Monday, 20 April 2020

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहासदृष्टि : सम्प्रदायिक ,जातिवादी / वर्णवादी है या नहीं - गोलेन्द्र पटेल


//कोरोना काल में शुक्ल पर बवाल क्यों//
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औपनिवेशिक काल का यह यह चित्र उस चित्र कुछ ऊपरी हिस्से से मेल खाता है जिसमें आम्बेडकर भी फिरंगी टाई और कोट से शुक्ल की तरह लैस हैं।पहनावे का अंतर सिर्फ इतना है कि आंबेडकर नीचे फूल पेंट पहनते थे और शुक्ल धोती। इसलिए आंबेडकर और शुक्ल दोनों
पर औपनिवेशिक पाश्चात्य चेतना का घर प्रभाव है।उपनिवेशवाद हमारी भलाई के लिए नहीं आया था,अब यह जगजाहिर है।
      शुक्ल में प्राच्य जातिवादी साम्प्रदायिक चेतना का भी प्रभाव है।लेकिन इस पर कमोवेश बहस लंबे समय से होती रही है।फिर इसमें नया क्या है?नया है देश काल और उसका प्रोडक्ट।।    
         कोरोना काल में बड़ी मानवता की हिफाजत के बजाए जात धरम पर बहस सत्ता और मीडिया कर रहे हैं और हम उसके असर के शिकार मनीषा हो चुके हैं।मुझे दुख है कि हिंदी के ढेर सारे पढ़े लिखे बौद्धिक हंसुआ के विवाह में खुरपी के गीत जैसी कहावत के ट्रैक में फंस गए हैं।यह अमानवीय कर्म भी है।
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      बात चली है तो ध्यान रखिए कि यह सनसनी साहित्य में सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारन्टीन की उपज है। एकेडमिक जगत पाखण्ड और अवसरवाद के लॉक डाउन का शिकार लंबे समय से है। इसलिए नियति के ये दिन आने ही थे।
         हिंदी के कुएं में पानी जैसे जैसे कम होता जाएगा,मेढ़क की टर्र टर्र बढ़ती जाएगी।सच तो यह है कि आलोचना और शोध से छत्तीस के आंकड़े रखनेवाले के एकेडमिक कुल का विस्तार लगातार होता रहा और उसको हमारे योग्य आचार्यों ने बेशर्म बढ़ावा दिया।आज उसकी कूट फसल यह पीढ़ी है।
        जब शोध और आलोचना के नाम पर घर धुलाई,कार पोछाई,ओझाई और  चेलाई ही करवानी है तो उसका सह उत्पाद ऐसा ही होगा।।    
         हिंदी के शीर्ष आलोचकों ने विश्व ज्ञान को साधा था,तब कुछ दे गए।जो दे गए चाहे शुक्ल-द्विवेदी हों या नामवर-मैनेजर उनकी जड़ें प्राच्य और पश्चिम की ज्ञान और साहित्य परम्परा में सतर्क ढंग से धंसी हुई है।
      दुनिया के दो समकालीन मार्क्सवादी  आलोचक टेरी ईगलटन और फ्रेडरिक जेमेसन को पढ़िए तो पता चलता है कि वे अपनी परंपरा से कितने जुड़े हैं।
         असहमति का साहस और सहमति का विवेक दोनों हमारे आसपास रणनीति के तहत नष्ट किए गए हैं। जातिवादी और कुलीन ब्राह्मण समुदाय को शुक्ल जी पसंद हैं तो यह दोनों का दुर्भाग्य है और इसी कारण दलित को शुक्ल जी से घृणा है तब भी दोनों की बदनसीबी है।
         वस्तुतः नवकुल नक्काल की भड़ैती ही उनका साहित्यिक शगल है।एक कहावत है यथा गुरु तथा चेला/मांगे गुड़ दे ढेला।
     मुझे तो इस बहस में सनसनी,उत्तेजना,अनपढपन और तथ्यहीनता ही ज्यादा दिख रही है।जिस बहस का मूल ही अनपढपन और अवसरवादी सनसनाहट का शिकार हो उसके अतिरिक्त विस्तार का नतीजा रिक्त ही होगा।
         कोरोना महामारी की विकट घड़ी में जिस तरह सत्ता जात धरम की राजनीति से मानवता को घायल कर रही है,उसी का बाई प्रोडक्ट यह उथला एकालाप है।जहाँ देखिए हिंदी के मास्टर और एकेडमिक जगत से परमकुंठा पालने वाले कथित लेखक मच्छर गान गाए जा रहे हैं।न राग न लय, फिर भी प्रलय!!!...


जो रचनाएँ पूजनीय हो चुकी हैं उनको शिक्षण संस्थाओं में नहीं पढ़ाना चाहिए। शिक्षा तर्क करने और विचार व्यक्त करने का अधिकार देती है। जो लोग किसी रचना को पूजनीय मानते हैं उनको यह पहल जरूर करना चाहिए। क्योंकि शिक्षण संस्थानों में पढ़ाये जाने पर बार-बार उनकी उपादेयता पर प्रश्न जरूर होंगे।

जिस समय देश के स्वंतत्रता सेनानी एकजुट होकर साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ रहे थे, स्वंतत्रता आंदोलन निर्णायक भूमिका की तरफ कदम बढ़ा रहा था उस समय गाँधी और अंबेडकर में आजादी के स्वरूप को लेकर बहस भी चल रही थी। अंबेडकर अंग्रेजों के साथ ही जातिवादी और सामंतवादी ताकतों के शोषण से वंचित समाज की मुक्ति चाहते थे। ये वही ताकतें थी जिन्होंने वंचित समाज का सदियों से शोषण किया था। गाँधी इसको घर की आंतरिक समस्या मानकर बाद में इसके समाधान की बात कर रहे थे। अंबेडकर वंचित समाज की इस गुलामी को अंग्रेजों से मुक्ति के साथ ही खत्म करने की बात कर रहे थे और निरंतर वंचित समाज की आवाज बनकर संघर्ष कर रहे थे। उस समय यह देखना जरूरी हो जाता है कि साहित्य का आलोचक, इतिहासकार और चिंतक वंचित समाज के बीच से निकलकर आने वाली रचनाओं को किस रूप में देख रहा था। खासकर कबीर और रैदास की रचनाओं के प्रति उसका क्या रुख था। ये वही रचनाएँ हैं जो वंचित समाज की संवेदना और पीड़ा से परिचित कराती हैं। यदि चिंतक और इतिहासकार की दृष्टि में इनकी कविताएँ कविता की सीमा रेखा के बाहर नजर आती हैं तो उस इतिहास और चिंतन पर प्रश्न खड़े करना जरूरी हो जाता है। यदि उस समय का चिंतक और इतिहासकार वंचित समाज के कवियों से नहीं टकरा रहा है और उनकी संवेदना से कोई सरोकार नहीं स्थापित कर रहा है तो स्वाभाविक है कि वह नये तरह के साम्राज्यवाद को रचने की कोशिश कर रहा है। आज यह जरूरी हो जाता है कि उस समय के इतिहास और चिंतन का फिर से सचेत मूल्यांकन किया जाय और उसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किया जाय। इससे किसी को किसी तरह का परहेज नहीं होना चाहिए।
बी एच यू बना बौद्धिक हॉटस्पॉट : इसे क्वारंटाइन की जल्द जरूरत है
एक वरिष्ठ हैं सुनते हैं बड़े गरिष्ठ हैं| कविता पर आज तक एक वाक्य भी नहीं लिखा हैं और नई सदी की कविता का इतिहास बनाने चले हैं| यह कोरोना में ही सम्भव है कि जो कविता का एक वाक्य न लिखा हो, वह कविता का इतिहास बनाने निकल पड़ा हो|

