Friday, 15 October 2021

"श्रीप्रकाश शुक्ल : कविता का समुज्ज्वल पक्ष और कोरोजीविता" :: गोलेन्द्र पटेल

कविता का समुज्ज्वल पक्ष और कोरोजीविता// गोलेन्द्र पटेल



इकीसवीं सदी की त्रासदी की तान का जन्म कोई आकास्मिक घटना नहीं है बल्कि इसका बीज महामारियों के ऐतिहासिक जमीन में कई सदी पूर्व ही अंकुरित हो चुका था पर वह पल्लवित और पुष्पित नहीं हुआ और यह जन्म के ज्वर को सहन न कर सकने की वजह से शीघ्र ही महामारी की मिट्टी में मुँह के बगल लम्बे समय के लिए सो जाती थी पर सर्जनात्मकता की सृष्टि में संवेदना की शीतलता व उष्णता, अनुभूति की आर्द्रता और सर्जक की छींक से कभी-कभी कुछ समय के लिए जग जाती थी। कोरोनाकाल में इसी तान की तरंग कविता की ताकत बनकर संसार में गूँज रही है और यही ताकत जिन कविताओं में पायी जा रही है उसे आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल 'कोरोतान' के अंतर्गत रखते हुए, सुतर्क की कसौटी पर 'कोरोजीवी कविता' की सैद्धांतिकी निर्मित कर रहे हैं। जिसका हिन्दी जगत ही नहीं बल्कि गैर हिन्दी जगत भी खुलकर स्वागत कर रहा है। 


आगे आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल इस कोरोजयी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि "इस कोरोजीवी कविता का महत्व इस कारण से नहीं है कि यह महामारी के बावजूद लिखी जा रही है जिसमें युगबोध की उपस्थिति तो है ही, साथ ही साथ इतिहासबोध की नयी अंतर्दृष्टि भी है।" इस संदर्भ में 'क्षीरसागर में नींद' संग्रह की कविता "संभवतः" की निम्नलिखित पंक्तियों को देखिये :-

"जब-जब इतिहास को नये तथ्यों की जरूरत महसूस हुई है/

यह सम्भवतः ही है जिसने सम्भव किया है/

मनुष्य के लिए एक नया इतिहास!" ('क्षीरसागर में नींद' / 31)


तो आइए, अब हम सब मिलकर महामारी से पूर्व गुरुदेव की दृष्टि पर अपनी पैनी दृष्टि डालते हैं और एकटक देखते हैं उनकी कविताओं को, कि कैसे वे अपनी कविताओं में भावी त्रासदी को दर्ज करते हुए नज़र आ रहे हैं। 


"घर में कितने ही वायरस का प्रवेश है" ('बोली बात' / 80)

"उनके घर में बच्चा उनका कितना बीमार है/

पत्नी उसकी इस बीमारी पर अपनी बीमारी कितना भूल चुकी है/

इससे कुछ भी लेना-देना नहीं है उन्हें" (('बोली बात' / 96)

"यह मित्रताओं के टूटने का समय है'/.../ 

'तब कमरे में बिखरे अखबारों के बीच/ 

गिरे किसी लिफाफे के वजूद की तरह/ 

टूटेगी हमारी मित्रता'/.../ 

'तब हमारी मित्रता के टूटने के दिन होंगे" ('बोली बात' / 14)


"महाश्मशान की लपटों में कितनी आर्द्रता है" ('बोली बात' / 112)


"बाढ़ आए

बादल फटे

सूखा पड़े

फसल सूखे

किसान मर जाएँ

महामारी घर कर जाए" ('क्षीरसागर में नींद' / 77)


मास्क , फेसशील्ड , सोशल टिस्टेंशिंग, स्प्रेडर, सुप्ररस्प्रेडर , क्वारंटाइन, सेनेटाइजर , लॉक डाउन, फ्रंटलाइन वारियर ,  होम डिलेवरी , वर्क फ्राम होम , ऑनलाइन क्लासेज ,ऑक्सीजन, वेबिनार, शव, श्मशान, कबरिस्तान, मेडिकल व दवाओं का नाम आदि शब्दों के प्रयोग करने से कोई कविता 'कोरोजीवी कविता' नहीं होती है बल्कि इन सबके बजाय उसमें कोरोजीविता का तत्व होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि यह तत्व कोरोनाकाल से पहले की कविताओं में मौजूद नहीं है। जो भी कोरोजयी कवि है यह तत्व उनके यहाँ पहले से ही मौजूद है। जिसका जीता जागता उदाहरण स्वयं सिद्धांतकार श्रीप्रकाश शुक्ल हैं। यदि आपको कोरोजीविता के तत्वों को बारिकी से समझना है तो आप सिद्धांतकार के साथ-साथ आचार्य अरुण होता एवं युवा आलोचक अनिल कुमार पाण्डेय के लेखों को पढ़ सकते हैं। 


