“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
Saturday, 1 July 2023
हिन्दी कविता में स्तन : गोलेन्द्र पटेल / Breast in Hindi Poetry: Golendra Patel
Friday, 9 June 2023
पहले माँ फिर बेटा : गोलेन्द्र पटेल
पहले माँ फिर बेटा
जब मैं अपने माँ के गर्भ में था
वह ढोती रही ईंट
जब मेरा जन्म हुआ वह ढोती रही ईंट
जब मैं दुधमुँहाँ शिशु था
वह अपनी पीठ पर मुझे और सर पर ढोती रही ईंट
मेरी माँ, माईपन का महाकाव्य है
यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उसका बेटा हूँ
मेरी माँ लोहे की बनी है
मेरी माँ की देह से श्रम-संस्कृति के दोहे फूटे हैं
उसके पसीने और आँसू के संगम पर
ईंट-गारे, गिट्टी-पत्थर,
कोयला-सोयला, लोहा-लक्कड़ व लकड़ी-सकड़ी के स्वर सुनाई देते हैं
मेरी माँ के पैरों की फटी बिवाइयों से पीब नहीं,
प्रगीत बहता है
मेरी माँ की खुरदरी हथेलियों का हुनर गोइंठा-गोहरा
की छपासी कला में देखा जा सकता है
मेरी माँ धूल, धुएँ और कुएँ की पहचान है
मेरी माँ धरती, नदी और गाय का गान है
मेरी माँ भूख की भाषा है
मेरी माँ मनुष्यता की मिट्टी की परिभाषा है
मेरी माँ मेरी उम्मीद है
चढ़ते हुए घाम में चाम जल रहा है उसका
वह ईंट ढो रही है
उसके विरुद्ध झुलसाती हुई लू ही नहीं,
अग्नि की आँधी चल रही है
वह सुबह से शाम अविराम काम कर रही है
उसे अभी खेतों की निराई-गुड़ाई करनी है
वह थक कर चूर है
लेकिन उसे आधी रात तक चौका-बरतन करना है
मेरे लिए रोटी पोनी है, चिरई बनानी है
क्योंकि वह मजदूर है!
अब माँ की जगह मैं ढोता हूँ ईंट
कभी भट्ठे पर, कभी मंडी का मजदूर बन कर शहर में
और कभी-कभी पहाड़ों में पत्थर भी तोड़ता हूँ
काटता हूँ बोल्डर बड़ा-बड़ा
मैं गुरु हथौड़ा ही नहीं, घन चलाता हूँ खड़ा-खड़ा
टाँकी और चकधारे के बीच मुझे मेरा समय नज़र आता है
मैं करनी, बसूली, साहुल, सूता, रूसा व पाटा से संवाद करता हूँ
और अँधेरे में ख़ुद बरता हूँ मेरा दुख मेरा दीपक है
मैं मजदूर का बच्चा हूँ
मजदूर के बच्चे बचपन में ही बड़े हो जाते हैं
वे बूढ़ों की तरह सोचते हैं
उनकी बातें
भयानक कष्ट की कोख से जन्म लेती हैं
क्योंकि उनकी माँएँ
उनके मालिक की किताबों के पन्नों पर
उनका मल फेंकती हैं
उनके बीच की कविता सत्ता का प्रतिपक्ष रचती है
अब मेरी माँ वही कविता बन गयी है
जो दुनिया की ज़रूरत है!
(©गोलेन्द्र पटेल / 10-06-2023)
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
Thursday, 1 June 2023
कबीर : कल और आज / कबीर का करघा : गोलेन्द्र पटेल
एक).
कबीर तार्किक हैं
बुद्धिवादी हैं
सत्यवादी हैं
सत्यान्वेषी हैं
सजग-सच्चे साधक एवं जननायक हैं
वे हर चीज़ को तर्क के तेराजू पर तौलते हैं
अब वह चाहे परिभाषिक शब्द हो
या फिर कोई बात
कबीर बुनकर हैं
युगद्रष्टा हैं
क्रांतिकारी हैं
समाज-सुधारक हैं
सामाजिक वैज्ञानिक हैं
निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी हैं
वैष्णव भक्त हैं
मानवधर्म-प्रवर्तक हैं
मानवताप्रेमी कालजयी कवि हैं
दार्शनिक हैं
साधना के क्षेत्र में युग-पुरुष हैं
काव्य के संभाव्य स्रष्टा हैं
भ्रमणशील व्यक्ति हैं
सारग्राही संत हैं
और अब कबीर किताबों के भीतर कराह रहे हैं
वे नहीं सोये हैं वाया रात
वे नाथों से प्रभावित हैं
सिद्धों से प्रभावित हैं
बुद्ध से प्रभावित हैं
और हम उनसे!
दो).
मेरे कबीर किसी किताब के कबीर नहीं ,
बल्कि जनमानस के कबीर हैं
इसलिए कोई कितना ही बड़ा कोविद क्यों न हों
मैं उनकी वही बातें ग्रहण करता हूँ
जो लोकमन की कसौटी पर खरी उतरती हैं!
