ठ कवि सुभाष राय के उपस्थिति में सम्पन्न हुआ ।जिसमें रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार 2020 का छठां पुरस्कार कवि संदीप तिवारी को प्रशस्ति पत्र,अंगवस्त्र के साथ 5000 की राशि पुरस्कार के रूप में प्रदान की गई।
स्वागत और अभिनंदन करते हुए पुरस्कार समिति के निर्णायक मंडल के सदस्य प्रो.श्री प्रकाश शुक्ल ने कार्यक्रम में आये युवाओं एवं नई पीढ़ी को यह बताया कि इस कार्यक्रम का पूरा स्वरूप युवाओं को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है क्योंकि इसे आगे इन्हीं युवाओं को ही लेकर जाना है।हमारे कार्यक्रम का जो स्वरूप होता है उसमें हमारा ध्यान सिर्फ नई पीढ़ी के तरफ ही रहता है, क्योंकि यह नई पीढ़ी को कविता कर्म से जोड़ना चाहती है,जिससे नई पीढ़ी वरिष्ठ पीढ़ी के साथ अपनी चेतना को जोड़ पायेगी और इस सामंजस्य से दोनों पीढ़ी एक-दूसरे को जान पायेगी। यह जो परस्पर का संवाद है वह मूल्यवान है, आज के दिन को उत्सव के रूप में मनाते हैं ।कविता की भूमिका उत्सव के एक बाजारू शोर में अन्तत कविता ही है जो हमारे उल्लास की शांति को बचाये रखेगी।जहाँ पर उत्सव का बाजारू शोर है उसमें उल्लास की शांति को सुरक्षित रखने का माध्यम अगर कुछ है तो कवि कर्म,कवि काव्य है। इस नजरिये से  यह आयोजन बहुत महत्वपूर्ण है।
इसके साथ आज का जो शोर है उसके साथ एक डिस्टेंस स्वर की जरूरत है जिससे काव्य के स्वर को पहचाना जा सके।शोर बनाम स्वर की बाइनरी में हम स्वर की शिनाख्त करने की प्रक्रिया से जुड़ना और जोड़ना चाहते हैं।और इसी कारण से कवि की सामाजिकता यही पर सुरक्षित रहती है और बिना सामाजिकता के कवि का कर्म चरितार्थ हो नहीं सकता ।
आगे इन्होंने कहा कि यह धरती बड़ी विचित्र है इस धरती पर हम लोग या तो कह रहे होते हैं या देख रहे होते हैं।कुछ लोग केवल कहते चले जाते हैं कुछ लोग केवल देखते चले जातें हैं कोई भी धरती की चिंता नहीं करता जिस पर  खड़ा होकर के वह या तो खाता जा रहा है या देखता जा रहा है इस धरती की चिंता कौन करेगा,इस धरती की चिंता करने का बुनियादी दायित्व वह कवि का है और वहीं पर उसका कवि कर्म है ।
कविता लिखने के लिए सहजात प्रतिभा की जरूरत है क्योंकि हर कवि की अपनी जमीन होती है जहाँ पर वह खड़ा होकर अपने दुनिया को अपने नजरिये से देखने की कोशिश करता है इस नाते से आज के आयोजन से यह जरूर है कि नई पीढ़ी अपने जमीन को पहचाने और आसमान से आँख मिलाने का साहस करे।

