Tuesday, 15 September 2020

कविता संग्रह : "कोरोजीवी कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ" (©corojivi kavita)

 

१.

शबरी //

गुरुभक्ति से प्रसन्न हो

महर्षि मतंग दिए हैं वरदान

प्रभु की दर्शन हो गई


हे अनुज लक्ष्मण!

शबरी की जूठी बेर विशेष वात्सल्य है 

खाओ ख़ुशी से


यह हमारा सौभाग्य है

कि हमें माता शबरी का ममत्व और मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है

इस निर्जन वन में


हे कौशल्यानंदन! 

करुणासिंधु तीनों लोक के स्वामी

मुझे मुक्ति दीजिए


सत्य की पहचान

नवधाभक्ति का ज्ञान दे रहे हैं भगवान

(श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन)


आनंदित हैं आश्रम की कूची

शबरी का सब्र दे रहा है सीख

उपेक्षितों उम्मीद मत छोड़ना!

(©गोलेन्द्र पटेल

२७-०८-२०२०)



२.

"जोंक"
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रोपनी जब करते हैं कर्षित किसान ;
तब रक्त चूसते हैं जोंक!

चूहे फसल नहीं चरते
फसल चरते हैं

साँड और नीलगाय.....
चूहे तो बस संग्रह करते हैं
गहरे गोदामीय बिल में!

टिड्डे पत्तियों के साथ
पुरुषार्थ को चाट जाते हैं

आपस में युद्ध कर
काले कौए मक्का बाजरा बांट खाते हैं!

प्यासी धूप
पसीना पीती है खेत में
जोंक की भाँति!

अंत में अक्सर ही
कर्ज के कच्चे खट्टे कायफल दिख जाते हैं
सिवान के हरे पेड़ पर लटके हुए!

इसे ही कभी कभी ढोता है एक किसान
सड़क से संसद तक की अपनी उड़ान में!
(रचना : ०८-०७-२०२०)




३.

तड़प 

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देखो!
इस अंधेरे में
चमगादड़ लौट रहे हैं
अपने नयन से अपने नीड़
और उनके हमसफ़र उल्लू भी!

अन्य पंक्षी
दिन के पथिक कैसे पहुँचेंगे अपने घोसला???

पूछ रही बहेलिया की बेटी
प्रसव-पीड़ा से लेटी
संसद के पथरीली पथ पर पिता से।...

बापू
क्या मेरा पुत्र पहुँच पायेगा घर???

इसे अभी धरती पर आये
कुछ ही क्षण हुए हैं
मेरे पेट में चार दिन से चूहे दौड़ रहे हैं

सूख चुकी है छाती
चाम चिचोर रहा है मेरा बच्चा।

चमचमाती धूप में आत्मा चौंधिया
सिसक सिसक कर रो रही है
दर्ज़नों दर्द देह में ढो रही है इस महारंक-रूप में

चुपचाप चीख सून रहे हैं नये नेता
नाक पर रुमाल डाल कर
हाय! और क्या कहूँ असहाय
मैं देखता रहा "तड़प"।।
(२५-०५-२०२०)



४.

कविता जनतंत्र के अखाड़े में 

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एक मेंढक टर-टराए

तो दूसरे का टरटराना स्वभाविक क्रिया है

उमस है

तो उम्मीद है बारिश का

भले ही बादल आएं और चले जाएं

खेत से दूर बहुत दूर

बंजर मरूस्थल हृदय के पास।


बेलमुर्गी चीं-चीं चीख रही है

जलकुंभी में छिप कर

एक दिल्ली के आदमी से डर


जो अभी अभी आया है गांव में

खेतिहर के वोट के ख़ातिर

चिड़ियों को चना देने बाकी को दाना

खेतिहरिन को लाई पसंद है

खाना नहीं!


एक कमीना देख रहा है

कूशे में टिटिहरी का अंडा

सुन रहा है हु-टि२-टि३...


गंवईं गवाह हैं

उक्त प्रतिरोध की ध्वनि कानों-कान जायेगी

कचहरी।


कचहरी के दिवारों से टकरा 

लौट आयेगी प्रतिध्वनि कविता के शरण में


कविता बगावत करेगी

बहादूरों से

जनतंत्र के अखाड़े में।

(रचना : १ जुलाई ,२०२०)



५.

सरसराहट संसद तक बिन विश्राम सफ़र करेगी
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तिर्रियाँ पकड़ रही हैं
गाँव की कच्ची उम्र
तितलियों के पीछे दौड़ रही है
पकड़ने की इच्छा
अबोध बच्चियों का!

बच्चें काँचे खेल रहे हैं
सामने वृद्ध नीम के डाल पर बैठी है
मायूसी और मौन 

मादा नीलकंठ बहुत दिन बाद दिखी है
दो रोज़ पहले मैना दिखी थी इसी डाल पर उदास
और इसी डाल पर अक्सर बैठती हैं चुप्पी चिड़ियाँ!

कोयल कूक रही है
शांत पत्तियाँ सुन रही हैं
सुबह का सरसराहट व शाम का चहचहाहट चीख हैं
क्रमशः हवा और पाखी का

चहचहाहट चार कोस तक जाएगी
फिर टकराएगी चट्टानों और पर्वतों से
फिर जाएगी ; चौराहों पर कुछ क्षण रुक
चलती चली जाएगी सड़क धर
सरसराहट संसद तक बिन विश्राम किए!
(रचना : ०७-०८-२०२०)



६.

तिर्रें-तिर्रियों-तितलियों के साथ
बच्चों को खेलते देख ताज़े हो जाते हैं पके उम्र

बचपन की स्मृतियों में खो जाते हैं
बुढवा-बुढिया!

सनई फूली है
नेनुआ-तरोई चढ़ी हैं झोपड़ी पर
बाड़ा हरा है
और पीले चेहरों के ख़ुशी पीले पुष्प खिले हैं!

मक्का-मकई झूम रही हैं
गोहरा ढो रही हैं बहूएं

हल्दी-सूरन सोह रही है दादी
नीम पर चढ़े करैलों के कविताएँ सुना रहा हूँ दादा को!
( रचना : ०९-०८-२०२०)



७.

कविता के लिए

अज्ञेय आकाश से शब्द उठाते हैं

केदारनाथ धूल से

श्रीप्रकाश शुक्ल रेत से 


पहला धूल है या फूल ; 

कह नहीं सकता

ताकना तुम

तर्क के तह में "सत्य" दिखेगा


दूसरा गुलाब है 

गंध आ रही है

नाक में

तीसरा नदी का नाव।



८.

◆रक्षाबंधन◆

एकजुआर रोती रोज़
नून-तेल-ईंधन नहीं
रोटी का पेट से बंधन

चूल्हा ताक रहा है - "भूख"
तवा उदास कड़ाही का दुख
डकची को सुना रहा है

चौका-बेलना बिलख रहे हैं
सून्ठा-सिल सिसक रही हैं
आँखें हरहरा नदी बन बही हैं

गरीब के गालों पर गंगा।

कुएँ का पानी विकल्प है
बच्चों के जीवन के लिए
आज नैहर जाना है - प्राणनाथ स्वर्ग से लौट आओ

बच्चों को नानी के घर
मिलेगा हलवा-पूरी मिठाई
सब उल्लास से उछल रहे हैं

भाईया पहले अपने ससुराल जाएंगे
फिर लौट कर आएंगे शाम को लेने
साँझ हो गई मामा कब आएंगे माँ

उम्मीद वक्त मांगता है बेटी
बस थोड़ा और इंतजार करो सब
मामा आ गए मामा आ गए बड़े मामा आ गए...

मुन्नी कैसी हो?
ठीक हैं
रात हो गई

दीदी रास्ते में गाड़ी खराब हो गई थी
सारे दुकान बंद थें "लॉकडाउन लगा है चारों ओर"
आदमी घर में रहते रहते लंगड़ हो गए हैं

चलो जल्दी करो माई फोन करवा रही है
विधवा बहन विशेष धागों के साथ पहूँची मायके
भौजाई बोली मिठाई नहीं केवल "रक्षाबंधन" है
(रचना : ०१-०८-२०२०)

९.

धूप का रोटियाँ
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हे श्रमिक!
लोकतंत्र के आँगन में
देखा मैंने

श्रम को सोखती

भूखी-प्यासी धूप
पसीना पी-पी परिश्रम से
सेक रही है - "रोटियाँ" ;

लोकसभा व लोकसेवा के मच्छरों के लिए

जो खून चुसते हैं
क्या उनसे उक्त रोटियाँ पचेगी
उनके अंतिम समय में।
(रचना : २९-०७-२०२०)



१०.

मेंढ़क के टर-टर में कजरी व कविता 

मेंढकएँ टर-टर के भाषा में कहते हैं
लड़ो नहीं
लोकतंत्र आ नहीं सकता
तुम्हारे पगडंडियों पर पैदल
लंगड़ है।

नहर-नाली टूट-फूट-पट चुकी हैं
सूखे हैं सारे सरोवर
ट्यूबवेलों को जले हुए कई साल हो गए
जहाँ मायूस मेंढ़क टर-टर करता था एक कविता
दोहराता था कजरी
जिसे सुनने जाता था रात में कुआँ के पास
उछल-उछल कूद-कूद फुदक-फुदक....

यदि तुम आशिक हो तो और भी सुनो
जब जुगनूँ जगत पर चमकते थे चमचम चमचम
तब हवा को किशोरियों का होठ चुमते देखा था
फेफड़ा उस वक्त चुम रहा था हवा को

आज हवा में विरहाग्नि अधिक है
इसके बाह्य स्पर्श से जले रहे हैं देह
अंतः से हृदय ; हरेक आशिकों का

कर्ज़ से लदे कृषक कहते हैं मेंढ़क से
प्रेम-म्रेम छोड़ो ; बादल को बुलाओ
बादल तुम्हारे टर-टर में त्राहि-त्राहि सुनते हैं
हमारे कराह नहीं ,आंतरिक आह नहीं....
(रचना : १९-०७-२०२०)



११.

मुसहर मित्र के घर
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लाल के लिए
मुसहरिन माता के मटके में पक रहा है
तोमड़ी का लाल तण्डुल
जिसे कृषक झरनहवाँ धान कहते हैं।

लाल मेरा मुसहर मित्र है
अभी अभी लौट कर आया है भूख के भयंकर जंगलों से
जहाँ जाने पर पेट के भीतर जम जाते हैं बबूल के पेड़
उड़ने लगते हैं रेगिस्तानी पंक्षी।

लाल के पिता चूहे भून रहे हैं
उसके चाचा चार गोहटों के तेल नीकाल रहे हैं
उसकी चाची घोंघे ताल रही हैं
ड्योढ़ी पर बैठी दादी दौरी बीन रही है
छोटे छोटे बच्चे चेहरे पर नाक-पोटा चिपोरे
चूल्हे की ओर ताक रहे हैं

मैं उसके दादा के स्मृतियों में ढुँढ रहा हूँ
समय के लिए उलाहना
तिरपाल के नीचे नाली का गंध
क्यों...???
(रचना : २७-०७-२०२०)



१२.

1.
जब आकाश से गिरते हैं
पूर्वजों के संचित आँसू
तब खेतिहर करते हैं मजबूत
अपनी मेंड़

मेड़ तो मजबूत हुई नहीं
पर फरसी-फरसा लाठी-लाठा झोटी-झोटा मारी-मारा उठा-पटक....
अंत में थाने!