-गोलेन्द्र पटेल
कबीर का करघा : गोलेन्द्र पटेल
विषय :- 'कबीर : कल और आज'सम्मानित मंच एवं प्रिय पथप्रदर्शक गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल जी, प्रिय गुरुजन एवं सहृदय साथियो! आज कबीर की 625वीं जयंती के अवसर मुझे कुछ बोलने और कविता पाठ का मौका मिला है। यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष का पल है।
कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहना है कि 'कबीर की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई।' मुझे लगता है कि उस भक्ति के बीज का बीज मैं हूँ।
चौदह सौ पचपन साल गए, चंद्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसात को पूरणमासी तिथि प्रकट भए।
घर गरजे दामिनी दमके बूँदें बरसें झर लाग गए।
लहर तलाब में कमल खिले तँह कबीर भानु प्रकट भए।
कबीर का जन्म 1455 संवत में हुआ या संवत 1456 में या किसी अन्य तिथि-विथि को। मुझे डेट को लेकर फर्क़ नहीं पड़ता। मैं व्यक्तिगत तौर मध्यकाल के किसी भी कवि के जन्म तिथि व जन्मस्थान और उनके निर्वाण तिथि, मृत्यु-स्थान को लेकर ज़्यादा विचार विमर्श नहीं करता हूँ। मेरा मानना है कि कवि का जन्म तब होता है जब उसे कोई दिशा दिखाने वाला मिलता है या कोई पथप्रदर्शक उसे पा जाता है। जैसे कबीर को उनके गुरु रामानंद ने पाया था, या कि कबीर ने रामानंद को। उनके प्रथम मिलन को ही मैं उनका जन्मदिन मानता हूँ। खैर, कबीर के संदर्भ में यह मिलन तिथि भी विवादस्पद है।
कबीर काशी के दूसरे वरिष्ठ कवि हैं जिन्होंने अपने प्रखर व तेजस्वी व्यक्तित्व के कारण न केवल मध्यकालीन भक्ति-साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई बल्कि पंद्रहवीं शताब्दी की संपूर्ण सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त तमस को अपनी ज्ञान-रश्मियों की आभा से दूर करने का प्रयास किया। कबीर की प्रासंगिकता उनकी वाणी की व्यापकता से है। कबीर की वाणी 'तेरा मेरा मनवा कैसे एक होई रे!' इस दिशा में समानता, सद्भावना और समृद्धि का समाज बनाने के लिए सांस्कृतिक पहल है। कबीर के बारे में किसने क्या कहा है? उन्हें ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, जो कबीर के परिवेश से आते हैं। जो उनके पेशे से अभी भी जुड़ें हैं। जैसे कि मैं किसी पर ध्यान नहीं देता हूँ।
कबीर भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रमुख सूत्रधार हैं। वे मृत्युंजय कलाकार हैं और कलाकारों की एक ही जाति होती है मनुष्यता। लेकिन दुःख की बात यह है कि कबीर के अधिकांश अध्येताओं ने कबीर को अपनी-अपनी जाति की आँखों से देखा है और कबीर को अपनी जाति का सिद्ध करने का (कु)प्रयास किया है। वे सब कबीर के कुछ पदों को लेकर हिंदू-मुस्लिम के बीच झुल रहे हैं। जैसे- 'जाति जुलाहा नाम कबीरा। बनि-बनि फिरौं उदासी।।' और 'परिहर काँम राँम कहि बौर सुनि सिख बंधू मोरी। हरि कौ नाँव अभैपददाता, कहै कबीरा कोरी।।' इनमें 'जुलाहा' (मुसलमान) और 'कोरी' (हिन्दू) शब्द उनकी बहस के बीजतत्व के रूप में उपस्थित हैं। किसी ने कोरी को जुगी (न हिंदू न मुसलमान अर्थात् एक भ्रष्ट जाति) बताया, तो किसी ने बनिया, तो किसी ओबीसी। कबीर पेशे से बुनकर थे यानी मध्यकाल के जुलाहे थे। इसलिए मुझे कबीर करघे पर मानवीय चेतना के चादर बिनने वाले कवि नज़र आते हैं। उनकी बुनकरी के ताने-बाने में जीवन के नये गाने और ज्ञान के मोती हैं। जिसे आप 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' पद में सुन सकते हैं इस संदर्भ मुझे अपने प्रिय पथप्रदर्शक शब्द-शिक्षक कवि व विभागाध्यक्ष सदानंद शाही जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं वे कहते हैं कि
'मुरदों के गांव में सब मर जायेंगे
कबीर नहीं मरेंगे
जब तक संसार जलता रहेगा
कबीर धाह देते रहेंगे
जब तक कागज की लेखी
खड़ी करती रहेगी भ्रम की टाटी
आती रहेगी ज्ञान की आंधी
बैठे ठाले पंडे और पुरोहित
चादर मैली करते रहें-
कबीर का करघा चलता रहेगा
और नई चादर बुनी जाती रहेगी'
कबीर नाथों-सिद्धों की तरह ही बुद्ध से भी बहुत प्रभावित हैं। इसीलिए वे अनुभव पर बल देते हैं।
'तू कहता कागद की लेखी,
मैं कहता आँखिन की देखी।
मैं कहता सुरझावन हारि,
तू राख्यौ उरझाई रे!!'
