Saturday, 29 August 2020

"भारत भूषण अग्रवाल सम्मान -2018" से सम्मानित युवा कवि विहाग वैभव【©Vihag Vaibhav】 की कुछ महत्वपूर्ण कविताएं

 


१.

कैद में कवि 

( वरवर राव के लिए)

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कहाँ कैद कर पायीं हैं एक कवि को 

जेल की सलाखें 


सरकारें उसे कैद करती हैं 

वह भाषा का हथियार भाँजते हुए निकल आता है 

अपनी देह के बाहर 

और किसी पूर्व चेतावनी की तरह 

फैल जाता है जनता के हृदयों में 


सरकारें कैद करती हैं

कवि बड़ा हो जाता है 

सरकारें हत्या करती हैं

कवि और बड़ा हो जाता है 


मूर्ख सरकारें एक देह को कैद करती हैं 

और सोचती हैं कवि को कैद कर लिया 


भला कौन बाँध पाया है पानी 

भला कौन भेद पाया है दिशाएँ 

भला कहाँ कैद कर पायीं हैं कवि को 

जेल की सलाखें । 


२.
सूर्य का नदी में डूबने की भाषा में विदा
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मैं जौनपुर में जन्मा और तुम सिमडेगा में 
हम एक ही झण्डे तले दो देश में जन्मे 

एक दिन नदी पार की धकधक वीरानी पर बैठे हुए
मेरी गोद से दूर होती हुई जब तुमने कहा- 
जिसे तुम जंगल कह रहे हो वो मेरा घर है 

तुम्हारी उस अर्थगर्भित रहस्यमयी मुस्कान से 
मेरी आत्मा का आईना ताउम्र लड़ता रहेगा हंसदा 
तुमने जिस महान करुणा से मुझे माफ़ किया था वह मुझे उम्र भर मुलायम रखेगी 
अपने घर की याद में गिरा तुम्हारा एक चुप कतरा आँसू 
मेरी ज़िंदगी भर की चीख पर भारी रहेगा हंसदा 

पैरों में मेमने की उछल बाँधकर
कल परसों तक तुम चली जाओगी अपने घर की ओर
तब पिछले बरस की एक रात अंगुलियों से छूकर मेरी पीठ पर 
तुम्हारे हाथों उगाये हुए जंगलों में तुम्हारा घर गुम हो जाएगा 

तुमने कहा सिमडेगा में प्रेम कोई फल नहीं 
जिसे खाया जाता हो 
वहाँ यह एक फूल होता है 
जिसे रोपना पड़ता है 

अब जब कल परसों तक तुम अपने इतने बड़े घर में गुम हो जाओगी
तब नहीं देख पाओगी कि
तुम्हारी एक छुवन भर से लहलहा उठने वाला ये मन 
न फल रहा न फूल 
तुम कभी नहीं जान पाओगी कि सिमडेगा के पहाड़ी पर उतरी पूर्णिमा की ओट में 
मेरे साथ तुम्हारी रति-केली की तमन्ना
मेरी कामेच्छा को उम्र भर सताती रहेगी 
और बरसों बाद भी स्खलित घुप्प अकेले में उठती 
मेरी सिसकियों के ऐन बीच-बीच तुम्हारे नाम की पुकार आती रहेगी हंसदा 

हंसदा तुम मुझे इस निगाह से मत देखो जैसे देखा जाता है किसी को आखिरी बार 
जैसे निश्चित हार की लड़ाई में जाता हुआ सिपाही देखता है अपनी बीमार बच्ची को 

हंसदा, हमारा प्रेम दो देश की लड़ाई में कुर्बान नहीं जाएगा 
वह सिमडेगा के जंगलों में फूलता रहेगा 
जिसकी गंध बीच की दीवार पार कर एकदिन मेरे जौनपुर तक जरूर आएगी 

तुमसे प्रेम के अपराध में मेरा देश लामबंद होगा और अपनी पुरातन घृणा से मार देगा 
देश की सुरक्षा के मद्देनजर हुई मेरी हत्या की खबर सुनकर 
तुम अपना हृदय जले हिरण की राख लपेटकर बिलख मत पड़ना 
मेरी मृत्यु मेरे जंगल और तुम्हारे घर के फूल जितनी स्वाभाविक होगी 

उस खोती हुई दिशा की बेला में आकाश को मृदंग बना लेना 
और पहाड़ से उतरते हुए मद्धम आवाज में गाना अपने बाबा से सुना वही लोकगीत

जिसमें एक फूल पहाड़ बनता है 
पहाड़ जंगल बनता है 
जंगल घर बनता है 
घर को कुछ नहीं बनना होता है 
क्यों कि घर घृणा के विरुद्ध होता है। 

४.
बहुत मामूली चीज है
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यदि मैंने जन्नत देखी होती 
तो दावे के साथ कह पाता कि 
तुम्हारे साथ बिताए हुए दिनों के आगे
जन्नत बहुत मामूली चीज है। 

अब चूँकि मैंने नर्क देखा है 
तब दावे के साथ कह सकता हूँ कि 
तुम्हारे बिछोह के आगे 
नर्क बहुत मामूली चीज है। 
 
५.
प्रचलित परिभाषाओं के बाहर महामारी-1 
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कोई ऐसा शब्द कहो 
जिसका सचमुच कोई अर्थ हो 

कोई ऐसी नदी दिखाओ 
जिसमें न बह रहा हो हमारी आँख का पानी 

कोई ऐसा फूल उपहार में दो 
जिसकी गंध बाज़ार में न बिकती हो 

अपने प्रेम और घृणा के लिए दलीलें देना बंद करो 
ताकि मैं भरोसे पर पुनः भरोसा कर सकूँ

अर्थ, रस, गंध और स्पर्श 
सब अपनी सवारियों से पलायन कर रहे हैं 
और यही इस दौर की सबसे विकराल महामारी है 

अगर नहीं तो 
एक ऐसे मनुष्य से मिलाओ 
जिसे मनुष्य कहकर पुकारूँ और वह पलटकर जवाब भी दे। 

६.
प्रचलित परिभाषाओं के बाहर महामारी-2
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महामारी के दिनों में 
सब लौट जाते हैं अपने-अपने घरों की ओर 

अन्न गोदामों में लौट जाते हैं
और अधिक काले दिनों की प्रतीक्षा में 

मनुष्य आत्मा के सभी पाट पर कुंडी देकर 
लौट जाता है अपनी देह, अपनी हड्डियों में 

पानी आँख से उतरने लगता है और जमा होता है भूख के आदिम अँधियारे कुण्ड के तलहट 

फूल अपनी पंखुड़ियों में सिमटने की तैयारी करते हैं 
और गंध से कहते हैं - विदा 

देह की आसक्ति अपना निर्मम रहस्य खोलती है
और स्खलित उबकाई की भेंट चढ़ती है

जब सब के सब लौट रहे होते हैं उत्स, अपनी जड़ों में
तब यह मुमकिन नहीं कि चूहे न लौटें अपने खंदकों की ओर 

इसी बीच संवेदना की परीक्षा के प्रश्न-पत्र जैसी ख़बर आती कि 
मुसहरों ने भूख से आकुल घास खाना शुरू कर दिया है 

ठीक इसी समय 
मनुष्यता के मरघट की राख से सना मेरा अधमरा मन चीखना चाहता है- 

जिसे आप मुसहर कहते हैं, दरअसल वे मनुष्य हैं। 

७.
प्रचलित परिभाषाओं के बाहर महामारी - 3
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कुछ भूख से मरे, कुछ भय से 

जो आस्तिक थे वे ईश्वर की कृपा से मरे 
कुछ खुशी से मरे की छोटी होंगी अब बैंक की कतारें

जो हड्डियों के आखिरी हिलोर तक सरकार से सवाल करते हुए लड़ सकते थे 
वे मरे सरकार की बेशर्म हिंसक हँसी से 

महामारी से बचाव का घिनौना तर्क देते हुए पुलिस ने
जिनकी जर्जर पीठ पर लाठियों के काले-लाल फूल रोपे थे 
उनके प्रियजन उस फूल की गंध से मारे गए

कुछ अपनी अश्लील आरामकुर्सी पर 
लालच और लिप्साओं का ज़हर खाकर मरे पड़े मिले 

कुछ तो सिर्फ यह देखकर मर गए कि 
इस कब्रिस्तान में उनके लिए कोई जगह नहीं बची है 

कुछ को घर लौटने के रास्तों ने मारा 
इस तरह से वे उन मुठ्ठीभर लोगों में हुए 
जो किसी मुहावरे के बाहर अब भी 
प्रेम के लिए चुपचाप मर सकते थे 

कुछ को घृणा ने मारा, कुछ को शक्ति ने 
कुछ को ऐश्वर्य ने मारा, कुछ को भक्ति ने 

महामारी में मरने वाले सब के सब लोग 
महामारी से नहीं मरे थे। 


८.
प्रचलित परिभाषाओं के बाहर महामारी- 4
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सभ्यता के दक्खिन में चारो दिशाओं से जिस रात धू धू धुँआ उठा 
और देखते ही देखते मनुष्य से मवेशी तक 
सब के सब राख में बदल गए 

कहते हैं तब जसोदा चाची आठ माह पेट से थी 
यह रहस्य उस अजन्में के साथ गया कि 
घृणा की आग से उठते धुँए से दम घुटने लगे तो 
करुणा का गर्भ हमें कब तक जिंदा रख सकता है 

निरपत हरिजन का पूरा का पूरा गाँव सिर्फ इसलिए जला दिया जाता है कि 
उन्होंने अपने मनुष्य होने के पक्ष में गवाही दी थी 

यदि आपके गणित और समाजशास्त्र को जाति का गेंहुअन न डसा हो तो 
सोचकर बताइये कि पिछली सदी की कोइलारी में 
कोयला खोदते खदान में दफ़्न होकर आपकी कार का ईंधन हो गए लोग कौन हैं 
बताइये तो जरा 
वे लोग कौन हैं जो भरी जवानी में दिहाड़ी करने सूरत, बम्बई ,कलकत्ता, गुजरात गए 
जिन्होंने आपके शहर की चिमनियों और मिलों को बंद नहीं होने दिया
और जो दुर्दिन में घर लौटते हुए सरकारी निर्देशों से मारे गए 

क्या आप बता सकते हैं कि 
जमींदार के भय की बेगारी करती हुई 
हड्डियों की हवस के अँधेरे गोदामों तले
कितनी अवर्ण स्त्रियों के लिए बलात्कार दिनचर्या में शामिल कर दिया गया 

क्या आप बता सकते हैं कि कितने भुइधर धोबी के पीठों पर 
ब्याज के कोड़ों के निशान कभी नहीं धुले 

खदानों में, मिलों में, मशीनों में समा गए लोग 
कौन थे, कहाँ से आये थे 
आपने कभी नहीं सोचा कि वे किस महामारी के शिकार हुए 
यदि आपने भाषा पर डाका नहीं डाला होता तो वे बोलते- 
जाति वह भीषण महामारी है 
जो न गला पकड़ती है 
न साँस जकड़ती है 
न फेफड़ों को रोक देती है काम पर जाने से 
यह आदमी के गुप्तांग में पेचकस घुसेड़ देती है
यह औरत के यौनांग में पत्थर घुसेड़ देती है 

यदि आपका इतिहास चाँदी के चम्मच से घृणा का खीर खाकर नहीं जवान हुआ है तो 
आप सोच पाएंगे कि 