दूसरे वरिष्ठ के सशक्त प्रतिरोधी कनिष्ठ हैं| ऐसे कनिष्ठ हैं कि अभी दो दिन शोध में आए हुआ है, और मुझे नहीं लगता कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास को ठीक से पढ़ा भी है, लेकिन करें क्या कि प्रासंगिकता के लिए शुक्ल जी से ही टकरा गए|
अब ये भी कोरोना में ही सम्भव है कि बिना किसी को पढ़े बिना किसी को जाने आप किसी से टकरा जाएं...अब भाई बदनाम तो होंगे क्या नाम भी न होगा?
दुर्भाग्य यह है, कि जैसे कई नौजवान कवि कोरोना काल में वरिष्ठ का शिकार हो गये, वैसे ही कई वरिष्ठ रचनाकर इस काल में कनिष्ठ के शिकार हो गए|
मुझे इसकी चिंता ज्यादे हो रही है कि यदि ये लॉकडाउन आगे बढ़ा तो हिंदी सहित्य का इतिहास किस रूप में समृद्ध किया जाएगा? यह देखने की बात होगी|
सम्भव है कि हिंदी साहित्य को बचाने के लिए हिंदी के प्रशासनिक ढाँचे के लोग आगे आएं और इस लॉक डाउन को जल्दी ख़त्म कराने का प्रयास करें| अन्यथा हिंदी का ऐसा इतिहास लिखा जाएगा जो भूतो न भविष्यत होगा|
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास पर  जब विचार-विमर्श , आरोप -प्रत्यारोप, आलोचनाएँ हो ही रहीं हैं, तो कुछ विचार-विमर्श इसपर भी हो कि - आचार्य शुक्ल के इतिहास में कितनी ऐसी नई अन्तरदृष्टियाँ हैं, जिनकों लेकर नये-नये शोध , नये-नये विचार विमर्श और आलोचनाओं के मार्ग प्रशस्त होते हैं । मुझे तो आचार्य शुक्ल से ज़्यादा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'हिन्दी
साहित्य की भूमिका' में ऐसे नये शोध ,आलोचना,विमर्श के मार्ग मिलते हैं... मैं हिन्दी के विद्वानों को इस पर अपने विचार रखने के लिये आमन्त्रित करता हूँ।
फेसबुक पर शुक्ल जी पर अब कुछ लिखना उमड़ते उदधि में कागज की नाव तैराने जैसा हो गया है,पर वादा किया था, सो जाति के प्रश्न पर भी अपनी बात रखूंगा |
साथियों, शुक्ल जी वैसे ही हिंदी साहित्येतिहास का पक्का ढांचा खड़ा कर रहे थे जैसे उसी दौर में म. प्र.द्विवेदी हिंदी भाषा का पक्का ढांचा बना रहे थे |यह दौर हिंदी भाषा और साहित्य के स्थिरीकरण का है, तो स्वाभाविक है कि इसका लक्ष्य 'शिक्षित जनता 'को ही होना था,ठेठ अपढ लोक में बहावमिलना था, ठहराव  नहीं|यह हमें जानना चाहिए कि शुक्ल जी के यहां 'शिक्षित जनता' का मतलब सीधे तौर पर परंपरागत ज्ञानधारी होने से था यानी वेद-पुराणादि के ज्ञान से था, और तरह की पढ़ाई उनकी 'शिक्षित जनता 'में शामिल नहीं है|और उस समय वेदपुराण काव्यशास्त्र  कौन जानता था? ब्राह्मण या चंद उच्चसोपानिक वर्ण के लोग|इसीलिए शुक्ल जी का पूरा दृष्टि पथ वर्णव्यवस्था की इन्हीं ऊंची जातियों को लेकर खड़ा हुआ|
दूसरे वे भारतीय रसवाद के गहरे असर में थे|रसवाद आस्वाद को महत्व देता है |आस्वादन के लिए 'सहृदय'होना अनिवार्य है |सहृदयता की भी शर्त वही 'शिक्षित जनता 'पूरी करती थी |इसीलिए जातिव्यवस्था( चिंतामणि भाग-4)जैसा विचारोत्तेजक निबंध लिखने वाले शुक्ल जी लोक की 'प्रकृति भावधारा' की ताकत को समझते हुए (द्वितीय उत्थान :काव्यखंड) भी पुराणवादी शिक्षित जनता की पूंछ नहीं छोड़ पाते|
शुक्ल जी ने जो कवियों की जाति का जरूर से जरूर उल्लेख किया है यह उन्हें साहित्येतिहास लेखन की परंपरा में शिवसिंह सेंगर के यहां से मिलता है |जो लोग यह समझते हैं कि शुक्ल जी का इतिहास मौलिक है, वे कुछ नहीं जानते|शुक्ल जी ने इतिहास लेखन का पैटर्न ग्रियर्सन,मिश्रबंधु और बंग्ला के इतिहास लेखक दिनेशचंद सेन से लिया, शोध पूरा का पूरा मिश्रबंधुओं के विनोद व सभा की रिपोर्ट से लिया, हां आलोचना दृष्टि में मौलिकता है|कवि परिचय लिखते लिखते शुक्ल जी जो मूल्यवान टिप्पणियां करते चलते हैं यह आदत 'शिवसिंह सरोज' में मुसलसल मौजूद है, भले सरोजकार का बोध शुक्ल जी के स्तर का नहीं है |
उन्हें जातिवादी कहते समय यह भी ध्यान देना चाहिए कि मिश्रबंधु और शुक्ल जी का इतिहास दोनों नवजागरण की ही उपज हैं, नवजागरण ऊपरी तौर पर जाति वगैरह का खण्डन करता है, पर उसके झंडाबरदार चूंकि ऊंची जातियों से आये थे, सो उनके दृष्टिपथ में वर्णवाद का घुसना स्वाभाविक था, जो शुक्ल जी के साथ भी हुआ|यही कारण है कि शुक्ल जी की दृष्टि उलझी हुई नजर आती है |उनके भक्त और आलोचक दोनों अपनी सुविधानुसार कोटेशन तलाश सकते हैं |मेरे विचार से सांप्रदायिक नहीं थे,और जहां हुए हैं, वहां औपनिवेशिक दृष्टि का शिकार होने के नाते हुए हैं |वे अपनी समझ में जातिवादी नहीं हैं पर संस्कार,परंपरा और अपने द्वारा बनाई गयी साहित्य की मान्यताओं की फँसरी के जहां जहां शिकार होते हैं  जातिवादी या कहें वर्णवादी हो उठते हैं|
इसमे किसी को सन्देह नही होना चाहिए कि रामचंद्र शुक्ल जी की जो किताब है खासकर "इतिहास " की वो किताब आउटडेटेड हो चुकी है। उन्होंने इस किताब में जो भी कोलॉज निर्मित किये हैं। वो अब कोई मायने नही रखता। लेकिन फिर भी वो कौन सी मज़बूरी है, या मानसिकता है, जो इसे "अकेडमिक दुनिया" से अलग नही कर पा रहा।अब आप ये भी कह सकते हैं कि बहुत सारी किताब लिखी जा चुकी है आप उन्हें पढ़िए, लेकिन यकीन मानिए अगर इस किताब से अकेडमिक दुनिया मे प्रश्न नही पूछा जाता तो मैं इसे नही पढता। क्योंकि इनकी जो किताब है, "हिंदी साहित्य का इतिहास" उसका कोई भी आधार अब स्थायित्व नही रखता। सभी निर्मूल हो चुका है। अगर आप चाहे तो इस ग्रन्थ को "मरे हुए लाश" के तरह पीठ पर रखकर चल सकते हैं। लेकिन अकेडमिक दुनिया से इस किताब को बाहर किया जाना चाहिये। आप विहाग वैभव के 2 से 3 शब्दों के आधार पर एक विक्षिप्त मानसिकता के बता सकते हैं तो उसी आधार पर शुक्ल जी को ये क्यो नही कह कहते कि उनका भी इतिहास ग्रन्थ "जातिवादी" और "वर्गवादी" मानसिकता के तहत लिखा गया। शुक्ल जी कंही पर भी जब कवियों का  परिचय देते है तो वह  "जाति" और वर्ग जैसे शब्दों को जोड़ देते हैं।
कुछ उदाहरण देता हूँ। ऐसे उदाहरण बहुतेरे है।
-- भूषण को लेकर उनका वक्तव्य
  उनके प्रति भक्ति और सम्मान की प्रतिष्ठा हिंदू जनता के हृदय में उस समय भी थी और आगे भी बराबर बनी रही या बढ़ती गई।"
--हिंदू जाति के प्रतिनिधित्व कर्ता के रुप में
शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णनों को कोई कवियों की झूठी ख़ुशामद नहीं कह सकता।"
--  "वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।"
--कबीर के बारे में
कबीर ने अपनी झाड़-फटकार के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों की कट्टरता को दूर करने का जो प्रयास किया। वह अधिकतर चिढ़ाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं।"
--सूरदास को लेकर
   "इस परम्परा में मुसलमान कवि हुए हैं। केवल एक हिन्दू मिला है।"
   आखिर कोई बतायेगा ये किस प्रकार की इतिहास दृष्टि है।मैं तो उनकी इस किताब को "विसंगतियों का इतिहास" कहना पसन्द करूँगा। जो ज्यादा उपयुक्त है।अगर आप यह कहना चाह रहे हैं कि उस समय की परिस्थिति कुछ और थी। तो ठीक है इस समय और परिस्थिति अब बदल चुकी है,और इनकी यह किताब भी अप्रसांगिक साबित हो चुकी है। हाँ ये कर सकते हैं कि इसे "मरे हुई लाश" के तरीके उपयोग किया जा सकता है। जो ज्यादा उपयुक्त है।
अब वर्तमान में एक नई इतिहास दृष्टि, एक नई सोच की तहत सहित्योइतिहास की  रचना की जानी चाहिए! आप कह सकते हैं कि किताबें बहुत सारी लिखी गई है। लेकिन मैं फिर से कहूँगा कि जो भी इतिहास लिखी गई है आज तक वह सिर्फ इनकी ही विचारों का पिष्टपेषण किया गया है। उसमें उनका कोई मौलिक विचार या, स्वतन्त्र तरीका नही है सोचने का, वह इन्ही के माध्यम से अपनी बातों को शुरू करते हैं।अंत तक इन्ही का खंडन-मण्डन करते चले जाते हैं। आज तक सारे सहित्योइतिहास के रचनाकारों ने यही किया। जिनके कारण ही उनकी ये किताब आज तक अपनी अस्तित्व बनाई हुई है। अगर वो एक नई तरीके से सोचते तो आज ये "आउटडेटेड" किताब पढ़ने की आवस्यकता नही होती।
कुछ बयान सुनवाता हूँ आपको! जो पहले ही इनके सामने हथियार डाल देते हैं। बिल्कुल नतमस्तक हो जातें है।
-- रामचन्द्र शुक्ल से सर्वत्र सहमत होना सम्भव नहीं। ..... फिर भी शुक्ल जी प्रभावित करते हैं। नया लेखक उनसे डरता है, पुराना घबराता है, पंडित सिर हिलाता है।
ऐसे बहुतेरे कथन आपको मिल जायेगा। आप ढूंढ सकते हैं। चतुर्वेदी जी से लेकर बच्चन तक, रामविलास से लेकर नामवर जी तक। बहरहाल इसका एकमात्र कारण है इनके विचारों से ही "खण्डन-मण्डन"  की  शुरआत करना।
एक और नमूना देखिये-रामस्वरूप चतुर्वेदी जी का
--"आचार्य का विषय प्रतिपादन जैसा गुरु गम्भीर है उसके बीच उनका सूक्ष्म व्यंग्य और तीव्र तथा पैना हो गया है, घनी-बड़ी मूँछों के बीच हल्की मुस्कान की तरह।"
कौन सी गुरु गम्भीरता कौन --हाँ
---आदिकाल के साथ शुद्ध और अशुद्ध साहित्य के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---भक्तिकाल जो जनवादी चेतना का उभार था उसके साथ ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---रीतिकाल में श्लीलता-अश्लीलता के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---छायावाद के साथ रहस्यवाद के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
छायावाद के बाद बालें प्रकरण पर कुछ भी कहना बेईमानी होगी चाहे वह गद्य विधा हो या पद्य का।
इनके इतिहास की जो किताबों है। उसका दूसरा संस्करण 1940 है। तो निश्चित है। उसके बाद की इतिहास इसमें कम मिलने वाली है।मुमकिन ही नही है।यानि कि करीबन 60 वर्षों का इतिहास गायब, फिर भी इतना ज्यादा प्रासंगिक होना! कितना आश्चर्यजनक है न! मैं आखरी बात कहना चाहूँगा की यह किताब "आउटडेटेड" हो चुकी है। आपको इसे जिस खोह-कंदरा में डालना हो डालें, लेकिन अकेडमिक दुनिया से इसे बाहर करें।
क्योंकि यह मेरे समकालीन नही ठहरता। समकालीन का अर्थ प्रसांगिकता से लें!इस प्रकार, भले ही रैदास और कबीर मध्यकाल के कवि ठहरते हैं। और दुष्यन्त कुमार और राजेश जोशी आधुनिक काल के लेकिन अगर कबीर के विचार हमारे लिए प्रसांगिक है तो भले ही वह मध्यकाल के हों लेकिन वह "मुझे" मेरे समकाल नज़र आते हैं। और अगर राजेश जोशी का विचार पुरातनपंथी है। तो भले ही वह आधुनिक काल के कवि हैं लेकिन वो मेरे लिए समकालीन नही है और अप्रसांगिक भी।
उसी प्रकार कुल-मिलाकर मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि रामचंद्र शुक्ल की जो इतिहास की किताब है वो "आउटडेटेड" हो चुकी है।
वह सभी दृष्टियाँ जो इतिहास को हिन्दू-मुस्लिम युग्म में देखती है,वे साम्राज्यवादी है और एक हद के बाद साम्प्रदायिक भी हो जाती है।और उस भाषाई समाज में जिसके पुरखों ने इस नयी परिस्थिति के शुरुआती दौर में ही बहुत ही रेडिकल स्टैंड लेते हुये कहा था - "न वेदे न कुराने", ‘‘ना मस्जिद ना देहुरा।‘‘गोरखनाथ की इस विचार-परम्परा को ही कबीर ने ‘ना हिन्दू ना मुसलमान‘ , ‘दोनों राह न पायी‘ जैसी टेक के साथ अनेक बार दोहराया है। इन दोनों कवियों को याद करना इस लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों के टकराव एवं सम्मिलन की ये प्रारंभिक आवाजें हैं।इन आवाजों के साथ बाद के और विशेष रूप से साम्राज्यवाद के खिलाफ ल़डाई के दौर में विभिन्न अनुशासनों में लिख रहे लोगों ने किस तरह का रिश्ता बनाया है,उसका मूल्यांकन होना ही चाहिए।गोरख और कबीर के लिए इन्सान होना पहली शर्त है।उनके लिए समानता और बन्धुता वह बुनियाद है जिसपर भावी मनुष्यता की गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो सकती है।नाथ और निर्गुण पंथ में कही गईं इस तरह की बहुत सी बातों के साथ आप किस तरह से संवाद करते है इससे आपकी पक्षधरता निर्धारित होगी।किसी विचारक का मूल्यांकन करते हुए यह भी देखा जाना चाहिए कि उसका समय-सन्दर्भ कैसा है और साथ ही वह अपने समय की अग्रगामी विचार सरणियों के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है।
चुनौती :                                                                            
पिछले दो दशकों में हिन्दी साहित्य  में  हुए पाँच उल्लेखनीय/महत्वपूर्ण/श्रेष्ठ शोधकार्य   : भारत के किसी भी विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभागों में हुए शोधकार्य का नाम बताइये, जिन्हें आज और आने वाले समय में हिन्दी पाठकों,विद्यार्थियों,शोधार्थियों  के समक्ष प्रतिमान के रूप में पेश किये जा सकें।
रामचंद्र शुक्ल का इतिहास साम्प्रदायिक और जातिवादी इतिहास है।
हिन्दी अकेडमिया को तुरंत इसका विकल्प खोजना चाहिए और इस इतिहास को इतिहास के संग्रहालय में डाल देना चाहिए।
बात जरा अगम्भीर लगे तो भी।
हम सब यह तो मानते ही होंगे कि पढ़ने का असर हमारी चेतना पर होता है। हमारी चेतना का निर्माण हमारे पढ़ने-समझने से भी विकसित होता है। यानी अगर हमारी चेतना प्रगतिशील मूल्यों में भरोसा रखने वाली बनी है तो निश्चित ही उसमें कबीर,रैदास,प्रेमचंद,निराला,मुक्तिबोध जैसे रचनाकारों का योगदान होगा। (जिन्हें नाम छूटने के आरोप लगाना है वे अपने हिसाब से और नाम जोड़ सकते हैं। वे स्वतंत्र हैं।) इसी तरह जो दक्षिणपंथी लोग हैं वे अपने ढंग की किताबें पढ़ते हैं।
अब मूल बात कि क्या आप में से कोई किसी ऐसे व्यक्ति का नाम बता सकता है जो शुक्ल का इतिहास पढ़कर साम्प्रदायिक या जातिवादी हुआ हो?.....


यह उपरोक्त लेख मेरा नहीं है अर्थात् अपना नहीं अपने लिए है
-युवा कवि गोलेन्द्र पटेल!

