युवा किसान कवि गोलेन्द्र पटेल की सोलह कविताएँ :-
{साखी-33 का लोकार्पण}“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
Tuesday, 7 September 2021
युवा किसान कवि गोलेन्द्र पटेल की सोलह कविताएँ
Sunday, 5 September 2021
शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य - 2 : गोलेन्द्र पटेल (बीएचयू)
शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य - 2
'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (यानी 'अज्ञान') और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश (यानी 'ज्ञान')। अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म स्वरूप प्रकाश है, वह गुरु है। यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि गुरु का उक्त तात्पर्य उस युग का है जब एक 'गुरु' स्वयं एक 'गुरुकुल' होता था। समय के साथ शिक्षा की खेती करने की अनेक पद्धतियाँ विकसित हुई हैं। परंतु खेत दिन-प्रतिदिन छोटे होते जा रहे हैं और ज्ञान की खेती करने वाले सुकुमार, एकदम सुकुवार। तेजी से मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो रही है। शिक्षक और शिष्य के संबंधों का सुमन मुरझा रहा है। इस मुरझाते हुए सुमन के संदर्भ में मुझे अपने प्रिय कवि ज्ञानेंद्रपति की कविता 'वे जो' की याद आना, यहाँ कोई अनायास नहीं है बल्कि वर्तमान की दशा का दबाव है। इस कड़वी सच्चाई को व्यक्त करनेवाली कवि कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-
"वे जो 'सर' कहाते हैं
धड़ भर हैं
उनकी शोध-छात्राओं से पूछ देखो"
बुद्धि हर व्यक्ति के पास होती है। पर सद्बुद्धि सबके पास नहीं होती है। यह तब तक प्राप्त नहीं होती है जब तक कि व्यक्ति को किसी का मार्गदर्शन प्राप्त न हो जाये। एक बात यह भी है कि गुरु के अनुभव से जब शिष्य के अनुभव का रैखिक मिलन होता है तब उसके सोचने-समझने की दायरा बहुत बढ़ जाता है और उसकी सृजनात्मक शक्ति भी पहले की अपेक्षा काफी बढ़ जाती है। उसकी सचेतनता उसकी रचनात्मकता को परिष्कृत करती रहती है। उसके संस्कार का संसार अपनी सभ्यता और संस्कृति से उर्जा पाकर फैलने लगता है। इसके फैलने से उसके (शिष्य) भीतर की मनुष्यता जागृत होती है। जो उसे मानवीय बनाती है और यही मानवीयता सृष्टि की संवेदना को संजोकर जिंदगी की नदी को स्वच्छ रखती है। जिसमें वैचारिकता की नाव बौद्धधर्मी खेना सीखाते रहते हैं जीवन भर।
किसी भी परिस्थिति में किसी भी तरह की समस्याओं और उलझनों से निपटने के लिए गुरुमंत्र ही वह सार्थक व सर्वोत्तम साधन है। जिसके द्वारा व्यक्ति आसानी से उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। हर गुरु साधारण में असाधारण होता है क्योंकि उनके पास शक्तित्रयी (आत्मशक्ति, स्पर्शशक्ति व वाक्यशक्ति) है और यही शक्तियाँ उन्हें ईश्वर से भी बढ़कर सिद्ध करती हैं। जिसे संत कवियों ने बेखूबी से अपनी रचनाओं में दर्ज किये हैं। इस संदर्भ में कबीरदास का आगामी दोहा तो जगत प्रसिद्ध है ही। "गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,काके लागूं पायं / बलिहारी गुरु आपणे, जिन गोविन्द दिया दिखाय ।।"