आज के कार्यक्रम के प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे ज्ञानेंद्रपति ने कहा कि कवि संदीप तिवारी बहुत आत्मिक कवि हैं ,इनके कविताओं में जो संवेदनाएं हैं वह गहरे स्तर पर कवि के जमीन से जोड़ते हुए कवि के आत्मसातीकरण के आधार पर कवि को आदर्श रूप देती हुई दिखती हैं।कवि के भीतर यह जो वर्तमान के साथ अतीत भाव है वह आज के यथार्थ को नए ढाँचे में ढालता दिख रहा है ।आगे ज्ञानेंद्रपति जी ने कहा कि कविता में रचनाकार के पीछे का यथार्थ गूंज रहा होता है,जो उसे साथ लेकर चल रहा है आगे आपने कहा कि कवि कर्म के लिए कवि का सास्वत होना जरूरी है और यही सास्वतता कवि को समकालीन बना देती है और यही सास्वत की इकाई कवि को यथार्थ से जोड़ती दिख रही है। साथ ही कहते है कि कविया में जो यथार्थ है वह दिया हुआ यथार्थ नहीं है बल्कि यह कमाया हुआ यथार्थ है और इस तरह से कवि ऐंद्रिय बन जाता है।साथ ही जाग्रत यथार्थ में जो वेदना है वह कवि के भीतर प्रतिध्वनित होती है।
सम्मानित कवि संदीप तिवारी ने अपने आत्मवक्तब्य में कहा कि आज मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है क्योंकि मैंने जैसे बनारस को पढ़ा वैसा ही इसे पाया।साथ ही अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए सबका धन्यवाद दिया।यह सम्मान  मेरे लिए एक जिम्मेदारी और चुनौती भी है क्योंकि इस परम्परा को मैं जीवित रखूँ। इसके बाद इन्होंने अपनी कविता पर बात करते हुए कहा कि मैं फैजाबाद के छोटे से गांव का कवि हूँ वहीं से हमारे कविता की जमीन शुरू होती है जिससे मैं अपने गांव,अपने ज़मीन के लिए एक कर्ज उतार रहा हूं।गांव और वहाँ के लोगों में जो देखता हूँ उसी को शब्द में उतारता हूं।
आलोचक डॉ.विंध्याचल यादव जो युवा अध्येता व आलोचक हैं,उन्होंने सबसे पहले संदीप तिवारी को बधाई दिया।आगे इन्होंने कहा कि हम ऐसे समय में कविताएं कर रहे हैं जब कविता पर सरकारें जांच बैठा दे रहीं हैं यह वह दौर है इस दौर में कवि का सम्मान किया जाना अपने आप में ही एक प्रतिरोध है तो इस नजरिए से यह बहुत महत्वपूर्ण कार्यक्रम है।केदारनाथ सिंह की कविता को याद करते हुए सत्ता और सरकारी सत्ता पर अपनी बात रखते हैं।आगे कहते है कि कवि संदीप तिवारी की कविता के आधार पर तीन तरह की कविता मिलती है। पहली सत्ता पर सीधी प्रतिरोध करती कविताएं हैं,दूसरी तरह की जो कविता है उसमें किसान जीवन की दुख,तकलीफों को दर्ज करती कविता और तीसरी तरह की कविता में विस्थापन बोध की कविता है और जब विस्थापन बोध की बात करते हैं तो जो रोजमर्रा की जिंदगी में हम झेलते हैं या फिर कहीं किसी काम से लोग बाहर जाते हैं तो इस तरह की विदाई, छोटी-छोटी यात्राएं उनके टिस की जो जिंदगी है उसे पकड़ने की कोशिश संदीप के कविताओं में देखा जा सकता है। इनकी कविता को पढ़ते हुए लगता है कि यात्रा सन्दीप की कविता की लाइफलाइन हो,तथा इनकी तमाम कविताएं यात्राओं पर केंद्रित हैं।
इस तरह हम इन्हें सन्दीप यात्राओं का कवि भी कह सकते है।
