Saturday, 1 July 2023

हिन्दी कविता में स्तन : गोलेन्द्र पटेल / Breast in Hindi Poetry: Golendra Patel

हिन्दी कविता में स्तन : गोलेन्द्र पटेल

साहित्य, संगीत, सिनेमा एवं कला में स्तनों के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण रखना और उनकी शारीरिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्ता को समझना आवश्यक है। स्तनों का संबंध स्त्रीत्व, मातृत्व, ममता, स्नेह, प्रेम, प्रजनन, पोषण और पहचान ही नहीं, बल्कि सृजनात्मक शक्ति और सौंदर्य से भी है, लेकिन कहीं पर इनका वर्णन वात्सल्यवृत्ति में है, तो कहीं पर वासनावृत्ति में
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महान प्रेम मौन होता है, वह जितना कोमल है, उतना ही कठोर है, वह अपनी लघुता में विराट है, व्यापक है, विनम्र है, विशेष है, ब्रह्म है! अब जब जीवन में प्रेम का घनत्व कम होता जा रहा है। प्रेम की बात हो रही है, पर प्रेम जीवन से गायब है। प्रेम बाहर नहीं, भीतर की चीज़ है। वह तन नहीं, मन की वस्तु है, अर्थात् वह देह की वस्तु नहीं, आत्मा की वस्तु है; वह सम्पूर्ण आत्म-समर्पण है, इसलिए वह अपनी उदात्तता में भक्ति है, उसमें वह शक्ति है, जो अवगुणों को गुण बनाती है और असुंदर को सुंदर! प्रेम आंतरिक अनुभूतिप्रधान होता है। प्रेम व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व से होता है। कवि मानवीय सौंदर्योपासक प्राणी है। संस्कृत साहित्य के मानवीय सौंदर्य की अनुगूँज हिंदी कविता में सुनाई देती है। कालिदास के साहित्य इसके सबसे सर्वोत्तम उदाहरण हैं। मुझे 'हिंदी कविता में स्तन' पर बोलना है, तो मैं सर्वप्रथम महाकवि कालिदास से अपनी बात शुरू करता हूँ। वे 'मेघदूत' में कहते हैं :-

छन्‍नोपान्त: परिणतफलद्योतिभि: काननाम्रै-
     स्‍त्‍वय्यरूढे शिखरमचल: स्निग्‍धवेणीसवर्णे।
नूनं यास्‍यत्‍यमरमिथुनप्रेक्षणीयामवस्‍थां
     मध्‍ये श्‍याम: स्‍तन इव भुव: शेषविस्‍तारपाण्‍डु:।।

इस श्लोक में प्रकृति नायिका है, इसमें वे पीली पृथ्वी के स्तन की बात करते हैं। जिसका संबंध इसमें वर्णित पर्वत की चोटी से है। कविता में स्तन की चर्चा, मतलब मांसलता के मूल्य पर बातचीत। हिंदी में प्रेमानुभूति की मांसलता की जड़ें अंकुरणकाल (आदिकाल) के प्रेमपरक कविताओं में हैं क्योंकि वहाँ भी बहुत से प्रेमपरक कविताओं में प्रेम के नितांत दैहिक और उत्तेजक उरोज एवं नायिका के गुप्तांगों के शब्दचित्र सौंदर्य के साँचे में ढल कर नायक में 'कामेच्छा' को उदित करते हैं।

जीवन का प्रेम और सौंदर्य से अटूट संबंध है क्योंकि प्रेम के रंग और सौंदर्य की सुगंध जीवन के रंग और गंध हैं। देह प्रेम की जन्मभूमि है! देह के ही इर्दगिर्द प्रेम और सौंदर्य की अभिव्यंजना होती है। देह में ही वासना के फूल खिलते हैं। देह से ही उत्तेजक उजास फूटते हैं। देह से ही मनोवेग को उद्दीप्त करने वाली प्रेमपरक कविताएँ उपजती हैं। प्रेम देव है, तो स्त्री-देह देवमंदिर। स्त्री-देह की सुंदरता पुरुष-देह को सदैव उसकी जवानी का आभास कराती है। शायद इसलिए प्रेम के कवि ख़ुद को हमेशा युवा महसूस करते हैं। याद है न? पाण्डित्य और अलंकारिक नीरसता के बीच केशवदास का रसिक व्यक्तित्व वाली छवि। जब वे बूढ़े हो जाते हैं, तो युवतियों के 'बाबा' संबोधन पर कहते हैं :-
"केसव केसनि अस करी बैरिहु जस न कराहिं।
चंद्रबदन मृगलोचनी 'बाबा' कहि-कहि जाहिं।।"

स्त्री की सत्ता पुरुष की सत्ता से कहीं अधिक आगे है लेकिन अपभ्रंशकाल में हेमचंद्र की नायिका के स्तन इतने छोटे थे कि उसका नायक उसे प्यार नहीं करता है, उसमें उसका मन नहीं लगता है। बहुत प्रयत्न के बाद नायिका अपने स्तनों को बढ़ाने में सफ़ल हो पाती है। उसके स्तन इतने उत्तुंग हो जाते हैं कि उसका प्रिय उसके अधरों तक पहुँच नहीं पाता है। इसलिए वह स्वयं के अंगों को कोसने लगती है :-
"अइ तुगत्तणु जंग थणहं, सो छेदउ, न हु लाहु।
सहि जइ केम्वइ, तुडि-वसेण अहरि पहुच्चइ नाहु।।"
प्रेम और सौंदर्य का संबंध शाश्वत है। जीवन में सौन्दर्य प्रेम का प्राण है। मनुष्यता सौंदर्य की आत्मा है। प्रेम व सौन्दर्य मानवीय चेतना के उज्ज्वल वरदान हैं। ये दोनों अपने आप में व्यापक हैं। प्रेम व सौन्दर्य के चितेरे मैथिल कोकिल कवि विद्यापति नायिका के अंग–सौन्दर्य का वर्णन करते हुए उसके स्तनों पर अपनी नज़र टिकाते हैं, वे कहते हैं :-
“पीन पयोधर दूबरि गता।
मेरू उपजल कतक-लता।।
ए कान्हु ए कान्हु तोरि दोहाई।
अति अपूरूप देखलि साईं।। ”

यही नहीं, विद्यापति सद्य:स्नाता नायिका के स्तनों का वर्णन पूरे रसिक मूड में करते हैं। वे रूप–सौन्दर्य ख़ासकर सद्यः स्नाता का वर्णन करने में सिद्धहस्त हैं। सरोवर से स्नान करके तुरंत निकली युवती के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं :-

“कामिनि करत सनाने। हेरितहि हृदय हनय पंचबाने।।
चिकुर गरए जलधारा। जनि मुख ससि डर रोअए अंधकारा।।
कुचजग चारु चकेवा। निज कुल मिलि आन कौन देवा।।
ते शंका भुज पासे। बांधि धएल उडि जाएत अकासे।।”

प्रेमोन्मत्त नेत्रों में नायिका के कांतिमय शरीर का सुशोभित होना स्वाभाविक है। भक्तिकाल के सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावती के नखशिख वर्णन करते हुए उसके उभरे हुए उन्नत स्तन की क्या ख़ूब चर्चा की है। पद्मावती के स्तन और उनके अग्रभाग ऐसे हैं, गोया अनार और अंगूर फले हैं। उनकी नज़र में पद्मावती के हृदय रूपी थाल में दोनों कुच मानो सोने के दो लड्डू हैं, वे कहते हैं :-
"हिया थार कुच कंचन लाडू।
कनक कचोर उठे करि चाडू॥"
अपनी-अपनी भाषा में प्रेम, यौवन और सौंदर्य के कवि स्तन के आकर्षण की अभिव्यक्ति की है। नखशिख-वर्णन के अंतर्गत कवियों ने नायिकाओं के केश, मुखमण्डल, बाहु, स्तन, त्रिवली, रोमराजि, नाभिकूप, नेत्र, अधर, जघन, नितम्ब, चरण, रान, पीठ, पेट आदि का वर्णन किया है। स्तन नायिका का सर्वाधिक आकर्षक अंग होता है। इसीलिए संभवतः स्तन स्त्री-सौन्दर्यबोध का कोश है।

