नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
नाम : गोलेन्द्र पटेल
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बाढ़ और श्रीप्रकाश शुक्ल पर केंद्रित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की चार कविताएँ :
1).
भँवर में भगवान//
इश्क में इनसान
भँवर में भगवान
डूब रहे हैं
डूब रहे हैं
दुःख में देश
बुरे समय में संदेश
डूब रही हैं
पीड़ा में पहचान
आँसुओं में आन
आह! डूब रही है
बाढ़ में बस्ती
मँझधार में मस्ती
डूब रही हैं
तकलीफ़ में तान
बारिश में शान
डूब रही हैं
जिंदगी-बंदगी
दुनिया-जहान
डूब रहे हैं
घर के रोशनदान
और साज़-सामान
डूब रहे हैं
गंगा में गान
पउड़ते पिता के कान
जिसमें एक नन्ही बच्ची
अपने पिता से कह रही है
मुझे छोड़ दीजिए
और खुद को बचाइए
लेकिन कोई पिता
भला पुत्री को कैसे छोड़ सकता है
डूबने के लिए
और पिता उसे लेकर साथ पउड़ पड़ते हैं
बीच नदी में!
ठीक इसी समय मुझे याद आतें हैं अपने गुरु के वे कथन
जो उन्होंने घाट पर कहे थे
इस पिता के संदर्भ में-
संघर्ष के शब्दों से बनी हुई कविता
बढ़ियाई सरिता में
डूबते हुए मनुष्य को
धारा के विपरीत तैरने के लिए ताकत देगी
और उम्मीद की उमंगें
उसे तरंगों से अधिक बल देंगी
जिससे वह जल को पीछे ठेलता हुआ
किनारे की ओर आगे बढ़ेगा
और जान बचाने की संभावना बढ़ जायेगी ।
इस डूबते पिता के पास थकान की थाप है
जो पानी पर थप-थप पड़ रही है
जिसके सहारे मौत से लड़ते लड़ते
दोनों ही किनारे पर आ गये!
रचना : 20/08/2021
2).
मँझधार में माँ//
सावन में सत्ता के सेतु पर सेल्फी खींचने वाले
बहुत हैं
बाढ़ में डूबी बस्तियों को देखने वाले
बहुत हैं
घड़ियाली आँसू बहाने वाले
बहुत हैं
और हां
कविता लिखने वाले भी बहुत हैं !
लेकिन परपीड़ा को प्रत्येक पंक्ति में
दर्ज करने वाले कौन हैं
यह हम सब जानते हैं
पानी का एक इतिहास यह भी है
कि मनुष्यता का मरना
लाशों की गणना करना
उम्मीदों को अग्नि देना
और सुख को छीन लेना
यानी हर आन्दोलन का जड़ है पानी
मँझधार में माँ कह रही है
कि कुएँ का जल जहर है
तो अमृत भी है
नदियाँ प्रश्न हैं
तो उत्तर भी!
बाढ़ की विभीषिका
मृत्यु का खेल खेलती है
लहरें आ रही हैं पास
सावधान! गड़बहना!
मुझे कसकर पकड़े रहना
माँ! मुझे जोर से भूख लगी है
एक शिशु चिचोड़ रहा है चूचुक
एक को लगी है प्यास
पीड़ा की पतवार
केले की बेड़ी को खे रही है
किनारे की ओर
बेचारी लाचारी वक्त की मारी विधवा नारी
फँसी है भय के भँवर में
अपने बच्चों के साथ
हाथ में लिए लम्बा बाँस
मैं उसके दुःख को लिख नहीं पाऊँगा
आह! मेरा आँसू टपक रहा है
मैं एक गोताखोर की तरह
गम की गंगा में डुबकी लगा रहा हूँ
जहाँ मुझे अपने गुरु से प्राप्त हो रही है
श्वास रोकने की शक्ति
और वह रेत की आकृति भी
जिसे उन्होंने गढ़ा है मेरे लिए
केवल कवि की कविता का ही नहीं
बल्कि इस वक्त रेत की माँ का कल-कल कराह भी
शामिल है इस माँ के दुःख में
इन बिलखते बच्चों के रुदन में!
रचना : 19/08/2021
3).
छत पर चिता //
इच्छाओं की इमारतें भहरा रही हैं
गम के गड्ढे में
इनसानियत देख रही है
तालिबान की आँखों में बढ़ियाई हुई है नदी
व्यवस्थाएं ख़ुश हैं
अपने अपने मत पर
ढेर सारी आत्मा डूब चुकी हैं रक्त में
बची हुई डूब रही हैं
आँसुओं में
आह! श्मशान घाट पर नहीं
न ही सड़क पर
लाशें जल रही हैं छत पर!
