Sunday, 7 February 2021

हमारा समय हमारी कविता By स्वप्निल श्रीवास्तव || जनपक्षधर और लोक जीवन-राग की कविताएं : कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव By डॉ.अवनीश मिश्र | मुक्तिपथ

हमारा समय हमारी कविता By स्वप्निल श्रीवास्तव || जनपक्षधर और लोक जीवन-राग की कविताएं : कवि  स्वाप्निल श्रीवास्तव By डॉ.अवनीश मिश्र



https://youtu.be/PD7WfDD2BOo

 वक्ता-परिचय

कवि : स्वप्निल श्रीवास्तव


जन्म : 5 अक्तूबर 1954, मेहनौना, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश


भाषा : हिंदी


विधाएँ : कविता, कहानी, यात्रा संस्मरण


मुख्य कृतियाँ


कविता संग्रह : ईश्‍वर एक लाठी है, ताख पर दियासलाई, मुझे दूसरी पृथ्‍वी चाहिए, जिंदगी का मुकदमा, जब तक है जीवन


 


सम्मान


भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार,  फिराक सम्‍मान 


संपर्क


510, अवधपूरी कालोनी, अमानीगंज, फैजाबाद – 224001



*नोट 💐👌👏

जनपक्षधर और लोक जीवन-राग की कविताएं : कवि  स्वाप्निल श्रीवास्तव


('हमारा समय हमारी कविता' शृंखला में इस बार के आमन्त्रित कवि हैं श्री स्वप्निल श्रीवास्तव। वे 31 जनवरी को शाम 4 बजे से 'मुक्तिपथ' पर अपनी कविताओं का पाठ और बातचीत करेंगे। इस अवसर पर यह आलेख युवा अध्येता डॉ.अवनीश मिश्र ने लिखा है। वे कविता की वस्तुनिष्ठ आलोचना करते हैं। डॉ. मिश्र इन दिनों केंद्रीय विद्यालय में अध्यापन करते हैं। इस अवसर पर लिखे गए इस लेख के लिए हम उनके प्रति आभारी हैं।)


समकालीन हिन्दी कविता में स्वाप्निल श्रीवास्तव नवें दशक के एक  सशक्त हस्ताक्षर कवि हैं। जिनकी कविताएं अपने समकाल के महत्त्वपूर्ण सवालों से व्यापक सरोकार रखतीं हैं। वे बराबर एक वैचारिक हस्तक्षेप व प्रतिरोध करती दिखाई देती हैं। उसके साथ ही लोक जीवन व जगत से भी कवि का गहरा संबंध परिलक्षित होता है।कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव के अब तक कविता के पाँच संग्रह : "ईश्‍वर एक लाठी है, ताख पर दियासलाई, मुझे दूसरी पृथ्‍वी चाहिए, जिंदगी का मुकदमा, जब तक है जीवन" प्रकाशित हो चुके हैं। 

स्वाप्निल श्रीवास्तव का काव्य संसार विविधताओं और बहुरंगी छटा से भरा है। उनकी कविताओं की अंतर्वस्तु में आया लोक, जीवन से नाभिनालबद्ध है, वे वहीं से अपनी रचनाओं के लिए उपजीव्य ग्रहण करते हैं। उसकी ग्राह्यता अपने परिवेश से समाविष्ट होकर उद्बुद्ध होती है। स्वाप्निल का समय लोक से शिष्ट में संक्रमण का समय है। आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता का और पत्राचार से यातायात व संचार का समय है। सत्ता और साम्प्रदायिक शक्तियों के उभार व गठबंधन का समय है। जनांदोलनों के उभार का समय है। उस समय एक कवि छोटे से शहर में जिन्दगी के दोराहे पर खड़े आम आदमी की पीड़ा, अपने समय में हो रहे षडयंत्र के प्रति सचेत दृष्टिकोण, किसान जीवन, सुमधुर आत्मीय लोक, जीवन राग और प्रेम के उल्लासपूर्ण भावों से भरा संवेनात्मक सृजन करता है। उनकी कविता में बहुत सी खिड़कियां हैं, किसी भी खिड़की से प्रवेश करने पर आपको निराशा हाथ नहीं लगेगी।  बुध्द की धरती पर पैदा हुए कवि स्वाप्निल की कविताओं में लोक और जीवन का एक देशज राग बजता है। वे जीवन को आस्तिक दृष्टिकोण से देखने वाले आस्थावादी कवि हैं। उनके यहाँ बुध्द और कबीर जैसे एकमेव हो गये हों।किसी भी परिवार की इकाई पति-पत्नी और माता पिता किस तरह आपसी समझदारी से एक मकान को घर में रुपान्तरित कर देते हैं। जीवन के ताने बाने को वे अपने श्रम, त्याग व समर्पण से सिरजते हैं। अस्तु -ताना बाना~


"माँ एक करघा थी

जिस पर हम बच्चों को

बुना गया था

पिता कबीर के पद थे

जिसे अन्तरँग क्षणों में

गाया करती थी माँ

उसके गाने से खिलते थे

कपास के फूल

पवित्र होते थे सफ़ेद रँग

माँ ताना थी तो पिता थे बाना

दोनों बुनने का काम करते थे।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव के कवि व्यक्तित्व का निर्माण और वैचारिक भावभूमि की तलाश सन् 75 के भारतीय आपातकाल के आस पास से शुरु होती है। यही वह समय है जब इस देश के भीतर की सामाजिक व राजनीतिक स्थितियों में तेजी से परिवर्तन घटित हो रहा था। भारत की आम जनता में आजादी के मोहभंग से उपजी हुई निराशा ने आपातकाल के बाद उसे तोड़कर रख दिया था। राजनीतिक रुप से यह अलोकतांत्रिक और अराजक किस्म का समय था। इस दौर में आम आदमी की व्यापक अनदेखी हुई। समाज से बहुत सारे नैतिक मान मूल्यों तिरोहित हो रहे थे जिससे मनुष्य और मनुष्य के बीच में भेद कर पाना मुश्किल था। सांमती शक्तियां अपने ताकतवर रुप में उपस्थित हैं और फिलहाल उनके खिलाफ हवा का रुख भी नहीं था। यह ऐसा समय था कि गहन नैराश्य के स्याह में डूबी हुई आम जनता में भय ,आशंका व अविश्वास घर कर गया था। यहाँ कवि कविता के कथ्य से अपने पुरखे कवि मुक्तिबोध से जुड़ता हुआ दिखाई देता है। मसलन-'यह एक ऐसा समय था'~


"अजीब सा समय था

कोई किसी से बोलता नहीं था

न इशारे से बात करता था

उन्हें डर था कि उन्हें देखा जा रहा है

जगह–जगह जासूसी कैमरे छिपा

दिये गये थे

हवाओं की तरह आसपास

मुखविर थे

जो बोलने के लिये विख्यात थे

उन्होंने मुखौटे पहन लिये थे

लिखने वालों ने कलमदान को अपनी

कलम सौंप दी थी

स्याही बनाने वालों ने किसी दूसरे पेशे

का चुनाव कर लिया था

आदेश न मानने वालों को एकांतवास

में भेज दिया गया था

यह एक ऐसा समय था जब हमें

अपने सांसो से भय लगने

लगा था ।" 


या - हमलावर ~


"जिन हमलावरों ने उसकी हत्या की थी

वे उसकी अन्तिम यात्रा में शामिल थे

हत्यारों को जानती थी पुलिस

वे राजनेताओं के क़रीब थे

नगर के लोग उनसे परिचित थे

उनके दुस्साहस के सामने छोटा था

लोगों का साहस

जो हत्यारों के ख़िलाफ़ बोलता था

वह मारा जाता था।"


आपातकाल से लेकर उत्तर आपातकाल के दौर तक का समय रचनात्मकता व लेखन के लिए सबसे कठिन समय था। कवि इस तरह के कुचक्रों और शोषणकारी षडयंत्रों को भलीभाँति पहचानता है। कवि स्वाप्निल अपने नाम के बरक्स यथार्थ के हर रेशे को उघाड़कर उसके भीतर से कालिमा को पहचानने वाले कवि हैं। इस स्याह समय में हत्या, आत्महत्या और मौत में फ़र्क करना बहुत दुश्कर है। रात के अंधेरे में किस तरह हत्याकांड को एक स्वाभाविक मृत्यु में तब्दील कर दिया जा रहा है। लेकिन हत्या सिर्फ हत्या को बढ़ावा देती है और हत्यारे की नियति भी उसे हत्या की तरफ ले जाती है। यह हमारे समय और समाज की सबसे बड़ी विडंबना है कि हत्यारे खुलेआम घूम रहें हैं और हत्या और गायब हो जाने वाले लोगों पर किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। इस तरह का हत्यारा मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय और राजेश जोशी की भी कविताओं में आता है। बहरहाल, समय भले ही और कठिन हो गया हो परन्तु हत्या के तरीके और ज्यादा आसान हो चले हैं।  यथा -फ़र्क कविता में देंखें।