एक ओर कोरोजीवी कविता समय की शहनाई का स्वर है तो दूसरी ओर ढोलक की धधकती ध्वनि है और जहाँ परिवेशगत संलग्नता में सभ्यता व संस्कृति का संगीतात्मक समन्वय इसकी विशेषता का चरम विकास है। जो पूर्ववर्ती काव्यपरंपरा में छायावाद से अधिक विकसित है, छायावादी कवियों के यहाँ भी दुःख है पर यह उनका स्थाई भाव नहीं। जो है कि हम कोरोजयी कवियों के यहाँ इसे देख रहे हैं। अतः प्रकृति की सूक्ष्म चेतना का परम प्रसार ही बुद्धि के विस्तार का समुज्ज्वलतम पक्ष है जिसका आधार मानवीय जिजिविषा है। हम कह सकते हैं कि कोरोजीवी कविता साहसपूर्ण आनंद की अनुभूति की अभिव्यक्ति है और इसके सर्जक निराशा में निराकरण कवि हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि जब संवेदना संक्रमित हो रही हो, तब कविता में केवल उत्साहधर्मिता, कविता की प्रकृति को क्षति पहुँचाती है। जिसे कोरोजयी सर्जक अपने-अपने भूगोल व वय के अनुसार शक्ति में परिवर्तित करते हुए नज़र आ रहे हैं और यही इनकी कविता की ताकत भी है जो जड़ता को जड़ से उखाड़ने के बजाय पहले उसकी शाखाओं को, फिर तने को, फिर जड़ को क्रमशः काट रही है। यानी यह लोकधर्मिता के संस्कार से उपजी उम्मीद की कविता है और इसकी पहचान ही इसकी गतिशीलता है। 


कुछ हैं जो कुछ करते तो नहीं है पर यहाँ-वहाँ इनसे-उनसे शिकायत करते रहते हैं और वे अपनी ऊर्जा का उपयोग उगाने में नहीं, बल्कि उगे हुए को नष्ट करने में लगाते हैं ताकि इतिहास उन्हें भी याद रखे। जैसा कि आप कोरोनाकाल में ही नहीं, बल्कि हर संकट के समय में उन्हें देखते हैं।


आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल की एक कविता है 'शिकायत'। जो इसी विडंबना को दर्ज करनेवाली सजीव दहकती हुई लपट की तरह है, जो कोरोनाकाल से बहुत पहले लिखी गयी थी। जिसकी आँच उन्हें एकबार में सुधारने में सक्षम है। जिसकी निम्नलिखित पंक्तियों के जरिये, आप समझ सकते हैं। वे लिखते हैं कि 

"मुझे शिकायत है उन बहुत सारे लोगों से/

सारा जीवन करते रहे शिकायत जो/

कभी स्वयं से/

कभी समाज से" ('बोली बात' / 28)


पहली लहर से लेकर दूसरी लहर तक 'लौटना' नामक खतरनाक क्रिया की दहशत से हम सभी लोग भली-भाँति परिचित हैं और यह क्रिया हर रचनाकार के यहाँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मौजूद है। जो मजदूर शहरों में कई वर्षों से रह रहे थे। कुछ के तो अपने निजी घर थे पर वे भी अपनी पुस्तैनी घर लौट रहे थे। लौटने की प्रक्रिया में छूटने का जो दुःख होता है। उसे एक कोरोजयी कवि कोविडकाल से पहले कैसे महसुस कर कर अपनी कविता में ढ़ालता है यह काबिल तारीफ है। गुरुवर लिखते हैं कि "जिस मकान में हम वर्षों से रह रहे थे/

जब उसके छूटने की बारी आई/

तब बिदा होती बेटी की तरह/

हमारे भीतर कुछ टूट रहा था" ('बोली बात' / 25)


इसकी परिधि पर नहीं बल्कि केंद्र में स्पर्श की स्पर्धा है। जो एक तरह की मनोवैज्ञानिक भूमि का निर्माण करती है। जिसकी मिट्टी मानवता की मिट्टी की तरह उपजाऊ है। इसके बीज 'श्रम', 'संघर्ष', एवं 'प्रयत्न' आदि होने के कारण केवल उग ही नहीं रहे हैं बल्कि विमर्श का विशाल वृक्ष उन 'भूखे', 'थके', 'हारे' आदि लोगों के लिए बन रहे हैं। जो इसके 'फल','फूल' एवं 'छाया' आदि के अधिकारी हैं। इस संबंध में आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि "यह जो कोरोजीवी कविता है, प्रतिभा से अधिक, श्रम के महत्व की शिनाख्त करने वाली कविता है।" अर्थात् इसमें श्रम का सौंदर्य और संवेग की सुगंध दोनों एक साथ मौजूद हैं। अतः हम कह सकते हैं कि 'कोरोजीवी कविता' केवल कहने वाली ही नहीं है बल्कि करने वाली भी है।


सभ्यता व संस्कृति के समन्वय का संगीतात्मक रस, राजनीति का द्वंद्वात्मक राग तथा अनुभूति के अनुराग से लबालब भरी है 'कोरोजीवी कविता'। यदि हम जिज्ञासा की भाषा में कहें तो यह कह सकते हैं कि चेतना की चित्रात्मक अभिव्यक्ति ही संकट के समय में सर्जक का मूल स्वर होता है। अतः यह चुनौतियों के विरुद्ध चमक की कविता है। जहाँ उम्मीद की उजाला स्थाई है और वहीं पर 'कोरोजयी कवि' क्रमशः 'लोकधर्मी', 'क्रांतिधर्मी' एवं 'युगधर्मी' के रूप में उपस्थित है। जिसकी मानवीय संवेदना भय की भूमि में हताश, उदास, निराश, दीन-दुखी एवं असहाय मनुष्य के भीतर उम्मीद, उजास, आशा, सम्भावना,एवं जिजीविषा को जन्म देने वाली है। जब-जब मनुष्यता पर आफ़त आयी है कला, साहित्य एवं संस्कृति के शुभचिंतकों ने अपनी अहम भूमिका निभाये हैं। रचनात्मकता का रूप निखरा है और संवेदनशीलता का स्वरूप सार्थकता के साँचे में ढला है। अर्थात् समाज में सृजनात्मक सजगता बढ़ी है।


