Tuesday, 7 September 2021

युवा किसान कवि गोलेन्द्र पटेल की सोलह कविताएँ

 युवा किसान कवि गोलेन्द्र पटेल की सोलह कविताएँ :-

                                 {साखी-33 का लोकार्पण}

1).

👁️आँख👁️
••••••••••••••

1.
सिर्फ और सिर्फ देखने के लिए नहीं होती है आँख
फिर भी देखो तो ऐसे जैसे देखता है कोई रचनाकार
2.
दृष्टि होती है तो उसकी अपनी दुनिया भी होती है
जब भी दिखते हैं तारे दिन में, वह गुनगुनाती है आशा-गीत
3.
दोपहरी में रेगिस्तानी राहों पर दौड़ती हैं प्यासी नजरें
पुरवाई पछुआ से पूछती है, ऐसा क्यों?
4.
धूल-धक्कड़ के बवंडर में बचानी है आँख
वक्त पर धूपिया चश्मा लेना अच्छा होगा
यही कहेगी हर अनुभव भरी, पकी उम्र
5.
आम आँखों की तरह नहीं होती है दिल्ली की आँख
वह बिल्ली की तरह होती है हर आँख का रास्ता काटती
6.
अलग-अलग आँखों के लिए अलग-अलग
परिभाषाएँ हैं देखने की क्रिया की
कभी आँखें नीचे होती हैं, कभी ऊपर
कभी सफेद होती हैं तो कभी लाल !


2).

लकड़हारिन
(बचपन से बुढ़ापे तक बाँस)

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तवा तटस्थ है चूल्हा उदास
पटरियों पर बिखर गया है भात
कूड़ादान में रोती है रोटी
भूख नोचती है आँत
पेट ताक रहा है गैर का पैर

खैर जनतंत्र के जंगल में
एक लड़की बिन रही है लकड़ी
जहाँ अक्सर भूखे होते हैं
हिंसक और खूँखार जानवर
यहाँ तक कि राष्ट्रीय पशु बाघ भी
 
हवा तेज चलती है
पत्तियाँ गिरती हैं नीचे
जिसमें छुपे होते हैं साँप बिच्छू गोजर
जरा सी खड़खड़ाहट से काँप जाती है रूह
हाथ से जब जब उठाती है वह लड़की लकड़ी
मैं डर जाता हूँ...!

3).

मुसहरिन माँ
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धूप में सूप से
धूल फटकारती मुसहरिन माँ को देखते
महसूस किया है भूख की भयानक पीड़ा
और सूँघा मूसकइल मिट्टी में गेहूँ की गंध
जिसमें जिंदगी का स्वाद है

चूहा बड़ी मशक्कत से चुराया है
(जिसे चुराने के चक्कर में अनेक चूहों को खाना पड़ा जहर)
अपने और अपनों के लिए

आह! न उसका गेह रहा न गेहूँ
अब उसके भूख का क्या होगा?
उस माँ का आँसू पूछ रहा है स्वात्मा से
यह मैंने क्या किया?

मैं कितना निष्ठुर हूँ
दूसरे के भूखे बच्चों का अन्न खा रही हूँ
और खिला रही हूँ अपने चारों बच्चियों को

सर पर सूर्य खड़ा है
सामने कंकाल पड़ा है
उन चूहों का
जो विष युक्त स्वाद चखे हैं
बिल के बाहर
अपने बच्चों से पहले

आज मेरी बारी है साहब!

4).

चिहुँकती चिट्ठी
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बर्फ़ का कोहरिया साड़ी
ठंड का देह ढंक
लहरा रही है लहरों-सी
स्मृतियों के डार पर

हिमालय की हवा
नदी में चलती नाव का घाव
सहलाती हुई
होंठ चूमती है चुपचाप
क्षितिज
वासना के वैश्विक वृक्ष पर
वसंत का वस्त्र
हटाता हुआ देखता है
बात बात में
चेतन से निकलती है
चेतना की भाप
पत्तियाँ गिरती हैं नीचे
रूह काँपने लगती है

खड़खड़ाहट खत रचती है
सूर्योदयी सरसराहट के नाम
समुद्री तट पर

एक सफेद चिड़िया उड़ान भरी है
संसद की ओर
गिद्ध-चील ऊपर ही
छिनना चाहते हैं
खून का खत

मंत्री बाज का कहना है
गरुड़ का आदेश आकाश में
विष्णु का आदेश है

आकाशीय प्रजा सह रही है
शिकारी पक्षियों का अत्याचार
चिड़िया का गला काट दिया राजा
रक्त के छींटे गिर रहे हैं
रेगिस्तानी धरा पर
अन्य खुश हैं
विष्णु के आदेश सुन कर

मौसम कोई भी हो
कमजोर....
सदैव कराहते हैं
कर्ज के चोट से

इससे मुक्ति का एक ही उपाय है
अपने एक वोट से
बदल दो लोकतंत्र का राजा
शिक्षित शिक्षा से
शर्मनाक व्यवस्था

पर वास्तव में
आकाशीय सत्ता तानाशाही सत्ता है
इसमें वोट और नोट का संबंध धरती-सा नहीं है
चिट्ठी चिहुँक रही है
चहचहाहट के स्वर में सुबह सुबह
मैं क्या करूँ?

5).

सब ठीक होगा
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धैर्य अस्वस्थ है
रिश्तों की रस्सी से बाँधी जा रही है राय
दुविधा दूर हुई
कठिन काल में कवि का कथन कृपा है
सब ठीक होगा
अशेष शुभकामनाएं

प्रेम ,स्नेह व सहानुभूति सक्रिय हैं
जीवन की पाठशाला में
बुरे दिन व्यर्थ नहीं हुए
कोठरी में कैद कोविद ने दिया
अंधेरे में गाने के लिए रौशनी का गीत

आँधी-तूफ़ान का मौसम है
खुले में दीपक का बुझना तय है
अक्सर ऐसे ही समय में संसदीय सड़क पर
शब्दों के छाते उलट जाते हैं
और छड़ी फिसल जाती है

अचानक आदमी गिर जाता है

वह देखता है जब आँखें खोल कर
तब किले की ओर
बीमारी की बिजली चमक रही होती है
और आश्वासन के आवाज़ कान में सुनाई देती है

गिरा हुआ आदमी खुद खड़ा होता है
और अपनी पूरी ताकत के साथ
शेष सफर के लिए निकल पड़ता है।

6).

ऊख
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(१)
प्रजा को
प्रजातंत्र की मशीन में पेरने से
रस नहीं रक्त निकलता है साहब

रस तो
हड्डियों को तोड़ने
नसों को निचोड़ने से
प्राप्त होता है
(२)
बार बार कई बार
बंजर को जोतने-कोड़ने से
ज़मीन हो जाती है उर्वर

मिट्टी में धँसी जड़ें
श्रम की गंध सोखती हैं
खेत में
उम्मीदें उपजाती हैं ऊख
(३)
कोल्हू के बैल होते हैं जब कर्षित किसान
तब खाँड़ खाती है दुनिया
और आपके दोनों हाथों में होता है गुड़!

7).

ईर्ष्या की खेती
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मिट्टी के मिठास को सोख
जिद के ज़मीन पर
उगी है
इच्छाओं के ईख

खेत में
चुपचाप चेफा छिल रही है
चरित्र
और चुह रही है
ईर्ष्या

छिलके पर  
मक्खियाँ भिनभिना रही हैं
और द्वेष देख रहा है
मचान से दूर
बहुत दूर
चरती हुई निंदा की नीलगाय !

8).

किसान है क्रोध
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निंदा की नज़र
तेज है
इच्छा के विरुद्ध भिनभिना रही हैं
बाज़ार की मक्खियाँ

अभिमान की आवाज़ है

एक दिन स्पर्द्धा के साथ
चरित्र चखती है
इमली और इमरती का स्वाद
द्वेष के दुकान पर

और घृणा के घड़े से पीती है पानी

गर्व के गिलास में
ईर्ष्या अपने
इब्न के लिए लेकर खड़ी है
राजनीति का रस

प्रतिद्वन्द्विता के पथ पर

कुढ़न की खेती का
किसान है क्रोध !

9).

गुढ़ी
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लौनी गेहूँ का हो या धान का
बोझा बाँधने के लिए - गुढ़ी
बूढ़ी ही पुरवाती है
बहू बाँकी से ऐंठती है पुवाल
और पीड़ा उसकी कलाई !


