Thursday, 4 September 2025

विद्यालय से विश्वविद्यालय तक गुरु-शिष्य

विद्यालय से विश्वविद्यालय तक की मेरी यात्रा में, निस्संदेह मेरे सुपरहीरो मेरे शिक्षक ही रहे हैं, लेकिन ज़्यादातर आदरणीय शिक्षक ही मिले, अनुकरणीय कुछ गिने चुने ही हैं! उनमें से एक हैं गुरुवर श्री मुमताज़ अहमद जी।


इस स्मृति-विहीन समय में लगभग 12–13 वर्षों बाद रामनगर (वाराणसी) के एक सम्मान समारोह में गुरुवर श्री मुमताज़ अहमद जी से अचानक भेंट हुई। संयोग इतना अद्भुत कि उसी कार्यक्रम में गुरुवर्य की भी अपने गुरु से लगभग 40 वर्षों बाद मुलाकात हुई। यह क्षण अवर्णनीय रूप से सुखद रहा।

गुरुवर मुमताज़ अहमद जी 7वीं–8वीं कक्षा में मेरे कक्षाध्यापक रहे, पर आज भी गाँव में मेरी पहचान उनके शिष्य के रूप में ही होती है।
सच कहूँ तो आज तक मुझे इनके जैसा कोई और शिक्षक मिला ही नहीं, जिसके नाम से मेरी पहचान गाँव में गूँज उठे।

सभी प्रिय शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं को 'शिक्षक दिवस' की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनायें सह सादर प्रणाम।🙏

__________________________________________

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की तीन कविताएं :-

1).

*शिल्पकार की ललकार : ज्ञान और श्रम के दीपक*
                         —गोलेन्द्र पटेल


अंधकार टिक नहीं सकता,
जब ज्ञान का दीपक जलता है।
गुरु वह शक्ति हैं
जो आँखों में तर्क का उजाला भरते हैं,
मनुष्य को अंधविश्वास की बेड़ियों से
मुक्त कराते हैं।

गुरु वह नहीं
जो आस्था का बोझ लादें,
बल्कि वही हैं
जो विज्ञान की कसौटी पर
हर तथ्य को परखना सिखाते हैं
और निर्भीकता से
सही-गलत का निर्णय कराते हैं।

वे चरित्र गढ़ते हैं
जैसे संगतराश पत्थर से आकृति निकालता है।
कठिन चट्टानों से
वे भविष्य का आकार तराशते हैं,
सिखाते हैं कि संघर्ष ही
मनुष्य की पहचान है,
और श्रम से बड़ा कोई देवता नहीं।

वे मिट्टी की तरह लचीला बनाते हैं,
कुम्हार की तरह भविष्य का चाक घुमाते हैं।
बताते हैं कि मानवता का सबसे बड़ा दीपक
ज्ञान और श्रम से जलता है,
न कि किसी चमत्कार से।

शिक्षक राष्ट्र के निर्माता हैं—
वे किताबों से अधिक
सोचने का विज्ञान पढ़ाते हैं,
आलोचना का साहस जगाते हैं,
नई पीढ़ी को तैयार करते हैं
ताकि वह अंधकार से टकराकर
भविष्य का सूरज गढ़ सके।

उनकी वाणी प्रेरणा का प्रवाह है,
उनका श्रम सामाजिक परिवर्तन का औजार।
वे सिखाते हैं:
मनुष्य ही इतिहास का असली शिल्पकार है
और समाज वही आगे बढ़ता है
जहाँ ज्ञान और श्रम को
समान सम्मान मिलता है।

अंधेरे की चट्टान पर हथौड़े की हर चोट
विज्ञान की धार बन जाती है—
न देवता, न मंत्र,
बस तर्क की छेनी
जो अज्ञान को चीरती है।

मिट्टी के लोथड़े से वे भविष्य गढ़ते हैं,
कुम्हार की तरह,
पर चाक उनका क्रांति का चक्र है।
बाजार की बाढ़ और नकली चमक के बीच
वे धरती को मजबूत बनाते हैं,
उपयोगी और अटूट।

चुनौतियाँ उनके लिए रुकावट नहीं—
वे ईंधन हैं।
समाज की दरारों को भरते हैं,
चरित्र की नींव डालते हैं,
सोच को आलोचना की आग में पकाते हैं
ताकि निकले प्रगति का सूरज
बिना किसी छाया के।

वे मार्गदर्शक ही नहीं, क्रांतिकारी हैं—
ज्ञान की लहरें फैलाते हैं,
जहाँ हर बच्चा नेता बने,
बंधन टूटें, विचार उड़ान भरें,
और राष्ट्र की एकता
वैज्ञानिक चेतना से गढ़ी जाए।

नहीं दोहराव, बस धारदार स्वर—
वे व्यक्तिगत विकास की आग जगाते हैं,
समस्या-समाधान की तलवार थमाते हैं
और पुकारते हैं:
“उठो, तराशो अपना कल,
क्योंकि शिक्षक नहीं रुकते,
क्रांति अनवरत चलती है।”
★★★


2).

*क्रांति का आलोक : गुरु–शिष्य, शिक्षा और मुक्ति*
                            —गोलेन्द्र पटेल


गुरु सिर्फ़ ज्योति नहीं,
वह मशाल है—
जो अँधेरे चीरती है,
सदियों की गुलामी तोड़ती है,
जाति की जंजीरें गलाती है।

शिक्षक केवल पाठ का व्यापारी नहीं,
वह भविष्य का शिल्पकार है—
जहाँ दलित–बहुजन की संतानें
गुलाम नहीं, शेर कहलाती हैं,
समानता की दहाड़ से गूँज उठती हैं।

गुरु वह है
जो परंपराओं की कैद को तोड़े,
स्वतंत्रता का मन्त्र दे,
तर्क का दीपक जलाए
और कहे—
“मनुष्य बनो, स्वाधीन बनो।”

शिक्षा—
काग़ज़ी डिग्री नहीं,
संघर्ष का शस्त्र है,
आत्मसम्मान का घोष है,
अंधविश्वास और ब्राह्मणवादी जाल
तोड़ने का तीखा हथियार है।

जब फुले ने पहला स्कूल खोला,
तो वह सिर्फ़ अक्षरज्ञान नहीं,
जाति की दीवार गिरा रहे थे।
सावित्रीबाई पर कीचड़ फेंका गया,
पर वही कीचड़ बहुजन चेतना की मिट्टी बना,
क्रांति के फूल खिला गया।

अंबेडकर ने कहा—
“शिक्षा शेरनी का दूध है।”
हाँ, गुरु वही है
जो शिष्य के भीतर शेर जगाए,
गुलामी की आदत मारे,
सिंहनाद करना सिखाए।