हिंदी कविता में घर से निकलने की पीड़ा को कवि दर्ज करता है लेकिन घर से निकलना भी कितना जरूरी है।हमारा समय और इस समय का जो ताल है उस ताल के साथ रोजी-रोटी के लिए तमाम तरह की क्रियाकलापों के लिए निकलना पड़ता है तो सवाल है कि परिस्थितियां किस किस से सामना किया जाए ।कविता के माध्यम से कवि विस्थापन को किस प्रकार ब्यक्त करता है यह भी देखने की जरूरत है। विस्थापन की कविता में भी संवेदना भी देखी जानी चाहिए।विस्थापन पर केवल दर्द ब्यक्त कर देना ठीक नहीं है।।
मुख्य अतिथि के रूप में आए अखिलेश जी ने कहा कि इस कार्यक्रम में रविशंकर उपाध्याय के रूप में जिसमें कवि की अपनी जड़ों के प्रति लगाव,पहचान को देखा जा सकता है।साथ ही जब इस पुरस्कार की बात करें तो देखते हैं कि इस दौर में उम्मीदें बहुत खंडित होती चली जा रही हैं और कई बार यथार्थ जितना देखा उतना भयानक हो जाता है जिससे कवि में एक अवसाद पैदा होता है और इस अवसाद से निपटने के लिए,इस निराशा से बचने के लिए हम कहाँ जाएं कोई हमारे समाज की जो राजनीति है, जो सत्ताधारी संरचनाएं हैं, जो शासन व्यवस्था है वहाँ आप जाते हैं तो और गहरी निराशा से आप जुझ जाते हैं ।साथ ही हम देखने की जरूरत है कि वह कौन सी चीज है जो हमें जीवित रहने में सहायता कर रहीं हैं।इसकी खोज जो युवा पीढी है वह हमारी गहरी मदद करती है इनमें जो यथार्थ है वह अपने समय के दमनकारी यथार्थ का भी चित्रण भी है और उससे लड़ने की झटपटाहट भी है।इनकी कविता में यह जिद्द भी है।इसी जिद्द में एक स्वीकार भी है जहां कवि की दुनिया एक यथार्थ की दुनिया में चली जाती है।कवि अपने चीजों को याद करने का,साथ ही चीजों के बिगड़ जाने की पीड़ा है।कवि के कविता में बदलाव बुरा नही हैं। पर इस बदलाव से हो रहे विखंडन के प्रति कवि चिंतित है। कवि की कविताओं में यादों की यात्राओं के अस्तित्व को छीन,निजी सुख दुःख भी कविता में ,परिवेश के प्रति प्रेम, जड़ो से,अपने लोगों से जुड़े हुए है और सन्दीप की कविता लोकल का पता देती है। समकालीनता के साथ कविता में लयात्मकता, टेक,छंद आदि का प्रयोग मिलता है।
कार्यक्रम के सचिव डॉ.वंशीधर उपाध्याय ने संस्था को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त किया इसी के साथ इन्होंने युवा कवियों से यह वादा भी किया कि आने वाले समय में युवाओं के लिए इससे भी बड़ा कार्यक्रम करेंगे।अपनी स्मृति को याद करते हुए इन्होंने रविशंकर जी को भी याद किया और आगे कहा कि उनकी याद को जिंदा रखने के लिए या इस दृष्टि से इस संस्थान ने एक संबल प्रदान किया है और आगे भी यह करता रहेगा।यह रविशंकर की उम्मीद का विस्तार है जो सबको एक जड़ जोड़ने की कोशिश में बड़े आकार को ले रहा है और आने वाले समय मे कविता को लेकर साहित्य सर्जना का सामूहिक प्रयास होगा ।