जाति की महामारी से मारे गए लोगों की तुलना में 
जैविक महामारी में मारे गए लोगों की संख्या कुछ नहीं है। 

९.
बसंत आ गया है और मुझे किसी का इंतजार नहीं 
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यह सोचना मेरे रक्त में सफेद बालू घोल देता है कि
बसंत आ गया है और मुझे किसी का इंतजार नहीं 

मैंने जिस फूल की कली को चूमकर देवताओं को मुँह चिढ़ाया था
वह हवा के साथ चली गयी 

जिन रातों को बिताया था उसकी नंगी कमर को ताकते हुए 
उन सबका अँधेरा मेरे कमरे के दरवाजे पर आवारे कुत्ते की तरह बैठा रहता है 

अब कैसा तो मुर्देपन की भूमिका से भर गया हूँ कि एक शख्स मेरा हक़ मुझे नहीं दे रहा 
और मैं इसके लिए चुपचाप इंतजार कर रहा हूँ
जबकि मेरी आँखों में निरंतर धधक रहे मेरे परिजनों की लाशें गवाह हैं कि 
कितनी ही बार मैंने मृत्यु के हलक़ से अपने जीवन को छीन लिया और वह लड़खड़ाकर नर्क में गिर पड़ी है

उद्विग्नता का साँप गले में नहीं बदन में दौड़ता है
उदासी की नदी आँख के आँगन से होकर गुजरती है
सूनापन नींद तक पीछा नहीं छोड़ता

यह बसंत का लहलहाता हुआ मौसम 
खिलते हुए कँटीले फूल 
यह चिड़ियों के ब्याह का लाजवाब मौसम 

मुझे इस विचार ने आश्चर्यजनक मुश्किल में डाल दिया है कि
बसंत आ गया है और मुझे किसी का इंतजार नहीं 

न सुबह का, न भूख का 
न प्रेम का, न न्याय का 
न घृणा का , न शांति का 
न जीवन का, न मृत्यु का 

अभी तो मैं बस 
एक लाचार लड़की के हाथों जंगली नदी के निर्जन धार पर छोड़ा गया प्रार्थनाओं का दीप हूँ 
इसी बीच मझधार में 
गूलर के सूखे पत्ते पर हिडोले खाता बसंत आ गया है 
और मुझे किसी का इंतजार नहीं। 

१०.
इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ 
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इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ 

यहाँ से आगे 
अतिरिक्त नींद के स्वप्न में तितली का अमलतास को न चूम पाने का कपासी दुख नहीं होना है 
यहाँ से आगे 
महुआ के गंध से देस के विस्थापन का घाव भर लेना नामुमकिन होगा 
यहाँ से आगे 
ठुमरी पर बजता पखावज सदियों दूर से आती मानुष-चीख में बदल जाएगा
यहाँ से आगे 
कत्थक करते कमल-दल से पाँव मानुष-लोहू में डूबने लगते हैं 

इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ

यहाँ से आगे 
घृणा की आग में जली बस्तियाँ आएंगी
मध्यकालीन मर्द के मस्तिष्क के मवाद से मरी बच्चियाँ आएंगी
परिवार के कोल्हू में कच्ची तीसी सी पेर दी गईं स्त्रियाँ आएंगी
बीमार मनुष्यता के लिए जंगल से सन्नाटे की औषधि बटोरते हुए पहाड़ो में ज़िंदा दफनाए गए मुण्डा और टोप्पो आएंगे 
अवर्णों की हड्डियाँ उनके लहू में घिसकर चंदन लगाने वाली संस्कृतियाँ आएंगी 
मजलूमों का रक्त पीकर जवान हुई सभ्यताएं आएंगी 
वध की भाषा में क़त्ल की कथाएँ आएंगी 
यहाँ से आगे ऐसा बहुत कुछ आएगा
जिससे निबटने के लिए यहाँ से बहुत-बहुत पीछे जाना होगा

यहाँ से आगे
लाशों से पटे धर्मस्थलों के गर्भगृह में बर्बरता की करुणा से तर्कयुद्द लड़े जायेंगे
यहाँ से दुःख नहीं, दुःख के कारण आएंगे
यहाँ से आगे बहसों का अंधड़ आएगा
यहाँ से आगे पुनर्व्याख्याओं की लू चलेगी 

जिनकी चेतना के गुणसूत्र अनुकूल नहीं हैं ऐसे मौसम के लिए 
वे लौट जाएँ 

बहुत भीषण है यहाँ से आगे कलाओं की दुनिया 
बहुत दुर्गम है यहाँ से आगे संवेदनाओं के रास्ते 
यहाँ से बदलते हैं कहानी के पात्र 
यहाँ से बदलती है कविता की भाषा 

यह इस नयी सदी और सभ्यता का आखिरी मोड़ है
इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं , लौट जाएँ । 


११.
करुणा की ठिठोली से झूलता देहयात्री था प्रेम
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- तुम कहते हो तुम्हारी पीठ पर जन्म के पहले से ही हजार कोड़ो के निशान हैं? 

- हाँ हैं, ये कोड़े मेरे पुरखों ने खाये थे 

- अपनी शर्ट उतारो, मुझे देखने हैं

- तुम हँस सकती हो पर शर्म आती है मुझे 

- बकवास मत करो, उतारो भी 

- पीछे मुड़ो... अब तुम इन्हें देख सकती हो 

- अरे हाँ ! ये निशान सच में हैं ; रुको, रुको इन्हें छूने तो दो जरा

- तुमने मेरी नंगी पीठ देखी, अब तुम भी मुझे अपनी नंगी पीठ दिखाओगी 

- माँ कहती है अपनी आँखों से अपने घाव नहीं देखने चाहिए, पीड़ा बढ़ती है। 


१२.
बहुत मामूली सी चीजें चाही थी उन्होंने 
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मेरे पुरखों ने एक छत चाही थी 
धूप, सर्द और बारिश से जो छुपा सके सिर 
बच्चे जब थरथराते थे ठंड से 
तो पिता की आत्मा कटे पतंग सी काँपती हुई गिरने लगती थी पीड़ा के महासागर 

खेत का इतना भर टुकड़ा चाहते थे वे 
कि मुठ्ठीभर भूख की मक़तलनुमा हवेली पर बँधुआ हुए बगैर 
परिवार को ज़िंदा रखा जा सके 
और न्यूनमत आत्माभिमान का सौदाकर लाये गए अन्न से 
बच्चों की क्रूरतम मृत्यु को स्थगित किया जा सके 

जबकि वे जानते थे मनुष्य के नंगेपन के आगे देह का नंगापन कुछ भी नहीं, फिर भी
बच्चों का, बीवी का तन ढँक जाए
कि सभ्यताएँ बची रह जाएँ नंगी होने से 
इतना भर वस्त्र चाहा था मेरे पुरखों ने 

कुछेक थे जिसने इन सबसे उबरकर एक देस चाहा था 
कोड़ों से क़त्ल हुए बगैर जिसे वे अपना कह सकें 

पर धर्म की आग पर पके अजन्मी पीढ़ियों के गर्भ-शिशु खाये शराबी की उल्टियों की तरह 
तुम्हारी सभ्यता सदियों दूर से गंधाती है मुझे 

मैं देखता हूँ कि वहाँ, अय्यास इतिहास के कोटरों में 
अकूत अनाज सड़कर बजबजा रहा है 
सड़ी सभ्यता के संग्रहालय में रखी वह जड़ीदार शेरवानी 
मेरे पुरखों की हड्डियों से बनायी गयी हैं 

एक भूख सदियों से मेरा पीछा करती है 
एक आदिम कराह सीने में सारंगी की तरह बजती रहती है
तुम ध्यान से देखोगे तो 
तुम्हें मेरी पीठ पर कोड़ों के हजार निशान मिलेंगे 
माँ कहती है जन्मजात हैं ये निशान 

भूख भर अन्न 
धूप भर छत 
प्यास भर पानी 
बहुत मामूली सी चीजें चाही थी मेरे पुरखों ने 
पर घृणा के मवाद का खाद पाकर लहलहाती हुई तुम्हारी सभ्यता ने उन्हें 
भूख में डुबोकर मारा
पानी से बाँधकर मारा 
इतिहास की छत बनवाई और छत में चुनवाकर मारा । 


१३.
अपनी आत्मा को खूब सुखा दो पहले
फिर अपनी रीढ़ की हड्डी निकालकर सौंप आओ
हत्यारों, आतताइयों और धार्मिक उन्मादियों के हाथ
अपने मस्तिष्क में धर्म का धुआँ भर लो इस कदर कि
तुम अपनी बेटियों, पत्नियों और माँओं के लिए
कुतिया, रण्डी और छिनाल जैसे सम्बोधनों का समर्थन कर सको
और सोच सको कि
मेरा प्रधानमंत्री इसके समर्थन में है
तो अवश्य ही अपूर्व गौरव की बात है

अपने हृदय को
फूल से बच्चों की जली लाश की राख से लीप लो
कर लो बिल्कुल मृत्यु-सा काले रंग में
और इन बच्चों की हड्डियों में
वह रंग विशेष का झण्डा लहराकर
पूरे हृदय से भारत माता को करो याद
अपने कानों में ठूँस लो हत्या समर्थन के सभी तर्क-पुराण
और उन गला सुजाकर रोती माँओं की चीख़ को
भजन या राष्ट्रगान की तरह सुनो

जिनके ईश्वर जैसे बच्चे
स्कूल और अस्पताल से नहीं लौटे आज की शाम
जुबान को काटकर रख आओ सत्ता के पैरों पर
आँखों का पानी बेच आओ सम्प्रदाय की दुकान में
आने के पहले थोड़ा लाश हो जाओ
थोड़ा-थोड़ा हो जाओ पत्थर
फिर तो स्वागत है तुम्हारा इस देश में
एक देशभक्त और सम्मानित नागरिक की तरह।


१४.
यह मनुष्य की मनुष्य को मनुष्यता की पुकार है
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किस ख़बर का इंतजार है आपको 
किस हत्या के बाद आपकी नसें तन जाएंगी
किस लाश को कंधा देने निकलेंगे आप अपनी हड्डियों से बाहर 

कविता में कह चुका हूँ पहले भी 
सात समंदर घृणा से उपजे हत्यारों की कृपा पर पल रहे देश को कत्लगाह में बदलते देर नहीं लगती 

क्या आपको अपनी संतान की सरकारी हत्या का इंतजार है 
क्या आपने तय किया है कि जबतक खून का समंदर आपका दरवाज़ा नहीं खटखटाता 
तब तक आप अपने दड़बों में पड़े रहेंगे 

आप मेरी माँ और पिता हैं तो कहना चाहता हूँ -
आपके बदन का दूध और पसीना जो मेरी देह में रक्त बनकर दौड़ रहा है 
वह ख़तरे में हैं 
आप मेरे भाई हैं तो फिर अनंतिम हताशा में साहस बनकर उभरने वाला कन्धा कभी भी पुलिस की लाठी से तोड़ा जा सकता है 
आप मेरी प्रेमिका हैं तो याद रखें यह मुलाकात हमारी आखिरी मुलाकात हो सकती है 
फिर चीख में लिथड़े मरे प्रेमी के बेज़ान होंठ चूमने के अलावा कुछ नहीं बचेगा 

स्वर्ग कहीं नहीं होता , नर्क होता है 
नर्क की दीवारें नहीं होतीं 
नर्क का दरवाजा कहीं से भी खुल सकता 

आप अपनी देह, अपनी हड्डियों से बाहर निकलें 
किसी रिश्ते के लिए नहीं 
यह मनुष्य का मनुष्य को मनुष्यता की लड़ाई के लिए पुकार है 

इसके पहले की आप किसी अपने को फोन करें और आपको उसके सरकारी मौत की ख़बर मिले 

सरकार हत्यारों के ख़िलाफ़ लहराते हुए अपने बाजू 
आप अपनी देह, अपनी हड्डियों से बाहर निकलें ।


१५.