मैंने रीतिकालीन नायिकाओं पर चर्चा करते हुए कई बार यह बात कही है कि रीतिकाल की नायिकाएँ तरल रबड़ की हैं। वे विरह में कभी इतनी दुबली हो जाती हैं कि उनकी कानी अँगुली की अँगूठी उनके बाँह से होते हुए कमर से सरक जाती है। वे साँस लेती-छोड़ती हैं, तो कई हाथ आगे-पीछे हो जाती हैं। कभी वे इतनी तंदुरुस्त होती हैं कि उनके जोबन से ज्योति फूटी है अर्थात् उनके अंग-अगं से प्रकाश की किरणें फूटी हैं। यानी रीतिकालीन कविता में देह-दीप्ति की चर्चा है। रीतिकाल में नायिकाओं के स्तनों का क्या ख़ूब वर्णन प्रेम की पीर के कवि घनानंद ने किया है! वे कहते हैं कि छलकत जोबन अंग...! खैर, स्तनों के वर्णन में बिहारी का कोई सानी नहीं है। जहाँ उर्दू के शायर अपनी नायिकाओं के स्तनों को गुंबद (गुंबज) कहते हैं, वही बिहारी पर्वत शिखर कहते हैं। वे कहते हैं :-
"कुचगिरि चढ़ि अतिथकित ह्वै चली डीठि मुंह चाड़।
फिरि न टरी परियै रही परी चिबुक की गाड़।।"
इस शृंगारपरक छंद में स्तनरूपी पर्वत की चर्चा है। ऐसे वर्णनों की भावाभिव्यक्ति और अर्थ अपनी जगह पर है। लेकिन मैं जब भी नायिकाओं के गोपनीय अंगों का अगोपनीय वर्णन से गुज़रता हूँ , तो मैं सोचता हूँ कि मेरे साथ में पढ़ने वाली छात्राएँ जब इन वर्णनों को पढ़ती होंगी, तो उनके मन में विद्रोह की अग्नि धधक उठती होगी। वे इन कवियों की अपनी कल्पना में अच्छी ख़बर लेती होंगी। क्या सलेब्स (पाठ्यक्रम) बनाने में गुरु माताओं की राय नहीं ली जाती है? क्या वे अपने सगे बच्चों को भाषा के नाम पर ऐसे वर्णनों को पढ़ने के लिए कहती हैं? या फिर गुरु कहते हैं?

नायिकाओं के गोपनीय अंगों के बारे में सोचने का अर्थ है मानस में उनका नंगा उपस्थित होना, मन में उनकी काल्पनिक छवि की उपस्थिति का तन पर क्या प्रभाव पड़ता है इससे तो शायद सभी लोग परिचित हैं ही। खैर, मैं ऐसे वर्णनों को पोर्नोग्राफ़िक इमेज़ कहता हूँ। जिनको पढ़ने के बाद बाज़ारवाद की आँखों में वस्तु हो चुकी स्त्री नज़र आती है। ख़ासकर वे नायिकाएँ भी दिमाग़ में नाचने लगती हैं जो अपनी संस्कृति से कोसों दूर हो चुकी हैं। जो थोड़े से पैसों के लिए नंगा होती जा रही हैं। जो ग्राम की लड़कियाँ रीलस् के चक्कर में इंस्टाग्राम लेकर टेलीग्राम तक पर नंगी नज़र आती हैं, वे सब दिमाग़ में नाचती हैं।

मैं व्यक्तिगत तौर पर ऐसे वर्णनों से गुज़रने से बचता हूँ। हो सकता है मेरी बात आपको सतही चीज़ लगे। मगर मुझे बारिश में भींगी हुई किसी ऐसी नायिका को देखना अच्छा नहीं लगता है, जिसके अंग वस्त्रों के बाहर झाँकते हैं अर्थात् गोपनीय अंग दिखाई देते हैं। क्योंकि ये नायिकाएँ स्वप्न में पीछा करती हैं। इस प्रसंग को आगे हम प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल के वर्णन से समझेंगे। स्वकीया-प्रेम और परकीया-प्रेम का ऐसा वर्णन हर काल के कवियों ने अपने-अपने ढंग से किया है। अग्रवाल जी सुंदर रूप और सौंदर्य से अभिभूत होने वाले कवि हैं। उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ स्त्री-सौंदर्य शारीरिक दृष्टि से द्रष्टव्य है :-
"जहाँ कुएँ की जगत पर
मेरे घर के सामने
पानी भरने आती थीं
गोरी-साँवरि नारि अनेकों
गोरी रूप कमान समान तने तनवाली
प्रबल प्रेम की करती दृढ़ टंकार थी
और जहाँ मैं रात में
सपने के संसार में
दिन में जिन्हें कुमारी कहता और रात में प्रेमिका
जिन्हें अकेला सोता पाकर
मैं बाहों में कस लेता था
ओठों और कपोलों पर चुम्बन लेता था
अपना नाम कुचों पर जिनके
मीठे चुम्बन से लिखता था
जिनकी छाती बड़े से धक्-धक् करने लग जाती थी।"

अब आप ही बताइए कि केदारनाथ अग्रवाल के इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद किस पाठक को सुंदरता और प्रेम की प्यास नहीं लगेगी! जबकि पाठक स्नातक या परास्नातक का शिक्षार्थी हो!

नब्बे के दशक के प्रकृतिप्रेमी कवि निलय उपाध्याय अपनी कविता 'ताजमहल' में बेड़न औरतों के स्तनों की तुलना गुंबद से करते हुए कहते हैं :-
"गुंबदों के निमार्ण में दक्ष कारीगर
टर्की...बेड़न औरतों के स्तन पर बाहर से पड़ी नज़र
अब तक रचित गुंबद नक्काशी में छोटे हो चुके थे।"
स्तन का वर्णन वासना और वात्सल्य दोनों रूपों में होता रहा है लेकिन प्रेमपरक कविता में स्तन का वर्णन करते वक्त मांसलवादी कवि स्त्री की अस्मिता को ताख़ पर रख देते हैं, क्योंकि उन्हें सौंदर्य का आकर्षण अंधा बना देता है। वे शृंगार रस के नशे में वात्सल्य रस को भूल जाते हैं। उनके मानवीय संस्कार घास चरने चले जाते हैं। बहुत सारे स्त्रीवादी कवियों ने भी रीतिकालीन कवियों की भाँति स्तन का वर्णन किया है।
छायावाद प्रेम और वेदना का काव्य है। जयशंकर प्रसाद ने 'कामायनी' के 'श्रद्धा' सर्ग में श्रद्धा के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं :-

"नील परिधान बीच सुकुमार,
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।
खिला हो ज्यों बिजली का फूल,
मेघवन बीच गुलाबी रंग।।"

कामायनी के इन पंक्तियों का आशय चाहे जो भी हो! लेकिन अभिधार्थ तो यही है कि श्रद्धा नीले परिधान को धारण की है फिर भी उसका अधखुला सुकुमार व सुकोमल अंग दिख रहा है अर्थात् उरोज दिख रहा है।  अब उरोज को देख कर नायक (मनु) की स्थिति क्या होती है? कल्पना में भी नायिका के उरोज को देखकर नायक की कामाग्नि और अधिक प्रज्वलित हो उठती है न? यदि पाठक (छात्र) नायक से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, तो उसके साथ क्या होता है? इन प्रश्नों के जवाब वयःसंधि पर खड़े पाठक से अधिक बूढ़े शिक्षक जानते हैं क्योंकि वे भाषा में जवान हैं।
प्रसाद की उक्त अभिव्यक्ति को पद्माकर की निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है :-
"अधखुली कंचुकी उरोज अध-आधे खुले,
अधखुले वेष नख-रेखन के झलकैं।"