10).

थ्रेसर
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थ्रेसर में कटा मजदूर का दायाँ हाथ
देखकर
ट्रैक्टर का मालिक मौन है
और अन्यात्मा दुखी
उसके साथियों की संवेदना समझा रही है
किसान को
कि रक्त तो भूसा सोख गया है
किंतु गेहूँ में हड्डियों के बुरादे और माँस के लोथड़े
साफ दिखाई दे रहे हैं

कराहता हुआ मन कुछ कहे
तो बुरा मत मानना
बातों के बोझ से दबा दिमाग
बोलता है / और बोल रहा है
न तर्क , न तत्थ
सिर्फ भावना है
दो के संवादों के बीच का सेतु
सत्य के सागर में
नौकाविहार करना कठिन है
किंतु हम कर रहे हैं
थ्रेसर पर पुनः चढ़ कर -

बुजुर्ग कहते हैं
कि दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है
तो फिर कुछ लोग रोटी से खेलते क्यों हैं
क्या उनके नाम भी रोटी पर लिखे होते हैं
जो हलक में उतरने से पहले ही छिन लेते हैं
खेलने के लिए

बताओ न दिल्ली के दादा
गेहूँ की कटाई कब दोगे?

11).
श्रम का स्वाद
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गाँव से शहर के गोदाम में गेहूँ? 

गरीबों के पक्ष में बोलने वाला गेहूँ
एक दिन गोदाम से कहा
ऐसा क्यों होता है
कि अक्सर अकेले में अनाज
सम्पन्न से पूछता है
जो तुम खा रहे हो
क्या तुम्हें पता है
कि वह किस जमीन की उपज है
उसमें किसके श्रम का स्वाद है
इतनी ख़ुशबू कहाँ से आई?
तुम हो कि
ठूँसे जा रहे हो रोटी
निःशब्द!

12).

उम्मीद की उपज
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उठो वत्स!
भोर से ही
जिंदगी का बोझ ढोना
किसान होने की पहली शर्त है
धान उगा
प्राण उगा
मुस्कान उगी
पहचान उगी
और उग रही
उम्मीद की किरण
सुबह सुबह
हमारे छोटे हो रहे

खेत से....!

13).

घिरनी
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फोन पर शहर की काकी ने कहा है
कल से कल में पानी नहीं आ रहा है उनके यहाँ

अम्माँ! आँखों का पानी सूख गया है
भरकुंडी में है कीचड़
खाली बाल्टी रो रही है
जगत पर असहाय पड़ी डोरी क्या करे?

आह! जनता की तरह मौन है घिरनी
और तुम हँस रही हो।

14).

मेरे मुल्क की मीडिया
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बिच्छू के बिल में
नेवला और सर्प की सलाह पर
चूहों के केस की सुनवाई कर रहे हैं-
गोहटा!

गिरगिट और गोजर सभा के सम्मानित सदस्य हैं
काने कुत्ते अंगरक्षक हैं
बहरी बिल्लियाँ बिल के बाहर बंदूक लेकर खड़ी हैं

टिड्डे पिला रहे हैं चाय-पानी

गुप्तचर कौएं कुछ कह रहे हैं
साँड़ समर्थन में सिर हिला रहे हैं
नीलगाय नृत्य कर रही हैं

छिपकलियाँ सुन रही हैं संवाद-
सेनापति सर्प की
मंत्री नेवला की
राजा गोहटा की....

अंत में केंचुआ किसान को देता है श्रधांजलि
खेत में

और मुर्गा मौन हो जाता है
जिसे प्रजातंत्र कहता है मेरा प्यारा पुत्र
मेरे मुल्क की मीडिया!

15).

सफ़र


सरसराहट संसद तक बिन विश्राम सफ़र करेगी
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तिर्रियाँ पकड़ रही हैं
गाँव की कच्ची उम्र
तितलियों के पीछे दौड़ रही है
पकड़ने की इच्छा
अबोध बच्चियों का!

बच्चें काँचे खेल रहे हैं
सामने वृद्ध नीम के डाल पर बैठी है
मायूसी और मौन  

मादा नीलकंठ बहुत दिन बाद दिखी है
दो रोज़ पहले मैना दिखी थी इसी डाल पर उदास
और इसी डाल पर अक्सर बैठती हैं चुप्पी चिड़ियाँ!

कोयल कूक रही है
शांत पत्तियाँ सुन रही हैं
सुबह का सरसराहट व शाम का चहचहाहट चीख हैं
क्रमशः हवा और पाखी का

चहचहाहट चार कोस तक जाएगी
फिर टकराएगी चट्टानों और पर्वतों से
फिर जाएगी ; चौराहों पर कुछ क्षण रुक
चलती चली जाएगी सड़क धर
सरसराहट संसद तक बिन विश्राम किए!

16).

कोहारिन काकी की कला 
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लटक रहा है
मानस के सिकहर पर
मक्खन से भरा
मथुरा का मार्मिक मटका

इस पर उत्कीर्ण है
कोहारिन काकी की कला।

गंध सूँघ रहा है बन-बिलार
बिल्ली थक कर बैठी है नीचे

मक्खियाँ भिनभिना रही हैं
चूहे चढ़ कर चाट रहे हैं मक्खन

अंततः बन-बिलार फोड़ दिया घर का घड़ा।

पूर्वजों ने ठीक ही कहा है
कला का महत्व मनुष्य जानते हैं
जानवर नहीं।

जानवर तो अपना ही जोतते रहते हैं

काकी ठीक कहती हैं
भूख कला को जन्म देती है।

कुछ भी हो
बन-बिलार बलवान के साथ साथ चतुर भी है
क्योंकि वह मक्खन और चूहे को एकसाथ खा रहा है।

परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) , बी.एच.यू.।
भाषा : हिंदी
विधा : कविता व कहानी
माता : श्रीमती उत्तम देवी
पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :
कविताएँ और आलेख -  प्राची, बहुमत, आजकल, व्यंग्य कथा, साखी, काव्य प्रहर, प्रेरणा अंशु, जनसंदेश टाइम्स, विजय दर्पण टाइम्स, रणभेरी,पदचिह्न, अग्निधर्मा, नेशनल एक्सप्रेस, अमर उजाला, पुरवाई एवं सुवासित आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।

ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-
गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - हिंदी कविता, समकालीन जनमत, लिटरेचर प्वाइंट, साहित्य रचना, समालोचना, द लल्लनटॉप, पुरवाई, साहित्य कुंज, साहित्यिक डॉट कॉम, साहित्यिक, जनता की आवाज़, पोषम पा, अपनी माटी, लोक साक्ष्य, अद्यतन काल क्रम, द साहित्य ग्राम, लोकमंच, राष्ट्र चेतना पत्रिका, डुगडुगी, साहित्य सार, हस्तक्षेप, जनवर्ता, जखिरा, संवेदन स्पर्श (अभिप्राय) , मीडिया स्वराज, जानकी पुल, उम्मीदें, बोलती जिंदगी, गढ़ निनाद एवं हमारा मोर्चा इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित।

प्रसारण : राजस्थानी रेडियो, द लल्लनटॉप एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)
अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्य-गोष्ठियों में।

सम्मान : फिलहाल कोई विशेष सम्मान नहीं, पर अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र मिले हैं।

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

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कवि : गोलेन्द्र पटेल
(काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र)

माता : श्रीमती उत्तम देवी
पिता : श्री नन्दलाल
भाषा : हिंदी
विधा : कविता व कहानी
डाक पता :-
ग्राम - खजूरगाँव 
पोस्ट - साहुपुरी
जिला - चंदौली
राज्य - उत्तर प्रदेश , भारत 221009

संपर्क सूत्र :-
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
 
--Golendra Patel


BHU , Varanasi , Uttar Pradesh , India


नोट : उपर्युक्त सभी रचनाएँ स्वरचित हैं और मेरी हैं!

धन्यवाद!