Saturday, 18 April 2020

हिंदी आलोचना के अमर आचार्य【हिंदी आलोचना के भगवान 】 : आचार्य रामचंद्र शुक्ल





इसमे किसी को सन्देह नही होना चाहिए कि रामचंद्र शुक्ल जी की जो किताब है खासकर "इतिहास " की वो किताब आउटडेटेड हो चुकी है। उन्होंने इस किताब में जो भी कोलॉज निर्मित किये हैं। वो अब कोई मायने नही रखता। लेकिन फिर भी वो कौन सी मज़बूरी है, या मानसिकता है, जो इसे "अकेडमिक दुनिया" से अलग नही कर पा रहा।अब आप ये भी कह सकते हैं कि बहुत सारी किताब लिखी जा चुकी है आप उन्हें पढ़िए, लेकिन यकीन मानिए अगर इस किताब से अकेडमिक दुनिया मे प्रश्न नही पूछा जाता तो मैं इसे नही पढता। क्योंकि इनकी जो किताब है, "हिंदी साहित्य का इतिहास" उसका कोई भी आधार अब स्थायित्व नही रखता। सभी निर्मूल हो चुका है। अगर आप चाहे तो इस ग्रन्थ को "मरे हुए लाश" के तरह पीठ पर रखकर चल सकते हैं। लेकिन अकेडमिक दुनिया से इस किताब को बाहर किया जाना चाहिये। आप विहाग वैभव के 2 से 3 शब्दों के आधार पर एक विक्षिप्त मानसिकता के बता सकते हैं तो उसी आधार पर शुक्ल जी को ये क्यो नही कह कहते कि उनका भी इतिहास ग्रन्थ "जातिवादी" और "वर्गवादी" मानसिकता के तहत लिखा गया। शुक्ल जी कंही पर भी जब कवियों का  परिचय देते है तो वह  "जाति" और वर्ग जैसे शब्दों को जोड़ देते हैं।
कुछ उदाहरण देता हूँ। ऐसे उदाहरण बहुतेरे है।
-- भूषण को लेकर उनका वक्तव्य
  उनके प्रति भक्ति और सम्मान की प्रतिष्ठा हिंदू जनता के हृदय में उस समय भी थी और आगे भी बराबर बनी रही या बढ़ती गई।"
--हिंदू जाति के प्रतिनिधित्व कर्ता के रुप में
शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णनों को कोई कवियों की झूठी ख़ुशामद नहीं कह सकता।"
--  "वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।"
--कबीर के बारे में
कबीर ने अपनी झाड़-फटकार के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों की कट्टरता को दूर करने का जो प्रयास किया। वह अधिकतर चिढ़ाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं।"
--सूरदास को लेकर
   "इस परम्परा में मुसलमान कवि हुए हैं। केवल एक हिन्दू मिला है।"
   आखिर कोई बतायेगा ये किस प्रकार की इतिहास दृष्टि है।मैं तो उनकी इस किताब को "विसंगतियों का इतिहास" कहना पसन्द करूँगा। जो ज्यादा उपयुक्त है।अगर आप यह कहना चाह रहे हैं कि उस समय की परिस्थिति कुछ और थी। तो ठीक है इस समय और परिस्थिति अब बदल चुकी है,और इनकी यह किताब भी अप्रसांगिक साबित हो चुकी है। हाँ ये कर सकते हैं कि इसे "मरे हुई लाश" के तरीके उपयोग किया जा सकता है। जो ज्यादा उपयुक्त है।
अब वर्तमान में एक नई इतिहास दृष्टि, एक नई सोच की तहत सहित्योइतिहास की  रचना की जानी चाहिए! आप कह सकते हैं कि किताबें बहुत सारी लिखी गई है। लेकिन मैं फिर से कहूँगा कि जो भी इतिहास लिखी गई है आज तक वह सिर्फ इनकी ही विचारों का पिष्टपेषण किया गया है। उसमें उनका कोई मौलिक विचार या, स्वतन्त्र तरीका नही है सोचने का, वह इन्ही के माध्यम से अपनी बातों को शुरू करते हैं।अंत तक इन्ही का खंडन-मण्डन करते चले जाते हैं। आज तक सारे सहित्योइतिहास के रचनाकारों ने यही किया। जिनके कारण ही उनकी ये किताब आज तक अपनी अस्तित्व बनाई हुई है। अगर वो एक नई तरीके से सोचते तो आज ये "आउटडेटेड" किताब पढ़ने की आवस्यकता नही होती।
कुछ बयान सुनवाता हूँ आपको! जो पहले ही इनके सामने हथियार डाल देते हैं। बिल्कुल नतमस्तक हो जातें है।
-- रामचन्द्र शुक्ल से सर्वत्र सहमत होना सम्भव नहीं। ..... फिर भी शुक्ल जी प्रभावित करते हैं। नया लेखक उनसे डरता है, पुराना घबराता है, पंडित सिर हिलाता है।
ऐसे बहुतेरे कथन आपको मिल जायेगा। आप ढूंढ सकते हैं। चतुर्वेदी जी से लेकर बच्चन तक, रामविलास से लेकर नामवर जी तक। बहरहाल इसका एकमात्र कारण है इनके विचारों से ही "खण्डन-मण्डन"  की  शुरआत करना।
एक और नमूना देखिये-रामस्वरूप चतुर्वेदी जी का
--"आचार्य का विषय प्रतिपादन जैसा गुरु गम्भीर है उसके बीच उनका सूक्ष्म व्यंग्य और तीव्र तथा पैना हो गया है, घनी-बड़ी मूँछों के बीच हल्की मुस्कान की तरह।"
कौन सी गुरु गम्भीरता कौन --हाँ
---आदिकाल के साथ शुद्ध और अशुद्ध साहित्य के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---भक्तिकाल जो जनवादी चेतना का उभार था उसके साथ ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---रीतिकाल में श्लीलता-अश्लीलता के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---छायावाद के साथ रहस्यवाद के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
छायावाद के बाद बालें प्रकरण पर कुछ भी कहना बेईमानी होगी चाहे वह गद्य विधा हो या पद्य का।
इनके इतिहास की जो किताबों है। उसका दूसरा संस्करण 1940 है। तो निश्चित है। उसके बाद की इतिहास इसमें कम मिलने वाली है।मुमकिन ही नही है।यानि कि करीबन 60 वर्षों का इतिहास गायब, फिर भी इतना ज्यादा प्रासंगिक होना! कितना आश्चर्यजनक है न! मैं आखरी बात कहना चाहूँगा की यह किताब "आउटडेटेड" हो चुकी है। आपको इसे जिस खोह-कंदरा में डालना हो डालें, लेकिन अकेडमिक दुनिया से इसे बाहर करें।
क्योंकि यह मेरे समकालीन नही ठहरता। समकालीन का अर्थ प्रसांगिकता से लें!इस प्रकार, भले ही रैदास और कबीर मध्यकाल के कवि ठहरते हैं। और दुष्यन्त कुमार और राजेश जोशी आधुनिक काल के लेकिन अगर कबीर के विचार हमारे लिए प्रसांगिक है तो भले ही वह मध्यकाल के हों लेकिन वह "मुझे" मेरे समकाल नज़र आते हैं। और अगर राजेश जोशी का विचार पुरातनपंथी है। तो भले ही वह आधुनिक काल के कवि हैं लेकिन वो मेरे लिए समकालीन नही है और अप्रसांगिक भी।
उसी प्रकार कुल-मिलाकर मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि रामचंद्र शुक्ल की जो इतिहास की किताब है वो "आउटडेटेड" हो चुकी है।
दीपशिखा सिंह Deepshikha Singh के इस लिखे से मेरी सहमति है। हिंदी आलोचना को शुक्ल-द्विवेदी की बाइनरी से बाहर ले जाने की जरूरत है। हिंदी एकेडमिया में बहुत सारे जरूरी लिखे गए से जान बूझकर वाकिफ़ नहीं कराया जाता। ऐसा कराया जाना चाहिए। संत काव्य पर परशुराम चतुर्वेदी का काम भी कम महत्व का नहीं है। लेकिन मुझे नहीं याद की 'उत्तर-भारत की संत परम्परा' का नाम भी मुझे किसी शिक्षक ने एमए तक बताया हो। टिप्पणी देखें।
हिंदी की विश्वविद्यालयी शिक्षण पद्धति को लेकर मेरे मन में बार-बार यह सवाल खड़ा होता है कि वास्तव में विद्यार्थियों को एक सचेत आलोचकीय दृष्टि प्रदान करने में यह पूरी प्रक्रिया सक्षम है या फिर हम एक ऐसे सँकरे गलियारे में बंद कर दिये जाते हैं, जिसका एक रास्ता रामचन्द्र शुक्ल के यहाँ खुलता है और दूसरा हजारी प्रसाद द्विवेदी के यहाँ।
यदि हम कक्षाओं में हिंदी आलोचना की स्थिति को देखें, तो सहज ही यह पाते हैं कि हमें रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के आलोचना कर्म के बीच ही उलझाकर रख दिया गया है। ज़्यादा से ज़्यादा हम इस क्रम में आगे बढ़ते हुए रामविलास शर्मा और नामवर सिंह तक पहुँच पाते हैं। लेकिन हिंदी साहित्य के विविध कालखण्डों के विश्लेषण और मूल्यांकन के क्रम में रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा निर्मित ढाँचे को तोड़ नहीं पाते हैं। यहाँ तक कि एमए तक अधिकांश विद्यार्थियों को यह भी पता नहीं चल पाता है कि इनके समकालीन अन्य आलोचकों ने भी कुछ महत्त्वपूर्ण लिखा- पढ़ा है, जो हमारी दृष्टि को विस्तार दे सकता है, बाद वालों को तो छोड़ ही दीजिए।
जैसे निर्गुण भक्ति का अध्ययन करते हुए हम शुक्ल जी से होते हुए द्विवेदी जी पर आकर रुक जाते हैं। कभी भी कक्षाओं में पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल जैसे अध्येताओं की दृष्टि की चर्चा तक नहीं की जाती। इसी तरह से हर बार कहा जाता है कि हिंदी साहित्य के आदिकाल पर बहुत कम काम हुआ है। लेकिन जो कायदे का काम हुआ है, उनमें हजारी प्रसाद द्विवेदी से आगे बढ़कर कभी भी विद्यार्थियों से रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन, धर्मवीर भारती आदि की पुस्तकों की चर्चा भी नहीं की जाती।
इस तरह से हिंदी साहित्य के अनेक हिस्सों की चर्चा की जा सकती है, जिनपर अनेक आलोचकों ने छोटा- बड़ा लेकिन महत्त्वपूर्ण काम किया है। लेकिन शुक्ल- द्विवेदी के दायरे में हम इतना सिमटकर रह गए हैं कि इनके दृष्टिकोण पर उठने वाले कुछ जायज सवालों से हम टकराना नहीं चाहते। एक लंबी प्रक्रिया के तहत हमारी दृष्टि इतनी संकुचित कर दी जाती है कि कई बार इन पर उठने वाले सवालों पर ईशनिंदा की तर्ज पर हमले होने लगते हैं।
हमने विश्वविद्यालयी शिक्षण पद्धति में भी मुख्यधारा और हाशिया बना रखा है और आज भी हमारा मन-मस्तिष्क इसकी इजाजत नहीं देता कि हाशिया भी मुख्यधारा हो सकता है या मुख्यधारा में शामिल हो सकता है। बार-बार एक ही पुस्तक को पढ़ने की दबावनुमा सलाह के पीछे कौन से पूर्वाग्रह काम करते हैं! बीए से लेकर रिसर्च करने तक और उसके बाद भी कोई एक ही पुस्तक क्यों पढ़ता रहे! हजारों पुस्तकें हैं, पूरी दुनिया खुली हुई है। सम्भव है कि किसी एक पुस्तक को पढ़ने पर किसी को हर बार कोई नई दृष्टि मिले, उसी तरह किसी को नहीं भी मिल सकती है। यह प्रक्रिया बहुत निजी है। किसी पुस्तक के संदर्भ में इसे सार्वभौमिक नहीं बनाया जाना चाहिए।
रामचन्द्र शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में सिद्धों-नाथों, कबीर व अन्य संत कवियों से होते हुए निराला तक का क्या और कितना विश्लेषण किया गया है और ये विश्लेषण, इतिहासकार की किस दृष्टि के परिचायक हैं, यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है। इसलिए इन पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को सार्थक दिशा देने की जरूरत है। साथ ही हमें पीछे मुड़कर विश्वविद्यालयी शिक्षण पद्धति के अपने अनुभवों का भी विश्लेषण करना चाहिए ।
यदि हिंदी विभागों ने हिंदी साहित्य के विविध कालखण्डों के अध्ययन- अध्यापन के दरमियान रामचन्द्र शुक्ल- हजारीप्रसाद द्विवेदी के साथ- साथ अन्य महत्वपूर्ण आलोचकों के कार्यों को भी शामिल किया होता, विद्यार्थियों को विविध पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया होता, उनपर पर्चे लिखवाये होते, कहने का आशय कि यदि हिंदी आलोचना को मुख्यधारा और हाशिया के रूप में नहीं बाँटा होता तो शायद ऐसी अतिरेकी प्रतिक्रियाएँ देखने को नहीं मिलती, जैसी समय- समय पर देखने को मिलती है। बल्कि सवाल भी वाजिब तरीके से उठते और उनपर सार्थक बहस होती।
सभ्यतागत विकास क्रमिक रूप में घटित होता है,अचानक कुछ भी नहीं होता। हजारी प्रसाद द्विवेदी को कोट कर सकते हैं 'भारतीय चिंतनधारा का स्वाभाविक विकास'।
लंबे समय से भारतीय समाज की सामाजिक-संरचना जिस ढांचे में चलती आई है वह ढांचा ब्राह्मणवाद/मनुवाद का ढांचा है। गोपेश्वर सिंह ने लिखा है मनुवाद/ब्राह्मणवाद का रूप हमेशा से एक जैसा नहीं रहा है। उसने जितना बाहरी दबाओं से खुद को बदला है उतना ही अपने भीतरी संवादों से भी। जिस तरह का सामाजिक-ढांचा 3-4शताब्दी में था वैसा ही शंकराचार्य के समय में नहीं रहा। शंकराचार्य के समय का ढांचा रामानंद और भक्त कवियों के यहां बदले हुए रूप में दिखाई देता है। उसी ब्राह्मणवादी/मनुवादी समाज व्यवस्था से निकले विवेकानंद और गांधी अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद आधुनिक ख़यालों के व्यक्ति हैं। प्रेमचंद,निराला,प्रसाद और रामचन्द्र शुक्ल जिस भावभूमि पर खड़े होकर विचार कर रहे थे आज का लेखक उससे आगे खड़ा होकर बात करता है। शुक्ल की कविता सम्बन्धी बहुतेरी मान्यताओं को मुक्तिबोध ने अपने लेखन के द्वारा खारिज किया है। 'अंधेरे में' कविता और  'एक साहित्यिक की डायरी' और 'नई कविता का आत्मसंघर्ष और अन्य निबंध' नामक किताब इस सम्बन्ध में पर्याप्त मदद करेगी। रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना के मान और मूल्य को नामवर जी ने छायावादी संस्कार कहा है। 'कविता के नए प्रतिमान' किताब देखी जा सकती है। उन संस्कारों से मुक्त हुए बिना कविता के नए प्रतिमान तय नहीं किये जा सकते ऐसी उनकी मान्यता है। उससे आगे भी एक पूरी परम्परा है जो इसी तरह संवाद करते हुए आगे बढ़ी है।
एजेंडे के तहत किसी का विकल्प नहीं तलाशा जा सकता। विकल्प अपनी सभ्यता और संस्कृति से संवाद करते हुए ही विकसित होते हैं। विचार की दुनिया में दाख़िल-खारिज नहीं चलती। संवाद चलता है। संवाद करते हुए आगे बढ़ने की प्रवृत्ति हमेशा से प्रगतिशील मानी गई है।
इस विकासक्रम को आप दुनियाभर में हुई क्रांतियों के साथ भी जोड़कर देख सकते हैं। रेनेसॉ हो,आधुनिकता हो, दुनियाभर की तमाम औद्योगिक क्रांतियां हों,फ्रांस की राज्यक्रांति हो या रूस की बोल्शेविक कोई भी अचानक नहीं घटित हुई हैं। उनके पीछे एक लंबा वैचारिक संघर्ष और संवाद रहा है।
घोषणाएं तानाशाहों की निशानी हुआ करती हैं। जब हम इस देश के जड़ विचारों से लड़ रहे हैं तो हमें नए हथियार तलाशने की जरूरत है। नफरत का जवाब और नफरत नहीं है। झूठ को झूठ से नहीं पराजित किया जा सकता।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास पर  जब विचार-विमर्श , आरोप -प्रत्यारोप, आलोचनाएँ हो ही रहीं हैं, तो कुछ विचार-विमर्श इसपर भी हो कि - आचार्य शुक्ल के इतिहास में कितनी ऐसी नई अन्तरदृष्टियाँ हैं, जिनकों लेकर नये-नये शोध , नये-नये विचार विमर्श और आलोचनाओं के मार्ग प्रशस्त होते हैं । मुझे तो आचार्य शुक्ल से ज़्यादा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'हिन्दी
साहित्य की भूमिका' में ऐसे नये शोध ,आलोचना,विमर्श के मार्ग मिलते हैं... मैं हिन्दी के विद्वानों को इस पर अपने विचार रखने के लिये आमन्त्रित करता हूँ।
हिंदी बौद्धिकजगत में   विवेकहीनता किस तरह चरम पर है उसकी झलक लेनी हो तो बस एकबार हिंदी के महान आलोचक रामचन्द्र शुक्ल के बारे में विगत दो दिनों में लिखी गयी अधिकांश फेसबुक टिप्पणियों को चुपचाप पढ़ जाइए।अनैतिहासिकता किस कदर हिंदी के बौद्धिक जगत में घर बना चुकी है।इसके आपको साक्षात अनुभव चंद मिनटों में ही हो जाएंगे।
“ईश्वर साकार है या निराकार, लम्बी दाढ़ी वाला है या चार हाथ वाला, अरबी बोलता है कि संस्कृत, मूर्ति पूजने वालों से दोस्ती रखता है कि आसमान की ओर हाथ उठाने वालों से, इन बातों पर विवाद करने वाले अब केवल उपहास के पात्र होंगे। इसी प्रकार सृष्टि के जिन रहस्यों को विज्ञान खोल चुका है, उनके संबंध में प्राचीन पौराणिक कथाएं और कल्पनाएं (छः दिन में सृष्टि की उत्पत्ति, आदम हौव्वा का जोड़ा, चौरासी लाख योनि इत्यादि) हैं, वे अब ढाल तलवार का काम नहीं कर सकतीं।”__रामचंद्र शुक्ल (चिंतामणि-३ / पृ. – १८१)
''जाति संस्था ने प्रजाति की शुद्धता को सुरक्षित रखने का असफल प्रयत्न किया है। इतिहास का हर छात्र जानता है कि भारतीय रक्त शक, यवन, यूची, हूण, मंगोल, आर्य तथा द्रविड़ रक्तों का मिश्रण है। जाति व्यवस्था के विरुद्ध सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि इसने मनुष्य को स्तरों और श्रेणियों में रूढ़ विभाजन कर दिया है। इसके तथाकथित समर्थकों के किसी भी सदस्य द्वारा यह प्रति-संतुलित(Counter Balanced) नहीं की जा सकती।'' और ''भारतीय समाज की प्रगति में रामायण काल से ही भावशून्य वर्ण और जाति बहुत बड़ी बाधा रही है। जब तक यह अस्वाभाविक प्रणाली प्रचलित रहेगी, समाज का विनाश और उसके साथ हमारा भी विनाश है।''___रामचंद्र शुक्ल
(आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली, भाग -4, पृ.-२०२)
ये विचार उन्हीं रामचंद्र शुक्ल के हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा है और जिनपर जातिवादी और सांप्रदायिक होने के आरोप हैं। हाँ ये विचार उनकी मृत्यु के कुछ वर्षों पूर्व लिखे लेखों यथा 'जाति व्यवस्था', 'धर्म का विकास' आदि में मौजूद मिलेंगे। मेरा यह कहना है कि किसी भी आलोचक के लेखन में वैचारिक विकास को भी देखा जाना जाहिए। आचार्य शुक्ल पर शोध-कार्य करते हुए मेरी निजी समझ यह रही कि वे अपने उत्तरवर्ती लेखन में खुद को बदलते हैं। जैसा कि किसी भी लेखक के साथ संभव है। यह बदलाव या विकास हम तब एकदम नहीं देखेंगे या नहीं देखना चाहेंगे जब सांप्रदायिक व जातिवादी का लेबल लगाकर उन्हें खारिज करने के अभियान में मुब्तिला होंगे।
ये जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर  'जातिवादी व संप्रदायवादी' होने का मिथ्या आरोप मढ़ रहे हैं, यदि वे जाति शब्द से पूर्णतया परिचित होंगे तो उन्हें भी पता लग गया होगा कि उन सब का भी अब एक जाति बन गया है। मैं तो निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि वे जाति शब्द से भलीभाँति परिचित हैं तभी कौओं की तरह कवाय रहे हैं। विद्वान कुतर्क व आरोप मढने के बजाय कर्म करते हैं जिससे उनकी अपनी इयत्ता स्वतः स्थापित हो जाती है।  आप कवाँते  रहिये, कुछ होने वाला नहीं है तब तक ,जब तक कि कोई शुक्लजी जैसा मनीषी उत्पन्न नहीं हो जाता। जो कि होने से रहा !!! शुक्ल जी वो आधार हैं जिससे हिंदी-साहित्येतिहासलोचन नामक भवन निर्मित है। ध्यान रहे इस युग पुरुष को ढहाने की कोशिस की तो भवन गिरना तय है। और इसी भवन की क्षत्रछाया में न केवल समूचा हिंदी साहित्य पनपा है ,और पनप रहा है बलकि अन्य साहित्यिक भी उनसे प्रेरणा-प्रेरित हैं।
मेरे प्यारे छोटे भाईयों ( बड़ो को ज्ञान दे सकूं इस लायक नहीं ) और बहनों         ( विशेषकर ) के लिए
स्त्री विमर्श का अर्थ "वामा- विलाप" नहीं है ...
एक दिन पहले शायर मिज़ाज छोटे भाई ने कहा कि " आचार्य शुक्ल की स्त्री दृष्टि पर भी लोग बोल रहे हैं |"
मेरा कहना था - " छोटे भाई इतना समय नहीं है कि केवल फेसबुक मेंटेन कर पाऊं | पोस्ट लिखना, तर्क- वितर्क करना और आजकल कुतर्क भी करना, फिर गोष्ठी बैठाकर एक- एक कमेन्ट पर विमर्श करना और उसके बाद कैसे "चापलूसी विधा" को आगे बढ़ाएं - इस पर अनुसंधान करना, माफ़ी चाहूंगी इतनी क्षमता मेरी नहीं है | मेरे लिए फेसबुक का अर्थ बस इतना है कि समय मिला तो देख लिया | कभी कुछ थोड़ा रोचक लगा तो डाल दिया | या फिर कभी मन न लगा तो ...बस इतना ही |
विस्तार में नहीं जाउंगी ...लेकिन दृष्टान्त हमारे पुरोधाओं को समझने के लिए काफ़ी है | ये है तो विवेकानंद का साक्षात्कार, जिन पर अभी मैं लेख लिख रही   थी | ये उस युग के विचारकों के मानसिक धरातल को और स्त्री सम्बन्धी दृष्टि को समझने के लिए बहुत आवश्यक है जिसमें आचार्य शुक्ल बड़े हुए थे | हो सकता है ये स्थापना साहित्य में न हो लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि ये सत्य ही नहीं है | इसके बाद भी आपत्तिजनक विपत्ति आ जाए तो एक बार दिनकर के लेखों को पढ़ लेंगे | इतनी विनती के साथ साक्षात्कार -       
इस सन्दर्भ को हम इस प्रकार समझ सकते हैं वर्ष १८९८ के दिसम्बर में प्रबुद्ध भारत के प्रतिनिधि ने स्वामी जी से स्त्रियों के विषय में कुछ प्रश्न पूछे | इनमें से कुछ प्रश्न और उनके उत्तर इस प्रकार हैं -
“ और इसलिए आपका विचार है कि हमलोगों में नारी की असमानता पूर्णतया बौद्ध मत के कारण है ?”
“जहाँ वह है निश्चय ही ऐसा है स्वामी जी ने कहा, “ पर हमें यूरोपीय आलोचना की अचानक आयी हुई बाढ़ और उसके कारण अपने में उत्पन्न हुई अंतर की भावना के वशीभूत होकर अपनी नारियों की असमानता के विचार को स्वीकार करने में अत्यधिक शीघ्रता नहीं करनी चाहिए | परिस्थतियों ने हमारे लिए अनेक शताब्दियों से नारी की रक्षा की आवश्यकता को अनिवार्य बनाया है | हमारे इस रिवाज का कारण इस तथ्य में है, नारी की हीनता में नहीं |”
“तो स्वामी जी आप हमारे बीच नारियों की स्थिति से पूर्णतया संतुष्ट हैं ?”
“कदापि नहीं” , स्वामी जी ने कहा,  “ पर हमारा हस्तक्षेप करने का अधिकार केवल शिक्षा का प्रचार कर देने तक ही सीमित है | हमें नारियों को ऐसी स्थिति में पहुंचा देना चाहिए, जहाँ वे अपनी समस्या को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सकें | उनके लिए यह काम न कोई कर सकता है और न किसी को करना ही चाहिए | और हमारी भारतीय नारियाँ संसार की अन्य किन्हीं भी नारियों की भांति इसे करने की क्षमता रखती है |”
“वह बुरा प्रभाव, जिसका कारण आप बुद्धमत को बताते हैं, क्यों आया ?”
“वह केवल धर्म के क्षय से आया |”
स्वामी जी ने कहा, “प्रत्येक आन्दोलन अपने कुछ असाधारण लक्षणों के कारण विजय प्राप्त करता है , और जब वह गिरता है, तो यही गर्व का विषय उसकी दुर्बलता का मुख्य तत्व बन जाता है | भगवान् बुद्ध, मनुष्यों में महानतम, अद्भुत संगठनकर्ता थे, और उन्होंने इस साधन से संसार को विजित किया | पर उनका धर्म भिक्षुओं का धर्म था|  इसलिए इसका बुरा प्रभाव यह पड़ा कि स्वयं भिक्षुक का वेश ही आदर का पात्र हो गया | उन्होंने पहली बार धर्म- स्थानों पर सामूहिक जीवन का भी आरम्भ किया और उससे नारियों को अनिवार्यत: नरों से हीन बना दिया; क्योंकि महा भिक्षुणियाँ कुछ विशिष्ट भिक्षुओं की सलाह के बिना कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकती थीं | इससे उनके तात्कालिक उद्देश्य, धर्म की दृढ़ता, की तो पूर्ति हो गयी; पर आप देखते हैं कि उसके जो दूरगत परिणाम निकले, वही शोचनीय हुए |”
“ पर संन्यास को तो वेदों की स्वीकृति प्राप्त है! ”
“निश्चय ही है ; पर उसमें नर और नारी के बीच कोई भेद नहीं किया गया है | आपको याद होगा कि राजा जनक की सभा में याज्ञवल्कय से किस प्रकार प्रश्न पूछे गए थे ? उनकी मुख्य प्रश्न करने वाली थी, वाचक्नवी, वाग्मी कन्या – ब्रह्मवादिनी, जैसा उन दिनों कहा जाता था | वह कहती है, “ मेरे प्रश्न एक कुशल धनुर्धर के हाथ में दो चमकदार तीरों के समान हैं |” उसके नारी होने की चर्चा भी नहीं की गयी है | और फिर क्या वनों में स्थित हमारे पुरातन विश्वविद्यालयों में लड़कों और लड़कियों की समानता से अधिक पूर्ण कुछ और हो सकता है | हमारे संस्कृत नाटकों को पढ़िए, शकुंतला की कहानी पढ़िए और देखिए कि क्या टेनीसन की ‘प्रिंसेज’ हमें कुछ सिखा सकती है ?” 
अंत में यही कहूंगी यदि तर्क की ही आवश्यकता है तो उसका स्तर भी श्रेष्ठ होना चाहिए | केवल मैं स्त्री हूँ या मैं "अमुक" हूँ ...यह कहकर छूट नहीं लेनी चाहिए |
दूसरी बात 'विरोध के लिए भी अध्ययन उतना ही मजबूत होना चाहिए और हम सब अभी निर्माण की स्थिति में हैं |
तीसरी बात यदि मेरा स्वपन आदरणीय डॉ. शिव प्रसाद सिंह के 'नीला चाँद' की तरह लिखने का है और यदि यह मैं पूरा नहीं कर पायी तो मुझे कोई हक नहीं कि वामा-विलाप के नाम पर पुरुषों को सर पकड़कर और छाती पीटकर गाली देने लग जाऊं | हाँ  हमारे लिए रास्ते कुछ ज्यादा कठिन हैं मैं मानती हूँ | हिम्मत भी बढ़ानी ही होगी |
यह देखकर आश्चर्य होता है और दुख भी कि हिन्दी के किसी स्थापित लेख़क को निशाना बनाकर उसकी अत्यंत आपत्तिजनक छवि पेश कर देते हैं।उसके विशाल साहित्य से प्रसंग, संदर्भ को काटकर और समयच्युत कर प्रतिपक्ष हिस्से को प्रस्तुत कर दिया जाता है।अथवा बिना ऐसा किये भी फतवा की शक्ल में कुछ टिप्पणी जड़ दी जाती है।अब फेसबुक पर जिसकी प्रकृति ही संक्षिप्त  तात्कालिक और क्षणिक होती है, आप चाहकर भी वास्तविकता नहीं बता सकते।इसके लिए आप पढ़िये, उस पर लिखा पढिये और फेसबुक पर जवाब लिखिये।जाहिर है यह तो संभव नहीं,फिर यह बात कम पढ़े लिखे या युवाओं के भीतर उतर जाती है। फिर इसे ही परम सत्य मानकर पढ़ते ही नहीं।यह प्रवृत्ति बहुत ही घातक है।कहना यह चाहिए कि इस पर ये ये पढ़िये और अपनी सोच बनाइये।जैसे,तुलसीदास वर्णव्यवस्था के पोषक हैं, वे दो कौड़ी के हैं। निराला जी ब्राह्मण थे उनमें हिन्दुवाद है।रामचन्द्र शुक्ल रियेक्शनरी हैं। हम कहते हैं तुम ये ये पढ़ो। इनकी रचनाओं में जो श्रेष्ठ है, रचनात्मक है,उसकी पहचान करो।जो आपत्तिजनक है, उसकी आलोचना करो।अब तुम इस तरह अपना आलोचनात्मक विवेक विकसित नहीं करोगे तो बौद्धिक विकलांग बनकर रह जाओगे।फेसबुक पर शुरू हुए हो,फेसबुक पर ही मिट जाओगे।जर्मन उपन्यासकार हापमैन हिटलर का समर्थक था।उसने द बुअर नाम से एक अमर उपन्यास लिखा।उसे नोबेल पुरस्कार मिला।उसी तरह बालजाक हैं, टालस्टाय हैं। इनका जीवन पढ़ो तो चकित रह जाओगे। मगर इनकी महानता ऐसी कि जब तक यह धरती रहेगी,ये रहेंगे। इसलिए युवाओं तुम्हारे पास दिमाग है,विवेक है तो किसी की मत मानो।खुद पढ़ो,उस पर आलोचना पढ़ो। आलोचनात्मक विवेक से पढो।खुद की समझ विकसित करो।अगर राजनीतिक छेछड़ई वाली अक्ल से साहित्य और बौद्धिकता हासिल करोगे तो इस इलाके के छेछड़ ही बन कर रह जाओगे। जो मन करे,सो  करो।हमारा क्या बिगाड़ लोगे--खाक?
प्लाखानोव बाद में कम्युनिस्ट विरोधी हो गये थे।छात्र जीवन में स्टडी सेंटर में बताया गया था कि तब भी लेनिन मार्क्सवाद को ठीक से  समझने के लिए उनकी की किताब बताते थे।संग्रह और त्याग का विवेक नहीं है तो साहित्य और बौद्धिकता से बाहर चले जाइये।पंसारी की या पकौड़े की दुकान खोलिये अथवा किसी पार्टी का झंडा ढोइ...