बहरहाल, मेरी दृष्टि में मेरे गुरु भी उन्हीं ऋषियों की तरह हैं जो अपने समय के सर्वशक्तिमान शिक्षक रहे हैं। मेरे गुरु भी अपने आप में गुरुकुल हैं और मेरे शिक्षक भी अपने आप में शिक्षालय हैं। एक संस्था हैं। जहाँ शिक्षा और दीक्षा दोनों ही आधुनिकता के रंग में रंगी हुई हैं। कला, साहित्य और संस्कृति का त्रिवेणी संगम हैं। अक्सर मैं इस संगम पर सुनता हूँ उनके मुख से निकला हुआ ब्रह्म स्वरूप शब्द! अतः मेरे गुरु मेरे समय के शब्द हैं।
मैं उनकी प्रशंसा नहीं कर रहा हूँ। न ही उनका मूल्यांकन। और न ही यहाँ कोई अतिशयोक्ति है। न ही मेरे पास कोई चाटुकारिता की भाषा है। मैं तो बस सत्यता की सीमा में अपनी बात रख रहा हूँ। उनकी सक्रियता ही उनकी सदाचारिता और साधुता की पहचान है। वे सतर्क के साँचे में वर्णित अनुभूतियों को मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से उच्च स्तर (भूमि) पर ले जाने का भागीरथ प्रयास तो करते ही हैं। साथ ही साथ शुन्य की संवेगी कंपनता का साक्षात्कार भी कराते हैं। अतः मैं यह कह सकता हूँ कि मेरे गुरु सहज और उदात्त होने के साथ साथ ज्ञाता और दाता भी हैं।
उनकी क्यारी की फसलें लहलहाती हुई नज़र आ रही हैं। उसमें उगे हुए गेहूँ और गुलाब का संगीतमय संवाद स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है। उनकी आँखों की ज्योति निराशा में आशा का गीत गुनगुनाती हुई सूर्य की किरण की तरह जगत का तमस दूर कर रही है और तब तक करती रहेगी जब तक सृष्टि रहेगी।
©गोलेन्द्र पटेल
{संपादक : गोलेन्द्र पटेल}नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
शिक्षक का स्वप्न : प्रो. प्रभाकर सिंह {बीएचयू}
शिक्षक का स्वप्न
{प्रो. प्रभाकर सिंह , हिन्दी विभाग, बीएचयू}
"मेरे लिए शिक्षक होने का स्वप्न है जो विद्यार्थियों को साहसी और संवादी बनाए। प्रतिरोध करने से पहले प्रेम करने का गुर सिखाए। किताब में दर्ज जिंदगी की पहचान करने की समझ तो पैदा करे पर उसके बाहर प्रकृति, कला, संगीत और ज्ञान की तमाम दुनियावी बातों को महसूस करने और समझने का सहूर पैदा कर सके। किसी बड़े मंजिल में पहुंचने की सीख भले ना दे पर मंजिल में आने वाले रास्ते में फैली जिंदगी को जिंदादिली से जी लेने की अदा विकसित करने में सहयोगी बने। विश्वविद्यालय के क्लासरूम और पुस्तकालय में बिखरे ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता को विकसित करने के साथ विश्वविद्यालय के परिसर के स्थापत्य, पेड़, पौधे, चिड़ियों ,दुकानों, आंदोलनधर्मी कोनों, संवादी अड्डों की पहचान करने का हुनर दे पाए जिससे विद्यार्थी शिक्षा और ज्ञान के ईन औजारों से समाज को खूबसूरत और लोकतांत्रिक बनाने के लिए व्यावहारिक रास्ते तलाश सके। एक शिक्षक किसी विद्यार्थी को कक्षा में अव्वल आने का पाठ भले न पढ़ा सके पर उसको कुछ मौलिक रचने की सृजनात्मक और वैचारिक संवेदना जरूर सिखा पाए जिसकी स्मृतियां उसे मुस्कुराने और कभी ना हारने का बहाना दे सकें।"
"बस कुछ ऐसा ही।"
प्रभाकर सिंह
प्रोफेसर ,हिंदी विभाग
काशी हिन्दू विश्व, वाराणसी
{संपादक : गोलेन्द्र पटेल}
नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
Saturday, 4 September 2021
शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल (बीएचयू)
शिष्य का शब्द : आत्मकथ्य //
वैसे आमतौर पर यही कहा जाता है कि पहला गुरु माँ होती है! लेकिन मेरी माँ कहती है। पहला गुरु भूख होती है। चलिये! मैं आप लोगों को कुछ समय के लिए अपने बचपन में ले चलता हूँ। गदहिया गोल से लेकर पहली कक्षा तक मैं पहाड़ी इलाके के एक प्राथमिक विद्यालय (घासीपुर-बसाढ़ी ,अधवारे ,मिर्जापुर) में शिक्षा ग्रहण किया हूँ। उस समय इस विद्यालय की एक विशेषता, यह थी कि इसका प्रत्येक विद्यार्थी दशरथ मांझी था। क्योंकि सभी के पास भूख थी। सभी सहपाठी पहाड़ों में गिट्टी फोड़ा करते थे। और कुछ मेरे सहपाठी आज भी पहाड़ों में काम रहे हैं। कुछ पत्थर प्लांट पर पत्थर चीर रहे हैं। मैं अक्सर इन लोगों से बातचीत करता रहता हूँ। मैं यहाँ उन सभी सहपाठियों के विषय में चर्चा न करके बल्कि एक ऐसे महात्मा सहपाठी का जिक्र करना चाहता हूँ जिन्होंने सर्वप्रथम अपने हिस्से की रोटी मुझे खाने को दिया है। और मेरी माँ बताती है कि उनकी माता ने मुझे अपना स्तन पान कराया है। बहरहाल, साधु स्वभाव के साथी थे। इसलिए मैं उन्हें महंत कहता था। परंतु वास्तविक नाम है इंद्रजीत सिंह। इनके गाँव के लोग इन्हें सुखु व सुखुआ नाम से संबोधित करते हैं। परंतु अब हमउम्र के लोग महंत ही कहते हैं। उम्र में मुझसे कम से कम डेढ़-दू साल बड़े हैं। इंद्रजीत पहाड़ों में काम करते हुए स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर लिए हैं। आगे की पढ़ाई इसलिए छूटी है कि हालात ने भयंकर लात मारी है। बातचीत के दौरान वे अक्सर कहते हैं कि हालात ठीक होने पर आगे की पढ़ाई जारी कर दूँगा। आप निश्चिंत रहिये।...आप से माफी चाहुँगा। आज मुझे तो अपने शिक्षकों को याद करना है और मैं अपने सहपाठियों को याद कर रहा हूँ।
अब आई दूसरी से तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई मैं अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय से ग्रहण किया हूँ। यहाँ के गुरुजनों में कोई खास बात नहीं थी। न ही इस विद्यालय से जुड़ी कोई दिलचस्प प्रसंग ही है। बस एक घटना याद आ रही है कि 26 जनवरी के कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी तभी कुछ लड़कियों ने मुझे अपना पहरेदार बना लिया था। वे सब मिलकर स्काउट गाइड का कमर बेल्ट चुराने के लिए मुझे दरवाजे पर खड़ा कर के करीब 20 बेल्ट गायब कर दीं। दो हप्ते तक सभी की धुलाई होती रही। इस पिटाई की वजह से लगभग एक दर्जन बेल्ट लड़कियों ने लौटाई। पर मुझे जो मिला था मैं तो उसी दिन प्राइवेट स्कूल के एक विद्यार्थी को बेच दिया था। लेकिन मैं बच गया क्योंकि वह बेल्ट उस गुरुजी के निगरानी में नहीं था। वह किसी और अत्यंत संवदेनशील शिक्षक के निगरानी में था जिनका केवल एक खोया था और वही मुझे मिला था पहरेदारी का पुरस्कार।