सभ्यता की अदालत में तटस्थता एक अपराध है 
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यदि आप हत्यारे के विरोध में होना नहीं चुनते 
तो हत्यारे आपको अपना समर्थक मान लेते हैं 

यदि आप भूखे का साथ नहीं देते 
तो आप अय्यास सम्पन्नता के साथ हो जाते हैं 

यदि आप मनुष्य होने के लिए नहीं होते लालायित
तो अमानुषों की सेना आपको गिन लेती है अपने में 

यदि आप प्रेम को नहीं चुनते 
तो घृणा आपको चुन लेती है 

सभ्यता की अदालत में तटस्थता एक अपराध है 

यदि आप नहीं खड़े होते स्वतंत्रता, समानता, न्याय और प्रेम के पक्ष में 
तो तमाम मृत तर्कों के बावजूद
आप इनके विरोधियों में हो चुके होते हैं शामिल । 

१६.
कुछ लड़ाइयाँ अटल और अनिवार्य होती हैं 
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कुछ लड़ाइयाँ अटल और अनिवार्य होती हैं 
जिन्हें हमारे पुरखे 
या तो हारे होते हैं 
या लड़े नहीं होते 
वे मृत्यु की तरह अटल और अनिवार्य होती हैं 

घृणा और बदले के सिंहासन पर बैठी सरकारें
अपनी कारुणिक विनम्रता में भी 
क़त्लेआम की शांति-व्याख्याओं की हद तक निर्मम होती हैं 

फिर यहाँ तो सामूहिक हत्याओं को भी 
सदी के विकास-क्रम का अनिवार्य चरण बताया जाता है 
मुसोलिनी और हिटलर, इदी अमीन और पॉल पॉट 
बहुत कम हत्यारों को राज करने का दुयोग होता है 
पर जब होता है तो देश को मक़तल में बदलते देर नहीं लगती 

तब सड़कों , आँगनों और दिमागों में 
खेतों , जंगलों और विश्वविद्यालयों में 
संसदीय नीति-पत्रों और पुस्तकालयों में 
चारो तरफ खून ही खून पसर जाता है 
सभ्यता के कोढ़ की तरह जन्मे हत्यारों को देशभक्त के तमगे से नवाजा जाता है 
शांति-दूतों की तस्वीरों से पुर्नहत्या का किया जाता है अभ्यास 
तब मानवद्रोहिता और अमानुषिकता की एक प्रतियोगिता शुरू होती है 
जिसमें बहुत बड़ी आबादी निकृष्टतम होने के लिए गिरती चली जाती है 

पर इसी बीच कुछ जिंदा ज़ेहन लोग निकलते हैं अपनी अपनी देह से बाहर 
और सरकार की गोली खाकर मरी संतान की ताजी चिता से उठा लाते हैं मुठ्ठी भर आग 
सीने में छिपा लेते हैं प्रमथ्युस की विरासत 
और आग को जिलाए रखने के मुहावरे से बाहर लाते हैं 

दोस्तों ! बहुत काम की चीज होती है आग 
जाति का ज़हर ज़ेहन में चढ़ जाए तो 
लगा दी जाती हैं चमारों की बस्तियों में 
बलात्कारियों के हत्थे चढ़ जाए तो 
फूँक दी जाती है चीखती हुई औरत 
यह धर्म-शास्त्रों में शस्त्र की तरह फैलती है 
और राख हो जाता है मुहल्ला , पुरवा, प्रदेश 
आग का प्रयोगधर्मी हत्यारा यदि हो जाए प्रधानमंत्री
तो धू-धू कर जलने लगता है पूरा देश
तब आग जंगल की तरफ से नहीं संसद की तरफ से फैलती है 

पर नहीं दोस्तो! 
आग रोटी भी पकाती है 
अच्छे दिनों की तमन्ना 
दुर्दिन में आग बनकर उभरती है और इंसान को बेख़ौफ़ कर देती है 
तब आग को जिलाए रखने के मुहावरे से बाहर लाकर 
मनुष्य ललकार कर लड़ जाता है हत्यारों से , सरकारों से 
फिर वह हक़ और हुकूत के लिए जिरह नहीं करता 
सामने से आती हुई सरकार की गोली को चूम लेता है 
क़ैदखानों में यारों के साथ मुक्ति-गीत गाता है 
तानाशाह की बौखलाहट पर हँसता है 
और हँसते हुए फाँसी तक चढ़ जाता है 

वह बहुत अच्छे से जानता है कि 
यह लड़ाई वह नहीं लड़ेगा तो उसकी आने वाली पीढ़ियों को लड़नी होगी 
और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी 

वह बहुत अच्छे से जानता है कि 
कुछ लड़ाइयाँ मृत्यु की तरह अटल और अनिर्वाय होती हैं । 

१७.
इसी देश में रहेंगे 
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इसी धरती के गर्भ का जल बदन में लहू बनकर दौड़ता है 
इसी खेत का उपजा अन्न माँस-मज्जा बनकर बढ़ता है 
कभी काम के कोल्हू से बँधी माँ ने उतारा तो 
इसी धरती की गोद में बेफिक्र पसर गए 
अपने घावों पर इसकी मिट्टी का थाप दिया और सब ठीक हो जाने के भरोसे से जिंदा रहे 

पर धर्म की घृणाएँ कत्लेआम से भी नहीं जातीं 
वो अजन्मी पीढ़ियों तक का पीछा करती हैं 

अब जब संगठित घृणा-वंशज हमसे बाशिंदगी का सबूत माँगते हैं 
तब मैं एक ऐसे लैब को ढूँढता फिर रहा हूँ जो मेरी रूह का एक्सरे कर सके 

पर नहीं 
नागरिकता रूह नहीं जिस्म का मसअला है 
और जिस्म को गोली मारी जा सकती है 

सरकार की गोली , घृणा का बारूद बेशक हमें खत्म कर सकता है 
पर हम लड़ेंगे , थकेंगे , टूटेंगे , रो पड़ेंगे 
अपनी कब्र खोदेंगे और पुरखों के बगल में जा सो पड़ेंगे 
पर हम कहीं नहीं जाएंगे 

इसी देश में जन्मे थे इसी देश में मरेंगे 
यहीं अपनी देह ,अपने देश में रहेंगे । 

१८.
करुणा के कंठ में स्मृतियों की लाश बाँध
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वर्षों पहले जो तुमने उपहार में दिया 
मेरी कलाई उसी घड़ी के लिए बनी थी 

मेरे पाँव बने थे 
तुम्हें पाने की अंतहीन यात्राओं के लिए 

मेरा गला बना था 
करुणा के कंठ में स्मृतियों की लाश बाँध
पुकारते रहने के लिए तुम्हें
जंगल-जंगल , रेती - रेती , बस्ती-बस्ती 

बदन में दौड़ता मेरा गाढ़ा रक्त बना था 
तुम्हारे पाँव में महावर लगाने के लिए 

मैं तो बना था सभ्यता के उस विषण्य दुर्गंधयुक्त कुँए को पाटने के लिए 
जिसमें भूख और शोषण से लड़ते हुए मर गए 
मेरे पुरखों की असंख्य लाशें पड़ी हैं 

पर मेरा मन !
मेरा मन बना था तुम्हें प्यार करने के लिए 
और उम्र भर अपनी पीठ पर बँधुआ मजूर सा
तुम्हारा बिछोह ढोने के लिए 
तुम्हारी चाह रोने के लिए । 

१९.
रक्तबीज
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कौन नहीं जानता कि इतिहास और गाथाएँ उनकी होती हैं 
जिनके एक हाथ में कलम 
और दूसरे हाथ में विरोधियों का कटा हुआ सिर होता है 

ऐसे में रक्त-चूसकों की कथाएँ क्यों बताएंगी कि रक्तबीज कौन था 
और इतिहास के किस पन्ने पर छटपटा रहा है उसका कटा हुआ सिर 

कथा कहती है रक्तबीज को वरदान था कि 
उसके लहू का एक भी कतरा अगरचे गिरता है धरती की कोख पर 
तो उतना ही विराट , उतना ही विस्तृत दूसरा रक्तबीज पैदा हो जाएगा वहीं , उसी दम
यानि कि रक्त की हजार बूंदे हजार रक्तबीज को जन्म देती रहेंगी 

रक्त-चूषकों , आततायी बुर्जुआ देवताओं की नौकरानी हुईं दुर्गा 
जब नहीं कर पायीं रक्तबीज का सामना 
तब काली चंडिका की क्रूर विभत्स माया को रच डाला और काली पी गयी रक्तबीज का आखिरी कतरा-कतरा खून 

यह कथा यहीं पर उसकी हो जाती है जिसके एक हाथ में कलम और दूसरे में रक्तबीज का कटा हुआ सिर है 

पर सच की आदत है 
वह सदियों , भाषाओं और सभ्यताओं को पार कर चुपचाप 
किसी रोज उभरता है जिद्दी दूब और बेहया के फूल सा 

रक्तबीज का एक आखिरी कतरा लहू 
चण्डिका की आत्मा से होते हुए जमीन पर गिर पड़ा था 
मैं उसी रक्तबीज का वंशज हूँ 

तब से लेकर आज तक दुनिया में जो कहीं भी , कभी भी 
रक्तचूषक , आततायी , अन्यायी की आँखों में आँखें डालकर 
अधिकार , न्याय और समानता के लिए 
बेधड़क लड़ जाता है 
रक्तखोरों के खिलाफ सदियों पार से जुलूस जुटाकर 
राजमार्ग की तरफ बढ़ जाता है 
प्राण को अपनी देह के हरेक कतरे में बाँटकर
बुर्जुआ देवताओं की छाती पर चढ़ जाता है 
वह रक्तबीज का वंशज है 

कथा को ऐसे भी समझें कि 
रक्तबीज देह की नहीं रक्त की सवारी करता है 
जिनके पुरखे किसी अन्याय और शोषण के विरुद्ध लड़ते हुए क़त्ल हुए 
उनके नवके उस लड़ाई को लड़ते रहे

कथा के इसी अर्थात में 
मेरे बाबा रक्तबीज के वंशज थे 
मैं रक्तबीज का वंशज हूँ 
मेरी पीढ़ी रक्तबीज की वंशज होगी । 


२०.
हमारे चेहरों पर चीखों के धब्बे हैं  
_______________________________________

पिछली चौबीस रातों से मेरे स्वप्न में आने वाला

नालंदा के राजगीर पहाड़ी पर बलत्कृत स्त्री के यौनांग से रिसता खून 
और छह पुरुषों के लिंग से बहता सभ्यता का वीर्य 
मेरे मष्तिष्क में मवाद की तरह जम रहा है 

इतिहास हत्यारों के दलाल की तरह सच छुपाने का आदी है 
वह कभी नहीं कहेगा कि आशीर्वाद से और खीर खाकर गर्भवती हुईं स्त्रियाँ 
वस्तुतः उन गलीज़ आत्माओं वाले महात्माओं और ऋषिओं द्वारा बलत्कृत औरतें हैं 

त्रिशूलधारी त्रिपुंडमण्डित रक्तखोर इतिहास से मुझे उम्मीद भी नहीं 
वह तो सदियों से नालंदा के राजगीर पर्वत पर बह रहे छः पुरुषों का वीर्य पोछने में लगा हुआ है 

तो क्या राजगीर के पत्थरों पर एक बलत्कृत स्त्री और उसके असहाय प्रेमी को छोड़कर हम चाँद पर चढ़ जाएं ? 
फिर इतिहास हमें हत्यारों का दलाल कहेगा ! 
अरे भाड़ में जाए इतिहास 
भाड़ में जायें हत्यारे 
और भाड़ में जाएँ उसके दलाल 

सवाल एक बलत्कृत स्त्री और क्षत-विक्षत हुई सभ्यता का है 
सवाल ये है कि
इसे लेकर हम किस अस्तपताल में जा सकते हैं 
किस रसायन से धुल सकता है हमारे सूख चुके रक्त की शक्ल का पत्थरों पर पड़ा यह सदियों पुराना दाग 
किस भाषा में , दुनिया की किस अदालत में दायर किया जा सकता है ये मुकदमा ? 