किसी नायिका की अवस्था से स्तन के सौंदर्य का घनिष्ठ संबंध है। जब नायिका यौवनावस्था में होती है, तो उसके उरोज उन्नत होते हैं, जो उसके रूप को आकर्षक बनाते हैं, जो उसके नायक को आकर्षित करते हैं और वे नायक में काम-भावना को उद्बुद्ध करते हैं। जब नायिका अधेड़ावस्था में होती है, तो उसके स्तन से नायक का मोहभंग होना शुरू हो जाता है और नायिका की उम्र की ढलान पर नायक का स्तनों से एकदम मोहभंग हो जाता है क्योंकि मनुष्य एक निश्चित समय के बाद रूप सौंदर्य से मुक्त हो जाता है और सौंदर्य की मुक्ति से मनुष्य वासना से वैराग्य की ओर चला जाता है। जिसे आप ओशो के शब्दों में संभोग से समाधि की ओर जाना कह सकते हैं। दुनिया के साहित्य में नायिकाओं की भिन्न-भिन्न अवस्था में उनके स्तनों का अनूठा वर्णन हुआ है। हिंदी में भी स्तनों का मार्मिक वर्णन हुआ है। आदिकाल में स्तनों के वर्णन में अग्रणी कवि विद्यापति हैं, तो रीतिकाल में बिहारी। इसलिए एक सहपाठी शिक्षार्थी का प्रश्न है कि बिहारी की कविता में कितने प्रकार के स्तनों की चर्चा है! यह प्रश्न जितना सरल या हास्यात्मक है उतना ही कठिन या विचारणीय है। शास्त्रों में नायिकाओं के विभिन्न भेद हैं। जैसे; भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार नायिका के आठ भेद हैं- वासकज्जा, विरहोत्कंठिता, स्वाधीनपतिका, कलहांतरिता, खंडिता, विप्रलब्धा, प्रोषितभर्तृका एवं अभिसारिका। अग्निपुराण" के अनुसार नायिका के आगामी भेद हैं- स्वकीया, परवीकया, पुनर्भू एवं सामान्या। बहरहाल, आयु, गुण, रूप, शरीर, शास्त्र आदि के कई आधारों पर ये भेद नाटक या महाकाव्य या महाकाव्यात्मक उपन्यास की नायिकाओं के हैं। लेकिन इन विभिन्न प्रकार की नायिकाओं के स्तनों के प्रकार की चर्चा तो साहित्यशास्त्र में नहीं हुई है, हो सकता है कामशास्त्र में हो! आयुर्वेद एवं चिकित्सा विज्ञान के ग्रंथों में बनावट एवं आकार के आधार पर कुछ प्रकार स्तनों की चर्चा सामने आती है। जैसे कि असिमेट्रिक शेप ब्रेस्ट, एथलीट शेप ब्रेस्ट, बेल शेप ब्रेस्ट, साइड सेट शेप ब्रेस्ट, स्लेंडर शेप ब्रेस्ट, स्लेंडर शेप ब्रेस्ट, टियर ड्रॉप शेप ब्रेस्ट, टियर ड्रॉप शेप ब्रेस्ट, राउंड शेप ब्रेस्ट, रिलैक्सड शेप ब्रेस्ट एवं ईस्ट- वेस्ट शेप ब्रेस्ट। खैर, बिहारी तो मुक्तक काव्य के कवि हैं। वे नायिका की विभिन्न अवस्थाओं में उसके स्तनों का वर्णन किये हैं, अब यह उनके पाठक की मनोवृत्ति पर निर्भर है कि उन्हें उनकी नायिका के स्तन कैसे दिखाई देते हैं। जिस दोहे में जैसे दिखाई देगें, वैसे स्तन होंगे, यानी वे उक्त प्रकारों में से कोई प्रकार बता सकते हैं।

स्त्री-पुरुष दोनों अपनी अपूर्णता में एक समान हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें एक दूसरे की ओर आकर्षित करती है। स्त्री अपनी नकारात्मकता को पुरुष की सकारात्मकता से और पुरुष अपनी नकारात्मकता को स्त्री की सकारात्मकता से संतुलित करते हैं। ताकि वे पूर्ण हो सकें। प्रेम परिणय के पथ पर स्त्री-पुरुष को पूर्णता प्रदान करता है। खैर, आज भी स्त्री अपनी देह में सिमटी हुई है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज द्वारा उसे देह तक सिमेट दिया गया है! अलंकार उसको अपनी ओर आकर्षित करता है और उसके स्तन पुरुष को अपनी ओर। पुरूष को स्‍त्री के पूरे शरीर की अपेक्षा उसके स्‍तनों से अधिक प्रेम है। यही कारण है कि पुरुषों के द्वारा रचित काव्‍य, साहित्‍य, चित्र, चलचित्र व मूर्तियाँ सब कुछ स्त्री के स्‍तनों से जुड़े हैं। स्तन तन-मन की ध्वन्यात्मकता के केंद्र हैं।
आदर्श अनुराग में त्याग का राग होता है। सौन्दर्य के उपासक देह से संवाद करते हैं। प्रेम सृष्टि को अपनी रागात्मकता से सींचता और संवर्धित करता है। प्रेम नैसर्गिक होता है, इसलिए उसमें निर्बंधता होती है कुंठा नहीं। प्रेम पराधीनता का प्रतिपक्ष रचता है, वह जीवन की स्वतंत्रता का स्वर है। लौकिक प्रेम की खेती देहभूमि में होती है। देह से गुज़रे बिना संभव नहीं है लौकिक प्रेम करना। न ही देहभाषा जाने बिना संभव है लौकिक प्रेम को समझना।
लौकिक प्रेम को नाटककारों एवं उपन्यासकारों ने भी अपने प्रेमपरक नाटक व उपन्यास के गीतों में रेखांकित किया है। प्रेमयुद्ध के लिए नायिका के स्तन हथियार होते हैं। वे आँखों से पहले स्तन की चमक से नायक को घायल करती हैं। नायक प्रेमक्रीड़ा में नायिका के इन्हीं हथियारों से सर्वप्रथम लोहा लेता है और पराजित हो जाता है। यही नहीं, इन हथियारों पर एकाधिकार के लिए जगत प्रसिद्ध लड़ाइयाँ लड़ी गयी हैं। इनके चक्कर में कितने नायकों के सर कटे हैं, इतिहास की ओर आँखें करने पर पता चलता है। सर कटने का प्रसंग उठा है, तो मैं बता दूँ कि कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध नाटककार गिरीश कारनाड ने 'हयवदन' नाटक के एक गीत में कहा है :-
"दोनों स्तनों पर एक-एक शीश
दोनों आँखों के लिए एक-एक पुतली।
दोनों बाँहों से दोनों का
अलग अलग आलिंगन
जिसकी मुझे न लज्जा है, न चिंता।
धरती के अंतर में रक्त बरसता है
आकाश में गीत की कोंपलें फूटती हैं।"

उन्मुक्त प्रेमकाव्य, प्रेम व मस्ती के काव्य, वैयक्तिक अनुभूतियों का चित्रण एवं प्रणयानुभूति की मधुर अभिव्यक्ति प्रेम, यौवन और सौंदर्य के पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। कविता में प्रेम के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा है। जब प्रेम का उदात्तीकरण होता है, तो वह भक्ति में तब्दील हो जाता है। इस संदर्भ में हमें रामचंद्र शुक्ल की आगामी सूक्ति याद आ रही है कि श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। इस सूत्र को समझने में हमें रसखान और मीरांबाई की कविताएँ मदद करती हैं। जिसकी विधिवत चर्चा हम कभी करेंगे।

उदात्त प्रेम हमेशा से बल और बुद्धि पर भारी रहा है। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि अलौकिक प्रेम ज्ञान पर विजय प्राप्त करता है जैसा कि सूरदास या रसखान के यहाँ है। लेकिन हयवदन में तो लौकिक प्रेम है फिर भी बल-बुद्धि पर भारी है। यहाँ दो नायक (देवदत्त व कपिल) एक नायिका (पद्मिनी) के प्रेम के चक्कर में ख़ुद को नष्ट कर लेते हैं, जो कि एक दूसरे के सच्चे मित्र भी हैं। बहरहाल, कभी-कभी पुरुषों की क्रूरता के सामने अपराजिता नायिका स्वयं अपने स्तन अपनी देह से अलग कर देती है। इस संदर्भ में आप केरल की 'नंगेली' को याद कर सकते हैं। जिसने 19वीं सदी में कुप्रथा 'ब्रेस्ट टैक्स'(स्तन कर) से मुक्ति पाने के लिए अपने स्तन काटे थे।

भारतीय संस्कृति का कहना है कि स्तन की पुकार दो ही व्यक्ति सुनते हैं। एक पति (प्रेमी) और दूसरा पुत्र (नवजात शिशु)। जब तक नायिका माँ नहीं बनी होती है, तब तक उसका नायक ही पुत्र की भूमिका में होता है। वह उसके स्तनों को निकोटता-बिकोटता-चिचोड़ता है, उससे खेलता है और उसको प्यार करता है। नायिका से दूर होने पर भी नायक को स्तनों की याद आती है। पास होने पर तो बात ही क्या! शमशेर बहादुर सिंह एक कविता में नायिका/प्रेयसी के स्तनों के पुलकने की बात करते हैं, वे कहते हैं :-

