Friday, 27 March 2020

😢*भूख*😘
पेट के नगाड़े
नारायण का
नृत्यगान बने!

जिस भंडारे में
भूखे लोग पहुँचे
वह महादान बने!

अपने आस पास
ढूँढ़ो उन बच्चों को
जिनके आँत आशीर्वाद

देना चाहती हैं इस वक्त
एक रोटी के बदले!

ऋषियों के मंत्रध्यान
से प्राप्त शक्तियाँ शून्य हैं
भूख के युद्धभूमि पर

राजनीति का योद्धा है
बरगद के पेड़ की तरह
अपने जमीन का राजा!

त्राहि माम त्राहि माम....
एक कान से सुनता
दूसरे कान से निकालता

गिनता एक रोटी पर एक ओट
तो नारा है *इस बार चूल्हे घर घर जलेगें*
अर्थात् भूख के जमीन पर जीत पक्का।

राजा एक ही बार भोजन करेगा
ऐसा वह चुनाव के वक्त चिल्लाता है
सामंत सुबह से शाम यही दुहराता है

अंधों आगे अच्छे दिन आने वाला है
क्योंकि उन्हें आँख मिलेगा निःशुल्क
चुनाव चिह्न का बटन दबाने के लिए

हल्का सा हवा का झोका बरगद से उठा
और सीधे पीपल के पत्तों से कहा हिलोगे
हमारे विरुद्ध पूजे जाने की बाद भी इसी देश में।

यहाँ भूख को लेकर कुछ जादा शिक्षित हैं
सोशल मीडिया से लेकर काव्य कागज़ तक
एक ही स्वर में बोलते भुखमरी मिटाओ : राजा!

किसानों के गिलास में धूप
वे बैठे धूप सोखतें खेत में
जैसे स्वयं भूख है पौधा रेत में

नदी के संतान रेगिस्तान में
परिवर्तित हो विस्तार चाहते हैं
नाले ॐ नमः शिवाय जपते जाते हैं

नदी में द्वीप के विरुद्ध एक ओट के लिए
दंगों में जलती गरीबों के झोपड़ियाँ संकेत हैं
राज्य में बख्तियार ख़िलजी के आगमन का।

जनता को जानकारी है अपने देश दूर्दशा की
कर्षित मजदूर के बटोई , कड़ाही व तवा की
जिसमें नहीं पक पाता भूख का भोजन समय पर।

भूख का जड़ भुखमरी के जमीन को न जोतना ही है
आओ प्यार देशवासियों मिलकर जोतने
भूख के विरुद्ध भूख के जमीन को।
-गोलेन्द्र पटेल


रोज रोज रोटी सेकने वाले मर्दों
इश्क़ के आईने में गनजा हो गया।
दिलों के दृश्य में जलने वाले गर्दों
गोलेन्द्र के बाल को सजा हो गया।

एक महादेश ने कहा....!
कोरोना कुछ तो करो ना
तुम रावण हो चाइना का

मैं दूधनहड़ी का करोनि
खट्टा मिठा फल करउना
लोग मेरा खाते हैं अचार

भारत में केवल दो चार
जन हो गए तेरा शिकार
भगवान राम से डरो ना।
ओ कोरोना......


जहाँ से आए हो वहाँ
कल नहीं आज ही जाना है
वुहान ही नहीं सम्पूर्ण विश्व
तेरे विरोधगान का दीवाना है

यार मान जाओ प्यार से
हम वैद्य हैं घास वाले
सोशल मीडिया पर
शेयर ना करो ना कोरोना से
संबंधित अनर्गल बातें

डब्ल्यू.एच.ओ. का कथन मान जाओ
22मार्च को एकसाथ सब मिलकर गाओ
कोरोनाराक्षस दूर जाओ दूर जाओ देश जाओ....।