Sunday, 5 September 2021

शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य - 2 : गोलेन्द्र पटेल (बीएचयू)


 शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य - 2


'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (यानी 'अज्ञान') और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश (यानी 'ज्ञान')। अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म स्वरूप प्रकाश है, वह गुरु है। यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि गुरु का उक्त तात्पर्य उस युग का है जब एक 'गुरु' स्वयं एक 'गुरुकुल' होता था। समय के साथ शिक्षा की खेती करने की अनेक पद्धतियाँ विकसित हुई हैं। परंतु खेत दिन-प्रतिदिन छोटे होते जा रहे हैं और ज्ञान की खेती करने वाले सुकुमार, एकदम सुकुवार। तेजी से मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो रही है। शिक्षक और शिष्य के संबंधों का सुमन मुरझा रहा है। इस मुरझाते हुए सुमन के संदर्भ में मुझे अपने प्रिय कवि ज्ञानेंद्रपति की कविता 'वे जो' की याद आना, यहाँ कोई अनायास नहीं है बल्कि वर्तमान की दशा का दबाव है। इस कड़वी सच्चाई को व्यक्त करनेवाली कवि कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-


"वे जो 'सर' कहाते हैं

धड़ भर हैं

उनकी शोध-छात्राओं से पूछ देखो"


बुद्धि हर व्यक्ति के पास होती है। पर सद्बुद्धि सबके पास नहीं होती है। यह तब तक प्राप्त नहीं होती है जब तक कि व्यक्ति को किसी का मार्गदर्शन प्राप्त न हो जाये। एक बात यह भी है कि गुरु के अनुभव से जब शिष्य के अनुभव का रैखिक मिलन होता है तब उसके सोचने-समझने की दायरा बहुत बढ़ जाता है और उसकी सृजनात्मक शक्ति भी पहले की अपेक्षा काफी बढ़ जाती है। उसकी सचेतनता उसकी रचनात्मकता को परिष्कृत करती रहती है। उसके संस्कार का संसार अपनी सभ्यता और संस्कृति से उर्जा पाकर फैलने लगता है। इसके फैलने से उसके (शिष्य) भीतर की मनुष्यता जागृत होती है। जो उसे मानवीय बनाती है और यही मानवीयता सृष्टि की संवेदना को संजोकर जिंदगी की नदी को स्वच्छ रखती है। जिसमें वैचारिकता की नाव बौद्धधर्मी खेना सीखाते रहते हैं जीवन भर।


किसी भी परिस्थिति में किसी भी तरह की समस्याओं और उलझनों से निपटने के लिए गुरुमंत्र ही वह सार्थक व सर्वोत्तम साधन है। जिसके द्वारा व्यक्ति आसानी से उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। हर गुरु साधारण में असाधारण होता है क्योंकि उनके पास शक्तित्रयी (आत्मशक्ति, स्पर्शशक्ति व वाक्यशक्ति) है और यही शक्तियाँ उन्हें ईश्वर से भी बढ़कर सिद्ध करती हैं। जिसे संत कवियों ने बेखूबी से अपनी रचनाओं में दर्ज किये हैं। इस संदर्भ में कबीरदास का आगामी दोहा तो जगत प्रसिद्ध है ही। "गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,काके लागूं पायं / बलिहारी गुरु आपणे, जिन गोविन्द दिया दिखाय ।।"


बहरहाल, मेरी दृष्टि में मेरे गुरु भी उन्हीं ऋषियों की तरह हैं जो अपने समय के सर्वशक्तिमान शिक्षक रहे हैं। मेरे गुरु भी अपने आप में गुरुकुल हैं और मेरे शिक्षक भी अपने आप में शिक्षालय हैं। एक संस्था हैं। जहाँ शिक्षा और दीक्षा दोनों ही आधुनिकता के रंग में रंगी हुई हैं। कला, साहित्य और संस्कृति का त्रिवेणी संगम हैं। अक्सर मैं इस संगम पर सुनता हूँ उनके मुख से निकला हुआ ब्रह्म स्वरूप शब्द! अतः मेरे गुरु मेरे समय के शब्द हैं।


मैं उनकी प्रशंसा नहीं कर रहा हूँ। न ही उनका मूल्यांकन। और न ही यहाँ कोई अतिशयोक्ति है। न ही मेरे पास कोई चाटुकारिता की भाषा है। मैं तो बस सत्यता की सीमा में अपनी बात रख रहा हूँ। उनकी सक्रियता ही उनकी सदाचारिता और साधुता की पहचान है। वे सतर्क के साँचे में वर्णित अनुभूतियों को मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से उच्च स्तर (भूमि) पर ले जाने का भागीरथ प्रयास तो करते ही हैं। साथ ही साथ शुन्य  की संवेगी कंपनता का साक्षात्कार भी कराते हैं। अतः मैं यह कह सकता हूँ कि मेरे गुरु सहज और उदात्त होने के साथ साथ ज्ञाता और दाता भी हैं।


उनकी क्यारी की फसलें लहलहाती हुई नज़र आ रही हैं। उसमें उगे हुए गेहूँ और गुलाब का संगीतमय संवाद स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है। उनकी आँखों की ज्योति निराशा में आशा का गीत गुनगुनाती हुई सूर्य की किरण की तरह जगत का तमस दूर कर रही है और तब तक करती रहेगी जब तक सृष्टि रहेगी।

 

©गोलेन्द्र पटेल

                                                             {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

शिक्षक का स्वप्न : प्रो. प्रभाकर सिंह {बीएचयू}

 शिक्षक का स्वप्न                  

                           {प्रो. प्रभाकर सिंह , हिन्दी विभाग, बीएचयू}


 "मेरे लिए शिक्षक होने का स्वप्न है जो विद्यार्थियों को साहसी और संवादी बनाए। प्रतिरोध करने से पहले प्रेम करने का गुर सिखाए। किताब में दर्ज जिंदगी की पहचान करने की समझ  तो पैदा करे पर उसके बाहर  प्रकृति, कला, संगीत और ज्ञान की तमाम दुनियावी बातों को महसूस करने और समझने का सहूर पैदा कर सके। किसी बड़े मंजिल में पहुंचने की सीख भले ना दे पर मंजिल में आने वाले रास्ते में फैली जिंदगी को जिंदादिली से जी लेने की अदा विकसित करने में सहयोगी बने। विश्वविद्यालय के क्लासरूम और पुस्तकालय में बिखरे ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता को  विकसित करने के साथ  विश्वविद्यालय के परिसर के स्थापत्य, पेड़, पौधे, चिड़ियों ,दुकानों,  आंदोलनधर्मी कोनों, संवादी अड्डों की पहचान करने  का हुनर दे पाए जिससे विद्यार्थी शिक्षा और  ज्ञान के ईन औजारों से समाज को खूबसूरत और लोकतांत्रिक बनाने  के लिए व्यावहारिक  रास्ते  तलाश सके। एक शिक्षक किसी विद्यार्थी को कक्षा में अव्वल आने का पाठ भले न पढ़ा सके पर उसको कुछ मौलिक रचने की सृजनात्मक और वैचारिक संवेदना जरूर सिखा पाए जिसकी स्मृतियां उसे मुस्कुराने और कभी ना हारने का बहाना दे सकें।" 


"बस कुछ ऐसा ही।"


प्रभाकर सिंह

प्रोफेसर ,हिंदी विभाग 

काशी हिन्दू विश्व, वाराणसी


                                                             {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com



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Saturday, 4 September 2021

शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल (बीएचयू)


 शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य //


वैसे आमतौर पर यही कहा जाता है कि पहला गुरु माँ होती है! लेकिन मेरी माँ कहती है। पहला गुरु भूख होती है। चलिये! मैं आप लोगों को कुछ समय के लिए अपने बचपन में ले चलता हूँ। गदहिया गोल से लेकर पहली कक्षा तक मैं पहाड़ी इलाके के एक प्राथमिक विद्यालय (घासीपुर-बसाढ़ी ,अधवारे ,मिर्जापुर) में शिक्षा ग्रहण किया हूँ। उस समय इस विद्यालय की एक विशेषता, यह थी कि इसका प्रत्येक विद्यार्थी दशरथ मांझी था। क्योंकि सभी के पास भूख थी। सभी सहपाठी पहाड़ों में गिट्टी फोड़ा करते थे। और कुछ मेरे सहपाठी आज भी पहाड़ों में काम रहे हैं। कुछ पत्थर प्लांट पर पत्थर चीर रहे हैं। मैं अक्सर इन लोगों से बातचीत करता रहता हूँ। मैं यहाँ उन सभी सहपाठियों के विषय में चर्चा न करके बल्कि एक ऐसे महात्मा सहपाठी का जिक्र करना चाहता हूँ जिन्होंने सर्वप्रथम अपने हिस्से की रोटी मुझे खाने को दिया है। और मेरी माँ बताती है कि उनकी माता ने मुझे अपना स्तन पान कराया है। बहरहाल, साधु स्वभाव के साथी थे। इसलिए मैं उन्हें महंत कहता था। परंतु वास्तविक नाम है इंद्रजीत सिंह। इनके गाँव के लोग इन्हें सुखु व सुखुआ नाम से संबोधित करते हैं। परंतु अब हमउम्र के लोग महंत ही कहते हैं। उम्र में मुझसे कम से कम डेढ़-दू साल बड़े हैं। इंद्रजीत पहाड़ों में काम करते हुए स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर लिए हैं। आगे की पढ़ाई इसलिए छूटी है कि हालात ने भयंकर लात मारी है। बातचीत के दौरान वे अक्सर कहते हैं कि हालात ठीक होने पर आगे की पढ़ाई जारी कर दूँगा। आप निश्चिंत रहिये।...आप से माफी चाहुँगा। आज मुझे तो अपने शिक्षकों को याद करना है और मैं अपने सहपाठियों को याद कर रहा हूँ।


अब आई दूसरी से तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई मैं अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय से ग्रहण किया हूँ। यहाँ के गुरुजनों में कोई खास बात नहीं थी। न ही इस विद्यालय से जुड़ी कोई दिलचस्प प्रसंग ही है। बस एक घटना याद आ रही है कि 26 जनवरी के कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी तभी कुछ लड़कियों ने मुझे अपना पहरेदार बना लिया था। वे सब मिलकर स्काउट गाइड का कमर बेल्ट चुराने के लिए मुझे दरवाजे पर खड़ा कर के करीब 20 बेल्ट गायब कर दीं। दो हप्ते तक सभी की धुलाई होती रही। इस पिटाई की वजह से लगभग एक दर्जन बेल्ट लड़कियों ने लौटाई। पर मुझे जो मिला था मैं तो उसी दिन प्राइवेट स्कूल के एक विद्यार्थी को बेच दिया था। लेकिन मैं बच गया क्योंकि वह बेल्ट उस गुरुजी के निगरानी में नहीं था। वह किसी और अत्यंत संवदेनशील शिक्षक के निगरानी में था जिनका केवल एक खोया था और वही मुझे मिला था पहरेदारी का पुरस्कार।


लेकिन गुरुजी मुझसे बहुत ही खफा थे। स्कूल से सटी एक पोखरी है। उन दिनों मेरे गाँव के विद्यालय में शौचालय नहीं था। शौच के लिए हम सब बाहर, यानी खेतों में और सड़कों पर जाते थे। एक दिन शौच के बहाने मैं और मेरे लंगोटी यार उसी पोखरी में बुल्ली-क-बुल्ला (यानी पानी के अंदर छुपा-छुपाई खेल) खेल रहे थे। बिल्कुल नग्न होकर। इस सुनहरा अवसर को आँसुओं में बदलने के लिए दूसरे गोल के एक विद्यार्थी ने हेड सर को खबर लगाई कि हम लोग मैदान के लिए नहीं बल्कि स्नान के लिए छुट्टी माँगे हैं। फिर क्या वहीं हुआ जो नहीं होना चाहिए था। सारा वस्त्र गुरुजी के हाथ में और हम लोगों बिल्कुल नंगा (निर्वस्त्र) मंदिर में लुका गये थे। हम सभी के गार्जियन आये और पिटाई हुई। फिर मैं तीसरी कक्षा के बाद एक प्राइवेट स्कूल में चला गया। मेरे गाँव में कई टोले हैं उसी में से चमरौटी टोला (हरिजन बस्ती) के एक प्राइवेट गुरुजी थे। उनका नाम राजेश है। पिताजी के मित्र थे। इसलिए मुझे अपने विद्यालय में पढ़ने के लिए ले गये। नाम लिखा गया। दो तीन महीने पढ़ाई हुई फिर स्कूल ही बंद हो गया। सब विद्यार्थी भिन्न भिन्न स्कूलों में नाम लिखवा लिए। कुछ दिन बाद प्राथमिक विद्यालय ऐकौनी (नियमताबाद, चंदौली) मेरे घर से करीब तीन-साढ़े तीन किमी. दूरी पर है। इसी स्कूल के चौथी कक्षा में मेरा दाखिल हुआ। वहाँ मुझे तीन गुरुजन मिलें। मनोज सर , ओझा सर और अजय सर से क्रमशः अंग्रेजी-विज्ञान ,हिंदी और गणित हम पढ़ाते थे। हमारा परिवेश और अन्य विषयों को भी तीनों लोग पारी पारा पढ़ाते थे। 


मैं इनके टेस्ट में प्रथम आता था इसलिए वे मुझे मानते थे। कुछ खाने पीने को भी कभी कभी देते थे। लड़कियों का टोली या लड़कों का टोली जब कुकिंग (खाना वगैरह बनाते थे) करते थे तो गुरुजन मुझे भी शिक्षक की तरह बैठा देते थे। मैं खुद को कभी क्लास का मनीटर नहीं समझता था। क्योंकि दूसरे पोजीशन से लेकर चौथे पोजीशन तक मेरे लंगोटी यार ही थे। यहाँ एक प्रसंग मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकत्था की याद आ रही है कि उनसे उनके गुरुजन झाडू लगवाते थे और पानी छिड़कवाते थे। खैर, मेरे जीवन में भी ऐसा हुआ है। मैं भी झाडू लगाया हूँ और पानी छिड़का हूँ। 


छठवीं कक्षा के लिए मैं अपने पोस्ट के पूर्व माध्यमिक विद्यालय महदेवाँ (साहुपुरी, चंदौली) में दाखिला लिया।  वहाँ कोई खास गुरु नहीं थे। सब खबुआहा थे। एक मैम थी खेत्री मिश्रा। वे दिन भर रसोइयाँ झाँकती रहती थीं। यहाँ का खाना (यानी दोपहर का भोजन) सब जगह से अच्छा था। पर पढ़ाई सबसे घटिया। मैं और मेरे मित्र दोपहर को भागकर, बावन बिगहवा में फुटबॉल खेला करते थे। चमकिल्ला में हम लोग कॉपी-किताब-कलम लेकर जाया करते थे। इसलिए भागने में आसानी भी होती थी। इसी बीच पूर्व माध्यमिक विद्यालय ऐकौनी (नियमताबाद, चंदौली) में दो नये अध्यापक आयें। क्रमशः राम अवध यादव और मुमताज अहमद। इन गुरुओं ने मेरी खोजी की। मेरे मित्रों से मुझे संदेशा भेजवायें कि वे मुझसे मिलना चाहते हैं। फिर क्या इसी का लाभ उठाते हुए। मैं महदेवाँ छोड़ दिया। महदेवाँ के हेड सर से कहा था कि गुरुजी मेरे माता पिता नानी के यहाँ जा रहे हैं मैं वहीं पढ़ूँगा। नाक-नूँक करते हुए उन्होंने एक दिन जुलाई में टीस काट दी। मैं ऐकौनी सातवीं कक्षा में एडमिशन ले लिया। पढ़ाई-लिखाई अच्छे से चलने लगी। एक दिन किसी काम से हेड सर ऐकौनी आये हुए थे और मैं ऑफिस में जा पहुंचा। देखते ही सर ने कहा कि क्या गोलेन्द्र इधर ही तुम्हारा ननिआउर है। मैं झूठ बोल दिया कि हाँ।


मुमताज सर और राम अवध सर कभी कभी टेस्ट लेते थे और पुरस्कृत करते थे। इनके पुरस्कारों को पाने में मैं गुरुवर विकास चौहान (एम.ए.पास एक मजदूर पर मेरे गुरु) का सहायता लेता था। वे अक्सर सुबह पाँच बजे मुझे अपने पास बुला लेते थे। और मेरा मार्गदर्शन करते थे। जो भी सवाल होता था उसका उत्तर अति सहजता से देते थे। शिघ्र ही समझ में आ जाता था क्योंकि मैं मजदूर का भाषा जानता हूँ। यह मेरे डीएनए में ही है। मैं नरेगा/मनरेगा वगैरह में काम करता था। वे यह बात जानते थे। उनके साथ भी मजदूरी किया हूँ। तब तक मैं कवि के रूप में आस पास के गाँवों में प्रसिद्ध हो चुका था। विकास सर के साथ गीत वगैरह भी लिखा। इसी दौर में भोजपुरी के कई दिग्गज कलाकारों से मेरा परिचय हुआ। पर वे जैसा गाना/गीत मुझसे लिखवाना चाहते थे। मेरी आत्मा को मंजूर नहीं था। वैसा लिखने के लिए। पर हालात कुछ ऐसी थी कि मैंने लिखा।