मेरे मन में कुछ सवाल ये हैं कि क्या हम कबीर के वारिस हैं? हम कबीर को कितना जीते हैं? हमें कबीर पढ़ाने वाले शिक्षक कबीर को कितना जीते हैं? क्या कबीर किताब की चीज़ हैं? आज कबीर के करघे की क्या स्थिति है? आख़िर जुलाहों को अपना जीवन ज़हर क्यों लग रहा है? आख़िर मेरे पिताजी अपने करघे बेच क्यों दिये? इन सवालों का जवाब हम सब को पता है।
आज हमें जरूरत है कि हम कबीर को जीयें। ताकि मुट्ठी भर लोग हमारी जीवटता की हत्या न कर सकें।
अंत में गुरुवर रामाज्ञा राय शशिधर जी के शब्दों में इतना ही कि
'करघा खेत कपास सब चले मौत की रेस।
बुन बुनकर बेहाल हूँ फिर भी नंगा देस।।'
-गोलेन्द्र पटेल (क्रमशः)
आज के क्रान्तिचेता कवि करघे पर
बहुत समय पहले ही कबीर का करघा
कोई चुराया लिया है धरम...
चरखा तो गाँधी तक चला भी
वे बुनकरों पर कविता लिखते हैं
ताकि वे कबीर कहला सकें
कबीर नहीं तो कबीर के वंशज कहला सकें
कबीर होना इतना आसान नहीं है
कबीर इतना आसान होना भी इतना आसान नहीं है
कबीर हिंदी के पहले क्रान्तिचेता कवि हैं न!
वे कबीर पर लिखी कविता किसी ए.सी. कमरे में पढ़ते हैं
वे करघे के 'खाटी-राग' क्या जानें?
वे टेकुए की चुभन क्या जानें?
वे कपास का काला होना क्या जानें?
वे तानी की तान क्या जानें?
वे क्या जानें कि कैसे बुनी जाती है
करघे पर नई चेतना की नई चादर!
वे क्या जानें कि कपड़ों के थान का गान कैसा है
कि मानवीय रेज़े का रंग कैसा है
कि धरती की गति किस ढरकी की गति जैसी है!
वे कबीर के शब्द किताबों से सीखते हैं न?
वे धन्य हैं कि वे कबीर के कोविद हैं
और काशी धन्य है कि कबीर उसके यहाँ के हैं
और हम धन्य हैं कि कबीर पेश से हमारे पुरखे हैं!
(©गोलेन्द्र पटेल / 01-06-2023)
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
लिंक :- https://youtu.be/Q2S2ATbd6Js
Friday, 26 May 2023
ऑक्सफोर्ड के आँसू / नालंदा पर नज़र / गोलेन्द्र पटेल
ऑक्सफोर्ड के आँसू
चूहो!
गिद्धों के गीत बाज़ बाँच रहे हैं
ऐसे में मुर्दा मौन के कौन को सुनना
बुरा तो है
नालंदा के मरसिया में
तक्षशिला की तकलीफ़
विक्रमशीला से कम नहीं है
और वल्लभी की पुष्पगिरी से...!
जहाँ एक आचार्य मस्त है
दूसरा पस्त
तीसरा अस्त हो चुका है
चौथा व्यस्त है
ऐसे वक्त में समस्त शिक्षार्थिगण उल्लुओं की आवाज़ें
और गीदड़ों की हुआँ हुआँ सुन रहे हैं
और कुत्ते-बिल्लियों का प्रलाप भी!
खैर, एक पैर पर
ऑक्सफोर्ड के आँसू को पढ़ना
बुरा तो है
बजबजाती हुई बद्दुआओं की बत्तियाँ जल रही हैं
शेर और भेड़िए के पेट में हिरण और भैंस
की चीख उनकी भूख शांत कर रही है
साँप ज्ञान के अवशेषों पर
इंतज़ाररत है
उस पर्यटक का जो मनुष्यता का मुसाफ़िर है
वह जीभ पर डँसने की कला में
माहिर है
उसकी फुफकार को सीने पर झेलना
बुरा तो है
'शोकमग्न' और शोक-'मगन' के बीच
नीचता-नफ़रत-निंदा की नागिन ख़ुश है
शिक्षा-व्यवस्था में इनका नाम
उरुस है
यह परिसर में उड़ती हुई उम्मीद की चिड़िया
का थरथराते चोंचों से शांतिपाठ है
इसे सुनना उनके लिए
बुरा तो है!!
