Friday, 27 March 2020





  **निनावाँ**
कच्चे केना कोना में
बच्चे अच्छे ओना में
खेल रहे हैं निनावाँ से
नये  नेता  को वोट दे।
सच्चे वैद्य घासतंत्र में
लोकतंत्र का मंत्र ढूँढते-
फिरते वन उपवन खेत...
उपर्युक्त चुनाव चोट दे।
बच्चे को अच्छे को
सच्चे को कच्चे को
मतदाता को वैद्य को....
बेमतलब प्लाटिंग चकरोट दे।
मौत  के  मेंड़  पर  चर आना
ईद पर बकरे का शहर जाना
राजनीति-भरसाँय का दाना
बन ,स्वयं को खाना ,कोट दे।
अन्य को बर्फ की वर्षा में
ठण्ड से लड़ना मरना ही है
भयंकर पाला से पाला पड़ा
निनावाँ का इस वर्ष ,ओट लें।
महकऊवाँ घास ओढ़ कहा
वैद्य जी मुझे लोग नहीं जानते
इस जग में एक औषधि पौधा
बस थूकने हेतु खाते खोट के।।
*-गोलेन्द्र पटेल*
*रचना : 02-02-2020*





एकांत में नहीं एकांत
सुबह और शाम समझ रहे हैं
बस बेवजह बैठी बुलबुल
बाँस पर बैठी कोयल का स्वर सून रही है
अपने स्वर में उसके दर्द को साधने हेतु
धनकूटनी लंबे चोच में चावल लीए आई
कबूतर के बच्चों के मुख में डालने हेतु
पर वह अपने चोंच पर विचार कर कही
वाह रे विधाता! यह कैसा मुख?
इन अनाथ चूजों को भोजन भी नहीं करा सकती।
उसके मित्र बगुले को देख बच्चे चाँ चाँ चिल्लाने लगे
कोयल का स्वर भंग हुआ
बुलबुल बोली सखी कपोत बच्चे भूखे हैं
हाँ जीजी पर खिलाऊँ क्या?
कल संसदभवन में गई थी पर
वहाँ कोई किड़ा मकोड़ा नहीं मिला
आज आपके पास बड़ी आश लेकर आई हूँ
आप हमारे मुहल्ले की स्वर नेता है
हमारा किड़ाकार्ड गुम हो गया है
महोदया! मुझे दो दाना अन्न दो
मेरा और मेरे बच्चों का वोट अपने नाम करो।
भावी चुनाव नजदीक है आकाश में बिजली चुप है
बाज़ के भय से इंद्र स्वर्ग के सेनापतियों से कहते हैं
इस वर्ष का चुनाव पृथ्वी पर नहीं भूख के जमीन पर है
बुलबुल के गुप्तचर ने संदेशा लाया कि एक दोपाया
जो गंगा की सड़ा पानी पी बिमार पड़ा है एकांत
बाज़ का पूजनीय गगनगंगा गंदा होती जा रही है
उसी का जल और दो मटर के दानें दे कृतार्थ की
भूखी कपोत के दो भूखे बच्चों के आँत को।
-गोलेन्द्र पटेल
मो.नं.8429249326






अर्चनीयात्मा आदरणीय आचार्य!
आदर आभार अभिनंदनीय आर्य!
आपका अद्भुत आत्मीय सत्कार्य!
कवित्व  आचार चुंबकीय धार्य!
साहित्य  भास्कर भविष्य भार्य!
हमारे हृदय हविष्य काव्याचार्य!
अनंत  अमृतवचन कवि औदार्य!
साहित्यिक शब्दसुमन शिरोधार्य!
माननीय मदन कश्यप कृपाचार्य!
काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल शील!
सत्यसार समुद्रीय-अंतरीक्ष नील!
राग   अनुराग   जलकुंड   झील!
स्याही बन कागज़ के गले मिल!
कर्षित कलियों के मुर्झाया दिल!
व सूखी क्यारी सींच रहे अखिल!
नई कविता का ,कलम में स्नेह भर!
रेत और रेह में धूप सोखतें देह भर!
नई आकृतियाँ लाना चाहते गेह पर!
      (अर्थात् साहित्य में।)
नदी का द्वीप कहता शांती नहीं!
रोशनी चाहिए , सहृदय में वहीं!
कहा-कही  दूध-दही  सब सही!
जहाँ थोड़ा कविता का जगह
समय  और  समाज के सतह
पर "मिल के पत्थर" की तरह
प्रसांगिकता के ज़मीन पर बचा है!
शुक्ल जी और मदन जी ने रचा है!
वहीं काव्य , जिसका अर्थ पचा है!....
     *-गोलेन्द्र पटेल*
*"मेरे प्रिय कवि" से*
क.सं. : 4
क.रो.नं. : 217
बी.ए. आनर्स "हिन्दी" द्वितीय वर्ष
【कला संकाय : हिन्दी विभाग】बीएचयू
मो.नं.+918429249326
*काव्यगुरु : श्रीप्रकाश शुक्ल*





