Friday, 27 March 2020




**स्मृति**
ऋगवेद का सत्य
महावीर का ब्रह्मचर्य
बुद्ध का अहिंसा
अशोक का कलिंग विजय
गांधी का अभय
अन्य-अहर्य
धन्य-मूर्धन्य
अक्षर-अक्षय
जय का लय
निर्भय-निर्णय
लें लिखा साहित्य-
इतिहास।
अचानक एक अहसास
उल्लास के साथ विश्वास
बढ़ाने आयी मेरे पास
ख़ास स्मृति बन स्मृति में।
-गोलेन्द्र पटेल
रचना : 19-01-2020




बैठा है
दूर्गंध सूँघने
समय
सड़े
समय के पास
चुपचाप
बंजर खेत में।
कुछ जानवर
सड़ चुके हैं
कुछ सड़ रहे हैं
कुछ गाँव में मरें हैं
कुछ सगड़ी पर लदे आ रहे हैं
समयानुसार
सड़े
समय के पास
हम-आप
चेत में।।
देख रहे हैं
हरे-भरे
फ़सल के बीच
मेंड़ पर
एक चतुर चिड़िया आयी
जो
लक्ष्य के पेड़ पर
चोंच में
कुछ दबा दनादन
आ-जा रही हैं
कभी कभी
किसी सोच में
इधर उधर
ताक झाँक कर
कवि की ओर देख रही है
जिसके आसपास
तरह तरह के घास
हवा के झोंके चूम-
झूम रहे हैं
घूम रहे हैं
खड़े खड़े
हो
एकदम मग्न
यहाँ तक की
एक दो नग्न
भी हैं।
गुरु!
गेहूँ दो बिता के हैं
तीसी तरुणी तरु
कि बात न पूछो
एकाएक एक
सुगंध सूँघ
दिल दे दी
चिड़िया को।
आह रूक रही है
श्वास!
द्वंद्व युद्ध में
हताश
मन!
विजय का ख़ास
अस्त्र उल्लास
उम्मीद की किरण हैं
एत में।।
सिवान में
काव्य सृजन के समय
समीर संग निर्भय
देख रहा हूँ
सुबह से शाम तक
स्मृतियों के आकृतियाँ
आकाशगंगा के रेत में।
-गोलेन्द्र पटेल
रचना : 19-01-2020


काशी का अक्कड़,बक्कड़ व फक्कड़ आमंत्रण.......

कल,रविवार,19 जनवरी 2020 को घाटवाक विश्वविद्यालय के द्वितीय वार्षिक उत्सव समारोह का खुला आमंत्रण//-आरम्भ:ठीक 1.30 पर -तुलसीघाट से।
(संयोजक-श्रीप्रकाश शुक्ल,आयोजक--विजयनाथ मिश्र)

कार्यक्रम ठीक 1.30 बजे तुलसीघाट से आरंभ होगा और 5 बजे राजघाट पर सम्पन्न होगा।यह दुनिया का शायद अकेला व अनूठा विश्वविद्यालय है जिसका वार्षिक उत्सव भी घूम घूम कर ही नहीं,झूम झूम कर होगा।जैसे की इसकी शिक्षा का स्वभाव है।अपने गतिशील पाठ्यक्रम के अनुसार।काशी की रामलीला की तर्ज पर इसकी संकाय संरचना भी गतिशील है ठीक काशी की अपनी गति की तरह।यहां देह स्थायी रूप से विसर्जित है।केवल चेतना का जाग्रत भाव बना रहता है...

...तो 'घाट वाक' तन की नहीं,मन की  यात्रा है..

अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवाक विश्वविद्यालय,बनारस के अखाड़े बाजों का नहीं,फक्कड़ व मस्तमौलों का आयोजन है।यह गंभीर व उबाऊ लोगों का नहीं,सरस व टिकाऊ लोगों का आयोजन है।अपने 4 प्रमुख संकायों में बंटे इस विश्वविद्यालय का अपना एक अडभंगी मिजाज है।शिव इसके संरक्षक हैं  और  गंगा इसकी रक्षक! शिक्षा,स्वास्थ्य ,स्वच्छता और सकारात्मक सोच इसके प्रमुख उद्देश्य हैं।सत्य की रक्षा करना इसका संकल्प है और इसके पास अपना शीर्षक गीत भी है।लोगो भी  बनकर तैयार है जो आगे चलकर  अलग से लोकार्पित होगा।