यह गीत नहीं ,यह दर्द है इंसानों का
चमगादड़ से फैला ,ऐसा मत है विद्वानों का
लक्षण इसके जुकाम छींक खाँसी बुखार

उपाय इसके भीड़ में मास्क लगाओ
विदेश से आने पर खुद का जाँच कराओ
घर में हो तो हाथ साबुन से धोवो बार बार

एक और संदेश सून लो दूनिया वालों
किसी भी वाइरस से अब मत करना खेलवाड़
इस बार राम बचा लेंगे अगले बार पक्का है

"राम नाम सत्य है" जनाजे के जाते वक्त
महापथ से महाशमशान के चिताग्नि तक
सृष्टि के गर्भ में छिपे एक विषाणु के कारण

किसी का पति तो किसी का पिता
किसी पत्नी तो किसी का माँ
किसी का पुत्र तो किसी का पुत्री

स्वर्ग सैया पर सदैव सोने चले  जाएंगे
करुणा गीत गजल में कविजन गाएंगे
जिसे सुनेगा शून्य संसार जीवन हार

अब तो जागो जीने जैसा आज
सारे चमगादड़ खा जाओ बाज़
खत्म करो ना कोरोना का राज
-गोलेन्द्र पटेल






समाज के
श्यामपट्ट पर
आज विशेष
विषय की
सूची है।

एक
कलाकार की
कृति व कीर्ति
एक
कूची है।

रंग के
तरंग
उमंग के
संग
सुव्यवस्थित
ढंग
से।

साहित्य के
वाटिका में
सुमन को
संदेश शब्द
देवताओं के
विरुद्ध
जंग
दे।

मेरे प्रिय मित्र
चित्रकार युवा
अमर अद्भुत
आकृष्ट आकृति
संकट के समय
खेत में जुआ
कंधों पर लादे
फ़सल के फल
सफल कृषक
हरिओम झा।

शून्य सृष्टि में
दिव्य दृष्टि से
देख दर्द दृश्य
उकेर दो चित्र
दिल के दर्पण में

एक कवि हो
कथा कविता
जो भी रचो
सत्य समर्पण में
सब सृजन है
सिजन का।
 -गोलेन्द्र पटेल
रचना : 22/03/2020
आज  कोरोना का ॐ नमः स्वाहा!
सबमिलकर हवनकुंड में इसे दाहा!
समाज का दर्पण साहित्य ने चाहा!
प्रत्येक व्यक्ति के चहरे पर हा - हा!
इस  महामारी के  महाकहर में हो!
हे  हरि- हर यही हर्ष हर घर में हो!
-गोलेन्द्र पटेल【"कोरोना" कविता से】

।। सौर मंडल में स्त्री ।।

पृथ्वी ने जन्म लिया किसी स्त्री की तरह।
किसी ने नहीं नोट की उसकी जन्म तिथि,
पता नहीं सूरज खुश भी हुआ था कि नहीं
अपनी इस नई संतान के जन्म से।

मैं नहीं गिन सकता उन शून्यों को 
जो बनाती हैं पृथ्वी के जीवन के वर्ष,
वैज्ञानिकों ने भी किया होगा 
कुछ वैसा ही जोड़ तोड़, 
जैसा मैंने कराची में जन्मी अपनी माँ का 
पासपोर्ट बनवाते हुए किया था,
उसकी अनुमानित 
जन्म तिथि की गणना करने के लिए। 

सौर मंडल में घूमते हुए 
उल्का पिंडों, निहारिकाओं और न जाने कितने 
अणु-परमाणुओं की टकराहटों और विस्फोटों से 
जन्मी होगी हमारी पृथ्वी,
जैसे हमारे घरों में जन्म लेती हैं लड़कियाँ।
शायद इसी लिए दुनिया की 
बहुत सारी भाषाओं में 
पृथ्वी आज भी स्त्रीलिंग है। 