अब समय आ गया है कि 
सृष्टि के सभी प्राणियों , जंगलों , पर्वतों और नदियों की सामूहिक पंचायत से यह तय कर लिया जाए कि 
इस दुनिया में पुरुष रहेगा कि मनुष्य 

मैं चौबीस दिनों से सुन रहा हूँ कि वह लड़की 
मुझे कातर आवाज लगाए जा रही है 
इतिहास के चंगुलों में फँसा उसका प्रेमी 
मुझे मेरे मनुष्य होने का वास्ता दे रहा है

स्वप्न और स्वप्न से बाहर 
ये आवाजें दिन रात मेरा पीछा करती हैं 

इन दिनों मेरा बदन 
क्रोध , हताशा , चिंता और शर्म से अक्सर थरथराने लगता है 
और बारहा मैं महसूस करता हूँ कि ये आवाजें 
सिर्फ चौबीस दिन से नहीं 
बल्कि सदियों से मेरा पीछा कर रही हैं ।   
 

                      - 19 अक्टूबर 2019 

२१.
वे सारे मेरे अपने हैं 
____________________________

जो सभ्यता के इतिहास में अवर्णित रहे 
जिनका होना , न होने से बिल्कुल भी अलग नहीं रहा 

जो हवा और पानी की तरह चुपचाप अपने काम पर गए 
और वापस लौटकर गुम हो गए ब्रह्माण्ड के किसी कोने में 
जिनका उल्लेख भाषा में कहीं भी नहीं पाया जा सकता 

इतिहास जिनके नामों के पीठ पर लदकर हम तक आता है 
वे उनके सिपाही हुए 
हरक्यूलिसों और अशोकों की निर्मम महानता के लिए 
उनकी हवस के लिए 
लड़े और बेनाम दफ़्न हो गए युद्धभूमि की कोख में 
वे सारे मेरे अपने हैं 
जिनकी मृत्यु का मुआवजा अदद दो आँसू की मेहरबानी के लिए तरसता रहा 

इतिहास जिन्हें विराट शौर्यजीवी योद्धा कहता है 
उनकी जमीन की तरफ देखिये 
वे मेरे पुरखों की लाशों की ढेर पर खड़े हैं 

साफ और सम्मानजनक प्यास को घाव भरे पीठ पर लादकर वे जीवन भर भटकते रहे 
बैलों की तरह जुतते रहे बैलों के साथ 
और बैलों से कम मजूरी मिली जिन्हें 
बैलों के गोबरों से जिन्होंने रोटियाँ बनायीं 

जो ताजमहल बनाए और क़त्ल हो गए 
जो भूख भरी थाली को बगल खिसका 
किसी पुरवासी का छप्पर उठाने के लिए दौड़ गए बेशर्त 
वे सभ्यता की सड़ चुकी लाश को कंधे पर लाद गाथाओं की मुर्दहिया तक पहुँचाते रहे 

वे सारे मेरे अपने हैं 

वे ज्यादातर श्यामवर्णी मेहनतकश बलिष्ठ हुए 
इतिहास ने उन्हें राक्षस कहा और वध किया 
पहाड़ की मानिन्द जीवट और रुई की तरह मुलायम 
पूँजी के अभाव में सीने में पल रहे मृत्यु को छिपा ले गए 
और पीढ़ी की पहली स्कूल जाती बेटी की लाल चोटी पर फिदा होकर बिफर पड़े 

वे किसी की महानताओं के लिए झंडा उठाते रहे 
सभा में झाड़ू लगाते रहे 
पुल के लिए लोहा काटते रहे 
सड़क के लिए गिट्टी तोड़ते रहे 
पानी के लिए जमीन खोदते रहे 

वे किसी भी वर्णन के आदि-आदि हुए 

सभ्यताएं जिनके पसीने को सोखकर हरी होती रहीं 
महानताएँ जिनके रक्त से ऐश्वर्य पाती रहीं 
गाथाएँ जिन्हें राक्षस कहती रहीं 
वे सारे के सारे मेरे अपने हैं। 

२२.
रुलाई 
_________________________

वह कभी भी आ सकती है 
कहीं भी किसी भी बात पर 
किसी को भी 

बैठे - बिठाए अचानक से वर्षों पुरानी कोई बात
आँख में पानी की तरह चमक सकती है 

उदास शाम की टेक लेकर 
चौराहे पर सिग्नल खुलने के इंतजार में खड़े 
या पुश्तैनी पीड़ाओं के संग्रहालय , गाँव में अपने
अधिया खेत से काटकर लाते हुए बरसिम 
माँ की दशकों पुरानी थकान का अंदाजा लगा 
आ सकती है रुलाई 

पहले दिन के स्कूल से लौटती हुई 
दो हाथ के अमलतास के फूल सी बेटी को देख 
छलछला सकती हैं आँखे 

या मुठ्ठीभर भात की भूख को हत्या की भीख में बदलते देश की 
अय्यास और निर्मम संपन्नता देख 
वह आ सकती है 

होलिका दहन में शामिल होते हुए 
हॉस्टल के कमरे में बैठे हुए बीहड़ अकेले को ओढ़ 
दोस्त को देते हुए प्रेम-विवाह की बधाईयाँ 
मनरेगा से लौटे हुए बासठ बरस के बाबा का धुलाते हुए हाथ 
कालीन पर लेटे हुए कालीन बीनते दिनों को याद कर
अपनी ही किसी कविता का करते हुए पाठ 
(आवाज थरथरा सकती है , आँखे भरभरा सकती हैं)
मेट्रो में चढ़ते ही 
वर्षों पहले गुजर गए भाई की शक्ल का कोई लड़का देख 
हवाई जहाज में उड़ते हुए बहन के विवाह की चिंता में 
पहाड़ पर चढ़ते हुए 
जंगल में घूमते हुए 
नदी में तैरते हुए 
मॉल में टहलते हुए 
चाँद पर उतरते हुए 
रुलाई कहीं भी , कभी भी और किसी को भी आ सकती है 

कई बार वह नहीं आती है 
जैसा होना है उसका आना , वैसे नहीं आती है
पिछले बरस चौंतीस की उम्र में चाचा जब मरे 
तब दादा नहीं रोये 
भीड़ को छाँट-छाँट बीच-बीच मे देख जाते रहे 
दरवाजे पर नीम नीचे पड़ी जवान बेटे की लाश
वे बस चुप रहे , हमेशा के लिए चुप रहे 
जब सब रोकर अपने जीवन में लौट आए 
तब भी वे चुप ही रहे 
भव्य अतीत के जर्जर खण्डहर मानिंद
कभी - कभी राह चलते गिर जाते हैं और खुद उठ नहीं पाते 
कहने को कहा जा सकता है कि वे नहीं रोये 

पर मेरे दोस्त 
सच किसी गद्दार के दिल में 
पचपन बर्छियों का छेद करता है 

हम रोने के लिए कन्धा चुनते हैं 
और इधर निर्लज्जता के नए नए प्रतिमान 
कोई कंधे के लिए किसी का रोना चुनता है 

हमारे आँसू तक गिरवी रखे जा चुके हैं 

पड़ोसी की हत्या कर 
सांत्वना बँधाकर
लाश को कन्धा देकर
करुणानिधि और प्रिय बना जा सकता है 

भाषा को बेगार खटाने के लिए माफ़ी चाहूँगा दोस्त 
कहता तो बस इतना भर था कि 
वह तो रुलाई है 
वह कभी भी आ सकती है 
कहीं भी , किसी भी बात पर 

पर अपने ही क़त्ल के लिए 
क़ातिल की कृतज्ञता पर रुलाई कभी नहीं आती । 

© Vihag vaibhav



कवि परिचय : -
                       विहाग वैभव अभी बीएचयू से हिंदी विषय में पीएचडी कर रहे हैं।
इन्हें 'भारत भूषण अग्रवाल सम्मान -2018' से सम्मानित किया गया है।




संपादक परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू ~ बी.ए.}
संपर्क सूत्र  : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com 

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Wednesday, 26 August 2020

युवा कवि संदीप तिवारी की कुछ महत्वपूर्ण कविताएँ { सम्मान : रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार 2020}





१.

साइकिल

_________________


दोनों पैंडल पिता के पाँव हैं

टायर पिता के जूते

मुठिया उनके हाथ

कैरियर उनका झोला


हर रोज जाती है

उन्हें लेकर

लाती है लादकर

गाते हुए लहराते हुए


बिना किसी हेडलाइट के भी

घुप्प अँधेरे में 

चीन्ह लेती है अपनी राह

मुड़ती है घर की ओर

हर रात पिता को

घर तक छोड़कर

फिर खुद सोती है साइकिल 

भूखी दीवार से सटकर


साइकिल 

जो पिता की अभिन्न साथी है

किसी पेट्रोलपंप तक नहीं जाती

कोई पेट्रोल नहीं पीती

जिसका अक्षय ईधन

छिपा है पिता के पाँव में

 १७ फरवरी ,२०२०


२.