"आँखें अनझिप
खुलीं
वक्ष में।
स्‍तन
पुलक बन
उठते और
मुँदते।"

शमशेर एक और अपनी कविता 'गीली मुलायम लटें' में स्तनों को बिंबित होते हुए दिखाते हैं, वे लिखते हैं :-

"गीली मुलायम लटें
आकाश
साँवलापन रात का गहरा सलोना
स्तनों के बिंबित उभार लिए
हवा में बादल
सरकते
चले जाते हैं मिटाते हुए
जाने कौन से कवि को..."
मैं आगे वात्सल्य रस के दायर में स्तन की चर्चा करूँगा। ख़ाकसार उन स्तनों की चर्चा, जो भयंकर गरीबी की वजह से उघड़े हुए होते हैं, सूखे हुए होते हैं और चमड़ी की थैली की भाँति छाती से झुल रहे होते हैं। फिर भी माँ अपने भूखे नवजात शिशु को अहिंसा का दूध पीलाती है। दूध नहीं, सिर्फ़ सांत्वना पीलाती है और शिशु भूखा ही सो जाता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ऐसे ही माँओं का सजीव चित्रण करते हुए कहते हैं :-

"पर, शिशु का क्या हाल, सीख पाया न अभी जो आंसू पीना?
चूस-चूस सुखा स्तन माँ का सो जाता रो-विलप नगीना।"

ये मजदूर माँएँ भारत माता की सच्ची बेटियाँ हैं। दुनिया की सभी माँएँ एक समान पूजनीय हैं क्योंकि सबकी छाती में अपने बच्चे को देखकर ममता की नदी उमड़ती है। उनके स्तनों से अमृत की बूँदें टपकने लगती हैं। माँएँ मधु-स्तन-दान देती हैं। माँ कुरूप हो सकती है लेकिन कुमाता नहीं। रामायणकालीन कैकेयी भी राम की नज़र में कुमाता नहीं है। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत अपनी कविता 'अप्सरा' में माँ की महानता को रेखांकित करते हुए कहते हैं :-

"शैशव की तुम परिचित सहचरि,
जग से चिर अनजान
नव-शिशु के संग छिप-छिप रहती
तुम, माँ का अनुमान;
डाल अँगूठा शिशु के मुँह में
देती मधु-स्तन-दान,
छिपी थपक से उसे सुलाती,
गा-गा नीरव-गान।"
सूरदास वात्सल्य रस के सम्राट हैं उनके यहाँ माता यशोदा अपने आँचल से ढककर बाल कृष्ण को स्तनपान कराती हैं, इस संदर्भ में सूर का निम्नलिखित पद दर्शनीय है :-

"किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।।
मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिम्ब पकरिबैं धावत॥
कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरने चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत॥
कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति।।
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु को दूध पियावति॥"(क्रमशः)
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Friday, 9 June 2023

पहले माँ फिर बेटा : गोलेन्द्र पटेल

 

पहले माँ फिर बेटा

जब मैं अपने माँ के गर्भ में था
वह ढोती रही ईंट
जब मेरा जन्म हुआ वह ढोती रही ईंट
जब मैं दुधमुँहाँ शिशु था
वह अपनी पीठ पर मुझे और सर पर ढोती रही ईंट

मेरी माँ, माईपन का महाकाव्य है
यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उसका बेटा हूँ
मेरी माँ लोहे की बनी है
मेरी माँ की देह से श्रम-संस्कृति के दोहे फूटे हैं
उसके पसीने और आँसू के संगम पर
ईंट-गारे, गिट्टी-पत्थर,
कोयला-सोयला, लोहा-लक्कड़ व लकड़ी-सकड़ी के स्वर सुनाई देते हैं

मेरी माँ के पैरों की फटी बिवाइयों से पीब नहीं,
प्रगीत बहता है
मेरी माँ की खुरदरी हथेलियों का हुनर गोइंठा-गोहरा
की छपासी कला में देखा जा सकता है

मेरी माँ धूल, धुएँ और कुएँ की पहचान है
मेरी माँ धरती, नदी और गाय का गान है
मेरी माँ भूख की भाषा है
मेरी माँ मनुष्यता की मिट्टी की परिभाषा है
मेरी माँ मेरी उम्मीद है

चढ़ते हुए घाम में चाम जल रहा है उसका
वह ईंट ढो रही है
उसके विरुद्ध झुलसाती हुई लू ही नहीं,
अग्नि की आँधी चल रही है
वह सुबह से शाम अविराम काम कर रही है
उसे अभी खेतों की निराई-गुड़ाई करनी है
वह थक कर चूर है
लेकिन उसे आधी रात तक चौका-बरतन करना है
मेरे लिए रोटी पोनी है, चिरई बनानी है
क्योंकि वह मजदूर है!

अब माँ की जगह मैं ढोता हूँ ईंट
कभी भट्ठे पर, कभी मंडी का मजदूर बन कर शहर में
और कभी-कभी पहाड़ों में पत्थर भी तोड़ता हूँ
काटता हूँ बोल्डर बड़ा-बड़ा
मैं गुरु हथौड़ा ही नहीं, घन चलाता हूँ खड़ा-खड़ा

टाँकी और चकधारे के बीच मुझे मेरा समय नज़र आता है
मैं करनी, बसूली, साहुल, सूता, रूसा व पाटा से संवाद करता हूँ
और अँधेरे में ख़ुद बरता हूँ मेरा दुख मेरा दीपक है

मैं मजदूर का बच्चा हूँ
मजदूर के बच्चे बचपन में ही बड़े हो जाते हैं
वे बूढ़ों की तरह सोचते हैं
उनकी बातें
भयानक कष्ट की कोख से जन्म लेती हैं
क्योंकि उनकी माँएँ
उनके मालिक की किताबों के पन्नों पर
उनका मल फेंकती हैं
उनके बीच की कविता सत्ता का प्रतिपक्ष रचती है

अब मेरी माँ वही कविता बन गयी है
जो दुनिया की ज़रूरत है!

(©गोलेन्द्र पटेल / 10-06-2023)

कवि : गोलेन्द्र पटेल

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Thursday, 1 June 2023

कबीर : कल और आज / कबीर का करघा : गोलेन्द्र पटेल

एक).


कबीर तार्किक हैं

बुद्धिवादी हैं

सत्यवादी हैं 

सत्यान्वेषी हैं

सजग-सच्चे साधक एवं जननायक हैं

वे हर चीज़ को तर्क के तेराजू पर तौलते हैं

अब वह चाहे परिभाषिक शब्द हो

या फिर कोई बात


कबीर बुनकर हैं

युगद्रष्टा हैं

क्रांतिकारी हैं

समाज-सुधारक हैं

सामाजिक वैज्ञानिक हैं

निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी हैं

वैष्णव भक्त हैं

मानवधर्म-प्रवर्तक हैं

मानवताप्रेमी कालजयी कवि हैं

दार्शनिक हैं

साधना के क्षेत्र में युग-पुरुष हैं

काव्य के संभाव्य स्रष्टा हैं

भ्रमणशील व्यक्ति हैं

सारग्राही संत हैं

और अब कबीर किताबों के भीतर कराह रहे हैं

वे नहीं सोये हैं वाया रात


वे नाथों से प्रभावित हैं

सिद्धों से प्रभावित हैं

बुद्ध से प्रभावित हैं

और हम उनसे!


दो).


मेरे कबीर किसी किताब के कबीर नहीं ,

बल्कि जनमानस के कबीर हैं

इसलिए कोई कितना ही बड़ा कोविद क्यों न हों

मैं उनकी वही बातें ग्रहण करता हूँ

जो लोकमन की कसौटी पर खरी उतरती हैं! 