2.
रोपनी के समय
रोटी के लिए
संडा जब कबारते हैं मजदूर
तब रक्त चूसती हैं - "जोंक"

दोहरे दोहित दलित दुबली पतली देह
विश्राम जब करती हैं बिस्तरे पर
तब शेष शोणित - "खटमल"

३.
मेंड़ पर सोए शिशु को च्यूँटे काट रहे हैं
चीख सुन रहे हैं मालिक मौन
मजदूरनी माँ कहती है शांत रह लल्ला
अभी एक पैड़ा और बचा है
रोप लेने दे

बच्चे के पास पहुंचा तो देखा
एक दोडहा व दो बिच्छूएँ
एक केकड़ा थोड़ा दूर

पैर में काट लिया है बर्र
घिंनाते-घिंनाते उसे उठाया
वह अपने मल-मूत्र से तरबतर था

तुरंत बर्रों के मंत्रों का पाठ किया
फिर अपनी चाची को बुलाया -
बिच्छू झाड़ीफूकी
चमरौटी से बुलाया बुढउ दादा को -
जो दोडहा झाड़ेफूके

बिच्छू-दोडहा तो तसल्ली के लिए झाड़ा गया
गाँव में सभी को पता है कि कुछ मंत्र जानता हूँ मैं
(बर्र-भभतुआ-थनइल-नज़र-रेघनी...)
सीखा तो बिच्छू-साँप का भी था
पर उसे तभी भूल गया जब विज्ञान का विद्यार्थी था
जो स्मृतियों में जीवित हैं उसे भी भूल गया
ऐसा कहता हूँ मैं।

मंत्रों से आँखें कचकचाएँ
होठों की हँसी हृदय में हर्ष से हहराएँ
फूंकने पर केश लहराएँ
कर्षित कली का मेंड़ पर

आज मुझे लग रहा है मंत्र सीखना सार्थक रहा
हे समय!
(रचना : ०५-०७-२०२०)



१३.

अंधेरे में रोशनी रोपना 

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नहीं रोपना चाहती
नई पीढ़ी
धान का संडा
छोटे हो रहे खेत में!

बंजर सिर्फ आँसुओं से नहीं
रक्त से सिंचा है 
जिसे कुदाल-फावड़ा से नहीं
कर्ज़ के कर से कोड़ा है
कर्षित किसान!

हम तैयार हैं
अंधेरे में रोशनी रोपने के लिए

उर्वर उम्मीद को उगाता है
कवि शब्द को उठाता है
सड़क से ; और पहुँचाता है संसद भवन!

वृक्ष पर लटकते लोकतंत्र को देख
प्रायः प्रातः पंक्षी चहचहाना छोड़ देते हैं
पर "कविता" नहीं!
(रचना : ०४-०७-२०२०)



१४.

दुःख-दर्द के दर्पण में संवेदना का प्रतिबिंब हूँ
जो कहता कविता का कर्षित कवित्व बिंब हूँ
भुवन में भावनाओं का भूखा कवि वही हूँ मैं
काव्यशाला में कुछ विशेष बात का बही हूँ मैं

साहित्यिक तर्पण के लिए दहीकौर कहीं हूँ
खुली आँखों में खुला आकाश और मही हूँ
प्रातः पूज्य काव्यपरंपरा गाने वाला छही  हूँ मैं
पद्य को गद्य के करीब पहुँचाने वाला नहीं हूँ मैं

कृति कहे आज कवि नहीं कवयित्री की आत्मा हूँ
दया करुणा प्रेम गीत गुलाब गंध की परमात्मा हूँ
बौद्धों के निर्वाण जैनों के कैवल्य की काव्यात्मा हूँ मैं
शब्दों के समुच्चयों में सृष्टि के सत्य की धर्मात्मा हूँ मैं

प्रत्येक प्यासे व्यक्ति के लिए निर्मल सितल सरिता हूँ
काव्याचार्य! काम-क्रोध-मद-मोह से मुक्त कविता हूँ
पुरुषों को पुरुषार्थ पथ पर भेजनेवाला पथप्रदर्शक हूँ मैं
समकालीनता में श्रेष्ठ साहित्यिक दिव्यदृष्टि का दर्शक हूँ मैं
(रचना : ०४-०१-२०२०)
【"कविता का कर्षित कृषक पूत्र हूँ" से】


१५.

लक्ष्य के पथ जाना है

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लक्ष्य के पथ जाना है

आँधी आये दीप बुझे ;

फिर भी रुक नहीं सकता

मणि है साथ जो!

आगे बढ़ चला 

साहित्य के घर चला!

आदित्य की तरह जला

काव्य-परिसर में आ जो पला!



१६.

काव्य-खेत का खेतीहर हूँ

धान गेहूँ  बाजरा  रहर  हूँ

पूज्य पूर्वजों का वंशजचंद्र हूँ मैं

हिंदी कविता का हरिशचंद्र हूँ मैं


सरसों तीसी चना मटर हूँ 

ककरी केराव मसूर टमाटर हूँ

नेनुआ केदुआ चढ़ानेवाला घर हूँ मैं

महाकृति का मधुर स्वर हूँ मैं


मीर्च लेहसुन प्याज चुकंदर हूँ

चौराई पालक धनिया क्षर हूँ

आदेश्वर कवि का अक्षर हूँ मैं

आदि   से   ही   अमर   हूँ  मैं


आलू गोभी मूली गाजर हूँ

तरबूज़ खीरा बेल कटहर हूँ

आम अमरुद बेर का पेड़ हूँ मैं

पके ताड़ खजुर का पेड़ हूँ मैं


कौमुदी कमल गुलाब गुड़हल हूँ

खाड़ गुड़ चीनी  मिश्रित कल हूँ

दिव्य सरिता निर्मल शीतल हूँ मैं

साहित्य का सोमरस  जल हूँ मैं

   【"कविता का कर्षित कृषक पूत्र हूँ" से】



१७.

दिल से  दिल का  दीपक जला  रहा  हूँ ।

युवा संदेश साध हाथ हल चला रहा हूँ ।

सृष्टि संकेत शोषितों का सूत्र हूँ मैं

कविता के खेत का कृषक पुत्र  हूँ मैँ।


करुणा से उपजा साहित्य का सागर हूं।

महामना मानवता का पुण्य एक घर हूं।

कविता व संगीत के परिवार का सदस्य हूँ मैं।

सार्थक शब्द समुच्चय की उठती हुई लय हूँ मैं।


गन्ना-धान के पत्तों पर पड़ी ओस मणि हूँ ।

गौ  गाँव गंगा व गुरु से खड़ा जोश  हूँ ।

आज एक  आँसू का जन कवि बना हूँ मैं।

जगत जीव दर्द की संवेदना हूँ मैं।


साहित्यकार से पहले विद्यार्थी हूँ 

समय और समाज का सारथी हूँ 

मनुष्य के मुक्ति का अभिव्यक्ति हूँ मैं।

शिष्याचार्य परम्परा की शक्ति हूँ मैं।


ऊपर सदैव उठने वाला उमंग हूँ 

जीवन के जगमग  समुद्र की तरंग हूँ

कवियों के प्रयोगशाला का अंग हूँ मैं।

काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल के संग हूँ मैं।


हवनकुण्ड का ह्रस्व स्वर मंत्र हूँ 

भविष्य हविष्य हृदय का लोकतंत्र हूँ 

कालजयी काव्यकला का तंत्र हूँ मैं।

कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ मैं।

 【"कविता का कर्षित कृषक पूत्र हूँ" से】



१८.

लोहारिन का लक्ष्य//

सिर के सिस्टम में छुपे
जूँ काट रहे हैं

माथे से टपटप टपटप चू रहा परिश्रम
चिंगारी पैरों पर गिर रही है

हाथों के छाले
हथौड़ा चला रहे हैं
लोहारिन के लक्ष्य पर।

पेट की पुकार सुन
सटीक प्रबल प्रहार
बार बार कर रही भूख
एक वक्त के आहार के लिए।

आग बुझ रही है आँसू से
पत्थर तप कर टूट रहा है
लोहा ढल रहा है समय के साँचे में
हलक माँग रहा है पानी -
सूखे कुएँ से।
(रचना : ०९-०८-२०२०)



१९.

कोहारिन काकी की कला

लटक रहा है
मानस के सिकहर पर
मक्खन से भरा
मथुरा का मार्मिक मटका

इस पर उत्कीर्ण है
कोहारिन काकी की कला।

गंध सूँघ रहा है बम-बिलार
बिल्ली थक कर बैठी है नीचे

मक्खियाँ भिनभिना रही हैं
चूहे चढ़ कर चाट रहे हैं मक्खन

अंततः बम-बिलार फोड़ दिया घर का घड़ा।

पूर्वजों ने ठीक ही कहा है
कला का महत्व मनुष्य जानते हैं
जानवर नहीं।

जानवर तो अपना ही जोतते रहते हैं

काकी ठीक कहती हैं
भूख कला को जन्म देती है।

कुछ भी हो
बम-बिलार बलवान के साथ साथ चतुर भी है
क्योंकि वह मक्खन और चूहे को एकसाथ खा रहा है।
(रचना : ११-०८-२०२०)



२०.

मूर्तिकारिन //

राजमंदिरों के महात्माओं
मौन मूर्तिकार की स्त्री हूँ

समय की छेनी-हथौड़ी से
स्वयं को गढ़ रही हूँ

चुप्पी तोड़ रही है चिंगारी!

सूरज को लगा है गरहन
लालटेनों के तेल खत्म हो गए हैं

चारो ओर अंधेरा है
कहर रहे हैं हर शहर

समुद्र की तूफानी हवा आ गई है गाँव
दीये बुझ रहे हैं तेजी से
मणि निगल रहे हैं साँप

और आम चीख चली -
दिल्ली!
(रचना : १२-०८-२०२०)



२१.

हे महर्षि अगस्त्य!

कोरोजीवी केवल काव्य संज्ञा ही नहीं है
बल्कि संकटों के सप्तसागर को सोखने वाला सूत्र भी है

इसे  गढ़ें हैं हमारे काव्यगुरु
समतामूलक साहित्यिक समाज के लिए

जो आम आदमी के आत्मसंघर्ष के आचार्य हैं
एक चिकित्सक की भाँति!

महामारी का नेवाला है मृत्यु
जनता मुँह ताक रही हैं महंगी दवाओं का
सस्ते मंत्र सेहत गिरा रहे हैं - मौन मजदूर

चुप्पियों के गर्भ से जन्मी है कोरोजयी कविता!

सत्ता के विरुद्ध शंखनाद करती कह रही है
                          मैं हूँ
समकालीन शब्दसत्ता की क्रांतिकारी चेतना!

दुनिया का दिल धड़क रहा है
दिख रही हैं दया-करुणा कैद घरों में
और ममत्व-स्नेह सोशल मीडिया पर

सहृदय साँस नहीं ले पा रहे हैं
बच्चों की रोटियाँ छीन  रहे हैं काले कौएं
अभी भी सड़क पी रही हैं राहगीरों के रक्त!

खेतों के हरे फ़सल चर रहे हैं साँड़
नीलगाय हाँक रही हैं खेतिहरिन

रेगिस्तानी जहाज थउस रहे हैं बीच सफ़र में!

बाढ़ आई है चारों ओर
और प्यास से मर रहे हैं पंक्षी
एक चतुर चिड़िया उड़ान भरी है -
दिल्ली की दिशा में

हे महा मुनि!
उसे वहाँ न्याय तो मिला नहीं
अलबत्ता मेरे प्रिय कवि मदन कश्यप हो गए हैं निरीश्वर!

सुभाष राय से लेकर अनिल पाण्डेय  तक
सभी काव्य कृषक सोह रहे हैं कोरोजीवी क्यारी
                  
उम्मीद है
नयी सुबह के लिए उगेगी उचित उत्तम उपज

श्रीप्रकाश शुक्ल के संग साथ सींच रहा हूँ मैं भी
कुएँ से पानी खींच रहा हूँ
मौन!

कोरोजीविता का सूत्र हूँ
कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ मैं!!
(रचना : १४-०८-२०२०)




२२.

चुड़िहारिन //


बूढ़ी पत्तियाँ हर वर्ष 

नयी पत्तियों को अपना जगह देती हैं सहर्ष


आकाश का शासक शिकारी है 

टहनियों पर चुपचाप बैठी हैं चिड़ियाँ


चुड़िहारिन चिल्ला रही है

संसद के सड़क पर -

चुड़ी ले लो....!