"बहुत-सी मौतें हत्या की तरह होती है

उसे हम अन्त तक नही जान पाते

आदमी की मृत्यु स्वाभाविक दिखती है

यह पता नही चलता उसे कितने सलीके से

मारा गया है

उसकी मृत्यु सिर्फ़ मृत्यु दिखाई देती है ।

कुछ दिनो बाद लोग हत्या और मृत्यु का फ़र्क

भूल जाते है ।

इतिहास में ऐसी बहुत सी मौतें दर्ज हैं

जो वास्तव में हत्याएँ हैं ।

जो हत्याएँ करते हैं उन्हें भी मार दिया

जाता है ।"


  या  'गायब होने वाले आदमी के बारे में।'


"वह बाज़ार को बहुत ध्यान से देख रहा था

जैसे अपने घोंसले के लिए कोई जगह

खोज रहा हो

वह चिड़िया नहीं आदमी था, शायद वह

यहाँ बसना चाहता हो

विडम्बना देखिए, वह बसने के पहले ही

उजड़ गया।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव वस्तुतः किसान जीवन चेतना, किसानी सभ्यता और लोक जीवन के अप्रतिम कवि हैं, जहाँ पर उनकी कविता की जड़ें गहरे पैबस्त हैं। उनकी कविता में मां की बोरसी की आग भी है और कछार के किनारे बगुले भी हैं, आम की गुठली भी है और परिंदे व बारिश भी है, अपने पुरखे किसानों के पगचिह्न भी है तो लाठी भी है; जो उनकी कविता के वृहत्तर आयाम को द्योतित करती है। कविता के भीतर इस विस्तृत फ़लक का प्रकटीकरण उस संस्कृति में गहराई तक धँसें बिना संभव नहीं है। उनकी कविता का भूगोल ही असल रुप से कवि का वास्तविक संसार है। मसलन गेंहूँ कविता~


"गेंहूं  के  पौधे  .घुघरूं   की  तरह 

बजते  हैं तो  मुझे  याद  आती  है

खलिहान  में  चलती  हुई  माँ


मां  कहती  थी  -गेंहूं  सबसे  स्वादिष्ट

अनाज  है 

शंख  की  तरह  सुघड़  दाने  मां  को 

पसंद  थे


रोटी  का  स्वाद खेत  से  शुरू होता  है

जब  वह  नही  पहुंच  पाता  है 

भूखे  आदमी  के  मुंह  तक  

तब  भूखा  आदमी  भूकम्प  की  तरह

पूरे  ग्लोब  पर  उठता  है 

और  सारी  चीजें  उसके  इशारे  पर 

नाचने  लगती  है।"


स्वाप्निल जी की कविताओं में बहुआयामी तेवर है। उनकी कविताएं जितनी अपनी संवेदना और शिल्प में सरल व सहज दिखाई देती हैं, अपनी अर्थवत्ता में वे उतनी ही बेधक हैं। भावबोध और वैचारिकी में उनकी कविताओं का पक्ष और मानी स्पष्ट है। पश्चिमी साहित्यकारों की तरह उनके यहाँ भी आत्मीय प्रेम और जीवन संघर्ष का रुपक साथ साथ चलते दिखाई देतें हैं। उनकी कविताएं प्रेम, स्नेह और आकांक्षा से उत्पन्न होती है और दुःख, जिज्ञासा और संघर्ष में और भी खिलती व निखरती चली जातीं हैं। हर तरह के राग-द्वेष, कुंठा और तृष्णा जैसे भाव तिरोहित हो जाते हैं, इसी से निखरता है जीवन और इसी जीवन की अभिव्यक्ति है कविता। जनपक्षधरता और गहन भाव संवेदना में उनकी कविताएं अपने समकालीन परम्परा के दो कवियों राजेश जोशी और अरुण कमल से मिलती हैं। वसंत का उल्लसित भाव कवि के मिज़ाज का परिचायक है, जिसे उसके स्वभाव से अलग नहीं किया जा सकता। उदास मौसमों के खिलाफ वह और निडर व उत्साहित हो उठता है। उनके यहाँ वसंत क्रांति का प्रतीक है।

बकौल - स्वाप्निल श्रीवास्तव - वसंत आएगा~


"वसन्त आएगा इस वीरान जंगल में जहाँ

वनस्पतियों को सिर उठाने के ज़ुर्म में

पूरा जंगल आग को सौंप दिया गया था

वसन्त आएगा दबे पाँव हमारे-तुम्हारे बीच

सम्वाद कायम करेगा उदास-उदास मौसम में

बिजली की तरह हँसी फेंक कर वसन्त

सिखाएगा हमें अधिकार से जीना।"


स्वाप्निल अपनी कविता में कल्पना के उड़ान बनिस्बत यर्थाथ की ठोस भूमि पर विचरण करते हैं जिससे कवि का अपनी जड़ों से उसका जैविक व भौतिक संबंध बना रहे।स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं में भूमंडलीकरण और बाजारवाद के बढ़ते प्रसार व बिकने की चिंताएं भी हैं और गांवों से विस्थापित लोगों का दर्द भी है। साथ ही मनुष्यता के बिकने की वाज़िब चिंतना भी। मनुष्य अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की नियति का मारा है। भौतिकवादी लोलुपता उसे कहीं भी सूकून नहीं दे सकती है। जब तक वह अपनी इन्द्रियों पर विजय नहीं पा लेता। ऐसे में उसे कांक्रीट के जंगलों और बाज़ारवाद के व्यामोह से दूर रहना होगा, अन्यथा परिणाम सामने है।

 जैसे- विस्थापन~


"जो गाँव में रहते हैं 

वे नगर में जाने के लिए बेचैन हैं 

नगर के नागरिक 

महानगर में बसने के लिए हैं लालायित 

छोटी जगह पर अब कोई नहीं चाहता रहना 

सबको चाहिए बड़ी जगह 

ज़मीन पर रहने के लिए कोई राज़ी नहीं है।"


या- बिकना ~ 


"जो कभी नहीं बिके थे

वे इस बार के बाज़ार में बिक गए

सौदागर ने उनकी जो क़ीमत मुकर्रर की

वह उनकी औक़ात से ज़्दाया थी

इसलिए वे ख़ुशी- ख़ुशी बिक गए

इस ख़रीद- फरोख़्त में दलालों ने

ख़ूब माल और शोहरत कमाई

अपनी सात पुश्तों का इन्तज़ाम

कर लिया।"


कवि स्वाप्निल जी के यहाँ संबंधों के निर्वाह, मिलन की इच्छा और दरवाजे पर किसी आगन्तुक के आने का दस्तक भी है और स्मृतियों का एक भरा पूरा संसार भी है। ईश्वर एक लाठी है,खरीदारी, विस्थापन, लेटरबाक्स, तितलियां,नंगे लोग, हँसना, बंदूक, मलबे,दस्तक, बुनकर स्त्रियाँ और प्रूफरीडर आदि कविताएं कवि के भौगोलिक विस्तार और भाव प्रसार की परिचायक हैं। मनुष्य जीवन की बहुत सारी उत्पत्तियाँ व आविष्कार उसके दिमाग की उपज है। क्योंकि दिल और दिमाग से बहुत सारे काम किये जाते हैं। चुनांचे कवि दिमाग को उत्तम विचारों की जगह मानता है न कि कूड़ेदान। इस माने में उनकी कविता बराबर एक वैचारिक हस्तक्षेप की मांग करती हैं। यथा- सही जगह~


"कूड़ा रखने की सही जगह कूड़ेदान है 

अतः इसे दिमाग़ में मत रखिए 

दिमाग़ उत्तम विचार रखने के लिए बने हैं 

खूटियाँ कपड़े टाँगने के लिए बनी हैं 

इस पर ख़ुद को टाँगने की कोशिश मत करिए 

इसी तरह रहने की निर्धारित जगह घर है 

अन्य जगहों पर मत करिए यक़ीन 

अन्यथा दर-ब-दर होने के ख़तरे बढ़ सकते हैं।"