लेकिन गुरुजी मुझसे बहुत ही खफा थे। स्कूल से सटी एक पोखरी है। उन दिनों मेरे गाँव के विद्यालय में शौचालय नहीं था। शौच के लिए हम सब बाहर, यानी खेतों में और सड़कों पर जाते थे। एक दिन शौच के बहाने मैं और मेरे लंगोटी यार उसी पोखरी में बुल्ली-क-बुल्ला (यानी पानी के अंदर छुपा-छुपाई खेल) खेल रहे थे। बिल्कुल नग्न होकर। इस सुनहरा अवसर को आँसुओं में बदलने के लिए दूसरे गोल के एक विद्यार्थी ने हेड सर को खबर लगाई कि हम लोग मैदान के लिए नहीं बल्कि स्नान के लिए छुट्टी माँगे हैं। फिर क्या वहीं हुआ जो नहीं होना चाहिए था। सारा वस्त्र गुरुजी के हाथ में और हम लोगों बिल्कुल नंगा (निर्वस्त्र) मंदिर में लुका गये थे। हम सभी के गार्जियन आये और पिटाई हुई। फिर मैं तीसरी कक्षा के बाद एक प्राइवेट स्कूल में चला गया। मेरे गाँव में कई टोले हैं उसी में से चमरौटी टोला (हरिजन बस्ती) के एक प्राइवेट गुरुजी थे। उनका नाम राजेश है। पिताजी के मित्र थे। इसलिए मुझे अपने विद्यालय में पढ़ने के लिए ले गये। नाम लिखा गया। दो तीन महीने पढ़ाई हुई फिर स्कूल ही बंद हो गया। सब विद्यार्थी भिन्न भिन्न स्कूलों में नाम लिखवा लिए। कुछ दिन बाद प्राथमिक विद्यालय ऐकौनी (नियमताबाद, चंदौली) मेरे घर से करीब तीन-साढ़े तीन किमी. दूरी पर है। इसी स्कूल के चौथी कक्षा में मेरा दाखिल हुआ। वहाँ मुझे तीन गुरुजन मिलें। मनोज सर , ओझा सर और अजय सर से क्रमशः अंग्रेजी-विज्ञान ,हिंदी और गणित हम पढ़ाते थे। हमारा परिवेश और अन्य विषयों को भी तीनों लोग पारी पारा पढ़ाते थे।
मैं इनके टेस्ट में प्रथम आता था इसलिए वे मुझे मानते थे। कुछ खाने पीने को भी कभी कभी देते थे। लड़कियों का टोली या लड़कों का टोली जब कुकिंग (खाना वगैरह बनाते थे) करते थे तो गुरुजन मुझे भी शिक्षक की तरह बैठा देते थे। मैं खुद को कभी क्लास का मनीटर नहीं समझता था। क्योंकि दूसरे पोजीशन से लेकर चौथे पोजीशन तक मेरे लंगोटी यार ही थे। यहाँ एक प्रसंग मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकत्था की याद आ रही है कि उनसे उनके गुरुजन झाडू लगवाते थे और पानी छिड़कवाते थे। खैर, मेरे जीवन में भी ऐसा हुआ है। मैं भी झाडू लगाया हूँ और पानी छिड़का हूँ।
छठवीं कक्षा के लिए मैं अपने पोस्ट के पूर्व माध्यमिक विद्यालय महदेवाँ (साहुपुरी, चंदौली) में दाखिला लिया। वहाँ कोई खास गुरु नहीं थे। सब खबुआहा थे। एक मैम थी खेत्री मिश्रा। वे दिन भर रसोइयाँ झाँकती रहती थीं। यहाँ का खाना (यानी दोपहर का भोजन) सब जगह से अच्छा था। पर पढ़ाई सबसे घटिया। मैं और मेरे मित्र दोपहर को भागकर, बावन बिगहवा में फुटबॉल खेला करते थे। चमकिल्ला में हम लोग कॉपी-किताब-कलम लेकर जाया करते थे। इसलिए भागने में आसानी भी होती थी। इसी बीच पूर्व माध्यमिक विद्यालय ऐकौनी (नियमताबाद, चंदौली) में दो नये अध्यापक आयें। क्रमशः राम अवध यादव और मुमताज अहमद। इन गुरुओं ने मेरी खोजी की। मेरे मित्रों से मुझे संदेशा भेजवायें कि वे मुझसे मिलना चाहते हैं। फिर क्या इसी का लाभ उठाते हुए। मैं महदेवाँ छोड़ दिया। महदेवाँ के हेड सर से कहा था कि गुरुजी मेरे माता पिता नानी के यहाँ जा रहे हैं मैं वहीं पढ़ूँगा। नाक-नूँक करते हुए उन्होंने एक दिन जुलाई में टीस काट दी। मैं ऐकौनी सातवीं कक्षा में एडमिशन ले लिया। पढ़ाई-लिखाई अच्छे से चलने लगी। एक दिन किसी काम से हेड सर ऐकौनी आये हुए थे और मैं ऑफिस में जा पहुंचा। देखते ही सर ने कहा कि क्या गोलेन्द्र इधर ही तुम्हारा ननिआउर है। मैं झूठ बोल दिया कि हाँ।
