Saturday, 18 April 2020

अयोध्यायसिंह "हरिऔध" : जयंती


आज अयोध्यासिंह 'हरिऔध' का जन्मदिन है-
खड़ी बोली को काव्य भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले कवियों में अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (जन्म- 15 अप्रैल, 1865, मृत्यु- 16 मार्च, 1947) का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में 1890 ई. के आस-पास अयोध्यासिंह उपाध्याय ने साहित्य सेवा के क्षेत्र में पदार्पण किया।
इनका जन्म ज़िला आजमगढ़ के निज़ामाबाद नामक स्थान में सन् 1865 ई. में हुआ था। हरिऔध के पिता का नाम भोलासिंह और माता का नाम रुक्मणि देवी था। अस्वस्थता के कारण हरिऔध जी का विद्यालय में पठन-पाठन न हो सका अतः इन्होंने घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी, बांग्ला एवं अंग्रेज़ी का अध्ययन किया। 1883 में ये निज़ामाबाद के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर हो गए। 1890 में क़ानूनगो की परीक्षा पास करने के बाद आप क़ानून गो बन गए। सन् 1923 में पद से अवकाश लेने पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने।
हरिऔध जी को  जीवनकाल में यथोचित सम्मान मिला था। 1924 ई. में इन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधान पद को सुशोभित किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने इनकी साहित्य सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए इन्हें हिन्दी के अवैतनिक अध्यापक का पद प्रदान किया। एक अमेरिकन 'एनसाइक्लोपीडिया' ने इनका परिचय प्रकाशित करते हुए इन्हें विश्व के साहित्य सेवियों की पंक्ति प्रदान की। खड़ी बोली काव्य के विकास में इनका योगदान निश्चित रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि 'प्रियप्रवास' खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है तो 'हरिऔध' खड़ी बोली के प्रथम महाकवि।
     उन्होंने अपने कवि कर्म का शुभारम्भ ब्रजभाषा से किया। 'रसकलश' की कविताओं से पता चलता है कि इस भाषा पर इनका अच्छा अधिकार था, किन्तु इन्होंने समय की गति शीघ्र ही पहचान ली और खड़ी बोली काव्य-रचना करने लगे। काव्य भाषा के रूप में इन्होंने खड़ी बोली का परिमार्जन और संस्कार किया। 'प्रियप्रवास' की रचना करके इन्होंने संस्कृत गर्भित कोमल-कान्तपदावली संयुक्त भाषा का अभिजात रूप प्रस्तुत किया। 'चोखे चौपदे' तथा 'चुभते चौपदे' द्वारा खड़ी बोली के मुहावरा सौन्दर्य एवं उसके लौकिक स्वरूप की झाँकी दी। छन्दों की दृष्टि से इन्होंने संस्कृत हिन्दी तथा उर्दू सभी प्रकार के छन्दों का धड़ल्ले से प्रयोग किया। ये प्रतिभासम्पन्न मानववादी कवि थे। इन्होंने 'प्रियप्रवास' में श्रीकृष्ण के जिस मानवीय स्वरूप की प्रतिष्ठा की है, उससे इनके आधुनिक दृष्टिकोण का पता चलता है। इनके श्रीकृष्ण 'रसराज' या 'नटनागर' होने की अपेक्षा लोकरक्षक नेता हैं।
एक बूँद
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से।
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।।
सोचने फिर फिर यही जी में लगी।
आह क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।।
दैव मेरे भाग्य में क्या है बढ़ा।
में बचूँगी या मिलूँगी धूल में।।
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी।
चू पडूँगी या कमल के फूल में।।
बह गयी उस काल एक ऐसी हवा।
वह समुन्दर ओर आई अनमनी।।
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला।
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।।
लोग यों ही है झिझकते, सोचते।
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर।।
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें।
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।।.....