-गोलेन्द्र पटेल


कबीर का करघा : गोलेन्द्र पटेल

विषय :- 'कबीर : कल और आज'

सम्मानित मंच एवं प्रिय पथप्रदर्शक गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल जी, प्रिय गुरुजन एवं सहृदय साथियो! आज कबीर की 625वीं जयंती के अवसर मुझे कुछ बोलने और कविता पाठ का मौका मिला है। यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष का पल है।

कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहना है कि 'कबीर की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई।' मुझे लगता है कि उस भक्ति के बीज का बीज मैं हूँ।


चौदह सौ पचपन साल गए, चंद्रवार एक ठाठ ठए।

जेठ सुदी बरसात को पूरणमासी तिथि प्रकट भए।

घर गरजे दामिनी दमके बूँदें बरसें झर लाग गए।

लहर तलाब में कमल खिले तँह कबीर भानु प्रकट भए।



कबीर का जन्म 1455 संवत में हुआ या संवत 1456 में या किसी अन्य तिथि-विथि को। मुझे डेट को लेकर फर्क़ नहीं पड़ता। मैं व्यक्तिगत तौर मध्यकाल के किसी भी कवि के जन्म तिथि व जन्मस्थान और उनके निर्वाण तिथि, मृत्यु-स्थान को लेकर ज़्यादा विचार विमर्श नहीं करता हूँ। मेरा मानना है कि कवि का जन्म तब होता है जब उसे कोई दिशा दिखाने वाला मिलता है या कोई पथप्रदर्शक उसे पा जाता है। जैसे कबीर को उनके गुरु रामानंद ने पाया था, या कि कबीर ने रामानंद को। उनके प्रथम मिलन को ही मैं उनका जन्मदिन मानता हूँ। खैर, कबीर के संदर्भ में यह मिलन तिथि भी विवादस्पद है।


कबीर काशी के दूसरे वरिष्ठ कवि हैं जिन्होंने अपने प्रखर व तेजस्वी व्यक्तित्व के कारण न केवल मध्यकालीन भक्ति-साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई बल्कि पंद्रहवीं शताब्दी की संपूर्ण सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त तमस को अपनी ज्ञान-रश्मियों की आभा से दूर करने का प्रयास किया। कबीर की प्रासंगिकता उनकी वाणी की व्यापकता से है। कबीर की वाणी 'तेरा मेरा मनवा कैसे एक होई रे!' इस दिशा में समानता, सद्भावना और समृद्धि का समाज बनाने के लिए सांस्कृतिक पहल है। कबीर के बारे में किसने क्या कहा है? उन्हें ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, जो कबीर के परिवेश से आते हैं। जो उनके पेशे से अभी भी जुड़ें हैं। जैसे कि मैं किसी पर ध्यान नहीं देता हूँ।



कबीर भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रमुख सूत्रधार हैं। वे मृत्युंजय कलाकार हैं और कलाकारों की एक ही जाति होती है मनुष्यता। लेकिन दुःख की बात यह है कि कबीर के अधिकांश अध्येताओं ने कबीर को अपनी-अपनी जाति की आँखों से देखा है और कबीर को अपनी जाति का सिद्ध करने का (कु)प्रयास किया है। वे सब कबीर के कुछ पदों को लेकर हिंदू-मुस्लिम के बीच झुल रहे हैं। जैसे- 'जाति जुलाहा नाम कबीरा। बनि-बनि फिरौं उदासी।।' और 'परिहर काँम राँम कहि बौर सुनि सिख बंधू मोरी। हरि कौ नाँव अभैपददाता, कहै कबीरा कोरी।।' इनमें 'जुलाहा' (मुसलमान) और 'कोरी' (हिन्दू) शब्द उनकी बहस के बीजतत्व के रूप में उपस्थित हैं। किसी ने कोरी को जुगी (न हिंदू न मुसलमान अर्थात् एक भ्रष्ट जाति) बताया, तो किसी ने बनिया, तो किसी ओबीसी। कबीर पेशे से बुनकर थे यानी मध्यकाल के जुलाहे थे। इसलिए मुझे कबीर करघे पर मानवीय चेतना के चादर बिनने वाले कवि नज़र आते हैं। उनकी बुनकरी के ताने-बाने में जीवन के नये गाने और ज्ञान के मोती हैं। जिसे आप 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' पद में सुन सकते हैं इस संदर्भ मुझे अपने प्रिय पथप्रदर्शक शब्द-शिक्षक कवि व विभागाध्यक्ष सदानंद शाही जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं वे कहते हैं कि


'मुरदों के गांव में सब मर जायेंगे 

कबीर नहीं मरेंगे 

जब तक संसार जलता रहेगा 

कबीर धाह देते रहेंगे 

जब तक कागज की लेखी

खड़ी करती रहेगी भ्रम की टाटी

आती रहेगी ज्ञान की आंधी 


बैठे ठाले पंडे और पुरोहित 

चादर मैली करते रहें-

कबीर का करघा चलता रहेगा 

और नई चादर बुनी जाती रहेगी'



कबीर नाथों-सिद्धों की तरह ही बुद्ध से भी बहुत प्रभावित हैं। इसीलिए वे अनुभव पर बल देते हैं।

'तू कहता कागद की लेखी, 

मैं कहता आँखिन की देखी।

मैं कहता सुरझावन हारि,

तू राख्यौ उरझाई रे!!'



मेरे मन में कुछ सवाल ये हैं कि क्या हम कबीर के वारिस हैं? हम कबीर को कितना जीते हैं? हमें कबीर पढ़ाने वाले शिक्षक कबीर को कितना जीते हैं? क्या कबीर किताब की चीज़ हैं? आज कबीर के करघे की क्या स्थिति है? आख़िर जुलाहों को अपना जीवन ज़हर क्यों लग रहा है? आख़िर मेरे पिताजी अपने करघे बेच क्यों दिये? इन सवालों का जवाब हम सब को पता है।


आज हमें जरूरत है कि हम कबीर को जीयें। ताकि मुट्ठी भर लोग हमारी जीवटता की हत्या न कर सकें।


अंत में गुरुवर रामाज्ञा राय शशिधर जी के शब्दों में इतना ही कि


'करघा खेत कपास सब चले मौत की रेस।

बुन बुनकर बेहाल हूँ फिर भी नंगा देस।।' 

-गोलेन्द्र पटेल (क्रमशः)



आज के क्रान्तिचेता कवि करघे पर


बहुत समय पहले ही कबीर का करघा

कोई चुराया लिया है धरम...

चरखा तो गाँधी तक चला भी


वे बुनकरों पर कविता लिखते हैं

ताकि वे कबीर कहला सकें

कबीर नहीं तो कबीर के वंशज कहला सकें


कबीर होना इतना आसान नहीं है

कबीर इतना आसान होना भी इतना आसान नहीं है

कबीर हिंदी के पहले क्रान्तिचेता कवि हैं न!


वे कबीर पर लिखी कविता किसी ए.सी. कमरे में पढ़ते हैं

वे करघे के 'खाटी-राग' क्या जानें?

वे टेकुए की चुभन क्या जानें?

वे कपास का काला होना क्या जानें?

वे तानी की तान क्या जानें?

वे क्या जानें कि कैसे बुनी जाती है

करघे पर नई चेतना की नई चादर!

वे क्या जानें कि कपड़ों के थान का गान कैसा है

कि मानवीय रेज़े का रंग कैसा है

कि धरती की गति किस ढरकी की गति जैसी है!

वे कबीर के शब्द किताबों से सीखते हैं न?


वे धन्य हैं कि वे कबीर के कोविद हैं

और काशी धन्य है कि कबीर उसके यहाँ के हैं 

और हम धन्य हैं कि कबीर पेश से हमारे पुरखे हैं!


(©गोलेन्द्र पटेल / 01-06-2023)


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Friday, 26 May 2023

ऑक्सफोर्ड के आँसू / नालंदा पर नज़र / गोलेन्द्र पटेल

 


ऑक्सफोर्ड के आँसू


चूहो!

गिद्धों के गीत बाज़ बाँच रहे हैं

ऐसे में मुर्दा मौन के कौन को सुनना

बुरा तो है


नालंदा के मरसिया में

तक्षशिला की तकलीफ़

विक्रमशीला से कम नहीं है

और वल्लभी की पुष्पगिरी से...!


जहाँ एक आचार्य मस्त है

दूसरा पस्त

तीसरा अस्त हो चुका है

चौथा व्यस्त है

ऐसे वक्त में समस्त शिक्षार्थिगण उल्लुओं की आवाज़ें 

और गीदड़ों की हुआँ हुआँ सुन रहे हैं

और कुत्ते-बिल्लियों का प्रलाप भी!