सन् नब्बे के बाद आर्थिक उदारीकरण और सन् 92 में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना को उस समय के हर रचनाकार ने किसी न किसी रुप में अपनी अभिव्यक्ति दी है। कुँवर नारायण, राजेश जोशी और बाद के कवि अदनान कफील दरवेश ने उस पर बेहतर कविताएं लिखीं और रचीं हैं। ईश्वर जब व्यक्तिगत आस्था का विषय हो गया हो तो धर्म के ठेकेदार पैगम्बर व रहनुमाओं के वेश में जनता को दिग्भ्रमित करने और बरगलाने लगते हैं। कवि स्वाप्निल भी उस घटना से अछूते नहीं रहे, वे भी धर्म की आड़ में चलने वाले इस साम्प्रदायिकता की आग को बखूबी पहचानते हैं। हत्या और जादू जैसे शब्द उनकी कविता में बारहा आते हैं, इस विरोधाभास व तनाव से कविता के तत्वों की अर्थवत्ता और बढ़ जाती है। समाज से सत्य, विनम्रता, नैतिकता, आदर्श जैसे मानवीय मूल्य सब गिर गयें हैं। चारो ओर सिर्फ झूठ का बोलबाला है। ऐसे समय में उनकी कविताएं हमें आश्वस्त करती प्रतीत होती हैं। 

 मसलन- झूठा आदमी~


"झूठा आदमी इतने यकीन के साथ झूठ बोलता है

कि हम उसे सच समझने की गलती करने

लग जाते हैं

वह हमारी बुद्धि हर लेता है

और हमें अपने अनुकूल बना लेता है

झूठा आदमी एक जादूगर की तरह

चमत्कार दिखाता है।"


या- नई खोज कविता देखें।~


"उसने सत्य और अहिंसा की जगह

लोगों के हाथ में त्रिशूल और तलवार

थमा दिया और कहा - तुम्हें एक

धर्मयुद्ध लड़ना है

बचोगे तो जनता तुम्हें अपना

नायक मान लेगी

शहीद हो जाओगे तो तुम्हारे लिए

स्वर्ग के दरवाजे खुल जाएँगे

नए तथ्य बताते हैं कि यह

पागलपन का दौर है

जो सच बोलेगा उसे मार दिया जाएगा।"


सत्ता और साम्प्रदायिकता का जब आपस में गठजोड़ हो जाता है तो समय और समाज का चेहरा विकृत और भयावह हो जाता है। साधारण मनुष्य इसमें घुटने और पिसने को विवश है। उसकी नियति में सिर्फ़ संघर्ष और जद्दोजहद की असंख्य रोड़े हैं। चुनांचे कवि अपने लिए दूसरी पृथ्वी की तलाश में है, जहाँ फ़कत मनुष्य रहते हों और मनुष्यता ही वहाँ का मजहब हो। उनकी कविताएं इस बात तस्दीक़ करती व विश्वास दिलाती हैं और साथ ही हमें आगाह भी करती हैं। द्रष्टव्य- विनम्रता ~


"मैं मनुष्य होना चाहता हूं

और वे मुझे मनुष्यहीन बनाना चाहते हैं

इस आदमखोर समय में लोग एक दूसरे को

भक्ष रहे हैं

क्या हम किसी जंगल में आ गये हैं ?"


यथा- रहनुमा ~ 


"वे हमारे लिये भूख का इलाज नहीं

मजहबी किताबें लेकर आये थे

और कहा था कि मजहब और खुदा

तुम्हारे सारे दुख दूर कर देंगे

धीरे – धीरे टिड्डी दल की तरह

हमारे इलाके में फैल गये

उन्होंने हमारे खेत नहीं हमारे

दिमाग को ढँक लिया था

हम अनाज बोने की तरकीब भूल कर

खेत में मजहब उगाने लगे

यह समझ हमें बहुत दिनों बाद

आयी कि जिन लोगों ने हमे लूटा था

वे हमारे ही रहनुमा थे."


आठवें नवें दशक की कविता में लोक का भाव संसार कवियों का प्रिय क्षेत्र बन गया था। ज्ञानेन्द्रपति, लीलधर मंडलोई, मदन कश्यप, अष्टभुजा शुक्ल, श्रीप्रकाश शुक्ल, एकांत श्रीवास्तव और स्वाप्निल श्रीवास्तव जैसे कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से पुनश्च लोक की महत्ता को स्थापित किया। कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविता का मुख्य स्वर उनका अपना लोक संसार है। जहाँ कवि का भावुक मन स्वच्छंद विचरण करता है। लोक उनकी कविता का स्थायी भाव है। हालांकि अब लोक तक शहर,सड़क और बाजार की पहुंच बढ़ती जा रही है। गाँव भी अब ग्लोबल में तब्दील होते जा रहे हैं।  महानगरों के बरक्स छोटे शहरों व कस्बो में रहते हुए कवि ने गाँव और शहर के जीवन को एक साथ साधा है और साथ ही उनके यहाँ प्रकृति और मनुष्य की वाज़िब चिन्ताएं भी हैं। 

जैसे- परिन्दे कम होते जा रहे हैं~


"परिंदे कम होते जा रहे हैं

शहरों में तो पहले नहीं थे

अब गाँवों की यह हालत है कि

जो परिंदे महीने भर पहले

पेड़ों पर दिखाई देते थे

वे अब स्वप्न में भी नही दिखाई देते

सारे जंगल झुरमुट

उजड़ते जा रहे हैं

कहाँ रहेंगे परिंदे

शिकारी के लिए और भी सुविधा है

वे विरल जंगलों में परिंदों को

खोज लेते हैं।"


जैसे - गुठली ~ 


"यह गुठली नही क्रांतिबीज है

जिसमें वृक्षों की अनेकानेक संततियाँ

जन्म लेने के लिए बेचैन हैं

इसके भीतर

वृक्षों की दुनिया को कोलाहल से भरनेवाले

परिंदे छिपे हुए हुए हैं।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं में प्रेम के स्वाप्निल लोक संसार के कई तहें हैं, जो उनकी गहन ऐन्द्रीकता की तासीर का पता देती है। उनके यहाँ प्रेम के उदात्त व सात्विक रुप हैं। और उनके उदाहरण भी जीवन जगह की रोजमर्रा से होकर आते हैं। यह निरा वायवीय नहीं बल्कि दुनियावी प्रेम है, जो भौतिकता के बाह्याडंबर से कोसों दूर है। उनके यहाँ दोनों तरफ का प्रेम एक रुपक की तरह है। जैसे दरवाजे और खिड़कियां एक दूसरे की पूरक हैं। उनकी ही तीन कविताओं के मार्फ़त यह बात और स्पष्ट होगी। उनकी कविता में प्रकृति और प्रेम की ऐहिकता का एक अद्भुत संयोग है, जो एक दूसरे में अनुस्यूत है। जैसे नदी में नाव, बाँसुरी में साँस और सुई में धागा एक दूसरे के बिना अधूरे हैं वैसे ही प्रेम के बिना मनुष्य जीवन। प्रेम के लिए नदी का नाव से संबंध इसका सबसे मुफीद व मौज़ू उदाहरण है। 

यथा- भवसागर ~


"जिस नांव को तुम मझधार में

छोड़ कर चली गयी थी

उसे किनारे तक लाने में काफी

समय लगा

कभी नदी में आ जाती थी बाढ़

कभी तूफान का सामना करना

पड़ता था

कभी नदी में इतना कम पानी

हो जाता था कि ठहर जाती थी नांव

मुझे बारिश का इंतजार करना

पड़ता था"


या - जैसे - बाँसुरी~


"मैं बाँस का एक टुकड़ा था

तुमने मुझे यातना दे कर

बाँसुरी बनाया

मैं तुम्हारे आनंद के लिए

बजता रहा

फिर रख दिया जाता रहा

घर के अँधेरे कोने में

जब तुम्हें खुश होना होता था

तुम मुझे बजाते थे

मेरे रोम रोम में पिघलती थीं

तुम्हारी साँसें

मैं दर्द से भर जाया करता था

तुमने मुझे बाँस के कोठ से

अलग किया

अपने ओठों से लगाया

मैं इस पीड़ा को भूल गया कि

मेरे अंदर कितने छेद हैं"


जैसे- कमीज़ ~


"आज आलमारी से मैंने

तुम्हारे पसंद की कमीज निकाली

उसके सारे बटन टूटे हुए थे

तुमने न जाने कहाँ रख दिया

मेरी जिंदगी का सुई धागा

बिना बटन की कमीज

जैसे बिना दाँत का कोई आदमी"