विद्यालय अगर सिर्फ़ किताबों तक सीमित है,
तो अधूरा है।
विश्वविद्यालय अगर केवल डिग्रियाँ बाँटे,
तो निरर्थक है।
सच्चा शिक्षालय वही है—
जहाँ आलोचना जन्म ले,
सोचने का साहस पनपे,
“क्यों?” और “कैसे?”
हर पाठ का हिस्सा बनें।

विद्यार्थी—
अनुशासन का गुलाम नहीं,
अन्याय का सबसे पहला प्रतिरोधक है।
गुरु–शिष्य परंपरा झूठ है,
जब तक गुरु शिष्य को
जाति–धर्म की कैद से मुक्त कर
मनुष्यत्व का पाठ न पढ़ाए।

सच्चा शिक्षक वही है
जो सिखाए—
“संविधान तुम्हारा शस्त्र है,
संघर्ष तुम्हारा मार्ग है,
बराबरी तुम्हारा धर्म है।”

ज्ञान—
संस्कृत श्लोकों का संग्रह नहीं,
मज़दूर की पुकार है,
किसान की कराह है,
स्त्री की मुक्ति की ज़िद है,
बहुजन का आत्मबोध है।

गुरु का धर्म है
दलित को ब्राह्मण का शिष्य न बनाना,
बल्कि मनुष्य का स्वामी बनाना।
शिक्षक का धर्म है
वंचित की प्रतिभा पहचानना,
उसे ऊँचाई देना
और कहना—
“भविष्य तेरे हाथ में है।”

आज ज़रूरत है
बुद्ध और कबीर जैसे मार्गदाताओं की,
फुले और सावित्रीबाई जैसे शिक्षकों की,
अंबेडकर और पेरियार जैसे पथप्रदर्शकों की,
जो शिक्षा को शांति-क्रांति का घोषणापत्र बनाएँ।

यह विद्रोह का मन्त्र है,
बहुजन समाज को जगाने वाली चेतावनी—
“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”

गुरु आता है तूफ़ान बनकर,
अविद्या की कालकोठरी फाड़कर
प्रकाश बिखेरता है।
नहीं केवल ज्ञान,
बल्कि विद्रोह की आग और समानता का हथियार सौंपता है।

वह क्रांति का सेनापति है,
भविष्य का शिल्पकार है,
जो दलित बस्तियों में स्कूल खोलता है,
महिलाओं को उड़ान देता है,
हर हाथ में कलम,
हर ज़ुबान में विद्रोह थमाता है।

गुरु–शिष्य का बंधन
पवित्र नहीं, युद्ध का संधि–पत्र है—
जहाँ शिष्य बनता है योद्धा,
गुरुकुल क्रांति का अड्डा होता है,
जहाँ वेदों से नहीं,
संविधान की धाराओं से जीवन बहता है।

विद्यार्थी जीवन—
संघर्ष का मैदान है।
छुआछूत की चोट सहकर,
अनुशासन से संगठित होकर
बहुजन सेनाएँ गढ़ता है।
उसकी निष्ठा सत्ता के प्रति नहीं,
न्याय के प्रति होती है।

विद्यालय की नींव
बराबरी पर टिकनी चाहिए।
विश्वविद्यालय
स्वतंत्रता का किला होना चाहिए।
डिग्री का नहीं,
क्रांति का पुल होना चाहिए—
जहाँ वंचित नेता बनते हैं,
छिपी प्रतिभाएँ ज्वालामुखी बनकर फूटती हैं।

फुले ने स्कूल खोले,
सावित्रीबाई ने आग लगाई,
अंबेडकर ने घोषणा की—
“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”
यही है गुरु–शिष्य की क्रांति का घोषणा–पत्र।

गुरु देवता नहीं,
मानव उत्थान का योद्धा है।
शिक्षक वेतनभोगी नहीं,
समाज का क्रांतिकारी है।
अंबेडकरवादी तीर से
असमानता को भेदता है,
दलित चेतना की आग से
कुरीतियों को जलाता है।

यह कविता नहीं—
विद्रोह का मैनिफेस्टो है।
यह प्रेरणा का स्रोत है
जहाँ हर शिष्य गुरु बनता है।
उठो बहुजन!
शिक्षा की तलवार थामो,
जंजीरें तोड़ो,
समता और न्याय का नया भारत गढ़ो।

बौद्ध नैतिकता से करुणा बहाओ,
वंचित को अधिकार दिलाओ,
गुरु को ईश्वर से ऊपर मानो,
क्योंकि वही अंधकार नहीं,
शोषण से मुक्ति देता है।

क्रांति का आलोक फैलाओ—
हर कक्षा, हर गुरुकुल में।
बहुजन का सूरज उगाओ—
जो कभी न डूबे।
संघर्ष अनंत है,
पर विजय निश्चित है—
शिक्षा से, गुरु से, शिष्य से,
क्रांति से
संतों का सपना साकार करो—
“ऐसा चाहूँ राज मैं,
जहाँ मिलै सबन को अन्न। 
छोट बड़ो सब सम बसै,
रैदास रहै प्रसन्न।”
★★★

3).

*शिक्षक*

—गोलेन्द्र पटेल 

शिक्षा सृष्टि की सबसे महान रोशनी है 

सीखना और सिखाना क्रिया के बीच 
मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ एक शिक्षार्थी हूँ
लेकिन कुछ लोग हैं 
कि मुझे शिक्षक समझते हैं

क्योंकि 
भाषा में एक पुरखे कवि* ने अर्ज़ की है,
“प्रत्येक कवि शिक्षक होता है,
मैं चाहता हूँ कि या तो मैं शिक्षक समझा जाऊँ
या कुछ नहीं।”

समझने और समझाने के बीच 
शिक्षक जीवनपर्यंत शिक्षक बना रहता है 
अपने शिक्षार्थी को नया जीवन देते हुए
यह सीख देते हुए 
कि ऐसे सीखो कि जैसे सदैव जीना है 
सफलता का अमृत पीने से पहले 
असफलता का विष पीना है

शिक्षक होना 
असल में उदात्त उजाले को उचित दिशा दिखाना है!
★★★

*वर्ड्सवर्थ 
__________________________________________

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


गुरु, शिक्षक और शिक्षा : अंधकार से मुक्ति का अंबेडकरवादी घोषणापत्र — गोलेन्द्र पटेल

 गुरु, शिक्षक और शिक्षा : अंधकार से मुक्ति का अंबेडकरवादी घोषणापत्र
—गोलेन्द्र पटेल



भारतीय समाज में "गुरु" और "शिक्षक" की भूमिका सदियों से चर्चा का विषय रही है। पारंपरिक धारणाओं में गुरु को देवताओं से भी ऊँचा स्थान दिया गया, क्योंकि वे अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश देते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि यह "प्रकाश" किसके हिस्से आया और किसे अंधकार में ही छोड़ दिया गया? किसके लिए गुरुकुलों के द्वार खुले रहे और किसे वहाँ प्रवेश करने से रोका गया? यही प्रश्न आज हमें गुरु-शिष्य परंपरा को अंबेडकरवादी दृष्टि से पुनर्परिभाषित करने के लिए मजबूर करता है।