तीसरी लहर के दौरान महामारी के महासागर में शवों को तैरते हुए तथा श्मशान में चिता के लिए कम पड़ी लकड़ी का दर्दनाक दृश्य को हमने अपनी आँखों से देखा है। दिल और दिमाग को झकझोरने वाले अनेक दृश्य आज भी हमारी पुतलियों में कैद हैं। ट्रेन के पटरियों पर बिखरी लाशों का चित्र हो या प्लेटफार्म पर मृत पड़ी माँ से चिपके शिशु की संवेदना का साक्षात्कार हो या फिर बाढ़ में डूबी दुनिया का दर्शन हो। ये सभी तस्वीरें सत्ता की क्रूरता से कुश्ती करने के लिए उद्धत हैं। जो शब्दों के चित्रों का सामर्थ्य है और कोरोजयी कवि की कालजयी कला भी। महामारी से पूर्व इस भयावह भविष्य का दर्शन करने वाले आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल लिखते हैं कि

"इस सभा में शव के लिए प्रार्थनाएँ की गयीं/.../

ठीक जैसे किसी लेखक की गम्भीर बीमारी में उसके बारे में पुराने पन्ने पलटे जाते हैं/

कि न जाने श्रदांजलि के दो शब्द बोलने का प्रस्ताव कब आ जाय!" ('क्षीरसागर में नींद' / 81)


इस महामारी के मुख में हिंदी के कवि मंगलेश डबराल से लेकर उर्दू के शायर डॉ. राहत इंदौरी तक अनेक साहित्य साधक समा गये हैं। सुबह-सुबह सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि का सुमन समर्पित करना, ऐसा लग रहा था मानो दुःख के दिन सूर्य को अर्घ्य देना है। 


ऐसे में कवि की आत्मा अत्यंत दुखी थी और आँखों में था आँसू का समुद्र। फिर भी वह 'आपदा को अवसर' के रूप न देखकर, बल्कि मन की नवीन दृष्टि से उसे 'कोरोना में क्रियेशन' के रूप देख रहा था तथा महामारियों का मूल्यांकन करते हुए नये सूत्रों के संदर्भों की तलाश कर रहा था। दरअसल, यह तलाशने की प्रक्रिया इस त्रासदी से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी। जिसकी उपज है 'कोरोजीवी कविता' का सिद्धांत। कुछ गिनेचुने हैं जो बिना विचारे ही विरोध की लाठी लेकर निकल पड़े हैं तो उनके लिए आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल की निम्नलिखित पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-

"जिसके साथ ठीक से हुआ नहीं जा सकता/

उसके विरोध में कुछ कहा नहीं जा सकता/.../

विरोध की ठीक-ठीक उपस्थिति का इतिहास/

समर्पण के बार-बार अपमानित होने का इतिहास है" ('क्षीरसागर में नींद' / 15)


■■★■■ संक्षिप्त परिचय :-


नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम : गोलेंद्र ज्ञान

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) , बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी

विधा : कविता, कहानी व निबंध।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल

काव्यगुरु : श्रीप्रकाश शुक्ल

मार्गदर्शक : सदानंद शाही, सुभाष राय, मदन कश्यप, स्वप्निल श्रीवास्तव, जितेंद्र श्रीवास्तव, अरुण होता, कमलेश वर्मा, वसंत सकरगाए, शैलेंद्र शांत, गिरीश पंंकज , विन्ध्याचल यादव एवं अन्य।


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


प्रसारण : राजस्थानी रेडियो, द लल्लनटॉप , वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : मैं भोजपुरी अध्ययन केंद्र (बीएचयू) में तीन-चार बार अपनी कविताओं का पाठ किया हूँ और 'क कला दीर्घा' से 'साखी' के फेसबुक पेज़ पर दो बार लाइव कविता पाठ। अनेक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठी में।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" और अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र।


संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


कविता का समुज्ज्वल पक्ष और कोरोजीविता (केंद्र में आ. श्रीप्रकाश शुक्ल) : गोलेन्द्र पटेल || भाग-दो

 

2. कविता का समुज्ज्वल पक्ष और कोरोजीविता//

इसकी परिधि पर नहीं बल्कि केंद्र में स्पर्श की स्पर्धा है। जो एक तरह की मनोवैज्ञानिक भूमि का निर्माण करती है। जिसकी मिट्टी मानवता की मिट्टी की तरह उपजाऊ है। इसके बीज 'श्रम', 'संघर्ष', एवं 'प्रयत्न' आदि होने के कारण केवल उग ही नहीं रहे हैं बल्कि विमर्श का विशाल वृक्ष उन 'भूखे', 'थके', 'हारे' आदि लोगों के लिए बन रहे हैं। जो इसके 'फल','फूल' एवं 'छाया' आदि के अधिकारी हैं। इस संबंध में आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि "यह जो कोरोजीवी कविता है, प्रतिभा से अधिक, श्रम के महत्व की शिनाख्त करने वाली कविता है।" अर्थात् इसमें श्रम का सौंदर्य और संवेग की सुगंध दोनों एक साथ मौजूद हैं। अतः हम कह सकते हैं कि 'कोरोजीवी कविता' केवल कहने वाली ही नहीं है बल्कि करने वाली भी है।