मुमताज सर और राम अवध सर कभी कभी टेस्ट लेते थे और पुरस्कृत करते थे। इनके पुरस्कारों को पाने में मैं गुरुवर विकास चौहान (एम.ए.पास एक मजदूर पर मेरे गुरु) का सहायता लेता था। वे अक्सर सुबह पाँच बजे मुझे अपने पास बुला लेते थे। और मेरा मार्गदर्शन करते थे। जो भी सवाल होता था उसका उत्तर अति सहजता से देते थे। शिघ्र ही समझ में आ जाता था क्योंकि मैं मजदूर का भाषा जानता हूँ। यह मेरे डीएनए में ही है। मैं नरेगा/मनरेगा वगैरह में काम करता था। वे यह बात जानते थे। उनके साथ भी मजदूरी किया हूँ। तब तक मैं कवि के रूप में आस पास के गाँवों में प्रसिद्ध हो चुका था। विकास सर के साथ गीत वगैरह भी लिखा। इसी दौर में भोजपुरी के कई दिग्गज कलाकारों से मेरा परिचय हुआ। पर वे जैसा गाना/गीत मुझसे लिखवाना चाहते थे। मेरी आत्मा को मंजूर नहीं था। वैसा लिखने के लिए। पर हालात कुछ ऐसी थी कि मैंने लिखा।
आठवीं के बाद मैं रामनगर के सरकारी कॉलेज यानी प्रभु नारायण राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ना चाहता था। जो घर से लगभग दस किमी. दूरी पर है। इसके लिए मुझे एक साइकिल की जरुरत थी। पैसा तो मेरे पास था नहीं। फिर सहपाठी साथियों के साथ लेबरई (यानी मकान का काम) किया। लेबर मंडी में हम सब खड़े थे। वहाँ से सब इधर-उधर, कहीं और चले गए। मैं बस हल्का काम चाहता था क्योंकि उस समय तो मुझे यह भी नहीं पता था कि क-एक-क मलासा बनता है जुड़ाई या ढ़लाई के लिए। बहरहाल, दस बजे के आपपास एक रिटायर्ड कर्नल आये। और पूछा कि छूटू मेरे यहाँ काम करोगे? उत्तर में मैंने प्रश्न किया 'सर' काम क्या है? उन्होंने आश्चर्य से मेरे ओर ताका जैसे मैं उनसे कोई बहुत ही जटिल प्रश्न किया हूँ। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। उन्होंने कहा कि बाबू अब तक सब लेबर 'चाचा' वगैरह से मुझे संबोधित किये हैं पर तुम 'सर'। मुझे नहीं लगता है कि तुम मजदूर हो। तब मैंने कहा कि सर! 'मैं कलम का मजदूर नहीं बल्कि कमल के लिए मजदूर हूँ। फिलहाल एक विद्यार्थी हूँ। और लेबरई का मुझे कोई अनुभव नहीं है। नरेगा/मनरेगा से भली भांति परिचित हूँ।' उनसे कुछ ऐसा ही कहा था। 17 दिन उनके यहाँ काम किया। संयोग से वे भी पटेल थे। मकान का डिजाइन किया जा रहा था। मिस्त्री भी पटेल थे और वे भी बनारस के ही थे। एक लेबर और थे जो गाजीपुर के थे और यादव थे। उन्हीं से मैं अपने हिस्से का भारी काम करता था। वैसे , दिन भर में मिस्त्री दादा 51 ईंटें ही जोड़ते थे। बस, सुबह में थोड़ा कठिन काम होता था। लेबरई आखिर लेबरई ही है। जब जादा भारी काम आया तो मैं धीरे से निकल लिया। तब तक काम भर पैसे हो चुके थे।
फिर मैं एक साइकिल खरीदा। उसके बाद रामनगर के राजकीय कॉलेज में एडमिशन लिया। वहाँ मैं चार साल पढ़ा। इस कॉलेज का कोई भी अध्यापक मुझे प्रभावित नहीं किया। हाँ, फिजिक्स जब फँसता था तो गंगा सर से पूछ लेता था तो वे बता देते थे। इसी क्रम में में इंद्रजीत सर और आर.