शिक्षा : दमन से मुक्ति का औज़ार

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को मुक्ति और समानता का सबसे बड़ा हथियार बताया। उनका वाक्य आज भी गूंजता है—
"शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वही दहाड़ेगा।"
यह दहाड़ केवल व्यक्तिगत उन्नति की नहीं, बल्कि सामूहिक मुक्ति और सामाजिक क्रांति की है। इसलिए गुरु और शिक्षक का असली कर्तव्य केवल पाठ्यपुस्तकें पढ़ाना नहीं, बल्कि शोषित-उत्पीड़ित समाज को अपने पैरों पर खड़ा करना, उनमें आत्मसम्मान जगाना और उन्हें संघर्ष के लिए तैयार करना है।

गुरु-शिष्य परंपरा : आलोचनात्मक पुनर्पाठ

भारतीय परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध को पवित्र माना गया, किंतु वास्तविकता यह है कि यह परंपरा जाति और वर्ण की दीवारों में कैद थी। शूद्रों, दलितों और स्त्रियों को ज्ञान से वंचित रखकर इस परंपरा ने सदियों तक अंधकार को ही उनका भाग्य बना दिया।
आज आवश्यकता है कि हम इस परंपरा को पुनर्परिभाषित करें—

गुरु वह है जो शोषण के खिलाफ संघर्ष का रास्ता दिखाए।

शिक्षक वह है जो समाज के वंचित वर्गों में आलोचनात्मक सोच और आत्मविश्वास पैदा करे।

गुरु और शिक्षक की कसौटी यह होनी चाहिए कि वह ज्ञान किसे उपलब्ध करा रहा है और किसे परिवर्तन के लिए तैयार कर रहा है।


अंबेडकरवादी गुरु : ज्ञान और क्रांति का संगम

अंबेडकर ने कहा था— "शिक्षित बनो, संगठित रहो, और संघर्ष करो।" यह केवल नारा नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा के नए स्वरूप का घोषणापत्र है।

गुरु का कार्य अब केवल शिष्य के चरित्र निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि उसके भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने की चेतना जगाना है।

शिक्षक का कर्तव्य है कि वह छात्र को विज्ञान, तर्क और समानता की दृष्टि से सुसज्जित करे, ताकि वह परंपरा और रूढ़ियों की गुलामी से मुक्त हो सके।


बहुजन महापुरुष और शिक्षा की क्रांति

ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और बाबासाहेब अंबेडकर जैसे महापुरुषों ने शिक्षा को क्रांति का औज़ार बनाया।

सावित्रीबाई फुले ने पहला विद्यालय खोलकर स्त्रियों और दलितों को शिक्षा का अधिकार दिया। वे असली "जनगुरु" थीं, जिनकी क्रांति आज भी प्रेरणादायक है।

ज्योतिबा फुले ने "सत्यशोधक समाज" के माध्यम से ज्ञान को ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्त कर बहुजनों के हाथ में सौंपा।

अंबेडकर ने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत सफलता का साधन नहीं माना, बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की नींव के रूप में स्थापित किया।


शिक्षा : आत्मसम्मान और संघर्ष की धुरी

अंबेडकरवादी दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि शिक्षा का असली उद्देश्य नौकरी पाना या डिग्री अर्जित करना भर नहीं है।

यह आत्मसम्मान जगाने का माध्यम है।

यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक सोच विकसित करने का साधन है।

यह जाति, लिंग और वर्ग आधारित अन्याय को पहचानने और उसके खिलाफ खड़े होने की ताक़त देती है।


आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियाँ

आज विश्वविद्यालय और विद्यालय "ज्ञान" तो बाँट रहे हैं, लेकिन यह ज्ञान किसकी सेवा कर रहा है? क्या यह शिक्षा गरीब, दलित, आदिवासी और स्त्रियों को बराबरी दे रही है, या फिर उन्हें बाज़ार और सत्ता का उपकरण बना रही है?
अंबेडकरवादी दृष्टिकोण कहता है कि शिक्षा तभी सार्थक है, जब वह समाज में बराबरी और न्याय को मज़बूत करे, न कि असमानता को और गहरा करे।

घोषणापत्र : नए युग का गुरु-शिष्य संबंध

1. गुरु-शिष्य परंपरा अब केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि संघर्ष और परिवर्तन की साझेदारी है।


2. हर शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बहुजन बच्चों को मुख्यधारा से जोड़कर उनमें आत्मविश्वास पैदा करे।


3. शिक्षा को बाज़ार और जाति की कैद से मुक्त कर, उसे सामाजिक न्याय की धुरी बनाया जाए।


4. असली गुरु वही है, जो शिष्य को प्रश्न करना सिखाए, न कि अंधविश्वास में झुकना।


5. अंबेडकरवादी शिक्षक वही है, जो "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो" का जीवन्त उदाहरण बने।



निष्कर्ष

गुरु और शिक्षक का महत्व निर्विवाद है, लेकिन उनकी भूमिका का पुनर्पाठ करना ज़रूरी है। आज हमें ऐसे गुरु चाहिए, जो केवल ज्ञान न दें, बल्कि न्याय और समानता के लिए लड़ने की प्रेरणा दें। ऐसे शिक्षक चाहिए, जो केवल पाठ्यक्रम न पढ़ाएँ, बल्कि बहुजन समाज की चेतना को जगाएँ।
यही अंबेडकरवादी शिक्षा का मार्ग है—
ज्ञान से मुक्ति, शिक्षा से क्रांति और गुरु-शिष्य परंपरा से सामाजिक न्याय की स्थापना।

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Wednesday, 20 August 2025

“दूसरी आज़ादी का आह्वान : यशःकायी बोधिसत्व डॉ. सोनेलाल पटेल”—गोलेन्द्र पटेल

सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत, वंचितों के अधिकारों के सशक्त प्रवक्ता, किसानों व कमेरा समाज के मसीहा, सामाजिक न्याय और समरसता के प्रखर प्रणेता, अपना दल के संस्थापक यशःकायी बोधिसत्व डॉ. सोनेलाल पटेल जी पर केंद्रित बहुजन कवि-लेखक श्री गोलेन्द्र पटेल जी की दो कविताएँ :-


1).

दूसरी आज़ादी का आह्वान : डॉ. सोनेलाल पटेल


वे मिट्टी से जन्मे थे,

हल-जोते खेतों की गंध से भरे हुए,

किसान का बेटा होकर भी

आकाश की भौतिकी पढ़ने निकले थे।

पर ज्ञान का प्रकाश जब देखा—

तो जाना कि सबसे अँधेरा

तो मनुष्य की आँखों पर बैठा है,

जाति, शोषण और अन्याय का।


उन्होंने कहा—

“यह कैसी आज़ादी है,

जहाँ बहुजन भूख से मरता है

और गिने-चुने लोग राजसिंहासन पर बैठे हैं?”