(©गोलेन्द्र पटेल / 13-04-2023)
नालंदा पर नज़र
आपको जानकर हैरानी होगी,
मुझे चंद्रगुप्त मौर्य ने बताया है
इतिहासकार इतिहास में एक सत्य लिखना भूल गये हैं
वह यह कि नालंदा में चाणक्य जब विद्यार्थी थे
तब वहाँ के आचार्यों की बात आपस में तनिक भी नहीं बनती थी
लेकिन चाणक्य यह ज़रूर सोचते थे कि इनकी आपस में छनती है
पर धीरे-धीरे सब स्पष्ट हो गया
चाणक्य अक्सर अपने साथियों से कहा करते थे
यह शिक्षालय नहीं, जंगल है
यहाँ हर शिक्षार्थी हिरण है
और हर शिक्षक शेर
शब्दों में हेर-फेर हो सकता है, पर; भाव वही है
जो मुझे चंद्रगुप्त मौर्य ने बताया है
चाणक्य, आख़िर चाणक्य थे
च्युत दोपायों को चील समझ कर चाप देते थे
गिद्धों पर भी अपनी गुलेल से
दो-चार सुलगते हुए शब्दों को दाग देते थे
उनकी बुद्धि की बंदूक में गोली नहीं,
आग भरी होती थी
ये सब जंगलराज के महाहिंसक महाराजाधिराज जानते थे
चाणक्य कनफुँकवों की कुटनीति से परिचित थे
क्योंकि उनके गुरु की नज़र पूरे नालंदा पर थी
जो भेड़ियों की भाषा ही नहीं,
कुत्तों के भोंकने तक का अर्थ उन्हें पहले ही समझा देते थे
उनके गुरु नालंदा के आँगन के महावृक्ष थे!
(©गोलेन्द्र पटेल / रचना : 27-05-2023)
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
Tuesday, 16 May 2023
नाऊन (सोनू भइया को समर्पित कविता) : गोलेन्द्र पटेल
ये मेरे प्रिय सोनू भैय्या हैं, सहज, सरल, संवेदनशील, मृदुभाषी व हँसमुख व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हैं। ये विद्यालय के दिनों में मेरे सीनियर रहे हैं। खैर, मैंने 24 साल में एक बार भी अपने से अपनी दाढ़ी नहीं बनायी है आगे भी नहीं बनाऊँगा। इन्हीं से मैं अपना बाल कटवाता हूँ। ये बाल को हर तरह के स्टाइल व डिज़ाइन में काटते हैं। सोनू भइया को समर्पित निम्नलिखित कविता पढ़ें :-
नाऊन
मैंने सोचा—
‘नाउन’ एक ऐसी ‘संज्ञा’ है
जो समाज को सभ्यता की ओर उन्मुख करती है
फिर सोचा—
‘नाउन’ के ‘उ’ का दीर्घीकरण करना
ब्लेड से हमारी पशुता को कुतरना है
जहाँ कंघी और क़ैंची के बीच बाल का हाल
एक नाई समझता है
लेकिन वह क्या करे, उसे तो हमें सभ्य बनाना है न!
ईश्वर यदि कहीं झुकते हैं,
तो इनके यहाँ ही!
©गोलेन्द्र पटेल
रचना : 17-05-2023
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
Monday, 17 April 2023
आलोचक कवि बन रहे हैं / वह कवि होना चाहता है / त्रयी की चाह : गोलेन्द्र पटेल
आलोचक कवि बन रहे हैं
अब जब 'खोजो कम खोदो जादा'
हर विमर्श का नारा है
तब आलोचना, समालोचना, समीक्षा, टीका, टिप्पणी,
नुक्ताचीनी, छिद्रान्वेषण और भाष्य
क्रिटिसिज़म की क्यारी में कविता को कहानी बता रहे हैं
और निबंध को नाटक...
खैर, बिना पैर के संबुद्ध संपादक व प्रबुद्ध पाठक ख़ुश हैं
कि कोरोना ने आलोचक को कवि बना दिया
किसी भी भाषा में कवि होना, विशेष होना है
काव्य-हेतु पर बात करते हुए
दण्डी जैसे आचार्यों ने अभ्यास पर ज़ोर दिया है
शायद इसीलिए अब प्रतिभा से अधिक अभ्यास के
कवि जन्म ले रहे हैं
और आलोचक कवि बन रहे हैं
कवि तो खैर आलोचक होता ही है
ऐसे में सवाल यह है कि आज की आलोचना की
स्थिति क्या है?
क्या आलोचक होना
व्युत्पत्ति के व्याकरण को समझना है?
या सिर्फ़ यश की चाह में कलम का
रोना है?
या उत्तर-कोरोना में करुणा लोक का श्लोक बन रही है
और उनके भीतर वाया वाल्मीकि का उदय हो रहा है
बात जो भी हो,
उनकी आलोचना पर उनकी कविता हँस रही है
और मुझ जैसे अबोध शोधार्थी भी!
वे शब्द के पथिक हैं
उनके पास अनुभव अधिक है
उनकी उम्र उनकी रचना में बोलती है
उनके विचारों को खोलती है
क्या सच में वे नवोदितों में शामिल होना चाहते हैं?