आज के दूसरे सत्र काव्यपाठ की अध्यक्षता कवि सुभाष राय ने कहा कि कवि संदीप तिवारी की कविताओं में लोक भूमि का परिचय मिलता है क्योंकि अगर कवि अपने लोकल का परिचय नहीं देता या यह नहीं बताता कि कवि कहाँ से जुड़ा है,तो वह कवि कहीं किसी भ्रम में है ।कवि संदीप तिवारी गांव से बहुत गहरे स्तर पर जुड़े हुए हैं, गांव की पीड़ा को बहुत गहराई से देखते हैं और समझते हैं लेकिन इसके साथ यह भी देखते हैं कि गांव की कठिनाई इतनी बढ़ गयी है कि गांव से लोग भाग रहे हैं विस्थापित हो रहें हैं परंतु कवि संदीप तिवारी उससे भागता नहीं है बल्कि वह उसे सँजोये रखने के लिए अपने भाव,और संवेदना को कविता में व्यक्त करता है।कवि गांव को वैभव,सुखी और खुश देखना चाहता है ।कवि अपने कविताओं में गत्यात्मक बिम्ब का प्रयोग करता है। कवि संदीप की कविता लोकतंत्र पर भी हमला करते हुए लोकतंत्र को पसिंजर की ट्रेन के समान देख रहा हैं। कवि संदीप अपनी पीड़ा ,अपनी चेतना के साथ खड़े है और वे अपनी कविता के माध्यम से शुद्ध कविता रचते है।हम सब समय की धुरी पर खड़े है।जहाँ हम बोल नहीं सकते है।और थोड़ा भी बोलने को कोशिश करते हैं तो जेल में डाल दिए जातें हैं,तो इस प्रकार हम देख सकते हैं कि आज आवाज कैसे दबायी जा रही है और   इस इसके लिए युवाओं को इससे लड़ने की जरूरत है।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में डॉ .रविशंकर उपाध्याय युवा स्मृति पुरस्कार से सम्मानित युवा कवि संदीप तिवारी (बिदाई का घर,प्रयाश्चित, पेशेनज़र नामा,लोकतंत्र में कहा लोक है,बापू) ने अपनी कविताओं का पाठ किया।
इसके साथ युवा कवियों में गोलेंद्र पटेल,आदित्य राज(मणिकर्णिका के ओर हिंदुस्तान),प्रतिभा श्री(भूख,श्रमिक),आर्य पुत्र(बापू),आर्य भारत(अफीम का बेटा,गिलकिस बानो),अनुपम सिंह(एक औरत का अंत,जहारबाज,राष्ट्रीय सूतक),रविशंकर (डर)तौफीक गोया),अरुणाभ सौरभ (राग यमन,धरतीमाता-भारतमाता,कथकहि) डॉ.अमरजीत राम (किसान और उसके बच्चे,तुहि लौट आओ),निलाम्बुज, अदनान(याद का शहर),डॉ.रचना शर्मा (जिसे मैंने तोड़ा,प्रेम में पतझड़,नेपथ्य संवाद),अंकिता खत्री( मैं पानी बन जाऊंगी,मैं गांव-गांव तुम शहर-शहर,आसान नहीं बनारस से प्यार करना)डॉ.सोनी पांडेय ने ( मेरे पास सुंदर कुछ नहीं था, मूर्तियां का सच,कुछ अधूरी बातें, ये जो दिखाई दे रहा है), प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल ने (शिव), प्रो.बलराज पांडेय ने (अबकी बार जाड़ा कुछ ज्यादा पड़ा है, घड़ी, लड़की, सबसे बड़ा कलाकार) , वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति ने( शीघ्रदर्शनम,ट्राम में एक याद), प्रो चंद्रकला त्रिपाठी , कवि सुभाष राय,कुमार मंगलम ने कविता का पाठ किया।
आमंत्रित कवियों और अतिथियों में इनकी उपस्थिति मूल्यवान रही जिमसें डॉ रचना शर्मा,प्रो.बलराज सर,प्रो.कृष्ण मोहन ,डॉ नीरज खरे, प्रो.वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, प्रो.चन्द्रकला त्रिपाठी,डॉ.विंध्याचल यादव,डॉ.सोनी पांडेय, डॉ.प्रांजलधर,डॉ.अमरजीत राम,सुमित चौधरी, गौरव भारती, रविशंकर, अंकिता खत्री, आर्य भारती,अरुणाभ सौरभ,अनुपम,निलाम्बुज,प्रतिभा श्री , युवा कवि गोलेन्द्र पटेल आदि उपस्थित रही।
कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र जगन्नाथ दुबे एवं दूसरे सत्र का संचालन कुमार मंगलम ने किया।
प्रस्तुति
-रंजना गुप्ता-