मेरे गुरु की गली में कीचड़ है
कमल उगेगा या नहीं
पर काशी में जिसका चिह्न है
वह साला लीचड़ है
लोकतंत्र के लाल रंग में रंगा हुआ लंपट है
उसके द्वारा भाषणों में फेंका गया
आश्वासन का शब्द
दुःख के दरवाजे की चौखट है!
मेरी कविताएँ यात्रा कर रही हैं
शहर से गाँव की ओर
गड़ही में खिली है कुमुदिनी
और खिले हैं चहुंओर अनेक प्रकार के फूल
मुरेड़ पर बैठी हुई चिड़िया
सुना रही है अपना हालचाल
इस गोधूलि वेला में
धुएँ के साथ धूल
बारिश के विरुद्ध
जा रही है वहाँ
जहाँ उसे जाना है
खैर जैसे जंगल का शहंशाह
जब हथनी के बच्चे का करता है शिकार
तब वह चिंघाड़ती है
पूरी ताकत के साथ
ठीक वैसे ही
चिता के पास चिंघाड़ रही हैं इस समय हिलोरें!
रचना : 18/08/2021
4).
बाढ़ में बेचारा//
आने और जाने के बीच है
खतरनाक क्रिया का क्रंदन
कवि, कोविद और किसान के नयन में
बढ़ियाई नदी का नहीं हुआ अभिनंदन
देख रही है कविता
और देख रही है
कि सीढ़ियों पर से जा रहा है सावन
जहां वसंत की प्रतिक्षा में बैठे हैं श्रीप्रकाश शुक्ल
संवेदना की सरिता में आई बाढ़
एक न एक दिन लौट जाती है
पर आँसुओं की बाढ़ डटी रहती है
ज्यों का त्यों दिल के दरवाजे पर
दिमाग का दीया जला रहा है दृश्य
मनुष्यता की मणि चमक रही है चहुंओर
जिसकी किरणें तैर रही हैं नदी में
जहां स्नेह के गेह में फैल रहा है उजास
हवा के विरुद्ध
उम्मीद की उमंग खे रही है नाव
घाव ताजा कर लौट चली है धार
अपने गंतव्य पथ पर
पर आह!घाट 'बेचारा' पर दोहरा घात
जहां गुरु के सजल नयन में देख रहा हूँ
कि इस बार भी
आश्वासन की कटिया में चारा गूँथकर
उसे मारा जाएगा
बेमौत मछली की तरह
घर पर नहीं
इसी घाट पर
क्योंकि घर जो है उसका
वह तो ढह गया है!
रचना : 17/08/2021
{संपादक : गोलेन्द्र पटेल}नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
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ईमेल : corojivi@gmail.com
बाढ़ और श्रीप्रकाश शुक्ल पर केंद्रित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की चार कविताएँ :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
1.
रेत डूब
वरुणा और असि के द्वाब में बसी काशी
अब हो चुकी है बासी
इन्हें सरकारी कागजों में घोषित कर दिया गया है नाला
धर्म की नगरी को नगरपालिका की गायों की तरह दुह रहा है साला
बच्चे माँ की कोख में ठूँस रहे हैं पत्थर
लोग अवैध कब्जा किये जा रहे हैं नदियों का किनारा
और दहाड़ मारकर रो रही है
कबीर का लहरतारा
बुद्ध और रैदास सुन रहे हैं रुदन का स्वर
तुलसी घाट पर 'राग नया अनुराग नया'सुन रही है गंगा
अपने शब्दसाधक पुत्र श्रीप्रकाश शुक्ल से
मैं त्रिनेत्र की आँखों में देख रहा हूँ
उत्तर और दक्खिन का दुख
और सोच रहा हूँ
कि जैसे बाढ़ में डूब जाता है खेत
ठीक वैसे ही
अपने आँसू में
डूब गयी है रेत
{फोटो साभार : गुरुवर डॉ. विजयनाथ मिश्र}हालात के मारे लोगों को
लहरें लात मार रही हैं
और टूट रहा है लोक का लय
जहां मेरे गुरु गढ़ रहे हैं पक्का महाल में मानस का मंदिर
जिसमें उस देवता की मूर्ति बसी है
जो कभी मरा है बेघर होकर
रो.. रो.. कर!