आठवीं के बाद मैं रामनगर के सरकारी कॉलेज यानी प्रभु नारायण राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ना चाहता था। जो घर से लगभग दस किमी. दूरी पर है। इसके लिए मुझे एक साइकिल की जरुरत थी। पैसा तो मेरे पास था नहीं। फिर सहपाठी साथियों के साथ लेबरई (यानी मकान का काम) किया। लेबर मंडी में हम सब खड़े थे। वहाँ से सब इधर-उधर, कहीं और चले गए। मैं बस हल्का काम चाहता था क्योंकि उस समय तो मुझे यह भी नहीं पता था कि क-एक-क मलासा बनता है जुड़ाई या ढ़लाई के लिए। बहरहाल, दस बजे के आपपास एक रिटायर्ड कर्नल आये। और पूछा कि छूटू मेरे यहाँ काम करोगे? उत्तर में मैंने प्रश्न किया 'सर' काम क्या है? उन्होंने आश्चर्य से मेरे ओर ताका जैसे मैं उनसे कोई बहुत ही जटिल प्रश्न किया हूँ। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। उन्होंने कहा कि बाबू अब तक सब लेबर 'चाचा' वगैरह से मुझे संबोधित किये हैं पर तुम 'सर'। मुझे नहीं लगता है कि तुम मजदूर हो। तब मैंने कहा कि सर! 'मैं कलम का मजदूर नहीं बल्कि कमल के लिए मजदूर हूँ। फिलहाल एक विद्यार्थी हूँ। और लेबरई का मुझे कोई अनुभव नहीं है। नरेगा/मनरेगा से भली भांति परिचित हूँ।' उनसे कुछ ऐसा ही कहा था। 17 दिन उनके यहाँ काम किया। संयोग से वे भी पटेल थे। मकान का डिजाइन किया जा रहा था। मिस्त्री भी पटेल थे और वे भी बनारस के ही थे। एक लेबर और थे जो गाजीपुर के थे और यादव थे। उन्हीं से मैं अपने हिस्से का भारी काम करता था। वैसे , दिन भर में मिस्त्री दादा 51 ईंटें ही जोड़ते थे। बस, सुबह में थोड़ा कठिन काम होता था। लेबरई आखिर लेबरई ही है। जब जादा भारी काम आया तो मैं धीरे से निकल लिया। तब तक काम भर पैसे हो चुके थे।


फिर मैं एक साइकिल खरीदा। उसके बाद रामनगर के राजकीय कॉलेज में एडमिशन लिया। वहाँ मैं चार साल पढ़ा। इस कॉलेज का कोई भी अध्यापक मुझे प्रभावित नहीं किया। हाँ, फिजिक्स जब फँसता था तो गंगा सर से पूछ लेता था तो वे बता देते थे। इसी क्रम में में इंद्रजीत सर और आर.पी. सर से हिन्दी , डॉ. कृपानाथ यादव सर से अंग्रेजी और फिरोज सर से कमेस्ट्री। और अन्य अध्यापकों ने भी कभी कभी मेरी कक्षाएं ली। यहाँ विद्यार्थीगण फेल बहुत जादा होते थे। इसलिए मैं गुरुवर विनोद पटेल सर (सैदपुर, साहुपुरी के निवासी) से सहायता ली। विनोद सर गणित और फिजिक्स पढ़ते हैं। वैसे हैं तो प्राइमरी के शिक्षक। ज्ञान इतना है कि इनसे पढ़कर कोई भी विद्यार्थी आई.आई.टी. आसानी से क्लियर कर सकता है। मुझे तो इनसे बहुत ही कम पढ़ने का अवसर मिला है। बहुत सारे बीटेक की परीक्षाओं को इन्हीं के आशीर्वाद से क्वालिफाई किया हूँ। वैसे विनोद सर दिलेर मनुष्य हैं। बस एक दोष यह है कि कभी भी टाइम पर नहीं आते थे। इनका मार्गदर्शन पाने का अर्थ है आपके पास धैर्य है। आप इंतजार करने में सक्षम हैं। बहुत इंतजार करवाते हैं। इन्हीं के एक मित्र हैं कल्लू गुरुजी। वे भी ऐसे ही हैं। सहज सरल हसमुख प्रकृति के धनी व्यक्ति।


इतना कुछ आप लोगों को बता दिया।  अब मैं बीएचयू  के गुरुजन की ओर बढ़ रहा हूँ। इस यूनिवर्सिटी में मेरा एडमिशन एक अजीब घटना है। मैं बीटेक, बीएससी, बीए की परीक्षाएं दिया था। सभी में क्वालीफाई हुआ था। बीएचयू में भी हो गया था। अब चिंता यह थी कि मैं क्या पढूं? मैं साइंस वर्ग का विद्यार्थी था। तो साइंस लेने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। पर मैंने महसूस किया कि सांइस में नहीं बल्कि साहित्य में मेरी रुचि है वास्तव में। साइंस तो समाज की वजह से जबरी पढ़ रहा हूँ।  क्योंकि हाईस्कूल के अधिकतर टॉपर समाज के भय से साइंस ले लेते हैं। उस वक्ता वे अपना नहीं, दूसरों का सुनते हैं। खैर, अंतिम तिथि 31 जुलाई को मैं एडमिशन ले लिया। मेरा फिस विकास साइबर रामनगर से जमा किया गया था। 


जैसा कि आप सभी कल के पोस्ट द्वारा यह बात जाने गये हैं कि मेरी पहली मार्गदर्शिका डॉ. शिल्पा सिंह मैम हैं। जिनसे मुझे मूलरामायण पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अब तक जितनी शिक्षिकाओं ने मुझे पढ़ाया है उसमें सबसे अधिक शिल्पा मैम ने मेरी कक्षाएँ ली हैं। और इस शिक्षक दिवस पर मेरी यही कामना है कि आगे भी शिल्पा मैम की तरह मार्गदर्शिकाएँ मुझे मिलें। बीएचयू में तमाम शिक्षक हैं पर गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल सर और गुरुवर सदानंद शाही सर बहुत ही जादा मुझे प्रभावित किये हैं। इन दोनों गुरुओ से मुझे साहित्यिक संस्कार प्राप्त हुआ है। इन गुरुओ पर यदि बातचीत करने लगूंगा तो दिन बीत जाएगा। बहरहाल, बस यह जान लीजिए कि "सद्गुरु के मुख का शब्द अनमोल/जो देता है लक्ष्य के द्वार को खोल।" साथियों! इसी क्रम में बतौर शिक्षक सुभाष राय सर भी मेरे लिए एक गुरु हैं। ठीक है। परीक्षा के बाद अपने शेष मार्गदर्शकों के विषय में चर्चा करूँगा। और उसी समय मैं आप लोगों को गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल सर और गुरुवर सदानंद शाही सर के विषय में विस्तार से सुनाउंगा। आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

©गोलेन्द्र पटेल

                                                           {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


नोट :- मैं इस संस्मरण को पुनः संशोधित कर के प्रस्तुत करूंगा।



Wednesday, 25 August 2021

उपजीव्य कवि श्रीप्रकाश शुक्ल : गोलेन्द्र पटेल || संदर्भ के रचनाकार

उपजीव्य कवि श्रीप्रकाश शुक्ल : गोलेन्द्र पटेल

आलेख में संदर्भ के रूप में प्रयुक्त होने वाली रचनाएँ (संकलन जारी है):-


कविताएँ :-


1).