पी. सर से हिन्दी , डॉ. कृपानाथ यादव सर से अंग्रेजी और फिरोज सर से कमेस्ट्री। और अन्य अध्यापकों ने भी कभी कभी मेरी कक्षाएं ली। यहाँ विद्यार्थीगण फेल बहुत जादा होते थे। इसलिए मैं गुरुवर विनोद पटेल सर (सैदपुर, साहुपुरी के निवासी) से सहायता ली। विनोद सर गणित और फिजिक्स पढ़ते हैं। वैसे हैं तो प्राइमरी के शिक्षक। ज्ञान इतना है कि इनसे पढ़कर कोई भी विद्यार्थी आई.आई.टी. आसानी से क्लियर कर सकता है। मुझे तो इनसे बहुत ही कम पढ़ने का अवसर मिला है। बहुत सारे बीटेक की परीक्षाओं को इन्हीं के आशीर्वाद से क्वालिफाई किया हूँ। वैसे विनोद सर दिलेर मनुष्य हैं। बस एक दोष यह है कि कभी भी टाइम पर नहीं आते थे। इनका मार्गदर्शन पाने का अर्थ है आपके पास धैर्य है। आप इंतजार करने में सक्षम हैं। बहुत इंतजार करवाते हैं। इन्हीं के एक मित्र हैं कल्लू गुरुजी। वे भी ऐसे ही हैं। सहज सरल हसमुख प्रकृति के धनी व्यक्ति।
इतना कुछ आप लोगों को बता दिया। अब मैं बीएचयू के गुरुजन की ओर बढ़ रहा हूँ। इस यूनिवर्सिटी में मेरा एडमिशन एक अजीब घटना है। मैं बीटेक, बीएससी, बीए की परीक्षाएं दिया था। सभी में क्वालीफाई हुआ था। बीएचयू में भी हो गया था। अब चिंता यह थी कि मैं क्या पढूं? मैं साइंस वर्ग का विद्यार्थी था। तो साइंस लेने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। पर मैंने महसूस किया कि सांइस में नहीं बल्कि साहित्य में मेरी रुचि है वास्तव में। साइंस तो समाज की वजह से जबरी पढ़ रहा हूँ। क्योंकि हाईस्कूल के अधिकतर टॉपर समाज के भय से साइंस ले लेते हैं। उस वक्ता वे अपना नहीं, दूसरों का सुनते हैं। खैर, अंतिम तिथि 31 जुलाई को मैं एडमिशन ले लिया। मेरा फिस विकास साइबर रामनगर से जमा किया गया था।
जैसा कि आप सभी कल के पोस्ट द्वारा यह बात जाने गये हैं कि मेरी पहली मार्गदर्शिका डॉ. शिल्पा सिंह मैम हैं। जिनसे मुझे मूलरामायण पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अब तक जितनी शिक्षिकाओं ने मुझे पढ़ाया है उसमें सबसे अधिक शिल्पा मैम ने मेरी कक्षाएँ ली हैं। और इस शिक्षक दिवस पर मेरी यही कामना है कि आगे भी शिल्पा मैम की तरह मार्गदर्शिकाएँ मुझे मिलें। बीएचयू में तमाम शिक्षक हैं पर गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल सर और गुरुवर सदानंद शाही सर बहुत ही जादा मुझे प्रभावित किये हैं। इन दोनों गुरुओ से मुझे साहित्यिक संस्कार प्राप्त हुआ है। इन गुरुओ पर यदि बातचीत करने लगूंगा तो दिन बीत जाएगा। बहरहाल, बस यह जान लीजिए कि "सद्गुरु के मुख का शब्द अनमोल/जो देता है लक्ष्य के द्वार को खोल।" साथियों! इसी क्रम में बतौर शिक्षक सुभाष राय सर भी मेरे लिए एक गुरु हैं। ठीक है। परीक्षा के बाद अपने शेष मार्गदर्शकों के विषय में चर्चा करूँगा। और उसी समय मैं आप लोगों को गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल सर और गुरुवर सदानंद शाही सर के विषय में विस्तार से सुनाउंगा। आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!
©गोलेन्द्र पटेल
{संपादक : गोलेन्द्र पटेल}नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
नोट :- मैं इस संस्मरण को पुनः संशोधित कर के प्रस्तुत करूंगा।
Wednesday, 25 August 2021
उपजीव्य कवि श्रीप्रकाश शुक्ल : गोलेन्द्र पटेल || संदर्भ के रचनाकार
कविताएँ :-
1).