-Golendra Patel

https://youtu.be/Ics_zgp89bw

छिपाने और छल की कला और कोविद-19


छिपाने और छल की कला और कोविद-19
        इस समय एक लाख बीस हजार के करीब डोमेन हैं। इनसे आम लोग कोरोना संबंधी सूचनाओं के लिए आ-जा रहे हैं। इनमें अनेक पोर्टेल के मालिक ठगई कर रहे हैं, छल कर रहे हैं।अनेक किस्म के घोटाले हो रहे हैं।मसलन्, मास्क,कर्ज,बेकारी,वेक्सीन,क्योर आदि को लेकर जबर्दस्त धंधा चल रहा है।अनेक कंपनियों ने तो कुछ खास पदबंधों की खोज के जरिए उनके पोर्टेल में प्रवेश करने वालों पर पाबंदी लगा दी है।इसके बावजूद सोशलमीडिया में मिस-इन्फॉरेमेशन का प्रवाह जारी है।सारी कंपनियां जानती हैं लेकिन अभी तक मिस इन्फॉर्मेशन का प्रवाह रोकने में वे असमर्थ रहे हैं।
      उल्लेखनीय है फेसबक,गूगल,यू ट्यूब,माइक्रोसॉफ्ट, ट्विटर आदि कंपनियों ने मार्च के मध्य में एक साझा बयान जारी किया था जिसमें कोविद-19 से संघर्ष करने वायदा किया गया।यह एक चलताऊ किस्म का साझा बयान था जो इन कंपनियों ने दिया था। इस बयान में मिस इन्फॉर्मेशन से लड़ने और प्रामाणिक सूचनाएं देने का वायदा किया गया था।लेकिन अभी तक ये कंपनियां अपने इस वायदे का पालन नहीं कर पायी हैं।बल्कि इस बीच में उलटा हुआ है।कोरोना से लड़ने के नाम पर अंट-शंट दवाओं के नाम विभिन्न तथाकथित शोधपत्रों में गूगल में प्रकाशित हो रहे हैं। एक ही उदाहरण काफी होगा।
    इंटरनेट पर विशेषज्ञों के एकदल ने ‘‘कोरोना वायरस क्योर’’ के तहत गूगल पर सर्च किया तो पाया कि वहां अनेक तथाकथित शोधपत्र भ्रमण कर रहे हैं लोग बड़ी संख्या में पढ़ रहे हैं और उनकी गलत-सलत सूचनाओं का दुरूपयोग कर रहे हैं। ये पत्र ट्विटर पर भी सर्कुलेट किये जा रहे हैं। इसी तरह का एक शोधपत्र तकनीकी व्यवसायी एलॉन मास्क ने गूगल डॉकूमेंटस में साझा किया । कहा गया यह वैज्ञानिक रिसर्च पेपर है।इसे स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के कैलीफॉर्निया स्थित स्कूल ऑफ मेडीसिन में कार्यरत वैज्ञानिक सलाहकार ने तैयार किया है। इस पेपर के इंटरनेट पर प्रकाशित होते ही दूसरे ही दिन फॉक्स टीवी चैनल ने इस पेपर के आधार फीचर बनाया और कहा कि कोरोना से बचने की दवा है ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’। इस दवा से कोरोना 100फीसदी खत्म हो जाएगा।इसी तरह फ्रांस से एक लघु शोधपत्र सामने या जिसमें दावा किया गया कि ‘‘क्वीनाइन’’ और ‘‘ टॉनिक वाटर’’ और ‘‘मलेरिया ड्रग’’को इंटरनेट पर खोजने वालों की बाढ़ आ गयी।देखते ही देखते बाजार में ये दवाएं और प्रोडक्ट हाथों हाथ बिक गए। इसका अर्थ है इंटरनेट पर जो लिखा जा रहा है उसे जनता पढ़ रही है।सुन रही है।
    फॉक्स टीवी चैनल से कार्यक्रम आने के बाद स्टैंनफोर्ड विश्वविद्यालय ने बयान देकर कहा कि फॉक्स ने जिस व्यक्ति को हमसे जोड़कर पेश किया है उसका हमसे कोई संबंध नहीं है और वह व्यक्ति उनके विश्वविद्यालय के किसी रिसर्च कार्यक्रम में शामिल नहीं रहा है।इस घटना के बाद ट्विटर पर भयानक तूफान आ गया,बड़ी संख्या में डाक्टरों और वैज्ञानिकों ने इस तरह के डिस इनफॉर्मेशन कैम्पेन की आलोचना की।लोगों ने यहां तक लिखा कि इस दवा की अचानक कमी हो गयी और इस दवा को डाक्टर की सलाह के बिना लेने से यह शरीर को नुकसान पहुँचा सकती है।इस तूफान के बाद ट्विटर ने निर्णय लिया और ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’ दवा से संबंधित सैंकड़ों ट्विट हटा दिए। ये सारे ट्विट दक्षिणपंथियों के थे। वे लोग मिस इनफॉर्मेशन फैलाकर जश्न मना रहे थे। जो जश्न मना रहे थे उनमें फॉक्स चैनल की हॉस्ट लोरा इनग्राहम,डोनाल्ड ट्रंप के एटॉर्नी रूड़ी गुईलियानी और कंजरवेटिव पंडित चार्ली के नाम खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। इसके बाद ट्रंप ने इस दवा को लेकर जमकर उत्साह दिखाया.इससे बाजार में केमिस्टों से लेकर पीएम मोदी तक इसका दवाब देखा गया।इससे एक बात पता चलती है कि विज्ञान के बारे में मिस इनफॉर्मेशन फैलाया जाए तो उससे कितने व्यापक स्तर पर नुकसान हो सकता है।इस घटना ने वैज्ञानिकों पर भी दवाब बनाया कि वे कोरोना के लिए दवा न बनाएं।इस तरह के माहौल से राजनेताओं का कोई खास नुकसान नहीं हुआ लेकिन आम जनता और विज्ञान की क्षति जरूर हुई है।
     किसी भी खुले और स्वतंत्र समाज पर थोपे गए देश,जनता के दिमाग का मेनीपुलेशऩ और अग्राह्य को ग्राह्य कराने की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। कोरोना के महासंकट काल में यही सब हो रहा है।बड़े पैमाने पर कोरोना की सच्चाई छिपायी जा रही है।मरीजों की संख्या,नामकरण,मृत्यु,बड़े स्केल पर जनता की निगरानी,असहमति व्यक्त करने पर हमले या पाबंदी,जबरिया कोरेंटाइन या फिर वैक्सीन लगाने की कोशिश आदि चीजें सामने आ रही हैं।यह एक तरह से जनता के नॉर्मल जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश है।इस दौर में
लॉक डाउन में मनुष्य तो किसी तरह अपना इलाज आपात काल में करा ले रहे हैं, लेकिन पशुओं के पास ऐसी सुविधा कहां है। ऐसे में वो मरने को विवश हैं। इसका सबसे बुरा असर पशुपालकों पर पड़ रहा है। वो अपने पशुओं को बीमार अवस्था में देख कर दुखित है, लेकिन कुछ नहीं कर पा रहे हैं। गांवों की स्थिति यह हो गई है कि झोला छाप डाक्टर भी लॉक डाउन में नहीं मिल रहे हैं।
कोई पशुओं के लिए मोबाइल अस्पताल की सुविधा नहीं होने से पशुपालकों काफी परेशान हैं। वो अपना दुखड़ा बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के प्रसार विभाग के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को सूना रहे हैं, लेकिन यहां के डॉक्टर भी कुछ करने में असमर्थ हो रहे हैं। फोन पर ही पशुपालक अपने पशु की समस्या को बताते हैं और डाक्टर उन्हें फोन पर ही दवा का नाम बताते हैं। यदि वो दवा मिल जाती है तो ठीक है अन्यथा अपने पशुओं को परेशान होते देखते रहते हैं पशुपालक।
गर्भधारण कराने में भी आ रही है दिक्कत
सिर्फ इलाज कराने में ही पशुपालकों को समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है, बल्कि अपने पशुओं को गर्भधारण कराने में भी दिक्कत आ रही है। लॉक डाउन की वजह से कृत्रिम गर्भधारण कराने वाले गांव में नहीं आ रहे हैं।
श्रीराम तिवारी
माननीय ,
श्री नरेंद्र मोदीजी,प्रधानमंत्री
भारत सरकार, नई  दिल्ली !
मान्यवर,
'अत्र कुशलं तत्रास्तु'
श्रीमानजी टीवी पर आज आपका कोरोना संबंधित भाषण सुना,अच्छा भाषण था!लगा कि आप बाकई देश की आवाम के लिये बहुत फिक्रमंद हैं!आपने लॉकडाऊन का समय बढ़ाया तो तमाम जनता आपके इस निवेदन को कठोर इलाज समझकर स्वीकार कर लेगी!किंतु यथार्थ के धरातल पर इसके विपरीत परिणाम भी हो सकते हैं! जिन की ओर आपका ध्यानाकर्षण बहुत जरूरी है!
उदाहरण के लिये,मैं एक रिटायर सीनियर सिटीजन(पेंशनर) हूँ!हमारे टेलीकाम विभाग में वेतन समझौता 2017 में हो जाना चाहिये था!तब आप ही प्रधानमंत्री थे!किंतु अब तक नही हुआ! इस बाबत संसद में माननीय संचार मंत्री श्री रविशंकरप्रसाद ने बताया है  कि घाटे के कारण वेतन वृद्धि नही की जा रही है! यूनियनों ने घाटे की वजह भी आप को बताई थी,किंतु मदद करने के बजाय  आपने  BSNLको 4G से बंचित रखा! इसके विपरीत जियो (अंबानी) को आपका आशीर्वाद मिला! इससे हमारा सरकारी उपक्रम घाटे में आ गया और वेतन समझौता नही हो पाया!इस वजह से हम पेंसनर्स को बहुत नुकसान हो रहा है!मेडीकल सुविधा लगभग बंद है!मामूली पेंशन सिर्फ दवाई में खत्म हो जाती है! जबकि लाकडाऊन के कारण बाजार में हर चीज की कालाबाजारी और मेंहगाई का जोर है! जब केंद्र सरकार के रिटायर कर्मचारियों की यह हालत है,तब दैनिक वेतन भोगी मजदूरों का हाल क्या होगा? और ठेका मजदूरों की बदहाली का अनुमान आप खुद लगा सकते हैं!
मैं 10 साल से ब्रांकल अस्थमा का मरीज हूँ, पत्नी को भी सुगर,फेंफड़े थाइराइड की बीमारी है! जिस डॉक्टर से मेरा इलाज चल रहा है,वह खुद क्वारेंटाईन में है!अधिकांस अस्पतालों में स्टाफ के न आने से सन्नाटा पसरा है!यदि कोरोना वायरस से हम बच भी गये तो दवा के अभाव में क्रानिक बीमारी से कौन कैसे बचाएगा?
मान्यवर,
कोरोना की भयानक मारक क्षमता का मुकाबला करने के लिये 3 मई तक तो क्या हम बुजुर्ग लोग 3 जून तक लॉकडाऊन में रह लेंगे!लेकिन सरकार कोई ऐंसी व्यवस्था तो करे कि फल सब्जियां और किराना सामान खरीद सकें! अभी तो ये हाल है कि मेडीकल स्टोर्स पर दवाईयां खत्म! उधर खेतों में सब्जियां सड़ रही हैं, क्योंकि शहर ले जानी संभव नहीं! इधर शहर में सड़ी गली सब्जी भी चोरी छुपे 100 रुपया किलो बिक रही है!सरकार को  चाहिये कि बाजिब दामों पर खाद्यान्न और सब्जियां उपलब्ध कराए!लॉकडाऊन का समय बढ़ाना तभी सफल होगा,जब घरों में बंद लोगों को जिंदा रहने के लिये न्यूनतम  संसाधन उपलब्ध हों! हर एक को दवाइयां, राशन पानी,सब्जी और भोजन मिले!यदि  कदाचित कोई भूख से या अन्य बीमारी से घर में मर गया तो कोरोना से बचाव की कुर्बानी बेकार जाएगी!
प्रधानमंत्री जी को मालूम हो कि कुछ जमातियें-तब्लीगियों को छोड़ अधिकांस जनता केंद्र सरकार,राज्य सरकार,स्थानीय प्रशासन के निर्देशानुसार कोरोना से बचने के लिये कष्ट उठाने को तैयार है, किंतु सरकार की ओर से उचित सहयोग अपेक्षित है!
जय हिंद
भवदीय :श्रीराम तिवारी,इंदौर मध्यप्रदेश.
-Golendra Patel