चुचकी चूचुक चूस रहा है शिशु

खोपड़ी का खून पी रही हैं जूँ


चमचमाती धूप चमड़ी जला रही है

चौंधियाई आँखें अचकचा रही हैं 


टोकरी में जीवन का बोझ ढो रही है

लोकतंत्र की लोकल लड़की....!


सफ़र अभी शेष है

अँतड़ी में आँधी चल रही है


सूरज ढल रहा है

रात्रि आ रही है 


खटिया का खटमल जाग रहे हैं


विश्राम कहाँ करें कर्षिता -

हे बाज़!


चहक कर पूछ रही हैं चुप्पी चिड़ियाँ

उत्तर दो!!

रचना : १८-०८-२०२०



२३.

गोड़िन //

कुओं की भरकुंडी प्यास रही हैं

चोर खोल ले जा रहे हैं चपाकल
नलकूपों को नगद चाहिए पैसे ;

गोड़िन का गोड़ भारी है
गला सूख रहा है!

निःशुल्क है नदी का पानी

भरसाँय झोंक रही है भूख
आग पी रही हैं आँखें

कउरनी कउर रही है कविता ;

जो दाने ममत्व पाना चाहते हैं
उछल उछल कर जा रहे हैं आँचल में

और जो उचक उचक कर देख रहे हैं माथे पर पसीना
वे गिर रहे हैं कर्ज़ की कड़ाही में

मेरा मक्का मटर भून गया
चना चावल बाकी है!

कोयरी टोला में कोई टेघर गया है
अर्थी का पाथेय -
लाई भून रही हैं

जिसे छिड़कने हैं अंतिम सफ़र में
भूख के विरुद्ध!

सभी दाना भुनाने वाले जा रहे हैं कोयरीटोला
आदमी जवान है
डेढ़ बरस और तीन बरस की बच्चियाँ देह से लिपट कर रो रही हैं
चीख रही हैं चिल्ला रही हैं कह रही हैं उठा पापा जागा पापा.....

उसकी औरत को एक वर्ष पहले ही डँस लिया था साँप
हे देवी-देवताओं!
देहात की देहांत दृश्य देख दिल दहल गया

आह विधवा व्यथा!
गोड़ भी छोड़ गया है गर्भ में प्यार की निशानी
गोड़िन के नयन से निकली है गंगा
प्यासी पथराई उम्मीदों के विरुद्ध!
(©गोलेन्द्र पटेल
रचना : १९-०८-२०२)



२४.

बुनकर की बेटी //

राजा के पास धरोहर है चाभी
हथकरघों के हाथों में लगा है हथकड़ी
हरेक की हेकड़ी
शांत सड़क पर सीधी कर रही है कमर

करहा देना बंद है
कराह गाँव दर गाँव गूँज रही है

दिल्ली देख नहीं पा रही है छवि -
कर्षित-शोषित-दोहित जनता की
इसलिए हृदय के यज्ञ में हवि छोड़ रहा है कवि

रवि रुक कर कह रहा है
लोकतंत्र की लाठी लेना चाहती है बूढ़ी भूख

माँ काट रही है सूत
गाँधी की चरखा चला रही है बेटी
बुनकर पिता बुन रहा है बाधी वाला खाट
बेरोजगार बेटा बेबस खींच रहा है रिक्शा

रिश्ता बड़ी मुश्किल से बड़ी बहन के लिए आया है
कोविड कहर के समय में शहर से

बुनकर की बेटी बहू बनी है
लोहटा के लोकल लक्ष्मी के घर
जो लोरस-जरजेट जैसी तीखी हैं

नरी भरते वक्त अक्सर अँगुलियाँ कट जाती हैं
लोरस जरजेट की धागों से

फिर भी सहोदरी ससुराल में
सिल पर सुबह शाम मसाला पीसती है
और अपने क्रोध को दाँतों तले पीस कर जीवित रखती है उम्मीद

आज नहीं तो कल
पति का प्रेम पेट से बाहर आएगा
बनेगा सेठउरा ससुर ख़ुश हैं अपने पुत्र से

डाट रहे हैं
अपने औरत को
कि बहू से काम धाम मत कराया करो
नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा

पहली बहू फांसी लगाकर जब से मरी है
कितना ताना सहता हूँ समाज का
कारण तो तुम्हें भी पता है

हे प्रिये!
वह तो तुम्हें सौतेली नहीं मानती है
मम्मी कहती है
पाँव दबाती है
तुम्हारी जूठी बर्तन धोती है
और कचारती है प्रतिदिन तुम्हारी साड़ी
फिर तुम सौतेली क्यों???

माँ बनो बहू की
बेटा मानता है तुम्हें सगी माँ!

(©गोलेन्द्र पटेल
रचना : २५-०८-२०२०)



२५.

खटकिन //

बेटी सब्जी बेच रही है
आवारे कुत्ते पड़े हैं पीछे

खटकिन की खोपड़ी पर है
एक  टोकरी
जिसमें है -
जातीय जीवन!

गवईं गर्भवती पूछती
खट्टा खाद्य इमली है?

भूख के बगीचे में
खटिक खुरपी से छील रहा है घास

खुला खर्च खुरच रहा है ख़ास-
घर का घाव!

खड़े हैं
चौराहे पर यमराज दूत -
कोरोनापॉजिटव

प्यासा पुत्र ठेला पर रस पेर रहा है
दूसरों के लिए

बहू बतखों को चारा डाल रही है
मुर्गा-मुर्गी कैद हैं
दरबों में!

सूअर सड़क पर घूम रहे हैं

गंदगी से दूर बैठ
पोते खेल रहे हैं खेल
गोटियाँ उछाल रही हैं पोतियाँ

और कवि अचकचा कर देख रहा है चुपचाप
दर्द-दृश्य-दयनीय दशा!
(©गोलेन्द्र पटेल
२७-०८-२०२०)





 २६.

धोबिन //


दोपहर में दोपाये

तपती पथरीली पथ पर पैदल चल रहे हैं -

घर!


गजब की गति है

गाँव की ओर


लदी है

गदही की पीठ पर गठरी

शहर की!


पोखरी की तट पर है

एक पत्थर

(पटिया)

जिस पर पीट रही है धोबिन

खद्दर की धोती-कुर्ता


मछलियां पी रही हैं शांत पानी में

परिश्रम से टपक रहे पसीने को


रोहू बीच में उछल रही है

पाँव में धर रही है जोंक

और खोपड़ी का खून चूस रही है जूँ


सूर्य सोख रहा है शक्ति

थके श्रमिक निगल रहे हैं थूक


रुक रुक कर

पटक रही है पटिया पर खादी

कर्ज़ की क्रोध!


उसे डर है

कि कहीं फटे न साहब की कपड़ें


साहब छठी की दूध याद दिलाते हैं

पति को

और पति मार मार कर मुझको -

नानी का!


कोरोजीवी कविता सुन रही हूँ जब से

तब से उम्मीद की घोड़ी दौड़ रही है उर में


रेह से वस्त्र समय पर साफ हो या न हो

पर तुम्हारी कविताओं से मन साफ हो रहा है

हे कोरोजयी! हे संत साहित्य संवाहक कवि!

(©गोलेन्द्र पटेल

२८-०८-२०२०)




२७.

चिढ़ //

१.
जनता है
जनतंत्र की जूते की धूल

रेगिस्तानी राह पर रिरियाती
चुप्पियों का चप्पल
चिह्न छोड़ रही हैं

जिसे देख कर
चिरकुटों को है -
चिढ़!

२.
ककड़ी कहीं काट रहे हैं मूस
द्वेष की दही चाट रहे हैं चापलूस

चीड़ की चोटी पर चढ़ी है चिखुरी
चिड़चिड़ाहट चढ़ रही है चिखुरा की चक्षु पर
चिखुरा नेता है!

बबूल पर बैठी बुलबुल गा रही है
प्रकृति का पीड़ा -
नाले बह रहे हैं नदियों में
पत्थरप्लांट चीर रहे हैं पर्वतों का सीना
किसानों में बढ़ रहा है कर्ज़ रूपी कैंसर
शोषक-सेवी सम्पन्न हो रहे हैं दिन प्रतिदिन
जीव-जंतुओं की जीवित इच्छाएँ डूब रही हैं
महामारी के बाढ़ में

भूख लटक रही है युकेलिप्टस पर
पगडंडियों पर गिर रही हैं गौरैया
चित्र चिंता चोट कह रही हैं अब चिता तैयार कर
गिद्ध नोच रहे हैं गाँव का गाल
गरुड़ बन गए हैं बाज़
बुलबुलें हैं बेहाल

घोंसला को है घृणा
साँप से
और कोयल के कूक से
कौओं को है -
चिढ़!

गीत सुनने वाला वृद्ध वृक्ष क्या करे???
(©गोलेन्द्र पटेल
२९-०८-२०२०)



२८.

नदी बीच मछुआरिन //


जलदेवी की तपस्या से

मछुआरे को मिल गया है मोक्ष

नदी बीच स्थिर है नाव

मछुआरिन फेंकती है जब जाल

तब केकड़े काट देते हैं


मछलियाँ कहती हैं

माता मुझे अभी मुक्ति नहीं चाहिए-

नदी से!

(©गोलेन्द्र पटेल

०१-०९-२०२०)



२९.

नट की नायिका //

नट की रात
आँधी-पानी , जाड़ा-गर्मी-बरसात
हर मौसम की प्रभात
शाम तक सीमित सपने ले
संघर्ष की संसदीय सड़क पर चलते हैं

न ठहराव न ठिकाना
न ही रुकने की कोई स्थायी स्थान
अपने ही धुन में मस्त हैं
व्यस्त हैं

राजनीति की रस्सियों पर
नृत्य करती होंठों की हँसी
हिमालय से आती हेमंती हवाओं से
हर हाल में जीने की कला सीख लेती हैं

महरूम मुरझायी मायूसी मौन मुस्कुराहटें
झकझोर देती हैं
सहानुभूतियों के सच को

गहरी सांवली देह पर
रंग-बिरंगी फटी फ्राक और सलवार
सवाल है सरकार

कुछ लड़कियाँ लकड़ियाँ बिनती हैं
पर इसके लघु हाथों में लोकतंत्र की लम्बी लाठी है
जिसे कहते हैं भूख को हाँकने वाली पैना

कमर कसी है
करतब को साध लेने की उम्मीद

थाली में दो कौर
जुटाने की मशक्कत और जद्दोजेहद
जीवन को जुनून देती हैं

नामर्द नायक नाहक ही पिट रहे हैं विकास का ढोल
बजनिया , ब्रजवासी बाज़ीगर की नायिका
नाराज़ है नटराज
श्मशान से क्यों लौटती हैं अधजली लाशें
नटिन की आत्मा पूछ रही है
हे संविधान संरक्षक!
(©गोलेन्द्र पटेल
०२-०९-२०२०)



३०.

हिरण्यकश्यपीय राजनीति का वध //

सन्नाटा है संसदीय सड़क पर
साँड़ हग रहा है थाने के सामने
फ़ैक्टरियाँ मूत रही हैं नदियों में
और दिल्ली दीया जलवा रही है जनता से

थाली की चीख ठहरी है कानों में
मंदिरों में कैद , मूर्तियाँ भूखी हैं
कुछ मुँह पी रहे हैं मेरे हिस्से का माँड़
और मीडिया मुझे देख कर मुस्कुराता है-
मौन!

संवेदनशील धेनु की खुर बढ गए हैं
नाउन नाउम्मीदी का निर्जीव नाख़ून काटो

भूखाग्नि दहकती है जब पेट में
तब बच्चे नहीं पूछते दूध किसने दुहा है
और प्यास घुसेड़ती है जब कंठ में कंकड़
तब कौए भी नहीं पूछते घड़े में पानी कम क्यों है

संकट के सफ़र में नवजात शिशु
सूखे शरीर से चिपक कर चिचोड़ता है जब चूचुक
तब माँ की आत्मा पूछती है-
कौन?

देवता है दिल्ली में

हिरण्यकश्यपीय राजनीति का वध करना है
नृसिंहनी को चाहिए नाख़ून
नारियाँ कर रही हैं प्रार्थना
हे नाउन! उम्मीद का नाख़ून मत काटो।।
(©गोलेन्द्र पटेल
२०-५-२०२०)




३१.