बुरा एक सपना देखा
रात बुरा एक सपना देखा
सूखी नदी के घाट को देखा
पाट सटी टूटी नाव को देखा
तिथिहीन पतवार को देखा
नाविक के अंत:घाव को देखा
रात बुरा-बुरा एक सपना देखा
सूखी नदी को सड़क बनते देखा
सरपट भगती मोटर कार को देखा
घाट को बस-स्टॉप में बदलते देखा
पतवार को खाक़ी लिबास होते देखा
नाविक को बस-ड्राइवर बनते देखा
बुरा स्वप्न बनारस में साकार देखा
असि-अस्थियों की सड़क को देखा
नदी के रक्त-कणों को धूल उड़ते देखा
'रेत में आकृतियाँ' की हर उकेर को देखा
श्रीप्रकाश शुक्ल की आँखों में मर्म को देखा
कि असि* को अस्सी घाट उतरते न देखा !
( असि एक विलुप्त नदी है। बनारस में गंगा में मिलती थी। असि के नाम से ही अस्सी घाट है)
©वसंत सकरगाए
10/04/2021
2).
बाढ़ में कवि
लड़कपन से बच गए
जवानी के सैलाब तक में ना फँसे
पर दो हजार सोलह की बाढ़ में
आखिर फँस ही गए
कवि श्रीप्रकाश शुक्ल
हतप्रभ हैं लोग
जो कभी किसी रमणी में न फँसा
दमड़ी में ना फँसा
आखिर वो बाढ़ में कैसे फँस गया?
बाढ़ में बवाल काटते
जनवादी कवि शशिधर से
इस बाबत जब पूछा गया
तो भुजा उठाकर कहा उन्होंने -
'असंभव है कवि का बाढ़ में फँस जाना
भगवा अफवाह है ये
उनका अगल-बगल
अड़ोस-पड़ोस
आकाश-पाताल
सब बाढ़ में डूब सकता है
पर वे नहीं
उनका घर नहीं
क्योंकि नहीं है उनकी कविता में सूखा
ना ही वह किसी गीलेपन के खिलाफ ही है
और फिर नामवर की जिस धरती पर वे रहते हैं
वहाँ बाढ़ का पानी
वो भी गंगा का
भला क्या बहाने और भिगोने जाएगा भाई?'
कहना उनका यह भी
कि पक्की कारपोरेट साजिश है यह
क्योंकि जो आज तक किसी भी
जल-जाल से बचा और बचता रहा
भला बाढ़ में उसका फँसना क्या!
और बचना क्या!
जो भी हो
पर कविता में सच यही है
कि धीरे-धीरे प्यारे कवि
बहुत प्यारे कवि
बाढ़ में फँसते गए
बढ़ती गंगा का पानी
उनकी ओर
कांग्रेसी राजनीति की तरह बढ़ा
सबसे पहले उनके दुआर को चपेटा
फिर चौहद्दी को
फिर दलान से घुसते हुए वहाँ पहुँचा
जहाँ मेज पर फैली उनकी कविता थी
और फिर उसी की ऊँचाई पर
अपनी संपूर्ण गहराई के साथ ठहर गया
किंतु बाढ़ के पानी से
सिमटते-सिमटते वे
भागे नहीं
रोए नहीं
हाथ नहीं जोड़ा
मंत्र नहीं पढ़ा
कोई अनुष्ठान नहीं किया
पीछे नहीं गए
बल्कि ऊपर
और ऊपर चढ़ते गए
और मेरी पुख्ता जानकारी में
फिलहाल ओरहन का वह कवि
ठीक इसी बाढ़ की आँच पर
एक काली धामिन की चकाडुब्ब सुनते
घर के ऊपरी आसमान में रहता है
इधर शहर में उनको लेकर कई कयास हैं
कोई कहता है कि वे बाढ़ में डूब गए
कोई यह कि अच्छा हो कि डूब ही जाएँ
कोई यह कि बह कर कहीं और चले जाएँ
कोई यह कि आखिर जरूरत क्या है
इस शहर को
रेत और पानी के कवि की
खर-पतवार से अधिक वह भला है ही क्या?