कोरोना और सच की महत्ता : COVID19 【Wuhan Virus~Coronavirus】


कोरोना और सच की महत्ता -
     सच बोलना अपराध हो गया है।सिर्फ राज्य स्वीकृत बातें ही बोल सकते हैं।इससे पता चलता है  जिंदगी का अब स्वतंत्र अस्तित्व खतरे में है। इस ऑरवेलियन नियंत्रित छली समाज व्यवस्था की ट्रंप ने शुरूआत कर दी और धीरे धीरे वे लोग इस रास्ते पर चल निकले हैं जो ट्रंप के यार हैं।छल और नियंत्रण के नए शासन का आरंभ सूत्र है कोरोना के इलाज के बाद जारी होने वाला स्वास्थ्य प्रमाण पत्र। अमेरिका में यह आवाज उठी है अपने चुने गए नुमाइंदों को जनता अपना संरक्षक न समझे।वे जनता के हितों और अधिकारों के संरक्षक नहीं हैं।खासकर पश्चिम में तो ऐसा कोई संरक्षक नहीं है।
ट्रंप प्रशासन ने कोरोना संक्रमण से पीड़ितों के लिए कोविद-19 इम्युनिटी सर्टीफिकेट प्रमाण पत्र जारी करने का प्रस्ताव जारी किया है। मसलन् जिनका कोरोना टेस्ट लिया गया और वे जब रिकवर कर लेते हैं तो उनको एक प्रमाणपत्र दिया जाता है कि वे स्वस्थ हैं उनके शरीर में कोरोना के कोई लक्षण अब नहीं हैं।जिससे वे नौकरी पर लौट सकें।यह प्रमाण पत्र अमेरिका का ‘‘नेशनल इंस्टूट्यूट ऑफ हेल्थ एंड फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’’ जारी करेगा।  
इस प्रमाणपत्र को लेकर अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं।यह प्रमाणपत्र सबको जरूरी होगा।इससे जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी। इस तरह के प्रमाणपत्र को लेकर कोरोना के नेगेटिव और पॉजिटिव मरीजों की संख्या और उनके रजिस्ट्रेशन को लेकर विवाद होगा।उनकी सही संख्या को लेकर मेनीपुलेशन शुरू हो चुका है।कोरोना के टेस्ट को लेकर जो असल समस्या है वह यह कि इसके सही टेस्ट करने के लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।इसके टेस्ट के लिए पीड़ित मनुष्य के शरीर से छोटा सा टीशू का अंश लिया जाता है।उसको विश्लेषण के लिए विस्तारित करते हैं।लेकिन इस प्रक्रिया में यह बताना मुश्किल होता है कि यह वायरस शरीर में कहां कहां फैल गया है।इससे भी अधिक खतरनाक है जबरिया टॉक्सिंग वैक्सीनेशन और उसके बाद दिया जाने वाला प्रमाण पत्र।इस तरह का वैक्सीनेशन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।अनिवार्य वैक्सीनेशन और उसके जरिए कोरोना मुक्त प्रमाणपत्र मुश्किलभरा काम है। यह भी कहा जा रहा है कोरोना के टेस्ट के लिए जो किट इस्तेमाल हो रहे हैं वे अधिक भरोसेमंद नहीं हैं। अमेरिका में ये किट बेहतर प्रिफ़ॉर्म नहीं कर रहे।अभी तक विज्ञानसम्मत कोई टेस्ट कोरोना के लिए सामने नहीं आया है।अब कहा जा रहा है सब लोग टेस्ट कराओ और वैक्सीनेशन लो।सभी लोगों के लिए यह नियम खतरनाक है।
    अब सारी दुनिया में कोरोना को लेकर वैक्सीनेशन कराने की मुहिम सामने आई है। इसकी क्रोनोलॉजी समझने की कोशिश करें-
      कोविद-19 के लिए ‘‘कॉयलेशन फॉर प्रिपेयर्डनेस इन्नोवेसन( सीइपीआई) नामक संगठन का विश्व आर्थिक मंच डावोस, बिल एवं मेलिंडा गेटस फाउंडेशन के प्रायोजन में गठन किया गया है। इस क्रम देखें-
-- सन् 2019 में कोव वैक्सीन की डावोस आर्थिक मंच के सम्मेलन में घोषणा की जाती है।इसके एक सप्ताह बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करता है। यह आपातकाल ऐसे समय घोषित किया जाता है जब चीन के बाहर कन्फर्म केस मात्र 150 थे, इनमें अमेरिका में 6 केस थे।इसके बाद 11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया।सीइटल में मार्च 18 को पहला टेस्ट होता है जिसमें मानवीय स्वयंसेवक भी शिरकत करते हैं।सारी दुनिया में  सीइपीआई के तहत प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप में वैक्सीनेशन की मुहिम चलाने की अपील की जाती है। यह संगठन इस मामले में अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है,इस काम में ‘‘इननोविओ’’ और क्विंसलैंड विश्वविद्यालय आस्ट्रेलिया एक पार्टनरशिप पर साइन करते हैं। उल्लेखनीय है इन दोनों के बीच एक साझा समझौते के तहत पहले से काम चल रहा है।हमारे कुछ मित्र जो आस्ट्रेलिया भक्त हैं वे इस समझौते से अनभिज्ञ हैं और इसके पीछे कार्यरत राजनीतिक-आर्थिक शक्तियों की अनदेखी कर रहे हैं।इन्नोविओ और क्लींसलैंड विश्वविद्यालय के साझे काम को 23 जनवरी को सीइपीआई एक बयान जारी करके पुष्ट करती है।साथ ही कहती है कि उसने इस काम में मॉडर्ना और आईएनसी कंपनियों के साथ यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्टीयस डिजीज को भी इस गठबंधन में शामिल किया है।इन सबके नेतृत्व में अमेरिका में फीयर और पेनिक अभियान चलाया गया है। यह कैम्पेन मौसमी फ्लू के खिलाफ चलाए गए प्रचार अभियान से दस गुना अधिक है।
      जॉन हॉपकिंस इंस्टट्यूट के अनुसार यह एक तथ्य है कि कोरोना के इलाज का बेहद सिम्पल है।सिर्फ उसमें रिकवरी की समस्याओं को जोड़ देना ही पर्याप्त होता। लेकिन टीवी चैनलों की हेडलाइन निरंतर पेनिक क्रिएट करती रही हैं।मीडिया के उन्माद प्रचार के जरिए कोरोना के बारे में विज्ञानसम्मत राय के प्रचार पर कम ध्यान दिया गया।
कोरोना का सत्य वह है जो बीमारी या संक्रमण के रूप में है।दूसरा अघोषित सत्य यह है कि कोरोना के कारण विश्वव्यापी लॉकडाउन चल रहा है। इसके कारण बेकारी,दिवालियापन,भयानक गरीबी और अभाव पैदा हुआ है। इससे अमीरों और भ्रष्टनेताओं को लाभ हो रहा है। छोटे-मंझोले पूंजी के धंधे चौपट हो गए हैं।सिर्फ बड़ी पूंजी के धंधे बचे हैं।पूंजी का केन्द्रीकरण बढा है।यह एक तरह ने बायोलॉजिकल नयी विश्व व्यवस्था की शुरूआत है।इसने मानवीय अधिकारों, जीने अधिकारों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर दिया है।अनेक देशों में आपातकाल और मार्शल लॉ लागू किया जा चुका है।
   असल में जब झूठ को सत्य में बदल दिया जाए तो आप पीछे सत्य की ओर नहीं लौट सकते। इसलिए कोरोना से लड़ने साथ झूठ से लड़ना सबसे बड़ी
चुनौती है। हर स्तर पर झूठ का खेल चल रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर सकता है कोविड-19
इंसानी पहलू - श्यामल मजूमदार /  April 12, 2020
कई लोगों के लिए यह एक अनजानी अनिश्चितता का डर है कि उन्हें कितने दिन तक अपने रोजमर्रा के कामकाज को स्थगित रखना पड़ेगा। कई अन्य को आशंका है कि कहीं वे कोरोनावायरस के संपर्क में न आ जाएं या फिर कहीं यह उनकी वित्तीय हालत को नुकसान न पहुंचाए। परंतु बात केवल इतनी नहीं है। बहुत बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है जिनको आशंका है कि उनका रोजगार छिन सकता है। इसके बाद एक बड़ी चिंता यह है कि लोगों के वेतन में कटौती हो सकती है।
दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कोविड-19 संकट ने आर्थिक और वित्तीय अस्थिरता का एक मिश्रण तैयार किया। इसमें दो राय नहीं कि मौजूदा आशंकाएं सच हैं। लोगों के सामान्य जीवन में भारी उथलपुथल उत्पन्न हो गई है। जाहिर है इसका असर लोगों के भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा। उदाहरण के लिए लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में लोगों ने घबराहट में किराने की जमकर खरीदारी कर ली। यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे अस्थिरता और अनिश्चितता की आशंका में लोग अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। हकीकत में संक्रमित होने का खतरा कई लोगों में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर की आशंका पैदा कर चुका है।