सभ्यता व संस्कृति के समन्वय का संगीतात्मक रस, राजनीति का द्वंद्वात्मक राग तथा अनुभूति के अनुराग से लबालब भरी है 'कोरोजीवी कविता'। यदि हम जिज्ञासा की भाषा में कहें तो यह कह सकते हैं कि चेतना की चित्रात्मक अभिव्यक्ति ही संकट के समय में सर्जक का मूल स्वर होता है। अतः यह चुनौतियों के विरुद्ध चमक की कविता है। जहाँ उम्मीद की उजाला स्थाई है और वहीं पर 'कोरोजयी कवि' क्रमशः 'लोकधर्मी', 'क्रांतिधर्मी' एवं 'युगधर्मी' के रूप में उपस्थित है। जिसकी मानवीय संवेदना भय की भूमि में हताश, उदास, निराश, दीन-दुखी एवं असहाय मनुष्य के भीतर उम्मीद, उजास, आशा, सम्भावना,एवं जिजीविषा को जन्म देने वाली है। जब-जब मनुष्यता पर आफ़त आयी है कला, साहित्य एवं संस्कृति के शुभचिंतकों ने अपनी अहम भूमिका निभाये हैं। रचनात्मकता का रूप निखरा है और संवेदनशीलता का स्वरूप सार्थकता के साँचे में ढला है। अर्थात् समाज में सृजनात्मक सजगता बढ़ी है।


तीसरी लहर के दौरान महामारी के महासागर में शवों को तैरते हुए तथा श्मशान में चिता के लिए कम पड़ी लकड़ी का दर्दनाक दृश्य को हमने अपनी आँखों से देखा है। दिल और दिमाग को झकझोरने वाले अनेक दृश्य आज भी हमारी पुतलियों में कैद हैं। ट्रेन के पटरियों पर बिखरी लाशों का चित्र हो या प्लेटफार्म पर मृत पड़ी माँ से चिपके शिशु की संवेदना का साक्षात्कार हो या फिर बाढ़ में डूबी दुनिया का दर्शन हो। ये सभी तस्वीरें सत्ता की क्रूरता से कुश्ती करने के लिए उद्धत हैं। जो शब्दों के चित्रों का सामर्थ्य है और कोरोजयी कवि की कालजयी कला भी। महामारी से पूर्व इस भयावह भविष्य का दर्शन करने वाले आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल लिखते हैं कि

"इस सभा में शव के लिए प्रार्थनाएँ की गयीं/.../

ठीक जैसे किसी लेखक की गम्भीर बीमारी में उसके बारे में पुराने पन्ने पलटे जाते हैं/

कि न जाने श्रदांजलि के दो शब्द बोलने का प्रस्ताव कब आ जाय!" ('क्षीरसागर में नींद' / 81)


इस महामारी के मुख में हिंदी के कवि मंगलेश डबराल से लेकर उर्दू के शायर डॉ. राहत इंदौरी तक अनेक साहित्य साधक समा गये हैं। सुबह-सुबह सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि का सुमन समर्पित करना, ऐसा लग रहा था मानो दुःख के दिन सूर्य को अर्घ्य देना है। 


ऐसे में कवि की आत्मा अत्यंत दुखी थी और आँखों में था आँसू का समुद्र। फिर भी वह 'आपदा को अवसर' के रूप न देखकर, बल्कि मन की नवीन दृष्टि से उसे 'कोरोना में क्रियेशन' के रूप देख रहा था तथा महामारियों का मूल्यांकन करते हुए नये सूत्रों के संदर्भों की तलाश कर रहा था। दरअसल, यह तलाशने की प्रक्रिया इस त्रासदी से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी। जिसकी उपज है 'कोरोजीवी कविता' का सिद्धांत। कुछ गिनेचुने हैं जो बिना विचारे ही विरोध की लाठी लेकर निकल पड़े हैं तो उनके लिए आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल की निम्नलिखित पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-

"जिसके साथ ठीक से हुआ नहीं जा सकता/

उसके विरोध में कुछ कहा नहीं जा सकता/.../

विरोध की ठीक-ठीक उपस्थिति का इतिहास/

समर्पण के बार-बार अपमानित होने का इतिहास है" ('क्षीरसागर में नींद' / 15)


(©गोलेन्द्र पटेल

15/10/2021)

मो.नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com



Thursday, 14 October 2021

कविता का समुज्ज्वल पक्ष और कोरोजीविता (केंद्र में आ. श्रीप्रकाश शुक्ल) : गोलेन्द्र पटेल

 कविता का समुज्ज्वल पक्ष और कोरोजीविता//

इकीसवीं सदी की त्रासदी की तान का जन्म कोई आकास्मिक घटना नहीं है बल्कि इसका बीज महामारियों के ऐतिहासिक जमीन में कई सदी पूर्व ही अंकुरित हो चुका था पर वह पल्लवित और पुष्पित नहीं हुआ और यह जन्म के ज्वर को सहन न कर सकने की वजह से शीघ्र ही महामारी की मिट्टी में मुँह के बगल लम्बे समय के लिए सो जाती थी पर सर्जनात्मकता की सृष्टि में संवेदना की शीतलता व उष्णता, अनुभूति की आर्द्रता और सर्जक की छींक से कभी-कभी कुछ समय के लिए जग जाती थी। कोरोनाकाल में इसी तान की तरंग कविता की ताकत बनकर संसार में गूँज रही है और यही ताकत जिन कविताओं में पायी जा रही है उसे आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल 'कोरोतान' के अंतर्गत रखते हुए, सुतर्क की कसौटी पर 'कोरोजीवी कविता' की सैद्धांतिकी निर्मित कर रहे हैं। जिसका हिन्दी जगत ही नहीं बल्कि गैर हिन्दी जगत भी खुलकर स्वागत कर रहा है। 