इसलिए उनका स्वर गूँजा—

“दूसरी आज़ादी चाहिए,

अन्याय की जंजीरें तोड़नी होंगी।”


लाठीचार्ज की पीड़ा, जेल की दीवारें,

साजिशों के काँटे, षड्यंत्र की छाया—

किसी ने उन्हें रोका नहीं।

वे खड़े रहे—

समानता की मशाल हाथ में लिए,

कमेरा समाज की धड़कन बने।


उन्होंने धर्म की बेड़ियाँ भी तोड़ीं,

सरयू तट पर

अंधविश्वास की राख झटककर

धम्म का प्रकाश अपनाया।

बोधिसत्व कहाए,

क्योंकि करुणा और संघर्ष

उनके जीवन का धर्म था।


राजनीति को उन्होंने

सत्ता का खेल नहीं,

बल्कि वंचितों की हथेली में

न्याय रखने का माध्यम समझा।

“गिनती जितनी, हिस्सेदारी उतनी”—

उनकी यह घोषणा

हवा में नहीं,

जनता के दिल में गूँज बन गई।


वे जानते थे—

दलित, पिछड़े, किसान, स्त्रियाँ, वंचित—

इनकी मुक्ति के बिना

भारत की आत्मा अधूरी है।

इसलिए उन्होंने कहा—

“कुर्मी की ताक़त को पहचानो,

बहुजन की शक्ति को जगाओ

और व्यवस्था के किले को

गिराने के लिए आगे बढ़ो।”


पर सत्ता हमेशा डरती है

उन आवाज़ों से

जो सच्चाई बोलती हैं।

इसलिए सड़क की दुर्घटना

एक सवाल बनकर खड़ी है—

क्या सचमुच दुर्घटना थी

या न्याय की हत्या?

आज भी इतिहास पूछता है

और उनके अनुयायी संकल्प दोहराते हैं—

“सत्य को कभी मारा नहीं जा सकता।”


उनकी विरासत सिर्फ़ एक दल नहीं,

बल्कि जलते हुए दीपक की तरह है—

जो किसानों की झोपड़ियों में,

दलित बस्तियों की गलियों में,

पिछड़ों की चेतना में

अब भी रोशनी करता है।


उनकी संतानें,

उनकी पार्टी,

उनके सपनों का कारवाँ—

भले बँट गया हो दिशाओं में,

पर उनका मूल संदेश

आज भी वही है—

“समानता से कम कुछ नहीं चाहिए।”


हे सोनेलाल!

हम तुम्हें प्रणाम करते हैं

शत-शत नमन के साथ,

पर नमन ही काफ़ी नहीं।

हम तुम्हारे स्वप्न को

संघर्ष की धरती पर

फिर से बोने का संकल्प लेते हैं।


तुम्हारी आवाज़ आज भी गूँजती है—

“दूसरी आज़ादी चाहिए,

समानता का सूरज चाहिए,

जनता का राज चाहिए।”


और जब तक यह धरती

अन्याय से दहकती रहेगी,

तब तक तुम्हारा नाम

क्रांति की धड़कन बनकर

हमारे सीने में जलता रहेगा।

★★★



2).

क्रांति का बोधिसत्व


शोषितों की ललकार, सोनेलाल!  

कुर्मी मिट्टी से जन्मा योद्धा,  

दूसरी आज़ादी का आगाज़ आपने किया,  

वंचितों के हक़ में तलवार उठाई।  


अपना दल का बीज बोया,  

किसान-दलित की हिस्सेदारी माँगी,  

बौद्ध दीक्षा से हिंदुत्व की जंजीर तोड़ी,  

समरसता की आग में कट्टरता जलाई।  


साजिशों में घिरा, लाठी-गोली सही,  

सड़क पर 'हत्या' की आड़ में दफ़नाया गया,  

पर आपकी आवाज़ अब विद्रोह की चिंगारी,  

पल्लवी-अनुप्रिया में बँटी, मगर अमर।  


उठो, पिछड़ो! न्याय की आँधी बनो,  

शोषण की दीवारें ढहाओ, क्रांति जगाओ!  

सोनेलाल की जयंती पर संकल्प:  

हर वंचित का राज, या फिर युद्ध!

★★★

डॉ. सोनेलाल पटेल (2 जुलाई 1950 – 17 अक्टूबर 2009) एक भारतीय राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता और अपना दल (Apna Dal) के संस्थापक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के बगुलीहाई गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने पंडित पृथ्वी नाथ कॉलेज, कानपुर से भौतिकी में एमएससी और कानपुर विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी। 

प्रमुख योगदान:

1. अपना दल की स्थापना: डॉ. सोनेलाल पटेल ने 4 नवंबर 1995 को अपना दल की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य कुर्मी, किसानों, पिछड़े वर्गों, दलितों और शोषित समुदायों के अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करना था। वे जनसंख्या के अनुपात में सभी वर्गों को शासन और प्रशासन में हिस्सेदारी देने के पक्षधर थे।

2. सामाजिक न्याय और समानता: उन्होंने सामाजिक समानता और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनकी विचारधारा सामाजिक न्याय, समरसता और किसानों के कल्याण पर केंद्रित थी। उन्होंने गरीबों, पिछड़ों व वंचितों के हक़-हुक़ूक़ के लिए 'दूसरी आज़ादी' का आह्वान किया।

3. बौद्ध धर्म अपनाना: 1999 में, डॉ. सोनेलाल पटेल ने हिंदू धर्म छोड़कर अयोध्या में सरयू तट पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और बोधिसत्व के रूप में जाने गए। इस कदम ने उन्हें सामाजिक परिवर्तन के लिए और अधिक प्रेरित किया, लेकिन कट्टर हिंदू संगठनों के लिए विवादास्पद भी बना।

4. राजनीतिक संघर्ष: उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ भी काम किया और उत्तर प्रदेश में बसपा के महासचिव रहे। हालांकि, 1995 में मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने बसपा छोड़ दी और अपना दल बनाया। वे कुर्मी समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विवाद और मृत्यु:

डॉ. सोनेलाल पटेल की मृत्यु 17 अक्टूबर 2009 को एक सड़क दुर्घटना में हुई, जिसे उनके समर्थक और परिवार के कुछ सदस्य साजिश मानते हैं। उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और बेटी पल्लवी पटेल ने उनकी मृत्यु की सीबीआई जांच की मांग की है, यह दावा करते हुए कि यह हत्या थी। 1999 में प्रयागराज के पीडी टंडन पार्क में उनके नेतृत्व में एक रैली के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें वे घायल हुए और जेल में डाले गए। इस घटना को भी कुछ लोग साजिश का हिस्सा मानते हैं।