खैर, एक पैर पर

ऑक्सफोर्ड के आँसू को पढ़ना

बुरा तो है


बजबजाती हुई बद्दुआओं की बत्तियाँ जल रही हैं

शेर और भेड़िए के पेट में हिरण और भैंस

की चीख उनकी भूख शांत कर रही है


साँप ज्ञान के अवशेषों पर

इंतज़ाररत है

उस पर्यटक का जो मनुष्यता का मुसाफ़िर है

वह जीभ पर डँसने की कला में 

माहिर है

उसकी फुफकार को सीने पर झेलना

बुरा तो है


'शोकमग्न' और शोक-'मगन' के बीच

नीचता-नफ़रत-निंदा की नागिन ख़ुश है

शिक्षा-व्यवस्था में इनका नाम

उरुस है


यह परिसर में उड़ती हुई उम्मीद की चिड़िया

का थरथराते चोंचों से शांतिपाठ है

इसे सुनना उनके लिए

बुरा तो है!!


(©गोलेन्द्र पटेल  / 13-04-2023)



नालंदा पर नज़र


आपको जानकर हैरानी होगी,

मुझे चंद्रगुप्त मौर्य ने बताया है

इतिहासकार इतिहास में एक सत्य लिखना भूल गये हैं

वह यह कि नालंदा में चाणक्य जब विद्यार्थी थे

तब वहाँ के आचार्यों की बात आपस में तनिक भी नहीं बनती थी 

लेकिन चाणक्य यह ज़रूर सोचते थे कि इनकी आपस में छनती है

पर धीरे-धीरे सब स्पष्ट हो गया


चाणक्य अक्सर अपने साथियों से कहा करते थे

यह शिक्षालय नहीं, जंगल है

यहाँ हर शिक्षार्थी हिरण है

और हर शिक्षक शेर

शब्दों में हेर-फेर हो सकता है, पर; भाव वही है

जो मुझे चंद्रगुप्त मौर्य ने बताया है


चाणक्य, आख़िर चाणक्य थे

च्युत दोपायों को चील समझ कर चाप देते थे

गिद्धों पर भी अपनी गुलेल से 

दो-चार सुलगते हुए शब्दों को दाग देते थे


उनकी बुद्धि की बंदूक में गोली नहीं,

आग भरी होती थी

ये सब जंगलराज के महाहिंसक महाराजाधिराज जानते थे


चाणक्य कनफुँकवों की कुटनीति से परिचित थे

क्योंकि उनके गुरु की नज़र पूरे नालंदा पर थी

जो भेड़ियों की भाषा ही नहीं,

कुत्तों के भोंकने तक का अर्थ उन्हें पहले ही समझा देते थे


उनके गुरु नालंदा के आँगन के महावृक्ष थे!



(©गोलेन्द्र पटेल / रचना : 27-05-2023)

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Tuesday, 16 May 2023

नाऊन (सोनू भइया को समर्पित कविता) : गोलेन्द्र पटेल

 

ये मेरे प्रिय सोनू भैय्या हैं, सहज, सरल, संवेदनशील, मृदुभाषी व हँसमुख व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हैं। ये विद्यालय के दिनों में मेरे सीनियर रहे हैं। खैर, मैंने 24 साल में एक बार भी अपने से अपनी दाढ़ी नहीं बनायी है आगे भी नहीं बनाऊँगा। इन्हीं से मैं अपना बाल कटवाता हूँ। ये बाल को हर तरह के स्टाइल व डिज़ाइन में काटते हैं। सोनू भइया को समर्पित निम्नलिखित कविता पढ़ें :-

नाऊन

मैंने सोचा—
नाउन’ एक ऐसी ‘संज्ञा’ है
जो समाज को सभ्यता की ओर उन्मुख करती है

फिर सोचा—
नाउन’ के ‘उ’ का दीर्घीकरण करना
ब्लेड से हमारी पशुता को कुतरना है

जहाँ कंघी और क़ैंची के बीच बाल का हाल
एक नाई समझता है
लेकिन वह क्या करे, उसे तो हमें सभ्य बनाना है न!

ईश्वर यदि कहीं झुकते हैं,
तो इनके यहाँ ही!

©गोलेन्द्र पटेल  

  रचना : 17-05-2023

कवि : गोलेन्द्र पटेल

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Monday, 17 April 2023

आलोचक कवि बन रहे हैं / वह कवि होना चाहता है / त्रयी की चाह : गोलेन्द्र पटेल

 

आलोचक कवि बन रहे हैं


अब जब 'खोजो कम खोदो जादा' 

हर विमर्श का नारा है

तब आलोचना, समालोचना, समीक्षा, टीका, टिप्पणी,

नुक्ताचीनी, छिद्रान्वेषण और भाष्य

क्रिटिसिज़म की क्यारी में कविता को कहानी बता रहे हैं

और निबंध को नाटक...

खैर, बिना पैर के संबुद्ध संपादक व प्रबुद्ध पाठक ख़ुश हैं 

कि कोरोना ने आलोचक को कवि बना दिया


किसी भी भाषा में कवि होना, विशेष होना है

काव्य-हेतु पर बात करते हुए 

दण्डी जैसे आचार्यों ने अभ्यास पर ज़ोर दिया है

शायद इसीलिए अब प्रतिभा से अधिक अभ्यास के

कवि जन्म ले रहे हैं

और आलोचक कवि बन रहे हैं

कवि तो खैर आलोचक होता ही है

ऐसे में सवाल यह है कि आज की आलोचना की

स्थिति क्या है?


क्या आलोचक होना 

व्युत्पत्ति के व्याकरण को समझना है?

या सिर्फ़ यश की चाह में कलम का

रोना है?


या उत्तर-कोरोना में करुणा लोक का श्लोक बन रही है

और उनके भीतर वाया वाल्मीकि का उदय हो रहा है

बात जो भी हो, 

उनकी आलोचना पर उनकी कविता हँस रही है

और मुझ जैसे अबोध शोधार्थी भी!


वे शब्द के पथिक हैं

उनके पास अनुभव अधिक है

उनकी उम्र उनकी रचना में बोलती है

उनके विचारों को खोलती है

क्या सच में वे नवोदितों में शामिल होना चाहते हैं?

या फिर ढंग का आलोचक न बन पाने का दुःख है उन्हें

अपनी उम्र के कवि को देखकर


उनके मन की पीड़ा 

उनकी रचना में एक टीस की तरह मौजूद है

अधेड़ या वरिष्ठ होकर कवि होना

समय का सृजनात्मक सूद है


उनसे अन्य आलोचक प्रेरणा ले सकते हैं

कि कवि होना, आलोचक होना है

किन्तु आलोचक होना, कवि होना नहीं है

कविता लिखने से कोई कवि थोड़े होता है

कविता तो पुरखे आलोचक भी लिखे हैं

तो क्या वे कवि हैं?

वह कवि होना चाहता है


लोचन तो उसके पास है ही नहीं

उसकी आलोचना से 'लुच्' धातु गायब है

वह 'लुच्चा' तो नहीं,

लेकिन उसका नायब है

क्योंकि 'लुच' से 'लुच्चा' बना है न?


आजकल वह देखता कम, 

दिखता ज़्यादा है

शायद भाषा में माँदा है!


उस पर कवि बनने का भूत सवार है

अब वह शब्द के अर्थ को उछालने की

कला सीख रहा है और

पद्य की जगह गद्य लिख रहा है


उसे याद है- 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।'

वह वाक्यों का कवि होना चाहता है

दूसरे कवियों को पढ़कर!


(©गोलेन्द्र पटेल  / 18-04-2023)

त्रयी की चाह


5 अगस्त 2021 के दिन

कवि होता हुआ आलोचक ने फोन पर मुझसे कहा—

मुझे ऐसी संस्था का युवा प्रतिनिधि के रूप में चुना गया है

जिसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत 

चार कवि हैं और

दो मेरे कक्षा अध्यापक हैं यानी प्रोफ़ेसर

फिर मुझे बधाई और शुभकामनाएँ दीं!


मैंने बातचीत के क्रम में पूछा कि आप तो आलोचक हैं न?

अभी पाँच-छह महीने से आपकी कविताएँ आ रही हैं

तो मैं आपको वरिष्ठों की लिस्ट में रखूँ, 

या फिर युवाओं की लिस्ट में,

या फिर नवोदितों की लिस्ट में, किसमें रखूँ?