समय और युग में परिवर्तन के साथ मनुष्य और ईश्वर के बीच के संबंधों में भी परिवर्तन अवश्यसंभावी था। ईश्वर अब व्यक्तिगत आस्था के विषय के साथ जो प्रत्यक्ष था, उसे ही उसके स्थानापन्न के रुप में स्वीकार किया। यहाँ किसी अपरोक्ष या मनुष्येत्तर सत्ता के लिए अवकाश न रह गया था। स्वाप्निल की कविताओं में ईश्वर जीवन के साथ लगा हुआ साहचर्य के रुप में आता है। अगरचे जीवन का फ़लसफा इतना आसान नहीं है, कि एक टेक भर से उसे जिया जा सके। अलबत्ता एक लाठी ईश्वर के मानिन्द उसके यहाँ भी मौजूद है। द्रष्टव्य- ईश्वर एक लाठी है।~


"ईश्वर एक लाठी है जिसके

सहारे अब तक चल रहे हैं पिता

मैं जानता हूँ कहाँ कहाँ दरक गई है

उनकी कमजोर लाठी

रात को जब सोते हैं पिता उनके

लाठी के अंदर चालते हैं घुन

वे उनकी नींद में चले जाते हैं।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं का शिल्प,अंतर्वस्तु अनुरूप ऊपर से सहल और सरल तो दिखाई देती हैं,परन्तु उसके भीतर एक हाहाकार और उष्णता है। वह जटिलता और दुर्बोधता के आवरण से मुक्त लेकिन निरा सपाटबयानी से अलग एक आंतरिक लय को आत्मसात करके चलती है। जहाँ शिल्प का आवरण कमजोर है वहाँ उनकी कविताएं आश्वस्त करती हैं। कवि स्वाप्निल का ध्यान शिल्प के चमत्कार से ज्यादा कविताओं के अंतर्वस्तु पर टिका है। लोक के बदलते स्वरूप व भाव के अनुसार उनकी भाषा है। उनकी भाषा में खड़ीबोली हिन्दी के साथ ही अवधी और भोजपुरी के भी शब्दों का मेल है। गुठली, लाठी,घुन, कमीज, दरक, ताख, कोठ, दियासलाई,झुरमुट, मझधार, ठहरना,खूँटी, कलमदान इत्यादि जैसे शब्द लोक से होकर आते हैं, जो उनकी कविता में स्वाभाविक रुप से समाहित हो जाते हैं,जिससे उनकी कविता को दूर से ही बिना कवि का नाम लिए पहचाना जा सकता है। प्रतीक ,बिम्ब और मुहावरे उनकी कविता का नैसर्गिक रुप हैं जैसे लाठी को ईश्वर के प्रतीक के रुप में प्रयोग और 'बिना बटन की कमीज जैसे बिना दाँत का कोई आदमी' का उपमान भी द्रष्टव्य है। स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं का आस्वाद में लोक का गहरा बयान है। जो कविता के माँग के अनुरूप है। जैसे गमछा के अनुरूप उनकी कविताओं के गंध को भी दूर से पहचाना जा सकता है। जैसे-गमछा~


"फसलें कट चुकी हैं

किसी मजूर का पसीने से

तरबतर गमछा यहाँ

छूटा हुआ है

उसका लड़का ढूँढ़ते हुए

यहाँ आएगा

पसीने की गंध से

पहचान जाएगा कि यह

उसके बाप का गमछा है"


बहरहाल, कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताएं अपने समय समकाल को उद्घाटित करती चलती हैं। वे लोक से संबंध्द होकर समाज और परिवेश से गहराई से जुड़ती हैं। उनकी कविताएं मनुष्यता की पैरोकार हैं और यह हमारे समय के लिए आश्वस्तिकारक है कि जब प्रकृति,लोक और मनुष्य के ऐहिक संबंध को बचाना सबसे जरुरी है,ऐसे में कविता ही इसमें अपनी मौजूदगी से सार्थक हस्तक्षेप कर सकती है। जब समाज को बर्बर और क्रूर होने से बचाना है और सत्ता व साम्प्रदायिकता की चिंगारी से उसे सुरक्षित रखना है तो ऐसे में कविता ही एकमात्र विकल्प है जो सत्ता का प्रत्याख्यान व प्रतिपक्ष रच सकती है। इस तरह स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताएं हमारे मौजूदा समय में मनुष्यता, लोक संवेदना और जनपक्षधर हकीकत का सार्थक बयान करती हैं।


                           डॉ.अवनीश मिश्र

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हिंदी विभाग , काशी हिंदू विश्वविद्यालय , वाराणसी।

Monday, 11 January 2021

रविशंकर उपाध्याय (12 जनवरी, 1985 - 19 मई, 2014) : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू

 


कवि परिचय : रविशंकर उपाध्याय (12 जनवरी, 1985 - 19 मई, 2014)

रविशंकर उपाध्याय का जन्म ग्राम अकोढ़ी, जिला कैमूर (बिहार) के एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ। इन्होंने प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा गाँव से प्राप्त की और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक और परास्नातक हुये। यहीं से कुँवर नारायण की कविताओं पर शोध किया और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 'अखिल भारतीय युवा कवि संगम’ का सफल आयोजनकर्ता रहे।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित। का.हि.वि.वि. के हिन्दी विभाग की पत्रिका 'सम्भावना’ के आरम्भिक तीन अंकों का सम्पादन तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सृजनशीलता पर केन्द्रित 'संवेद’ पत्रिका के फरवरी, 2013 अंक का अतिथि सम्पादन। निधन के बाद 'उम्मीद अब भी बाकी है' (कविता संग्रह) राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित।

युवा कवि रविशंकर उपाध्याय का 19 मई 2014 को बीएचयू अस्पताल में तीस वर्ष की अवस्था में ही ब्रेन हैमरेज से निधन हो गया था।

उनकी स्मृति में 'रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार’ क्रमशः  पहला पुरस्कार वर्ष 2015 में रांची की युवा कवयित्री जसिंता केरकेट्टा को ,दूसरा पुरस्कार  वर्ष 2016 में बलिया के अमृत सागर को,तीसरा पुरस्कार वर्ष 2017 में दिल्ली के निखिल आनंद गिरि को , चौथा पुरस्कार वर्ष 2018 बलिया  के अदनान कफ़ील दरवेश को , पांचवां  पुरस्कार सीतापुर के शैलेन्द्र कुमार शुक्ल को  , छठवाँ गोसाईंगंज(अम्बेडकर नगर) युवा कवि संदीप को और सातवाँ दिल्ली के गौरव भारती को दिया जा चुका है।

सम्मान समिति के सम्मानित सदस्य :-
कवि अरुण कमल(पटना), आलोचक अरुण होता (कोलकाता), कवि मदन कश्यप(दिल्ली),कथाकार अखिलेश(लखनऊ), और  कवि प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल(वाराणसी) ,वंशीधर उपाध्याय एवं अन्य।

आज रविशंकर की जन्मतिथि है. इस अवसर पर उन्हें याद करते हुए। आज उनकी एक कविता 'सम्भावना समूह' में प्रस्तुत है...

उम्मीद अब भी बाकी है

जब धुंधली होने लगती है
उम्मीद की किरण
जब टूटने लगता है आशा और विश्वास
तभी प्रकृति की अनंत दुनिया में से
आती है आश्वासन की एक आवाज
जो धीरे-धीरे भर देती है
एक ललक जीवन की उद्दाम आकांक्षाओं की

भय और विश्वास के बीच
जीतता सदैव विश्वास ही है
भले ही सीता को हर ले जाए रावण
भले ही भिक्षा में मांग ले जाए इंद्र कवच-कुंडल
भले ही कारागार में डाल दिए जाय देवकी और वासुदेव
भले ही अनसुनी कर दी जाए
नागासाकी और हिरोशिमा से उठती कराह…
भले ही मिट्टी में मिला दी जाए
करुणा और शांति की आदमकद प्रतिमाएं
भले ही बार-बार प्रहार करें
मनुष्यता के दुश्मन बनारस और लाहौर पर
भले ही न बख्शा जाए
घंटे की ध्वनि और अजान की आवाज
भले ही न बख्शी जाए
गंगा और जमुना की अजस्र धारा
भले ही न छोड़ी जाए
कोयल की कोकिल कंठी तान से मुलायम हो रही डाल
भले ही उजाड़ दिए जाएं
चिड़ियों के घोंसले

अपने वजूद और अपनी मिट्टी से
जुड़े लोगों को
उनकी आदिम आकांक्षाएं बचा ही लेंगी
जब तक बची रहेगी
पृथ्वी!