सबसे बड़ी आशंका यह है कि यह महामारी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डाल सकती है। यह कई तरीके से हो सकता है। उदाहरण के लिए घर से काम करना जो शुरुआती दिनों में वरदान प्रतीत हो रहा था वह धीरे-धीरे अरुचिकर प्रतीत होने लगा है। एक आशंका तो यह है कि लगने लगेगा कोई काम है ही नहीं। वहीं दूसरी ओर लोगों में ज्यादा काम करने की प्रवृत्ति पैदा होने लगी है। उन्हें लगने लगा है कि उन्हें लंबे समय तक काम करना चाहिए ताकि वे अपने सहकर्मियों और बॉस को दिखा सकें कि वे काम करते समय दूसरों की तुलना में अधिक उत्पादक रह सकते हैं। जब लोग घर से काम करते हैं और समय पर कोई फोन नहीं उठा पाते या ईमेल का जवाब नहीं दे पाते तो सहकर्मियों को ऐसा लग सकता है कि वे काम को गंभीरता से ले भी रहे हैं या नहीं। आम जीवन में तनाव सामान्य बात है। परंतु एक बात जिसने जाने-अनजाने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालना शुरू कर दिया है वह यह है कि वैश्विक स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियों में नोवेल कोरोनावायरस ने लाखों लोगों को भौतिक रूप से शेष दुनिया से अलग-थलग कर दिया है। भविष्य के अज्ञात भय के साथ मिलकर यह बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अधिकारी के मुताबिक शारीरिक दूरी, पृथक्करण के उपाय, स्कूलों और कार्यालयों का बंद होना आदि कदम खासतौर पर चुनौती भरे हैं। क्योंकि ये कदम उन कामों को प्रभावित करते हैं जो हमें पसंद हैं, हमारे साथियों को हमसे दूर करते हैं।
अकेलापन दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण जोखिमों में से एक है। अब जबकि अनेक लोगों की आजादी से घूमने फिरने की गतिविधियों पर अंकुश लग गया है तो समस्या और बिगड़ गई है। खासतौर पर बुजुर्गों के लिए जिनका सामाजिक जीवन भी सीमित है। यहां डिजिटल युग हमारी सहायता कर सकता है। आखिरकार इससे पहले कभी अपने प्रिय लोगों से जुड़ा रहना इतना आसान नहीं रहा। कम से कम वीडियो कॉल के माध्यम से करीब होने का भ्रम तो होता है। ऐसा लगता है कि हम जिनसे बात कर रहे हैं वे हमारे आसपास हैं।
इस पृथक्करण का लाभ लेने का एक तरीका यह है कि हम उन चीजों की प्राथमिकता तय कर सकते हैं जो हमें पसंद हैं लेकिन जिनके लिए हम अब तक समय नहीं निकाल पा रहे थे। इस एकाकीपन को दूर करने के लिए लोगों को अपने जीवन के उन पहलुओं पर विचार करना चाहिए जिन पर वे अब तक ध्यान नहीं दे पाए थे।
मनोवैज्ञानिक जो सलाह दे रहे हैं उनमें से एक यह है कि कोविड-19 के बारे में कम से कम खबरें देखें, सुनें या पढ़ें क्योंकि वे हमें निराश करती हैं। बस दिन में एक या दो बार इसके बारे में जानकारी जुटाएं। अचानक इस बीमारी के बारे में खबरों की बाढ़ किसी को भी चिंतित कर सकती हैं।
इस समय बच्चों पर ध्यान देना अत्यावश्यक है। बच्चे संवेदनशील हैं और जब वे बड़ों को निराशाजनक ढंग से वायरस के बारे में बात करते देखते हैं तो वे परेशान हो जाते हैं। इसका आगे चलकर उनके मनोविज्ञान पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
अंत में, अब जबकि कोविड-19 के बाद छंटनी और वेतन कटौती अपरिहार्य है तो ऐसे में कंपनियों को ज्यादा सावधानी बरतनी होगी ताकि वे इससे उपजे तनाव से निपट सकें। इससे निपटने के तरीके को जितना पारदर्शी रखा जाए उतना ही अच्छा। हर कोई इसकी वजह से परिचित है लेकिन सभी चाहते हैं कि उनके साथ सम्मान से और समानुभूति से पेश आया जाए। संस्थान से बाहर जा रहे लोगों के साथ आप जिस तरह का व्यवहार करते हैं, उसे संस्थान के बाकी लोग बहुत गौर से देखते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि कोरोनावायरस की महामारी से लडऩा और निपटना केवल शारीरिक या स्वास्थ्यगत चुनौती नहीं है बल्कि यह मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है।(बिजनेस स्टैंडर्ड)
मजदूर और मालिकों का संकट गहराया-
पहले चरण में तीन हफ्ते के लॉकडाउन की घोषणा की गई थी उसके दो दिन पहले ही 23 मार्च को राष्टï्रीय राजमार्ग पर बेलगाचिया से हावड़ा के बीच लगभग लगभग 200 फैक्टरियां शाम 5 बजे बंद हो गईं। बनारस रोड के साथ लगे छोटे और मझोले कारखानों में कमोबेश देश के दूसरे हिस्से जैसा ही नजारा है। यहां सुरक्षा गार्ड और कतार में खड़े ट्रक नजर आते हैं और यहां से नजदीक रहने वाले कामगार गलियों में बैठे सुस्ता रहे हैं।
एक कलपुर्जे कारखाने में काम करने वाले कर्मचारी जलधर सिंह को लॉकडाउन से पहले के सप्ताहांत में वेतन मिला था। यहां करीब 200-250 लोगों को रोजगार मिला हुआ है लेकिन सवाल यह है कि क्या लॉकडाउन की अवधि के लिए पैसा मिलेगा? यह सवाल सिंह के मन में भी बना हुआ है। एक निर्माण इकाई में ठेके पर काम करने वाले कर्मचारी दीपक मंडल की तुलना में सिंह काफी बेहतर हैं जहां साप्ताहिक आधार पर भुगतान किया जाता है। यह पैसा उसके बैंक खाते में जमा हो गया। मंडल को लॉकडाउन के बाद पहले हफ्ते का भुगतान मिला लेकिन उसके बाद से वह अपने फोन पर भुगतान के लिए बैंक का एसएमएस अलर्ट चेक कर रहे हैं लेकिन कोई संदेश नहीं मिला है।
हावड़ा कास्टिंग, मशीन पाट्र्स असेंबल्ड पाट्र्स का केंद्र है और यह देश के साथ दुनिया की जरूरतें पूरी करता है। एक सामान्य गणना के मुताबिक इस क्षेत्र में 400-500 इकाइयों द्वारा 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये का वार्षिक निर्यात किया जाएगा। सिंह और मंडल कारोबारी पदानुक्रम में सबसे नीचे हैं लेकिन हावड़ा में लॉकडाउन से फैक्टरी मालिकों को काफी नुकसान हो रहा है। निर्यात ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं जिसकी वजह से इन इकाइयों को भारी नुकसान हुआ है।
कैलाश अग्रवाल की कंपनी जेपीके मेटालिक्स मैनहोल कवर बनाती है जिसकी आपूर्ति पश्चिम एशिया, यूरोप और आयरलैंड में की जाती है। अग्रवाल के पास पूरा माल भरा हुआ है और उन्हें डर है कि जब तक लॉकडाउन खत्म होगा तब तक निर्यात के ऑर्डर रद्द कर दिए जाएंगे। उन्हें एक महीने में 15 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। जेपीके में करीब 150 अनुबंध वाले संविदा कर्मचारी हैं। ठेकेदार को कर्मचारियों को भुगतान करने के लिए एकमुश्त राशि का भुगतान किया गया है। उन्होंने कहा, 'इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।'
भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद के चेयरमैन रवि सहगल ने कहा कि अगर 15 अप्रैल के बाद भी फैक्टरियों में काम शुरू नहीं हुआ तब बड़ी तादाद में निर्यात ऑर्डर रद्द किए जा सकते हैं। सहगल ने कहा, 'चीन, ब्राजील, तुर्की और मैक्सिको ऐसे देश हैं जहां कारोबार प्रभावित नहीं होता। अमेरिका में भी जहां देश में लॉकडाउन है लेकिन उद्योगों में काम चल रहा है। पश्चिम बंगाल निर्यात के लिए विनिर्माण इकाइयों, विशेष रूप से इंजीनियरिंग क्षेत्र में 50 फीसदी उपस्थिति के साथ परिचालन फिर से शुरू करने की अनुमति देकर अगुआई कर सकता है । हावड़ा परीक्षण का केंद्र बन सकता है।'
सहगल ने कहा कि अगर देश का इंजीनियरिंग क्षेत्र जरूरतों को पूरा करने में असफल रहता है तब आपूर्ति ऑर्डर दूसरे देशों को किया जा सकता है। अप्रैल ऐसा समय है जब ज्यादातर खरीदार छह महीने की खरीदारी की योजना बनाते हैं।
फैब्रिकेशन यूनिट दयाल इंजीनियर्स के मालिक एच के शर्मा को उम्मीद नहीं है कि लॉकडाउन हटाए जाने के बाद कारोबार तुरंत सामान्य हो जाएगा। उन्होंने कहा, 'अगले दो से चार महीने काफी उथल-पुथल वाले रहेंगे। यह एक लेन-देन पर आधारित उद्योग है। जब तक पैसा वापस नहीं आ जाता तक तक चीजें आसान नहीं होंगी।'  शर्मा दरअसल नकदी प्रवाह का जिक्र कर रहे हैं। दयाल इंजीनियर्स फाउंड्री (ढलाईखाना) के लिए स्पेयर पाट्र्स बनाते हैं जो इस वक्त संकट में हैं। जब तक कोई फाउंड्री भुगतान नहीं करता तब तक दयाल उन वेंडरों को भुगतान नहीं कर सकते हैं जो इलेक्ट्रोड और ऑक्सीजन की आपूर्ति करते हैं। यह एक ऐसा चक्र है जिसे चलते रहने की जरूरत है ।
शर्मा को अब भी अपने मजदूरों का भुगतान करना है। उन्होंने पहले ही खुराकी या दैनिक भत्ता सीधे अपने मजदूरों के खातों में ट्रांसफर किया है। लेकिन जब कारखाने खुलेंगे तब उन्हें उनकी मांग भी पूरी करनी होगी। उन्होंने कहा, 'मुझे पैसे की व्यवस्था करनी होगी नहीं तो वे दूसरी जगह काम करने चले जाएंगे।'
हावड़ा चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (एचसीसीआई) के महासचिव संतोष उपाध्याय ने कहा कि अगर सरकार मदद नहीं करती है तब हावड़ा में ज्यादातर खाते फंसे कर्ज में बदल जाएंगे। एचसीसीआई 1,000 से अधिक कारोबारियों और एमएसएमई सदस्यों का प्रतिनिधित्व करता है और इसने पहले से ही प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर राहत देने की गुहार लगाई है।
मांगी गई राहतों में जीएसटी के देर से दाखिल होने पर ब्याज और दंडशुल्क से छूट देने, पूरे लॉकडाउन अवधि के दौरान दीर्घावधि ऋण और कार्यशील पूंजी ऋण पर बैंकों से ब्याज की कुल छूट जैसी मांग शामिल है। चैंबर चाहता है कि ब्याज दर छह महीने के लिए न्यूनतम छह प्रतिशत तक सीमित रहे और रेलवे बोर्ड तथा सरकारी क्षेत्र के तहत चल रहे संयंत्रों को सुझाव दिया जाए कि मार्च में खरीदे गए सामान पर देर से भुगतान के लिए ब्याज न वसूला जाए।