इलाहाबाद

●●●


जो इलाहाबाद छोड़के गया है

वह प्रयागराज नहीं लौटेगा

लौटेगा तो

इलाहाबाद लौटेगा


प्रयागराज एक ट्रेन का नाम था

अब प्रयागराज एक जंक्शन का नाम हो जाएगा

अब टिकट पर नहीं लिखा मिलेगा इलाहाबाद

अब टिकट में उतनी महक भी नहीं बची रहेगी


प्लेटफार्म पर गड़े पीले बोर्ड

जिसको देखने भर से आ जाती थी जान में जान

उस पर लिखा एक प्यारा सा शब्द

अब मिटा दिया जाएगा


कहीं पर कुछ भी लिख दिया जाए

कुछ भी तोड़ फोड़ दिया जाए

पर दुःखी मत होना

सुबेरे जब ट्रेन पहुँचेगी प्रयागराज जंक्शन

बगल बैठा मुसाफ़िर उठाएगा

और बढ़ जाएगा इतना कहते हुए

जग जा भाई आ गया इलाहाबाद

★★★

३.
विदा के वक़्त
●●●

झोले में सब सामान समेटा जा चुका होता है
फिर भी बार-बार लगता है 
कहीं कुछ छूट सा गया
जैसे रह गया हो कुछ कहीं कोने में
 

विदाई के वक़्त
छूट जाती हैं बहुत सी चीजें
सबकुछ समेटकर भी
एक झोले में नहीं भरा जा सकता
कोई परचून की दुकान नहीं है विदाई का घर
परचून की दुकान से नहीं होता है कोई विदा

अमूमन बहुत तेज़ी से पहन लेता हूँ जूते
पर कभी-कभी 
जान बूझ कर करता हूँ देर
दोनों हाथों को लहराकर 
झाड़ता जाता हूँ जूते की धूल
मोजे को कई-कई बार करता हूँ सीधा
विदाई के वक़्त
बहुत समय लग जाता है
जूते को पहनकर खड़े होने में

 
चोरों की तरह 
नज़र चुरानी पड़ती है
और जल्दी से उतर जानी पड़ती हैं सीढियाँ
बहुत घातक होता है 
विदाई के वक़्त मुड़ के देखना

 
सड़क पर पहुँचते-पहुँचते 
भर जाती हैं आँखे
डर लगता है 
कि कहीं छलक न जाएं

 

सामने न देखकर 
कनखियों से देखता हूँ अगल-बगल
ठेले पर लदी सब्जियाँ 
और सुंदर लगने लगती हैं
बच्चे जहाज की तरह भागते हैं
मन उथल पुथल में होता है
और उन पर गाड़ियाँ हॉर्न बजाते हुए सरपट निकल जाती हैं

 

सड़क किनारे अपने डेढ़ पैरों पर खड़े शराबी
दुनिया को गालियों में नाप रहे होते हैं
मोटरसाइकिल के चक्के में
फँस गया है सजी-धजी दुल्हन का आँचल
रिक्शे वाला आज बहुत दयनीय लगता है
एक पागल जिसने फुटपाथ को ही बना लिया है अपना घर
रोज की तरह सुखा रहा है अपने कपड़े

इन सब से गुजरते हुए
सूखने लगा है आँख का पानी
भूल गया हूँ,कि
अभी-अभी किस हाल में रक्खा था सड़क पर कदम
भूल गया हूँ, कि 
अभी कहाँ से आ रहा हूँ

४.
बदरा बेमौसम
______________________

नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
दिन मा किए अनिहरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम

अखियाँ में जैसे लगाए कजरवा
चमकैं औ गरजैं चिढ़ावैं बदरवा
रोवैं औ पनिया बहावैं बदरवा
ताकैं तौ जैसै डरावैं बदरवा
करिया भई दुपहरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम

उड़ि चली चिरई 
कुकुर सब भागे
नाचै बच्छउआ
पड़ीवा कुलाछै
ताकैं टुकुर टुकुर सरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम

गोहूँ वलरि गए
टूटि गई सरसो
झरे गिरे चनवन कै फुलवा
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम

होली मा बरसैं
देवाली मा बरसैं
तरसैं असाढ़े मा धनवा
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
 ९मार्च , २०२०

५.
कोरोना क़हर है
सबको पता है
सभी कह भी रहे हैं
फिर भी सड़क पर आ रहे हैं

ये बिल्कुल वैसे ही है जैसे

तम्बाकू ज़हर है
रैपर पे लिखा है
सबको पता है
मगर सब खा रहे हैं
 २५ मार्च , २०२०

६.
जिसमें तैरकर जाते थे लोग घर
वह रेल हो गई है बन्द
पटरियाँ  बह  रही  हैं  सूखी
सूखी नदी में कैसे तैरेंगे लोग

भले लोग भी हैं दुनिया में
जो आएंगे आगे
रास्ता बताएंगे

सूखी नदी में कठिन है तैरना
कुछ दूर चलेंगे कहीं बैठ जाएंगे
उतरेंगे नदी में तैरते हुए जाएंगे
जो पैदल निकले हैं घर
वह पैदल ही पहुँच जाएँगे
२८ मार्च , २०२०

७.
गाँव, घर और शहर //

याद न करना घर की रोटी
घर का दाना
शहर की दुनिया में जब आना
मत घबराना
बड़ी खोखली है यह दुनिया
थोड़ी चोचली है यह दुनिया
किसिम-किसिम के जीव यहाँ पर
इनसे बचकर आना-जाना
मत घबराना...

शहर की दुनिया में जब आना
गली शहर की मुस्काती है
फिर अपने में उलझाती है
इस उलझन में फँस मत जाना
शहर में रुकना है मजबूरी
गाँव पहुँचना बहुत जरूरी
गाँव लौटना मुश्किल है पर
मत घबराना...

समय-समय पर आना-जाना
चाहे जितना बढ़ो फलाने
स्याह पनीली आँखों से तो
मत टकराना
धीरे-धीरे बढ़ते जाना
कुछ भी करना,
हम कहते हैं घूँस न खाना
शहर की दुनिया में जब आना
मत घबराना...

जब भी लौटा हूँ मैं घर से
अम्मा यही शिकायत करती
झोला टाँगे जब भी निकले
मुड़कर कुछ क्यों नहीं देखते
अब कैसे तुम्हें बताऊँ अम्मा
क्या-क्या तुम्हें सुनाऊँ अम्मा
तुमको रोता देख न पाऊँ
तू रोये तो मैं फट जाऊँ...
सच कहता हूँ सुन लो अम्मा...
यही वजह है सरपट आगे बढ़ जाता हूँ
नजर चुराकर उस दुनिया से हट जाता हूँ
आँख पोंछते रोते-धोते थोड़ी देर तक
पगडंडी पर घबराता हूँ
किसी तरह फिर इस दुनिया से कट जाता हूँ


८.
ठेका खुल गया
__________________

ठेका खुल गया
रंग बिरंगी बोतल आई
दिल दिमाग में दौड़ रही 
ठंडी पुरवाई

धन्य देश सरकार धन्य है
धन्य हमारी जनता
धन्य देश के मदिरालय हैं
जिनसे सच्ची ममता

धन्य हमारे पीने वाले
धन्य हमारी दारू
धन्य हमारे महाभूमि की
मिमियाती मेहरारू

धन्य देश का अटल खजाना
जो वर्षों से खाली
धन्य देश की प्यारी जनता 
पीट रही जो थाली

आसमान से बरसा पानी
धरती का संताप धुल गया
उठो भाइयो! 
ठेका खुल गया
४ मई ,२०२०

९.
पहले भी कम नहीं थीं मुश्किलें
_____________________________

ख़बरों में अभी भी पैदल चल रहे हैं लोग
साइकिल से जा रहे हैं
हज़ार-हज़ार किलोमीटर दूर अपने गाँव
दिन भर, रात भर,
भूख प्यास गर्मी में, लू में
चले जा रहे हैं

पहले भी कम नहीं थीं मुश्किलें
रेल के दरवाजे पे लटककर
शौचालय के बगल खड़े होकर
जाते थे लोग

ऊपर की सीटों में लपेटकर गमछा
बैठने की जगह बनाते थे
जहाँ सामान रखा जाना चाहिए
वहाँ खुद गठरी बन जाते थे 
पहले भी कम नहीं थीं बाधाएँ

अपनी सीट का किराया देकर भी  
खड़े होकर जाते थे 
दिल्ली कलकत्ता बम्बई हैदराबाद लुधियाना चंडीगढ़ 
और मंत्रालय ने  टिकट काउंटर पर लिखाया
कि इनका साठ प्रतिशत किराया 
कोई और अदा करता है

कोई ठीक-ठीक आँकड़ा है किसी भी सरकार के पास
कि वे बम्बई में कहाँ थे
दिल्ली में किधर
हैदराबाद लुधियाना में कहाँ रहते थे
चंडीगढ़ में काम तो करते थे
पर क्यों रहते थे चंडीगढ़ के पार

इस महामारी से पहले भी
वे मर खप रहे थे, अपने-अपने आकाश में
देर रात अपने-अपने पिंजरे में लौट आते थे सोने

कोई आँकड़ा है किसी भी सरकार के पास
कि किस नल का पानी पीते थे ये लोग
शौच के लिए सुबह-सुबह
कैसे खड़े रहते थे घंटों 
लम्बी-लम्बी कतारों में 
खाते भी थे या भूखे पेट सो जाते थे

रेल में मेट्रो में बसों में 
उनकी ही जेब कटी
वे ही ठगे गये हर जगह
बचा खुचा रुपया मोजे में छिपाकर 
लौटते थे गाँव
बहुत उदास होकर

यह महामारी तो अभी-अभी आई है
उनके हर दिन की महामारियों का 
कोई हिसाब नहीं!
न कोई सिरा न कोई अंत!

कुछ लोग कह रहे हैं कि
वह अबकी नहीं लौटेंगे शहरों महानगरों की ओर

लौटेंगे 
फिर लौटेंगे
जब तक पेट है आते-जाते ही रहेंगे

वही बनाएंगे घर 
वही ढोएंगे सामान
सरकार ठेकेदार दुकानदार मालिक सभी
फिर से बुलाएंगे उन्हें
आगामी महामारियों का अभ्यास कराने के लिए
 २६ मई ,२०२०

१०.
 ★पसिंजरनामा★

काठ की सीट पर बैठ के जाना 
वाह पसिन्जर जिंदाबाद 
बिना टिकस के रायबरेली 
बिना टिकस के फ़ैज़ाबाद 
हम लोगों की चढ़ी ग़रीबी को सहलाना 
वाह पसिन्जर जिंदाबाद । 

हाथ में पेपरबैक किताब 
हिला-हिलाकर चाय बुलाना 
रगड़ -रगड़ के सुरती मलना 
ठोंक -पीटकर खाते जाना 
गंवई औरत के गंवारपन को निहारना 
वाह पसिन्जर जिंदाबाद ।

तुम भी अपनी तरह ही धीरे 
चलती जाती हाय पसिन्जर 
लेट-लपेट भले हो कितना 
पहुंचाती तो तुम्ही पसिन्जर 
पता नहीं कितने जनकवि से 
हमको तुम्हीं मिलाती हो 
पता नहीं कितनों को जनकवि 
तुम्हीं बनाते चली पसिन्जर 
बुलेट उड़ी औ चली दुरन्तो
क्योंकि तुम हो खड़ी पसिन्जर 
बढ़े टिकस के दाम तुम्हारा क्या कर लेगी ?
वाह पसिन्जर जिंदाबाद । 

छोटे बड़े किसान सभी 
साधू, संत और सन्यासी 
एक ही सीट पे पंडित बाबा 
उसी सीट पर चढ़े शराबी
चढ़े जुआड़ी और गजेंड़ी
पागल और भिखारी 
सबको ढोते चली पसिन्जर 
यार पसिन्जर तुम तो पूरा लोकतंत्र हो !!!!!

सही कहूँ ग़र तुम न होती 
कैसे हम सब आते जाते 
बिना किसी झिकझिक के सोचो 
कैसे रोटी- सब्जी खाते 
कौन ख़रीदे पैसा दे कर 'बिसलरी'
उतरे दादा लोटा लेकर 
भर के लाये तजा पानी 

वाह! पसिन्जर .........
तुम्हरी सीटी बहुत मधुर है 
सुन के अम्मा बर्तन मांजे 
सुन के काका उठे सबेरे 
इस छलिया युग में भी तुम 
हम लोगों की घड़ी पसिन्जर
सच में अपनी छड़ी पसिन्जर 
वाह पसिन्जर जिंदाबाद । 

 

भले कहें सब रेलिया बैरनि
तुम तो अपनी जान पसिन्जर 
हम जैसे चिरकुट लोगों का 
तुम ही असली शान पसिन्जर 
वाह पसिन्जर जिंदाबाद ।

 

११.
टिकट काटती लड़की
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हल्की पतली नाक
और चमकती आँख
गेहुँआ रंग, घने बालों में
हल्का होंठ हिलाकर बोली
चलो बरेली चलो बरेली
बस के अंदर टिकट काटती
टिकट बाँटती लड़की....