मैं हिन्दी साहित्य का विद्यार्थी नहीं हूँ तो क्या हुआ! इतिहास का तो हूँ! और सम्प्रति आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के जिस कृति पर बहस छिड़ी हुई है, वह रचना है - "हिन्दी साहित्य का इतिहास"। स्पष्ट है कि बहस के लिए इसमें हिन्दी साहित्य और इतिहास दोनों ही विषयों के विद्यार्थीयों की आधी-आधी हिस्सेदारी बनती है। ऐसे में, मैं आधे के हिस्सेदार की हैसियत से कुछ कहना चाहता हूँ। इससे हिन्दी साहित्य वालों का ईगो हर्ट नहीं होना चाहिए।

पहली बात तो यह कि बउआ विहाग ने जो बात कही है, वह कोई नई बात नहीं है। मेरा प्रणाम उनको है जो विहाग द्वारा फेंके जाने के साथ ही उसे लपक लिया और च्विंगम की तरह चबाने लगे।
पहले वाक्य में बउआ ने कहा कि"रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास साम्प्रदायिक और जातिवादी है।" ठीक बात है। लेकिन इसीलिए तो हमारे इतिहास का विषयानुशासन(Discipline) कहता है कि इतिहास की कोई पुस्तक पढ़ने से पहले, उसके लेखक को पढ़ो और उस लेखक को भी पढ़ने के पहले उस पृष्ठभूमि का अध्ययन करो, जिसमें वह लेखक लिख रहा है। (मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा कि विहाग 0को इतनी सी बात पता नहीं होगी। लेकिन हरेक पता बात को आत्मसात कर लेना आसान नहीं होता। उसमें हमारी पक्षधरता आड़े आती है). माने कि यह मानकर चला जाता है कि कोई भी व्यक्ति अपने युग के बन्धनों और अपने निजी चेतना-अवचेतना व पूर्वाग्रहों से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता है।
1929 में शुक्ल जी के "हिन्दी साहित्य का इतिहास" के प्रकाशित होने के समय तक भारत में साम्प्रदायिकता का अच्छा-खासा खेल खेला जा चुका था। ऐसे में किसी भी लेखक द्वारा अपने साम्प्रदायिक पक्ष का बिल्कुल तिरोहण सम्भव था क्या! ऐसी ही बात कम से कम एक एक उत्तर भारतीयों की जातीय चेतना के विषय में कही जा सकती है।
बउआ ने दूसरे वाक्य में कहा कि "हिन्दी अकेडमिया को तुरंत इसका (शुक्ल जी रचित"हिन्दी साहित्य का इतिहास"का) विकल्प खोजना चाहिए और इस इतिहास को इतिहास के संग्रहालय में डाल देना चाहिए।"
इस सम्बंध में मेरा मानना है कि केवल शुक्ल जी के इतिहास को ही क्यों इतिहास के संग्रहालय में डाल देनी चाहिए! मैं तो कहता हूँ कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले लिखे गए सारे इतिहास के कृतियों को इतिहास के संग्रहालय में डाल दिये जायें। प्रत्येक पीढ़ी को अपना इतिहास स्वयं लिखना और पढ़ना चाहिए। तभी इतिहास का अध्ययन हमारे किसी काम आएगा। वरना पढ़कर केवल स्नातक-स्नातकोत्तर की परीक्षाओं को पास करने के लिए तो शुक्ल जी का इतिहास भी काफी है।...
हिन्दी के आलोचक- जिनकी आज पुण्यतिथि है.-1
आलोचक प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री 
राजनीति, साहित्य और समाज-सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री (2.5.1929 - 17.4.2005 ) की ख्याति एक कुशल वक्ता और आदर्श शिक्षक की भी है. वे भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं.  ‘कवि निराला की वेदना तथा अन्य निबंध’, ‘तुलसी के हिय हेरि’, ‘अनंत पथ के यात्री : धर्मवीर भारती’, ‘अनुचिन्तन’, ‘कुछ चंदन की कुछ कपूर की’, ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य के कुछ विशिष्ट पक्ष’, ‘भक्ति और शरणागति’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियां हैं. उनकी कृतियों का संग्रह ‘विष्णुकान्त शास्त्री : चुनी हुई रचनाएं’( 2 खंड ) प्रकाशित है जिसके प्रथम खण्ड में आलोचनात्मक निबंध हैं. इसमें क्रमश: कालिदास, कबीर, सूर, तुलसी, भारतेन्दु, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, दिनकर और सर्वेश्वर का मूल्यांकन किया गया है. चार निबंधों का विवेच्य विषय है- काव्य का वाचिक संप्रेषण, आधुनिक हिन्दी कविता और छंद, गीत और नवगीत तथा बांग्लादेश की संग्रामी कविता.
कबीर और तुलसी की तुलना करते हुए उन्होंने जो लिखा हैं उससे उनकी दक्षिणपंथी वैचारिक दृढ़ता का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है, “मैं यह तो मानता हूं कि प्राचीन कवियों और उनकी कृतियों को आधुनिक दृष्टियों की कसौटी पर भी कसना चाहिए, इससे उनके नए पहलू उजागर होते हैं, किन्तु ऐसा करते समय उनकी मूलभूत निष्ठा को विस्मृत कर देना उचित नहीं है. ऐसा हुआ तो हम अंतरंग की उपेक्षा कर बहिरंग को ही प्राधान्य दे देंगे. आखिर इसपर तो विचार करना ही चाहिए कि कबीर और तुलसी बुनियादी तौर पर क्या थे? क्या उनकी पहली पहचान समाज सुधारक, लोकनायक आदि की हो सकती है? सच्चाई यही है कि कबीर और तुलसी दोनो मूलत: भक्त थे.  दोनो परम तत्व से अपना संबंध निष्काम प्रेम के द्वारा जोड़ना चाहते थे. दोनों की वास्तविक निकटता या दूरी इसी मुद्दे के ऊपर प्रकट किए गए उनके भावों, विचारों से तै की जा सकती है. मेरा नम्र निवेदन है कि इस क्षेत्र में दोनो में अस्सी प्रतिशत से भी अधिक साम्य है.” ( तुलसी के हिय हेरि, पृष्ठ -253)
शास्त्री जी की आलोचना का फलक विस्तृत है. उनकी जीवन- दृष्टि और इसीलिए आलोचना- दृष्टि भी बहुत कुछ तुलसी की जीवन-दृष्टि और काव्यादर्श से प्रेरित और प्रभावित सी लगती है. उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नंददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और रामस्वरूप चतुर्वेदी पर विस्तार से लिखा है. इनपर लिखते हुए शास्त्री जी ने इनसे अपनी सहमतियों और असहमतियों- दोनो को पूरी ईमानदारी से व्यक्त किया है.
डॉ. रामचंद्र तिवारी ने उनकी आलोचना की विशेषताओं को बड़े व्यवस्थित ढंग से रेखाँकित किया है. वे लिखते हैं, “ शास्त्री जी के आलोचना-कर्म की पहली सामान्य विशेषता यह है कि वे आलोच्य विषय से सम्बद्ध समस्त ज्ञातव्य तथ्यों को सामने रखकर पूरी तैयारी के साथ आलोचना-कर्म में प्रवृत्त होते हैं. इसे उन्होंने अपनी पूर्णता-ग्रंथि कहा है. इस ग्रंथि के चलते उनकी आलोचना में अनुशीलन के तत्व भी संश्लिष्ट हो गए हैं. पंत, दिनकर, महादेवी और सर्वेश्वर की आलोचनाएं अपवाद हैं. संदर्भ- गर्भत्व इन आलोचनाओं में भी है किन्तु वह विविध संदर्भ –स्रोतों से नीत न होकर लेखक के आलोचक व्यक्तित्व में रचा- बसा और उसका सहज अविभाज्य अंग बनकर सामने आया है. दूसरी विशेषता यह है कि शास्त्री जी का पूरा लेखन संतुलित है. न तो उन्होंने किसी को एकतरफा खारिज किया है न आसमान पर चढ़ाया है. आलोच्य कवि या आलोचक की सीमाओं का उल्लेख भी बड़ी विनम्रता के साथ किया है.  उनके वैष्णव संस्कार आलोचना में ज्ञात- अज्ञात रूप में सक्रिय रहे हैं. किन्तु विशेष बात यह कि निर्णय के स्तर पर उनकी विनम्रता ने कहीं कोई समझौता नहीं किया है. निराला की भक्तिकाव्य संबंधी रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और नंदकिशोर नवल की आलोचनाओं को उद्धृत करने के बाद लेखक ने अपना निर्णय इन शब्दों में दिया है, “ मैं इन मतों को मार्क्सवादी आलोचना की स्थूलता और विफलता का उदाहरण मानता हूँ.” इससे लेखक की आस्थामूलक दृढ़ता का अनुमान लगाया जा सकता है. शास्त्री जी की आलोचना की तीसरी विषेषता है, निरंतर सक्रिय बुद्धि और हृदय की सहभागिता. यदि बुद्धि आलोच्य विषय के चयन, विश्लेषण, तुलनात्मक परीक्षण और निष्कर्ष –बिन्दु तक पहुंचने की दिशा में सक्रिय रहती है तो हृदय उसके साथ सहभाव बनाए रखकर आलोच्य विषय में अंतर्भूत, कोमल कठोर भाव –स्थितियों को धारण करने वाले मर्मक्षणों के उद्घाटन में प्रवृत्त. कहा जा सकता है कि शास्त्री जी की आलोचना में पुरुष और प्रकृति दोनो का स्वर समान भाव से मुखरित है. उनमें समरसता है, प्रतिद्वन्द्विता नहीं. हृदय से अनुप्रेरित होकर ही उनकी बुद्दि आलोचना-कर्म में प्रवृत्त हुई है. यह और बात है कि वह भी उनके अंतरतम में संचित संस्कारों से अनुप्राणित है. शास्त्री जी की आलोचना की चौथी विशेषता यह है कि परंपरा और शास्त्र का आधार लेते हुए भी न तो वह परंपराग्रस्त हैं, न शास्त्रबद्ध. उनका विश्वास, परंपरा की पुनर्व्याख्या में है. इसलिए पुराने कवियों की आलोचना करते समय भी उन्होंने आधुनिक मानसिकता वाले पाठकों का ध्यान रखा है.  ( विष्णुकान्त शास्त्री अमृत महोत्सव : अभिनंदन ग्रंथ, खण्ड-3, पृष्ठ 119)
   शास्त्री जी अपने व्यवहार और आचरण में भी अत्यंत सौम्य और उदार थे किन्तु वैचारिक दृढ़ता में संघ की विचारधारा के प्रति पूर्ण आस्थावान. 1992 ईं में तथाकथित बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय कार सेवक के रूप में प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री भी अपनी टोली के साथ अयोध्या पहुंचे थे.
शास्त्री जी बहुत उच्च कोटि के शिक्षक थे. राजनीति में रहते हुए भी उनके भीतर राजनीति के छल-प्रपंच, झूठ-फरेब आदि अवगुण नहीं थे. राज्य- सभा के सदस्य रहते हुए अनेक बार वे दिल्ली से कोलकाता हवाई अड्डे पर आते और वहाँ से सीधे विश्वविद्यालय में अपनी कक्षा में होते. विरोधी विचारधारा के लोगों से भी मैंने अनेकश: उनकी प्रशंसा सुनी है. ‘राम जी की कृपा से’ कहकर वे अपने प्रत्येक कार्य ‘राम’ पर छोड़ देते थे और स्वयं को निमित्त मात्र मानते थे.
  फिलहाल, संस्मरण शास्त्री जी की रचना- धर्मिता की केन्द्रीय विधा है. उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी. अपने विरोधी विचारधारा के कवि नागार्जुन की भी दर्जनों कविताएं उन्हें याद थी.
शास्त्री जी का निधन 17 अप्रैल 2005 को ट्रेन में हृदयगति रुक जाने से हो गया था. हम उनकी पुण्यतिथि पर समाज के लिए किए गए उनके योगदान का स्मरण करते हैं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं...