कोई-कोई तो यह भी कहते सुना गया है
कि अच्छा होता की बाढ़ हुमचकर
उनके ऊपर सदा-सर्वदा चढ़ी रहती
लोग तो अब खुलकर यह भी कहने लगे हैं
कि काश! इसी बाढ़ में
कब्र बन जाए इन मरगिल्ले हिंदी कवियों की
क्योंकि इन्ही ससुरों की वजह से
काशी नहीं बन पा रहा है क्योटो
दिल्ली की लाख कोशिशों के बावजूद
उधर गंगा के पानियों के बीच
घुप्प अँधेरे में बैठे कवि
फिलहाल मोबाइल की रोशनी में
अखबार पढ़ते हैं
ताजा खबर यह है
कि गंगा को अजीर्ण हो गया है
इसीलिए यह बाढ़ आई है
और अब बार-बार आएगी
यह पढ़ कवि का माथा गरम हो उठता है
आवेश में वे छत पर चढ़ आते हैं
और जोर-जोर से
न जाने किसको
ओरहन देते हैं
कि अजीर्ण, गंगा को नहीं
ज्ञान को हो गया है
सरकार को हो गया है
विद्वान को हो गया है
बवाल काटने वाले
केंद्रोन्मुखी भौकाल
अजीर्णता को भला क्या जाने
क्या समझें
जानता समझता और सहता
तो केवल कवि है
ज्ञान को
विद्वान को
सत्ता को
और पतितपावनी गंगा की बाढ़ को भी
बस वही जानता है
वही सहता है
और फिर सिरजता भी तो वह ही है
भले ही चाहे खुद फँसा
या फँसा दिया गया हो
बाढ़ में एक कवि!
3).
वापसी
धाराएं लौट रही है नदी में
जैसे लौटती है रौनक बस्ती में
प्रवासी से पथिक बन
गुरूश्रेष्ठ भी लौट रहें हैं
सूने गेह में जालाने को दीपक
दीपक जलने से पहले
आ चुकी है बिजली
और जा चुकी है
निर्जन में घुली काली रात
बाढ़ का जाते ही
काफी जद्दोजहद यानी
चंदा-चुटकी , घुस -पेच के बाद
सबसे पहले आती है लाइट
जिससे घरों में ऑक्सीजन पहुंचता है
क्योंकि कॉलोनी के घरों में
लाइट मतलब लाइफलाइन है
रास्ते पर केवल कीचड़ है
कमल की उम्मीद तक नहीं है
हां एक केवट है
जो स्नेहोपहार को संजो रहा है
जैसे संजो कर रहा था भुभुक्षु
अक्सर सावन बीतते बीतते
बनारस में आ जाती है बाढ़
जैसे शिव स्वयं गंगा को विदा कराने
आ जाते हैं काशी के घरों में
बनारस में बाढ़
शिव - शक्ति का संगम है,
सहवास है ,और प्रवास है
वे बखूबी समझेंगे
जिनका नदी क्षेत्र में निवास है
©दीपक आर्यपुत्र ( मुसाफ़िर )
4).
(कविवर एवं आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल सर को समर्पित कविता)
'रेत में आकृतियों' को
मिटा रही है बाढ़ ।
कठिन समय में
धैर्य की परीक्षा देते हुए
'एक जोड़ा दुख' के साथ भी
मुस्कुराता है कवि
वह जानता है दुख का स्वाद ।
बाढ़ का आना कवि के लिए
महज सूचना नहीं है ।
खतरे की घंटी है,
विस्थापन के दर्द का उभरना है ,
पुनः एक बार ।
न जाने कितने बाढ़ो का भुक्तभोगी रहा है कवि ।
कविता में लिखता रहा है इसका इतिहास |
वह जानता है कि -
बाढ़ महज प्राकृतिक आपदा नहीं,
राजनीतिक षड्यंत्र भी है ।
कवि देखता है,
रैदास के बेगमपुरा में ,
बाढ़ का ग़म पसर चुका है ।
©प्रतिभा श्री
नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
Monday, 23 August 2021
बाढ़-दर्शन की कविताओं पर आत्मकथ्य : गोलेन्द्र पटेल
नाम : गोलेन्द्र पटेल
{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}
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