घाटवाक  देह नहीं ,दर्शन है...बाह्य नहीं,आंतरिक है..पर्यटन नहीं,प्रेम है... सरल नही,जटिल है ...दिन चर्या नहीं,लोक चर्या है...जहां हर घाट अपनी अलग व अनूठी कहानी कहते हैं।वे रोकते हैं,टोकते हैं,बतियाते हैं और अगले घाट की तरफ इशारा करते हैं।वे कहते हैं कि वॉक ही मत करो,टाक भी करो।वे बार बार अपनी सांस्कृतिक विरासत से वर्तमान को सहला रहे होते हैं और प्रश्नांकित भी कर रहे होते हैं।।वे कह रहे हैं कि बैठो ही मत,देखो भी।चलो ही मत,चिंतन भी करो।भीड़ ही मत देखो,हमारे अकेलेपन को भी देखो..और समझो कि हम महज पत्थर नहीं हैं,हमारे में वैदिक ऋषियों से लेकर रामानंद,कबीर,तुलसी,रविदास, से लेकर पंडित जगन्नाथ , चेत सिंह  व बबुआ पांडेय की चेतना का प्रवाह भी है।हमारी सांस्कृतिक बहुलता केवल बौद्धिक नारा नहीं है बल्कि हमने संस्कृति की विविधता को अपने बारीकी से तराशे गए पत्थरों में सुरक्षित कर रखा है...आखिर गंदा करके तुम अपनी ही जिंदगी में  गंदगी इकट्ठा करते हो।
हमारे बनारसीपन को देखो तो समझोगे कि गायघाट के नट बोल्ट देवता केवल यहीं संभव हैं!चिता की राख से जीवन के उल्लास की रचना भी यही संभव है...और यही पर ताना बाना समूह की ' झीनी झीनी बीनी चदरिया' के गीत संभव हैं!पंचगंगा का महोत्सव और उसकी सांगीतिक उदात्तता भी यहीं कहीं है।
...तो संलग्न कार्यक्रम के अनुसार आ जाएं।निराश नहीं होंगे।उदात्त होकर ही लौटेंगे।आखिर रविवार का दिन भी है---

खेत भर धूप के बहाने भी आ सकते है
रूप तो रेत भर ही है
फिर क्या सोचना!
(@श्रीप्रकाश शुक्ल)


हाशिये का हसुआ
एकसाथ चीरता हुआ
सरसों-चना-केरवा
पालक-सोहा-बथुआ
से कहा पकोगे कड़ाही में
क्योंकि तुम सब शाग हो।

आह अंधेरा हो गया
पकाते पकाते चुल्हे पर!
आँत भूख से तड़प रही हैं
टुकुर टुकुर ताक तवा पर
रोटियाँ देख रही हैं : नई कविता जाग-रो।

शाक छौंक कर
माँड़ मिला कर
खाता-पीता काव्यरस
देख डर जाता हूँ
मदाड़ी के बस में
रहनेवाले नाग को

भूख पास बैठी
द्वंद्व के दुनिया में
संघर्ष के लिए माँ से कहती
काव्यथाली में अनुराग दो!
और शाग दो!शाग दो!।....
-गोलेन्द्र पटेल


**ओह और छी**
कविता

दो अव्यय की

स्त्री
बात बात में
बोलती छी!
पुरुष

बोलता ओह!


-गोलेन्द्र पटेल

काशी मृत्यु का प्रतीक्षालय नही है मोक्ष की जन्मभूमि है- राजेश्वर आचार्य

द्वितीय वर्षगाँठ सह घाटवॉक उत्सव समारोह:2020

दिनांक-19/01/2020 को 'अंतर्राष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय' द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम बहुत ही सराहनीय और उत्साहवर्धक रहा।इस कार्यक्रम के आयोजक प्रख्यात न्यूरो चिकित्सक प्रो.विजय नाथ मिश्र ने कार्यक्रम में आये सभी अतिथियों एवं छात्रों का स्वागत करते हुए अपनी प्रसन्नता जाहिर की।

 घाटवाक के सूत्रधार और संयोजक प्रो.विजयनाथ मिश्र ने कहा कि जब व्यक्ति घाटों पर आता है तो एक सामान्य व्यक्ति की तरह आता है यह घाट ईश्वर की सत्ता का बोध कराते हैं।  यह घाट ईश्वर से कम नही है  काशी के घाट डी एन ए की तरह हैं। यह घाट हमारे देश की विरासत है। काशी के 84 घाट एक विशिष्ट परम्परा को साथ रखे हुए हैं। इस तरह के घाट दुनिया में कही नहीं मिलेंगे।