पिछले 5-6 साल में कामगारों और नकदी की कमी के चलते कम से कम 200 इकाइयां बंद कर दी गईं। हालांकि यहां अब भी लोहा और स्टील इकाइयों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब दो लाख कामगार जुड़े हुए हैं।(बिजनेस स्टैंडर्ड,15अप्रैल2020)
छिपाने और छल की कला और कोविद-19
        इस समय एक लाख बीस हजार के करीब डोमेन हैं। इनसे आम लोग कोरोना संबंधी सूचनाओं के लिए आ-जा रहे हैं। इनमें अनेक पोर्टेल के मालिक ठगई कर रहे हैं, छल कर रहे हैं।अनेक किस्म के घोटाले हो रहे हैं।मसलन्, मास्क,कर्ज,बेकारी,वेक्सीन,क्योर आदि को लेकर जबर्दस्त धंधा चल रहा है।अनेक कंपनियों ने तो कुछ खास पदबंधों की खोज के जरिए उनके पोर्टेल में प्रवेश करने वालों पर पाबंदी लगा दी है।इसके बावजूद सोशलमीडिया में मिस-इन्फॉरेमेशन का प्रवाह जारी है।सारी कंपनियां जानती हैं लेकिन अभी तक मिस इन्फॉर्मेशन का प्रवाह रोकने में वे असमर्थ रहे हैं।
      उल्लेखनीय है फेसबक,गूगल,यू ट्यूब,माइक्रोसॉफ्ट, ट्विटर आदि कंपनियों ने मार्च के मध्य में एक साझा बयान जारी किया था जिसमें कोविद-19 से संघर्ष करने वायदा किया गया।यह एक चलताऊ किस्म का साझा बयान था जो इन कंपनियों ने दिया था। इस बयान में मिस इन्फॉर्मेशन से लड़ने और प्रामाणिक सूचनाएं देने का वायदा किया गया था।लेकिन अभी तक ये कंपनियां अपने इस वायदे का पालन नहीं कर पायी हैं।बल्कि इस बीच में उलटा हुआ है।कोरोना से लड़ने के नाम पर अंट-शंट दवाओं के नाम विभिन्न तथाकथित शोधपत्रों में गूगल में प्रकाशित हो रहे हैं। एक ही उदाहरण काफी होगा।
    इंटरनेट पर विशेषज्ञों के एकदल ने ‘‘कोरोना वायरस क्योर’’ के तहत गूगल पर सर्च किया तो पाया कि वहां अनेक तथाकथित शोधपत्र भ्रमण कर रहे हैं लोग बड़ी संख्या में पढ़ रहे हैं और उनकी गलत-सलत सूचनाओं का दुरूपयोग कर रहे हैं। ये पत्र ट्विटर पर भी सर्कुलेट किये जा रहे हैं। इसी तरह का एक शोधपत्र तकनीकी व्यवसायी एलॉन मास्क ने गूगल डॉकूमेंटस में साझा किया । कहा गया यह वैज्ञानिक रिसर्च पेपर है।इसे स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के कैलीफॉर्निया स्थित स्कूल ऑफ मेडीसिन में कार्यरत वैज्ञानिक सलाहकार ने तैयार किया है। इस पेपर के इंटरनेट पर प्रकाशित होते ही दूसरे ही दिन फॉक्स टीवी चैनल ने इस पेपर के आधार फीचर बनाया और कहा कि कोरोना से बचने की दवा है ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’। इस दवा से कोरोना 100फीसदी खत्म हो जाएगा।इसी तरह फ्रांस से एक लघु शोधपत्र सामने या जिसमें दावा किया गया कि ‘‘क्वीनाइन’’ और ‘‘ टॉनिक वाटर’’ और ‘‘मलेरिया ड्रग’’को इंटरनेट पर खोजने वालों की बाढ़ आ गयी।देखते ही देखते बाजार में ये दवाएं और प्रोडक्ट हाथों हाथ बिक गए। इसका अर्थ है इंटरनेट पर जो लिखा जा रहा है उसे जनता पढ़ रही है।सुन रही है।
    फॉक्स टीवी चैनल से कार्यक्रम आने के बाद स्टैंनफोर्ड विश्वविद्यालय ने बयान देकर कहा कि फॉक्स ने जिस व्यक्ति को हमसे जोड़कर पेश किया है उसका हमसे कोई संबंध नहीं है और वह व्यक्ति उनके विश्वविद्यालय के किसी रिसर्च कार्यक्रम में शामिल नहीं रहा है।इस घटना के बाद ट्विटर पर भयानक तूफान आ गया,बड़ी संख्या में डाक्टरों और वैज्ञानिकों ने इस तरह के डिस इनफॉर्मेशन कैम्पेन की आलोचना की।लोगों ने यहां तक लिखा कि इस दवा की अचानक कमी हो गयी और इस दवा को डाक्टर की सलाह के बिना लेने से यह शरीर को नुकसान पहुँचा सकती है।इस तूफान के बाद ट्विटर ने निर्णय लिया और ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’ दवा से संबंधित सैंकड़ों ट्विट हटा दिए। ये सारे ट्विट दक्षिणपंथियों के थे। वे लोग मिस इनफॉर्मेशन फैलाकर जश्न मना रहे थे। जो जश्न मना रहे थे उनमें फॉक्स चैनल की हॉस्ट लोरा इनग्राहम,डोनाल्ड ट्रंप के एटॉर्नी रूड़ी गुईलियानी और कंजरवेटिव पंडित चार्ली के नाम खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। इसके बाद ट्रंप ने इस दवा को लेकर जमकर उत्साह दिखाया.इससे बाजार में केमिस्टों से लेकर पीएम मोदी तक इसका दवाब देखा गया।इससे एक बात पता चलती है कि विज्ञान के बारे में मिस इनफॉर्मेशन फैलाया जाए तो उससे कितने व्यापक स्तर पर नुकसान हो सकता है।इस घटना ने वैज्ञानिकों पर भी दवाब बनाया कि वे कोरोना के लिए दवा न बनाएं।इस तरह के माहौल से राजनेताओं का कोई खास नुकसान नहीं हुआ लेकिन आम जनता और विज्ञान की क्षति जरूर हुई है।
     किसी भी खुले और स्वतंत्र समाज पर थोपे गए देश,जनता के दिमाग का मेनीपुलेशऩ और अग्राह्य को ग्राह्य कराने की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। कोरोना के महासंकट काल में यही सब हो रहा है।बड़े पैमाने पर कोरोना की सच्चाई छिपायी जा रही है।मरीजों की संख्या,नामकरण,मृत्यु,बड़े स्केल पर जनता की निगरानी,असहमति व्यक्त करने पर हमले या पाबंदी,जबरिया कोरेंटाइन या फिर वैक्सीन लगाने की कोशिश आदि चीजें सामने आ रही हैं।यह एक तरह से जनता के नॉर्मल जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश है।इस दौर में
कोरोना त्रासदी-2-
पुलिस के मुताबिक 30 वर्षीय मुकेश बिहार के गया जिले के बारा गांव का रहने वाला था। गुरूग्राम सेक्टर-53 में बनी झुग्गियों में परिवार के साथ रहता था। वह सफेदी का काम करता था। मृतक की पत्नी पूनम ने बताया काम नहीं होने के कारण उनके पास रुपये नहीं थे। इसी कारण वह कारण काफी परेशान रहता था।
फोन बेचकर लाया था राशन
पूनम ने बताया कि गुरुवार को मुकेश में ढाई हजार में अपना फोन बेचा था। उन रुपये से वह खाने की आटा, दाल सहित राशन लेकर आया था। इसके अलावा गर्मी से बचने के लिए पंखा भी लेकर आया। 400 रुपये पत्नी को दिए थे। उसके बाद वह झुग्गी में जाकर लेट गया। उसके दो लड़के और दो लड़कियां बाहर खेल रही थीं, जबकि पत्नी पूनम पास में ही रहने वाले पिता के पास गई थी। ऐसे में गुरुवार दोपहर को झुग्गी में फंदा लगाकर आत्महत्या  कर ली।
रुपये जुटाकर दाह संस्कार
मुकेश ससुर उमेश का पैर टूटा हुआ है। वह चल फिर नहीं पा रहा है। उन्होंने बताया कि मुकेश कई दुकानों से राशन का सामान उधार लेकर आता था और रुपये आने पर चुकाता था। अब दुकानदार भी उधार सामान नहीं दे रहा था। परिवार आर्थिक तंगी से  गुजर रहा था। उन्होंने बताया दाह संस्कार के लिए भी रुपये नहीं थे। झुग्गियों मे रहने वालों ने रुपये एकत्रित किए और उसके बाद दाह संस्कार किया।(दैनिक हिन्दुस्तान)
कोरोना त्रासदी-1-
शुक्रवार को सालारपुर ब्लाक के गांव मोहदीन नगर की राशन गांव निवासी शमीम बानो (40 वर्ष) पत्नी मैकू अली एक किलोमीटर चलकर प्रहलादपुर में राशन की दुकान पर चावल लेने पहुंची थी। तीन घंटे तक शमीम धूप में लाइन में लगे रहने के कारण बेहोश होकर गिर पड़ी। सूचना पर पहुंचे परिजन उसे लेकर कुंवरगांव पहुंचे। यहां डाक्टर ने महिला को बदायूं रेफर कर दिया लेकिन रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया।
ये है मोदी सरकार के मजदूर विरोधी चरित्र की आने वाली झलक
रेल मंत्रालय लॉकडाउन के चलते होने वाले घाटे को पाटने के लिए 13 लाख से अधिक अधिकारियों व कर्मचारियों के वेतन और भत्ते पर कैंची चलाने की योजना बना रहा है। इसके तहत टीए, डीए सहित ओवर टाइम ड्यूटी के भत्तों को समाप्त किया जाएगा।
रेल ड्राइवर-गार्ड को ट्रेन चलाने पर प्रति किलोमीटर के हिसाब से मिलने वाला भत्ता भी नहीं दिया जाएगा। रेलवे का तर्क है कि ड्यूटी करने के लिए कर्मचारियों को भत्ता क्यों दिया जाए। रेलवे पहले ही गंभीर आर्थिक तंगी से गुजर रही है। लॉकडाउन से हालत ओर पतली हो गई है। इसे देखते हुए ओवर टाइम ड्यूटी के लिए मिलने वाले भत्ते में 50% कटौती करने की जरूरत है।
35 फीसदी तक वेतन कम: मेल-एक्सप्रेस के ड्राइवर-गार्ड को 500 किलामीटर पर मिलने वाले 530 रुपये भत्ते में 50% कमी का सुझाव है। रेलकर्मियों के वेतन में छह माह तक कैंची चलाने की सिफारिश की गई है। इसमें 10 फीसदी से 35 फीसदी तक की कटौती की जाएगी।