-गोलेन्द्र पटेल【बीएचयू】

नोट : यह लेख मेरा नहीं है......बस अपने लिए है।

कोविड19(कोरोना) : सर्वप्रथम



कोरोना और सच की महत्ता -
     सच बोलना अपराध हो गया है।सिर्फ राज्य स्वीकृत बातें ही बोल सकते हैं।इससे पता चलता है  जिंदगी का अब स्वतंत्र अस्तित्व खतरे में है। इस ऑरवेलियन नियंत्रित छली समाज व्यवस्था की ट्रंप ने शुरूआत कर दी और धीरे धीरे वे लोग इस रास्ते पर चल निकले हैं जो ट्रंप के यार हैं।छल और नियंत्रण के नए शासन का आरंभ सूत्र है कोरोना के इलाज के बाद जारी होने वाला स्वास्थ्य प्रमाण पत्र। अमेरिका में यह आवाज उठी है अपने चुने गए नुमाइंदों को जनता अपना संरक्षक न समझे।वे जनता के हितों और अधिकारों के संरक्षक नहीं हैं।खासकर पश्चिम में तो ऐसा कोई संरक्षक नहीं है।
ट्रंप प्रशासन ने कोरोना संक्रमण से पीड़ितों के लिए कोविद-19 इम्युनिटी सर्टीफिकेट प्रमाण पत्र जारी करने का प्रस्ताव जारी किया है। मसलन् जिनका कोरोना टेस्ट लिया गया और वे जब रिकवर कर लेते हैं तो उनको एक प्रमाणपत्र दिया जाता है कि वे स्वस्थ हैं उनके शरीर में कोरोना के कोई लक्षण अब नहीं हैं।जिससे वे नौकरी पर लौट सकें।यह प्रमाण पत्र अमेरिका का ‘‘नेशनल इंस्टूट्यूट ऑफ हेल्थ एंड फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’’ जारी करेगा।  
इस प्रमाणपत्र को लेकर अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं।यह प्रमाणपत्र सबको जरूरी होगा।इससे जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी। इस तरह के प्रमाणपत्र को लेकर कोरोना के नेगेटिव और पॉजिटिव मरीजों की संख्या और उनके रजिस्ट्रेशन को लेकर विवाद होगा।उनकी सही संख्या को लेकर मेनीपुलेशन शुरू हो चुका है।कोरोना के टेस्ट को लेकर जो असल समस्या है वह यह कि इसके सही टेस्ट करने के लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।इसके टेस्ट के लिए पीड़ित मनुष्य के शरीर से छोटा सा टीशू का अंश लिया जाता है।उसको विश्लेषण के लिए विस्तारित करते हैं।लेकिन इस प्रक्रिया में यह बताना मुश्किल होता है कि यह वायरस शरीर में कहां कहां फैल गया है।इससे भी अधिक खतरनाक है जबरिया टॉक्सिंग वैक्सीनेशन और उसके बाद दिया जाने वाला प्रमाण पत्र।इस तरह का वैक्सीनेशन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।अनिवार्य वैक्सीनेशन और उसके जरिए कोरोना मुक्त प्रमाणपत्र मुश्किलभरा काम है। यह भी कहा जा रहा है कोरोना के टेस्ट के लिए जो किट इस्तेमाल हो रहे हैं वे अधिक भरोसेमंद नहीं हैं। अमेरिका में ये किट बेहतर प्रिफ़ॉर्म नहीं कर रहे।अभी तक विज्ञानसम्मत कोई टेस्ट कोरोना के लिए सामने नहीं आया है।अब कहा जा रहा है सब लोग टेस्ट कराओ और वैक्सीनेशन लो।सभी लोगों के लिए यह नियम खतरनाक है।
    अब सारी दुनिया में कोरोना को लेकर वैक्सीनेशन कराने की मुहिम सामने आई है। इसकी क्रोनोलॉजी समझने की कोशिश करें-
      कोविद-19 के लिए ‘‘कॉयलेशन फॉर प्रिपेयर्डनेस इन्नोवेसन( सीइपीआई) नामक संगठन का विश्व आर्थिक मंच डावोस, बिल एवं मेलिंडा गेटस फाउंडेशन के प्रायोजन में गठन किया गया है। इस क्रम देखें-
-- सन् 2019 में कोव वैक्सीन की डावोस आर्थिक मंच के सम्मेलन में घोषणा की जाती है।इसके एक सप्ताह बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करता है। यह आपातकाल ऐसे समय घोषित किया जाता है जब चीन के बाहर कन्फर्म केस मात्र 150 थे, इनमें अमेरिका में 6 केस थे।इसके बाद 11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया।सीइटल में मार्च 18 को पहला टेस्ट होता है जिसमें मानवीय स्वयंसेवक भी शिरकत करते हैं।सारी दुनिया में  सीइपीआई के तहत प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप में वैक्सीनेशन की मुहिम चलाने की अपील की जाती है। यह संगठन इस मामले में अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है,इस काम में ‘‘इननोविओ’’ और क्विंसलैंड विश्वविद्यालय आस्ट्रेलिया एक पार्टनरशिप पर साइन करते हैं। उल्लेखनीय है इन दोनों के बीच एक साझा समझौते के तहत पहले से काम चल रहा है।हमारे कुछ मित्र जो आस्ट्रेलिया भक्त हैं वे इस समझौते से अनभिज्ञ हैं और इसके पीछे कार्यरत राजनीतिक-आर्थिक शक्तियों की अनदेखी कर रहे हैं।इन्नोविओ और क्लींसलैंड विश्वविद्यालय के साझे काम को 23 जनवरी को सीइपीआई एक बयान जारी करके पुष्ट करती है।साथ ही कहती है कि उसने इस काम में मॉडर्ना और आईएनसी कंपनियों के साथ यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्टीयस डिजीज को भी इस गठबंधन में शामिल किया है।इन सबके नेतृत्व में अमेरिका में फीयर और पेनिक अभियान चलाया गया है। यह कैम्पेन मौसमी फ्लू के खिलाफ चलाए गए प्रचार अभियान से दस गुना अधिक है।
      जॉन हॉपकिंस इंस्टट्यूट के अनुसार यह एक तथ्य है कि कोरोना के इलाज का बेहद सिम्पल है।सिर्फ उसमें रिकवरी की समस्याओं को जोड़ देना ही पर्याप्त होता। लेकिन टीवी चैनलों की हेडलाइन निरंतर पेनिक क्रिएट करती रही हैं।मीडिया के उन्माद प्रचार के जरिए कोरोना के बारे में विज्ञानसम्मत राय के प्रचार पर कम ध्यान दिया गया।
कोरोना का सत्य वह है जो बीमारी या संक्रमण के रूप में है।दूसरा अघोषित सत्य यह है कि कोरोना के कारण विश्वव्यापी लॉकडाउन चल रहा है। इसके कारण बेकारी,दिवालियापन,भयानक गरीबी और अभाव पैदा हुआ है। इससे अमीरों और भ्रष्टनेताओं को लाभ हो रहा है। छोटे-मंझोले पूंजी के धंधे चौपट हो गए हैं।सिर्फ बड़ी पूंजी के धंधे बचे हैं।पूंजी का केन्द्रीकरण बढा है।यह एक तरह ने बायोलॉजिकल नयी विश्व व्यवस्था की शुरूआत है।इसने मानवीय अधिकारों, जीने अधिकारों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर दिया है।अनेक देशों में आपातकाल और मार्शल लॉ लागू किया जा चुका है।
   असल में जब झूठ को सत्य में बदल दिया जाए तो आप पीछे सत्य की ओर नहीं लौट सकते। इसलिए कोरोना से लड़ने साथ झूठ से लड़ना सबसे बड़ी चुनौती है। हर स्तर पर झूठ का खेल चल रहा है।