रविशंकर उपाध्याय की अन्य कविताएँ निम्न लिंक पर प्रस्तुत हैं...

https://golendragyan.blogspot.com/2020/12/drravishankar-upadhyaya.html


-गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू

मो.नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Wednesday, 23 December 2020

👁️दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए अनमोल ख़ज़ाना : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू 👁️

 

 👁️दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए अनमोल ख़ज़ाना : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू  



हिंदी साहित्य : विषय और वक्ता【लिंक पर क्लिक कर वीडियो डाउनलोड करें।】
तुलसी के राम :- प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह【आलोचक व आचार्य ~ जेएनयू】
लिंक : https://youtu.be/8K4WGoZELz4
1. महामारी में तुलसीदास :-  प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल 【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/I3u2XqxGhSA
2. भारतीय भक्ति काव्य :- प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय【आलोचक व  - जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/Nh7ButeWqCs
3. तुलसी की कविता और मनुष्य :- प्रोफेसर उमेश कुमार राय 【गौरी देवी राजकीय महिला महाविद्यालय- अलवर】
लिंक :- https://youtu.be/RZYnPHmZXVs
4. तुलसी की कविताई :- डॉक्टर मलखान सिंह 【जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/dM0ahhRkERg
5. वाल्मीकि रामायण का सामाजिक महत्त्व : - प्रोफेसर अवधेश प्रधान 【कवि , आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/_Lwc2eBOczY
6. निराला की कालजयी कृति “राम की शक्ति पूजा” :- प्रोफेसर प्रमोद कुमार सिंह【आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/p2GwRiqw-k8
7. निराला की राम की शक्ति पूजा :- प्रो. आशीष त्रिपाठी【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/uzo0Cq_pXzE
8. तुलसी के दलित सरोकार :-  प्रोफेसर श्रीभगवान सिंह【आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/rFN_z5--_2g
9. भारतीय संस्कृति और तुलसीदास :- प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित【आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/F0qlRqQcgms
10. तुलसीदास और आधुनिक कवि मन :- प्रोफेसर प्रभाकर सिंह【आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/XACje_o7vPc
11. तुलसीदास और क्वचिदन्यतोऽपि :- अष्टभुजा शुक्ल【कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/3J7MYMxQIAI
12. तुलसी के काव्य स्रोत :- प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी【संस्कृताचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/ZX56gsGpFhY
13. कलिकाल और रामराज्य :-  डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/HrBDLQK9kI4
14. लोक की सीता :- प्रोफेसर अवधेश प्रधान 【कवि , आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/ydZigMRxJn0
15. आदिकाल और भक्तिकाल (वर्चस्व बनाम प्रतिरोध की संस्कृति और साहित्य) :- प्रोफेसर चौथीराम यादव【लोकधर्मी आलोचक व आचार्या】
लिंक :- https://youtu.be/lxP9NDtxUs0
16. संत काव्य में लोक जागरण :- प्रोफेसर अशोक कुमार【आचार्य - पंजाब वि.वि.】
लिंक :- https://youtu.be/3IyfyiQ97aI
17. गोरखनाथ “धीरे धरिबा पाँव” :- प्रोफेसर सदानंद शाही【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/CqjqKhZZNko
18. हिंदी समाज और गोरखनाथ :- प्रोफेसर मनोज सिंह【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/3NnoVYQ7Nj4
19. हिन्दी साहित्य का आदिकाल कुछ उधेड़बुन :- प्रो. सदानंद शाही【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/kcjpjp43JwM
20. पद्मावत और जायसी :- प्रोफेसर रामबक्ष जाट【आचार्य – जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/vx9JFC3WS6k
21. सूरदास की कृष्ण कथा “भ्रमरगीत सार” :- प्रोफेसर रामबक्ष जाट【आचार्य – जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/me0rRMpo904
22. निराला का चिंतन परक साहित्य :- प्रोफेसर श्रद्धा सिंह【आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/dsSU2Wz13yE
23. “जायसी : एक पुनर्विचार” :- प्रोफेसर मनोज सिंह【आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/J75cJYjT0Sc
24. कबीर की कविताई :- प्रोफेसर के.के. सिंह【महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा】
लिंक :- https://youtu.be/DC3dfX8DCrI
25. हिंदी में कृष्ण काव्य परंपरा :- असि.प्रो. श्रीहरि त्रिपाठी【बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी】
लिंक :- https://youtu.be/xpmGNk37VDY
26. “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : पुंसवाद और धर्मनिरपेक्षता” :- प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी【आलोचक व आचार्य – कोलकाता विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/gw9flfexf68
27. प्यार और आलोचना के द्वंद्वात्मक संबंध के प्रतिक डॉ. नामवर सिंह :- प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
लिंक :- https://youtu.be/cN25mtoX-io
28. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास दृष्टि :- प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
लिंक :- https://youtu.be/35u48IxuSjY
29. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि :- प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी
लिंक :- https://youtu.be/UHq0qPaAM6k
30. स्त्री आत्मकथा के विविध पक्ष :- प्रोफेसर सुधा सिंह【आलोचक व आचार्य – दिल्ली विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/XT4-sbxcaGc 
31. स्त्री : संस्कृति और स्वाधीनता :- प्रोफेसर सुधा सिंह【दिल्ली विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/C4EOTniRufg
32. स्त्री संदर्भ में मेरी रचनाशीलता :- प्रोफेसर चंद्रकला त्रिपाठी【आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/4L6_y_i7M4o
33. कथा साहित्य का सृजन :- प्रोफेसर ममता कालिया【कवि व कथाकार】
लिंक :- https://youtu.be/bEqp6Y10jXM
34. प्रगतिशील आलोचना और रामचरितमानस :- प्रोफेसर सर्वेश सिंह【कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/S4Az-ExMob8
35. रीतिकाव्य : एक पुनर्विचार :- प्रोफेसर सर्वेश सिंह
लिंक :- https://youtu.be/sn5u5Mafm6E
36. नक्सलबाड़ी और कविता :- प्रोफेसर चंद्रेश्वर【कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/RENZeV_BZHk
37. रीतिकाव्य : पढ़ने के सूत्र :-  प्रोफेसर प्रभाकर सिंह【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/QCNhKa37VoU
38. हिंदी कविता और समकाल :- कवि मंगलेश डबराल
लिंक :- https://youtu.be/THlyHbrgrqY
39. भूमंडलीकरण और हिन्दी कविता :- प्रोफेसर अरुण होता【आलोचक व आचार्या】
लिंक :- https://youtu.be/jCaRsUrD_Io
40. कोरोजीवी कविता और श्रीप्रकाश शुक्ल :- अनिल कुमार पाण्डेय【युवा कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/GxILOrPzTH0
41. दलित स्त्री एवं दलित हिन्दी कविता :- डॉ.प्रियंका सोनकर【कवयित्री , असि.प्रो.- बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/-FX6qydSuPw
42. प्रेमचंद और आज का समय :- प्रोफेसर अजय तिवारी【आचार्य – दिल्ली वि.वि.】
लिंक :- https://youtu.be/28BXlcDhJXY
43. डॉक्टर नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि :- कवि राजेश जोशी
लिंक :- https://youtu.be/WUtKaF4ZHaM
44. अज्ञेय की कविताई :- प्रोफेसर अनंत मिश्र【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/WdxlQWntuwI
45. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की काव्य यात्रा :-  प्रोफेसर नरेंद्र मिश्र【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/YElgLr9AzE8
46. नयी कहानी आन्दोलन और फणीश्वरनाथ रेणु :- प्रोफेसर नीरज खरे【कवि ,आलोचक व आचार्य-बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/1AVo5YVSpPc
47. प्रेमचंद : कल ,आज और कल :- प्रोफेसर विनय कुमार【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :-भाग-1 -  https://youtu.be/GdaeC7qUKgE ,2-  https://youtu.be/GkQ659rzn04
48. छायावादी कविता में मुक्ति का स्वर :-  प्रोफेसर चंद्रदेव यादव【कवि , आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/vkz-1qGKkiw
49. मनुष्य प्रकृति और साहित्य :- प्रोफेसर सुरेंद्र दुबे【आलोचक , आचार्य व  कुलपति - सिद्धार्थ विश्वविद्यालय , कपिलवस्तु , सिद्धार्थनगर】
लिंक :- https://youtu.be/iYMKxHkCrFw
50. भारतेंदु और उनका युग :- प्रोफेसर राजेश गर्ग【आलोचक व आचार्य – इलहाबाद वि.वि.】
लिंक :- https://youtu.be/fyrFXISCN8k
51. मुंशी प्रेमचंद का गोदान :- प्रोफेसर जितेंद्र श्रीवास्तव【कवि , आलोचक व आचार्य -इग्नू】
लिंक :- https://youtu.be/MlGFc1tYAy4
52. विद्यापति और स्त्री :- प्रोफेसर चंद्रदेव यादव【जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय , नयी दिल्ली】
लिंक :- https://youtu.be/zbvhmz-fB9E
53. विद्यापति की पदावली : स्त्री की नजर से :- प्रोफेसर पुनम कुमारी【जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/Zqw8xuW6Y_U
54. तारसप्तक , प्रयोगवाद और रामविलास शर्मा :-  प्रोफेसर सत्यपाल शर्मा【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/a8HvXPy1BaE
55. नवगीत आज की कविता :- डॉक्टर इंदीवर पाण्डेय【नवगीत के आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/CApoemR8ahY  ,     https://youtu.be/tnGhZ4BKCOI
56. लोक साहित्य (लोकगीत) :-  उदय पाल【शोधार्थी – बीएचयू , हिंदी विभाग】
लिंक :- https://youtu.be/ltpr5aWkkIw
57. बाबा नागार्जुन की कविता का सौंदर्य पक्ष :- अमरजीत राम【युवा कवि व असिस्टेंट प्रोफेसर】
लिंक :- https://youtu.be/uXuPmvsCPE0
58. हिंदी पत्रकारिता : तब और अब :- प्रोफेसर रामशरण जोशी 
लिंक :- https://youtu.be/GmpneMgXvDU
59. आदिवासी साहित्य में शोध की संभावनाएं :- डॉक्टर गंगा सहाय मीणा【असिस्टेंट प्रोफेसर – जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/Jpjz5aDqWKk
60. शोध प्रविधि में नवाचार :-  प्रोफेसर देवशंकर नवीन【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/xSz4f66n02g
61. अज्ञेय और मुक्तिबोध : प्रतिश्रुति के क्षेत्र :-  प्रोफेसर अनिल राय【आचार्य – दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/pprMVAgEeec