50% की कटौती संभव: यात्रा, मरीज देखभाल, किलोमीटर समेत नॉन प्रैक्ट्रिस भत्ता में एक वर्ष तक 50% कटौती होनी चाहिए। कर्मचारी एक महीने ऑफिस नहीं आता है तो परिवहन भत्ता सौ फीसदी कटे। बच्चों के पढ़ाई भत्ता के लिए 28 हजार मिलते हैं। इसकी समीक्षा होगी।(दैनिक हिन्दुस्तान)
कोरोना का प्रत्युत्तर.....गोलेन्द्र पटेल!

कोरोना पर मृत्युंजय का पोस्ट


पंकज चतुर्वेदी
भारत में कोरोना टेस्ट के नाम पर रौरव नरक की यात्रा का रीयल आख्यान पढ़ें -
यदि किसी पर कोरोना का संदेह हो तो उस पर क्या बीतती है? यह पोस्ट पढ़ लें फिर समझ आएगा कि अनपढ़ों के मुहल्ले में आती अफवाहों और उससे उपजती आशंका और भय का आधार झूठा नहीं होता।
सुश्री प्योली जिन्होंने यह पोस्ट साझा किया है वे सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रेकॉर्ड हैं::-
कैसी भयावह स्थिति है ज़मीनी स्तर पर, पढ़िए इस पोस्ट को। यह नोएडा निवासी मृत्युंजय शर्मा नामक एक उच्च-मध्यवर्गीय व्यक्ति की आपबीती है, जो सत्ता समर्थक हैं। यह उनके साथ भी होना संभव है, जो ताली, थाली, दिया करते हुए हिंदू मुसलमान का ज़हर उगलते रहते हैं, पर सरकार से कोई सवाल नहीं पूछते और पूछने वालों को घेरते हैं। पढ़िए :
सबसे पहले मैं ये कहना चाहता हूं कि ये कोई पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है, आप मेरे ट्विटर और फेसबुक अकाउंट पर देख सकते हैं कि मैं मोदी सरकार का समर्थक रहा हूं.
लेकिन अब मुझे लगता है कि मोदी सरकार केवल मेकओवर कर रही है और केवल मीडिया हाउस को खरीद कर, टीवी और सोशल मीडिया पर अपना ब्रांड बना कर कैंपेन कर लोगों को मिसलीड कर रही है. इसकी कहानी शुरू होती है, पिछले सोमवार से. पिछले सोमवार से पहले मेरी वाइफ को पिछले एक हफ्ते से फीवर आ रहा था. शायद किसी दवाई की एलर्जी हो गई थी, मेरे घर के पास के ही अस्पताल में ही उसका ट्रीटमेंट चल रहा था. अचानक से उसे कफ की प्रोबलम भी होने लगी. फिजीशियन ने सलाह की कि आप सेफ साइड के लिए कोरोना का टेस्ट करा लो.
टीवी पर देख कर हमें लगता था कि कोरोना का टेस्ट बहुत आसान है और अमेरिका और इटली जैसे देशों से हमारे देश की हालत बहुत अच्छी है. सरकार ने सब व्यवस्था कर रखी है. इसी इंप्रेशन में हमने कोरोना का टेस्ट कराने की बात मान ली.
मुझे पता था कि सरकारी अस्पताल में इतनी अच्छी फेसिलिटी मिलती नहीं है, हमने कोशिश की कि कहीं प्राइवेट में हमारा टेस्ट हो जाए. हालांकि सभी न्यूज़ चैनल यह दिखा रहे थे कि सरकारी अस्पताल में बहुत अच्छी सुविधाएं हैं, लेकिन फिर भी मैंने सोचा कि प्राइवेट लैब में अटेंम्ट करता हूं. कोरोना के टेस्ट के लिए जितने भी प्राइवेट लैब की लिस्ट थी, मैंने वहां कॉन्टेक्ट करने की कोशिश की लेकिन वहां कांटेक्ट नहीं हो पाया. जहां कॉन्टेक्ट हो पाया, उन्होंने मना कर दिया कि वो कोरोना का टेस्ट नहीं कर रहे हैं.
अब मेरे पास आखिरी ऑप्शन बचा था कि गवर्नमेंट की हैल्पलाइन से मदद लेते हैं. मैंने वहां कॉल किया. गवर्नमेंट का सेंट्रल हैल्पलाइन, स्टेट हैल्पलाइन और टोल फ्री नम्बर तीनों पर हमारी फैमली के तीनों व्यस्क लोग, मैं, मेरा भाई और मेरी वाइफ, हम तीनों इन हैल्पलाइन पर फोन लगातार मिलाते रहे.
तकरीबन एक घंटे बाद मेरे भाई के फोन से स्टेट हैल्पलाइन का नंबर मिला. उस हैल्पलाइन से किसी सामान्य कॉल सेंटर की तरह रटा रटाया जवाब देकर कि आपको कल शाम तक आपको फोन आ जाएगा, वगैहरा कह कर फोन डिस्कनेक्ट करने की कोशिश की, लेकिन मैंने बोला कि सिचुएशन क्रिटिकल है, अगर किसी पेशेंट को कोरोना है तो उसे जल्द से जल्द ट्रीटमेंट देना चाहिए, ऐसी सिचुएशन में हम आपकी कॉल का कब तक कॉल करेंगे. हमने उनसे पूछा कि टेस्ट का क्या प्रोसीजर होता है, कॉल के बाद क्या होता है, इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था. मैं निराश हो चुका था.
मेरे पास डीएम गौतमबुद्ध नगर का फोन था. सुहास साहब, उनकी भी बहुत अच्छी ब्रांड है. उनको कॉल किया तो उनके पीए से बात हुई. मैंने उनको बताया कि मेरे घर में एक कोरोना सस्पेक्ट है और कोई भी नम्बर नहीं मिल रहा है, ये क्या सिस्टम बना रखा है, तो उनका कहना था कि इसमें हम क्या करें, ये तो हैल्थ डिपार्टमेंट का काम है तो आप सीएमओ से बात कर लो.
मैंने उनसे कहा कि आप मुझे सीएओ का नम्बर दे दो. उन्होंने कहा, मेरे पास सीएमओ का नंबर नहीं है. यह अपने आप में बड़ा ही फ्रस्टेटिंग था कि डीएम के ऑफिस के पास सीएमओ का नम्बर नहीं है, या डीएम के पीए को इस तरह से ट्रेन किया गया है कि कोई फोन करे तो उसे सीएमओ से बात करने को कहा जाए.
बहुत आर्ग्युमेंट करने के बाद उन्होंने मुझे डीएम के कंट्रोल रूम का नंबर दे दिया कि आप वहां से ले लो. फिर मैं इतना परेशान हो चुका था कि डीएम के कंट्रोल रूम को फोन करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई, फिर मैंने खुद ही इंटरनेट पर नंबर ढूंढ कर निकाला. इसके बाद मैंने सीएमओ को कॉल किया.
सीएमो को कॉल करने के बाद वहां से भी कोई सही जवाब नहीं मिला, उन्होंने कहा, इसमें हम क्या कर सकते हैं आप 108 पर एंबुलेंस को कॉल कर लो. और एंबुलेंस को ये बोलना कि हमें कासना ले चलो. वहीं हमने कोरोनावायरस का आइसोलेशन वार्ड बनाया हुआ है. जबकि मीडिया में दिन रात यह देखने को मिलता है कि नोएडा में कोरोना के इतने बड़े-बड़े अस्पताल हैं, फाइव स्टार आइसोलेशन वार्ड हैं वगैहरा लेकिन फिर भी उन्होंने हमें ग्रेटर नोएडा में कासना जाने को कहा.
फिर बहुत मुश्किल से 108 पर कॉल मिला और फिर घंटे भर की जद्दोजहद के पास 108 के कॉलसेंटर पर बैठे व्यक्ति ने एक एंबुलेंस फाइनल करवाया. जब मेरे पास एंबुलेंस आई उस समय रात के 10 बज चुके थे. मैं शाम के सात बजे से इस पूरी प्रक्रिया में लगा था. यूपी का लॉ एंड ऑर्डर देखते हुए रात के दस बजे मैं अपनी वाइफ को अकेले नहीं जाने दे सकता था.
मेरे घर में 15 महीने की एक छोटी बेटी भी है और घर में केवल एक मेरा एक भाई ही था जिसे बच्चों की केयर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, फिर भी मैं अपनी बच्ची को उसके पास छोड़कर वाइफ के साथ एंबुलेंस में बैठ गया और वहां से आगे निकले.
आगे बढ़ने के बाद ड्राइवर ने बोला कि हम ग्रेटर नोएडा नहीं जा सकते, मुझे खाना भी है, मैंने चार दिन से खाना नहीं खाया और वो बहुत अजीब व्यहवार करने लगा.
फिर वो हमें किसी गांव में ले गया, वहां से उसने अपना खाना और कपड़ा लिया और फिर वहां से दूसरा रूट लेते हुए हमें वो ग्रेटर नोएडा लेकर गया.
हमें गवर्नमेंट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ में हमें ले जाया गया. वहां एक कम डॉक्टर मिलीं जो ट्रेनी ही लग रहीं थीं, उन्होंने दूर से ही वाइफ से पूछा कि आपको क्या सिमटम हैं, वाइफ ने अपने सिमटम बताए, तो उन्होंने कहा कि आप दोनों को कोरोना का टेस्ट करना पड़ेगा. रिपोर्ट 48 घंटे में आ जाएगी. और अगर आप कोरोना का टेस्ट करवाते हैं तो आपको आईसोलेट होना पड़ेगा.
मैंने कहा कि मेरे लिए यह संभव नहीं है, मेरी 15 महीने की बच्ची है, मुझे वापस जाना पड़ेगा, आप बस मुझे वापस भिजवा दो. उन्होंने कहा कि हम वापस नहीं भिजवा सकते हैं. और अगर आप आइसोलेट नहीं होना चाहते हैं तो आप यहीं कहीं बाहर रात गुजार लो सुबह देख लेना आप कैसे वापस जाओगे. यह लॉकडाउन की सिचुएशन की बात है जिसमें कोई भी आने जाने का साधन सड़क पर नहीं मिलता है.
अचानक से उन्होंने किसी को कॉल किया और उधर से किसी मैडम से उनकी बात हुई और उन्होंने फोन पर कहा कि नहीं हम हस्बैंड को नहीं जाने दे सकते क्योंकि वो भी एंबुलेंस में साथ में आए हैं.
मैंने उनसे कहा कि 48 घंटे तो मेरा भाई मैनेज कर लेगा लेकिन आप पक्का बताइए कि 48 घंटे में रिपोर्ट आ जाएगी? इस पर उन्होंने कहा कि हां 48 घंटे में रिपोर्ट आ जाएगी आप अपना सैंपल दे दो. रात को ही हमारी सैंपलिंग हो गई और फिर से हमें एंबुलेंस में बिठाला गया.
एंबुलेंस में हमें तीन और सस्पेक्ट्स के साथ बिठाला गया और इसके पूरे चांस थे कि अगर मुझे कोरोना नहीं भी होता और उन तीनों में से किसी को होता, तो मुझे और मेरी बीवी को भी कोरोना हो जाता.
एक एबुंलेंस में पांच लोगों को पास-पास बिठाया गया. उनकी सैंपलिंग भी हमारे आस-पास ही हुई थी. इसके बाद हमें वहां से दो तीन किलोमीटर दूर एससीएसटी हॉस्टल मे आइसोलेशन में ले जाया गया.