बुरा एक सपना देखा


रात बुरा एक सपना देखा

सूखी नदी के घाट को देखा

पाट सटी टूटी नाव को देखा

तिथिहीन पतवार को देखा

नाविक के अंत:घाव को देखा


रात बुरा-बुरा एक सपना देखा

सूखी नदी को सड़क बनते देखा

सरपट भगती मोटर कार को देखा

घाट को बस-स्टॉप में बदलते देखा

पतवार को खाक़ी लिबास होते देखा

नाविक को बस-ड्राइवर बनते देखा


बुरा स्वप्न बनारस में साकार देखा

असि-अस्थियों की सड़क को देखा

नदी के रक्त-कणों को धूल उड़ते देखा

'रेत में आकृतियाँ' की हर उकेर को देखा

श्रीप्रकाश शुक्ल की आँखों में मर्म को देखा

कि असि* को अस्सी घाट उतरते  न देखा !


( असि एक विलुप्त नदी है। बनारस में गंगा में मिलती थी। असि के नाम से ही अस्सी घाट है)


                                           ©वसंत सकरगाए

                                               10/04/2021


2).

बाढ़ में कवि


लड़कपन से बच गए
जवानी के सैलाब तक में ना फँसे
पर दो हजार सोलह की बाढ़ में
आखिर फँस ही गए
कवि श्रीप्रकाश शुक्ल
हतप्रभ हैं लोग
जो कभी किसी रमणी में न फँसा
दमड़ी में ना फँसा
आखिर वो बाढ़ में कैसे फँस गया?
बाढ़ में बवाल काटते
जनवादी कवि शशिधर से
इस बाबत जब पूछा गया
तो भुजा उठाकर कहा उन्होंने -
'असंभव है कवि का बाढ़ में फँस जाना
भगवा अफवाह है ये
उनका अगल-बगल
अड़ोस-पड़ोस
आकाश-पाताल
सब बाढ़ में डूब सकता है
पर वे नहीं
उनका घर नहीं
क्योंकि नहीं है उनकी कविता में सूखा
ना ही वह किसी गीलेपन के खिलाफ ही है
और फिर नामवर की जिस धरती पर वे रहते हैं
वहाँ बाढ़ का पानी
वो भी गंगा का
भला क्या बहाने और भिगोने जाएगा भाई?'
कहना उनका यह भी
कि पक्की कारपोरेट साजिश है यह
क्योंकि जो आज तक किसी भी
जल-जाल से बचा और बचता रहा
भला बाढ़ में उसका फँसना क्या!
और बचना क्या!
जो भी हो
पर कविता में सच यही है
कि धीरे-धीरे प्यारे कवि
बहुत प्यारे कवि
बाढ़ में फँसते गए
बढ़ती गंगा का पानी
उनकी ओर
कांग्रेसी राजनीति की तरह बढ़ा
सबसे पहले उनके दुआर को चपेटा
फिर चौहद्दी को
फिर दलान से घुसते हुए वहाँ पहुँचा
जहाँ मेज पर फैली उनकी कविता थी
और फिर उसी की ऊँचाई पर
अपनी संपूर्ण गहराई के साथ ठहर गया
किंतु बाढ़ के पानी से
सिमटते-सिमटते वे
भागे नहीं
रोए नहीं
हाथ नहीं जोड़ा
मंत्र नहीं पढ़ा
कोई अनुष्ठान नहीं किया
पीछे नहीं गए
बल्कि ऊपर
और ऊपर चढ़ते गए
और मेरी पुख्ता जानकारी में
फिलहाल ओरहन का वह कवि
ठीक इसी बाढ़ की आँच पर
एक काली धामिन की चकाडुब्ब सुनते
घर के ऊपरी आसमान में रहता है
इधर शहर में उनको लेकर कई कयास हैं
कोई कहता है कि वे बाढ़ में डूब गए
कोई यह कि अच्छा हो कि डूब ही जाएँ
कोई यह कि बह कर कहीं और चले जाएँ
कोई यह कि आखिर जरूरत क्या है
इस शहर को
रेत और पानी के कवि की
खर-पतवार से अधिक वह भला है ही क्या?
कोई-कोई तो यह भी कहते सुना गया है
कि अच्छा होता की बाढ़ हुमचकर
उनके ऊपर सदा-सर्वदा चढ़ी रहती
लोग तो अब खुलकर यह भी कहने लगे हैं
कि काश! इसी बाढ़ में
कब्र बन जाए इन मरगिल्ले हिंदी कवियों की
क्योंकि इन्ही ससुरों की वजह से
काशी नहीं बन पा रहा है क्योटो
दिल्ली की लाख कोशिशों के बावजूद
उधर गंगा के पानियों के बीच
घुप्प अँधेरे में बैठे कवि
फिलहाल मोबाइल की रोशनी में
अखबार पढ़ते हैं
ताजा खबर यह है
कि गंगा को अजीर्ण हो गया है
इसीलिए यह बाढ़ आई है
और अब बार-बार आएगी
यह पढ़ कवि का माथा गरम हो उठता है
आवेश में वे छत पर चढ़ आते हैं
और जोर-जोर से
न जाने किसको
ओरहन देते हैं
कि अजीर्ण, गंगा को नहीं
ज्ञान को हो गया है
सरकार को हो गया है
विद्वान को हो गया है
बवाल काटने वाले
केंद्रोन्मुखी भौकाल
अजीर्णता को भला क्या जाने
क्या समझें
जानता समझता और सहता
तो केवल कवि है
ज्ञान को
विद्वान को
सत्ता को
और पतितपावनी गंगा की बाढ़ को भी
बस वही जानता है
वही सहता है
और फिर सिरजता भी तो वह ही है
भले ही चाहे खुद फँसा
या फँसा दिया गया हो
बाढ़ में एक कवि!
 

©सर्वेश सिंह



3).

 वापसी 

धाराएं लौट रही है नदी में

जैसे लौटती है रौनक बस्ती में 

प्रवासी से पथिक बन

गुरूश्रेष्ठ भी लौट रहें हैं

सूने गेह में जालाने को दीपक


दीपक जलने से पहले 

आ चुकी है बिजली

और जा चुकी है 

निर्जन में घुली काली रात


बाढ़ का जाते ही

काफी जद्दोजहद यानी

चंदा-चुटकी , घुस -पेच के बाद

सबसे पहले आती है लाइट

जिससे घरों में ऑक्सीजन पहुंचता है

क्योंकि कॉलोनी के घरों में

लाइट मतलब लाइफलाइन है


रास्ते पर केवल कीचड़ है

कमल की उम्मीद तक नहीं है

हां एक केवट है

जो स्नेहोपहार को संजो रहा है

जैसे संजो कर रहा था भुभुक्षु


अक्सर सावन बीतते बीतते 

बनारस में आ जाती है बाढ़

जैसे शिव स्वयं गंगा को विदा कराने

आ जाते हैं काशी के घरों में


बनारस में बाढ़ 

शिव - शक्ति का संगम है,

सहवास है ,और प्रवास  है

वे बखूबी समझेंगे

जिनका नदी क्षेत्र में निवास है

        ©दीपक आर्यपुत्र ( मुसाफ़िर )

4).

(कविवर एवं आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल सर को समर्पित कविता)

'रेत में आकृतियों' को 

मिटा रही है बाढ़ ।

कठिन समय में 

धैर्य की परीक्षा देते हुए

'एक जोड़ा दुख' के साथ भी

मुस्कुराता है कवि 

वह जानता है दुख का स्वाद ।


बाढ़ का आना कवि के लिए 

महज सूचना नहीं है ।

खतरे की घंटी है,

विस्थापन के दर्द का उभरना है ,

पुनः एक बार ।


न जाने कितने बाढ़ो का भुक्तभोगी रहा है कवि ।

कविता में लिखता रहा है इसका इतिहास |

वह जानता है कि -

 बाढ़ महज प्राकृतिक आपदा नहीं,

 राजनीतिक षड्यंत्र भी है ।

 कवि देखता है,

 रैदास के बेगमपुरा में ,

बाढ़ का ग़म पसर चुका है ।

©प्रतिभा श्री




संपादक : गोलेन्द्र पटेल

नाम : गोलेन्द्र पटेल

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Monday, 23 August 2021

बाढ़-दर्शन की कविताओं पर आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल

बाढ़-दर्शन की कविताओं पर आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल
{नोट : यह आलेख गुरुवर डॉ. कमलेश वर्मा के मार्गदर्शन में पुनः प्रस्तुत किया जाएगा}
{डॉ. कमलेश वर्मा }