या फिर ढंग का आलोचक न बन पाने का दुःख है उन्हें
अपनी उम्र के कवि को देखकर
उनके मन की पीड़ा
उनकी रचना में एक टीस की तरह मौजूद है
अधेड़ या वरिष्ठ होकर कवि होना
समय का सृजनात्मक सूद है
उनसे अन्य आलोचक प्रेरणा ले सकते हैं
कि कवि होना, आलोचक होना है
किन्तु आलोचक होना, कवि होना नहीं है
कविता लिखने से कोई कवि थोड़े होता है
कविता तो पुरखे आलोचक भी लिखे हैं
तो क्या वे कवि हैं?
■
वह कवि होना चाहता है
लोचन तो उसके पास है ही नहीं
उसकी आलोचना से 'लुच्' धातु गायब है
वह 'लुच्चा' तो नहीं,
लेकिन उसका नायब है
क्योंकि 'लुच' से 'लुच्चा' बना है न?
आजकल वह देखता कम,
दिखता ज़्यादा है
शायद भाषा में माँदा है!
उस पर कवि बनने का भूत सवार है
अब वह शब्द के अर्थ को उछालने की
कला सीख रहा है और
पद्य की जगह गद्य लिख रहा है
उसे याद है- 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।'
वह वाक्यों का कवि होना चाहता है
दूसरे कवियों को पढ़कर!
(©गोलेन्द्र पटेल / 18-04-2023)
■
त्रयी की चाह
5 अगस्त 2021 के दिन
कवि होता हुआ आलोचक ने फोन पर मुझसे कहा—
मुझे ऐसी संस्था का युवा प्रतिनिधि के रूप में चुना गया है
जिसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत
चार कवि हैं और
दो मेरे कक्षा अध्यापक हैं यानी प्रोफ़ेसर
फिर मुझे बधाई और शुभकामनाएँ दीं!
मैंने बातचीत के क्रम में पूछा कि आप तो आलोचक हैं न?
अभी पाँच-छह महीने से आपकी कविताएँ आ रही हैं
तो मैं आपको वरिष्ठों की लिस्ट में रखूँ,
या फिर युवाओं की लिस्ट में,
या फिर नवोदितों की लिस्ट में, किसमें रखूँ?
क्योंकि आजकल कवि, आलोचक व आचार्य की त्रयी
पाने की होड़ लगी है
आप दो तो थे ही! बस कवि की कमी थी
उसने भी अभ्यास के आगे घुटने टेक दी
आपकी कविता अच्छी न हो,
फिर भी आप अच्छे कवि मान लिये जाएंगे
ऊपर से आप इस संस्था के सचिव हैं
क्या आलोचना में आपका पाँव नहीं जमा सर?
खैर, मैं आपकी संस्था से जुड़ नहीं सकता
क्योंकि मेरी क्या औकात है कि इतने बड़े रचनाकारों को
कुछ सलाह दे सकूँ या कि कह सकूँ कि आपने गलत निर्णय लिया है!
सर, मुझे पूँछ पकड़ कर तैरने की आदत नहीं है
मैं स्वयं एक मल्लाह मछुआरा हूँ
नदी-सागर की भाषा में मनुष्यता का मज़दूर हूँ
मुझे बाढ़ से डर नहीं है भले ही मेरे पास
घर नहीं है, मैं गोधूलि में लौटता हूँ
जैसे लौटते हैं चौपाये या पंक्षिगण
मैं लौटता हूँ अतीत से वर्तमान में
और देखता हूँ खुले आसमान में अपने हिस्से का चाँद!