क्योंकि आजकल कवि, आलोचक व आचार्य की त्रयी

पाने की होड़ लगी है

आप दो तो थे ही! बस कवि की कमी थी

उसने भी अभ्यास के आगे घुटने टेक दी


आपकी कविता अच्छी न हो, 

फिर भी आप अच्छे कवि मान लिये जाएंगे


ऊपर से आप इस संस्था के सचिव हैं

क्या आलोचना में आपका पाँव नहीं जमा सर?


खैर, मैं आपकी संस्था से जुड़ नहीं सकता

क्योंकि मेरी क्या औकात है कि इतने बड़े रचनाकारों को

कुछ सलाह दे सकूँ या कि कह सकूँ कि आपने गलत निर्णय लिया है!


सर, मुझे पूँछ पकड़ कर तैरने की आदत नहीं है

मैं स्वयं एक मल्लाह मछुआरा हूँ

नदी-सागर की भाषा में मनुष्यता का मज़दूर हूँ

मुझे बाढ़ से डर नहीं है भले ही मेरे पास

घर नहीं है, मैं गोधूलि में लौटता हूँ

जैसे लौटते हैं चौपाये या पंक्षिगण


मैं लौटता हूँ अतीत से वर्तमान में

और देखता हूँ खुले आसमान में अपने हिस्से का चाँद!


(©गोलेन्द्र पटेल  / 19-04-2023)

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Tuesday, 11 April 2023

प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के संग्रह 'वाया नई सदी' में 'कोरोजयी लय' : गोलेन्द्र पटेल

 


 'वाया नई सदी' में 'कोरोजयी लय': गोलेन्द्र पटेल


भाषा के माध्यम से प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों, भावों एवं अनुभूतियों आदि को दो प्रकार से व्यक्त करता है। पहला गद्य रूप में और दूसरा पद्य रूप में। गद्य शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के 'गद्' धातु के साथ 'यत्' प्रत्यय जोड़ने से होती है, जिसका अर्थ होता है- बोलना, बताना या कहना। और पद्य से तात्पर्य है- काव्य या कविता। काव्य वह छंदोबद्ध, छंदमुक्त एवं लयात्मक साहित्यिक रचना है, जो श्रोता या पाठक के मन में भावात्मक आनंद की सृष्टि करती है। काव्य के दो पक्ष होते हैं- भाव-पक्ष एवं कला-पक्षा। अर्थात् कविता के दो स्वरूप होते हैं- १. बाह्य स्वरूप। जिसके अंतर्गत लय, तुक, ताल, शब्द-योजना, लक्षण, व्यंजना, रीतियाँ, रस, छंद, अलंकार एवं भाषा आदि तत्व आते हैं और २.आंतरिक स्वरूप। जिसके अंतर्गत अनुभूति की तीव्रता, अनुभूति की व्यापकता, कल्पनाशीलता, रसात्मकता और सौंदर्यबोध, भावों का उदात्तीकरण एवं रागात्मकता आदि अवयव आते हैं। ये दोनों एक-दूसरे के सहायक और पूरक होते हैं। भाव-पक्ष का संबंध काव्य की वस्तु से है और कला-पक्ष का संबंध आकार-शैली से है। सामन्यतः विचारात्मकता और भावात्मकता गद्य और पद्य साहित्य के भेदक तत्व माने जाते हैं लेकिन इसका यह कतई आशय नहीं है कि गद्य भावात्मक और पद्य विचारात्मक नहीं हो सकता। ये दोनों तत्व दोनों में हो सकते हैं बल्कि आधुनिक काव्य में ख़ासकर साठोत्तरी कविता में इन दोनों तत्वों को एक साथ देखना सुखद है। इस संदर्भ में स्वयं पहले तार-सप्तक (1943 ई.) के कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की चर्चा की है। गद्य साहित्य में बौद्धिक चेष्टाएँ और चिंतनशील मनःस्थितियों की अभिव्यक्ति सहजता से होती है और पद्य साहित्य में भावपूर्ण मनःस्थितियों की। 


गद्य और पद्य मिश्रित रचना को चम्पु काव्य कहते हैं। जैसे "नल चम्पू" जिसकी रचना त्रिविक्रमभट्ट ने 10वीं शताब्दी में की और हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त की "यशोधरा" को चम्पू काव्य माना जाता है। काव्य के दो भेद किये जा सकते हैं- १.श्रव्य काव्य और २.दृश्य काव्य । श्रव्य काव्य में रसानुभूति पढ़कर या सुनकर होती है, जबकि दृश्य काव्य में रसानुभूति अभिनय एवं दृश्यों के द्वारा ही संभव है। अब 'रस क्या है?' मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यह प्रश्न जितना छोटा है, इसका उत्तर उतना ही जटिल और बड़ा है। संस्कृत काव्यशास्त्र में कहा गया है- 'रसस्यते असौ इति रसाः।' या 'रस्यते आस्वाद्यते इति रसः।' अर्थात् जिसका आस्वादन किया जाए वही रस है। रस का व्युत्पत्तिपरक अर्थ आस्वाद है। इसे काव्यानंद भी कहा जाता है। आचार्य भरतमुनि ने 'रस' और 'भाव' का विवेचन 'नाट्यशास्त्र' के षष्ठ और सप्तम अध्यायों में किया है। उनके अनुसार, 'विभावानुभावव्यभिचारि संयोगाद्रसनिष्पत्तिः।' अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव (संचारी भाव) के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। अब इस सूत्र के 'संयोग' और 'निष्पत्ति' के अर्थ को लेकर रस की अवस्थिति किस में होती है? इस संदर्भ में इसकी व्याख्या करने वाले आचार्य चतुष्टय हैं- १.भट्टलोल्लट (मीमांसा दर्शन), २. श्रीशंकुक (न्याय "), ३.भट्टनायक (सांख्य '') एवं ४.अभिनवगुप्त (शैव ")। इन व्याख्याओं का प्रभाव हिंदी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉक्टर नागेंद्र आदि पर पड़ा है। इसके अंतर्गत भट्टनायक का साधारणीकरण प्रमुख है। 'रस' और 'कविता' के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने निबंध 'कविता क्या है?' में लिखा है- "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।" (चिंतामणि, संजय बुक सेंटर, वाराणसी। पृष्ठ संख्या-83)


श्रव्य काव्य के भी दो उपभेद हैं- १.प्रबंध काव्य और २.मुक्तक काव्य। प्रबंध काव्य में कोई महान कथा होती है, जबकि मुक्तक काव्य में स्वतंत्र पदों के रूप में भावाभिव्यक्ति की जाती है। प्रबंध काव्य के भी दो प्रकार हैं- १.महाकाव्य और २.खण्डकाव्य। यहाँ पर मुझे बिहारी के मुक्तक के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन स्मरण हो रहा है, वे कहते हैं कि 'यदि प्रबंधकाव्य एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।' मुक्तक काव्य के दो भेद हैं- १.पाठ्य मुक्तक एवं २.गेय मुक्तक। महाकाव्यों और खंडकाव्यों के नाम से तो आप सब परिचित ही हैं। जैसे (रचना-कवि)- पृथ्वीराजरासो-चंद्रबरदाई,  पद्मावत-जायसी, रामचरितमानस-तुलसीदास, साकेत-मैथिलीशरण गुप्त, प्रियप्रवास- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' एवं कामायनी-जयशंकर प्रसाद आदि महाकाव्य और हल्दीघाटी-श्यामनारायण पाण्डेय, पथिक-रामनरेश त्रिपाठी एवं रश्मिरथी-रामधारी सिंह 'दिनकर' आदि खंडकाव्य है।

  

पंत की 'पतझड़', निराला की 'भिक्षु', 'वह तोड़ती पत्थर', एवं श्रीप्रकाश शुक्ल की 'हड़परौली' आदि पाठ्य मुक्तक हैं और गेय मुक्तक के अंतर्गत गीति, प्रगीति, लोकगीत, गीत, नवगीत एवं ग़ज़ल रचनाएँ आदि आती हैं। इसमें भावप्रवणता, आत्माभिव्यक्ति, सौंदर्यमयी कल्पना, संक्षिप्तता, संगीतात्मकता की प्रधानता होती है। रविदास, कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, रसखान, रहीमदास, मीराँ, बिहारी, मतिराम, देव , महादेवी वर्मा आदि की रचनाएँ इसी कोटि में आती हैं। दृश्य काव्य के अंतर्गत नाटक, एकांकी एवं पटकथा आदि आती हैं।