 प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो अरविंद जोशी ने अक्कड़, बक्कड़ और फक्कड़ के विषय मे बताते हुए कहा कि अक्कड़ वे हैं जो पहले बार आएं है, बक्कड़ वे हैं जो सालों से साथ हैं और फक्कड़ वो हैं जो शुरू से आजतक बने हुए हैं।इसी के साथ यह भी बताया कि वैश्विक जीवन में घाटवाक की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षण जगत में अंतरराष्ट्रीय घाटवाक विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण मुद्दों से भी अवगत कराया । गहन चिंतन और स्वास्थ्य से लेकर मानसिक परिस्थितियों के विषय मे बताते हुए कहा कि जीवन मे जितनी ज्यादा सरलता होगी जीवन उतना ही आसान  होगा।

वरिष्ठ गीतकार इंदीवर पांडेय ने घाटों से सम्बंधित कविता( लहरों के छंद कही खो गए),दूसरी  (हे काशी कल्याणी) और तीसरी (चेहरा सनातन) का काव्यपाठ किया। इसी के साथ  (घाट है तो ठाठ है),प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल ने (घाट वाक के फक्कड़ प्रेमी ) और प्रतिभा श्री ने भी काव्यपाठ  किया।

श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि जिसके संरक्षक बाबा विश्वनाथ हो उसे किसी पद की आवश्यकता नहीं ।इसी के साथ अक्कड़ बक्कड़ और फक्कड़ के विषय मे बताते हुए कहा कि यह
घाटवाक पद धारकों का नहीं, पग धारकों का है और जो पगढ
यह घाट तन का नहीं मन की अंतर्यात्रा है। यह पर्यटन का नहीं  प्रेम का विश्वविद्यालय है।यह देह नहीं दर्शन है , बाह्य नहीं आंतरिक है। यह सरल नहीं जटिल है।यह दिनचर्या नहीं लोकचर्या है । इसी के साथ हर घाट की अपना इतिहास लिए हुए है। आगे बताया कि इस घाटवाक को 4 भागों में बांटा है। इस घाटवाक का मुख्यालय तुलसी घाट है।इसका समाप्त राजघाट पर होगा जो अनुभूति और अभिव्यक्ति का केंद्र है । उन्होंने आगे कहा उदात्तता जीवन की गति है और गति है तो जीवन है।इसके पश्चात काव्यपाठ किया और  साथ ही रेत में आकृतियों की भी चर्चा के साथ इस पार घाट और उस पर रेत है इस विषय मे भी बताया।

द्वितीय सत्र बबुआ घाट  पर प्रारंभ हुआ जिसमें प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल ने बताया कि इस घाट के सर्वेक्षण की जिम्मेदारी इनको मिली थी अतः इन्होंने बबुआ घाट के इतिहास के विषय मे बताते हुए कहा कि बबुआ पांडेय छपरा के रहने वाले थे जो पहलवानी करते थे जो घर से नाराज होकर बनारस चले आये और यहाँ पर उन्होंने लोककक्षा जैसे  कार्य जैसे अखाड़ा चलाते थे अतः बबुआ महिलाओं के सशक्तिकरण करने के लिये इस घाट से बेहतर और कोई घाट नहीं  हो सकता।

बबुआ घाट पर नेशनल एथिलीट डॉ नीलू मिश्रा ने कहा कि अगर हम फिट हैं तभी हिट हैं।डेली रूटीन में भी घाट वाक को शामिल करना चाहिए इसके साथ ही परिवार को भी इससे जोड़ें।जब परिवार फिट है तो समाज और देश की संस्कृति का वहन भी सुचारू होगा।  काशी की संस्कृति और काशी को स्वस्थ बनाने के लिए घटवाक बेहद जरूरी है। महिलाओं को प्रेरित करते हुए परिवार,समाज और देश को फिट और हिट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। इसके साथ ही महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारियों से निज़ात पाने के लिए डेली 3 किलोमीटर दौड़ या वाक करना बेहतर उपाय बताया।

डॉ विधि नागर ने अपने पूर्व के घाटवाक अनुभवों को साझा किया।

प्रो मंजुला चतुर्वेदी ने कहा कि अपने शहर की पहचान गंगा और घाट है उनसे जुड़ने का मौका मिला। गंगा और गंगा की लहरें हमारी आंतरिक चेतना का प्रवाह हैं।इसी के साथ घाटवाक विश्वविद्यालय के उद्देश्य  को बताया कि हम सब इससे जुड़े इस शहर से प्यार करें और काशी की जीवन्त नगरी को और उन्नत बनाएं।

मशहूर अदाकारा तनु शुक्ला ने कहा कि  घाट और गंगा को किस तरह से स्वच्छ रखे इस विषय मे बात की और बताया कि विशेषकर महिलाएं जो पूजा सामग्री को नदी में प्रवाहित करना श्रेष्ठ मानती हैं उन चीजो को प्रवाहित न कर किसी पेड़ के नीचे या अन्य जगहों पर भी रखा जा सकता है।