रचना : 12/08/2021
2
कभी- कभी दुख का चेहरा धरे आ जाता है उजास
घोंसलों में मौन पक्षी, चुप खड़े बबूल
चारों तरफ गंगधार, डूबा घर दुआर
ट्रैक्टर पर बैठ निज घर को निहार रहा वो कवि
जो तूफ़ानों से लड़ता रहा, लहरों से भी
अडिग, अविचलित श्रीप्रकाश शुक्ल
समय की आहट मिल रही नदी के कल कल में
आयी है शिव की सलाह मान कवि के घर
अनुग्रह जताने, उसका जो किया उसने
जब उजाड़ा जा रहा था तटग्राम धू-धू
अंधेरे के आक्रमण के विरुद्ध जो डटा रहा
वह गुरु मेरे, डूबते गांवों, घरों की पीड़ा
पर चिंतित, कुछ ऊंचाई से मुस्करा रहे
जान रहे वे, कि क्यों आयी है गंगा माई द्वार पास
कभी- कभी दुख का चेहरा धरे आ जाता है उजास
रचना : 11/08/2021
साभार : जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ (सं. डॉ. सुभाष राय)3.
मल्लू मल्लाह
(अपने काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल को समर्पित)
मेरे समय के शब्द हैं मेरे गुरु
यह मैं नहीं
उनकी कविताएँ कह रही हैं
उस मल्लू मल्लाह से
जिसकी नाव खड़ी है किनारे
और कुछ इधर-उधर औंधी पड़ी हैं
उसकी मँड़ई में लालटेन भभक रही है
भूख के भूगोल में जन्म ले रहा है भय
भकुआई भँवरी आ गयी है पास
हिलोरों से हताश हो रही है
तटीय जिंदगी
नगर पालिका के कूड़े की मानिंद
बिखर गई है गंदगी
मणिकर्णिका पर धुआँ ही धुआँ है
घाटों पर पसर गया है दुख
आह! शिव!
सावन में टूट जाता है विश्वास!
गंगा की गोद में हँसने वाले बच्चे रोने लगते हैं
बिलखते बिलखते भूखे पेट सोने लगते हैं
उसके जैसे अनेक लोगों का चूल्हा
विस्थापित हो रहा है
कोई कह रहा है कि
बाढ़ में बोझ है अपना आँसू
इसे छोड़ दो नदी में
मेरे गुरु वही आँसू
कविता की कटोरी में इकट्ठा कर रहे हैं
जिसमें इनसानियत की इंक घोलकर
कभी लिखा जाएगा काशी का इतिहास।
रचना : 13/08/2021
4.
उस पार
सब्र का बाँध टूटते ही ध्वस्त होता है नदी का धैर्य
जन जन के जिगर में गूँजता है गर्जन तर्जन
हवा हँस हँस कहती है कि
हरियाने का हुनर दिखा रही हैं हिलोरें
सीख लो सरोवर
बाढ़ में सागर से संस्कार
तरंगें होती हैं जिसकी ताकतवर
उसे नहीं होता है किसी भी प्रकार का कोई अहंकार
चेतना की चट्टान जब सह नहीं पा रही है पानी का प्रहार
शब्दसाधक श्रीप्रकाश शुक्ल समय के श्यामपट पर समझा रहे हैं
कि निराशा की नदी में जो खे रहे हैं पतवार
लोगों की पीड़ा उन्हें धक्का देकर पहुँचा रही है उस पार!
रचना : 12/08/2021
{संपादक : गोलेन्द्र पटेल}नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
बाढ़ पर केंद्रित तीन कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल
【घर के सामने का दृश्य है। गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल ट्रेक्टर के इंजन पर बैठकर अपने घर को देख रहे हैं।】1).
बाढ़//
इसमें कोई संदेह नहीं
कि बाढ़ नदी को स्वच्छ करती है
धरती को उर्वर बनाती है
पर उससे पहले वह उम्मीद की उपज नष्ट करती है
सारे सपने डूबो देती है
सुख का स्वाद छीन लेती है
तब एक किसान के गले में पड़ी हुई रस्सी
बोलती है
साहब! फसल नहीं, सपने डूबे हैं
इस पीड़ा से एक दो तीन नहीं, अनेक ऊबे हैं
दुनिया का दुख दरवाजे पर देता है दस्तक
चूड़ियाँ फूटती हैं
ढही दीवारें चीखती हैं
चिहुँकती चिड़ियाँ पूछती हैं
बाँध क्यों टूटा, पानी क्यों छूटा
उसके खेत में ?