साहित्य समाज का दर्पण है। वह एक सृजनात्मक अभिव्य्क्ति है। साहित्य जीवन का सौंदर्य है। सौंदर्य प्रियता मनुष्य की एक प्रधान मनोवृत्ति है। उसकी इस मनोवृति की प्रेरणा से ही सभ्यता, संस्कृति, कला, साहित्य एवं सिनेमा का विकास हुआ है। मानव भावों, विचारों, कल्पनाओं एवं अनुभूतियों की लालिल्यपूर्ण अभिव्यक्ति ही साहित्य है। असल में साहित्य भाषा में पुनर्जीवन है। प्रत्येक भाषा का साहित्य उस भाषा को बोलने वाले समाज का सजीव चित्र होता है। इस संदर्भ में आप आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आगामी पंक्तियों को पढ़िए- 'प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।' (हिंदी साहित्य का इतिहास, काल विभाग) साहित्य को परिभाषित करना कठिन है लेकिन विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से इस पर चिंतन किये हैं। एक और महत्त्वपूर्ण कथन आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का देखें- 'ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।' या फिर बालकृष्ण भट्ट की परिभाषा देखें- 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है।' अतः भाषा के द्वारा जीवन की मार्मिक अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यक्ति को ही साहित्य कहते हैं। साहित्य उस समाज को बदलने और उसको प्रगति की प्रेरणा देने का समर्थ साधन भी है।


'सौंदर्य' को केंद्र में रखते हुए पाश्चात्य विद्वान एडगर एलन पो ने लिखा है- 'Poetry is a rhythmic creation of beauty.' अर्थात् कविता सौंदर्य का लयात्मक सृजन है। मानव, जिसे प्रकृति द्वारा अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता प्राप्त है, सृष्टि की सुंदरतम् देन है। कवि मानवीय सौंदर्य का पक्षधर है। उसके भावों की अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से होती है। कविता शब्दों की नवनवोन्मेषशालिनी सृष्टि है। कविता में अंतःसौंदर्य का बोध होने के कारण इसे गद्य से ऊँची स्थिति प्राप्त है। कविता का सौंदर्य उपयुक्त शब्द-चयन द्वारा ही दृष्टव्य होता है। जीवन के सुख-दुख के प्रति कवि की प्रतिक्रिया कविता के रूप में फूट पड़ती है। कविता रचते समय जैसी अनुभूति कवि को होती है, वैसी ही अनुभूति वह पाठकों एवं श्रोताओं के मन में जगाना चाहता है। कवि-कर्म और कविता के महत्व को स्पष्ट करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि 'कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूति का संचार होता है' (चिंतामणि, संजय बुक सेंटर, वाराणसी। पृष्ठ संख्या-83) नक्सलवाड़ी कविता के दौर में धूमिल ने कविता के बारे में कहा है कि 'कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है।'



युग और युगधर्म में बिंब और प्रतिबिंब भाव से प्रतिभाषित होता है। कवि और युग एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं। कवि के अंर्तमन की गंभीर अनुभूति कविता का रूप धारण करती है। सृजन पूर्व कोई भी कवि एक अंतःप्रकृति से गुज़रता है जिसमें उसे सृजन के कई घटक तत्त्वों से जूझना पड़ता है।


कविता, मनुष्य-चेतना की सबसे महत्तम रचना है। वह भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करने के लिए शब्दचित्र, अर्थचित्र, ध्वनात्मक, बिंबात्मक, लयबद्ध और तालबद्ध भाषा विकल्पों के माध्यम से व्यक्त अनुभव के बारे में कल्पनाशील जागरूकता होती है। लय और तुक कविता को सहज गति और प्रवाह प्रदान करती हैं। कविता की एक समान गति को लय कहा जाता है। संगीत में लय की तीन कोटियाँ हैं- १.विलंबित लय, २.मध्य लय एवं ३.द्रुत लय। लेकिन कविता में मोटे तौर दो ही लय होती हैं, पहली शब्दलय और दूसरी अर्थलय। कविता लयबद्ध तथा तालबद्ध हो कर ही मनुष्य को आनंद और रस की अनुभूती करा सकती है। वह चाहे गद्यात्मक ही क्यों न हो? उसमें लय मौजूद होती है। क्योंकि वह मानव जीवन का सार है। संगीतात्मकता कविता की हृदय-गति होती है। लय, ताल एवं स्तरों के अरोहावरोह के कारण ही कविता के भाव भरकर आते हैं। लय-तत्व सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। झरने से लेकर सागर की लहरों में, चींटी से लेकर हाथी की चिंघाड़ तक में, चिड़ियों की चहचहाहट से लेकर भूख से बिलखते चूहे तक में, जंगल के जलने से लेकर पहाड़ टूटने तक में, आग में, पानी में और हवा में। वह हर जगह है।


लय मनुष्य के जीवन का आधार है। प्रकृति के एक रूप में लय के दर्शन होते हैं। सार्थक शब्दों के सुव्यवस्थित क्रम से कालजयी लय की व्युत्पत्ति होती है। इस लय में सत्य के स्वर, ताल और तान के सन्तुलित मिश्रण की मधुर सुरीली जय है। जो मनुष्यमात्र के चित्त को आनंदित करने के साथ-साथ उसके चेतना को जाग्रत करती है। इसी से हृदय में रंजक प्रस्फुटन होता है। इसके अभाव में कविता का कार्य संचालन नितान्त असंभव है। क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन लय से ही नियंत्रित होता है और इसको प्रकट करने की प्रक्रिया नाम ताल है। इसकी पहचान गति है। अलौकिक साहित्य में सामवेद गेय है, उसमें लय के प्रारंभिक स्वरूप को देखा जा सकता है। आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र लेकर आधुनिक कविता पर विचार करने वाले चिंतकों ने 'लय और प्रवाह' के महत्त्वपूर्ण को स्पष्ट किया है। लय के द्वारा मनोभावों के प्रदर्शन में रमणीयता, रोचकता, माधुर्य, सुन्दरता और उदात्तता आती है। इसकी कोई सीमा नहीं है, यह तो सभी सीमाओं से परे है। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि लोकोन्मुखी लय महान लय होती है और इस अर्थ में कोरोजयी लय अद्वितीय है।


कोरोजयी लय रचना की युगीन यथार्थ को इंगित करती हैं। सफल व सार्थक कविता लिखने के लिए अर्थ की लय निर्वाह जरूरी हैI कवि को भाषा के संगीत की पहचान होनी चाहिए। कोरोजीवी कविता में आंतरिक लय का निर्वाह गुरुवर प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता 'कोइलिया जल्दी कूको ना' में द्रष्टव्य है। इसमें लोक-संगीत के तत्व मौजूद हैं। यह एक ऐसी कोरोजीवी गीतात्मक कविता है जो अँधेरे की आकृति के विरुद्ध चेतना के चित्र सा चमक चुकी है। इसमें मनुष्यता का मानवीय स्वर है। अर्थात् इसमें आत्मा की आवाज़ की उदात्त लय है और इस लय में जीवन की जय की आलोकितालोड़ित अनुभूति है। जो युग बदलाव का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम है। वह अपनी सम्पूर्णता में जीवन है। प्रकृति, परिवेश, समय और समाज लय के प्रमुख स्रोत हैं। उसका समस्त राग कविता के एक सुन्दर शब्द में समाहित होता है। क्योंकि कविता एवं संगीत में चेतन और अवचेतन दोनों महत्त्वपूर्ण होते हैं। मैंने इस कविता को कई बार चर्चा की है। इसलिए उनकी एक अन्य कविता 'सुबह-ए-बनारस' की पंक्तियाँ देखें-

"पूर्णमदः की गूँजों से जब

पूर्णमिदं परिपूर्ण हुआ

कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू

सजल स्नेह

शत घूर्ण हुआ।" (वाया नई सदी, पृष्ठ संख्या-100)


इस कविता की भाषा तत्सम प्रधान है। इसमें बनारस के शास्त्रीय संगीत को सुना जा सकता है। इस संगीतात्मकता की पृष्ठभूमि में रविदासिया राग की ऊँची अनुगूँज है। (क्रमशः)


©गोलेन्द्र पटेल

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