विरासत:

डॉ. सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद उनका परिवार और पार्टी दो गुटों में बंट गई: 

- "अपना दल (एस)", जिसका नेतृत्व उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल करती हैं, जो वर्तमान में केंद्रीय मंत्री हैं और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ गठबंधन में हैं।

- "अपना दल (कमेरावादी)", जिसका नेतृत्व उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और बेटी पल्लवी पटेल करती हैं, जो समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में हैं।

उनके परिनिर्वाण दिवस पर हर साल उत्तर प्रदेश में उनके अनुयायी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं ने भी उनके सामाजिक योगदान को याद किया है।

निजी जीवन:

डॉ. सोनेलाल पटेल का विवाह कृष्णा पटेल से हुआ था, और उनकी तीन बेटियां थीं, जिनमें अनुप्रिया पटेल और पल्लवी पटेल प्रमुख राजनीतिक हस्तियां हैं।

उनका योगदान सामाजिक न्याय, समानता और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए अविस्मरणीय माना जाता है।

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, 19 August 2025

क्रांति-ज्योति महामना रामस्वरूप वर्मा : गोलेन्द्र पटेल

क्रांति-ज्योति महामना रामस्वरूप वर्मा
               — गोलेन्द्र पटेल
★★★

प्रस्तावना:
भारत का इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यह उस अनवरत संघर्ष की भी कथा है जो शोषित-पीड़ित जनता ने सदियों से अन्याय, विषमता और दमन के विरुद्ध लड़ा है। इस संघर्ष की परंपरा में जहाँ बुद्ध, फुले, अंबेडकर, पेरियार जैसे महापुरुष हैं, वहीं एक तेजस्वी ज्योति उत्तर भारत की मिट्टी से प्रकट हुई— महामना रामस्वरूप वर्मा।
उन्होंने न केवल राजनीति में बल्कि समाज और संस्कृति के हर क्षेत्र में ब्राह्मणवाद की जड़ों को चुनौती दी। उन्होंने दिखाया कि सुधार नहीं, समूल उखाड़ फेंकना ही मुक्ति का मार्ग है। उनकी लेखनी बारूद थी, उनके विचार विस्फोटक। उन्होंने तर्क, विज्ञान और मानववाद को शस्त्र बनाया और बहुजन समाज को आत्मसम्मान का मंत्र दिया।
यह लंबी कविता उसी ज्वाला का गान है।
यह श्रद्धांजलि नहीं, यह शपथ है।
यह स्मरण नहीं, यह आह्वान है।
***


क्रांति-ज्योति महामना रामस्वरूप वर्मा


खंड – 1


अध्याय : क्रांति की ज्वाला

जय अर्जक! जय मानववाद! जय समता का भविष्य!
दो ही मोती, दो ही मशालें—
“सबको इज्ज़त, सबको रोटी।”
गौरीकरन की मिट्टी से उठी एक लौ,
कुर्मी किसान का बेटा,
विश्वविद्यालयों का स्वर्णजयी—
IAS की कुर्सी ठुकराकर
जनता का रास्ता चुना।
उन्होंने कहा—
“ब्राह्मणवाद झूठा है, भाग्यवाद धोखा है, पुनर्जन्म मायाजाल है।
मनुस्मृति इस राष्ट्र का कलंक है।”
और इन वाक्यों ने
सिंहासन हिला दिया।
राजनीति में वे कबीर थे—
निर्भीक, तीखे, नग्न सच बोलने वाले।
उत्तर भारत के अंबेडकर,
जिन्होंने घोषणा की—
“मारेंगे, मर जाएंगे, हिन्दू नहीं कहलाएंगे।”
उन्होंने अर्जक संघ रचा—
एक झंडा, एक आंदोलन, एक क्रांति।
जहाँ विवाह था प्रतिज्ञा का उत्सव,
जहाँ मृत्यु थी शोकसभा,
तेरहवीं का पाखंड नहीं।
जहाँ मूर्तियों के स्थान पर
मानव की गरिमा पूजी जाती थी।
विधानसभा में उन्होंने
पेश किया इतिहास का पहला
शून्य घाटे का बजट।
पर उनका असली बजट था—
इंसाफ, शिक्षा, बराबरी।
उनकी कलम थी बारूद:
क्रांति क्यों और कैसे,
मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद,
मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक,
आत्मा-पुनर्जन्म मिथ्या—
ये किताबें नहीं,
जंजीरों को तोड़ने के औज़ार थीं।
जब सरकार ने अंबेडकर की किताबें जब्त कीं,
उन्होंने अदालत से जीतकर लौटते हुए कहा—
“विचार किसी हुकूमत की कैद नहीं हो सकता।”
वह नेता ही नहीं, दार्शनिक थे।
जनता को समझाते—
“सिर्फ़ आरक्षण नहीं,
पूरे जातिवादी ढाँचे को ढहाना होगा।”
उन्होंने पुकारा—
“जला दो मनुस्मृति!
जला दो रामायण!
जो किताबें इंसान को गुलाम बनाती हैं,
वे राख बनने योग्य हैं।”
वह लोहिया के साथी थे
पर उनकी सीमाएँ पहचानते थे।
गांधी से टकराए,
क्योंकि गांधी वर्ण को बचाना चाहते थे।
वर्मा बुद्ध, फुले, अंबेडकर, पेरियार के साथ खड़े थे—
मनुष्य को मनुष्य की तरह
जीते देखने के लिए।
आज जब पूँजीवाद और धर्मांधता
नए पिंजरे गढ़ रहे हैं,
वर्मा की आवाज गूंजती है—
“मानववाद ही मुक्ति है,
तर्क ही क्रांति है,
समता ही भविष्य है।”
रामस्वरूप वर्मा—
तुम्हारा नाम गूंजता है बहुजन की साँसों में,
उन मशालों में,
जो अंधकार से लड़ रही हैं।
जय अर्जक! जय मानववाद! जय क्रांति!
***