गले में काला झोला टाँगे
हँस-हँस कर बढ़ती है आगे
बहुत आहिस्ता पूछ रही है
कहाँ चलोगे??

कान के ऊपर फँसा लिया है
उसने एक कलम
हँसकर शायद छिपा लिया है
अपना सारा ग़म
उसी कलम से लिखती जाती 
बीच-बीच में राशि बकाया,
बहुत देर से समझ रहा हूँ
उसकी सरल छरहरी काया....
बस के अंदर कोई फ़िल्मी गीत बजा है
देखो कितना सही बजा है...
"तुम्हारे कदम चूमे ये दुनिया सारी
सदा खुश रहो तुम दुआ है हमारी।"

घूम के देखा अभी जो उसको,
टिकट बाँटकर
सीट पे बैठे
पता नहीं क्या सोच रही है
किसके आँसू पोंछ रही है.
कलम की टोपी नोच रही है..!


 

१२.
मकड़जाल
--------------------

भिनसार हुआ, उससे पहले 
दादा का सीताराम शुरू 
कितने खेतों में कहाँ-कहाँ 
गिनना वो सारा काम शुरू 
'धानेपुर' में कितना ओझास, 
पूरे खेतों में पसरी है 
अनगिनत घास 
है बहुत... काम,

 

हरमुनिया सा पत्थर पकड़े 
सरगम जैसा वो पंहट रहे 
फरुहा, कुदार, हंसिया, खुरपा 
सब चमक गए 
दादा अनमुन्है निकल पड़े 
दाना-पानी, खाना-पीना 
सब वहीं हुआ,
बैलों के माफ़िक जुटे रहे 
दुपहरिया तक, 

घर लौटे तो कुछ परेशान 
सारी थकान.....
गुनगुनी धूप में सेंक लिए, 
अगले पाली में कौन खेत 
अगले पाली में कौन मेड़
सोते सोते ही सोच लिए

 

खेती-बारी में जिसका देखो यही हाल 
खटते रहते हैं, साल-साल 
फिर भी बेहाल, 
बचवा की फीस, रजाई भी 
अम्मा का तेल, दवाई भी 
जुट न पाया, 
कट गई ज़िंदगी 
दाल-भात तरकारी में...!

 

 ये ढोल दूर से देख रहे हैं 
लोग-बाग़,
नज़दीक पहुंचकर सूँघे तो 
कुछ पता चले,
खुशियों का कितना है अकाल... 
ये मकड़जाल, 
जिसमें फंसकर सब नाच रहे
चाँदनी रात को दिन समझे 
कितने किसान.....
करते प्रयास 
फ़िर भी निराश 
ऐसी खेती में लगे आग!

 
भूखे मरते थे पहले भी 
भूखे मरते हैं सभी आज 
क्या और कहूँ ?

 

 
१३.
बाल नरेन्दर
------------------

 संघर्षों के सोना-चाँदी
हीरा-मोती बाल नरेन्दर
मगरमच्छ की खाल नोचकर
बड़े हुए हैं लाल नरेन्दर

 

प्लेटफार्म पर चाय बेचते
रहे इक्कीस साल नरेन्दर
फिर साधू सन्यासी बनकर
भटके सालों साल नरेन्दर

 

डिग्री कहाँ किधर से झटके
ये तो बड़ा सवाल नरेन्दर
बंगाली रसगुल्ला खाकर
फुला लिए हैं गाल नरेन्दर

 

आंख चुराकर नज़र बचाकर
ठोक रहे हैं ताल नरेन्दर
बचा खुचा है सिर में जितना
बेचेंगे सब बाल नरेन्दर

 

चूम रहे हैं डाल नरेन्दर
सच में बड़े कमाल नरेन्दर

तन ढंकने को लाख टके का
पहन रहे हैं छाल नरेन्दर!

१४.
यूकेलिप्टस का दरख़्त यह
____________________

कटहल से कुछ और बड़ा है 
दस पेड़ों के बीच खड़ा है
आमों का सिरमौर बना है 
चिकना गोल-मटोल तना है 
यूकेलिप्टस का दरख़्त यह 
जिसको देख रहा हूँ 
 
उमड़ रहा है घुमड़ रहा है 
तीन दिशा में घूम रहा है 
मगन मुदित है झूम रहा है
पड़ोसियों को चूम रहा है 
यूकेलिप्टस का दरख़्त यह 
जिसको देख रहा हूँ 

गाँव-गाँव औ खेत-खेत तक 
पगडंडी औ मेड़-मेड़ तक
छाया है यह यूकेलिप्टस
पता नहीं किस देश-भूमि से 
लदकर कैसे हिन्द देश तक
आया है यह यूकेलिप्टस 
जिसको देख रहा हूँ 

है विनम्र यह बहुत बड़ा है 
अपने दम पर यहाँ खड़ा है 
मिट्टी पानी हवा पिया है
कैसे कैसे लड़ा जिया है 
यूकेलिप्टस का दरख़्त यह 
जिसको देख रहा हूँ  

अभी यहाँ बदली छाई थी 
अभी यहाँ बुलबुल आई थी 
अभी एक कौआ बोला था
अभी एक कोयल गाई थी 
यूकेलिप्टस का दरख़्त यह 
जिसको देख रहा हूँ
 २५ जून ,२०२०

१५.
उत्सव और तरंगें होतीं 
एक जुलाई को
मन में बड़ी उमंगे होतीं 
एक जुलाई को
बहुत सवेरे हम उठते थे 
एक जुलाई को
पैदल ही स्कूल निकलते 
एक जुलाई को

कंधे पर झोला होता था 
एक जुलाई को
नया नया चोला होता था 
एक जुलाई को
आसपास हरियाली होती 
एक जुलाई को
बादल होते बारिश होती 
एक जुलाई को।
१जुलाई , २०२०


१६.
राम की अयोध्या में
_________________

मंत्रोच्चार हुआ
राम की अयोध्या में
कई-कई बार हुआ
राम की अयोध्या में

भूमि की पुजाई हुई 
राम की अयोध्या में
ईंट की जुड़ाई हुई
राम की अयोध्या में

राम की अयोध्या को
महामारी मार रही
राम की अयोध्या को
राजनीति तार रही

जोड़ रहे तोड़ रहे
राम की अयोध्या में 
राम को निचोड़ रहे
राम की अयोध्या में

लोगों का ध्यान हटा
राम की अयोध्या में
रहे परसाद बंटा 
राम की अयोध्या में

सरयू उफान पर है
राम की अयोध्या में
चच्चा दुकान पर हैं
राम की अयोध्या में
७अगस्त ,२०२०
१४.
कलाई में बंधी घड़ी देख लेता हूँ 
पर समय नहीं देखता 
मैंने कभी समय देखने के लिए 
कलाई में घड़ी नहीं बाँधी
 
कहीं आता हूँ कहीं जाता हूँ 
कभी समय देखकर नहीं उठता 
किसी के घर से
उठता हूँ, जब ऊब जाता हूँ
एक जगह से उठता हूँ 
दूसरी जगह बैठने के लिए 

जैसे एक चिड़िया 
थोड़ी देर बैठती है किसी पेड़ पर
ऊबती है  
फिर उड़ जाती है 
बैठने के लिए 
किसी दूसरी डाल पर 

चिड़िया घड़ी नहीं लगाती 
लेकिन वह समय को जानती है
२६अगस्त ,२०२०




साहित्यिक परिचय..
©संदीप तिवारी
जन्म- 27 अप्रैल 1993, उत्तर प्रदेश
सम्मान : रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार 2020
महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र- पत्रिकाओं और ब्लॉगों में कविताएँ प्रकाशित।

संपर्क-  हिंदी विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल, 263001
मो.नं. : 8840166161





संपादक परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू ~ बी.ए.,द्वितीय वर्ष}
जन्म : ५अगस्त ,१९९९ ,चंदौली , उत्तर प्रदेश, भारत।

संपर्क सूत्र :-
ईमेल : corojivi@gmail.com

मो.नं. : 8429249326


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युवा कवि मनकामना शुक्ल 'पथिक' की कुछ महत्वपूर्ण कविताएँ



१.

 धड़कती स्वास बनकर के हमारी रग़ों में नारी,

अगर स्वासें नही होती तो ये धड़कन नही होती।

अज़ब है तीन आख़र प्रेम का संसार में पावन,

'पथिक'जननी नही होती तो ये दुनिया नही होती।

'गाँव की गरीब बाला'

 

यौवन की दहलीज पर खड़ी बाला

करती है कल्पनाओं के संसार मे भ्रमण,


बैठी घर के अंदर ही

निहारती आसमा की ओर


कभी बूढ़े मां बाप को तो कभी दीवार में टंगी पुरखों की तश्वीरों को,


संभाल पाना हो जाता है मुश्किल

फिर भी संभल ही जाती है 

खुद ब खुद! 


रखती है खुद को व्यस्त प्रतिपल घर, आँगन, खेत-खलिहान, फावड़े,कुदालों के साथ, बूढ़े माँ बाप चौका-चूल्हों के बीच ?


शहर में भागती गाड़ियों के पहिये की भांति!

चाह कर भी इज़हार नही कर पाती प्रेम को

अपने अनजाने, अनहोने प्रियतम से,


बुद्बुदाती मन ही मनः पूछ बैठती है,

कल्पना के सुंदर राजकुमार से !

क्या तुम करते हो मुझसे प्यार ?


क्या मैं ! कर सकती हूँ तुम्हारा आलिंगन

पल भर के लिए!


किन्तु! सहसा तिलमिला उठती है

सीने से उठती ज्वर के बीच


प्रिय को न पाकर अपनी बाहों में !


लज्जा से झुक जाता है सिर

मन ही मन शर्माती है बाला!


अपनी किश्मत के आभागेपन पर कोसती है खुद को,


झोपड़ीनुमा खपरैल घर की दहलीज़ पर खड़ी

गरीबी,बेबसी, व लाचारी के मध्य घिरी!


किन्तु याचना नही करती याचक बन कर भगवान से,,,,,


बस करती है प्रतिपाल अपना कर्तव्य,

गहरी आकांक्षाओं के बीच ?


सुनहरे पर लगा, अपलक निहारते खुले

आसमां की ओर.........।

१६-०७-२०२०

३.
'झंडा फहराई गईल ना'
भईया पंद्रह अगस्त फेर आई गईल
झंडा फहराई गईल ना......
वीर भगत के कुर्बानी,
चंद्रशेखर के कहानी
गांधी बापु के अहिंसा सबे हेराई गईल
झंड़ा फहराई गईल ना.....

एक खरब के आबादी फाइलन सगरौ आतंकवादी,
देश के बिरवन के इतिहास धुंधलाई गईल
झंड़ा फहराई गईल ना.....

भईल प्रकृति के दोहन,
बढ़ल देश में प्रदूषण
सगरौ धरती के पेड़वा कटाई गईल 
झंडा फहराई गईल ना.....

घूस पेश के जमाना सगरौ अपने ताना बाना,
आज सभ्यता औ संस्कृति हेराई गईल
झंडा फहराई गईल ना.....

नेतन के जनता पर न ध्यान मूर्ति पर टिकल परान,
एही कुर्सी के ख़ातिर सबे बौराई गईल
झंडा फहराई गईल ना....