स्त्री होना एक सुखद अनुभूति 
रही होगी पृथ्वी के लिए,
उसने धीरे-धीरे समझा होगा अपना शरीर,
हो सकता है हरे भरे जंगल उगे हों उसके रोम-छिद्रों से,
उत्तुंग पर्वत उभरे हों उसके स्तनों की जगह,
पसीने की बूँदों से बह निकली हों नदियाँ
और समुद्रों का जल हो उसकी धमनियों में बहता रक्त।

बार बार रजस्वला हुई होगी पृथ्वी
किसी स्त्री की तरह।
वायु के संसर्ग से उसने जन्म दिया होगा
कीट पतंगों, असंख्य जीव-जंतुओं  
मछलियों और मानवों को। 

सृष्टि चक्र चलाए रखने के लिए
सभी श्रेणियों में रहे होंगे नर और मादा,
क्या ऐसे ही हमारी दुनिया 
नहीं चला रहीं हैं स्त्रियाँ करोड़ों वर्ष बाद भी।

आज भी भूचाल में काँप जाती है पृथ्वी
क्योंकि उसका स्त्री मन टिका है शेषनाग के फन पर।
आज भी चमकती हैं बिजलियाँ, 
बरसते हैं बादल मूसलाधार
धोने के लिए पृथ्वी का अनावृत शरीर,
सिहर सिहर जाती है स्त्री।

आसमान में चमकता है चाँद 
अपनी  मादक कलाओं के साथ,
तेज़ी-से चलने लगती है पृथ्वी की साँस,
डाँवा-डोल होता है समुद्र,
बड़ी मुश्किल से संभलती है पृथ्वी 
भावनाओं के ज्वार में बही किसी स्त्री की तरह।

शताब्दियों बाद भी 
हमारे सौर मंडल और आकाश गंगा में
अकेली ही स्त्री है पृथ्वी;
स्त्रियाँ अकेली ही होतीं हैं
अपने निर्माण और सृजन में।

-------- राजेश्वर वशिष्ठ
 चित्र सौजन्य : गोलेन्द्र पटेल
संग्रह : सोनागाछी की मुस्कान से।
**औरत का औकात**

आद्य औरत का अत्यंत
प्राचीन पुरातात्विक साक्ष्य हैं
मातृसत्तात्मक!

फिर भी हम
ऋग्वैदिक काल में आते हैं
जहाँ उषा है
उत्तम उम्मीद।

स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व
अनंत आकाश से ऊपर
अध्यात्म की शिक्षा-दीक्षा
समुद्र से गहरा मन:सागर

ऋचाएँ कंठस्थ थीं
वक्तव्यनिधि व्यक्त की
तर्क के तेराजू पर तौल।

वे महाविश्वविदुषी निम्न थीं
रोमशा ,अपाला ,उर्वशी ,
लोपामुद्रा ,विश्ववारा ,सिक्ता ,
निबावरी ,घोषा व सुलभा।

वैदिक युग में दो वर्ग
प्रथम *सद्योवधू* : विवाह के पूर्व
दूसरा *ब्रह्मवादिनी* : सम्पूर्ण जीवन

बुद्धि ,ज्ञान ,दर्शन ,तर्क ,
मीमांसा व साहित्य आदि
अध्ययन करती जैसे वेदवती

ऋषि कुशध्वज की कन्या
ब्रह्मवादिनी व महापंडिता
बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न स्त्री।

*काशकृत्स्नी* मीमांसा में विख्यात
याज्ञवल्क्य की पत्नी *मैत्रेयी* का नाम न पूछो
जनक सभा की विद्वगोष्ठी में विजेता *गार्गी*

अपने अद्भुत तर्कशक्ति से महर्षियों को मात देती
जिसमें प्रमुख थे याज्ञवल्क्य महाऋषि व उनके गुरु
चौंक उठी सामने झरोखे में बैठी रानी सभी।

रामायण काल में स्त्रियों के शिक्षक कभी
वाल्मीकि थे अत्रेयी के तो अगस्त्य मैत्रेयी के
पाण्डवों की मात कुन्ती अथर्ववेद में परांगत

और
अम्बा व शेखावत्य की शिक्षा
महाभारत की गरिमा है

बौद्ध युग में देखें तो
एक नहीं अनेक हैं थेरी
जिसमें थीं प्रमुख निम्न

शुभा ,सुमेधा, सुभद्रा ,अनोपमा ,
भद्रकुंडकेशा,जयंता ,गोतमी
 वैशाली ,विशाखा व खेमा....