COVID19 कोविड19 और भारत सरकार


भारत के मुख्य न्यायाधीश एस.ए बोबड़े को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा गया है। इस पत्र में सुप्रीम कोर्ट और बार काउंसिल से प्रार्थना की गई है कि वह उस स्थिति पर संज्ञान लें जिसमें वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण स्वतंत्र युवा अधिवक्ता भुखमरी के कगार पर हैं। पत्र में अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और अधिवक्ता कल्याण योजना, 1998 के प्रावधानों के अनुसार कोरोना वायरस (COVID-19) के प्रकोप के चलते एक आपातकालीन कोष के निर्माण की भी मांग की गई है। अधिवक्ता पवन प्रकाश पाठक और आलोक सिंह द्वारा भेजी गई इस पत्र-याचिका में कहा गया है कि अब तक भारत में 4000 से अधिक कोरोना के पॉज़िटिव मामले सामने आए हैं, जिसमें 114 की मौत हो चुकी है। इसके अतिरिक्त, लगभग 162 देशों में लगातार लॉकडाउन के कारण व्यवसाय वैश्विक वित्तीय बाजार आसन्न पतन के डर के साये में चल रहे हैं। पिछले वर्ष की सुस्त आर्थिक वृद्धि, बढ़ती बेरोजगारी, ब्याज दरों और राजकोषीय घाटे के कारण भारत की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आई है। वहीं रेटिंग एजेंसियों ने यह भी घोषित किया है कि यह महामारी भारत के लिए एक आर्थिक सुनामी साबित होगी, इसीलिए, 26 मार्च को, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 बिलियन डॉलर के पैकेज की घोषणा की थी जिसका उद्देश्य आर्थिक व्यवधान को कम करना था। एक दिन बाद आरबीआई ने भी ब्याज दरों में कटौती कर दी और घाटे में आ रहे व्यवसायों के लिए ऋण उपलब्ध कराने के लिए अपरंपरागत उपाय भी किए गए। इस पत्र-याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि- ''वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति को अनोखे संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह पूँजीवाद के विघटित संरचनात्मक संकट की जातीय स्थिति है। साथ में आय में बहुत ज्यादा असमानता, बेरोजगारी, श्रमिक वर्ग की उचित स्वास्थ्य देखभाल के लिए दुर्गमता, श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त करने में दुर्गमता और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए भी बहुत अधिक अंतर्जात स्थिति है।'' इसी के आधार पर, पत्र-याचिका में कहा गया है कि न्यायालय के अधिकारी अर्थात् अधिवक्ता, इस लॉकडाउन की चपेट में आ गए हैं और वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। आगे कहा गया कि ''... अगर लॉकडाउन आगे बढ़ता है, तो यह अधिवक्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है, जिनके पास उनकी आय का एकमात्र स्रोत मुकदमेबाजी है। यह समय है कि मौलिक और कानूनी अधिकारों के रक्षक इस जिम्मेदारी का ख्याल एक वर्ग (बार और बेंच)के रूप में रखें और इसके लिए राज्य या संघ से मिलने वाली राहत निधि की प्रतीक्षा न की जाए, क्योंकि सरकार को बड़े पैमाने पर अन्य व्यवसायों और नागरिकों का ध्यान भी रखना होगा।'' तथ्य यह है कि महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के चलते स्वतंत्र युवा वकीलों को एक कठिन समय का सामना करना पड़ा है। पत्र-याचिका में कहा गया है कि इन सभी को दिल्ली में सीमित काम के साथ रहना पड़ रहा हैं, और इसके बाद गर्मियों की छुट्टी होगी। जो उनकी वित्तीय स्थिति को और खराब कर देंगी। इसमें कहा गया कि ''... स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है और क्योंकि किराए के घर, भोजन और मेडिकल बिलों के भुगतान का अतिरिक्त बोझ है, जबकि आय के सीमित साधन हैं, इसलिए विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत किया गया कि हम इस बात की वकालत नहीं कर रहे हैं कि वर्तमान महामारी के दौरान ''वित्तीय सहायता'' हमारा ''मौलिक अधिकार'' है। तत्काल पत्र के माध्यम से हम केवल युवा स्वतंत्र अधिवक्ताओं की दुर्दशा साझा कर रहे हैं, जो समय के प्रकोप का सामना कर रहे हैं।'' इस पत्र-याचिका में राज्य बार एसोसिएशनों की नीतियों में एकरूपता या समानता की कमी पर भी प्रकाश डाला गया है, जिन्होंने अधिवक्ताओं के लिए विभिन्न ''वित्तीय सहायता'' योजनाएं बनाई हैं। यह भी कहा गया है कि यह उन अधिवक्ताओं के संबंध में एक संदेहापस्द विषय है, जो किसी भी संघ के साथ पंजीकृत न होने के कारण भगवान की दया पर छोड़ दिए गए हैं। यह भी कहा गया है कि बार काउंसिल ऑफ दिल्ली द्वारा प्रचारित नीतियों में अधिवक्ताओं को विभिन्न वर्गों में विभाजित कर दिया है। यह वर्गीकरण समझदारी से भिन्नता न करने की कमी के कारण समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। इसी तरह की नीति की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने भी की है। "तात्कालिक पत्र का उद्देश्य संबंधित राज्य बार संघों के प्रयासों और COVID-19 के संकट से लड़ने के उनके इरादे को हतोत्साहित करना नहीं है। यह विनम्रतापूर्वक बताया जा रहा है कि तत्काल पत्र केवल युवा स्वतंत्र अधिवक्ताओं की दुर्दशा को व्यक्त करने का प्रयास कर रहा है। जो किसी भी कोर्ट बार एसोसिएशन से जुड़े नहीं हैं और जिनको अभी भी स्टेट बार या बीसीआई से वित्तीय मदद की सख्त जरूरत है।'' पत्र-याचिका में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अधिवक्ताओं के लिए उपलब्ध कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बताया गया है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में रोल पर आए या पंजीकृत अधिवक्ताओं के अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा के लिए प्रावधान हैं। अधिवक्ता अधिनियम की धारा 6 (2) में भी अधिवक्ताओं के लिए आपातकालीन फंड का निर्माण करने का प्रावधान है। चूंकि सभी अधिवक्ताओं ने बार एसोसिएशनों की स्वैच्छिक सदस्यता के विपरीत अपनी पसंद वाले राज्य की बार काउंसिल के साथ पंजीकरण करवाया हुआ है , इसलिए वे उन कल्याणकारी योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता के हकदार हैं जिन्हें अधिनियम के तहत प्रख्यापित किया गया है। ''यह विनम्रतापूर्वक कहा गया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 अधिवक्ताओं के लिए वित्तीय निधि के निर्माण का प्रावधान करता है ताकि उनके अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा की जा सकें। इसलिए, विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की जाती है कि कृपया अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत उस पॉवर को लागू करें और उन युवा स्वतंत्र अधिवक्ताओं के लिए आपातकालीन कोष बनाया जाए, जिनको COVID-19 के दौरान वित्तीय सहायता की आवश्यकता है।'' पत्र-याचिका में शामिल किए गए सुझाव,जो इस प्रकार हैं- ''ए-बार और बेंच की मदद से एक समर्पित एकल आपातकालीन पूल फंड बनाया ला सकता है। बी- बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास सभी स्टेट बार एसोसिएशंस का डेटा है, इसलिए बीसीआई पूल फंड और वित्तीय सहायता की आवश्यकता वाले अधिवक्ताओं को यह फंड बांटने के लिए प्रबंधक निकाय बन सकता है। सी- प्रश्न उठता है कि कौन COVID-19 स्थिति के दौरान ''वित्तीय सहायता के लिए पात्र है?'' खैर, नियमों को बार के सदस्यों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है, जबकि हमारे सुझाव इस तरह होंगे- 1-अधिवक्ता जो अपने संबंधित राज्य की बार के साथ पंजीकृत हैं और उनके नाम राज्य रोल पर नामांकित हैं। दो-अधिवक्ता जो स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं और किसी भी कानूनी फर्म या चेम्बर्स या किसी अन्य स्रोत से वेतन/स्टाइफंड नहीं ले रहे हैं। तीन- उनकी घोषित आय के प्रमाण के रूप में आयकर रिटर्न ली जाए, जैसे हमारे मामले में कुल आय 2,50,000 रुपये से कम है। चार- अधिवक्ता जो अपने-अपने राज्यों में प्रैक्टिस कर रहे हैं और केवल आय के स्रोत के रूप में मुकदमेबाजी पर निर्भर हैं। पांच- COVID-19 के दौरान उनकी भोजन, आवास और चिकित्सा बिलों आदि की आवश्यकता को पूरा करने के लिए वित्तीय सहायता की में जरूरत के संबंध में स्व-प्रमाणित शपथ पत्र लिया जाए। हम पूल फंड कैसे एकत्रित कर सकते हैंः स्टेट बार एसोसिएशन ,भारत में लॉ फर्म, अन्य संस्थान या अधिवक्ता, जो इस फंड के लिए योगदान करने के इच्छुक हैं, योगदान दे सकते हैं। अधिवक्ताओं के लिए वित्तीय योजना- COVID-19 के दौरान सहायता की आवश्यकता वाले अधिवक्ताओं को मासिक या एक बार वित्तीय सहायता प्रदान की जा सकती है या एक निश्चित अवधि के लिए ऋण संवितरण के रूप में अधिवक्ताओं को सहायता प्रदान की जा सकती है, जो अदालत खुल जाने के पश्चात समय की एक निश्चित अवधि के बाद सहायता राशि उचित ब्याज के साथ वापिस कर देंगे। फिर आपातकालीन निधि को विभिन्न राज्य बार एसोसिएशनों या बीसीआई के बीच वितरित किया जा सकता है। जो कानूनी सहायता या किसी अन्य मानव जाति के उद्देश्य के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं। या जब वित्तीय सहायता लेने वाले अधिवक्ता उस पैसे को वापिस कर दें तो उसे उन वरिष्ठ अधिवक्ता, अधिवक्ता या कानून फर्म को वापिस किया जा सकता है,जिन्होंने इस निधि में अपना योगदान दिया था। इसलिए यह अधिवक्ताओं, कानून फर्मों को इस आपातकालीन निधि में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करेगा क्योंकि एक समय की अवधि के बाद उनका पैसा ब्याज सहित वापस कर दिया जाएगा। (इस विशेष योजना के लिए आरबीआई की अनुमति की आवश्यकता है) पत्र-याचिका के अंत में यह कहा गया है कि वकालत एक महान पेशा है और यह उन व्यक्तियों के लिए है जो दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ते हैं, महामारी ने कठोर स्थिति पैदा कर दी है, और इसके लिए शीर्ष न्यायालय के तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है।...
https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA

अंधविश्वास और नायक संस्कृति से बना जनमानस : साहित्य में


अंधविश्वास और नायक संस्कृति से बना जनमानस-
     भारत में आम जनता के दो पहलू हैं जिनसे उसकी मानसिक संरचनाएं संचालित होती हैं,पहली संरचना है उसके पुराने विश्वास और अंधविश्वास,दूसरी संरचना है उसका नायक प्रेम। इसमें सिर्फ नायक ही नायक है, इसमें न देशप्रेम आता है और जनता के प्रति प्रेम आता है। आम जनता लंबे समय से नायक मोह की शिकार है।अंधविश्वास और नायकप्रेम का यह संबंध उसके हरेक व्यक्ति के फैसले को निर्धारित और प्रभावित करता है।बहुत कम लोग हैं जो इन दोनों से पूरी तरह मुक्त हैं। यह बीमारी वाम से लेकर दक्षिण तक फैली हुई है।इन दोनों फिनोमिना को हिन्दी सिनेमा और विज्ञापनों ने खाद-पानी दिया है।नायकप्रेम और अंधविश्वास को यथार्थ में परखने की आम जनता कोशिश ही नहीं करती,यह मान लिया गया है,प्रचार में जो दिख रहा है वह सही है।जो दिखाया जा रहा है,वह इसलिए दिखाया जा रहा है ,क्योंकि सच है या उसमें सच का अंश है। मसलन् ,यह कहा गया कि नेहरू-इंदिरा तो मुसलमानों और औरतों के हितैषी थे, लेकिन तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते,यह भी कहा गया कि पंचवर्षीय योजनाओं से गरीबी खत्म हुई ,तथ्य इसकी भी पुष्टि नहीं करते, इसी तरह पीएम मोदी ने कहा कि सबके अच्छे दिन आएंगे, लेकिन तथ्य हस दावे की भी पुष्टि नहीं करते। उनका वायदा था हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार दूंगा।लेकिन यथार्थ में हर साल दो करोड़ नौकरियां खत्म हुई हैं विगत चार सालों में इसलिए नायकप्रेम और उसके पक्ष में किए गए प्रौपेगैंडा को यथार्थ पर परखने की जरूरत है।हमने एक चीज नोटिस की है नायकप्रेम और अंधविश्वास इन दो का प्रचार सबसे अधिक आम जनता हजम करती है।ये दो चीजें आज भी सबसे जल्दी दिलो-दिमाग को सीधे प्रभावित करती हैं। आमतौर इन दोनों फिनोमिना के साथ किसी न किसी रूप में पापुलिज्म काम करता है।किसी न किसी तरह का इल्युजन काम करता है।खासतौर पर युवाओं और औरतों पर इन दोनों के प्रचार का दैनंदिन जीवन में गहरा असर होता है। उनको ही खासतौर पर निशाना बनाया जाता है।यह माना जाता है कि असली नायक वह है जो जनता के मनोभावों को व्यक्त करे। इस तरह की अभिव्यंजनाओं को देखकर ही आम जनता उम्मीद लगाए बैठी रहती है कि हो सकता है नायक आगे कुछ करे, इंतजार करो जरूर कुछ करेगा,नायक के कदमों पर उसकी अगाध आस्था होती है।वह यह मानकर चलती है नायक में तो हमारी इच्छाएं-आकाक्षाएं निवास करती हैं।त्रासदी यह कि अपने इस विभ्रम के बाहर निकलकर जनता कभी यथार्थ को देखने को तैयार नहीं होती।
  जब हम नायक को देखते हैं तो उसे एक मिथ की तरह देखते हैं।उसे दिवा- स्वप्न की तरह देखते हैं।इस रूप में देखते हैं कि वह जो कह रहा है उसे जरूर लागू करेगा।लेकिन यहीं पर उस नायक की त्रासदी निहित है, उसका अंत निहित है।क्योंकि आम जनता मिथ के बाहर नजर डालने के लिए तैयार ही नहीं है।वह हमेशा प्रचार की रोशनी में नायक को देखती है और प्रचार ही उसे वैध बनाता है, उसकी बातों को वैध बनाता है।वह मिथ और प्रचार के बाहर यदि यथार्थ की कसौटी,अपने आसपास के जीवन यथार्थ में जाकर यदि नायक के कहे की मीमांसा करे तो तस्वीर एकदम भिन्न नजर आएगी।असल में नायक के बनाए मिथ और यथार्थ में कैद रहकर वह सब चीजें देखती है इसलिए वह अन्य किस्म के आख्यान,यथार्थ,तर्क आदि को मानने,सुनने को तैयार नहीं होती। हमारा अब तक का मानव सभ्यता का इतिहास इस तरह के नायकप्रेम, नायकबोध और निर्मित यथार्थ के असंख्य आख्यानों से भरा पड़ा है। कायदे से जीवन के यथार्थ की कसौटी पर नायक,विचार और जन -आकांक्षाओं की परीक्षा होनी चाहिए।दैनंदिन जीवन और नायकीय आश्वासनों के बीच में जो बड़ा अंतराल होता है उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। अंधविश्वास और नायकप्रेम में दूसरी चीज है आलोचनात्मक विवेक का अंत। ये दोनों चीजें इसकी हत्या कर देती हैं। अंधविश्वास और नायकप्रेम में डूबा समाज कभी क्रिटिकली सोचता नहीं है। खासकर महा-संकट की अवस्था में तो ये दोनों चीजें और ज्यादा घनीभूत हो जाती हैं।दूसरी बात यह कि इन दोनों के उपभोक्ताओं के संख्याबल के आधार पर मीडिया अपनी राय बनाता है।इन दोनों की ताकत है इमेज प्रेम और छद्म अनुभूतियां।इनमें आम जनता लंबे समय तक बंधी रहती है।दिलचस्प बात यह है कि नायकप्रेम ही नायक की सबसे बड़ी कमजोरी भी है।नायक अपने द्वारा निर्मित मिथ्या संसार पर एक अवधि के बाद विश्वास करने लगता है।यहीं से उसकी असफलता की खबरें आनी शुरू हो जाती हैं।हरेक नायक के साथ कोई न कोई उपसंस्कृति के रूप जुड़े होते हैं और उन रूपों को संतुष्ट करने के लिए वह कुछ न कुछ हरकतें करता रहता है।यहां तक कि अपने अनुयायियों के उपद्रवों को वैधता प्रदान करता है।एक बड़ा परिवर्तन और घटा है कम्युनिकेशन को इन्फॉर्मेशन ने अपदस्थ कर दिया है। पहले हम कम्युनिकेट करते थे,अब कम्युनिकेट नहीं करते बल्कि सूचनाएं लेते और देते हैं।अब हम यथार्थ पर नहीं सूचनाओं पर विश्वास करने लगे हैं।यथार्थ को परखने,उलट-पुलट करके देखने की कोशिश नहीं करते।क्योंकि हम माने बैठे हैं कि हम सही हैं, हमारी सूचनाएं सही हैं,इसलिए यथार्थ को देखने की जरूरत नहीं है। अब हम अनुकरण करते हैं। अनुकरण और इमेजों को ही सच मानते हैं।जबकि ये सच नहीं होतीं।ये दोनों विभ्रम पैदा करती हैं और यथार्थ से दूर ले जाती हैं।यही वो परिदृश्य है जिसमें नए नायक की इमेज,नायकप्रेम और सामाजिक अहंकार पैदा हुआ है।उसने विभिन्न किस्म की प्रतिगामी विचारों और उप-संस्कृति के रूपों और उनके मानने वालों को पाला-पोसा है।फलतःजहां एक ओर हाइपररीयल जनता निर्मित हुई है वहीं दूसरी ओर हाइपररीयल नायक और उसकी संचालन प्रणाली विकसित हुई है।अब हम रीयल और अनरियल में नहीं हाइपररीयल में जी रहे हैं।हाइपर रीयल हमारी संवेदनाओं , भावदशाओं और दैनंदिन तर्कशास्त्र को निर्मित और प्रभावित कर रहा है।
     इसके अलावा छिपाने की कला का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है,उसने बंद समाज को और अधिक बंद बनाया है।अनुदार बनाया है।पारदर्शिता घटी है।झूठ बोलने,झूठ में जीने की आदत बढ़ी है।
     ‘भावोन्मत्त’ भाव में तीव्र कम्युनिकेशन की आदत बढ़ी है। हम ठहरकर सोचने और संवाद-विवाद करने को तैयार नहीं हैं। जब तक हम यह सब नहीं करते मुश्किलें आएंगी।
गिरीश मालवीय
आज सुबह एक मित्र ने एक पोस्ट लिखी जिसमे पिछले कुछ दिनों में हुई इंदौर शहर में बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज में हुई मौतो के कारण पुछा गया........अब शायद मित्र ने वह पोस्ट हटा ली है इस पोस्ट पर मैने एक छोटा सा जवाब लिखा............
'एक बड़ा कारण यह भी है कि किसी तरह का ईलाज उपलब्ध नही है शहर के अस्पतालों में, न कोई क्लिनिक खुला है अगर स्वास्थ्य की स्थिति जरा भी बिगड़ती है तो गंभीर होने में देर नही लगती, ओर इलाज न मिलने की दहशत ही आदमी को मार डालती है, कोरोना से भी मृत्यु हो रही है लेकिन सारी मौतें कोरोना से हो रही है यह कहना भी गलत होगा'
इस जवाब से पोस्टकर्ता मित्र आंशिक रूप से सहमत थे लेकिन उनका कहना था कि ऐसी ही कंडीशन तो सभी इंदौर वासियों की हो रही होगी लेकिन इस पर  शहर का मुस्लिम समाज क्यो ख़ामोश है। हाहाकार क्यो नही मच गया शहर में
इस बात पर मैंने Riz Khan को कमेन्ट बॉक्स में आमंत्रित किया......... रिज खान लंबे समय से शहर में पब्लिक हेल्थ सेक्टर में ही कार्यरत है उन्होंने जवाब में जो लिखा वो आप सब को एक बार पढना चाहिए.......
गिरीश भाई शुक्रिया... यह समझे हम एक बड़े विकट समय से गुज़र रहे हे... जिस तरह से क्वारानटिन के एरिए बढ रहे हे... अगर हर रोज़ 2000 लोगो के कम से कम  कोरोना 19 का जाँच नही हुई तो जेसा मैने अपनी पोस्ट मे लिखा था मेरे डाटा एनालिसिस की जो क्षमता हे वह हार जाए... जो मेरा अनुमान हे वह झुठा हो जाए... में झुठा हो जाऊ... पता है यह में क्यो लिख रहा हूँ... इसलिए भाई कि अगर हम गलती से इसकी चपेट मे आ गए तो उस समय तक महामारी फेल चुकी होगी...  सामाजिक रिश्तों के ताने बाने अभी ही टूट चुके हे लोग शवयात्राओ मे नही जा रहे हे... मेरे खुद के घर के मेनगेट पर ताला लग चुका हे... न कोई बाहर जा रहा हे न कोई अन्दर आने के लिए अलाव हे... दुध पीना सब्जी खाना छोड़ चुके हे... यह व्यवस्था 3 माह तक चला लेंगे एक ज्वाइंट परिवार मे करीब 60 सदस्य हे...  लेकिन उसके बाद??? अगले हफ्ते अम्मी की बी पी की दवा खत्म है उसका कोई जुगाड नही हो पा रहा हे...
यह जो 134 लोग मरे हे उन सब का पोस्टमार्टम होना चाहिए था... नही हुआ... इनमे से कोरोना पाज़ेटिव को - कर दै बाकी सब तो कुत्ते से खराब मोत मरे हे... (मुझे माफ करना इस शब्द के लिए) मरीज़ गम्भीर होने पर रिश्तेदार एक हास्पिटल से दुसरे ओर फिर 5 हास्पिटल तक लेकर गए हे ओर मरीज़ो ने रास्ते में, रिश्तेदारों की गोद मै हास्पिटल के मेन गेट तक मे पहुँच कर इलाज के अभाव मे दम तोड़ा हे... हास्पिटलस ने मरीज़ो को एडमिट ही नही किया ओर भगा रहे हे...  इसमे भी सबसे ज़्यादा दर्द नाक डिलीवरी की महिलाए  जिसके हम 8000 देते हे ओर आपरेशन कै 18000... खुद मेरी भांजी को उन 4  बडे हास्पिटलस ने मना कर दिया एडमिट करने से जिनके मेनेजर मालिको से खास संबंध हे... एक हास्पिटल ने किया आपरेशन करना पड़ेगा खान साब 65000 लगेगे दवा गोली अलग से... 18000 वाला आपरेशन का 65000... सोचिए एक गरीब मरीज़ होती तो क्या होता उसका... एक बार फिर यह जो मरे हे पोस्ट मार्टम हूआ नही मृत्यु का कारण अज्ञात??? इनकी अंतिम क्रिया मे सारा परिवार शामिल हूआ अगर उनमे से 10 भी कोरोना पॉजेटिव थे यदि तो इस शहर का ईश्वर अल्लाह ही निगहबान है...
क्या वास्तव मे हम डर से मर रहे हे ? !
हमारे शहर मे हर रोज़ 6-8 मरीज़ो कै दिल के बायपास इतने ही ब्रेन के ओर ढेरो एमरजैंसी आपरेशन होते हे... अब नही हो रहे हे, लोगो को समय पर इलाज के लिए डाक्टर उपलब्ध नही हे... डायबिटीज़ बी.पी. केन्सर, प्रोस्टेट व युरो लाजी, कार्डियोलाजी व जीवनरक्षक दवाइया जो मरीज़ हर रोज़ ले रहे हे वह सब दवाइया, दवा बाज़ार तक  मे भी नही मिल रही हे...
ओर आप कहते हे लोग डर से मर रहे हे यह शर्मनाक बयान हे... आपको नही लिखना चाहिए यह शोभा नही देता हे... कई लोग जो दिन रात आपके साथ उठते बेठते हंसते खिलखिला कर अट्ठाहास लगाते हे... वह अन्दर से कइ बार बीमार होते हे ओर दिन भर मे 8-10 गोलियो के सहारै अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी चलाकर अपने को समाज के सामने खुश दिखाने की कोशिश करते हे...
इसलिए जब आप यह बोल रहे हे कि लोग "डर" से मर रहे है तो आप उनकी बे-इज़्ज़ती कर रहे हे!!! बन्द करिए यह बोलना... वह समय पर "उचित इलाज" ओर दवाइयो के अभाव मे मर रहे हे............
कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान मध्य प्रदेश के भिंड जिले में गरीब महिलाओं को प्रधानमंत्री जनधन योजना से 500 रुपये लेना महंगा पड़ गया. पुलिस ने सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन करने पर 39 गरीब महिलाओं को जेल में बंद कर दिया.
इतना ही नहीं, पुलिस ने महिलाओं पर धारा 151 के तहत कार्रवाई भी की. लिहाजा इन महिलाओं को 4 घंटे जेल में गुजारना पड़ा. इन महिलाओं को 10-10 हजार रुपये के मुचलके पर एसडीएम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद छोड़ा गया. इस कार्रवाई के दौरान पुलिस की भी लापरवाही सामने आई और पुलिस ने खुद सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया.
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दूसरों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराने वाली पुलिस ने इन 39 महिलाओं को हिरासत में लेकर एक ही वाहन में भरकर ले गई. इसके बाद इन महिलाओं को अस्थायी जेल में बंद कर दिया गया.
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कोरोना वायरस को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन की वजह से लोगों का कामकाज ठप हो गया है और गरीबों को खाने के लाले पड़ रहे हैं. इसी के चलते सरकार ने गरीब लोगों के खाते में 500 रुपये डाले हैं, जिसे निकालने के लिए बैंक के बाहर एक लंबी लाइन लग गई.
लॉकडाउन के उल्लंघन की जानकारी जब पुलिस को लगी, तो पुलिस फौरन पहुंची और इन महिलाओं को समझाया कि वो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें. लेकिन ये महिलाएं नहीं मानीं. फिर इन पर एक्शन लिया और इनको हिरासत में ले लिया.(आजतक )
भाजपा के साइबर सैल  की पोल खोल-2 -
पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया में एक मैसेज वायरल किया जा रहा है। इसमें लिखा है- ‘आज रात 12 बजे से देशभर में डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट लागू हो चुका है। इसके बाद सरकारी विभागों को छोड़कर अन्य कोई भी नागरिक कोरोनावायरस से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी शेयर नहीं कर सकेगा। ऐसा करने पर कानूनी कार्रवाई होगी। वायरल मैसेज में वॉट्सऐप ग्रुप एडमिंस को भी सलाह दी गई है कि वे यह मैसेज अपने ग्रुप में फॉरवर्ड कर दें।’ इस मैसेज के साथ ही न्यूज वेबसाइट लॉइव लॉ की लिंक भी वायरल की गई है। लाइव लॉ ने खुद अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस वायरल दावे का खंडन किया है। वेबसाइट की तरफ से किए गए ट्वीट में लिखा है कि लाइव लॉ की रिपोर्ट के साथ एक फेक मैसेज वॉट्सऐप ग्रुप में वायरल किया जा रहा है। कृपया इसे साझा न करें।
दरअसल यह पूरा मामला तब शुरू हुआ, जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए कहा कि कोविड-19 से जुड़ी किसी भी खबर को प्रकाशित, प्रचारित या टेलीकास्ट करने के पहले पुष्टि की अनिवार्यता की जाए। सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए गए मैकेनिज्म में दावों की पड़ताल के बाद ही कोविड-19 से जुड़ी कोई भी जानकारी प्रचारित-प्रसारित हो।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च को इस संबंध में कहा, ‘महामारी के बारे में स्वतंत्र चर्चा में हस्तक्षेप करने का हमारा इरादा नहीं है, लेकिन मीडिया को घटनाक्रम की जानकारी आधिकारिक पुष्टि के बाद प्रकाशित-प्रचारित किए जाने के निर्देश हैं।’ सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने पाया, ‘लॉकडाउन के दौरान शहरों में काम करने वाले मजदूरों की बड़ी संख्या में फेक न्यूज के चलते घबराहट पैदा हुई कि लॉकडाउन तीन महीने से ज्यादा समय तक जारी रहेगा। जिन्होंने इस तरह की खबरों पर यकीन किया, उन लोगों के लिए माइग्रेशन (प्रवासन) अनकही पीड़ा बन गया। इस प्रक्रिया में कुछ ने अपना जीवन खो दिया। इसलिए हमारे लिए यह संभव नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट या सोशल मीडिया द्वारा फर्जी खबरों को नजरअंदाज किया जाए।’ हालांकि कोर्ट ने ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया है जो कोविड-19 से जुड़ी जानकारी साझा करने पर रोक लगाता हो। कोर्ट ने फर्जी खबरों पर चितां जरूर जताई है साथ ही मीडिया को रिपोर्टिंग में ज्यादा सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं।
कोरोना से संबंधित मैसेज शेयर न करने से संबंधित जानकारी की पुष्टि के लिए हमने भोपाल रेंज के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक उपेंद्र जैन से बात की। उन्होंने बताया कि सिर्फ कोरोना नहीं, बल्कि किसी भी तरह की भ्रामक जानकारी वायरल कर यदि भय का माहौल बनाया जाता है या आपसी सौहार्द बिगाड़ा जाता है तो पुलिस ऐसे व्यक्ति के खिलाफ एक्शन ले सकती है। उन्होंने कहा कि बिना पुष्टि के किसी भी जानकारी को वॉट्सऐप या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म पर शेयर नहीं किया जाना चाहिए।
भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने भी वायरल दावे का खंडन करते हुए ट्वीट किया कि, सरकार द्वारा कोविड-19 को लेकर किसी भी तरह की जानकारी शेयर करने पर रोक लगाने का दावा करने वाला मैसेज फर्जी है।
मुसलमानों के खिलाफ चल रहे असत्य अभियान को बेनकाब करो-3-
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें मुस्लिमों का एक समूह बर्तनों को चाटते हुए दिख रहा है। दावा है कि कोरोनावायरस को फैलाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हमारी पड़ताल में वायरल दावा झूठा निकला। कई यूजर्स इस वीडियो को दिल्ली के निजामुद्दीन का बता रहे हैं। निजामुद्दीन को हॉटस्पॉट के तौर पर चिन्हित किया गया है। यहीं तब्लीगी जमात के ढेरों लोग कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
रिवर्स सर्चिंग में पता चला कि वायरल वीडियो जुलाई 2018 का है। सर्चिंग में वायरल वीडियो हमें वीमो पर मिला। इसमें दी गई जानकारी के मुताबिक, वीडियो में दिख रहे लोग दाउदी बोहरा हैं जो बर्तनों में कुछ भी जूठा न छूटे इस मकसद से बर्तनों को साफ कर रहे थे। इसमें ये जानकारी भी दी गई कि, ऐसा दाऊदी बोहरा समुदाय के सर्वोच्च धर्मगुरू सैयदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन के आदेश पर किया गया था।
मुसलमानों के खिलाफ चल रहे असत्य अभियान को बेनकाब करो   -2-
कोरोनावायरस को लेकर कई अफवाहें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। इनकी सच्चाई भी लगातार सामने लाई जा रही है। अब न्यूज एजेंसी एएनआई द्वारा दी गई जानकारी को नोएडा के गौतम बुद्ध नगर के डीसीपी ने गलत बताया है। न्यूज एजेंसी 'एएनआई ने 7 अप्रैल को गौतम बुद्ध नगर के डीसीपी संकल्प शर्मा का हवाला देते हुए ट्वीट किया था कि, नोएडा के हरौला के सेक्टर 5 में जो तबलीगी जमात के सदस्यों के संपर्क में आए थे, उन्हें क्वारेंटाइन कर दिया गया है।'
न्यूज एजेंसी के इस ट्विट को एएनआई की एडिटर स्मिता प्रकाश ने भी ट्विट करते हुए लिखा था कि नोएडा में सुरक्षित रहें।
अब इस दावे को डीसीपी नोएडा द्वारा ही झूठा बताया गया है। डीसीपी नोएडा ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से एएनआई को टैग करते हुए लिखा कि,' ऐसे लोग जो कोरोना पॉजिटिव के संपर्क में आए थे, उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार क्वारेंटाइन किया गया। तब्लीगी जमात का जिक्र नहीं था। आप गलत हवाला देते हुए फर्जी खबरें फैला रहे हैं।'
https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA

देवेन्द्र सुरजन : गोलेन्द्र पटेल


देवेन्द्र सुरजन
फर्जी खबरों का दुश्चक्र भारत को कोरोना से बड़ा नुकसान पहुंचाने जा रहा है. समाज का ​अपने ही लोगों के प्रति अविश्वास से भर जाना किसी महामारी में नहीं होता. कोरोना के बहाने भारत के नफरत के कारोबारियों ने अपना कारोबार आपात स्तर पर तेज कर दिया है.
रोज दो एक लेख लिखने के बावजूद मुझे लगता है कि मैं इसके खतरे को जितना समझ पा रहा हूं, उतना कह नहीं पा रहा हूं.
जब हम लिखना चाह रहे थे कि वायरल हुए दर्जनों वीडियो झूठे हैं, तब तक एक समुदाय के गरीब लोगों पर हमलों की तमाम खबरें आ गईं. पहाड़ से लेकर दक्षिणी राज्य कर्नाटक तक में यह मानकर हमले हुए कि मुसलमान कोराना फैला रहा है. हमारे झूठ के निरंकुश बाजार ने मुसलमानों को कोरोना का आविष्कारक बना डाला.
योगेंद्र यादव के स्वराज अभियान से जुड़े तबरेज और उनकी अम्मी बस्तियों में राशन बांट रहे थे. लोगों ने उन्हें ऐसा करने से रोका. कहा गया, "हिंदुओ को खाना मत बांटो, अपने लोगों को बांटो". इसके बाद भीड़ ने उन्हें पीटा. तबरेज़ के दाहिने हाथ और सिर पर टांके लगाए गए.
कर्नाटक के एक गांव में मछुवारों को पीटा गया. वे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहे हैं. भीड़ का आरोप है कि तुम्हारी वजह से कोरोना फैल रहा है. इन मछुआरों में हिंदू भी थे, मुसलमान भी.
हल्द्वानी के जावेद की दुकान हटवा दी गई, क्योंकि वे मुसलमान हैं. देश भर में लाखों दुकारदार जरूरी चीजों की सप्लाई कर रहे हैं, लेकिन जावेद से खतरा पैदा हो गया. दिल्ली में एक जगह से खबर आई कि मुसलमान विक्रेता को मुहल्ले में घुसने नहीं देना है.
जो ऐसा कर रहे हैं, उनकी गलती नहीं है. उन्हें ऐसा बताया गया है. मीडिया और सोशल मीडिया के जरिये.
मीडिया में खबर छपती है कि एक आइसोलेशन सेंटर में तब्लीगी जमात के लोग नंगे घूम रहे हैं और अभद्रता कर रहे हैं. इसी खबर के आधार पर, खून से लथपथ एक नंगे आदमी का वीडियो वायरल होता है. दावा किया जाता है कि देखिए, कोरेंटाइन सेंटर में तबलीगी ने आतंक फैला रखा है. वीडियो देखकर कमजोर दिल वाला सटक सकता है.
आल्टन्यूज इस वीडियो का सोर्स पता करता है. वीडियो पाकिस्तान से कराची का है. जहां एक व्यक्ति ऐसी अवस्था में मस्जिद में घुसा था. यह वीडियो  यूट्यूब पर अगस्त 2019 में अपलोड हुआ था, तब से इंटरनेट पर मौजूद है.
अमर उजाला और पत्रिका जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों ने खबर छापी सहारनपुर में तब्लीगियों ने मांसाहार न मिलने पर खाना फेंक दिया, खुले में शौच की, वगैरह वगैरह. इसे चैनलों ने भी चलाया. सहारनपुर पुलिस ने स्पष्टीकरण जारी किया कि मीडिया ने जो खबर प्रकाशित की है, हमारे यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ है. यह खबर फर्जी है.
पिछले दो हफ्ते में ऐसे सैकड़ों उदाहरण आ चुके हैं. कुछ एक तो आपको दिखे ही होंगे. हमारी वॉल पर ही तमाम दिखे होंगे. अगर इन पर कोई अध्ययन प्रकाशित करवाना हो तो कई हजार पेज की कई किताबें बनेंगी. हमारे झूठ का संसार बहुत बड़ा हो चुका है.
हम किस दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं, इसका अंदाजा आप ऐसे लगाइए कि हमारे केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह एक बड़े चैनल पर लॉकडाउन के बारे में कुछ डब्ल्यूएचओ का प्रोटोकॉल बताते हैं. मंत्री जी जो बता रहे हैं, वह एक फर्जी व्हाट्सएप फॉरवर्ड है. जब वे बता रहे हैं, उसके पहले आल्टन्यूज खबरें छाप चुका है कि फर्जी है, डब्ल्यूएचओ ने ऐसा कोई प्रोटोकॉल जारी नहीं किया है. यह व्हाट्सएप फॉरवर्ड कैंब्रिज के एक रिसर्च पर आधारित था, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन पर कुछ बातें थीं. लेकिन मंत्री जी ने अपनी सरकार से नहीं पूछा, अपने अधिकारियों ने नहीं पूछा, व्हाट्सएप पर डब्ल्यूएचओ का प्रोटोकॉल पढ़ लिया.
138 करोड़ लोगों की सरकार का मंत्री व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के फर्जीवाड़े के अथाह महासमंदर में कूद गया. बहुत संभावना है कि उनसे चूक हुई हो, लेकिन आप यह सोचिए कि मंत्री जैसे सुरक्षित पदों को फेक न्यूज ने अपने चंगुल में दबोच लिया है.
मसला यह नहीं है कि किसी जमाती ने ऐसा किया या नहीं, उनसे तो दो चार सिपाही लट्ठ बजाकर तुरंत निपट लिए होंगे. मसला यह है कि इन्हीं सैकड़ों फर्जी खबरों से हमारा मानस तैयार हो रहा है.
झूठी, दुर्भावनापूर्ण, सांप्रदायिक और विषैली सूचनाओं की रेत का एक बहुमंजिला महल है और हम सब उस पर चढ़ते जा रहे हैं....https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA




देवेंद्र सुरजन : गोलेन्द्र पटेल


देवेन्द्र सुरजन-।
सिपला के संस्थापक हमीद की कहानी
जब सिपला ने जेनेरिक दवाओं का उत्पादन शुरू किया तो अमरीका ने उस पर पेटेंट कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया था। उस वक़्त इन्दिरा गांधी मजबूती से सिपला के साथ खड़ी थीं। आज विडम्बना यह है कि वही अमरीका अब भारत से हाड्रोक्सीक्लोरोकुईन की मांग कर रहा है।
नेशनल हेराल्ड में प्रकाशित सुजाता आनंदन की रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद
 
एक ऐसे समय में जब देश में कुछ मीडिया समूह और भारतीय जनता पार्टी समर्थक भक्तों का एक तबका मुसलमानों को पैशाचिक रूप में प्रस्तुत कर उनके खिलाफ घृणा का माहौल बना रहा है, यह कहानी बहुत सारे लोगों के दिलों को राहत पहुंचाएगी।
बात वर्ष 1920 की है। एक रईस आदमी ने अपने बेटे को बेरिस्टरी की पढ़ाई करने के लिए बंबई से यूनाइटेड किंगडम की ओर जाने वाले जहाज में बैठा कर विदा किया। उस वक़्त देश के अधिकांश सम्पन्न परिवारों में यही प्रचलन था। लेकिन लड़के का दिल कानून की पढ़ाई में नहीं बल्कि रासायनिक विज्ञान में उलझा था, जिसमें उन दिनों कोई भविष्य नहीं माना जाता था।
लेकिन इस लड़के के पिता ने उसके सामने कोई विकल्प छोड़ा न था। बहरहाल जहाज ने जब बंदरगाह से लंगर छोड़ा उस वक़्त डेक पर खड़े हो कर पिता को विदाई में हाथ हिलाते ख्वाजा अब्दुल हमीद के मन में दूसरी ही उधेड़-बुन चल रही थी। वे बीच राह में इस जहाज से जर्मनी के तट पर उतर गए, जो विगत शताब्दी के उन आरंभिक दशकों में रसायन विज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में अग्रणी देश था। उन्होंने वहाँ से डिग्री हासिल की और एक जर्मन यहूदी और कम्युनिस्ट लड़की (दोनों ही पहचान ऐसी जिनसे नजियों को सबसे ज़्यादा नफरत थी) से शादी कर ली। इससे पहले कि एडोल्फ हिटलर के गेस्टापो उन्हें पकड़ पाते वे दोनों ही जर्मनी से निकल सुरक्षित भारत आ गए।
रसायनों की व्यापक समझ के साथ ख्वाजा हमीद ने वर्ष 1935 में केमिकल, इंडस्ट्रियल एंड फार्मास्युटिकल लबोरेट्रीज़ की स्थापना की। आज़ादी के कुछ दशकों के बाद इसी को CIPLA सिपला इस संक्षिप्त नाम से जाना गया।
ख्वाजा हमीद महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बड़े प्रशंसक थे और राष्ट्रवाद के सच्चे जज्बे के साथ उन्होंने जन सामान्य के लिए जनरिक दवाओं का उत्पादन कर बिलकुल कम दाम में उन्हें बेचना शुरू किया। इनमें सिर्फ मलेरिया और तपेदिक की दवाएं ही नहीं बल्कि अन्य श्वसन की तकलीफ़ों, हृदय रोग, मधुमेह और गठिया जैसी रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी सभी बामरियों की दवाएं शामिल थीं।
कभी 1970 के आसपास सिपला ने (यह नाम 1980 में रखा गया था) प्रोप्रानेलोल नामक दावा का उत्पादन शुरू किया। इसे एक बड़ी अमरीकी फार्मास्युटिकल कंपनी ब्रुकलिन, न्यू यार्क से पहले ही पेटेंट करा चुकी थी। यह दवा रक्तचाप, माइग्रेन, हृदय रोग और अन्य तकलीफ़ों के उपचार में काम में लाई जाती थी। उस वक़्त दो ध्रुवों में बंटी दुनिया में अमरीका भारत का मित्र देश नहीं था और वास्तव में महाशक्ति हुआ करता था। डोनाल्ड ट्रम्प की तरह उसे दुनिया के किसी देश से अपनी बात मनवाने के लिए धमकी देने की ज़रूरत नहीं थी।
अमरीका ने भारत सरकार को इस मामले में शिकायत की। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने उनके सामने घुटने नहीं टेक दिये जैसा कि गत सप्ताह नरेंद्र मोदी ने किया। बल्कि इन्दिरा गांधी ने ख्वाजा हमीद के बेटे युसुफ हमीद जो खुद उस वक़्त तक केंब्रिज से रसायन में स्नातक हो चुके थे और कंपनी का व्यवसाय संभाल रहे थे को अपने पास बुलवा भेजा। उन्होंने युसुफ को तलब किया कि वे कैसे अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कानून का उल्लंघन कर देश को संकट में डाल सकते हैं? इस पर युसुफ ने श्रीमती गांधी को अपने पिता की कहानी सुनाई और बताया कि उन्होंने किस तरह सामान्य भारतियों को कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता की दवाएं उपलब्ध कराने के लिए इस कंपनी की स्थापना की थी।
ख्वाजा ने अपने बेटे युसुफ को कंपनी का कार्यभार सौंपते हुए कहा था यह हिदायत दी थी कि इस कंपनी की स्थापना जिस मकसद के लिए की गई है उसे हमेशा याद रखना। “दुनिया की दूसरी फार्मास्युटिकल कंपनियों की तरह हम मुनाफा कमाने के लिए यह कंपनी नहीं चलाते हैं बल्कि हमारा उद्देश्य गरीबों तक स्वस्थ्य सेवाओं को पहुंचा कर उन्हें राहत पहुंचाना है। अच्छी और सस्ती दवाओं के अभाव में यह लोग मर सकते हैं।”
युसुफ ने इन्दिरा गांधी को बताया कि वे इसी मकसद से इस दावा का उत्पादन कर रहे हैं। इस दलील से प्रभावित इन्दिरा गांधी ने यह जानते हुए कि इसके नतीजे आसान नहीं होंगे, अमरीका के उस आदेश को मानने से इंकार कर दिया जिसके तहत भारत से इस दावा का उत्पादन बंद करने के लिए कहा गया था। अपने देशवासियों के हितों को सर्वोपरी रखने और अमरीकी आदेशों की अवहेलना के कारण इन्दिरा गांधी को अमरीकी सरकार नापसंद करती थी।
इतना ही नहीं युसुफ के सुझाव को ध्यान में रखते हुए इन्दिरा गांधी ने पेटेंट कानून में भी बदलाव करवाया, जिसके तहत दवा मात्र के पेटेंट की बजाय उनके उत्पादन की प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं होना चाहिए यह तय किया गया। इससे सिपला को यह छूट मिल गई कि वह जितनी चाहे उतनी उच्च गुणवत्ता की जनरिक दवाओं का उत्पादन कर उन्हें कम दामों में लोगों को उपलब्ध करा सके। तब से अब तक अन्य अनेक दवाओं के साथ ही सिपला ने HIV की सस्ती दवा उपलब्ध कराई है और कई अफ्रीकी देशों सहित अनेक विकासशील देशों में अपने काम का विस्तार किया है। इनमें ऐसे देश भी शमिल हैं जहां एक समय में सबसे बड़ी तादाद में गरीब और HIV के रोगी मौजूद थे।
यही वह कंपनी है जो हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन का उत्पादन करती है जिसका इस्तेमाल मलेरिया, ल्यूपस और संधिवात गठिया (rheumatoid arthritis) तक के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है जिसे अब मूर्ख ट्रम्प प्रशासन की एक धमकी के आगे घुटने टेकते हुए अब गरीब भारतीयों से छीन कर इतनी बड़ी तादाद में अमरीका को निर्यात कर दिया गया है।
ट्रम्प ने इस दवा के लिए भारत सरकार पर दबाव डालना शुरू किया उससे पहले ही  मुंबई के सैफी अस्पताल में संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हमीदुद्दीन परदावाला ने हम में से कुछ लोगों को इस बात पर गौर करने के लिए कहा था कि उन देशों में जहां मलेरिया और संभवतः तपेदिक का भी इतिहास रहा है वहाँ कोरोना वाइरस का असर उतना नहीं होगा जितना उन देशों में हुआ है जहां यह बीमारियाँ अस्तित्व में ही नहीं रही हैं।
मलेरिया कहाँ अस्तित्व में नहीं रहा? अमरीका, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, जर्मनी, स्पेन, कनाडा, आदि वे देश हैं जहां सब से ज़्यादा कोरोना का संक्रमण पाया गया। जब मैं जर्मनी के बारे में सोचती हूँ तो यह ख्याल आता है कि आज तमाम देश भारत के शुक्रगुजार हैं कि यहाँ से उन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन का निर्यात किया जा रहा है, यह सारे देश इस वक़्त क्या कर रहे होते यदि उस वक़्त ख्वाजा हमीद और उनकी पत्नी को हिटलर के गेस्टपो ने पकड़ कर किसी यातना शिविर में भेज दिया होता!
और कहीं ज़्यादा तल्खी के साथ इस देश के उन सारे कट्टरपंथियों से यह सवाल पूछने का मन है जिन्होंने मुसलमान समुदाय की पैशाचिक छवि बना कर बीमारी पर सांप्रदायिक रंग चढ़ा दिया है। ऐसे बहुत सारे लोग जिन्हें कभी मलेरिया हुआ होगा और उन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन के डोज़ दिये गए होंगे, जिससे उनके शरीर में कुछ ऐसी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई है कि वे कोविड-19 का प्रतिरोध करने में सक्षम हैं। इन्हीं में से कई लोगों को संक्रमण का शिकार होने पर इस कंपनी की बनाई दवा से उपचार कराना होगा। वे जानते भी न होंगे कि एक मुसलमान द्वारा स्थापित कंपनी की बनाई जाने कौन-कौन सी जनरिक दवाओं ने उनके रक्तचाप को नियंत्रित रखा होगा, और कितने मधुमेह के उपचार के लिए हमीद के कर्जदार होंगे!
बहुत ब्यौरों में जाने के बजाय मैं इसे काव्यात्मक न्याय कहना चाहुंगी। भारत में ही नहीं दुनिया में शायद ऐसी कोई कंपनी नहीं है जिसने सिपला की तरह स्वास्थ्य सेवाओं को गरीब की पहुँच में लाने की दिशा में काम किया होगा। इतना ही नहीं यह अपने अनुसंधान को दूसरी कंपनियों के साथ साझा करने में भी कंजूसी नहीं करती। सिपला देश में दूसरी फार्मास्युटिकल कंपनियों को सामाग्री और प्रक्रियाएँ भी उपलब्ध कराती है, ताकि वे अपने स्तर पर दवाओं का उत्पादन कर सकें।
देश के विभाजन के समय मुहम्मद आली जिन्ना उन्हीं सामाजिक समूहों में उठते-बैठते थे, जिनमें ख्वाजा हमीद का आना-जाना था और उन्होंने हमीद से भी पाकिस्तान चलने का अनुरोध किया था। लेकिन हमीद जानते थे कि उनकी पक्षधरता गांधी के साथ थी और उन्होंने भारत में ही रहना तय किया।
देश में मुसलमान हैं और ऐसे मुसलमान भी हैं जो निज़ामुद्दीन में तबलीगी जमात के सम्मेलन में गए थे। इसी तरह देश में हिन्दू हैं और ऐसे हिन्दू भी हैं जो अपनी असहमतियों या कट्टरपंथ के चलते दूसरे हिंदुओं की जान ले लेते हैं।
(ऐसा नहीं है देश में महामारी की आशंका के चलते और देशभर में बाकी सभी ने अपने धार्मिक कार्यक्रम रद्द कर दिये हों और ऐसा भी नहीं है और तबलीगी जमात को भी ऐसा ही सम्मेलन आयोजित करने की इजाज़त सब जगह मिल गई हो, मुंबई में नहीं दी गई थी।)
जैसे कुछ जाहिल हिंदुओं के कारण सब हिंदुओं को निशाने पर नहीं लिया जाता उसी तरह मुट्ठी भर तबलीगी जमात के लोग पूरे मुसलमान समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
हमें चंद मूर्खों की खता के एवज में पूरे समुदाय को बदनाम करना बंद करना होगा।
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