मेरे मुल्क की मीडिया //

बिच्छू के बिल में
नेवला और सर्प की सलाह पर
चूहों के केस की सुनवाई कर रहे हैं-
गोहटा!

गिरगिट और गोजर सभा के सम्मानित सदस्य हैं
काने कुत्ते अंगरक्षक हैं
बहरी बिल्लियाँ बिल के बाहर बंदूक लेकर खड़ी हैं

टिड्डे पिला रहे हैं चाय-पानी

गुप्तचर कौएं कुछ कह रहे हैं
साँड़ समर्थन में सिर हिला रहे हैं
नीलगाय नृत्य कर रही हैं

छिपकलियाँ सुन रही हैं संवाद-
सेनापति सर्प की
मंत्री नेवला की
राजा गोहटा की....

अंत में केंचुआ किसान को देता है श्रधांजलि
खेत में

और मुर्गा मौन हो जाता है
जिसे प्रजातंत्र कहता है मेरा प्यारा पुत्र
मेरे मुल्क की मीडिया!
(©गोलेन्द्र पटेल
०४-०९-२०२०)




३२.

सत्ता खोना नहीं चाहता बाज़
चुप्पी चिड़िया चुनाव चिह्न है
कौआ काँव-काँव चिल्लाता है
चील्होर-चील को चाहिए आकाशीय ताज़

गिद्ध गगन में गऊगोश्त बटवाता है
पी कर मदिरा प्रजा पंक्षी प्रसन्न हैं

विजेता गरुड़ के सभा में
मोरनी नृत्य करती है
गौरैया गज़ल गाती है
बुलबुल गीत सुनाती है
कोइलीया कविता पढ़ती है
कचकचीया कथा कहती है
टिटिहरी तुरही बजाती है
हुऽ टि टी टी३............!

हारा हुआ हंस हर्षित है
बगल में बैठा बकुला व्यंग्यकार है

और सभा में उपस्थित
उल्लू उपन्यासकार है
चमगादड़ चित्रकार है
नीलकंठ नाटककार है
कबूतर कथाकार है
शुतुरमुर्ग संगीतकार है
सुग्गा संस्मरणकार है
पनडुब्बी प्रशस्तिकार है
(प्रथम महिला प्रशस्तिकार)

आकाश में शब्दसत्ता का सुशासन स्थापित हुआ है
गरुड़ से विष्णु जी क्षीरसागर में सोते वक्त कहे हैं
वत्स तुम तब तक राज करोगे
जब तक तुम्हारे सभा में साहित्यकार रहेंगे

तमसा के कल कल में क्रौंची का करुण कलरव है
प्रजा परंपरा की प्रातःकाल में सुनती आ रही है
महाराजाकाशाधिराज कुछ बोलते ही हैं कि
 का सेवा स्वर टूट जाता है
शोषित सिरोईल को अपने अंडे की चिंता होती है
(©गोलेन्द्र पटेल
०५-०९-२०१९)



३३.


गुलेल है

गाँव का गांडीव

चीख है

शब्दभेदी गोली


लक्ष्य है

दूर दिल्ली के वृक्ष पर!


बाण पकड़ लेता है बाज़

पर विषबोली नहीं


गुरु

गरुड़ भी मरेंगे 

देख लेना

एक दिन

राजनीति के रक्त से बुझेगी 

ग्रामीण गांडीव की प्यास!

©गोलेन्द्र पटेल

रचना : 2019



३४.

नदी में नाव का निर्वाण //

मुक्ति के मार्ग में
सच को छुपाना झूठ से बड़ा पाप है

झूठ के रंग
रक्तिम रश्मियों के संग
सच के सरोवर में
सुबह से शाम तक तैरते हैं

इस पार
नाव में बैठी हैं इच्छाएँ

उम्मीदें उमंग के तरंग पर पैदल चलती हैं
पाँव में पतवार बाँध
उस पार!
(©गोलेन्द्र पटेल
१०-०९-२०१९)




३५.

कवि कोविड और काशी //
(©गोलेन्द्र पटेल)

कोरेंटाइन कथा की भाँति कवि की कविता मूक नहीं है

देखो बदल रही है सृष्टि
दर्द दृश्य दुह रहे हैं दृष्टि
कालजयी काशी कुहुक रही है 

मंदिरों में मास्कविहीन मौन हैं मूर्तियाँ
घर घर से घाट पर आती चीख सुन रहे हैं घंटें
कैद शिव सो रहे हैं
बंदी नंदी बैल रो रहे हैं
सनिटाइज़र साथ लेकर संत साँड़ सड़क पर घूम रहे हैं-
कोरोना पॉज़िटिव!

गुरु
वरुणा व असी दुःखी हैं
विद्या के केंद्र में ख़ुशी है
किंवदंतियों में
मोक्षदायिनी काशी महाकाल के त्रिशूल पर टिकी है
गंगा की गोद में बसी है

यहाँ
हर किसी के होंठों पर
विष्णु और बुद्ध का दिया हुआ हँसी है
रिक्शे वालों के ज़बान पर कबीर-रैदास-तुलसी हैं
केला बचने वालों के कंठ में केदार-प्रसाद-मुंशी हैं

भूखी जनता मांग रही है आटा
महामारी में काट रहा है माटा
कर्षितों के कराह कानों में कोंच रही है काँटा
दिल्ली गायों के गालों पर मार रही है चाँटा

कवि कोविड और काशी क्या कहें कविता में?
यह संवेदनाओं को सूप से पछोड़ने का समय है
धूप में धैर्य के साथ सफ़र तय करने का समय है!
(©गोलेन्द्र पटेल
१३-८-२०२०)




३६.

सावधान //
-----------------------------
हे कृषक!
तुम्हारे केंचुओं को
काट रहे हैं - "केकड़े"
                सावधान!

ग्रामीण योजनाओं के "गोजरे"
चिपक रहे हैं -
गाँधी के 'अंतिम गले'
                   सावधान!

विकास के "बिच्छुएँ"
डंक मार रहे हैं - 'पैरों तले'
                    सावधान!

श्रमिक!
विश्राम के बिस्तर पर मत सोना
डस रहे हैं - "साँप"
                  सावधान!

हे कृषका!
सुख की छाती पर
गिर रही हैं - "छिपकलियाँ"
                  सावधान!

श्रम के रस
चूस रहे हैं - "भौंरें"
                 सावधान!

फिलहाल बदलाव में
बदल रहे हैं - "गिरगिट नेतागण"
                  सावधान!

(©गोलेन्द्र पटेल
रचना : १८-०७-२०२०)


३७.

भूखे को भाषा नहीं भात चाहिए //

आलोचना के ओखली में कविता कूट रही है
महामारी का मूसल

कवि लेखक पाठक श्रोता भूखे हैं
कवयित्री के कड़ाही में करुण कथाएँ पक रही हैं

नाटक का दृश्य है दिल्ली में
कैदी काल्पनिक यात्रा तो किया नहीं

उम्मीदें उपन्यास रच रही हैं
सड़क पर बिखरे हैं संस्मरण

डायरी डॉक्टर के पास है
कर्षित की कटोरी में रेखाचित्र रख दिया है कोविड

निबंध में कह रहा है नेता
भूखे को भाषा नहीं भात चाहिए।
(©गोलेन्द्र पटेल
०८-०९-२०२०)




३८.

◆सत्ता का सेतु◆

महानगरों के उर पर बन रहे हैं पुल

न नल-नील हैं
न बंदरों की सेना
न राम नाम का कोई पत्थर

आश्चर्यचकित है गिलहरी

नेताओं के फेंके पत्थर तैर रहे हैं
आँसुओं के सागर में ;

जनतंत्र की जीसीबी तोड़ रही है
घर
संसदीय सड़कें चौड़ी हो रही हैं
शहर दर शहर है
डर

भयभीत भूखी जनता कूद कर मर रही है सत्ता के सेतु से
क्योंकि उसे चाहिए जीव!
(©गोलेन्द्र पटेल
०२-०२-२०१९)



३९.

खर जीउतिया पूजन //

एक माँ की स्मृति जीवित होती है
जीवित्पुत्रिका व्रत से
दुआएँ द्वार पर आती हैं
संतानें साँपों से बच जाती हैं सफ़र में
विषम समय की विष सोख लेते हैं सूर्य

जगत पर टिमटिमाते जुगनुओं के रोशनी में
अढ़ाई अक्षरों के प्रेमपत्र को पढ़ किशोरियाँ
किलकारियों के कचकचाहटीय स्वर में गाती हैं कजरियाँ

"सर्वे भवंतु सुखिनः' सिद्धांत है हवा के होंठों पर
ऐ सखी सृष्टि में फूल मरता है
पर उसका गंध नहीं
कलियाँ कंठों-कंठ कानों-कान सुनती रहती हैं
भ्रमरियों के गुनगुनाहटें"

अंधेरी आँधियों में मणियों का मौन चमकना
सर्पों के संग सर्पिणियों के संयोग का संकेत है
ओसों से बुझती दूबों की प्यास

पेड़ को पता है
पत्तियों के पेट में जाग रही है भूख

आश्विन-कृष्णा अष्टमी को
जीमूतवाहन जन्नत की वास
छोड़ पृथ्वी पर आते हैं
गरुड़ गगन गंगा में मलयावती के साथ नौका विहार करते हैं

नयन नीर की नदियों में शांति है
रस से लबालब भरा गिलास है खारा
समुद्र की नीलिमा बढ़ी है

गर्भवती अनुभूतियाँ जन्म देती हैं स्मृतियों को
जिसे जीवित रखती है जिउतिया
छत्तिस घंटे तक

यह वर्ष प्रेम में नजदीकियों को नहीं
दूरियों के तनाव को स्वीकार किया है
स्पर्श से दिलों में दरारे पड़ रही हैं

पर्व को परवाह नहीं किसी के जीवन से
मृत्यु नहीं रुकती मास्क से
नहीं रुकती खुद से खुद की दूरियाँ बनने से

गंवईं मृत्यु के गंध को सूँघ रहे हैं
मरने से पहले
एकसाथ एकत्र हो एक ही अगरबत्तियों के धुएं को
फेफड़े तक पहुंचा

बूढ़ी औरतें नयी नवेली बहुओं को उपदेश दे रही हैं
उपवास उम्मीद है
उज्ज्वल भविष्य की

चील्होर था या उल्लू फुसफुसा रही है भीड़
परात का प्रसाद लौट रहा है
चूल्हे के पास

बच्चे हैं
कि गोझिया आज ही खाना चाहते हैं
खर व्रतधारी समझा रही हैं
जिउतिया माई रात भर खईहन
हम सब सवेरे
(अर्थात् बासी)

बच्चे कह रहे हैं माई हमार हिस्सा हमें दे दे
नाहीं त रतिया के जिउतिया माई कुल खा जईहन
आज शायद ही छोटे बच्चे सो पाएंगे ठीक से
(©गोलेन्द्र पटेल
१०-०९-२०२०)





४०.

धुआँ उठता है ऊपर //

आज हर आदमी को पता है कि
अनेक अस्मिताएँ झेल रही हैं औरतें

दिल्ली में दया जग रही है दुधमुंही के दिन

अँतड़ियों में दहक रही है आग
नाड़ियों से निकल रही है भाप
भूख बैठी है चूल्हे के पास

आँसू टपक रहा है तवा पर
भात का बुदबुदाहट सुन रहा है पेट

आँखें देख रही हैं
रोटी खा रहा है सेठ

अंत में अक्सर चिता से उठता है धुआँ
और उठता ही रहता है ऊपर!
(©गोलेन्द्र पटेल
२०-९-२०१८)



कवि परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल
जन्म : ०५-०८-१९९९
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी ,चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
शिक्षा : बीएचयू , बीए में अध्ययनरत
माता-पिता : श्रीमती उत्तम देवी-श्री नन्दलाल
पेशा : कवि-लेखक व आलोचक
काव्यगुरु : श्रीप्रकाश शुक्ल

संपर्क सूत्र :-

मो.नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

YouTube :

https://www.youtube.com/c/GolendraGyan

Facebook : 

https://www.facebook.com/golendrapatelkavi


नोट : इस पेज़ पर अहिंदी भाषी साथियों के लिए समकालीन साहित्य से संबंधित अध्ययन समाग्री भेजा जाता है । अतः आप भी इस अहिंदी भाषी साथियों के पेज़ पर अपनी रचना साझा कर सकते हैं इसके लिए निम्न नंबर या ईमेल पर अपनी रचना भेजें। आपकी रचनाओं का आत्मिक अभिनंदन और सहृदय सादर स्वागत है।

(8429249326 , corojivi@gmail.com)

सभी को सादर प्रणाम!