गुप्तकालीन गौरव प्रभावतीगुप्त
कश्मीर की शासिका सुगंध और दिद्दा
सोलंकी वंशी अक्का और भैला
राज्य कार्य के लिए इतिहास में विख्यात।

हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री नृत्यगीत
की अध्यापिका थी सखियों के बीच
प्रमाण है हर्षचरित व गाथासप्तशाती
रेखा ,रोहा ,माधवी ,अनुलक्ष्मी ,पाहई बद्धवही
व शशिप्रभा जैसी कवयित्रियों के कला कौशल का।

हम रजिया सुल्तान से रानी लक्ष्मीबाई
और अनेक भारतीय महिलाओं के
महान व्यक्तित्व से परिचित हैं ; जैसे-

कल्पना चावला ,इन्द्रा गाँधी ,सरोजनी नायडू ,लता मंगेशकर ,मीराबाई, सुभद्रा कुमारी चौहान ,महादेवी वर्मा एवं अन्य।

स्त्री चेतना का उत्खनन आधुनिक साहित्य का काम
हम वाल्मीकि , वेदव्यास व गौतम बुद्ध के
नारी नयन को छोडते हैं आते हैं हिंदी में

कबीर , तुलसी , जायसी व सुर से सीधे
प्रसाद , पंत ,निराला ,दिनकर ,प्रेमचंद ,
जैनेन्द्र ,यशपाल ,अज्ञेय एवं अन्य के पास

एक समय था
जब प्रसाद लिखते हैं *नारी तुम केवल श्रद्धा हो*
तब निराला कहते हैं: *वह तोड़ती पत्थर*

मैं चुपचाप पढ़ रहा हूँ
एक रचनाकार के भीतर का स्त्री
और आज के स्त्री का स्त्री।

कुछ लोग कैसे कहते हैं ?
आधुनिक स्त्रियों का स्थिति पहले से अच्छी है
पृथ्वी भी एक स्त्री है क्या इसकी स्थिति अच्छी?

नदी भी एक स्त्री है क्या इसकी?
या मेरे माँ की?
या मेरे पत्नी की?
या मेरे पुत्री की?

हे समाज के साईकिल का एक चक्का महापुरुष!
जब तक रहेगा
पितृसत्तात्मक!

कुशक्ति का घर में वास
तब तक रहेंगी
हाशिये पर स्त्री।

उपर्युक्त औरतों का औकात
ऋषियों ने ,महर्षियों ने ,शासकों ने , रचनाकारों ने
यहाँ तक की हमने और आप ने भी देखा

किसी पौधे के पुष्प का पूर्ण विकास
जिस प्रकार कली के पूर्ण विकास में निहित है
ठीक उसी प्रकार पुरुष का उत्तम उत्थान
स्त्री के उत्तम उत्थान में।

अतः आज हम कह सकते हैं कि नारी
किसी भी कार्य में पुरुषों से पीछे नहीं हैं
खुद के उन्नति और देश के उन्नति के लिए

हमें अपने समान ही अपने घर के स्त्रियों को
समानता ,स्वतंत्रता व शिक्षा देनी ही होगी
अर्थात् मातृसत्तात्मक बराबर पितृसत्तात्मक।....

*-गोलेन्द्र पटेल*
रचना : 24/03/2020
**औरत का औकात** से
*मोबाइल नंबर : 8429249326

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...