(©गोलेन्द्र पटेल / 19-04-2023)
■
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
Tuesday, 11 April 2023
प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के संग्रह 'वाया नई सदी' में 'कोरोजयी लय' : गोलेन्द्र पटेल
'वाया नई सदी' में 'कोरोजयी लय': गोलेन्द्र पटेल
भाषा के माध्यम से प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों, भावों एवं अनुभूतियों आदि को दो प्रकार से व्यक्त करता है। पहला गद्य रूप में और दूसरा पद्य रूप में। गद्य शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के 'गद्' धातु के साथ 'यत्' प्रत्यय जोड़ने से होती है, जिसका अर्थ होता है- बोलना, बताना या कहना। और पद्य से तात्पर्य है- काव्य या कविता। काव्य वह छंदोबद्ध, छंदमुक्त एवं लयात्मक साहित्यिक रचना है, जो श्रोता या पाठक के मन में भावात्मक आनंद की सृष्टि करती है। काव्य के दो पक्ष होते हैं- भाव-पक्ष एवं कला-पक्षा। अर्थात् कविता के दो स्वरूप होते हैं- १. बाह्य स्वरूप। जिसके अंतर्गत लय, तुक, ताल, शब्द-योजना, लक्षण, व्यंजना, रीतियाँ, रस, छंद, अलंकार एवं भाषा आदि तत्व आते हैं और २.आंतरिक स्वरूप। जिसके अंतर्गत अनुभूति की तीव्रता, अनुभूति की व्यापकता, कल्पनाशीलता, रसात्मकता और सौंदर्यबोध, भावों का उदात्तीकरण एवं रागात्मकता आदि अवयव आते हैं। ये दोनों एक-दूसरे के सहायक और पूरक होते हैं। भाव-पक्ष का संबंध काव्य की वस्तु से है और कला-पक्ष का संबंध आकार-शैली से है। सामन्यतः विचारात्मकता और भावात्मकता गद्य और पद्य साहित्य के भेदक तत्व माने जाते हैं लेकिन इसका यह कतई आशय नहीं है कि गद्य भावात्मक और पद्य विचारात्मक नहीं हो सकता। ये दोनों तत्व दोनों में हो सकते हैं बल्कि आधुनिक काव्य में ख़ासकर साठोत्तरी कविता में इन दोनों तत्वों को एक साथ देखना सुखद है। इस संदर्भ में स्वयं पहले तार-सप्तक (1943 ई.) के कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की चर्चा की है। गद्य साहित्य में बौद्धिक चेष्टाएँ और चिंतनशील मनःस्थितियों की अभिव्यक्ति सहजता से होती है और पद्य साहित्य में भावपूर्ण मनःस्थितियों की।
गद्य और पद्य मिश्रित रचना को चम्पु काव्य कहते हैं। जैसे "नल चम्पू" जिसकी रचना त्रिविक्रमभट्ट ने 10वीं शताब्दी में की और हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त की "यशोधरा" को चम्पू काव्य माना जाता है। काव्य के दो भेद किये जा सकते हैं- १.श्रव्य काव्य और २.दृश्य काव्य । श्रव्य काव्य में रसानुभूति पढ़कर या सुनकर होती है, जबकि दृश्य काव्य में रसानुभूति अभिनय एवं दृश्यों के द्वारा ही संभव है। अब 'रस क्या है?' मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यह प्रश्न जितना छोटा है, इसका उत्तर उतना ही जटिल और बड़ा है। संस्कृत काव्यशास्त्र में कहा गया है- 'रसस्यते असौ इति रसाः।' या 'रस्यते आस्वाद्यते इति रसः।' अर्थात् जिसका आस्वादन किया जाए वही रस है। रस का व्युत्पत्तिपरक अर्थ आस्वाद है। इसे काव्यानंद भी कहा जाता है। आचार्य भरतमुनि ने 'रस' और 'भाव' का विवेचन 'नाट्यशास्त्र' के षष्ठ और सप्तम अध्यायों में किया है। उनके अनुसार, 'विभावानुभावव्यभिचारि संयोगाद्रसनिष्पत्तिः।' अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव (संचारी भाव) के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। अब इस सूत्र के 'संयोग' और 'निष्पत्ति' के अर्थ को लेकर रस की अवस्थिति किस में होती है? इस संदर्भ में इसकी व्याख्या करने वाले आचार्य चतुष्टय हैं- १.भट्टलोल्लट (मीमांसा दर्शन), २. श्रीशंकुक (न्याय "), ३.भट्टनायक (सांख्य '') एवं ४.अभिनवगुप्त (शैव ")। इन व्याख्याओं का प्रभाव हिंदी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉक्टर नागेंद्र आदि पर पड़ा है। इसके अंतर्गत भट्टनायक का साधारणीकरण प्रमुख है। 'रस' और 'कविता' के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने निबंध 'कविता क्या है?' में लिखा है- "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।" (चिंतामणि, संजय बुक सेंटर, वाराणसी। पृष्ठ संख्या-83)