"खुद जुड़े और औरों को जोडें"

आत्मीक धन्यवाद!

Sunday, 13 September 2020

माँ की भाषा में होता है जीवन सार : कोरोजयी कवयित्री डॉ.शशिकला त्रिपाठी {©Shashi Kala Tripathi} / कुछ महत्वपूर्ण कोरोजीवी कविताएँ

 

चर्चित कवि , आलोचक व आचार्य डॉ.शशिकला त्रिपाठी मैम की कुछ महत्वपूर्ण "कोरोजीवी कविताएँ" :-


१.

कोरोना (शीर्षक)

नहीं  हुईं वार्ताएं

देश के आकाओं के मध्य, 

नहीं उठे मुद्दे

इतिहास, भूगोल, अर्थनीतियों  के 

ढुलमुल विश्व मंचों पर

न कोई समझौता 

न चेतावनी ,न उद्घोषणा 

न देश की सीमाओं पर

दिखी बाजीगरी सैनिकों की

फिर भी छिड़ गया है  

भयानक विश्वयुद्ध,

वर्चस्व के लिए। 

नामालूम तरीके से 

जैसे आता है अंधड़

समुद्र में सूनामी और 

जंगल में लगती है आग

वैसे ही विश्व में  

महामारी रूप में 

पैर पसार चुकी है कोरोना

पूर्व के नैसर्गिक 

और मानवनिर्मित

आपदाओं को पछाड़कर।

मर रहें हैं बेकसूर 

लाखों की संख्या में 

नई तकनीकें भी

सिद्ध हुई हैं बेबश

योरोपीय देश हैं बेहाल।

विचित्र यह कि 

लड़ा जा रहा है युद्ध

घरों में बंद होकर

मास्क, साबुन और  सैनिटाइजर

जैसे हथियारों से 

दुनिया है स्तब्ध।

विश्वविजेता

बनने की होड़ में 

चीन, वेपन वायरस से 

तोड़ता है महाशक्तियों के रीढ़ 

लीलाधारी बन,

करता है शंखनाद 

अभिनय के लिए 

सृजन और विनाश का 

 विश्व रंगमंच पर ।।





२.
मां की स्मृति में कुछ उद्गार ।
कभी नहीं मरती माँ 
‐----------------------------
हंस के उड़ने पर भी
बेटी की आत्मा में
चुपचाप चली आती है माँ 
मौका मिलते ही उससे 
करती है ढेरों संवाद 
कभी नहीं मरती माँ  ।
बागी बेटी भी
उसके पाठों से
सुलझाती है उलझन ।
संस्कारों के बीज 
अंखुवाते  हैं बेटी में
मां की सोच
निखरती है बेटी में 
समस्याओं से घिरने पर
उसे उबार लेती है मां 
उसकी सीख से
मिलता रहा है उसको हल 
माँ की भाषा में 
होता है जीवन सार
लोकोक्तियां की भरमार 
उन्हें दुहराती है
जब तब वह।
मां से ही समझा है 
उत्सव पर्व का अर्थ 
इसीलिए  स्मृति मात्र से
आती है सुगंध पकवानों में
उसकी डांट व प्यार की लहरें 
बहती है बेटी के नस नस में।
उम्र की सीढ़ियों पर
बेटी जब बनती है मां 
हो जाती है बिलकुल मां जैसी
कभी नहीं मरती मां
बेटियों में 
अमर होती है ।
-------------------


३.
जाना है गाँव 
( 1)
-----------------
कमाऊ शहर
दिल्ली, मुम्बई हो 
या तेलंगाना,मेंगलुरू,
केरल, कोलकाता हो
या हरियाणा, पंजाब 
प्रवासी मजदूर 
हताशा में 
आते हैं सड़कों पर
कोरोना से बेखौफ 
न सुरक्षा के उपकरण
न बना पाते हैं  दूरियां 
जाना है गाँव ।
भले हजार, बारह सौ 
किलोमीटर की हो दूरी 
पहुंच ही जाएंगे 
पंद्रह बीस दिनों में 
प्रबल यह विश्वास। 
वामन बनकर 
नापना चाहते हैं 
महानगरों से 
गांव की दूरियां।  
चल पड़ते हैं 
झुंड में पैदल
सिर पर गठरी
गठरी में गृहस्थी 
ठेले पर परिवार 
परिवार में गर्भवती पत्नी
और नन्हें मुन्ने बच्चे।
पक्का इरादा है 
बंदी खुले या बढ़े 
उसकी अवधि 
फर्क नहीं पड़ता 
जाना है गाँव ।
सौ किलोमीटर चलते चलते
चक्कर खाती बिटिया
गिरती है भू पर
हांफती  पत्नी
कहती है अब 
चला नहीँ  जाता
फिर भी बेचैनी है
जाना है गाँव ।
महामारी से पहले
मरेंगे भूख से
अंत समय में 
न तुलसी-गंगाजल होगा
न होगा अपनों का कंधा
जाना है गाँव 
जिंदा या मुर्दा ।
‐------------------


४.
जाना है गांव 
------------------
स्मृति में 
सक्रिय है
चलचित्र 
पीपल का छाँव
पुरखों का वास 
मां बाप का आशीष 
और रहने को 
अधबना मकान
जाना है गांव ।
वहां होते नहीं
सिर्फ़ मजदूर 
पुकारे जाते हैं 
राम घनश्याम 
मुरारी हनुमान 
जाना है गाँव ।
वहां दद्दा-कक्का 
खेत,खलिहान 
पोखर, पगडंडियाँ 
बचपन की स्मृतियां।
नहीं होंगे घर में बंद
न मरेंगे भूख से
उदरपूर्ति के लिए 
कुछ न कुछ 
हो जाएगा इंतजाम। 
महानगरों में 
खटते हैं दिन रात 
दुरुस्त करते हैं 
अर्थव्यवस्था के चूलों को
फिर भी नहीं होते भारतीय 
होते हैं मजदूर 
यूपी और बिहार के।
सरकारें बनती, बिगड़ती हैं
लेकिन उनके हिस्से में 
नहीं आती समृद्धि 
भले गुजर जाए जीवन ।
रुकेगें नहीं अब पांव
'गोदान' के गोबर का
हुआ है मोहभंग 
जाना है गाँव ।
--------------------.

५.
शकुंतले! तुझे सलाम
----------------------------

विशेष 
औषधि-आहार से
होती है रक्षा 
दो जीवों की
मातृत्व की
अनमोल अवस्था 
गर्भावस्था।
संगठित क्षेत्रों की स्त्री 
छह मास होती है
अवकाश पर
लेकिन, 
मजदूर स्त्री 
कोमल नहीं
इस्पाती होती है
इसीलिए,
प्रचंड हौसले के साथ 
गर्भावस्था में 
करती है प्रस्थान 
महाराष्ट्र से बिजासन ।
लंबी दूरी को  
पटकनी देने हेतु
लगाती है छलांग 
पार करती है 
सत्तर किलोमीटर।
तभी वह
प्रसव पीड़ा से 
तड़पती है 
सड़क किनारे 
देती है शिशु को जन्म।
पुन: यात्रा पर
छाती से सटाए
नवजात को 
लांघ जाती है
एक सौ साठ किलोमीटर 
पहुँच जाती है 
अपने गंतव्य पर।
उसकी यात्रा गाथा
अविश्वसनीय 
होते सब भौंचक 
देखते हैं अपलक
औरत नहीं 
जादुई शक्ति है।
श्रम मंत्रालय 
महिला आयोग 
सब खामोश 
पुलिस-प्रशासन 
करुणाविगलित 
ध्वनित होता स्वर
वीरांगना हो
शकुन्तले! तुझे सलाम ।
‐---------------------------

६.
पिता
त्योहार थे
खुशियों के अंबार थे
नए वस्त्र, खिलौने,उमंग
और उत्साह के मेला थे।
पिता
आम की बगिया थे 
लाते थे रिक्शे से
आम बोरे भर भर कर।
तब, सोते थे छत पर 
कमरा भर जाता
आम के पाल से
पुआल ही पुआल से।
कलेवा में 
रसदार आम
हो जाते हम निहाल
आम के पने पीते
चूसते अमावट 
गर्मी की दुपहरी 
बीतती थी लूडो 
शतरंज के खेल में ।
 पिता
अनाज के भंडार थे 
ऋतुफलों की टोकरी थे
गौ सेवा करते हुए 
दूध के धार थे।
खुश थे हम
रिश्तो की स्पर्धा में
पिता थे राजा 
हम राजपुत्र-पुत्रियां।
पिता 
हमारे आदर्श थे
उनकी आंखों के हम स्वप्न थे
कोई पुत्र होता
कलक्टर, कोई इंजीनियर 
कोई बनता राष्ट्रपति
बेटियाँ भी बनतीं
डाक्टर और लेक्चरर।
नहीं थीं बेटियां 
बोझ कि उतार दें उन्हें कहीं ।
पिता 
माँ की श्रृंगार थे
हम सबकी शान थे
बड़ा मकान 
वाहन, सुख समृद्धि थे।
पिता 
डर,आदेश, निर्णय थे
और अनुशासनप्रिय थे।
अवज्ञा पर
होती थी कठोर सज़ा 
कुएं में औंधे लटकाते
बांध देते मोटी रस्सी से
बुनते हों जैसे वे खाट।
पिता 
पंडित जी थे
घर के बाहर  
देते थे आशीर्वाद 
सुझाव और उपाय भी
धर्म था उनका 
दीनों को उबारना।
पिता 
रक्षक थे, कर्मठ थे
उद्यमी ,ऊर्जावान थे
हम बच्चों के भगवान थे।
पिता अमर हैं 
बसते हैं अंतस में 
चिंगारी की फूंक बन।
-----------

©शशिकला त्रिपाठी

कवयित्री परिचय :-
नाम : शशिकला त्रिपाठी
{एसोसिएट प्रोफेसर , वसंत महिला कॉलेज , वाराणसी}

रचनाएँ :

साहित्यिक सम्मान : 
 
ईमेल : 


संपादक परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल
{बीएचयू , बीए , तृतीय वर्ष}
संपर्क सूत्र :-
मो.नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

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Saturday, 12 September 2020

कोरोजीवी कविता : जन और समाज की चिंता का प्रश्न {©corojivi}



 “कोरोजीवी कविता : जन और समाज की चिंता का प्रश्न”

  -गोलेन्द्र पटेल 

कोरोजीवी कविता :  जो कविताएँ कोरोना काल में लिखी गयीं या लिखी जा रही हैं उसे ही “कोरोजीवी कविता” कहा जा रहा है। इस कविता में कवि की सम्पूर्ण संवेदना स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। इसमें कोरोना (अर्थात् कोविड) का जिक्र हो या न हो ; परंतु यह उससे पूर्णतः प्रभावित है। इस कविता का श्रीगणेश श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता “उत्तर-कोरोना” से माना जा रहा है। इसमें भूख , भय , त्रासदी , प्रकृति , प्रेम , बेबसी , लाचारी , मजबूरी , संसदीय सड़क पर निराशा , महामारी का मार , मुसिबत में मजदूरों का मंत्र से मेडिकल तक की यात्रा , दर्द का जीवंत दृश्य , पीड़ा , व्यथा , मानसिक दुख , तनाव एवं चिंता इत्यादि हैं।