मेरी सैंपलिंग होने के बाद भी ना मुझे कोई ट्रैकिंग नंबर दिया गया, ना मेरा कोई रिकॉर्ड मुझे दिया गया कि मैं कहां हूं मेरे पास कोई जानकारी नहीं थी. इसके पास मेरी वाइफ को लेडीज वार्ड भेज दिया गया और मुझे जेंट्स वार्ड.
जेंट्स और लेडीज़ दोनों का वॉशरूम कॉमन था. जब मुझे मेरा रूम दिया गया तो वहां चारपाई पर बेडशीट के नाम पर एक पतला सा कपड़ा पड़ा हुआ था और दूसरा कपड़ा मुझे दिया गया और बोला गया कि आप पुराना बेडशीट हटा कर ये बिछा लेना.
रात के एक बज रहे थे, जो खाना मुझे दिया गया वो खराब हो चुका था, लेकिन मैंने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया मैं बिना खाए वैसे ही सो गया.
उसके बाद मैं सुबह उठा मुझे फ्रेश होना था, मैं नीचे गया और हाथ धोने के लिए साबुन मांगा. मुझे जवाब मिला कि पानी से ही हाथ धो लेना. सैनिटाइजेशन के नाम पर जीरो था वो आइसोलेशन सेंटर. चारों तरफ कूड़ा फैला पड़ा था.
मुझे एक -दो घंटे कह कर पूरे दिन साबुन का इंतजार करवाया गया लेकिन मुझे साबुन नहीं मिला. इस चक्कर में ना मैंने खाना खाया औ ना मैं फ्रेश हो पाया. मैंने सोचा कि केवल 48 घंटे की बात है, काट लेंगे.
अगले दिन जब मैं फिर गया साबुन मांगने तो फिर मुझे आधे घंटे में साबुन आ रहा है कह कर टाल दिया गया. करीब 12 बजे मेरी उनसे बहस हो गई तो उन्होंने अपने लिक्विड सोप में से थोड़ा सा मुझे एक कप में दिया तब जाकर मैं फ्रेश हो पाया और मैंने खाना खाया.
वहां बिना कपड़ों और सफाई के हालत खराब हो रही थी, 48 घंटे के बाद मैं पूछने गया तो मुझे बताया कि इतनी जल्दी नहीं आती है रिपोर्ट 3-4 दिन इंतजार करना होगा. वहां उन्होंने बाउंसर टाइप कुछ लोग भी बिठा रखे हैं ताकि कोई ज्यादा सवाल जवाब ना करे. वहां मैंने देखा कि वहां चाहें आप नेगेटिव हो या पॉजिटिव हो किसी की भी 7-8 दिन से पहले रिपोर्ट नहीं आती है.
हर हाल में मरना है, सरकार आपके लिए वहां कुछ नहीं कर रही है. केवल आपको आइसोलेशन वार्ड में डाल दिया जाता है कि केवल सरकार की नाकामी छिप जाए. देट्स इट.
वहां पर 80% लोग जमात और मरकज वाले और उनके संपर्क वाले लोग थे. उनका भी यही हाल था. उनकी भी रिपोर्ट नहीं बताई जा रही थी.
करीब 72 घंटे बाद जब मैंने दोबार पूछा कि मेरी रिपोर्ट नहीं आ रही है तो वहां पर मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि हमें नहीं पता होता है कि आपकी रिपोर्ट कब आएगी. हमें केवल इतना पता है कि आपको यहां से जाने नहीं देना है जब तक आपकी रिपोर्ट नहीं आ जाती है.
मुझे लग रहा था कि उनके पास कोई इंफॉर्मेशन नहीं थी, कोई ट्रैकिंग की व्यवस्था नहीं थी. जो पहले आ रहा था वो बाद में जा रहा था, जो बाद आ रहा था वो पहले जा रहा था.
मैंने दोबारा डीएम के नंबर पर कॉल करना शुरू किया, फिर वो स्विच ऑफ हो गया और फिर वो आज तक वो नंबर बंद है, शायद नंबर बदल लिया है. फिर मैंने नोएडा के सीएमओ को कॉल करना शुरू किया, उन्होंने कॉल नहीं उठाया.
मैंने मैसेज किया कि मेरी 15 महीने की बेटी है जो मदर फीड पर है और फिलहाल मेरे भाई के साथ अकेली है, मुझे आपसे मदद चाहिए. लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं आया.
मुझे समझ नहीं आताा कि कोरोनावायरस के इतने क्रूशियल समय में आप कैसे 5-6 दिन में रिपोर्ट दे सकते हैं!
सीएमओ ने मेरा मैसेज पढ़ा और फिर मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया. फिर मैंने डिप्टी सीएमओ को भी कॉल किया लेकिन फोन नहीं उठा. मैंने काफी हाथ-पैर मारे, मेरा फ्रस्ट्रेशन बहुत बढ गया था. एक डॉक्टर आते हैं वहां नाइट ड्यूटी पर, उन्होंने कहा कि मेरे पास कोई इंफॉर्मेशन नहीं हैं यहां पर मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता, आप मुझसे कल सुबह बात करना.
मेरे साथ ही एक और लड़का आइसोलेट हुआ था, गंदगी और गर्मी के कारण वो कल मेरे सामने बेहोश हो गया. कोई उसे उठाने, उसे छूने के लिए, उसके पास जाने को राजी नहीं था.
वहां किसी भी पेशेंट की तबियत खराब हो रही थी तो कोई उसके पास नहीं जा रहा था. अगर किसी को फीवर है तो पैरासिटामोट देकर वार्ड के अंदर चुपचाप सोने को कहा जा रहा था. सीढियों के पास इतना कूड़ा इकठ्ठा हो रहा था कि बदबू के मारे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था.
सब केवल अपनी औपचारिकता कर रहे थे वहां. बड़े अधिकारी जो वहां विजिट कर रहे थे वो बाहर से ही बाहर निकल जा रहे थे, अंदर आकर हालात जानने की कोशिश किसी ने नहीं की.
आखिरकार कल शाम तक जब मेरी रिपोर्ट नहीं आई और मेरे साथ वालों की आ गई तो मैंने उनसे फिर पूछा कि मेरी रिपोर्ट क्यों नहीं आई अभी तक. क्यों कोई ट्रेकिंग सिस्टम नहीं है, क्यों किसी को कुछ पता नहीं है. तो उनका वही रटा रटाया जवाब मिला कि हम केवल आइसोलेट करके रखते हैं, हमें इसके अलावा और कोई जानकारी नहीं है. जब रिपोर्ट आएगी आप तभी यहां से जाओगे.
कोरोना आईसोलेशन वार्ड की यूज किया हुआ बिस्तर
इसके बाद मेरी वाइफ का फोन आया कि उन्होंने सुना है कि लेडीज को कहीं और शिफ्ट कर रहे हैं, किसी और जगह ले जाएंगे. मैं अपनी वाइफ के साथ नीचे गया और पता चला कि लेडीज को गलगोटिया यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर रहे हैं.
मैंने उनसे कहा कि मैं अपनी वाइफ को अकेले नहीं जाने दूंगा. वरना अगर इन्हें कुछ भी होता है तो आप रेस्पोंसिबल होगे. फिर उन्होंने मेरी बात मानी और कहा कि आपको भी इनके साथ भेज देंगे और फिर उन्होंने मुझे बाहर बुला लिया.
बाहर बुलाने के बाद में उन्होंने मेरे हाथ में पर्ची पकड़ाई कि ये इस वार्ड से उस वार्ड में आपका ट्रांसफर स्लिप है. मैंने पर्ची को देखा तो उसमें पहली लाइन में मुझे लिखा दिखा कि "मृत्युंजय कोविड -19 नेगेटिव".
इस पर मैंने उनसे कहा कि अरे जब मेरी रिपोर्ट आई हुई है तो आप मुझे दूसरे वॉर्ड में क्यों भेज रहे हो. इस पर उन्होंने मेरे हाथ से पर्ची ले ली और कहा कि शायद कोई गलती हो गई है. इतने गैरजिम्मेदार लोग हैं वहां पर.
फिर उन्होंने क्रॉसवेरिफाई किया और बाहर आकर कहा कि हां आपकी रिपोर्ट आ गई है. आपकी रिपोर्ट नेगेटिव है. आपकी वाइफ की रिपोर्ट नहीं आई है. इन्हें जाना पड़ेगा. आप इस एंबुलेंस में बैठो, आपकी वाइफ दूसरी एंबुलेंस में बैठेंगी.
मैंने उनसे सवाल किया कि मेरी वाइफ की सैंपलिंग मेरे से पहले हुई थी तो ऐसा कैसे पॉसिबल है कि मेरी रिपोर्ट आ गई लेकिन मेरी वाइफ की नहीं आई? मैंने सोचा ज़रूर कुछ गलती है.
मैंने एंबुलेंस रुकवा दी कि मैं बिना जानकारी के नहीं जाने दूंगा. फिर वो दो स्टाफ के साथ अंदर गए और फिर कुछ देर बाद बाहर आकर बताया कि हां आपकी वाइफ का भी नेगेटिव आया है.
वहां कोई प्रोसेस, कोई सिस्टम नहीं है, जिसके जो मन आ रहा है वो किए जा रहा है. किसी को नहीं पता कि चल क्या रहा है. फिर उन्होंने कहा कि आप दोनों अब घर जा सकते हो. वापस आते हुए भी एंबुलेंस में पांच और लोग साथ में थे.
वहां हाइजीन की खराब स्थिति के कारण पूरे चांस हैं कि अगर आपको कोरोना नहीं भी है आइसोलेशन वार्ड या एंबुलेंस में आपको कोरोना हो जाए. अगर आपको कोरोना नहीं भी है तो आप वहां से नहीं बच सकते हो.
पहले एंबुलेंस ड्राइवर ने हमें कहा कि वो नोएडा सेक्टर 122 हमें छोड़ देगा. लेकिन हमें निठारी छोड़ दिया गया. हमसे कहा गया कि आप यहां पर वेट करो , मैं दूसरी सवारी को छोड़ने जा रहा हूं. 102 नंबर की गाड़ी आएगी वो आपको लेकर जाएगी.
वहां आधा घंटा इंतजार करने के बाद जब मैंने वापस कॉल की और पूछा कि कब आएगी गाड़ी किया तो उन्होंने कहा कि हमारी जिम्मेदारी यहीं तक की थी. आगे आप देखो.
फिर हम वहां और खड़े रहे. लगभग आधा घंटा और बीता और बीता और जो एंबुलेंस का ड्राइवर हमें छोड़ कर गया था वो वापस लौटा.
हमें वहीं खड़ा देख कर रुक गया. कहने लगा कि अरे बाबूजी मैं क्या करुं मैं तो खुद परेशान हूं चार दिन से खाना नहीं खाया है, हालत खराब है. मेरे सामने ही उसने वीड मारी और कहने लगा कि 12 से ऊपर हो रहे हैं आप काफी परेशान हो, मैं आपको छोड़ देता हूं.
एंबुलेंस ड्राइवर अपने दो-तीन साथियों के साथ एंबुलेंस में बैठा और फिर वो रात के 1 बजे मेरी सोसाएटी से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर ही वो मुझे छोड़ कर चला गया.
यह कहानी बहुत कम करके मैंने बताई है, कि क्या सिस्टम जमीन पर है और क्या मीडिया में दिखता है. जब आप ग्राउंड लेवल पर आते हो तो कोई रेस्पोंसिबल नहीं है आपकी हैल्थ के लिए, आपकी सिक्योरिटी के लिए, आपके कंसर्न के लिए और आपकी जान के लिए.
  (मृत्युंजय की पोस्ट Pyoli Swatija की वॉल से।)