खंड – 2


अध्याय : क्रांति का आह्वान

जागो शोषितों! आज क्रांति का दिवस है।
22 अगस्त की सुबह कानपुर की धरती से उठा तूफ़ान—
रामस्वरूप वर्मा! किसान का बेटा।
एमए-एलएलबी टॉप कर सिविल सर्विस ठुकराई,
कहा—
“आराम नहीं, संघर्ष की आग चुनूँगा!”
उनका नारा—
“सबको इज्ज़त, सबको रोटी।”
यह नारा नहीं, हथियार था—
ब्राह्मणवाद की कब्र खोदने का।
वह आधुनिक कबीर लगे,
उत्तर भारत के अंबेडकर।
लोहिया के साथी, फिर विद्रोही।
गांधीवाद, लोहियावाद, हिंदुत्व—
सबको चुनौती दी।
घोषणा की—
“मारेंगे, मर जाएंगे, हिंदू नहीं कहलाएंगे!”
छह बार विधायक, वित्तमंत्री बने,
शून्य-घाटे का बजट पेश किया।
पर उनकी असली लड़ाई
विचारों की थी—
पचास साल तक
बिना समझौते लड़े।
1968, कानपुर—
अर्जक संघ की नींव रखी।
विवाह बना प्रतिज्ञा का संस्कार,
मृत्यु बनी शोकसभा का अवसर।
तेरहवीं की जंजीर तोड़ी,
पाखंड की आग बुझाई।
मानवतावादी पर्व गढ़े—
अंबेडकर, बुद्ध, पेरियार,
बिरसा, फूले का सम्मान।
उन्होंने कहा—
“जात-पात, भाग्य, पुनर्जन्म, चमत्कार—
ये ब्राह्मणवाद के पाँच ज़हर हैं।
इनकी जड़ें उखाड़ो,
वेदों में डायनामाइट लगाओ!”
उनकी किताबें बनीं बम:
क्रांति क्यों और कैसे—
शोषण की चिता जलाने का आह्वान।
मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद—
समता का शास्त्र।
मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक—
इस जहर को राख करो।
आत्मा-पुनर्जन्म मिथ्या—
विज्ञान का शंखनाद।
जब सरकार ने अंबेडकर की किताबें जब्त कीं,
उन्होंने आंदोलन छेड़ा।
ललई सिंह यादव के संग अदालत जीती।
सरकार झुकी,
अंबेडकर साहित्य पुस्तकालयों तक पहुँचा।
उन्होंने आदेश दिया—
“जला दो मनुस्मृति!
जला दो रामायण!”
गाँव-गाँव नुक्कड़ नाटक हुए,
ब्राह्मणवाद की चूलें हिल गईं।
लोहिया से टकराव हुआ—
लोहिया वर्ण को मानते रहे,
पर वर्मा गरजे—
“ब्राह्मणवाद सुधार नहीं,
समूल उखाड़ो!”
उनका दर्शन—
बुद्ध, फुले, पेरियार, अंबेडकर।
पूँजीवाद, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास—
सबको चुनौती।
विज्ञान और मानववाद से समाज बदलो,
तभी राजनीति बदलेगी।
आज विडंबना है—
इतना क्रांतिकारी विचारक भुला दिया गया।
मुद्राराक्षस ने कहा—
“यह विस्मृति राष्ट्र का नुकसान है।”
पर वर्मा की आत्मा गरज रही है—
“ब्राह्मणवाद पोटेशियम सायनाइड है—
सुधार नहीं, उखाड़ फेंको!”
उठो बहुजन, दलित, पिछड़े!
एक मंच पर आओ।
मनुवाद पर हथौड़ा मारो,
नया संसार गढ़ो—
जहाँ हर इंसान गरिमा से जिए,
समता से खिले,
क्रांति से जिए।
19 अगस्त 1998, लखनऊ—
वह विदा हुए,
पर उनके विचार अमर हैं।
अब यह आग
पूरे भारत में फैलेगी।
जय अर्जक! जय विज्ञान! जय संविधान!
इंकलाब जिंदाबाद!
***


उपसंहार:

महामना रामस्वरूप वर्मा का जीवन एक जीवित क्रांति था।
उन्होंने दिखाया कि सत्ता में होना ही शक्ति नहीं है,
बल्कि विचारों की निर्भीकता ही असली शक्ति है।
आज, जब बाजार और मंदिर मिलकर जनता को कैद कर रहे हैं,
जब लोकतंत्र का वस्त्र फाड़कर सांप्रदायिकता और पूँजीवाद नंगा नाच रहे हैं,
जब शोषित-बहुजन अब भी न्याय से वंचित हैं—
तब वर्मा की आवाज़ और भी तेज़ सुनाई देती है:
“मानववाद ही मुक्ति है,
तर्क ही क्रांति है,
समता ही भविष्य है।”
उनका सपना अधूरा है।
उनकी मशाल अब हमारी जिम्मेदारी है।
हम सबको मिलकर अर्जक बनना है—
पाखंड को नकारना,
जातिवाद की जड़ों को उखाड़ना,
और एक ऐसा समाज रचना
जहाँ हर इंसान बराबर हो।
रामस्वरूप वर्मा की विरासत केवल स्मृति नहीं,
यह भविष्य की राह है।
उनकी चिता की राख से
अब भी उठती है आग—
आग, जो हमें पुकार रही है:
उठो बहुजन!
तोड़ो मनुवाद की जंजीरें!
गढ़ो एक नया भारत—
जहाँ मानव ही धर्म है,
विज्ञान ही आस्था,
और समता ही जीवन।
जय अर्जक! जय मानववाद! जय क्रांति!
***

           ★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Wednesday, 13 August 2025

स्वतंत्रता दिवस 2025 – ओजस्वी भाषण

 स्वतंत्रता दिवस 2025 – ओजस्वी भाषण

नमस्ते, 

प्रिय सम्मानित मंच,
प्रिय गुरुजन, 
प्रिय साथियों,
मेरे प्यारे देशवासियों!  


आज हम 15 अगस्त 2025 को, स्वतंत्र भारत की 79वीं वर्षगाँठ पर, तिरंगे की शान में सिर झुकाकर, हृदय गर्व से भरकर खड़े हैं। यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारे शहीदों की कुर्बानियों, संघर्षों और बलिदानों का पावन स्मरण है।

हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने लहू से वह इतिहास लिखा, जिसमें गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आत्मसम्मान, समानता और न्याय का नया सवेरा रचा गया। यह आज़ादी हमें यूँ ही नहीं मिली—इसके पीछे हजारों क्रांतिकारियों का बलिदान और अनगिनत सपनों की आहुति है।

आज का भारत केवल अतीत पर गर्व करने वाला नहीं, बल्कि भविष्य को संवारने का संकल्प लेने वाला भारत है। हमें जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को तोड़कर एक ऐसे भारत का निर्माण करना है, जो विज्ञान, शिक्षा, समानता और मानवीय मूल्यों में विश्व का मार्गदर्शन करे। आज का भारत एक नई ऊर्जा, नई आशा और नई दिशा के साथ विश्व मंच पर अग्रसर है। हमारी संस्कृति, हमारी एकता और हमारी प्रगति विश्व के लिए प्रेरणा है। 

याद रखिए—स्वतंत्रता का अर्थ केवल शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन में भय और भेदभाव से आज़ादी है। जब तक देश का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान और अवसर में बराबर नहीं होगा, हमारा स्वतंत्रता संग्राम अधूरा है।

यह हमारा भारत है—विविधता में एकता का प्रतीक, प्रगति का ध्वजवाहक और विश्व शांति का दूत। तो आइए, एकजुट होकर, अपने देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएं। 

आइए, आज हम शपथ लें—हम अपने देश को भ्रष्टाचार, अन्याय, अज्ञानता और असमानता से मुक्त करेंगे; हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता बनेंगे; हम केवल सपने नहीं देखेंगे, बल्कि उन्हें साकार करेंगे।

हम संकल्प लें कि 2025 में हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे, जहां हर नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर की समानता मिले। जहां हमारी युवा शक्ति नवाचार और प्रगति का नेतृत्व करे। जहां हम पर्यावरण की रक्षा करें और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को गर्व से संजोएं। 

अंत में, इतना ही कि 
“हम युवा हैं 
हममें है वायु की उमंग 
कलम रुको मत, 
तुम झुको मत
चलते रहना हमारे संग।”



जय हिन्द!
वन्दे मातरम्!