युवा कवि व आलोचक “बिम्ब-प्रतिबिम्ब” के संपादक अनिल पाण्डेय ने जब समकालीन हिंदी कविता हस्ताक्षर कवि , आलोचक व आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल से नब्बे के दशक के बाद के कविताओं के नामकरण के संबंध में जानना चाहा , तो उन्होंने तीन नामों का जिक्र किया। जो निम्नलिखित हैं –

1. अस्मितामूलक कविता

2. प्रयोजनिक कविता

3. कोरोजीवी कविता


उक्त संज्ञाओं में से कोरोजीवी कविता संज्ञा को हिंदी जगत सर्वमत से स्वीकार कर स्वागत कर रहा है। इस संज्ञा के संबंध में आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल ने के.एल.पचौरी प्रकाशन के फेसबुक पेज़ पर सैद्धांतिकी एकल व्यख्यान दिए हैं। शुक्ल के कोरोजीवी नामकरण पर अपना विचार व्यक्त करते हुए समकालीन हिंदी कविता के विश्वसनीय आवाज आत्मीय कवि मदन कश्यप ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा था कि “कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बाद दुनिया का बदलना तय है। संवेदनशील विधा होने के नाते कविता उस बदलाव को लक्षित कर रही है। हिंदी के यशस्वी कवि एवं आलोचक श्रीप्रकाश शुक्ल ने कविता में आ रहे बदलाव को आधार बनाकर एक नयी सैद्धांतिकी गढ़ी है जो स्वागत योग्य है।“ यह सैद्धांतिकी कोरोजीवी कविता की सैद्धांतिकी है।



कोरोजीवी कविता ने सम्प्रदायगत सजगता की जगह इतिहास विवेक पैदा किया है साथी ही हमें सजग किया कि हम जिस भूगोल पर चल रहे थे उस पर हमारा ध्यान बने रहना चाहिए। यह नये इतिहास विवेक की कविता है। शुक्ल ने कविता को आंतरिक लय के दायरे में लोकोन्मुखी मानते हुए कहा है कि यह कोरोजीवी ही कविता की कोरोजयीता का प्रमुख आधार है।



कोरोना की इस वैश्विक आपदा में मनुष्य कोरोजीवी हो गया है। उठते-बैठते , सोते-जागते , खाते-पीते , घूमते-टहलते , लिखते-पढ़ते यदि किसी बात की चिंता है तो वह है “कोरोना” । ईश्वर भी कोरेंटाइन हो गए हैं और आम आदमी की आस्थाएँ डगमगा रही हैं। जिसका जीवंत दृष्टव्य निम्नलिखित कोरोजयी काव्य पुष्प पंखुड़ियाँ हैं-


“क्या तुम जानते हो

यह आस्थाओं के फड़फड़ाने का दौर है

जिसमें संत कवियों की एक बार फिर से वापसी हो रही है

जब उन्होंने कहा था कि इस जगत में एक ही ब्रह्म की सत्ता है

बाकी सब मिथ्या है।“

{उत्तर-कोरोना (आत्माएं होंगी , आत्मीयता न होगी) : श्रीप्रकाश शुक्ल} से


आर्थिक , सामाजिक , राजनीतिक एवं धार्मिक (आध्यात्मिक) जगत की यथार्थ स्थिति को इस समय की कविताओं ने खुली आँखो से अभिव्यक्त किया है।सदियों से रक्षित ईश्वरी सत्ता से लोगों का विश्वास इधर एकदम से टूटा है। जिस विज्ञान के आंतक से लोग डरे हुए थे , जिस पर गुमान करते हुए पूरा आधुनिक समाज टिका था , वह विज्ञान भी कुछ न कर सका।





फ्रांसीसी साहित्यकार “ज्यों पाल सार्त्र” अस्तित्त्ववादी विचारकों में सर्वोपरि माने जाते हैं । वे नास्तिक अस्तित्त्ववाद के प्रतिपादक हैं। उनका मत है कि “ईश्वर मर चुका है” । जिसका साक्षात्कार हम कोरोजयी कवियों की कविताओं में कर रहे हैं। इस संदर्भ में मुझे मदन कश्यप  की कुछ कोरोजीवी काव्य पंक्ति याद आ रही हैं।जो निम्नलिखित हैं-


1.     “एक तुम्हारा स्पर्श ही तो था

जिससे ईश्वर होने की अनुभूति हुई

लेकिन कोरोना ने मुझे निरिश्वर बना दिया”


2. “मैं मरने से पहले ईश्वर को मरता हुआ

  देखना चाहता हूँ।“




इधर 4-5  महीने से सामाजिक बिखराव की समस्याएं बढ़ी हैं। रिश्तों-संबंधों और व्यावहारिकता को लेकर नये समीकरण बने हैं। जनता में बेरोजगारी , भूखमरी एवं मानसिक तनाव की समस्या बढ़ी है।  जन-जन के हृदय में डर का रोग तेजी से बढ़ रहा है और वातावरण में संकट की सन्नाटा है , भय है , त्रासदी है एवं राजनीति का नग्नता है। कोरोजीवी कवि जनता के पक्ष में निडर खड़े हैं। वे इस कोविड-कहर से उत्पन्न कराह को संत कवियों की भाँति सुन रहे हैं और यथार्थ दुःख , पीड़ा व मानवीय संवेदनाओं को सहृदयता से शब्द-शस्त्र में ढाल कर राजनीति षड्यंत्र को असफल बना रहे हैं।

 

 

1. “सारा दुख गुस्से में बदल जाय तो दरक सकते हैं

 बड़े से बड़े किले”

      (“अंधेरे के अंत का गीत” से , सुभाष राय)

            2. “सोचा तब क्या होगा?

   जब संकट के समय में

  इंसानों की भाँति सूर्य मना करेगा रोशनी देने से

  चाँद शीतलता

  पेड़-पौधे मना करेंगे

  फल-फूल छाया देने से

  बादल पानी”

          (“संकट के समय में” से , अमरजीत राम)



निष्कर्ष : -   अनिल पाण्डेय ने कोरोजयी कवि और कोरोजीवी कविता के संदर्भ में कहा है कि “कवि और कविता सही अर्थों में मनुष्य के मुक्ति की छटपटाहट है।“ इस वैश्विक महामारी में घोर निराशाओं के क्षण में आशाओं का मशाल लेकर कोरोजयी कवि अंधेरी गलियों में जन-जीवन के उज्ज्वल भविष्य के लिए उम्मीद का  रोशनी  बिखेर रहे हैं।


लोक जिस गति में पहले जागरूक हो रहा था इधर कोरोजयी कवि और कोरोजीवी कविता के हस्तक्षेप से कुछ और अधिक जागरूक व चौकन्ना हुआ है।


कोरोजीवी कविता महज अव्यवस्थाओं का चित्रण नहीं करती अपितु व्यवस्था-परिवर्तन में सकारात्मक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला रही है उसकी दृष्टि में भौगोलिक यथार्थ है।


कोरोजीवी कवि अकर्मण्य होने की अपेक्षा अपनी सामाजिक-सक्रियता बढ़ा रहे हैं और वे भूख-प्यास से लिपटे जनों के पास जने का सहर्ष साहस भी कर रहे हैं जिससे उपेक्षितों को जीने की उम्मीद “संजीवनी साहित्य का सृजन” तीव्र गति से हो रहा है।



लोकतंत्र के लोकल लोग भूखे-प्यासे पथरीली पथ पर नग्गे पाँव लौट रहे होते हैं तब कवि के आँखों से आँसू का टपकना और दिल चीर देने वाली तस्वीरों पर नजर गढ़ना , कानों में काँटों की भाँति चुभने वाली चीख सहजता से सहृदय सुन कर सजीव चित्र हमारे सामने प्रस्तुत कर रही है निम्न कोरोजयी पंक्ति :-


1. नहीं रही अब  खतरनाक क्रिया

नयी सदी में लौटने की यह क्रिया 

जाने से कहीं अधिक ख़ौफ़नाक है।

(“लौटना” से , श्रीप्रकाश शुक्ल)


कोरोजीवी कविता में जिम्मेदारी और ईमानदारी साथ साथ जन-जीवन की चिंता है। यह चिंताएं संज्ञानात्मक , शारीरिक , भावनात्मक और व्यवहारिक विशेषता वाले घटकों की मनोवैज्ञानिकि हैं। आज सत्ताएँ जन को दो वर्गों में बाट कर राजनीति का रंगमंचीय नाटक समाज को देखा रही है। पहला आमजन (मूल निवासी) दूसरा ख़ास जन (प्रवासी) । जब ऐसे समय में शक्ति और सत्ताएँ दोनों अनुपस्थित हो जाते हैं तब जन-जीवन के केंद्र में श्रम और प्रेम की उपस्थिति से उल्लास का उर्वर ज़मीन तैयार करनेवालों में स्वप्निल श्रीवास्तव जैसे कवि का योगदान उल्लेखनीय है। वे कहते हैं कि “हमने अपने श्रम से इस धरा को सुंदर बनाया है” । इस दौर के अन्य महत्वपूर्ण कवि व कवयित्री निम्नलिखित हैं –

2. रामाज्ञा राय शशिधर’

3. बोधिसत्व

4. जितेंद्र श्रीवास्तव

5. निलय उपाध्याय

6. संजय कुंदन

7. शैलेंद्र शुक्ल

8. संदिप तिवारी

9. अरुणाभ सौरभ

10. मनकामना शुक्ल पथिक

11. अनामिका

12. रश्मिभारतद्वाज

13. सोनी पाण्डेय

14. अंकिता खत्री

15. पूनम विश्वकर्मा

16. रचना शर्मा

17. प्रतिभा श्री एवं अन्य।

©गोलेन्द्र पटेल



नाम : गोलेन्द्र पटेल

शिक्षा : बीएचयू , बीए , तृतीय वर्ष

 https://www.youtube.com/c/GolendraGyan

https://www.facebook.com/golendrapatelkavi

ईमेल : corojivi@gmail.com

Whatsapp : 8429249326

पता : खजूरगाँव , साहुपुरी , चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत। 221009

DATE : 13-09-2020



Sunday, 30 August 2020

रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार से पुरस्कृत शैलेन्द्र कुमार शुक्ल【© Shailendra Kumar Shukla】 की कुछ महत्वपूर्ण कविताएँ

 

 

◆सहजता और संलग्नता के कवि हैं शैलेन्द्र:प्रोअरुण होता◆

भोजपुरी अध्ययन केंद्र और डॉ रविशंकर उपाध्याय स्मृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में 'सम्मान समारोह,परिचर्चा और काव्यपाठ' विषयक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर हिंदी के युवा कवि शैलेन्द्र कुमार शुक्ल को पांचवा रविशंकर उपाध्याय स्मृति  युवा कविता पुरस्कार प्रदान किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें प्रशस्ति पत्र,पुरस्कार राशि और साल भेंट किया गया।   सम्मान समारोह की अध्यक्षता प्रो. रामकीर्ति शुक्ल ने की।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो शुक्ल ने  कहा कि शैलेन्द्र ने अपनी काव्य परम्परा का जिस तरह स्मरण किया है वह उन्हें विलक्षण और विशिष्ट बनाता है। शैलेन्द्र को उन्होंने परंपरा के स्मरण का कवि बताते हुए उनकी अवधी पृष्ठभूमि की काविताओं की प्रशंसा की।

मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि  मदन कश्यप  ने कहा कि प्रतिरोध की विश्वसनीयता सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि साम्राज्यवाद ने प्रतिरोध को भी फंडिंग देना शुरू कर दिया है। यह उसकी क्रूरतम सच्चाई है लेकिन वह ऐसा कर रहा है। शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की विशेषता यह है कि वे लोक में रचे बसे रचनाकार हैं। उनकी यह लोक सम्बद्धता उन्हें विश्वसनीय भी बनाता है। शैलेन्द्र की काविताओं को उन्होंने हिंदी काव्य परंपरा की केंद्रीय धारा की काविताओं के रूप में रेखांकित किया।