शून्य में सफेद संवेदना सफ़र करती है
गाँव से दिल्ली शहर की ओर
पर सांत्वना के नाम पर उसके गले में
एक रस्सी है
और वह गा रही है गमी का गीत-
शोक का सोहर
गाँव दर गाँव, शहर दर शहर!!
2).
गंगा में गुरु//
बाँध खुलने पर नदी लाँघती है लक्ष्मण रेखा
और पगहा टूटने पर पशु
पर पथ का नियम तोड़ने पर टूटता है पैर ही!
खैर, गंगा में फँसे हैं मेरे गुरु
जैसे सब फँसे हैं गंगा के मानस पुत्र
वे भी फंसे हैं ठीक वैसे
फंसना बस नियति ही जैसे!
नदी भूल गई है अपना पथ , अपना घर
वह अपने किनारे का कपाट खटखटा रही है
और कह रही है थोड़ी देर विश्राम करने के लिए
मैं आई हूँ आपके घर
आपके गाँव-शहर
जो कि कभी मेरा था!
दुख के दरवाजे से झाँककर
लोग स्वागत कर रहे हैं नदी का
नदी हमारी माँ है
जो सुना रही है अपनी व्यथा-कथा
काशी के एक कवि को
जी हां,श्रीप्रकाश शुक्ल को
जहां एक वाक्य पूरा होने से पहले ही
दूसरा आँसू टपक रहा है गंगधार
जिसमें शामिल हैं तमाम लोगों के दुःख
और सिसकी भी!
3).
बाढ़ में बत्ती//
पक्षीगण अपने घोंसले में मौन हैं
सुख-दुख के साथी खड़े हैं बबूल
चारों तरफ है गंगधार
डूबा है घर दुआर
ट्रैक्टर के इंजन पर बैठकर
अपने घर को निहार रहे हैं श्रीप्रकाश शुक्ल
जो तरह-तरह के तूफ़ानों और लहरों से लड़े हैं
लड़ना ही उनके लोक का आलोक है
जहां गहरे डूबा है शोक
जो श्लोक बन उतरा रहा है
समय का स्वर भी आहत है
आहट जिसकी मिल रही है
नदी के कल कल स्वर में!
गंगा के गान में गुरु का गम
हम महसूस कर रहे हैं
संवेग का सूर्य ढल रहा है
भीतर दुख का दीया जल रहा है
और आँसुओं की चमक फैल रही है
अंधेरे के विरुद्ध
कभी कभी यही चमक चीख की चिंगारी से
उत्पन्न होकर चली जाती है
देश की देह में हुई फुड़िया को चीरने
खबरें आ रही हैं कि वह गाँव डूब गया है
वह डूबने वाला है
वहाँ इतने मर गये हैं, वहाँ इतने घर ढह गये हैं
वह बाँध टूटने वाला है
बचाव कर्मी लुटने वाला है
सुबह सुबह कोइलिया भी कूकी है
ऐसा संभव ही नहीं है कि बाढ़ में बत्ती ही न बुझे कहीं
फिर भी लोग हैं कि मुस्कुराते हुए पकड़ रहे हैं मछली
जहां मेरे कोरोजीवी गुरु
बत्ती में भी आकाश भर चमक दिए जा रहे हैं!
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#तिमिर में जैसे ज्योति #golendrapatel
नवोदित कवि अखिल सिंह की छह कविताएँ :-
1)
सदियों से है यही कह रहा हिमगिरि का उत्तुंग शिखर,
देश और मानव हित को,रहो हमेशा तुम तत्पर।
किस हेतु गर्भगृह से अपने नदियों को जना हिमालय ने,
किस हेतु चतुर्दिश से सोचो उत्तर ही चुना हिमालय ने।
तुम उद्गम स्थल पर देखो,तनूजा शोर मचाती है,
जैसे-जैसे जल बढ़ता है वह स्वयं धीर हो जाती है।
हे मानव तुच्छ सफलता पर फिर क्यों तूने हुंकार किया?
होकर मदान्ध फिर क्यों तूने आपस में खड़ी दीवार किया?
शिखरों पर जल का अंश लिए था खड़ा हिमालय सदियों से,
नगपति को किस तरह उदधि से मिला दिया नदियों ने।
कैसे शब्दों की परिधि में प्रकृति का सार लिखा जाए,
आपस से बैर मिटाओ अब थोड़ा सा प्यार लिखा जाए ।।
2).