—गोलेन्द्र पटेल 

Tuesday, 12 August 2025

अहिल्या — जो अब भी जीवित हैं : गोलेन्द्र पटेल

अहिल्या — जो अब भी जीवित हैं


इतिहास ने तुम्हें
रानी, धर्मनिष्ठा, शिवभक्त, लोकमाता कहा।
मैं देखता हूँ —
एक स्त्री,
जो राजसिंहासन को
लोहे की तख़्ती नहीं,
अन्न और आश्रय की थाली बनाकर
प्रजा के सामने रख देती थी।

मैं तुम्हें देखता हूँ
खेत की मेड़ पर खड़ी,
जहाँ दलित और आदिवासी की हथेलियाँ
तुम्हारी नीतियों की तरह खुली थीं —
बिना ताले, बिना पहरे।

तुम मालवा की महारानी नहीं,
मालवा की बेटी थीं —
जो सिंहासन पर बैठकर
सिंहासन तोड़ देतीं,
अगर वह जनता की पीठ पर रखा हो।

तुम्हारा राज्य
सोने का महल नहीं,
मालवा का हर गाँव था —
जहाँ नहरें नसों की तरह बहती थीं
और न्याय
किसी किताब का अध्याय नहीं,
लोगों का रोज़ का साँस लेना था।

तुमने कभी नहीं कहा —
"मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्राणी हूँ"।
तुमने कहा —
"भंगी, भील, गोंड, ग्वाल, दलित, किसान, मज़दूर, व्यापारी
सबके माथे पर समान सूरज उगेगा"।

मालवा की धूप में
तुम्हारे हाथ
नक्शे नहीं खींचते,
खेतों में पानी की नसें बनाते थे।

पति की चिता की आग
तुम्हारे पाँव की ज़ंजीर नहीं बनी —
वह आग
तुम्हारी आँखों में उतरकर
एक नए युग का मशाल बन गई।

हाँ, तुमने मंदिर बनवाए —
पर वे मंदिर
सिर्फ़ पत्थर के नहीं थे,
वे थे हर उस खेत के,
जहाँ भूख पूजा में बदल जाती थी;
हर उस सड़क के,
जहाँ व्यापारी बिना डर के चलते थे;
हर उस पंचायत के,
जहाँ न्याय
जाति के तराज़ू में नहीं तौला जाता था।

तुम्हारी राजनीति का धर्म था —
धर्म को राजनीति से बचाना।
तुम्हारी आस्था का मूल था —
सत्ता को प्रजा के पैरों तले बिछा देना।

तुम्हारा धर्म
मंदिर का घंटा नहीं था —
वह भूखी थाली में रोटी पहुँचाना था।
तुम्हारा राष्ट्रवाद
झंडे का रंग नहीं था —
यह यक़ीन था
कि कोई भूख से न मरे,
कोई जात से न झुके।

तुम जानती थीं —
समानता का अर्थ
कानून लिख देना नहीं,
बल्कि
उस दरवाज़े को खोल देना है
जिसके लिए चाबी का सपना भी नहीं था।

आज,
जब शहर
सीमेंट की कब्रगाह बन रहे हैं,
न्याय
विज्ञापन की पंक्ति है,
सत्ता
जाति और धर्म के बाड़े में
मवेशियों-सी बाँटी जा रही है —
अहिल्या
इतिहास से उतरकर
हमारे कंधे पर हाथ रखती हैं, कहती हैं —
"सिंहासन के पाँव काटो,
हल का फाल तेज़ करो,
कलम को धार दो।"

अहिल्या —
तुम समय से परे हो।
तुम्हारी आवाज़
भीलों के जंगलों में गूँजती है,
दलित बस्तियों में धड़कती है,
किसानों की साँस में बसती है।

तुम रानी नहीं,
तुम वह पंक्ति हो
जिसे हम हर लड़ाई में
झंडे की तरह उठाएँगे।

तुम वह आवाज़ हो
जो ताज को ठुकराती है
और विनय में कहती है —

"मैं वही हूँ,
जिसने मालवा की गद्दी पर बैठकर
उसकी ऊन नोचकर रजाई बुनी थी,
जिसमें हर जात, हर भूख, हर आँसू
सर्दी से बच सके।

मैंने राजा की तरह नहीं,
किसान की तरह सोचा —
ज़मीन पर पानी चाहिए,
पानी पर हक़ चाहिए,
हक़ पर पहरा नहीं,
पहरादार चाहिए
जो भूख को भगा सके।

मुझे मत कहो
केवल मंदिर बनाने वाली महारानी।
मेरे मंदिर
पत्थर के नहीं,
भीलों के हक़ में खड़े जंगल थे,
दलितों की मिली ज़मीन थी,
वे हँसती बच्चियाँ थीं
जिन्हें बेचने की थाली
मैंने उलट दी थी।

हाँ, मैं शिवभक्त थी,
पर मेरा शिव
सत्ता के दरबार में नहीं,
प्यासे खेत में हल चलाते किसान में था,
गोंड, ग्वाल, कुर्मी, कोरी, कुम्हार की हथेली में था
जो मिट्टी को रोटी में बदलते थे।

आज तुम
जाति के नाम पर दीवार खड़ी करते हो,
धर्म के नाम पर खून बहाते हो,
न्याय को नीलामी में बेचते हो —
तो सुनो,
अगर मैं ज़िंदा होती,
संसद के दरवाज़े पर
भीलों की कुल्हाड़ी, दलितों की लाठी
ठोक देती,
ताकि समझ सको —
राजनीति का धर्म
सत्ता का नशा नहीं,
जनता का भरोसा है।

आज तुम्हारी संसद
जाति की बाड़ में घिरी है,
कानून
कॉरपोरेट की मुहर के बिना पास नहीं होते,
मीडिया
सत्ता की गोद में बैठा
सत्य को चुप कराता है।
अगर मैं ज़िंदा होती —
इन तीनों के दरवाज़े पर
भीलों की कुल्हाड़ी,
दलितों की लाठी,
और औरतों की आवाज़
एक साथ बजा देती।