मुख्य वक्ता के रूप में प्रतिष्ठित आलोचक और निर्णायक मंडल के सदस्य प्रो अरुण होता ने अपने उद्बोधन में कहा कि शैलेन्द्र की कविताओं की  संलग्नता और सहजता हमे आकर्षित करती है। उन्होंने कहा शैलेन्द्र की कविताओं में प्रतिरोध और व्यंग्य का मिला जुला रूप दिखाई देता है। वे कविता में बड़बोलेपन के शिकार नहीं हैं। उनकी छोटी काविताओं को इन्होंने बड़े कैनवास की कविताएं माना।

विशिष्ट वक्ता के रूप में बोलते हुए हिंदी के महत्वपूर्ण कवि  स्वप्निल श्रीवास्तव  ने कहा की किसी कवि को याद करने का सबसे बेहतर तरीका है उसकी कविताओं का पाठ करना। उन्होने कहा कि शैलेन्द्र की कविताओं में मौजूद मुहावरे और चरित्र उनकी प्रतिबद्धता और पक्षधरता निर्धारित करते हैं। 

गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी पुष्पेंद्र कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि एक युवा कवि के लिए जरूरी है कि वह समय से सिक्त रहते हुए भी समय से मुक्त हो। यह एक कठिन कार्य है लेकिन यह किये बिना रचनात्मक मूल्यों को बचा पाना बहुत कठिन होता है। उन्होंने कहा आज हिंदी को एक सशक्त और कड़ी आलोचना की जरूरत है। उन्होंने कहा एक युवा कवि का अपनी संस्कृति,परम्परा और मूल्यों से जुड़े रहना उसके सजग और सचेत होने की निशानी है। शैलेन्द्र में ये चीजें बहुत साफ तौर पर दिखाई देती हैं। शैलेन्द्र को उन्होंने इतिहास,परंपरा और संस्कृति से संवाद करने वाले कवि के रूप में याद किया।

सम्मानित कवि शैलेन्द्र कुमार शुक्ल ने अपने आत्मवक्तव्य मे कहा की कविता में हम सबकी दुनिया शामिल है। मुझे लगता है मनुष्य का जीवन कविता से जुड़ा हुआ है।व्यक्ति आत्मालोचन की स्थिति में कविता रचता है। उन्होंने कहा मैं जिस अवधी क्षेत्र से आता हूँ वहां के लोगों का जीवन ही कविता है। उनके जीवन को देखते, उसमे शामिल होते हुए कविता की भूमि तैयार हुई। इस भूमि को पुष्पित पल्लवित होने का अवसर बनारस और यहां के साथियों ने दिया। 

कार्यक्रम का संचालन भोजपुरी केंद्र में  पीडीऍफ़ डॉ विकास कुमार  यादव ने किया व धन्यवाद ज्ञापन रविशंकर उपाध्याय स्मृति संस्थान के सचिव डॉ. वंशीधर उपाध्याय ने दिया। इस अवसर पर शहर के गणमान्य साहित्यप्रेमी व भारी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
(प्रस्तुति: जगन्नाथ दुबे)




१.

युगबोध

मैं तुम्हें अपने दोनों हाथ

जोड़कर नमस्कार करता हूँ

लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं

कि अपने दाहिने हाथ से 

अपने बाएं पांव का जूता निकाल कर

तुम्हारे अपराधी चालक मुँह पर

भब्भ से नहीं मारूंगा


बहुत ऐंठन से पगही भी कतर जाती है साहिब !


२.

1.

मैं अपने संदेहों से डरा हूँ

मेरे विश्वासों का नशा पड़ोसियों की छाती कूट रहा है

राजा की जययात्रा निकली थी

कुछ बरस पहले

कि जिनकी दिग्विजयी पताका पर लिखा था

एक महामारी का नाम

कितनी बार सोचा 

राजनीति में महामारी से वृहद और महान कुछ नहीं होता


2.

मैं एक राजनीतिक महामारी का मुँह

कविता की हवाई चप्पल से लाल कर देना चाहता हूँ

लेकिन तुम जानते हो

मेरी कविताएं नंगे पांव हैं कब से


3.

न तुम्हारे पास लाठी है

और न मेरे पास भैंस

ऐसे में प्रतीकों की वासना

हमें हांक कर ले आई है 

वैतरणी के तट पर


३.

आत्मविश्वास की टिकिया मिलेगी क्या ?

_______________________________


तुम्हारे आत्मविश्वास में

अहंकार का घुन लगा था

कई बरस पहले


खोखले हुए नाज में

जहाँ अन्न ही ब्रह्म था

तुमने अन्य पर विश्वास किया


विश्वास तुम्हारी सुविधा 

और इस सुविधा ने जो किया

विकास कहलाया


गांधी होते तो कहते यह तुम्हारे कर्मों का पाप है

मैं इस महामारी के दौर में

आत्मविश्वास की एक टिकिया खरीदने के लिए

दर दर भटक रहा हूँ

मेडिकल स्टोर पर जाता हूँ

तो टूटी कुर्सी पर बैठा केमिस्ट 

मुझे पार्टी के दफ्तर का रास्ता दिखा देता है


काश मेरी उदासी

मेरे विश्वासों को धिक्कार पाती


४.

महानता या महामारी

-------------------------------------


बहुत अच्छे लोग

मुझे नहीं जानते

बहुत बुरे लोगों को मैं नहीं


अच्छे लोग बड़े होते जाते हैं

यूकेलिप्टस जैसे लंबे और गोरे

बुरे लोग अंततः सिमट कर हो जाते हैं गठरी


कल कह रहा था कोई पागल

अच्छे लोग बुरे लोगों की जन्मभूमि होते हैं


वह बार बार कहे जा रहा था

मैं जन्मभूमि पर बात करना चाहता हूँ

वह कब से कहे जा रहा है

महानता से शुरू करूँ

या महामारी से

मेरा पागलपन जवाब नहीं दे पा रहा है।

५.
जितना तगड़ा दाग हमारे चोले पे
उतने हम इंसान तुम्हारे चुल्ल्हे से

इक इंजन जो खेंच रहा है गाड़ी कूं
गदहा अति बलवान तुम्हारे ठुल्ल्हे से

इस जंगल का शेर हमारा बाबा है
उत्तम गर्भाधान सदी का बिल्ल्हे से

हमरी छाती पर तुमरे ही नक़्शे हैं
फिर काहे भूचाल तुम्हारे पिल्ल्हे से

रोटी बिखरी चीख रही हैं राजा जी
तुमको दूंगी वोट हमारे जिल्ल्हे से

तालाबंदी खुलेखजाने खाज हुई
राउर बोला गई उर्वशी किल्ल्हे से

उन्चासों की चली न अपने भारत में
फिफ्टी हुए बहाल महारे दूल्ल्हे से

कितने बिगड़े काम बने हैं बिगड़ी से
सिगड़ी धधके रोज राम के मुल्ल्हे से


६.
दृश् धातु
___________

सूरज से समंदर निकला
या समुद्र से सूर्य
विदित हो अभिक्रिया से संकोच वश 
चकपकाती निकल पड़ी
महाधातु दृश्

विलोम के वलय से शोभित
अद्भुत का अनुशंधान
आँखिन देखने का गुमान
संज्ञान की महामाया 
न्याय के कल्पनामयी अंक में निहत्थे विश्वास
मूल्यों के पसरते हाथ 
प्रदक्षिणा कर जड़ता की
कुंडली मारती चेतना 
लोकातीत शास्त्र सम्मत 

उठो
उठो कि देखो अपने सम्मुख खड़े शत्रु को
गढ़ो पारिभाषिक शब्दावलियाँ
निर्माण के कार्य में
दिगंत तक प्रतीक्षित हैं मूल्य 
खोलो न्याय के दुर्ग का फाटक
तम के देवता को अर्पित करो
दृश्यता के महान प्रहरी
निष्कंटक मार्ग पर है मनुजता का इतिहास

लेकिन विलोम 
जिसमें शोभित है दृश्यता 
अदृश्यता के इतिहास की कब आएगी
नवीन टिका 
प्रतीक्षा के परिचित पुष्प

हम चिह्नते रहे दृश्य दुश्मनों को
सुलभ बनते रहे मित्र
अदृश्य से लड़ता रहा अहंकार
अभिमान हमारा यह
नितंबों पर चढ़ाए ऐनक
आज जूझ रही है सभ्यता
बहुत मामूली से निर्जीव
दृश् धातु के विलोम से।

७.
एक ग़ैरजरूरी सूचना
__________________

एक दिन भाजपा के डायनासोर
कम्युनिटों के चमगादड़ों से 
लड़ते हुए
सांस्कृतिक युद्ध 
जायकेदार चटनी में बदल जाएंगें !

किसी शाम अमेरिका का राष्ट्रीय पूंजीवाद
चीन के क्रांतिकारी साम्राज्यवाद से
मिल बन जायेगा आलू पराठा !

किसी रात सारे धर्मों की
सबसे लज़ीज़ बिरियानी
पकेगी बुझते हुए सूरज की आखिरी आग पर !

किसी सुबह सारे धन्नासेठ 
दुनिया के मजदूरों के साथ
एक साथ निकल पड़ेंगे 
हजारों साल के खनिज पदार्थों में तब्दील होने की यात्रा पर !

तुम चाहो तो तब तक मेरे साथ 
आलू पराठा और चटनी का मजा ले सकते हो
लेकिन तुम भरोसा नहीं करोगे 
आख़िरी आग पर पकी बिरियानी  का
तुम्हें लम्बी यात्रा पर निकलने से पहले
तुम्हारी लम्बी हड़बड़ी 
किसी सभ्यता को हँसा-हँसा कर मार डालेगी
लेकिन बचेगा कौन !

८.
नागरिकता

जिस तरह यह धरती नागरिक है
इस ब्रह्मांड की
हम धरती के नागरिक हैं

हमारी नागरिकता तुम्हारे मूतने से 
गीली नहीं हो सकती
हमारी नागरिकता तुम्हारे छीकने से 
रद्द नहीं हो सकती

हमने ऑस्ट्रेलिया से एशिया तक
अपने डगों से नापी है धरती
हमने अफ्रीका से अमेरिका तक
खेले हैं आखेट
लाखों बरस से नागरिक हैं हम धरती के

अभी सिर्फ दस हजार साल हुए खेती करते
अभी अपने गरूर में डूबी एक सभ्यता
मिटे बहुत दिन नहीं हुए
देशों में बटे हैं जैसे धरती के टोले

पानी में घुस कर पादोगे
तो बुलबुले निकलेंगे
कोई लौटेगा नहीं अपने गुजरे हुए वक्त में
भूख से लेकर महामारी तक
मरती गईं कई प्रजातियां मनुष्यों की
लेकिन कोई नहीं लौट सका 
अपने ढह गए घर की पुरानी चौखट पर

हम नागरिक है
नागरिकता के सपने किसी इतिहास ने नहीं देखे
हम बैलों की नागरिकता के हलवाहे हैं
पिन्हाई हुई गाय के नीचे टटोलते हुए थन
कोई नहीं उठा सकता नागरिकता के सवाल
बछड़ों से
मेरी बखार में सेंध मारते चूहे
कभी पासपोर्ट के लिए आवेदन नहीं करते
हम धरती के नागरिक हैं

उत्तर आधुनिकता की भैंस अब बंधी है बथान में
तुम छोड़ो अपना प्री मॉडर्न पांड़ा 
मध्यकालीन मूछों के नीचे जो होल है
टोहकारिये 
छूछी बाल्टी में उत्तर सत्य की सफेदी
तुम्हें धोखा देगी

आइए हम नागरिकता पर पुनर्विचार करते हैं

९.
ओ भाद्रपद के कजरारे मेघ
आओ 
आओ और अपनी सांवरी घटा में लपेट लो
गीली और बहुत कोमल मिट्टी से पोषित 
धरती की देह पर
कितनी फब रही मैके से आई हरी साड़ी
जब तुम आओगे
मैं दुद्धा दानों वाले मकई के खेत में
मचान पर बैठ कर कुंभार के आवे में 
सबसे ज्यादा पकी मिट्टी वाली गगरी
कंकड़ियों से बजाते हुए गाऊंगा
राग मल्हार !