गाँधी और अंबेडकर


जिस समय देश के स्वंतत्रता सेनानी एकजुट होकर साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ रहे थे, स्वंतत्रता आंदोलन निर्णायक भूमिका की तरफ कदम बढ़ा रहा था उस समय गाँधी और अंबेडकर में आजादी के स्वरूप को लेकर बहस भी चल रही थी। अंबेडकर अंग्रेजों के साथ ही जातिवादी और सामंतवादी ताकतों के शोषण से वंचित समाज की मुक्ति चाहते थे। ये वही ताकतें थी जिन्होंने वंचित समाज का सदियों से शोषण किया था। गाँधी इसको घर की आंतरिक समस्या मानकर बाद में इसके समाधान की बात कर रहे थे। अंबेडकर वंचित समाज की इस गुलामी को अंग्रेजों से मुक्ति के साथ ही खत्म करने की बात कर रहे थे और निरंतर वंचित समाज की आवाज बनकर संघर्ष कर रहे थे। उस समय यह देखना जरूरी हो जाता है कि साहित्य का आलोचक, इतिहासकार और चिंतक वंचित समाज के बीच से निकलकर आने वाली रचनाओं को किस रूप में देख रहा था। खासकर कबीर और रैदास की रचनाओं के प्रति उसका क्या रुख था। ये वही रचनाएँ हैं जो वंचित समाज की संवेदना और पीड़ा से परिचित कराती हैं। यदि चिंतक और इतिहासकार की दृष्टि में इनकी कविताएँ कविता की सीमा रेखा के बाहर नजर आती हैं तो उस इतिहास और चिंतन पर प्रश्न खड़े करना जरूरी हो जाता है। यदि उस समय का चिंतक और इतिहासकार वंचित समाज के कवियों से नहीं टकरा रहा है और उनकी संवेदना से कोई सरोकार नहीं स्थापित कर रहा है तो स्वाभाविक है कि वह नये तरह के साम्राज्यवाद को रचने की कोशिश कर रहा है। आज यह जरूरी हो जाता है कि उस समय के इतिहास और चिंतन का फिर से सचेत मूल्यांकन किया जाय और उसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किया जाय। इससे किसी को किसी तरह का परहेज नहीं होना चाहिए।
-गोलेन्द्र पटेल

Friday, 17 April 2020

उत्तर कोरोना : प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल


उत्तर - कोरोना...... (Post-Corona)
(आत्माएं होंगी,आत्मीयता न होगी!)
@श्रीप्रकाश शुक्ल)
मैने तुम्हें फोन किया और तुम मुझसे उत्तर मांग रहे हो
समय सुबह का है
सूरज की चमक थोड़ी गाढ़ी हुई ही थी
कि नदियों के स्वच्छ होते जल और वातावरण में बढती हुई आक्सीजन के बीच 
आसमान में निचाट सन्नाटा  है
और तुम कहते हो
यह उत्तर- कोरोना तो नहीं है!
कितना विकट समय है कि जब दुनिया का सारा विज्ञान एक रोएं के हजारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है
लगभग एक ब्रह्म की सूक्ष्म सत्ता की तरह इधर उधर छिटक रहा है
अपने स्वरूप को लगातार बदलता हुआ हर क्षण धरती का खून पी रहा है
तुम मुझसे उत्तर की अपेक्षा कर रहे हो
अब जबकि वर्तमान से बाहर आने की उम्मीद  कम ही  बची  है
चिडियों की बढ़ती चहचहाहट  के बीच
दुनिया के सारे देवता असहाय व असुरक्षित हो गए हैं
अल्लाह,ईसा ,मूसा और ईश्वर
सबके सब मुंह बांध कर अपने अपने कमरे में कैद हैं
और पुतलियों की जाती हुई गति से दुनिया को आते  हुए देख रहे हैं
तुम कोरोना के उत्तर से उत्तर -कोरोना की बात क्यों कर रहे हो
क्या तुम जानते हो
यह आस्थाओं के फड़फड़ाने का दौर है
जिसमें संत कवियों की एक बार फिर से वापसी हो रही है
जब उन्होंने कहा था कि इस जगत में एक ही ब्रह्म की सत्ता है
बाकी सब मिथ्या  है!
ठीक इसी जगह पर दुनिया बदल रही है
और बदलते हुए कोरोना के चरित्र में
खुद के लिए एक उत्तर खोज रही है
शायद उत्तर कोरोना का उत्तर-----
जहाँ अभिव्यक्तियाँ होंगी
लेकिन आस्वाद न होगा
लोग लौट रहे होंगे
लेकिन लौटने के लिए कुछ न होगा
आत्माएं होंगी आत्मीयता न होगी
एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी
यह चिंताओं व शंकाओं  के संघर्ष का दौर होगा
जिसमें हर कुछ एक भय की  तरह समर्पित होगा
जहां स्वीकारने के अलावा और कुछ न होगा
और संघर्ष के मोर्चे पर हर बार विवेक ही मारा जायेगा
आदतें कुछ ऐसी होंगी
एक खास जंग के जैसी होंगी
जीवन निर्वात होगा
संघर्ष हवाओं का होगा
सत्ताएं उदार होंगी
शासन सख्त होगा
देश का हर आदमी लड़ेगा सिपाही की तरह
लेकिन हर बार मारा जाएगा एक नागरिक के मोर्चे पर
शासक बहुत उदार होंगे
लेकिन उनमें सब कुछ को पाने की एक जल्दी होगी
लगभग इस समय की वाचाल मीडिया की तरह
जहाँ ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीखता है
अद्भुत होगा यह समय की अद्भुत जैसा कुछ नही होगा
केवल एक पुरातन की स्मृति होगी
और सभ्यता के एक वायरल इफेक्ट जैसा
खोने व पाने का संघर्ष होगा
हर नए विकल्प को  अनचाही आस्थाओं का आदिम स्वर देता हुआ
यह असहाय कथाओं के सर्जन का समय होगा
जिसमें कथाएं तो बहुत होंगी
काव्यत्व उतना ही कम होगा
स्मृति में मनोरंजन की सुविधाएं होंगी
आकांक्षा में ढेर सारी दुविधाओं के बीच
यह एक दूसरे की तारीफ का दौर होगा
जिसमें सराहनाएं भी शातिर होंगी
जहां एक ताकत दूसरे को आजमा  रही होगी
खोए हुए को पाने की जिद में
दुनिया दौड़ रही होगी
जिसकी जद में  आयी हुई सभ्यता
अपनी संपूर्णता में कराह रही होगी
यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा
क्या तुम जानते हो
वायरस का कोई पूर्व काल नहीं होता
उसका सिर्फ एक वर्तमान होता है
जो सदा एक उत्तर में बदल रहा होता है
यह विचार नहीं
व्यवहार समझता है
और तुम्हारा व्यवहार है कि इसकी आकंठ उलाहनाओं के बीच
पूंजी  की ताकत के सामने सदा झुका रहता है
एक स्थायी विनम्रता की तरह!
@श्रीप्रकाश शुक्ल-12-4-2020)

कोरोना और उसके बाद (साहित्य में कोरोना वायरस) -/- गोलेन्द्र पटेल


**कोरोना और उसके बाद**

हे स्त्री!
मैं पुरुष हूँ
मेरे पैरों में
बाँधो घुँघरू ;
क्योंकि
मुझ में
पुरुषत्व नहीं!
न ही कोई
विकल्प
न ही कोई
संकल्प ;
न ही कोई
संवेदना
न ही कोई
चेतना।
भरी दोपहरी में
चौंधियाई आँखों से
रूप पर पडे़ धूप देख
एक नदी कहती
समुद्र के भीतर समन्वय है
तरंग और उमंग का
स्वप्न और संघर्ष का
रंग और जंग का
धन्य और अन्य का....
यह नदी
उन युवतीयों के नयन नीर का
जो सदियों से
दो रूप में रोती हैं :
विरहिणी या विधवा
तवे पर तले ताज़े तकदीर को
विरहाग्नि से खौलते अदहन में
मैंने पकाना-खाना जाना
वक्त से पहले बन दिवाना
लॉकडाउन के कहर में घर
अब आह उह का स्वर
सुबह दोपहर शाम आधी रात
या आठों पहर में जहर
लगने लगे हैं : सामाजिकता के विरुद्ध
न मुझ में प्रेम है न वासना
बस परिवर्तन का रोग है खाँसना
स्पर्श शब्द से नफ़रत है हँसना
चुंबन के चंगुल में नहीं फँसना
समय का सच्चा प्यार है या न्याय
अच्छा तो क्या कह रहे थे
मेरी आँखें लग थीं : पुनः दोहराओ अपनी बात
कैसे दोहराऊँ लिख कर थोड़े लाया था
बस कुछ संकेत करता हूँ
समय के अभाव में
मैं जीना नहीं चाहता
अपने बच्चों के पेट में उठी दर्द का शंखनाद देख-सून
और तुम्हारे गर्भ में भूख से तड़पते भावी बच्चे को भी
द्वीप का दीप बुझ रहे हैं धीरे धीरे
एक मैं हूँ अकेला नदी के तीरे तीरे
जलीय जीवों के तलाश में भटकता
न मच्छली न घोंघा न सीप न अन्य
कुछ भी नहीं पकड़ पाया काव्यसरिता में
मुझे पहना दो चुड़ियाँ
कर्षित प्रेम कविता में
"अकाल और उसके बाद" में एक उम्मीद थी
पर "कोरोना और उसके बाद" में केवल ख़ौफ़
जो भयंकर डर ,भय ,त्रासदी ,सन्नाटा.....आदि को
जीवन के विरुद्ध जन्म दे रहा है इन दिनों
-गोलेन्द्र पटेल
**कोरोना और उसके बाद** से
मौत का तांडव,

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...