**भाषा का दर्द**
भाषा का दर्द
पालि भाषा से जाना
जो त्रिपिटकाचार्य हैं
स्वयं है यही ठाना
कि पालि अब लंगड़ी ही रहे
उसकी बैसाखी विद्यार्थीगण
उसके हाथ न लगे।
नहीं तो वह कुछ दूर टहल लेगी
बुद्धवचन को गाते गाते
गाँव के पगडंडियों पर
संघाटी व चीवर के संग
सर सर सर बहती समीर के सहारे
सुबह शाम स्वस्थ होने के लिए।
हिन्दी मुझसे कही वत्स
पालि के साथ संस्कृत पढ़ो
तभी **हिन्दी साहित्य में बुद्ध**
शीर्षक से तुम शोध कर पाओगे
अन्यथा आज के भिक्षु के भांति
भटकते रहो एक घर से दूसरे घर।
वैसे मैं बीएचयू बी.ए. कोर में पालि
डिप्लोमा कोर्स में संस्कृत पढ़ रहा हूँ
पर लगता है मुझे भी बुद्ध ही बनना होगा
जैसे वे *सिद्धार्थ से बुद्ध* बने बीन गुरु के
क्या मैं उनका उपदेश समझ सकता हूँ
तत्कालीन समाज में बीन पालिगुरु के
उत्तर खोजते खोजते न जाने कब
पहूँच गया तुलसी बाबा के पास
तुलसी बाबा से बाबा नागार्जुन तक
और मीरा से आधुनिक मीरा तक
यहाँ तक की अज्ञेय से आधुनिक शुक्ल तक
उत्तर में उलझने से अच्छा है पुनः विषय पर आता हूँ।
पालि अध्ययन में समस्या अनेक
जैसे पुस्तक का कम होना
सही मार्गदर्शन न होना
स्नातक स्तर से नीचे नगण्य होना
इस भाषा के संदर्भ में संगोष्ठी न होना
विद्यार्थियों से बौद्धाचार्य का संवाद न होना इत्यादि।
बुद्ध पर चर्चा अन्य भाषी जादा करते हैं
इसलिए उनका साहित्य समाज का दर्पण हैं
और अपना पालि-साहित्य चुपचाप
किसी आलमारी में बैठ रोता है
यह कितनी शर्मिंदगी की बात है
इसे पढ़ने-पढ़ाने वालों के लिए!
हे तथागत! हे अवतार पुरुष बुद्ध!
राग-द्वेष-लोभ-दोष अन्य अकुशल से
शुद्ध करो चित्त को! हे युगप्रवर्तक!
हे सत्यसाधक महाश्रमिक महाभिक्षु!
पालि का ज्ञान दो! पालि का गुरु दो!
हे पालि-संरक्षक पालि का ध्यान दो!!
*-गोलेन्द्र पटेल*
कक्षा रोल नं. 217
परीक्षा रोल नं. 18214HIN041
मो.न. 8429249326
बी.ए. द्वितीय वर्ष(चतुर्थ सेमेस्टर)
बीएचयू, वाराणसी।





**निटोरा**
निटोरा का लासा
शब्द से प्रारंभ हो
सभ्यता की यात्रा करता है
जड़ से चेतन तक कविता में।

बबूल लसम लक्ष्य
लासना चाहता कवि की कागज़
विकर्षण के विरुद्ध समाज में
जैसे अंधेरे के विरुद्ध प्रकाश है सविता में।

निटोरा निब से कहा कि
आप खुले आँखों में नींद को देख
साहित्यिक कागज़ पर चलते चलते
दिल्ली को दिव्यचश्मा दे ही आते हो

यथार्थ के धरातल को देखने हेतु
मैं(निटोरा) सूख चुका हूँ सावधान!
जो नर रेगिस्तान में पार लगाया था
आज फँसा गया राजनीतिसरिता में।।
-युवा कवि गोलेन्द्र पटेल





गुरु!
दुनिया में ऐसा है कि
ऐसा कुछ भी नहीं।

गाँव से शुरू हो
दिल्ली से दर्द तक की यात्रा
दर्शन का दरज़ी कर रहा है

चुपचाप धूप छाँह सहते हुए
क्योंकि एक छाता का दाम एक वोट है
जो उसके पास है पर उसके भूख के पास नहीं।

राशनकार्ड लिए लाईन में लगे लोग
पेट में बज रहे नगाड़े के धुन से
खुले आँखों में नींद के विरुद्ध
जागो और जगाओ का शंखनाद कर रहे हैं

खादी को सीने वाला धागा
आज कर्षित कृषक का कफन सी रहा है।

कर्ज़ के कड़ाही में पका दूधमुँही का भात
एक कौआ खा ; पसा माँड़ भी पी रहा है
दूसरा लालकिले के मुंडेर पर बैठा चिल्ला रहा है
मैं माँड़ नहीं पीता मुझे चाय चाहिए चाय चाय चाय।

जिन्दगी के स्टेशन पर एक पुत्र
पिता के शांति के लिए चाय देता है
एक प्यासे को अंदेखा कर
जो घड़े में कंकड़ डाल रहा है।
-गोलेन्द्र पटेल 【बीएचयू】








काशी पर कविता
रचने के लिए अर्ज़!
पावन पूज्य सरिता
वरुणा अस्सी व गंगा ने दिए तर्ज़!
शोक सत्य भविता
सीवर से जिए मर्ज़!
अनेक अंकुरित हो कथा के खेत में
कुछ ओ पार रेत में...
शाम का सविता व सिता
ज्योतिर्मय चिता में देख
कवि ले रहा है
किताब कॉपी कलम के लिए कर्ज़!
हवि दे रहा है
स्याही का हाशिये के यज्ञकागज़ पर
घाट के सिढ़ियों से दर्द का दर्शन पढ़
घाटवाक् कर रहे फक्कड़ प्रेमी जन
उम्मीद के उम्र से निम्न पूर्वजों के सूत्र-लेख-छंद
कबीर ,रैदास ,तुलसी ,भारतेंदु ,प्रसाद व प्रेमचंद
आदि के प्रासंगिकता के पोखरे में खिले कमल
नव विधाओं के नव जमीन पर दर्ज किए काशी।
      -golendra patel

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...