आगे आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल इस कोरोजयी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि "इस कोरोजीवी कविता का महत्व इस कारण से नहीं है कि यह महामारी के बावजूद लिखी जा रही है जिसमें युगबोध की उपस्थिति तो है ही, साथ ही साथ इतिहासबोध की नयी अंतर्दृष्टि भी है।" इस संदर्भ में 'क्षीरसागर में नींद' संग्रह की कविता "संभवतः" की निम्नलिखित पंक्तियों को देखिये :-

"जब-जब इतिहास को नये तथ्यों की जरूरत महसूस हुई है/

यह सम्भवतः ही है जिसने सम्भव किया है/

मनुष्य के लिए एक नया इतिहास!" ('क्षीरसागर में नींद' / 31)


तो आइए, अब हम सब मिलकर महामारी से पूर्व गुरुदेव की दृष्टि पर अपनी पैनी दृष्टि डालते हैं और एकटक देखते हैं उनकी कविताओं को, कि कैसे वे अपनी कविताओं में भावी त्रासदी को दर्ज करते हुए नज़र आ रहे हैं। 


"घर में कितने ही वायरस का प्रवेश है" ('बोली बात' / 80)

"उनके घर में बच्चा उनका कितना बीमार है/

पत्नी उसकी इस बीमारी पर अपनी बीमारी कितना भूल चुकी है/

इससे कुछ भी लेना-देना नहीं है उन्हें" (('बोली बात' / 96)

"यह मित्रताओं के टूटने का समय है'/.../ 

'तब कमरे में बिखरे अखबारों के बीच/ 

गिरे किसी लिफाफे के वजूद की तरह/ 

टूटेगी हमारी मित्रता'/.../ 

'तब हमारी मित्रता के टूटने के दिन होंगे" ('बोली बात' / 14)


"महाश्मशान की लपटों में कितनी आर्द्रता है" ('बोली बात' / 112)


"बाढ़ आए

बादल फटे

सूखा पड़े

फसल सूखे

किसान मर जाएँ

महामारी घर कर जाए" ('क्षीरसागर में नींद' / 77)


मास्क , फेसशील्ड , सोशल टिस्टेंशिंग, स्प्रेडर, सुप्ररस्प्रेडर , क्वारंटाइन, सेनेटाइजर , लॉक डाउन, फ्रंटलाइन वारियर ,  होम डिलेवरी , वर्क फ्राम होम , ऑनलाइन क्लासेज ,ऑक्सीजन, वेबिनार, शव, श्मशान, कबरिस्तान, मेडिकल व दवाओं का नाम आदि शब्दों के प्रयोग करने से कोई कविता 'कोरोजीवी कविता' नहीं होती है बल्कि इन सबके बजाय उसमें कोरोजीविता का तत्व होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि यह तत्व कोरोनाकाल से पहले की कविताओं में मौजूद नहीं है। जो भी कोरोजयी कवि है यह तत्व उनके यहाँ पहले से ही मौजूद है। जिसका जीता जागता उदाहरण स्वयं सिद्धांतकार श्रीप्रकाश शुक्ल हैं। यदि आपको कोरोजीविता के तत्वों को बारिकी से समझना है तो आप सिद्धांतकार के साथ-साथ आचार्य अरुण होता एवं युवा आलोचक अनिल कुमार पाण्डेय के लेखों को पढ़ सकते हैं। 


एक ओर कोरोजीवी कविता समय की शहनाई का स्वर है तो दूसरी ओर ढोलक की धधकती ध्वनि है और जहाँ परिवेशगत संलग्नता में सभ्यता व संस्कृति का संगीतात्मक समन्वय इसकी विशेषता का चरम विकास है। जो पूर्ववर्ती काव्यपरंपरा में छायावाद से अधिक विकसित है, छायावादी कवियों के यहाँ भी दुःख है पर यह उनका स्थाई भाव नहीं। जो है कि हम कोरोजयी कवियों के यहाँ इसे देख रहे हैं। अतः प्रकृति की सूक्ष्म चेतना का परम प्रसार ही बुद्धि के विस्तार का समुज्ज्वलतम पक्ष है जिसका आधार मानवीय जिजिविषा है। हम कह सकते हैं कि कोरोजीवी कविता साहसपूर्ण आनंद की अनुभूति की अभिव्यक्ति है और इसके सर्जक निराशा में निराकरण कवि हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि जब संवेदना संक्रमित हो रही हो, तब कविता में केवल उत्साहधर्मिता, कविता की प्रकृति को क्षति पहुँचाती है। जिसे कोरोजयी सर्जक अपने-अपने भूगोल व वय के अनुसार शक्ति में परिवर्तित करते हुए नज़र आ रहे हैं और यही इनकी कविता की ताकत भी है जो जड़ता को जड़ से उखाड़ने के बजाय पहले उसकी शाखाओं को, फिर तने को, फिर जड़ को क्रमशः काट रही है। यानी यह लोकधर्मिता के संस्कार से उपजी उम्मीद की कविता है और इसकी पहचान ही इसकी गतिशीलता है। 


कुछ हैं जो कुछ करते तो नहीं है पर यहाँ-वहाँ इनसे-उनसे शिकायत करते रहते हैं और वे अपनी ऊर्जा का उपयोग उगाने में नहीं, बल्कि उगे हुए को नष्ट करने में लगाते हैं ताकि इतिहास उन्हें भी याद रखे। जैसा कि आप कोरोनाकाल में ही नहीं, बल्कि हर संकट के समय में उन्हें देखते हैं।


आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल की एक कविता है 'शिकायत'। जो इसी विडंबना को दर्ज करनेवाली सजीव दहकती हुई लपट की तरह है, जो कोरोनाकाल से बहुत पहले लिखी गयी थी। जिसकी आँच उन्हें एकबार में सुधारने में सक्षम है। जिसकी निम्नलिखित पंक्तियों के जरिये, आप समझ सकते हैं। वे लिखते हैं कि 