62. कोरोजीवी कविता : प्रक्रिया और पाठ :- प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल【कवि व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/BSor_9zVY-s
63. महामारी में मदन कश्यप :- कवि श्रीप्रकाश शुक्ल【आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/8ScfqJBOrmY
64. डॉक्टर राहत इंदौर साहब :- डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता【असिस्टेंट प्रोफेसर – इलहाबाद विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/tHVxRFcbF5A
65. अन्य विषयों के लिए यूट्यूब लिंक :- https://www.youtube.com/c/GolendraGyan


संकलन कर्ता :- युवा कवि गोलेन्द्र पटेल【स्नातक का छात्र , काशी हिंदू विश्वविद्यालय , वाराणसी】

परिचय :-
नाम :- गोलेन्द्र पटेल
जन्म :- ०५-०८-१९९९
शिक्षा :- बीएचयू में स्नातक का छात्र【हिंदी हॉनर्स , तृतीय वर्ष】
माता-पिता :- श्रीमती उत्तम देवी – श्री नन्दलाल
भाषा :- हिंदी
विधा :- कविता 
पता :- ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी ,जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत।
पिन कोड :- 221009
ह्वाट्सएप नं. :- 8429249326
ईमेल :- corojivi@gmail.com


नोट :- यह पीडीएफ नोटस् दृष्टिबाधित विद्यार्थी साथियों के कहने पर तैयार किया गया है। अतः आप से साहित्यिक सहृदय सविनय निवेदन है कि आप इसे दृष्टिबाधित एवं दिव्यांग विद्यार्थियों तक पहुंचने की कृपा करें। जिससे वे हिंदी भाषा व  साहित्य का अध्ययन-अनुशीलन करने में “उक्त वक्तव्य निधियों” का सहयोग ले सकें। 

दिव्यांग साथियों के अभिभावकों से अतिविनम्र निवेदन है कि आप निम्न लिंक पर क्लिक कर यूट्यूब चैनल , फेसबुक पेज और ब्लॉग पेज से जुड़ें। यहाँ अध्ययन के लिए बहुत सारी सामग्री उपलब्ध है और होता रहेगा। आप हमारे ह्वाट्सएप नंबर पर रविवार को संपर्क कर सकते हैं। संपर्क समय :- सुबह 8 बजे से 12 बजे तक।

यूट्यूब चैनल :-
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ब्लॉग पेज :-
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ह्वाट्सएप :- 8429249326
दिव्यांगसेवी
गोलेन्द्र पटेल
स्नातक का छात्र
काशी हिंदू विश्वविद्यालय , वाराणसी

Monday, 21 December 2020

नए वर्ष पर केंद्रित कविताओं का संकलन : नीरज कुमार मिश्र {©Neeraj Mishra} और गोलेन्द्र पटेल की कविताएं



नये साल पर केंद्रित गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ :-

1).

*नव वर्ष का नया राग*

वे देश को दुहने के लिए
प्रतिबद्ध हैं
संबद्ध हैं
आबद्ध हैं
मगर मैं प्रतीक्षास्तब्ध हूँ
कि
गर्द है, धुआँ है, सर्द है और
आग है
नव वर्ष का नया राग है
जहाँ पेड़ की फुनगियों पर
उम्मीदें कायम हैं
टूट, ओ पीड़ा के पर्ण
पतझड़
वसंत से पहले आया है

गम के ग्रीटिंग कार्ड में लिखीं नम आँखें
कि नदी, जंगल, पहाड़ और सागर 
सुनो, इस दौर में ठौर नहीं है
कौर नहीं है
घर-घर में घुप अँधेरा घूर्ण है 
पूर्ण मन चूर्ण है
यह ख़त अपूर्ण है

सूरज लुढ़क गया है
उम्र की ढलान पर और 
पृथ्वी डूब रही है
आसमान के संचित आँसू में
लेकिन
युवा उलट कर हो गया वायु
या यह कहूँ 
कि उसकी आत्मा का अव्यय 
वाह
वह हवा है 
जो सरहद के पार जाती है
शुभकामना लेकर!

2).

*नये साल का नया स्वर*

मैं चाहता हूँ
जीवन के वन में कोयल कूजे
हर घर में 
समरसता, सर्वधर्म और समभाव की वाणी गूँजे
मैं चाहता हूँ
हर कवि की कविता में
सरिता लोरी गाए
सागर संगीतबद्ध हो जाए
और धरती की धुन में सनी
आसमान की लय उतर आए
मैं चाहता हूँ
पेड़ फूले-फले
और पहाड़
आदमी के कद से ऊँचा रहे
मैं चाहता हूँ
भाषा में सूप भर धूप
और रूप अमर
सुंदर अक्षर
मैं चाहता हूँ
सृजन के शोर में 
नया साल का नया स्वर
मैं चाहता हूँ
खेतों में सूरज उगे
चेतना की चिड़िया 
दाना चुगे!

3).

*नव वर्ष का हर्ष संघर्ष है!*

जनवरी! दिसंबर को पता है
बीतना एक नयी मुबारकबाद का मुहावरा है

उम्मीद की उड़ान भरी हुई
चेतना की चिड़िया
आसुओं की नदी को पार 
करती हुई उसमें
अपना चेहरा देखती है

और देखती है सूरज
डूब रहा है
वह निर्निमेष निहारती है
पेड़ों के प्रतिबिंबों को
और महसूस करती है 
मछलियों का पहाड़-सा दुःख
लेकिन लहरों के कुछ लम्हे
धारदार स्मृति की पहचान है

गत और आगत के बीच तट पर
हरा-भरा है घाव
सागर के इस छोर से उस छोर तक
जीवन की नाव 
पीड़ा की पतवार से खेती हुई
मल्लाहिन
चक्कर लगा रही है
मछलियों की तलाश में 
हताश होकर
अपने अस्तित्व का अर्थ
जानना चाह रही है
भँवर बीच 
भीतर के जल से

जहाँ नीरव शून्यता में नव वर्ष का हर्ष 
असल में अवनि पर स्वप्न का संघर्ष है!

कवि : गोलेन्द्र पटेल
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

नए वर्ष पर केंद्रित कविताओं का संकलन : नीरज कुमार मिश्र

 

(१). नववर्ष - सोहनलाल द्विवेदी

 

"स्वागत! जीवन के नवल वर्ष

आओ, नूतन-निर्माण लिये,

इस महा जागरण के युग में

जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

दीनों दुखियों का त्राण लिये

मानवता का कल्याण लिये,

स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!

तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति

की ज्वालाओं के गान लिये,

मेरे भारत के लिये नई

प्रेरणा नया उत्थान लिये;

मुर्दा शरीर में नये प्राण

प्राणों में नव अरमान लिये,

स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!

तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

युग-युग तक पिसते आये

कृषकों को जीवन-दान लिये,

कंकाल-मात्र रह गये शेष

मजदूरों का नव त्राण लिये;

श्रमिकों का नव संगठन लिये,

पददलितों का उत्थान लिये;

स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!

तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के

मद का चिर-अवसान लिये,

दुर्बल को अभयदान,

भूखे को रोटी का सामान लिये;

जीवन में नूतन क्रान्ति

क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष

आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!"


(२).ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं-रामधारीसिंह दिनकर


"ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं

है अपनी ये तो रीत नहीं

है अपना ये व्यवहार नहीं

धरा ठिठुरती है सर्दी से

आकाश में कोहरा गहरा है

बाग़ बाज़ारों की सरहद पर

सर्द हवा का पहरा है

सूना है प्रकृति का आँगन

कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं

हर कोई है घर में दुबका हुआ

नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं

चंद मास अभी इंतज़ार करो

निज मन में तनिक विचार करो

नये साल नया कुछ हो तो सही

क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही

उल्लास मंद है जन -मन का

आयी है अभी बहार नहीं

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं

ये धुंध कुहासा छंटने दो

रातों का राज्य सिमटने दो

प्रकृति का रूप निखरने दो

फागुन का रंग बिखरने दो

प्रकृति दुल्हन का रूप धार

जब स्नेह – सुधा बरसायेगी

शस्य – श्यामला धरती माता

घर -घर खुशहाली लायेगी

तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि

नव वर्ष मनाया जायेगा

आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर

जय गान सुनाया जायेगा

युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध

नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध

आर्यों की कीर्ति सदा -सदा

नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

अनमोल विरासत के धनिकों को

चाहिये कोई उधार नहीं

ये नव वर्ष हमें  स्वीकार नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं

है अपनी ये तो रीत नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं।"


(३).फिर वर्ष नूतन आ गया -हरिवंशराय बच्चन

 

"फिर वर्ष नूतन आ गया!

सूने तमोमय पंथ पर,

अभ्यस्त मैं अब तक विचर,

नव वर्ष में मैं खोज करने को चलूँ क्यों पथ नया।

फिर वर्ष नूतन आ गया!

निश्चित अँधेरा तो हुआ,

सुख कम नहीं मुझको हुआ,

दुविधा मिटी, यह भी नियति की है नहीं कुछ कम दया।

फिर वर्ष नूतन आ गया!

दो-चार किरणें प्यार कीं,

मिलती रहें संसार की,

जिनके उजाले में लिखूँ मैं जिंदगी का मर्सिया।

फिर वर्ष नूतन आ गया!"


(४).नवल हर्षमय नवल वर्ष यह-सुमित्रानंदन पंत

 

"नवल हर्षमय नवल वर्ष यह,

कल की चिन्ता भूलो क्षण भर;

लाला के रँग की हाला भर

प्याला मदिर धरो अधरों पर!

फेन-वलय मृदु बाँह पुलकमय

स्वप्न पाश सी रहे कंठ में,

निष्ठुर गगन हमें जितने क्षण

प्रेयसि, जीवित धरे दया कर!"

 

(५).गए साल की - केदारनाथ अग्रवाल

 

"गए साल की

ठिठकी ठिठकी ठिठुरन

नए साल के

नए सूर्य ने तोड़ी।

देश-काल पर,

धूप-चढ़ गई,

हवा गरम हो फैली,

पौरुष के पेड़ों के पत्ते

चेतन चमके।

दर्पण-देही

दसों दिशाएँ

रंग-रूप की

दुनिया बिम्बित करतीं,

मानव-मन में

ज्योति-तरंगे उठतीं।"


(६).नए साल की शुभकामनाएं ! -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

 

"नए साल की शुभकामनाएँ!

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को

कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को

नए साल की शुभकामनाएं!

जाँते के गीतों को बैलों की चाल को

करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को

नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को

चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को

नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को

ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को

नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को

सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को

नए साल की शुभकामनाएँ!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को

हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को

नए साल की शुभकामनाएँ!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे

उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे

नए साल की शुभकामनाएँ!"


(७).साल मुबारक! -अमृता प्रीतम


"जैसे सोच की कंघी में से

एक दंदा टूट गया

जैसे समझ के कुर्ते का

एक चीथड़ा उड़ गया

जैसे आस्था की आँखों में

एक तिनका चुभ गया

नींद ने जैसे अपने हाथों में

सपने का जलता कोयला पकड़ लिया

नया साल कुझ ऐसे आया...

जैसे दिल के फ़िक़रे से

एक अक्षर बुझ गया

जैसे विश्वास के काग़ज़ पर

सियाही गिर गयी

जैसे समय के होंटो से

एक गहरी साँस निकल गयी

और आदमज़ात की आँखों में

जैसे एक आँसू भर आया

नया साल कुछ ऐसे आया...

जैसे इश्क़ की ज़बान पर

एक छाला उठ आया

सभ्यता की बाँहों में से

एक चूड़ी टूट गयी

इतिहास की अंगूठी में से

एक नीलम गिर गया

और जैसे धरती ने आसमान का

एक बड़ा उदास-सा ख़त पढ़ा

नया साल कुछ ऐसे आया..."

 

(८).नए साल का कार्ड -लीलाधर मंडलोई

 

"कितना अजीब है यह कार्ड कि बोलता नहीं-‘सब खैरियत है’

न केवल पेड़-पौधे

न केवल अरब सागर

गायब है धरती, अंतरिक्ष गायब

भाग रहे हैं तमाम पखेरू नये ठिकानों की फिक्र में

कोई ऐसी जगह नहीं

कि चिलकती हो माकूल जगह

सिर्फ गर्द है, धुआँ है, आग है और

और असंख्य छायाएँ छोड़तीं ठिकाने

वर्दियों से अटा कितना अजीब है यह कार्ड

कि बोलता नहीं-‘सब खैरियत है।"


(९).वर्ष नया -अजित कुमार


"कुछ देर अजब पानी बरसा ।

बिजली तड़पी, कौंधा लपका …

फिर घुटा-घुटा सा, घिरा-घिरा

हो गया गगन का उत्तर-पूरब तरफ़ सिरा ।

बादल जब पानी बरसाये

तो दिखते हैं जो,

वे सारे के सारे दृश्य नज़र आये ।

छप-छप,लप-लप,

टिप-टिप, दिप-दिप,-

ये भी क्या ध्वनियां होती हैं ॥

सड़कों पर जमा हुए पानी में यहां-वहां

बिजली के बल्बों की रोशनियां झांक-झांक

सौ-सौ खंडों में टूट-फूटकर रोती हैं।

यह बहुत देर तक हुआ किया …

फिर चुपके से मौसम बदला

तब धीरे से सबने देखा-

हर चीज़ धुली,

हर बात खुली सी लगती है

जैसे ही पानी निकल गया ।

यह जो आया है वर्ष नया-

वह इसी तरह से खुला हुआ ,

वह इसी तरह का धुला हुआ

बनकर छाये सबके मन में ,

लहराये सबके जीवन में ।

दे सकते हो ?