ओ लाल चोंच वाले सुग्गों
आओ !
आओ कि अमरूद के बाग में
मेरी बहन ढूंढ रही है
ललगुदिया फल वाला बिरुवा 
तुम आओगे तो मेरी भाभियां तुम्हें बहकाएंगी जरूर
जैसे तुम्हारे हरे पंखों पर उतर आया हो भादो !

अरी ओ आरर डार वाली जामुन
तुम्हारे रंग से कसैली हो गई है धरती की परिधि
पुलई से गिरे फरेंद को कैसे उठाऊं 
इस गीली मिट्टी पर पटे पड़े हैं रसगुल्ले

यह भरभस बारिश के दिन हैं
और अनंत वितान तक तनी हुई रातें
ये कठोर कवच वाले कैथे और बेल 
जिनसे टकरा रहीं हैं मघा की मेघमति तीखी बूंदें
ऊसर भूमि की पगडंडी के उभयतः
घेरे खड़े हैं चकवड़ और हुरहुर 
जैसे भादो की भद्रता ने दे दिया हो रास्ता

अरे ओ भादो के मेघ
आओ
आओ और उतरो धान के खेतों में 
जहां निकौनी कर रहीं हैं काकी
आओ कि करबी से लिपट कर बिलंगी जा रही है 
लोंबिया की बेल
आओ कि देर न हो
सरपत की पत्तियों को धार दो
ओ भादो के मेघ !


१०.
आज के बाद
फिर आज होगा

कल की अनंत 
संभावनाओं के बाद
फिर कोई आ धमकेगा आज

इस तरह भी
कल भरोसे की चीज है
जैसे हर कल का कोई न कोई 
आज जरूर होता है

अब मत कहना
कल का कोई भरोसा नहीं होता।


११.
मेरे प्यारे दोस्तों तुम्हें शुक्रिया
-------------------

मेरे घर में अभी मां हैं
पिता हैं
भाई भतीजे हैं
एक भैंस है
उसकी प्यारी पड़िया
जिसे मैनें अपनी खुरपी से छील कर घास खिलाई है
मेरा बेटा जिसका दूध पीकर जवान हो रहा है
उस महिषी की मेरा शुक्रिया 

उन मजदूरों को मेरा शुक्रिया
जिन्होंने मेरे बाबा के खेत में काम किया
उस एक अकेली धोती को मेरा शुक्रिया 
जिसे बुढऊ आधी पहनते थे और आधी ओढ़ कर
नीले आसमान के नीचे
खलिहान में माड़ते थे मड़नी
उन बैलों की जोड़ी को मेरा शुक्रिया 
जिनका अपने बेटों से ज्यादा ख़याल रखती थीं दादी

उन गांव के तमाम तमाम लोगों को मेरा शुक्रिया
जिन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया
उस तालाब को शुक्रिया
जिसने मुझ नंग धड़ंग लड़के की उछल कूद को
कभी अश्लील नहीं माना
गांव की उस गरीब बूढ़ी औरत को मेरा शुक्रिया
जिसने मेरी नौकरी के लिए मन्नते मांगी

अब उस पागल को कैसे शुक्रिया कहूँ
जो मेरी बेरोजगारी से बहुत परेशान था
लेकिन उन होशियार लोगों को मेरा बहुत बहुत शुक्रिया
जिन्होंने सदैव मुझे नीचा दिखाने की जुगत की
मेरे पांव इस धरती पर जमे रहें
इस अनंत आकाश को मेरा शुक्रिया

उस जवान होती आबादी को मेरा शुक्रिया
जिसमें मेरा आबनूस बसता है
उन बुजुर्गों को मेरा शुक्रिया
जिनकी निगरानी में मुझे बिगड़ने का मौका मिला
मेरे दुश्मनों को मेरा शुक्रिया
जिन्होंने मुझे याद रक्खा

लखनऊ को शुक्रिया हैदराबाद तक
और हैदराबाद को लखनऊ तक शुक्रिया
बनारस को शुक्रिया कहूँ
तो किस मुँह से
जिसने मुँह खोलना सिखाया
किसका मुँह मांगू कि मिले भी
शुक्रिया बनारस

विदर्भ की काली मिट्टी को मेरा शुक्रिया
कपास की काली पत्तियों और सफेद रुई को 
मेरी तरफ से शुक्रिया
ग़ांधी को तो अभी नहीं
लेकिन उनके बंदरों को मेरा शुक्रिया
शुक्रिया उन सब को
जो मेरे बहुत अपने हैं

मेरे प्यारे दोस्तों तुम्हें शुक्रिया कहूँ
तो मुझे माफ़ मत करना
मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।


  ★★ ★【अवधी पद】★★★

१२.
आओ तुलसी का धकियाई
अपने औगुन हेतु प्रयोजन छूरा बगल छुपाई
लेंउड़ी तरे दलिद्दर छोपी भाल भरम चमकाई
मनसबदार बनी चिरकुट कै लेनिमिन्ट लगाई
हाँ जू हाँ जू करी दिनभरा रातिउ मा लुरियाई
डासत चली गई है रजनी दसनी धरी तहाई
बरन डार पै जाति कै झुलुआ पैंगा खूब बढ़ाई
गद्दी चमकै गद्दीधर की सावन सुआ फंसाई
बबवा रहै संकुचित बहुतै कहि कै गाल बजाई
दरबारन मा करी भड़ैती तुलसी का गरियाई
तमगा एक मिलै यही खातिर गदहा बाप बनाई
नेकी भनति उगै जेहि खेते सड़वा अस चरि जाई
मान पिपासा गड़ही  हुइगै  डीह  खोदि पटवाई


१३.
हे बलभद्दर !
ओ बलभद्दर !
तोहके करे सलाम सलेन्दर
तू हम सब मा छंटे कलंदर
भोर भवा पानी बरसत है
पिहू पिहू चातक बोलत है
भिजुआ पिलवा कान फटक कै
पूंछ डोलाये कुछ मांगत है
चलौ बजारे मछरी लाई
मनवा लायं लायं लोलत है
कबते तुमसे कहित गुरुजी
केशव दद्दा का बुलवाओ
बैजनाथ कै भोले बाबा
सावन लाग गवा है देखौ
हुंवनइ लाल सलाम करब हम
माठा ऐस फेराओ सागर
ई सागर मा दुक्ख बहुत है
मारि मथानी ते उपजी फिर
नाहिन कोई बचे सिकंदर
हे बलभद्दर !
ओ बलभद्दर !

भोजपुरी के तू नाहर हौ
हमहू हन अवधी के मनई
बटुई भर तरकारी पाकी
दुइ दुइ खाय पनेत्थ डकारब
देस कोस की बातै हुइहैं
तुम गोरख के गीत सुनायउ
हम जुमई की कविता बांचब
पटना ते अइहैं अमरेन्दर
हम दद्दा का गरे लगाउब
केसव दद्दा कसि के डटिहैं
बलभद्दर कै आजु जलमदिन
का रे तू अबहिउ सोवत है
आंख खुली तौ सपना जागा
का गोरख का कहैं मछन्दर
हे बलभद्दर !
ओ बलभद्दर!

१४.
का हो बोधी भेड़हा हौ !
भाषा बोली मा कन्फ्यूजन बिन सोंता के गढ़हा हौ
गिरै  दौंगरा  उफनै  लागौ  जेठ  म  नंगे  नरहा  हौ
चुप्पे चुप्पे साँझ क निकरौ दिन दुपहर मा खरहा हौ
छेगरी के बच्चन पर झपटौ धाक जमे पै  फरहा हौ
जहाँ बजार बजावै ढपली ताक धिना धिन थैया हौ
'लप ते ओहर लप ते एहर' कौड़ी कि तीन करैया हौ
पाला बदलि बदलि कै उलरौ कलकत्ता कै करिया हौ
बाम के भित्तर दक्खिन साधे तुम भैया बम्बबैया हौ
अमरनाथ कै  डमरू  बाजै  हिंदी  के  बचवैया  हौ
बोली बोलि करावत असगुन निकुही जाति चिरैया हौ
ओढ़ी खाल उतारौ बलकल बबुआ कहि डेरवैया हौ
कस अवधी  बाजार  गरम  है  तू  व्यौपार  करैया हौ


१५.
बाबू यहु इंदिरा का पोता
पप्पू कहि कहि गप्पू पालेउ हुइ गेउ रट्टू तोता
बीरजवाहिर का गिरियाएउ जिनका है यहु धोता
सबै भुलायेउ तहजीबन का दहेउ बहुरिया क गारी
विधवा जीवन काटि दिहिसि जो वह भारत की नारी
कबहुँ न कोइक कोसि सकी वह यहिकी है महतारी
प्रेम करिस जो धार पै चली के दीन्हिस उमर गुजारी
सब अपमान सहिस सीता अस तहूँ न फाटी छाती
नहिं जबान मा खाई  खंधक  धरती फाटि समाती
यहौ नागरिक है भारत   का नसा उतारी बिचारौ
भोंपू ते बहिरे कानन मा यहिकिउ बात उनारौ
राजनीति मा करौ दुष्मनी भारत भाग्य विधाता
पोता के जूतन पर भावुक काहे हौ मतदाता।


१७.
ककुआ डाहै बहुत कोरौना
प्रान सुखाने दिगदिगंत लौ सूखै सकल पुदीना
छुआछूत की डुग्गी बाजै हुलसैं सुकुल नगीना
सप्तम आसमान मा ध्वाखा जाई कौन मदीना
छुटी नमाजै कटे पुजापा लुटिगे गाल बजौना 
बंद किवरिया खुले खजाने सिमटा परा बिछौना
जुगई जिये गजोधर मरिगे कहिका काहुकही ना
बरम बिबेकी काम न आए माया भगति चुरी ना
का खाई का पेइ बचाई कौनौ जुगुति बची ना
त्रिभुवन भये गंजेड़ी चौचक तबहुँ तलब बुझी ना
छुट्टा सांड़ व्यसन की बेंड़ी नेहुरे खूब बचे ना
कौन करिंगा माड़ौवाला कोउ मलिखान डरी ना
माहिल मामा  भये मंत्री करिया करम कोरौना।


१८.
हम गयेन रहे अंबिया बिनै निबिया की जर पर मिले जच्छ 
बोले तुहि कहाँ जाति है रे तू कहिका है रे अंध भक्त

हम कहेन कि साहेब हिन्दू हन मोदी जी का हम दिहेन वोट
जोगी जी के हम चेला हन औ अमित साह के परम भक्त

सुनतै खन छूटि पसीना गा लत्ता मा मुँह पोंछै लागे
बोले यह रीति पुरातन है फिरि जच्छ प्रश्न पूछै लागे

बोले कि कोरौना ते ज्यादा कहिकी चर्चा है गरम हियाँ
बोलेन हम सुकुल राम चंदर के आगे सब कुछ नरम मियाँ

फिरि पूछिन कौन वायरस ते ज्यादा रिसर्च मा टाप किहिस
हम चट्ट बताएन तुलसी का जिनके आगे वहु पादि दिहिस

यहि बिकट आपदा ते तगड़ी है कौन महामारी बचुवा
हम कहेन कि 'नाहिन मरब हियाँ दुनियां मर जाय भले चचुआ'

कहिते डेराति है मनई सबु अब साँचु बताओ जल्दी ते
बदला लै लेई मरतुलहा बसि मारि गिराओ बल्दी ते

आखिरी सवाल बताओ अब कहिके कलंक पर बिंदी है
हे जच्छ चंद ! हे महामंद ! मूरखानंद यह हिंदी है ।

© शैलेन्द्र कुमार शुक्ल





संपादक परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू ~ बीए , तृतीय वर्ष}
संपर्क :-
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मो.नं. : 8429249326

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