संवेदना सिद्ध कवि हैं संदीप तिवारी :ज्ञानेन्द्रपति

भोजपुरी अध्ययन केंद्र, बीएचयू और रविशंकर उपाध्याय स्मृति संस्थान,वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सम्मान समारोह तथा कविता पाठ का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
इस कार्यक्रम का पहला सत्र सम्मान समारोह का रहा जिसके मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार और तद्भव पत्रिका के संपादक अखिलेश थे जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध हिन्दी कवि ज्ञानेन्द्रपति ने की।वरिष्ठ कवि सुभाष राय कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे।कार्यक्रम में नैनीताल के  युवा कवि संदीप तिवारी  को छठा रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार 2020 प्रदान किया गया जिसमें प्रशस्ति पत्र,अंगवस्त्रम के साथ सम्मानित राशि के रूप में पांच हज़ार की पुरस्कार राशि भी  प्रदान की गई।

कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्य अतिथि अखिलेश ने कहा कि दमन और अकेलेपन के विरोध में आज के युवा कवियों का स्वर यथार्थ को बहुत करीब से पहचानने की कोशिश का स्वर है। विस्थापन के विरुद्ध लिखते हुए भी संदीप अपनी कविता में कहीं नहीं कहते कि आप बाहर मत जाइए। यथार्थ आज हमें गहरे अकेलेपन में धकेलने की कोशिश करता है। संदीप उस गहरे अकेलेपन के विरोध में खड़े होते हैं। उनकी कविताएं अपनी जड़ों, अपने लोगों और अपने परिवेश से गहरे इश्क की कविताएं है। इनकी कविताओं में जो चीज़ अलग दिखती है वह यह कि इनकी कविताएं किसी एक मुहावरे में बंधी हुई कविताएँ नहीं है। इनकी कविताएं युवा आत्म विश्वास की कविताएं हैं।संदीप समकालीन कविता के दबाव से मुक्त कवि हैं जिनके यहां चीजों के नष्ट होते जाने की गहरी पीड़ा है।

अध्यक्षीय भाषण देते हुए प्रसिद्ध कवि ज्ञानेन्द्रपति ने कहा कि संदीप की कविताओं को पढ़ते सुनते हुए एक बात साफ उभर के आती है कि इस कवि की कविताओं का प्लाट बहुरंगी है। हमारे समय के यथार्थ, उसके कोलाहल और वेदना की ध्वनियां संदीप में साफ सुनाई पड़ती है। संदीप संवेदना सिद्ध कवि हैं जो नवीनता के प्रयोग से निरंतरता को बचाये रखने की कोशिश करते हैं।

विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ कवि सुभाष राय ने कहा कि संदीप की कविताओं की दो मुख्य विशेषता है। एक तो विस्थापन की पीड़ा को रचते हैं और दूसरी राजनीतिक पक्षधरता की बात करते हैं। आज के दौर में जब डर और हताशा का माहौल समाज की चेतना को मार रही है संदीप की कविताएं बहुत कुछ आशा और उम्मीद को बचाये रखने में अपनी भूमिका निभाती है। संदीप अपनी कविताओं में दुनिया की खूबसूरती को रचते है। ट्रैन इनकी संवेदना की खिड़की है जहां से ये जीवन को देखते हैं।

युवा आलोचक डॉ विंध्याचल यादव ने कहा कि संदीप की कविताएं मोटे तौर पर तीन तरह की कंटेंट लेकर उपस्थित होती है। एक तो वह सीधे-सीधे राजनीतिक प्रतिरोध के कवि हैं। संदीप की कविताओं की दूसरी विशेषता किसान जीवन की दुख तकलीफों को सामने लाने की कोशिश है। तीसरी विशेषता जो दिखाई देती है वह  विस्थापन से जुड़ी हुई कविताएँ हैं। संदीप के यहां विस्थापन का सिर्फ दुख ही नहीं है बल्कि जिन मजबूरियों में विस्थापन हुआ है उसका जायज़ा भी है।