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कविता क्या है? कविता क्या नहीं है? कविता कहाँ है? कविता कहाँ नहीं है?....इस तरह के तमाम प्रश्नों पर प्राचीन काल से लेकर आज तक के अनेक विद्वानों ने विचार किये हैं और करते रहेंगे। खैर, यहाँ किसी विशेष विद्वान के माध्यम से चर्चा न कर के खुद मैं कविता के विषय में क्या सोचता हूँ। मैं उसका कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

प्रत्येक जीव का जीवन एक लीला है जो ईश्वरीय सत्ता से संचालित होती है। इसी सत्ता से सृष्टि का जीवन है। अतः जीवन ही कविता है। दूसरे शब्दों में, कविता मानवीय प्रकृति की प्रतिक्रिया का प्रदीप है जिससे जिंदगी ज्योतिर्मय होती है। सच तो यह है कि कविता कवि की तीसरी दृष्टि है जिससे वह दुनिया को देखता है, परखता है, समझता है, अपने आप को जानता है और पहचानता है। अर्थात् कविता परिभाषा की परिधि से परे परिक्रमा करने वाली संवेदना से संचालित प्रकाशपुंज है। यह अनुभूति का आलोक है। यह संवेदनाओं का सार्थक गान है। यह अत्यंत संवेदनशील एवं गतिशील विधा है। वर्तमान की त्रासदी से पीड़ित आत्मा के लिए कविता एक प्रकार की औषधि है जिसकी कोरोजीविता उसे स्वस्थ और समृद्ध करने में अहम भूमिका अदा करती है। इस वैश्विक महामारी में वह समाज के विसंगतियों एवं मानसिक विकृतियों को दूर कर के मानवीय सुंगध को सार्वभौमिक करने में सफल रही है।

कविता और गीत के संदर्भ में कोरोजीवी कविता के सूत्रधार मेरे काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि "कविता मनुष्य की चेतना की उदात्त अभिव्यक्ति होती है जबकि गीत उसके भाव जगत का एक तकनीकी कौशल।" यही उदात्त अभिव्यक्ति और कौशल ही बाढ़ की विभीषिका में हमारे महामंत्र हैं। अतः कविता की कंठी को फेरते हुए हमारा समय इसी का उच्चारण कर रहा है।

मनुष्य की वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण आज इस कदर चढ़ गये हैं कि सोशल मीडिया पर कविताओं की बाढ़ हमें दिखाई दे रही है। अब एक अच्छे कवि और एक अच्छी कविता की खोज करना बहुत ही श्रमसाध्य कार्य हो गया है। इस संदर्भ में मुझे आचार्य रामचंद्र शुक्ल का सुप्रसिद्ध निबंध  ‘कविता क्या है?’ में लिखी आगामी पंक्ति याद आ रही है कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जायेंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि कर्म कठिन हो जाएगा।’ 

इसी विडंबना को रेखांकित करते हुए मेरे मार्गदशक कवि सुभाष राय कहते हैं कि "केवल कवि होने से आप कवि रहेंगे। इस सूत्र पर अब कवियों का भरोसा बहुत कम रह गया है। जब से कविता के लिए छंद और लय की बंदिश ढीली पड़ी, किसी के लिए भी कवि बन जाना सहज हो गया। सोशल मीडिया पर बहुत सारे ऐसे लोग कविताएं पोस्ट करते नजर आते हैं, जो कवि नहीं हैं लेकिन उन्हें इतना ज्ञान हो गया है कवि होना कुछ विशिष्ट होना है। वे विशिष्ट होने के लिए कवि दिखना चाहते हैं और कवि दिखने के लिए हर संभव मारग अपनाते हैं।"

ऐसे में मैं खुद के भीतर के कवि को ढूँढ रहा हूँ और कविता लिखना सीख रहा हूँ। मैं कविता क्यों लिखना सीख रहा हूँ। यह मेरे लिए भी उतना ही जटिल एवं टेढ़ा सवाल है जितना कि इसका जवाब देना। बहरहाल, बस यह समझ लीजिए कि मैं कविता को लिख नहीं रहा हूँ बल्कि जी रहा हूँ। मेरे भीतर का कवि भीतरी आवाज के साथ साथ बाहरी आवाज बार बार सुनना चाह रहा है। और वह बिना बोर होये बार बार सुन रहा है। अर्थप्रवणता में धरती की धुन, हवा की सरसराहट, गगन का गर्जन, तरंगों का तर्जन, सन्नाटे की सिसकी,  चुप्पी की चीख, एवं गमी की गूँज सुन रहा है। और सुन रहा है समय के स्वर में तड़पती आत्मा की तान एवं रुदन का गान। जहाँ है निराशा में निराकरण के शब्द। जिससे मैं कविता गढ़ रहा हूँ।  मेरा काव्य संसार केवल मेरा नहीं है वह हर असहाय आदमी का है जिसकी आँखों में मैं अक्सर झाँका करता हूँ।

मेरा कवि मन कविता के लिए नये शब्दों की तलाश में लोक की ओर चला जाता है और वहाँ से गँवई गंध में सना हुआ शब्द चुन कर अनुभव के आकाश में जहाज की तरह उड़ना चाहता है। जिसमें मेरी जिज्ञासा एक पोयटिक पायलट की तरह बैठना चाहती है। सृजनात्मक सृष्टि की संवेदनाएँ मेरे साहित्यिक संस्कार को परिष्कृत कर रही हैं। इसलिए मेरी कविताओं की जड़ें जमीन में गहराई तक धँसी हुई हैं। और धँस रही हैं। सकारात्मक संभावनाओं के सुमन की तरह पुष्पित होने वाली औषधि है मेरी कविता। उसकी प्रत्येक पंखुड़ी में पीड़ा का पराग है। 
जिसका स्वाद चखना ही सहृदयों के लिए आनंद की अनुभूति है। तो उसके दर्द के लिए कड़वी दवा भी।

अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ कि कविता की बाढ़ में मेरी भी कुछ कविताएँ बहेंगी। इसका मुझे दुःख नहीं है। मुझे दुःख इस बात की है कि जिस सुंदर शब्द की तलाश मैं कर रहा हूँ वह अभी तक मुझे मिला ही नहीं। शायद यह खोज जिंदगी भर जारी रहेगी। समय का शब्द ही साहित्य है और कवि का काव्य भी। इस संदर्भ में मुझे रघुवीर सहाय के काव्य संकलन “सीढ़ियों पर धूप में” की भूमिका में कवि-चिंतक अज्ञेय द्वारा लिखी गयी पंक्ति याद आ रही है कि “काव्य सबसे पहले शब्द है। और सबसे अंत में भी यही बात बच जाती है कि काव्य शब्द है।”

बाढ़-दर्शन
(केंद्र में काव्यगुरु) //

प्रिय मित्रों! सहृदय साथियों!  
                                       विश्व के मानचित्र में भौगोलिक दृष्टि से हमारा प्यारा भारत एक प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश है। वृहद भौगोलिक आकार, पर्यावरणीय विविधताओं और सांस्कृतिक बहुलता के कारण भारत को "भारतीय उपमहाद्वीप" और "अनेकता में एकता वाली धरती" के संज्ञान से संबोधित किया जाता रहा है। भारत में अनेक तरह की प्राकृत आपदाएं हैं लेकिन इन आपदाओं में सबसे अधिक प्रभावशाली एवं प्रलयंकारी बाढ़ है। दुनिया के कई देश बाढ़ से प्रत्येक वर्ष ग्रसित होते हैं और उसके विभीषिका की अग्नि में जन-धन , जमीन-जंगल, एवं जान-माल सब कुछ जलकर चिता की राख की तरह जल में बह जाते हैं। सभी सपनें स्वाहा हो जाते हैं। जीवन को अत्यधिक क्षति पहुँचती है। इस होनी की हानि से उबरना बहुत ही कठिन हो जाता है किसी भी देश के लिए।