"मुझे शिकायत है उन बहुत सारे लोगों से/

सारा जीवन करते रहे शिकायत जो/

कभी स्वयं से/

कभी समाज से" ('बोली बात' / 28)


पहली लहर से लेकर दूसरी लहर तक 'लौटना' नामक खतरनाक क्रिया की दहशत से हम सभी लोग भली-भाँति परिचित हैं और यह क्रिया हर रचनाकार के यहाँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मौजूद है। जो मजदूर शहरों में कई वर्षों से रह रहे थे। कुछ के तो अपने निजी घर थे पर वे भी अपनी पुस्तैनी घर लौट रहे थे। लौटने की प्रक्रिया में छूटने का जो दुःख होता है। उसे एक कोरोजयी कवि कोविडकाल से पहले कैसे महसुस कर कर अपनी कविता में ढ़ालता है यह काबिल तारीफ है। गुरुवर लिखते हैं कि "जिस मकान में हम वर्षों से रह रहे थे/

जब उसके छूटने की बारी आई/

तब बिदा होती बेटी की तरह/

हमारे भीतर कुछ टूट रहा था" ('बोली बात' / 25)


(©गोलेन्द्र पटेल

14/10/2021)

मो.नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com




Thursday, 23 September 2021

जिउतिया पर्व || खर जिउतिया पूजन || गोलेन्द्र पटेल

खर जिउतिया पूजन
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एक माँ की स्मृति जीवित होती है
जीवित्पुत्रिका व्रत से
अनंत दुआएँ द्वार पर आती हैं
सभी संतानें साँपों से बच जाती हैं मुश्किल सफ़र में
विषम समय का विख सोख लेता है सूर्य
गाँव दर गाँव गूँजता है तूर्य

जगत पर टिमटिमाते जुगनुओं की रोशनी में
अढ़ाई अक्षरों के प्रेमपत्र को पढ़ती हैं किशोरियाँ
किलकारियों के कचकचाहटी स्वर में गाती हैं कजरियाँ

“सर्वे भवंतु सुखिनः’ सिद्धांत है हवा के होंठों पर
 ऐ सखी! सृष्टि में फूल मरता है
 पर उसका सौरभ नहीं
 कलियाँ कंठों-कंठ कानों-कान सुनती रहती हैं
 भ्रमरियों की गुनगुनाहट
और आहत तन-मन की आहट
मसलन ‘जीवन का राग नया अनुराग नया”

बाहर धूल भीतर रेत है
अंधेरी आँधियों में मणियों का मौन चमकना
साँप-साँपिन के संयोग का संकेत है
ओसों से बुझ रही है घास की प्यास
साथ छोड़ रहा है श्वास

पर, पेड़ को पता है
पत्तियों के पेट में जाग रही है भूख
कहीं नहीं है सुख
सूख रहा है ऊख

आश्विन-कृष्णा अष्टमी को
जीमूतवाहन जन्नत का वास छोड़कर पृथ्वी पर आते हैं
गरुड़ गगनगंगा में मलयावती के साथ नौका विहार करते हैं
जहाँ ढेर सारे किसान बादलराग गाते हैं

नयननीर की नदियों में शांति है
पर आँखों में क्रांति है
लालिमा बढ़ रही है
टूट रहा है विश्वास
रोष के रस से लबालब भरा है गिलास

गर्भवती अनुभूतियाँ जन्म दे रही हैं स्मृतियों को
जिन्हें जीउतिया माई अमरता का आशीर्वाद दे रही हैं 
स्मृतियों के जीवित रहने से मनुष्यता जीवित रहती है

खैर, यह कोरोना के विरुद्ध छत्तिस घंटों का महासंकल्प है 

इस वायरस-वर्ष ने प्रेम में नजदीकियों को नहीं,
दूरियों के तनाव को स्वीकार किया है
स्पर्श से दोस्ती में दरार पड़ रही है
कच्ची उम्र की बुभुक्षा लड़ रही है

पर्व को परवाह नहीं किसी के जीवन से
मृत्यु नहीं रुकती है किसी के रोकने से
नहीं रुकती हैं
कभी-कभी ख़ुद से ख़ुद की दूरियाँ बढ़ने से
दूरियों के बढ़ने से मन खिन्न है

गँवई शब्द मृत्यु की गंध को सूँघ रहे हैं
मरने से पहले एकत्र होकर
एक ही अगरबत्ती के धुएं को फेफड़े तक पहुँचा रहे हैं
डर के विरुद्ध

व्रतधारिन बूढ़ी औरतें  
नयी नवेली बहुओं को उपदेश दे रही हैं
कि उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद है उपवास

चील्होर था या उल्लू फुसफुसा रही है भीड़
परात का प्रसाद लौट रहा है
चूल्हे के पास

बच्चे हैं
कि गोझिया आज ही खाना चाहते हैं
खर व्रतधारिन समझा रही हैं
जिउतिया माई रात भर खईहन
हम सब सवेरे
(प्रसाद बसियाने पर शीघ्र शक्ति प्रदान करता है, वत्स!) 

बच्चे कह रहे हैं माई हमार हिस्सा हमें दे दे
नाहीं त रतिया में जिउतिया माई कुल खा जईहन
आज शायद ही छोटे बच्चे सो पाएंगे ठीक से
व्रत की बात हट रही है लीक से

यह लोकपर्व मातृशक्ति की तपस्या है!!