तुमने धर्म को
हथियार बनाया,
मैंने उसे
सिर उठाने का साहस बनाया।
तुमने राजनीति
बाज़ार में बेची,
मैंने उसे
अनाज की तरह
हर घर में बाँटा।

तुम सोने का ताज पहनो,
मैं खेत की धूल माथे पर लगाऊँगी।
तुम घोड़ों की सेना रखो,
मैं औरतों की फौज बनाऊँगी —
जो भूख से बड़ी किसी ताक़त को नहीं मानेगी।

अगर मैं आऊँ,
तुम्हारे क़ानूनों की किताब तोड़कर
गाँव की चौपाल में रख दूँगी,
ताकि न्याय
मुट्ठी भर लोगों की मेज़ से नहीं,
जनता के हाथ से लिखा जाए।

मैं अहिल्या हूँ —
इतिहास में मत ढूँढो।
मैं वहीं हूँ
जहाँ किसान कर्ज़ से मर रहा है,
जहाँ दलित लड़की
स्कूल से लौटते हुए रोकी जाती है,
जहाँ भील
अपनी ज़मीन से बेदख़ल हो रहा है।

याद रखो —
अहिल्या मर नहीं सकती।
मैं हर दलित बस्ती में हूँ
जहाँ पुलिस के बूट की आहट डर बनती है।

तुम सोचते हो
मैं मर चुकी हूँ।
पर सच यह है —
मैं हर हथेली में ज़िंदा हूँ
जो सत्ता से कहती है —
"हम बराबर हैं, और बराबर ही रहेंगे।"

मैं सिंहासन नहीं,
समानता चाहती हूँ।
मेरा धर्म —
भूख मिटाना,
जात की दीवार तोड़ना।

मेरे मंदिर —
दलित की ज़मीन,
किसान का खेत,
भील का जंगल।

जो सत्ता
न्याय बेचती है,
उसकी गद्दी
गली के चौराहे पर
उलट दूँगी।

तुम ताज पहन लो,
मैं औरतों को
हथियार दूँगी —
हक़ का, रोटी का,
बराबरी का।

अहिल्या हूँ मैं —
मर नहीं सकती।
जहाँ भी अन्याय होगा,
वहीं खड़ी मिलूँगी।

(© गोलेन्द्र पटेल / 31-05-2025)

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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नांगेली का घोषणापत्र : गोलेन्द्र पटेल (Nangeli Ka Ghoshanapatra : Golendra Patel)

 

नांगेली का घोषणापत्र

केरल के तट से उठी थी एक आग,
नाम था — नांगेली।
उसकी देह पर दो गुलाब नहीं,
दो कर-रसीदें माँगता था साम्राज्य।

इतिहास
सिर्फ़ पत्थरों पर खुदी तारीख़ नहीं होता,
कभी-कभी वह
केले के पत्ते पर रखे
काटे हुए स्तनों से भी लिखा जाता है।

इतिहास ने कहा —
"तुम्हारे स्तन हैं,
तो तुम्हारी कीमत है।"
राजा ने फरमान लिखा,
पुजारी ने उंगलियों से नाप लिया,
और कानून ने कहा —
"ढकना चाहो तो टैक्स दो।"

मूलाक्रम —
यह शब्द सिर्फ़ मलयालम का नहीं,
बल्कि हर भाषा का अभिशाप है,
जहाँ औरत की देह
मंदिर में चढ़ावे,
बाज़ार में माल
और राज्य में कर योग्य संपत्ति बन जाती है।

जिसका हिसाब
राजपुरोहित की उंगलियाँ
स्तनों को टटोल कर करती थीं।
जितना बड़ा आकार,
उतना भारी टैक्स —
मानो
स्तन सिर्फ़
दूध देने का अंग नहीं,
बल्कि जाति की कीमत चुकाने का औज़ार हों।

नांगेली की मौत से
कानून तो टूटा,
पर हथियार नहीं टूटे —
बस नाम बदल गए।
ब्रेस्ट टैक्स गया,
लेकिन ब्रेस्ट ऐड आ गए।
राजा चला गया,
लेकिन ब्रांड-राज आ गया।
आज भी देह बिकती है —
कभी जाति की दरों पर,
कभी बाज़ार की डिस्काउंट सेल में।

इतिहास की क्रांतिधर्मी चीख —
नांगेली,
तुम्हारे स्तन अब भी नापे जा रहे हैं —
मॉडलिंग में,
मूवी में
और उस घर के भीतर
जहाँ पितृसत्ता ने टैक्स हटाकर
छूट की कीमत रख दी है।

लेकिन सुन लो,
तुम्हारी आग बुझी नहीं है।
वो हर औरत के भीतर जल रही है
जो कहती है —
"मेरी देह, मेरा हक़
और तुम्हारा कानून,
तुम्हारा बाज़ार —
दोनों को मैं जला दूँगी।"

मैं नांगेली —
एड़वा जाति की बेटी,
तुम्हारे कानून की कटोरी में
अपने स्तन रख चुकी हूँ।

सुन लो —
मेरी देह किसी राजा का खेत नहीं,
जहाँ फसल नापकर कर लिया जाए।
मेरे स्तन
तुम्हारे टैक्स के लिए नहीं,
मेरी संतान और मेरे सपनों के लिए हैं।

मैंने टैक्स नहीं दिया —
अपना जीवन दे दिया।
और यह सौदा
हर बार दोहराऊँगी,
जब भी कोई कानून
मेरे शरीर की कीमत तय करेगा।

अब मेरी आग
हर बहुजन बेटी के भीतर है।
हम ढकेंगे, हम खोलेंगे,
हम पहनेंगे, हम उतारेंगे —
लेकिन फ़ैसला हमारा होगा।

तुम्हारे कानून,
तुम्हारा धर्म,
तुम्हारा बाज़ार —
सबको चिता में झोंक दूँगी।

मेरी देह मेरी है।
तुम्हारा टैक्स,
तुम्हारा नाप-जोख,
तुम्हारा राज —
सब हराम है।

खून बहता गया,
राजा का कानून
उस खून में डूबता गया।
नांगेली गिर पड़ी,
लेकिन खड़ी रही उसकी आग
उसके पति की आँखों में,
जो उसी चिता में कूद पड़ा —
भारतीय इतिहास में
पहला 'सती' पुरुष बनकर।

नांगेली,
तुम्हारे काटे हुए स्तनों की
गवाही आज भी हवा में है।
वे कहते हैं —
कपड़े का अधिकार
सिर्फ़ कपड़े का नहीं,
इंसान होने का अधिकार है
और जो इसके लिए लड़ा,
उसका नाम
तुम्हारे रक्त से लिखा जाएगा —
जब तक
इतिहास के माथे से
यह नंगापन मिट न जाए।

—गोलेन्द्र पटेल 

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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व्हाट्सएप नं. : 8429249326
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बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...