श्रव्य काव्य के भी दो उपभेद हैं- १.प्रबंध काव्य और २.मुक्तक काव्य। प्रबंध काव्य में कोई महान कथा होती है, जबकि मुक्तक काव्य में स्वतंत्र पदों के रूप में भावाभिव्यक्ति की जाती है। प्रबंध काव्य के भी दो प्रकार हैं- १.महाकाव्य और २.खण्डकाव्य। यहाँ पर मुझे बिहारी के मुक्तक के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन स्मरण हो रहा है, वे कहते हैं कि 'यदि प्रबंधकाव्य एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।' मुक्तक काव्य के दो भेद हैं- १.पाठ्य मुक्तक एवं २.गेय मुक्तक। महाकाव्यों और खंडकाव्यों के नाम से तो आप सब परिचित ही हैं। जैसे (रचना-कवि)- पृथ्वीराजरासो-चंद्रबरदाई, पद्मावत-जायसी, रामचरितमानस-तुलसीदास, साकेत-मैथिलीशरण गुप्त, प्रियप्रवास- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' एवं कामायनी-जयशंकर प्रसाद आदि महाकाव्य और हल्दीघाटी-श्यामनारायण पाण्डेय, पथिक-रामनरेश त्रिपाठी एवं रश्मिरथी-रामधारी सिंह 'दिनकर' आदि खंडकाव्य है।
पंत की 'पतझड़', निराला की 'भिक्षु', 'वह तोड़ती पत्थर', एवं श्रीप्रकाश शुक्ल की 'हड़परौली' आदि पाठ्य मुक्तक हैं और गेय मुक्तक के अंतर्गत गीति, प्रगीति, लोकगीत, गीत, नवगीत एवं ग़ज़ल रचनाएँ आदि आती हैं। इसमें भावप्रवणता, आत्माभिव्यक्ति, सौंदर्यमयी कल्पना, संक्षिप्तता, संगीतात्मकता की प्रधानता होती है। रविदास, कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, रसखान, रहीमदास, मीराँ, बिहारी, मतिराम, देव , महादेवी वर्मा आदि की रचनाएँ इसी कोटि में आती हैं। दृश्य काव्य के अंतर्गत नाटक, एकांकी एवं पटकथा आदि आती हैं।
साहित्य समाज का दर्पण है। वह एक सृजनात्मक अभिव्य्क्ति है। साहित्य जीवन का सौंदर्य है। सौंदर्य प्रियता मनुष्य की एक प्रधान मनोवृत्ति है। उसकी इस मनोवृति की प्रेरणा से ही सभ्यता, संस्कृति, कला, साहित्य एवं सिनेमा का विकास हुआ है। मानव भावों, विचारों, कल्पनाओं एवं अनुभूतियों की लालिल्यपूर्ण अभिव्यक्ति ही साहित्य है। असल में साहित्य भाषा में पुनर्जीवन है। प्रत्येक भाषा का साहित्य उस भाषा को बोलने वाले समाज का सजीव चित्र होता है। इस संदर्भ में आप आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आगामी पंक्तियों को पढ़िए- 'प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।' (हिंदी साहित्य का इतिहास, काल विभाग) साहित्य को परिभाषित करना कठिन है लेकिन विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से इस पर चिंतन किये हैं। एक और महत्त्वपूर्ण कथन आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का देखें- 'ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।' या फिर बालकृष्ण भट्ट की परिभाषा देखें- 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है।' अतः भाषा के द्वारा जीवन की मार्मिक अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यक्ति को ही साहित्य कहते हैं। साहित्य उस समाज को बदलने और उसको प्रगति की प्रेरणा देने का समर्थ साधन भी है।
'सौंदर्य' को केंद्र में रखते हुए पाश्चात्य विद्वान एडगर एलन पो ने लिखा है- 'Poetry is a rhythmic creation of beauty.' अर्थात् कविता सौंदर्य का लयात्मक सृजन है। मानव, जिसे प्रकृति द्वारा अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता प्राप्त है, सृष्टि की सुंदरतम् देन है। कवि मानवीय सौंदर्य का पक्षधर है। उसके भावों की अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से होती है। कविता शब्दों की नवनवोन्मेषशालिनी सृष्टि है। कविता में अंतःसौंदर्य का बोध होने के कारण इसे गद्य से ऊँची स्थिति प्राप्त है। कविता का सौंदर्य उपयुक्त शब्द-चयन द्वारा ही दृष्टव्य होता है। जीवन के सुख-दुख के प्रति कवि की प्रतिक्रिया कविता के रूप में फूट पड़ती है। कविता रचते समय जैसी अनुभूति कवि को होती है, वैसी ही अनुभूति वह पाठकों एवं श्रोताओं के मन में जगाना चाहता है। कवि-कर्म और कविता के महत्व को स्पष्ट करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि 'कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूति का संचार होता है' (चिंतामणि, संजय बुक सेंटर, वाराणसी। पृष्ठ संख्या-83) नक्सलवाड़ी कविता के दौर में धूमिल ने कविता के बारे में कहा है कि 'कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है।'
युग और युगधर्म में बिंब और प्रतिबिंब भाव से प्रतिभाषित होता है। कवि और युग एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं। कवि के अंर्तमन की गंभीर अनुभूति कविता का रूप धारण करती है। सृजन पूर्व कोई भी कवि एक अंतःप्रकृति से गुज़रता है जिसमें उसे सृजन के कई घटक तत्त्वों से जूझना पड़ता है।