बिकने लगी मानवता ईमान बिक रहा है,
कैसा अजब समय है इंसान बिक रहा है।
सोने-चाँदी के बिस्तर सोने को लग रहे हैं,
बच्चा सड़क पे मुफ़लिस नादान बिक रहा है।
दौलत अमीरों के तो जूते सजा रही है,
दौलत की ख़ातिर ही तो सम्मान बिक रहा है।
दो वक्त की रोटी, भी है नहीं मयस्सर,
बेटी के ब्याहने को,मकान बिक रहा है।
मानव तेरी धरा पर क्यों न हो अँधेरा,
हाथों तिमिर के ही जब अंशुमान बिक रहा है ।।
3).
तालाब में,
मछुआरे ने दाने फेंके....
जठराग्नि से पीड़ित,
प्रज्ञास्वमिनी,
बेचारी मछलियाँ!!
पुनः फँसी ।
यही सियासत है ....
4).
हे राम अयोध्या नगरी में इक बार पुनः तुम वास करो,
इक बार पिता के कहने पर फिर चौदह वर्ष वनवास करो,
आर्यावर्त में पुत्र आज वनवास पिता को देते हैं,
इक बार पुनः पित्रज्ञा हेतु साम्राज्य छोड़ जाना होगा ।
हे त्रेता के वीर तुम्हे कलयुग में भी आना होगा ।।
भाई के लिए आज भाई विषधर भुजंग बन बैठा है,
मानव की करतूत देख सर्पों का भी मन बैठा है,
बेकार गया सब त्याग तुम्हारा राम अनुज ये सुन लो तुम,
इक बार पुनः आकर तुमको पर्णकुटी अपनाना होगा ।
हे त्रेता के वीर तुम्हे कलयुग में भी आना होगा।।
हे निशिचर देव हिन्द भू पर इक बार पुनःआ जाओ तुम,
बिन तपसी वेश बनाये ही मां सीता को ले जाओ तुम,
थोथे प्रेम की सत्ता को समूल मिटाने की खातिर,
हे जनकदुलारी पुनः तुम्हे लंकानगरी जाना होगा ।
युग-युग के आदर्श तुम्हे इक बार पुनः आना होगा।।
भारत भूमि पर नर पिशाच हर तरफ दिखाई देते हैं,
निर्धन,निर्बल और अबला के चीत्कार सुनाई देते हैं,
इस अधोगति से इस भू की रक्षा करने को रामलला,
लखनलाल के साथ-साथ सारंग धनुष लाना होगा।
हे त्रेता के वीर तुम्हे कलयुग में भी आना होगा।
युग-युग के आदर्श तुम्हे इक बार पुनः आना होगा ।।।
5).
मरता है अन्नदाता कैसी अजब खबर है,
देखो निठल्ला देश ये फिर भी बेखबर है।
हर रोज बीच रस्ते करते रहे तमाशा,
कानों पे जूँ न रेंगी चीखें भी बेअसर हैं।
महबूब का दामन ही सबको रास आया,
छाती फुला के खुद को कहते ये सुख़नवर हैं।
तेरी कृति का कैसा ये रंग है विधाता,
मंजिल कहाँ है इसकी?कैसी ये रहगुज़र है?
अमृत भरे जलाशय से देश जल रहा है,
संसद भी बेखबर है,सरकार बेखबर है।।
6).
मयख़ाने में डूबा शहर हमको नहीं मिला,
जाने क्यूँ वो चाहकर हमको नहीं मिला।
चर्चे हैं मुस्करा के सबके ज़ख्म भर दिए,
ऐसा कोई चारागर हमको नहीं मिला।
आंखों में मुकम्मल दरिया मिला हमें,
लेकिन क्यों पारावर हमको नहीं मिला।
हर राह जिसकी जाती हो मैक़दे तक,
ऐसा कोई सफर हमको नहीं मिला।
खुशकिस्मती वे नजरों से पिलाते हैं आज भी,
अफसोस कि ये हुनर हमको नहीं मिला।।
संपर्क सूत्र :-
नाम-अखिल सिंह
छात्र - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
पता - ग्राम-इमली महुआ,पो-रामापुर, जिला-आज़मगढ़,पिन-223225
पिता का नाम-मनोज कुमार सिंह
माता का नाम-रीता सिंह
मो. 8052657645
(वर्तमान पता-प्लॉट no 86(ओंकारनाथ मिश्र),गंगा प्रदूषण रोड (निकट-हेरिटेज हाउसिंग)भगवानपुर लंका वाराणसी ..
Pin-221005)
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बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास हमें खड़ा होने ...