आत्मवक्तव्य देते हुए  सम्मानित कवि संदीप तिवारी ने कहा कि जिस ज़मीन ने मुझे आगे बढ़ाया है, उसका  एक कवि के रूप में मैं कर्ज उतार रहा हूँ। उन्होंने अपनी कविताओं को गहरी सामाजिक बेचैनी के बीच रची जाने वाली कविताओं के रूप में याद किया।

स्वागत वक्तव्य देते हुए केंद्र के समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि उत्सव के इस बाजारू शोर में कविता ही हैं जो हमारे उल्लास की शांति को  बचा सकती है। कविता इस शोर के बीच आम जनता के स्वर को पहचानना चाहती है। यही वह बिंदु है जिसमें कवि की सामाजिकता सुरक्षित रहती है। नई पीढ़ी से अपेक्षा की  कि वह अपनी जमीन को पहचाने और आसमान से आंख मिलाने का साहस करे।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रो रामकीर्ति शुक्ल ने इस क्रम में प्रशस्ति पत्र का वाचन भी किया।
कार्यक्रम के इस सत्र का संचालन शोध छात्र जगन्नाथ दुबे ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन वंशीधर उपाध्याय ने दिया।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्य पाठ का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता सुभाष राय ने की।
 इस सत्र में वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति, बलिराज पांडेय, चंद्रकला त्रिपाठी, श्रीप्रकाश शुक्ल,  रचना शर्मा, अरुणाभ सौरभ, तौसीफ गोया, सोनी पांडेय, अनुपम सिंह, अमरजीत राम, अदनान कफील दरवेश, निलाम्बुज, रविशंकर, अंकिता खत्री, आर्यपुत्र दीपक, आर्य भारत, प्रतिभा श्री, आदित्य राज,युवा कवि गोलेन्द्र पटेल,संदीप तिवारी ने  काव्य पाठ भी हुआ।

कविता पाठ के सत्र का  संचालन दिल्ली से आये कुमार मंगलम ने किया। धन्यवाद ज्ञापन आदित्य विक्रम सिंह ने किया।
(प्रस्तुति:दिवाकर तिवारी)



ज्योहीं पका समय समय से
त्योहीं दाढ़ी पक गया कवि
और महाकवि का ;
पाप चाप चाप ताप
श्राप बन गया भाप
भूख के उबलती अदहन में!
आज
काव्य
धंधा में आँख अंधा
हो
किस कवित्व को कंधा
दे रहा
सत्य के चयन में!
सोशल मीडिया
अनाचार का आचार्य
समाचार का प्राचार्य
बन गया छाप...
बेकार हम-आप
वतन में!
रात रात कई रात
बात बात नई बात
करें
दिन दीन से!
भात भात भई भात
खात खात जई खात
मरें
सिन सीन से!
जिस तरह
   ठीक
उसी तरह
कविता का केश कपास-सा
पतिहीन पद्य-पंक्ति
या विधवा
काव्य-वसन में!
पीड़ा का पूज्य हो
संवेदना का शरीर ढकती
चमचमाती दोपहर में
चौंधियाई चक्षु सहती
सूर्याग्नि जलन
टुटे सुमन
या
डाल से टुटी कली के भाँती
कवि-नयन में!
दाढ़ी का पकना
समाज के कडाही में
कविताओं को कउर
मुक्तिपथ का पाथेय-दाना भुजने जैसा है
दाना सफेद दाढी सफेद
सफेद हैं शांति
और यही शांति
त्रिभुवन में!
परमसुख का पर्याय
परमहर्ष का काव्य
ॐ शांति शांति शांति
शांति ॐ....
अन्तःमन में!
-गोलेन्द्र पटेल
रचना : 13-01-2020

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...