कविता, मनुष्य-चेतना की सबसे महत्तम रचना है। वह भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करने के लिए शब्दचित्र, अर्थचित्र, ध्वनात्मक, बिंबात्मक, लयबद्ध और तालबद्ध भाषा विकल्पों के माध्यम से व्यक्त अनुभव के बारे में कल्पनाशील जागरूकता होती है। लय और तुक कविता को सहज गति और प्रवाह प्रदान करती हैं। कविता की एक समान गति को लय कहा जाता है। संगीत में लय की तीन कोटियाँ हैं- १.विलंबित लय, २.मध्य लय एवं ३.द्रुत लय। लेकिन कविता में मोटे तौर दो ही लय होती हैं, पहली शब्दलय और दूसरी अर्थलय। कविता लयबद्ध तथा तालबद्ध हो कर ही मनुष्य को आनंद और रस की अनुभूती करा सकती है। वह चाहे गद्यात्मक ही क्यों न हो? उसमें लय मौजूद होती है। क्योंकि वह मानव जीवन का सार है। संगीतात्मकता कविता की हृदय-गति होती है। लय, ताल एवं स्तरों के अरोहावरोह के कारण ही कविता के भाव भरकर आते हैं। लय-तत्व सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। झरने से लेकर सागर की लहरों में, चींटी से लेकर हाथी की चिंघाड़ तक में, चिड़ियों की चहचहाहट से लेकर भूख से बिलखते चूहे तक में, जंगल के जलने से लेकर पहाड़ टूटने तक में, आग में, पानी में और हवा में। वह हर जगह है।
लय मनुष्य के जीवन का आधार है। प्रकृति के एक रूप में लय के दर्शन होते हैं। सार्थक शब्दों के सुव्यवस्थित क्रम से कालजयी लय की व्युत्पत्ति होती है। इस लय में सत्य के स्वर, ताल और तान के सन्तुलित मिश्रण की मधुर सुरीली जय है। जो मनुष्यमात्र के चित्त को आनंदित करने के साथ-साथ उसके चेतना को जाग्रत करती है। इसी से हृदय में रंजक प्रस्फुटन होता है। इसके अभाव में कविता का कार्य संचालन नितान्त असंभव है। क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन लय से ही नियंत्रित होता है और इसको प्रकट करने की प्रक्रिया नाम ताल है। इसकी पहचान गति है। अलौकिक साहित्य में सामवेद गेय है, उसमें लय के प्रारंभिक स्वरूप को देखा जा सकता है। आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र लेकर आधुनिक कविता पर विचार करने वाले चिंतकों ने 'लय और प्रवाह' के महत्त्वपूर्ण को स्पष्ट किया है। लय के द्वारा मनोभावों के प्रदर्शन में रमणीयता, रोचकता, माधुर्य, सुन्दरता और उदात्तता आती है। इसकी कोई सीमा नहीं है, यह तो सभी सीमाओं से परे है। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि लोकोन्मुखी लय महान लय होती है और इस अर्थ में कोरोजयी लय अद्वितीय है।
कोरोजयी लय रचना की युगीन यथार्थ को इंगित करती हैं। सफल व सार्थक कविता लिखने के लिए अर्थ की लय निर्वाह जरूरी हैI कवि को भाषा के संगीत की पहचान होनी चाहिए। कोरोजीवी कविता में आंतरिक लय का निर्वाह गुरुवर प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता 'कोइलिया जल्दी कूको ना' में द्रष्टव्य है। इसमें लोक-संगीत के तत्व मौजूद हैं। यह एक ऐसी कोरोजीवी गीतात्मक कविता है जो अँधेरे की आकृति के विरुद्ध चेतना के चित्र सा चमक चुकी है। इसमें मनुष्यता का मानवीय स्वर है। अर्थात् इसमें आत्मा की आवाज़ की उदात्त लय है और इस लय में जीवन की जय की आलोकितालोड़ित अनुभूति है। जो युग बदलाव का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम है। वह अपनी सम्पूर्णता में जीवन है। प्रकृति, परिवेश, समय और समाज लय के प्रमुख स्रोत हैं। उसका समस्त राग कविता के एक सुन्दर शब्द में समाहित होता है। क्योंकि कविता एवं संगीत में चेतन और अवचेतन दोनों महत्त्वपूर्ण होते हैं। मैंने इस कविता को कई बार चर्चा की है। इसलिए उनकी एक अन्य कविता 'सुबह-ए-बनारस' की पंक्तियाँ देखें-
"पूर्णमदः की गूँजों से जब
पूर्णमिदं परिपूर्ण हुआ
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू
सजल स्नेह
शत घूर्ण हुआ।" (वाया नई सदी, पृष्ठ संख्या-100)
इस कविता की भाषा तत्सम प्रधान है। इसमें बनारस के शास्त्रीय संगीत को सुना जा सकता है। इस संगीतात्मकता की पृष्ठभूमि में रविदासिया राग की ऊँची अनुगूँज है। (क्रमशः)
©गोलेन्द्र पटेल
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
बेरोज़गारों का देश
बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास हमें खड़ा होने ...
-
स्त्री मुक्ति: ब्रालेस आंदोलन —गोलेन्द्र पटेल 1. बीजवपन: देह न बंधन, देह न बोझा, देह न चुप रह जाए रोज़ा। ब्रा न हो तो शिष्ट न मानी, कैस...
-
_*बहुजन जागरण चालीसा : नरेन्द्र सोनकर*_ 01. *❝ कहें गर्व-अधिकार से,नारी दलित यतीम।* नाम नहीं नारा नहीं, धम्म-दीप हैं भीम।। ❞ 02. ❝ जन्म ...
-
Golendra Patel corojivi@gmail.com हिंदी माध्यम के छात्रों का भविष्य हिंदी माध्यम के छात्रों का भविष्य : गोलेन्द्र पटेल ________________...



