मंदिर मस्जिद के जमाना राजनीति के तराना,
ये लॉक डाउनवा में सबै सलटाई गईल
झंडा फहराई गईल ना....

देश मे आईल कोरोनाकाल जनता हो गइल बेहाल
एहि कोरोनवा से सबहिन झटकाई गईल
झंडा फहराई गईल ना....

भईया पंद्रह अगस्त फेर आई गईल
झंडा फहराई गईल ना.....२


४.
" संबंधों की डोर "
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।
संबंधों के बीच मे
उसी तरह !
जैसे किसी पक्षी के चोंच से एक दाना
गिर पड़ा हो गहरे दरार में,
अनेक यत्नों के बीच
निकाल पाना हो जाता है मुश्किल !
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।
कभी-कभी उन संबंधों पर
पड़ जाती हैं चोटें गहरी,
लुहार के लोहे की भांति !
तिलमिला उठता है अंतर्मन,
उन स्वार्थमय संबंधों की 
जलील हरकतों से
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।
मनुष्य का गिरना उसके स्वार्थ के पराकाष्ठा 
की होती है हद! 
किन्तु ; नियति की चोट जब पड़ती है
आदमी के 'नीयत' पर !
वक्त के मार सी,
तो उस अभागे मन को होता है पश्चाताप
अपने अकर्मण्य कर्मों पर
फस जाता हूँ मैं अक्सर उन स्वार्थमय
संबंधों के बीच में.....!
       
'सुलझाओ दोस्तों'
जाति व धर्म के नाम पर न लजवावो दोस्तों,
खुले न्युक्ति की प्रक्रिया सबको बतलाओ दोस्तों।

महामना के ज्ञान मंदिर का सम्मान अलग है,
विद्या व धर्म संस्कृत की पहचान अलग है।

इन सबको एक मे पीस कर न चबाओ दोस्तों,
धर्म व जाति के नाम पर न लजवावो दोस्तों।

सच को न छिपाओ झूठे को न दबाओ,
सच क्या है उसे खुल कर के तो बताओ ।

हर धर्म संस्कृति की अपनी पहचान अलग है,
भाषा, कला, वेश-भूषा, खान-पान अलग है।

फिर भी हम हैं भारतीय न उलझावो दोस्तों,
हो काम पर विवाद न हो सुलझाओ दोस्तों।

अफ़वाहों को न यूँ ही फैलाओ ए दोस्तों,
खुले न्युक्ति की प्रक्रिया सबको बतलाओ दोस्तों।
                        
२१ नवंबर, २०१९

६.
'उम्मीद'
"""""""
सृष्टि के आरंभ से ही जुड़ा है
सम्बन्ध, मानव का उम्मीदों से!
जैसे मनु का था सतरूपा से
एक नएपन की उद्दाम,अतृप्त 
आकांक्षाओं की अमूर्त्त भविष्यमत्ता से
वहीं-वहीं !
जैसे आत्मा का शरीर से!
उम्मीदें रहेंगी तभी तो, रहेगा जीवन
पृथ्वी, आकाश व प्रकाशित ग्रहों की तरह, 
रहेगा अड़िग सत्य भी
शिराओं में स्पंदित लहू के सदृश
प्रलय प्रवाह में भी जीवंतमय बने रहने का संदेश!
आत्मा रहेगी ही कहाँ ?
जब शरीर ही नही रहेगा !
उम्मीदें हमें हौशले देती हैं,
खोल देती हैं, तमाम नाकामयाबियों के मध्य कामयाबी का एक रहस्यमय द्वार
क्षितिज के उस पार भी,
और ले जाती हैं हमें अपने मुकाम तक
मोक्ष के अंतिम सोपानों पर ।

१७ नवंबर, २०१९


७.
'गाँव आने पर'
महकते फूलों का आँगन  चहकते पंक्षियों के पर,
जहाँ पर लोक में परलोक सा सुख गाँव देता है ।
शहर की भागती,रोती व ठिठकी भीड़ से हट कर,
सुकूँ  सेहत  भरी हर  ज़िन्दगी  को छाँव देता है ।


8.
गाँव की गरीब बाला'
 
यौवन की दहलीज पर खड़ी बाला
करती है कल्पनाओं के संसार मे भ्रमण

बैठी घर के अंदर ही
निहारती आसमा की ओर

कभी बूढ़े मां बाप को तो कभी दीवारों पर टंगी पुरखों की तश्वीरों को

संभाल पाना हो जाता है मुश्किल
फिर भी संभल ही जाती है 
खुद ब खुद! 

रखती है खुद को व्यस्त प्रतिपल घर, आँगन, खेत-खलिहान, फावड़े,कुदालों के साथ, बूढ़े माँ बाप चौका-चूल्हों के बीच

शहर में भागती गाड़ियों के पहिये की भांति!
चाह कर भी नही कर पाती इज़हार
अपने प्रेम को,
अपने अनजाने अनहोने प्रियतम से

बुद्बुदाती मन ही मन पूछ बैठती है
कल्पना के सुंदर राजकुमार से !
क्या तुम करते हो मुझसे प्यार ?

क्या मैं ! कर सकती हूँ तुम्हारा आलिंगन
पल भर के लिए!

किन्तु! सहसा तिलमिला उठती है
सीने से उठती ज्वर के बीच
प्रिय को न पाकर अपनी बाहों में !

लज्जा से झुक जाता है सिर
मन ही मन शर्माती है बाला!

अपनी किश्मत के आभागेपन पर कोशती है खुद को,

झोपड़ीनुमा खपरैल घर की दहलीज़ पर खड़ी
गरीबी,बेबसी, व लाचारी के मध्य घिरी!

किन्तु याचना नही करती याचक बन कर भगवान से,,,,,

बस करती है प्रतिपाल अपना कर्तव्य
गहरी आकांक्षाओं के बीच !

सुनहरे पर लगा, अपलक निहारते खुले
आसमां की ओर ! 
                                                         


9.
'दोष इतना ही था कि मैं स्त्री थी'

अनंत आकांक्षाओं को लेकर
जनी थी एक नन्हीं सी परी
माँ की कोख़ से मुस्कराती,
उड़ना चाहती थी उन्मुक्त गगन में
सपनों के सुनहरे पर लगा
संघर्षों के पथ पर

किन्तु ! फस गई अनायास ही
धरा पर कुछ दानवों के बीच!
शिकार हुई क्षणभंगुर वासनाओं की
मनुष्य की अतृप्त हैवानियत में
रौंद दी गई बरबस काया
फसलों की भाँति !

निर्मम, नृशंस पूर्वक बर्बर,
कामुकता की खुरों से !
मांगती रही भीख दया की
याचक बन कर,
हजारों चितत्कारों के मध्य
राजधानी के राजपथ पर !

तड़फती रही अर्धनग्न लहू से लथपथ
चोटों से उभरी असहनीय पीड़ाओं
के बीच ही सिमट गई ज़िन्दगी
डबडबायी पथरीली आँखों से
कराहती, कोशती रही,
मानव की कामुकता को
धरती माँ के आँचल में!

अधटुटे फड़फड़ाते पंखों
को निहारते!
निःशब्द करुणा भरे स्वरों में 
कह बैठी अंतिम क्षण धरती माँ से,
मत देना अब किसी परी को
इस तरह बहादुर बिटिया होने का गौरव
ऋषि-मुनियों की धरती पर!

अंतिम शब्दों के साथ मुक्त हो काया से
चीखती है एक ही शब्द
बार-बार !
माँ मैं निर्दोष थी
उन वासनाओं से अतृप्त
दानवों के बीच!
बस दोष मेरा इतना ही था,
कि मैं स्त्री थी!

10.
 "आदिवासी होने का अर्थ"

पेड़ों की छाँव में, पहाड़ियों की ठांव में, घास-फुस के छाजन से पत्तों के ढ़ेर पर बसे होने का नाम है आदिवासी।

शहर की कोलाहल से दूर
खोह, कन्दराओं, घने जंगलों के मध्य अज्ञात की तलाश में प्रकृति के बीच अर्धनग्न!
कंद-मूल, रूखा-सूखा खाकर भी संतुष्ट 
होने का नाम है आदिवासी।

सूरज ,चंदा,तारे धरती, जीव-जंतुओं, वनस्पतियों के कोलाहल से ही
भविष्य का आँकलन 
करने का नाम है आदिवासी।

जल,जंगल,जमीन जागीर है जिनकी
कंद- मूल, फल ही अन्न है जिनका !
आधुनिकता की खूरों से रौंदे जाने के बाद भी,सभ्य व श्रेष्ठ होने का नाम है आदिवासी।

नियम व बचन के पक्के,
शिकार के शौकीन,
शत्रुओं से अपनी रक्षा में महारत हाशिल, धर्म,कला,संस्कृति व सभ्यता के भक्त लोक में भी परलोक का एहसास कराने का नाम है आदिवासी।

राजा-रानी, भूतों-प्रेतों, जादू-टोनों से भरी कहानियों, दन्त कथाओं,आख्यायिकाओं, लोक कलाओं, लोक संस्कृतियों से परिपूर्ण साहित्य रूपी रत्नों के अक्षय पात्र का नाम है आदिवासी।

भोगवादी जीवन से दूर, गणित, खगोल,तर्क,आयुर्वेद के ज्ञान से भरपूर नृत्य, संगीत, पशुपालन, दुग्धउत्पादन, बागवानी में दक्ष श्रम, ईमानदारी, बहादुरी, जिम्मेदारी का नाम है आदिवासी।

लघुउद्योग, कुटीर उद्योग, लोहे, सोने,चांदी
अनेक धातुओं हथियारों का खोजी (शोधक)
खाँची,मचिया,भउकी,सनई, खटिया,लउर लाखों शब्दों से भरे साहित्य के श्रृंगार का नाम है आदिवासी।

गोण्ड, खरवार,पनिका,पहरिया,
भुइयाँ, धसिया, धांगर, अगरिया,
कोरवा, कोल,सहरिया,पठारी,बैगा,
थारू, बुक्सा दर्जनों आर्य जातियों में
राजा महाराजा होने का नाम है आदिवासी।

जन-जन के पोषण का, राजनेताओं द्वारा शोषण का, राजनैतिक वर्चस्व को ज़िंदा रखने के लिए, वोट बैंक व नेताओं की खुराक का नाम है आदिवासी !

11.
विडंबना'

झिल्लीदार मांशल दीवारों के बीच
झांकती एक नन्हीं सी कली,
अपने नव जीवन के कटु यथार्थ को             समझने हेतु!

अपने अधिकारों को पाने को लालायित निश्चल मनःस्थिति से!                         
करना चाहती है अपने विचारों को प्रेषित
समाज के बीच!

दानवीय कुविचारों को उखाड़ फेंकने को
तत्पर नवस्फूर्ति नव चेतना से भरी
एक जाज्वल्यमान पुंज की भांति!

अपनी जिज्ञासाओं के घरौदे से
बाहर आने को उतावली, 
किंतु ! उसकी विह्वलता,निश्छलता व भाव-कोमलता को
दबा दी जाती है,
एक नुकीली धार के बीच!

हल्के धक्के में ही सिमट जाती है
अतीत की यादें!
अन्तिम स्वसों के बीच,
पथरीली आँखों में
सब चूर हो जाता है क्षण भर में!

हाय ! यह विडंबना है
समाज की ?
छटपटाती है वह नन्ही सी कालिका
झिल्लीदार मांशल दीवारों के बीच!