डॉ शारदा सिंह ने कहा कि इस घाटवाक के माध्यम से हमें बहुत सारी अनभिज्ञ चीजों की जानकारी मिली और एकदूसरे से जुड़ने का मौका मिला।इसी के साथ फिट और हिट होने की बात कही।

 सभी महिला सशक्तिकरण की प्रमुख महिलाओं प्रो मंजुला चतुर्वेदी, डॉ विधि नागर, अदाकारा तनु शुक्ला, डॉ शारदा सिंह, नेशनल एथिलीट डॉ नीलू मिश्र को अंग वस्त्र और पुष्प गुच्छ से सम्मानित किया गया।

तृतीय सत्र में दुर्गा घाट पर  अमित समीर जो गरीबों की मदद और महिलाओं को कराटो में निपुण  बनाते हैं और साकेत जो जरूरतमंदों के सहायक हैं उनको अंगवस्त्र से सम्मानित किया गया और यहाँ पर विदेश से आये इंस्ट्रूमेंट वादकों द्वारा सुमधुर धुनों का वादन हुआ।

इसके साथ ही अष्टभुजा सिंह द्वारा लिखे घाटवाक गीत के साथ तमाम घाटों का परिचय करवाते हुए चतुर्थ सत्र राजघाट के समीप रानीघाट पर पहुंचे जहां पर पद्म भूषण से सम्मानित राजेश्वर आचार्य ,प्रो अरविंद जोशी, सुदामा त्रिपाठी,चंद्रभूषण मिश्र, सुरेंद्र मिश्र आदि आदरणीय जनों को सम्मानित किया गया।

प्रो अरविंद जोशी ने बताया कि आजकल समाज मे
वरिष्ठ नागरिकों वृद्धों के साथ हो रहे  दुर्व्यवहार की बात को बताया किस प्रकार से वृद्धों के बोझ से बचने के लिए उनके मारने की घृणित कर्म समाज मे लोग करतें हैं। वैश्विक दौर में स्वार्थवाद के हावी होने की बात कही।आगे कहा कि सभी वृद्ध समाज मे समरूप व्यवस्था के नहीं है कोई भी व्यक्ति  चाहें कितना भी सम्पन्न हो उन्हें बायलोजिकल स्थिति का सामना करना ही पड़ता ही है अतः हमें इस स्थिति को सुधारना होगा।भारतीय संस्कृति में माता-पिता से दुर्व्यवहार निदनीय कार्य है। संस्कृति को खंडित करने का कार्य है।

सुदामा त्रिपाठी ने कहा कि गांधी जी ने 10 वर्ष की उम्र में किये कार्यो की चर्चा की और साथ ही अपने द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ लगाए नारों के विषय मे भी बताया-
ए अंग्रेजों भारत छोड़ों बोरिया बन्दा जल्दी बिटोरो
दूर हटो ए लन्दन वालों यह तो क्षेत्र हमारा है।

समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे राजेश्वर आचार्य जी ने कहा कि यह मात्र जमीन पर चलना नहीं है भूगोल को लेकर चलना है। इतिहास और भूगोल की संस्कृतिक धारा है घाट वाक ।यह हमें आनंद और समाधि की ओर ले जाता है।आगे कहा कि
काशी मृत्यु का प्रतीक्षालय नही है मोक्ष की जन्मभूमि है।

इस घाट वाक का संचालन शोधछात्र उदयपाल ने किया ।
इसके साथ ही इस उत्सव की वापसी नौका विहार करते हुए हुई जिसमें ताना बाना ग्रुप ने कबीर के पदों का सुंदर गायन किया और दिव्यांग विक्रांत शर्मा ने अद्भुत मिमिक्री की । इसके साथ ही घाटवाक उत्सव को सफल बनाया गया।
-golendra patel , bhu, jnu, du, varanasi , chandauli , Delhi , india, golendra gyan
भारत माता का
सेवक अनेक थे

सूर्यतेज से सम्पन्न
महापुरुष नेक थे

जिसके शब्दकोश में
जय विजय का घोष था।

जिसके रोष में
क्रांतिकारियों का जोश था।

जिसके होश में
सत्य और संतोष था।

जिसके भक्ति में
स्वदेश मुक्ति का संदेश था।

जिसके शक्ति में
सैनबल-जनबल अशेष था।

वही अपना प्यारा
नेता सुभाषचंद्र बोस था।
-golendra patel

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...