भारत में बाढ़ लगभग हर साल आती है। इसकी उत्पत्ति और इसके क्षेत्रीय फैलाव में कहीं न कहीं आधुनिक मानव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मानवीय क्रियाकलापों , अँधाधुँध वन कटाव, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, प्राकृतिक अपवाह तंत्रों का अवरुद्ध होना तथा नदी के तटीय क्षेत्रों में अवैध कब्जा और बाढ़ कृत मैदानों में मकानों की बनने की वजह से बाढ़ की तीव्रता, परिमाण और विध्वंसता बढ़ रही हैं। समय के साथ परिवर्तन होना नियति है जिसका सकारात्मक पक्ष जीवन के लिए जितना लाभदायक है उससे कहीं अधिक नकारात्मक पक्ष विनाशकारी है।  नदियाँ नहरों में परिवर्तित हो रही हैं और कुछ नालों में भी। गाँव के विशाल सरोवर बउली में तब्दील हो चुकी हैं। बहुत से ताल-तलई-तालाब पट गये हैं। जिसकी वजह से भी बारिश के मौसम में बाढ़ की विभीषिका को विनाशकारिता के लिए शक्ति प्राप्त होती है। 

असम, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तराखंड राज्य सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में से हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर-भारत की जादातर नदियाँ विशेषकर पंजाब और उत्तर प्रदेश में बाढ़ लाती हैं। इधर पिछले कुछ दशकों से आकास्मिक बारिश वगैरह की वजह से राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश में भी बाढ़ आई हैं। लौटती मानसूनों की वजह से दक्षिण भारत में भी कभी कभी अचानक तेज बारिश होती है और बाढ़ जैसी स्थितियाँ हमारे सामने नज़र आती हैं। वहाँ की नदियाँ जलमग्न होकर आसपास की तटीय जिंदगी को प्रभावित करती हैं। अतः बाढ़ का मुख्य कारण भारतीय मानसून की अनिश्चितता तथा वर्षा ऋतु के चार महीनों में भारी जलप्रवाह है।

बाढ़ की वजह से समाज का सबसे निचला तबका, गरीब, मजदूर एवं किसान प्रभावित होते हैं। बाढ़ जन-धन के साथ साथ प्रकृति को भी क्षति पहुचाती है। बाढ़ जब आती है तो वह संकट का संगीत और तबाही की तान कल-कलाहटी स्वर में सुनाती है। जहाँ नदियों की नाराजगी बजाती है बारिश की बाँसुरी। हमें रुदन का गान सुनाई देता है। और सरसराहटी धड़कन की धुन में असहाय की सिसकन भी। स्पष्ट हो जाता है स्वर। हमें पता चलता है कि किसानों के सपनों को और तटीय जिंदगी की उम्मीदों को डूबो देती है बाढ़।

हम बाढ़ में बहुत से मंदिरों , महजीदों और मनुष्यों को भी डूबते देखते हैं और देखते हैं कि बेजुबान जानवर भी डूब-डूबकर बेमौत मर जाते हैं। इसी बीच नदियां अपनी यात्रा के दौरान व्यवस्था को आइना दिखाती हैं और राजनीति के वास्तविक रूप से हमारा परिचय भी कराती हैं। बहरहाल, हम  जलमग्न नदियों के बहाने असहाय आँखों में बाढ़ का दर्शन कर रहे हैं। आजकल आप देख-सुन रहे हैं कि खबरें आ रही हैं। यू.पी. में  वाराणसी-प्रयागराज समेत लगभग 24 जिलों के 1200+ गाँव बाढ़ के चपेट में हैं। बनारस में गंगा अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ दी है वह लगभग 72+ मीटर की ऊँचाई तय कर ली है। इस शहर में कुल 88 घाट हैं और सब डूब गये हैं। गंगा के तटीय गाँवों में पानी घूसने की वजह से हजारों एकड़ जमीन की फसलें बर्बाद हो गयी हैं। साथ ही साथ शहर की दुसरी नदी वरुणा किनारे रामेश्वर, लक्ष्मीपुर, परसीपुर, रसुलपुर, जगापट्टी, नेवादा, औसानपुर, पाण्डेपुर, खंडा, तेंदुई, सत्तनपुर, गोसाईपुर इत्यादि गाँव की फसलें भी जलमग्न हैं। 

बिहार से बनारस तक के बाढ़-दर्शन में हमने देखा कि कैसे बाढ़ में बेजुबान, भँवर में भगवान एवं आँसुओं में इंसान डूब रहे हैं। कोरोनाकाल में शहर से गाँव लौटे हुए मजदूरगण पुनः नये छत की तलाश में अन्यत्र विस्थापित हो रहे हैं। विस्थापन का दोहरा दर्द जनता सह रही है। और इसी विस्थापनी विभीषिका को रेखांकित करते हुए कवि केदारनाथ सिंह अपनी कविता 'पानी में घिरे हुए लोग' में लिखते हैं कि 
"पानी में घिरे हुए लोग/प्रार्थना नहीं करते /वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को/और एक दिन/बिना किसी सूचना के/खच्चर, बैल या भैंस की पीठ पर/घर-असबाब लादकर/चल देते हैं कहीं और।" 

इस दोहरी त्रासदी का शिकार पशुओं तक को होना पड़ा है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से पंक्षीगण जिन क्षेत्रों में विस्थापित हुए हैं। वहाँ उनके लिए चारा नहीं है। सब चहचहाने के बजाय चिहुँक रहे हैं। मेरे इलाकों में कौए उन पंक्षियों को नये घोंसले का निमार्ण करने से रोक रहे हैं। कर्कश काँव काँव से साफ स्पष्ट हो रहा है कि सब मिलकर उन्हें भगा रहे हैं।

विचारणीय बात यह है कि जिन लोगों का घर ढह गये हैं, अनाज नष्ट हो गये हैं। जीविका के सारे स्थाई साधन धाराप्रवाह में प्रवाहित हो गये, गाय-भैंस, बकरी-बकरा, मुर्गी-मुर्गा एवं सब कुछ नष्ट हो गये हैं। उनके ऊपर क्या बीत रही है। उनके दुःख-दर्द के कल्पना मात्र से हमारी रूह कांप जा रही है। जिसका कोई अपना डूब गया है। बहुत से बच्चे अनाथ हो गए हैं बहुत से माता पिता अपने बच्चे खो दिये इस बाढ़ में।
 दिल को चिर देने वाले दृश्य हमारी नजरों के सामने आ रही है। जैसे ढहे हुए घरों में दबी लाशें, डूब रही विधवा माता के साथ नवजात शिशु, एक अबोध बच्ची और एक छोटा बच्चा, हर दृश्य हृदय को झकझोर रहे हैं। हम इन्हीं दिल चिरने वाली चित्रों को, दृश्यों को देख रहे हैं। और उन्हें कविता में सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें कविताओं में खींच रहे हैं। मैं "बाढ़" शीर्षक नामक कविता लिख कर रो ही रहा था कि गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल की एक तस्वीर मेरे हाथ लगी। जिसमें वे एक ट्रैक्टर के इंजन पर बैठ कर अपने घर को अत्यंत आत्मीयता के साथ निहार रहे हैं और चारों ओर जल ही जल दिखाई दे रहा है। यानी गंगा स्वयं उनके द्वार पर आ गयी है। 

मैं अपने गुरु की उस अवस्था का अवलोकन करने का प्रयास कर हूँ और सोच रहा हूँ कि आखिर बाढ़ में कवि किस का दर्शन कर रहा है। अपने घर का जहाँ नदी कुछ क्षण विश्राम करना चाहती है। मैं कभी कल्पना में, तो कभी यथार्थ के नदी में गोता लगाने लगा। फिर ठहर कर मैंने देखा कि  "गंगा में गुरु" से लेकर "गुरु की आँखों में गंगा" का दर्शन कर रहा हूँ, मैं। उस दर्शन को, मैं कविता की वाटिका में औषधि के पौधों की तरह रोप रहा हूँ। जिसकी पत्तियाँ, जड़ें, फल-फूल एवं टहनियाँ आदि एक दिन हमें इसी तरह के दृश्यों के दर्द से छुटकारा दिलाएगी।

हिंदी के तमाम कवि अपनी कविताओं में 'काशी में आई बाढ़' का सजीव चित्रण किये हैं। बहुत ही आदर के साथ केदारनाथ सिंह, त्रिलोचन व ज्ञानेंद्रपति आदि कवियों का नाम लिया जा सकता है। "बनारस में बाढ़ और हिंदी कविता" नामक आलेख में इस बिंदु पर अलग से विचार-विमर्श व अध्ययन-अनुशीलन किया जाएगा।
(क्रमशः)
©गोलेन्द्र पटेल
प्रकाशन तिथि : 23/08/2021
                                                   {संपादक : गोलेन्द्र पटेल}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

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