अनायास ही गूँजती है एक लघु आवाज,
विराट चेतना के रूप में
कोशती है; मानवीय, सामाजिक विडंबना को मनुष्य की नृशंसतापूर्वक बर्बरता व कामुकता को यथार्थवाद के धरातल पर !
कुछ भी व्यक्त नही कर पाती अपने विचारों से,
किन्तु विवश कर देती है !
मानव को सोचने हेतु ?
इस विडंबना के जर्जर मकानों के बीच !
                            

12.
"गांव का पोखऱा"

जहाँ सीखा था तैरना
भईया व दीदी के साथ, छुटपन में
अथाह पोखरे के बीच!
 
थाह को नापते चुलबुली हरक़तों में
अलमस्त गांव के हमउम्र साथियों के मध्य घिरा
मुर्गा-मुर्गी के खेलों में मस्त

अहो! कितना सुखमय था
बीच पोखरे में लाठी का छूना व
एक दूसरे की टाँगों को खींचने का मज़ा
पानी के अंदर ही अंदर

इस पार से उस पार तक चले जाना
पानी से लड़ते, टकराते, तैरते, व सनकते
जल्दी पार होने की जुगत मे!

वे आम के पेड़, बेल की मोटी शाखाएं,
जामुन की गंध और नीम के कड़वापन का सच
बेल की खट्टी मिट्ठी यादों से गुज़रते
कैत के कसैलेपन का बोध लिए,

पेड़ों की मोटी पतली शाखाओं से
निर्भीकता पूर्वक छलांग का लगाना!
अंदर ही अंदर काफी दूर तक चले जाना

साक्षी है ! आज पोखरे का सात सीढयों सहित एक आँगन नुमा घाट और शिव का मंदिर!
जिसे बनवाया था टेंगरी बाबा ने अपने परधानी के दौर में!

हाय! सबकुछ पीछे छूट गया है
बोध होता है! इस नश्वर शरीर का
आज रिरियाता पोखऱा बुलाता है लौट आने को बचपन के गांव में!

निहारता अपलक उसकी दरारें पड़ी सूखे तल को,
ख़ोजता किनारों को जहाँ हुवा करते थे
घने छायादार हरे-भरे पेड़ व उनकी बेपरवाह धुँधली तश्वीरों को!

उन पुर्वजों के लगाए कैत,जामुन,बेल,नीम
व आम का गुम होना!
भाउक हो उठता है अपना अन्तर्मन
पुरानी स्मृत्तियों को याद कर!

लुढ़क जाती है आँखों से दो बूँद!
उस तालाब को अभिसिंचित कर
मैं पुनः खो जाता हूँ अतीत में

13.
(क)' बाढ़'
इस भयंकर बाढ़ में
खो गया मेरा सबकुछ!
खो गया वो भी
जिसे कंधों पर बैठाकर खिलखिलाता था
उसकी नन्हीं उंगलियों को थामे
मेरे हर पीड़ा की दवा थी
उसकी तोतली बोलियाँ
ओह! आज कंधे भी रो रहे दहाड़े मार!
कि उसे कंधा न दे सका !
मेरा खो गया सबकुछ
इस भयंकर बाढ़ में!

(ख)  'जरूरी है'

ज़िंदा रहने के लिए जरूरी है थोड़ी सी धूप, थोड़ा पानी और थोड़ी सी आग
सुहानी हवाओं का एक थपेड़ा
व खुले आसमां की एक छत
नन्हे मुन्ने बच्चों का साथ
जिनकी तोतली बोलियों के बीच
उनकी उंगलियाँ थामे
आप बचा सकते हैं पूरी सृष्टि को!
रहेगी सृष्टि तभी तो बचेंगे आप,
आपका बचना ही
सृष्टि को बचाए रखना है
वो प्यारे दोस्तों!

14.
बापू तुमको आना होगा'
 
बापू तुमको आना होगा,
बापू तुमको आना होगा।
सत्य अहिंसा की ज्योतिर्मय
पावन जयोति जलाना होगा।
                बापू तुमको आना होगा।
घोर गरीबी अनाचार है
रिश्वतखोरी का है राज,
भटक गयी है सत्य अहिंसा
परिवर्तित है आज समाज,
चहुँदिशि भय आतंकवाद है
राजनीति का ताना बाना,
सुप्त पड़ी है युवा चेतना
देशभक्ति का गीत तराना,
तघुपति राघव राम और
चरखे की गूँज सुनाना होगा।

बापू तुमको आना होगा
बापू तुमको आना होगा।

धधक रही है आहुतियों में
जातिवाद और नारी
नून भात व प्याज मसाला
महंगी है तरकारी
सहम गयी है सारी जनता
भ्रष्टाचार पतन से
कृषक हुवा असहाय
बढ़ी महंगाई के परचम से
इस मंजर को चोट करारी देकर
पुनः हटाना होगा।
 
बापू तुमको आना होगा
बापू तुमको आना होगा।
सत्य अहिंसा की ज्योतिर्मय
पवन ज्योति जलाना होगा।

15.
'अन्ना का संदेश'
मांग उठी फिर आहुतियों की
भारत माँ कुर्बानी,
उठो क्रान्ति का बिगुल बजा दो
हम हैं हिंदुस्तानी ।
अत्याचारी गोरों ने जब
हम पर अत्याचार किया था,
वीर भगत, आज़ाद, गांधी ने
उन पर गहरा वार किया था।
वंदेमातरम हुँकारों से
गूँज उठा था सारा देश,
मार भगाओ इन गोरों को
था सबका अपनाया सन्देश।
हुई संगठन की शक्ति से
गोरों को तब हैरानी
           उठो क्रान्ति...........।
सत्तर के दशक में क्रांति की
चिंगारी भड़की थी,
जयप्रकाश की आवाज़ें तब
धरती पर तड़की थी,
संपूर्ण क्रांति की अलख जगी थी
वंदे मातरम नारा,
भ्रष्ट नही सरकार हमें
दे दो अधिकार हमारा,
जन-जन में विश्वास भरा था
होगी विजय हमारी,
तानाशाह सरकार झुकी
तब थी उसकी लाचारी,
नहीं चलेगी राजतंत्र में
भ्रष्टाचार मनमानी,
         उठो क्रान्ति का........।
आज त्रस्त जनता अपने
नेता के भ्रष्टाचारों से,
लूट, छिनैती, मंहगाई व
बड़े-बड़े घोटालों से,
अब कठपुतली बन नेताओं की
जनता नहीं चलेगी,
सरकारी गुंडों के आगे
पब्लिक नहीं झुकेगी
गांधी, जयप्रकाश की आवाज़
अब अन्ना में पुनः उठी है,
संसद में जन लोकपाल बिल
लाने की मांग उठी है,
दे दो तुम अधिकार हमारा
या हम दे दें कुर्बानी।
            उठो क्रान्ति का...........।
अब ललकार उठा है अन्ना
भ्रष्टाचार मिटाने को,
स्विस बैंक के काले धन को
हिंदुस्तान में लाने को,
वंदेमातरम गीत, गीत से
लहराते हाथों से हाथ,
सुखद और समृद्धि राष्ट्र हो
अन्ना हम हैं तेरे साथ,
आज तुली सरकार क्रान्ति को
फिर इतिहास बनाने को,
बिगुल बज गया युवाओं का
भ्रष्टाचार मिटाने को,
नहीं रूकेंगे नहीं झुकेंगे
हम हैं हिंदुस्तानी।
        उठो क्रान्ति का बिगुल बजा दो
        हम हैं हिंदुस्तानी।

16.
"ये शहर बनारस मेरा है"
ये शहर बनारस मेरा है
ये शहर बनारस मेरा है
टन-टन घंटों की नाद यहां
निर्मल गंगा का वास यहां,
साहित्य रत्न से भरा पड़ा
गुरु ज्ञान मंत्र का घेरा है
          ये शहर बनारस मेरा है।
मंदिर,मठ, दानी हैं अनंत 
हर गली गली व्यापारी हैं,
पढ़ लिख कर निकले युवा 
यहां के बड़े-बड़े अधिकारी हैं
हर गली घाट चौराहों पर
जहाँ राजनीति का डेरा है
          ये शहर बनारस मेरा है।
हर हर, बम बम, के जयकारे
घण्टों की नाद झनकती है
त्यागी भागीरथ के तप की
शिव गंगा जहाँ किलकती है
सुबहे पूजा अलमस्त कर्म
जहाँ शाम आरती फेरा है
         ये शहर बनारस मेरा है।
शिव तांडव होती रात रात
बिगड़ी भी बनती बात जहाँ
चहुँ दिशि मंदिर घाट दिखे
ज्ञानी संतों का मेल यहाँ
दिन में तो दिनकर का प्रकाश
रातों में जहाँ सवेरा है
          ये शहर बनारस मेरा है।
डाल गले में हाँथ यार के
घाटों पर ले मज़ा प्यार के
सुबह कचौड़ी तरी जलेबी
शाम गंगा नौका-विहार के
फंसे सड़क के जाम झाम में 
कैसा आफ़त घेरा है।
          ये शहर बनारस मेरा है।
पाप यहाँ तो हर जन-जन के
छू मंतर हो जाते हैं
पूजा-पाठ, स्नान, दान से
सब जन धर्म कमाते हैं
तन-मन में रची बसी काशी
शिव सबका तेरा मेरा है।
           ये शहर बनारस मेरा है।

17.
मैं वसन्त हूँ'
मैं उपवन का सरस गंध हूँ
मैं वसन्त हूँ, मैं वसन्त हूँ।

मैं उमंग का संवाहक हूँ,
मैं ही हूँ पूर्णिमा का चाँद।
मैं निर्झर झरनों से झरते,
निर्मल जल की हूँ आवाज़।
 
मैं फूलों का उपवन हूँ,
धरती की हरियाली हूँ।
मैं वसुधा के प्रिय पुत्रों के,
तन, मन की खुशियाली हूँ।

मैं चम्पा की सरस गंध हूँ,
मैं सूरज की नवल किरण।
मैं फूलों की पंखुड़ियाँ हूँ,
मैं भ्रमरों का हूँ गुंजन।

मैं हूँ गीतों में सुमधुर लय,
मलयागिरि का मैं चंदन हूँ।
मैं सपनों की मधुर मनोहर,
मैं जन गण का वंदन हूँ।

मधुमय रस बरसाता सबमे,
फूलों की क्यारी का घर हूँ।
धरती के सुंदर आँचल में,
मैं मयूर का सुंदर पर हूँ।

मधुर-मधुर गति सी बहती मैं,
गंगा के गति सी स्वतंत्र हूँ।
गमन और आगमन पुनः कर,
मैं अबोध गति सी स्वतंत्र हूँ।

मैं तो मानसरोवर के नव,
स्वर्ण कमल का राजहंस हूँ।
मैं तो धरती के आँचल का,
नन्हा सा एक राह 'पथिक' हूँ।

मुझे याद कर लेना पलभर,
लेकर आँचल में भर लेना।
कोमल सुखमय इन अधरों पर,
मधुमय सा चुम्बन दे देना।

मैं ब्रह्मा की श्री वाणी से,
गायत्री का वेद मंत्र हूँ।
मैं जीवन का विरह अंत हूँ,
मैं वसन्त हूँ, मैं वसन्त हूँ।
©मनकामना शुक्ल 'पथिक'

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©सर्वाधिकार सुरक्षित;
   मनकामना शुक्ल 'पथिक'  
     युवा कवि आलोचक,                       
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