(©गोलेन्द्र पटेल / 10-09-2020)

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
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*विख=विष





Friday, 17 September 2021

आखेट आचार्य (शिकारी शिक्षक)

आखेट आचार्य (शिकारी शिक्षक) : गोलेन्द्र पटेल

40 से अधिक रचनाकारों (पत्रकार, वरिष्ठ कवि, आलोचक व आचार्य) ने फोन करते ही आपको बहुत बहुत बधाई व अशेष शुभकामनायें। फिर पुरस्कार राशि कितना मिला है?...सबसे अंत में आप कैसे हैं? खैर, वे सुधीजन जो अपनी संस्था का पुरस्कार मुझे देना चाहते थे पर मैंने नहीं लिया। वे बहुत नाराज हैं कि आखिर मैं उनका पुरस्कार क्यों नहीं लिया? कुछ गुरुओं का आरोप है कि मैं एक चाटूकार चेला हूँ। उनकी दृष्टि में मैं एक चाटूक्ति लिखने वाला शिष्य हूँ। वे बतौर कक्षा एक दिन भी मेरा मार्गदर्शन नहीं किये हैं। और वे सोचते हैं कि मैं उन्हें अपना उपजीव्य बनाऊँ। तो यह कैसे संभव है? एक सर्जक शिष्य के लिए कि वह उन्हें अपना उपजीव्य बनाये। जो कभी प्रभावित ही नहीं किये उसे (यानी मुझे/एक शिष्य को)। एक गुरु (मार्गदर्शक) दूसरे गुरु के शिष्य के प्रति इतनी अमानवीय दृष्टि क्यों रखते हैं? यह एक गुरु ही जानता है। शिष्य तो उन्हें अपने गुरु के समान ही समझता है/ मानता है। उनके ही शिष्य-शिष्या जो मेरे मित्र हैं/ सखी (यानी शोधा छात्रा साथी) हैं। वे उनके व्यक्तित्व के विषय में जब मुझसे चर्चा करते हैं/ बताती हैं। मुझे हँसी आती है उनके गुरुत्व पर लेकिन मेरी नजर में उनका उतना ही सम्मान है जितना कि मैं उनकी रचनाओं का करता हूँ। अर्थात् उनके कृतित्व का। बहरहाल, शिक्षा के क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन हीन व संकीर्ण मानसिकता के मार्गदर्शक बढ़ रहे हैं। इसलिए आप खुल कर यह नहीं कह सकते हैं कि ये मेरे मार्गदर्शक हैं तो यह मेरा गुरु! क्योंकि आज शिष्यों से जादा गुरुओं के बीच द्वन्द्व है। देखावे के लिए, वे आपस में मिलते हैं पर वास्तविकता कुछ और है। जो धीरे-धीरे एक शिष्य को समझ में आता है। जब वह उनका शिकार होने लगता है। तब उसे पता चलता है उनका वह पक्ष जो उसकी कल्पना से अब तक परे था। मानस में स्थित उन पथप्रदर्शकों की प्रतिमाएँ भहरा कर टू जाती हैं। मन खिन्न हो जाता है और आत्मा दुखी।


शिक्षा के जंगल में कई शिकारी मेरा भी शिकार चाहते हैं। पर मेरे मार्गदर्शक उनके शिकार करने की कला से मुझे अवगत करा चुके हैं। मैं जंगल के सभी हिस्से से परिचित हूँ। किधर कौन सा हिंसक जानवर रहता है? जंगल के किस क्षेत्र में कौन सा शिकारी कब शिकार करता है? किधर वे अपना जाल बिछाये हैं? किधर कोई बहेलिया अपना जाल लगाया है या लगाने वाला है? किस शिकारी के पास कौन सा औजार है?....इस तरह के तमाम प्रश्नों के उत्तर। मैं अपने मार्गदर्शकों से पूछ लिया हूँ। मैं जान लिया हूँ इस जंगल का कोना-कोना। एक न एक दिन मैं नदी के तट पर शेष बातें भी जान जाऊँगा। असल में जानना ही शिष्य का धर्म है और सीखना उसका कर्म। और कर्म करना मनुष्य की नियति है। ("आखेट आचार्य" से /गोलेन्द्र पटेल)


                                                          {ई-संपादक}

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{युवा कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक}

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Wednesday, 15 September 2021

"सुब्रह्मण्य भारती युवा कविता सम्मान'' : शिक्षा को समाज की पहली आवश्यकता मानते थे राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्यम भारती - प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल

 शिक्षा को समाज की पहली आवश्यकता मानते थे राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्यम भारती- प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल

तमिल के प्रख्यात कवि, समाज सुधारक एवं पत्रकार सुब्रह्मण्यम भारती की स्मृति में अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय के तत्वावधान में हनुमान घाट पर ‘प्रतिमा माल्यार्पण सह परिचर्चा' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सुब्रह्मयम भारती की मूर्ति पर माल्यार्पण के बाद हनुमान घाट स्थित कवि के बनारस प्रवास के दिनों के घर जाकर परिवार से मुलाकात की गई तथा महाकवि की स्मृतियों को संजोते हुए परिवार को सम्मानित किया गया। 

इस अवसर पर युवा कवि गोलेन्द्र पटेल को "सुब्रह्मण्य भारती युवा कविता सम्मान'' प्रदान किया गया।

चेतसिंह किला परिसर में आयोजित परिचर्चा के क्रम में स्वागत एवं बीज वक्तव्य देते हुए काशी के ख्यात न्यूरोलॉजिस्ट एवं अंतरराष्ट्रीय काशी घाट वॉक विश्विद्यालय के मानद कुलपति प्रो. विजायनाथ मिश्र ने कहा कि सुब्रह्मण्यम भारती की कविताएं आम आदमी की पीड़ा का बयान हैं। महाकवि तुलसीदास की रचनाओं में भी आम आदमी का कष्ट दिखाई पड़ता है। प्रो. विजयनाथ मिश्र ने कार्यक्रम के माध्यम से हनुमान घाट स्थित भारती जी के घर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग उठाई।


अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक, अंतरराष्ट्रीय काशी घाट वॉक विश्वविद्यालय के मानद डीन एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि सुब्रह्मण्यम भारती के बहाने हिंदी और तमिल के बीच संस्कृतिक सेतु की चर्चा की जा सकती है। भारती जी 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में बनारस आए थे। बाद में 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में वे सिस्टर निवेदिता से मिले जहां से उन्हें स्त्री शिक्षा के लिए काम करने की प्रेरणा मिली। भारती जी का मानना था कि एक उन्नत समाज में शिक्षा होनी चाहिए, शिक्षा के लिए स्कूल चाहिए, अखबार और उद्यमी होने चाहिए। सन् 1919 में गांधी से मुलाकात कर उन्होंने हिन्दी भाषा का जोरदार ढंग से समर्थन किया था। वे हमेशा दलितों, उपेक्षितों, स्त्री शिक्षा पर जोर देते थे। महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती ने विकसित समाज के लक्ष्य प्राप्ति के लिए तीन बातें आवश्यक मानी इनमें पहली बात शिक्षा है, दूसरी बात शिक्षा और तीसरी बात भी शिक्षा है। वे भारतीय राष्ट्रीय काव्यधारा में दक्षिण भारत के उतने ही बड़े कवि जितने उत्तर भारत में मैथिलीशरण गुप्त एवं रामधारी सिंह दिनकर।

विशेष अतिथि के रूप में कवि सुब्रह्मण्यम भारती की नातिन डॉ. जयंती कृष्णन ने उन्हें याद करते हुए कहा कि भारती जी चार वर्ष तीन महीने बनारस में रहे थे और इसी दौरान वे लाल- बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल) से प्रभावित हुए। भारती जी की वेशभूषा भी उसी प्रभाव का परिणाम है। वे न सिर्फ लिखते थे बल्कि गाते भी थे। काशी के जय नारायण इंटर कॉलेज से उन्होंने पढ़ाई की और बाद में चेन्नई में श्रीमती  एनिबेसेंट व सिस्टर निवेदिता के संपर्क में आए।


विशिष्ठ अतिथि, बीएचयू के तमिल विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. जगदीशन टी ने महाकवि को याद करते हुए कहा कि भारती जी पूरी दुनिया को अपना मानते थे। गरीबों और लाचार की मदद करना वे धर्म समझते थे। उनके विचार न सिर्फ तमिलनाडु बल्कि समस्त भारत के विचार हैं, जिसे बनारस में उन्होंने ग्रहण किया था। आज सुब्रह्मण्यम भारती के विचारों को सामने लाए जाने की जरूरत है। 

कार्यक्रम के आरंभ में हनुमान घाट पर स्थित सुब्रह्मण्यम भारती की प्रतिमा का माल्यार्पण किया गया। तत्पश्चात युवा कवि गोलेन्द्र पटेल को पहले 'सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान 2021' से सम्मानित किया गया जिसमें इन्हें प्रशस्ति पत्र,सम्मान राशि व अंगवस्त्रम भेंट किया गया।

उनकी कविताओं पर वक्तव्य देते हुए बीएचयू के हिंदी विभाग में सहायक आचार्य और युवा आलोचक डॉ विंध्याचल यादव ने कहा कि 

गोलेन्द्र  हिंदी कविता में एक  विस्फोट की तरह हैं।वे किसानी व श्रमिक चेतना के कवि हैं।उनकी परंपरा में किसान परंपरा दिखाई देती है जहां लोक के प्रति गहरी संसक्ति है।उन्होंने  अपनी भाषा अर्जित की है,यह सुखद है।


इस अवसर पर गोलेन्द्र ने 'उस पार','मल्लू मल्लाह' व 'होनी का होना' नामक कविताओं का पाठ किया।


कार्यक्रम के अंत में  संगीत की प्रस्तुति भी हुई जिसमें बीएचयू के कृष्ण कुमार तिवारी ने गणेश वंदना के साथ सुब्रह्मण्यम भारती के जीवन पर आधारित गीत की प्रस्तुति की।तबले पर काशी विद्यापीठ के  सुमंत चौधरी ने संगत दी।

कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र उदय पाल  ने किया।धन्यवाद लोक कलाकार अष्टभुजा मिश्र ने किया।


इस अवसर पर अष्टभुजा मिश्र,उदय प्रताप सिंह,अंकित,कविता गोंड,पंकज पटेल,शिव विश्वकर्मा, आस्था वर्मा,जूही त्रिपाठी और कई शोधार्थी ,कलाकार व  घाटवाकर उपस्थित थे।

रपट साभार : जूही त्रिपाठी (शोधार्थी, बीएचयू)

Monday, 13 September 2021

HINDI : हिन्द, हिन्दवी, हिन्दी (हिंदी) | सिन्धु, हिन्दु, हिन्दुस्तान | हिंदी दिवस


 हिन्दी//


ह् इ न् द् ई

'ह' से हँसी 

'इ' से इश्क

'न' से नज़र 

'ई' से ईर्ष्या है हिन्दी


©गोलेन्द्र पटेल

रचना : 14 सितंबर, 2016 की है तब अंतिम पंक्ति ('ई' से ईप्सा है हिंदी) थी।

मो.नं. : 8429249326


बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...