--दो यही दुआ ।"


(१०).नव वर्ष मंगलमय हो-अनिल करमेले


"यह उठते हुए नए साल की सुबह है

धुंध कोहरे और काँपती धरती की

अजीब स्तब्ध सनसनी में छटपटाती

सूरज भी जैसे मुँह छुपा रहा

बीते साल के रक्तिम सवालों से

चमक रहे हैं मक्कार चेहरे वैसे ही

वैसे ही जुटे हुए हैं

सभी किस्म के हत्यारे

करोड़ों बच्चे काम के रास्ते में हैं

उत्तर आधुनिक नरक में हैं करोड़ों स्त्रियाँ

एक बड़े व्यापारिक घराने

और उस पर लुढ़कते शेयर बाज़ार पर

औंधे मुँह पड़ा है मीडिया

और बिकती गवाहियों की

क्रुर मुस्कराहटों पर

हाय-हाय करता हुआ न्याय

मुआवज़े की कुछ नहीं जैसी राहत से

ज़हरीली साँसों को बमुश्किल थामे हुए

फिर तिनके जुटा रहे हैं

शहर के बाशिंदे

इस देश के सच्चे धार्मिक

फिर रोने-रोने को हैं

अधर्मियों की कारगुज़ारियों पर

फिर शुरू होने जा रही हैं

सियासी कलाबाजियाँ

मधुबालाओं और मीनाकुमारियों

की जूतियों की धूल

कई मल्लिकाएँ

अश्लील चुटकुलों की तरह

हमारे ड्राइंग रूम में

बरस रही हैं लगातार

कल जैसा ही हाहाकार है चहुँ ओर

कल जैसे ही दु:ख हैं और

आँखें हैं आँसू भरी-भरी

कल के असीम जश्न के बाद

यह नया साल है

जीवन है पेड़ हैं बच्चे हैं

उम्मीदें कायम हैं

अब का समय सुख का बीते

नए साल में यही मंगल कामनाएँ हैं।"


(११).नए साल की पहली नज़्म -परवीन शाकिर

 

"अंदेशों के दरवाज़ों पर

कोई निशान लगाता है

और रातों रात तमाम घरों पर

वही सियाही फिर जाती है

दुःख का शब-खूं रोज़ अधूरा रह जाता है

और शिनाख्त का लम्हा बीतता जाता है

मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत

तारीकी की चादर ओढ़े

रोशनी की आहट पर कान लगाये कब से बैठे हैं

घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं

हद्द-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाजों के रेशम से

अपनी रिदा-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं

अन्गुश्ताने इक-इक करके छलनी होने को आए

अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है

सुबह से पहले वो कटने से बच जाए तो।"

 

(१२).नई सुबह -कुँअर रवीन्द्र

 

"चलो,

पूरी रात प्रतीक्षा के बाद

फिर एक नई सुबह होगी

होगी न,

नई सुबह?

जब आदमियत नंगी नहीं होगी

नहीं सजेंगीं हथियारों की मंडिया

नहीं खोदी जायेगीं नई कब्रें

नहीं जलेंगीं नई चिताएँ

आदिम सोच, आदिम विचारों से

मिलेगी निजात

होगी न,

नई सुबह?

सब कुछ भूल कर

हम खड़े हैं

हथेलियों में सजाये

फूलों का बगीचा,

पूरी रात जाग कर

फिर एक नई सुबह के लिए

होगी न

नई सुबह?"


(१३).नया वर्ष- अनिल जनविजय

 

"नया वर्ष

संगीत की बहती नदी हो

गेहूँ की बाली दूध से भरी हो

अमरूद की टहनी फूलों से लदी हो

खेलते हुए बच्चों की किलकारी हो नया वर्ष

नया वर्ष

सुबह का उगता सूरज हो

हर्षोल्लास में चहकता पाखी

नन्हें बच्चों की पाठशाला हो

निराला-नागार्जुन की कविता

नया वर्ष

चकनाचूर होता हिमखण्ड हो

धरती पर जीवन अनन्त हो

रक्तस्नात भीषण दिनों के बाद

हर कोंपल, हर कली पर छाया वसन्त हो।"


(१४).नया साल उन बच्चों के नाम - रंजना भाटिया

 

"नया साल.....

उन बच्चो के नाम

जिनके पास

न ही है रोटी

न ही है ,

कोई खेल खिलोने

न ही कोई बुलाए

उन्हें प्यार से

न कोई सुनाये कहानी

पर बसे हैं ,

उनकी आंखों में कई सपने

माना कि अभी है

अभावों का बिछोना

और सिर्फ़ बातो का ओढ़ना

आसमन की छ्त है

और घर है धरती का एक कोना

पर ....

उनके नाम से बनेगी

अभी कागज पर

कुछ योजनायें

और साल के अंत में

वही कहेंगी

जल्द ही पूरी होंगी यह आशाएं ...

इसलिए ,उम्मीद की एक किरण पर .

नया साल उन बच्चो के नाम ........"

 

संकलन- नीरज कुमार मिश्र


संपादक परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल


उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान' , 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिंदी से नेट।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :


कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।


लम्बी कविता : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' एवं 'दुःख दर्शन'


अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।


मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर और 'दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान' के संस्थापक हैं।


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आत्मिक धन्यवाद!

"हरियाते बसंत में ज़हर" : नीरज कुमार मिश्र{©Neeraj Mishra}

 

     नीरज कुमार मिश्र

{युवा कवि व आलोचक}

 नीरज कुमार मिश्र  की कुछ कविताएँ :- 

1.

वायरस 


"पनपते हैं वायरस

प्रकृति और मानव मस्तिष्क में

वर्षों से

प्रकृति के ये वायरस सदियों में

आते हैं एक बार

और भरभरा जाती हैं 

विकास की इमारतें

चरमरा जाती हैं अर्थव्यवस्थाएं

धरे के धरे रह जाते हैं

अत्याधुनिक हथियार

जिन्हें युद्ध की विभीषिका में

जलते हुए विश्व ने

आपसी होड़ में विकसित किये थे

उन्होंने नहीं विकसित किये

चिकित्सा के उन्नत साधन

नहीं खड़े किये ऐसे अस्पताल

जो लड़ सकें इन वायरसों से

उन्होंने परमाणु बम बनाये

पर नहीं बनाये बहुत सारे वेंटिलेटर

जो टूटती साँसें थाम सकें

न उन्होंने बनाये ऐसे हथियार

जो मार सकें इन मृत्यु बीजों को

विश्व की विकसित ताकतों को

चिढ़ा रहे हैं ये वायरस 

हमें आगाह करते हैं

हमसे भी ज्यादा खतरनाक है

मानव- मस्तिष्क में

पनप रहा वायरस

जो किसी दवा से नहीं मरता।"


2.

कोई हाथ भी न मिलाएगा,

क्यों गले मिलो तपाक से,

ये नए कोरोना का शहर है

एक मीटर के फ़ासले से मिला करो।

रखो तन और मन की सफाई,

घर से निकलते हुए

मुँह में मास्क कसा करो।।

मत रखो चेहरे पे हाथ बार बार

अपने हाथ पर ही रखो ध्यान

हर जगह हर बार उसे धुला करो।

न आयेगा फिर कोरोना पास कभी

इसकी हो रही जाँच में 

सभी खुलकर मदद किया करो।।

न हो निकलना बहुत जरूरी

अपने काम घर में रहकर किया करो।

घर में रहना ही इससे बड़ा बचाव है

ये मंत्र सभी को दिया करो।।


3.
उदास दिन

" आज दिन
बहुत उदास है
बीमार बेटी लेटी है चुपचाप
उसकी आँखों के अनंत में
कहीं खो गया हूँ 
घर को बुहारती पत्नी
खाली बैठे देख 
कुछ बुदबुदा रही है
मन का खालीपन
घर के खालीपन से ज़्यादा
कचोटता है मन को
कई सवाल खड़े होकर
चिढ़ाते हैं 
अंदर कुछ टूट सा जाता है
जब घुल जाता है
हरियाते बसंत में ज़हर
अंदर के मुरझाये
उस बसंत से
सपने तितली बन
चले जाते हैं कहीं दूर
दुनियाँ की तमाम
बेटियों की आँखों में
उन तितलियों को 
वापस लाने की चाह में
अपने अंदर के खालीपन 
से लड़ रहा हूँ लगातार
घर के खाली कोने में।

4.

"इन फिज़ाओं में,
साज़िशों के खंज़र बहुत हैं।
इस शांति के शहर में,
हिंसा के मंजर बहुत हैं।।
है कौन सी मज़बूरी,
चुप हैं सब अब तलक।
इस बोलते शहर में,मातमें ख़ामोशी बहुत है।।
साज़िशें ले रही हैं इम्तिहान,
गली मुहल्लों में।
हमारा फेल होना इस कदर,
उन्हें गवारा बहुत है।।"


5.

        "आग"

"आग याद आते ही
याद आती है 
आदिमानव की 
वो सभ्यता
जब आदि मानव ने,
भोजन के निमित्त
पत्थरों से पैदा की थी आग।
उस आग ने
समय के साथ
बदल लिए अपने रंग,रूप और उद्देश्य
बदल ली अपनी नियति।
आज वही आग
मनुष्यों की महत्त्वाकांक्षा से जुड़ गई
उस आग में घुल गई
मनुष्य की अदम्य लालसा
उसका ओछापन
इस ओछेपन ने शर्मसार की मानवता
इसी आग से
एक तरफ 
जलाई जा रही हैं लड़कियाँ,
दूसरी तरफ
जलाये जा रहे हैं शिक्षा प्रतिष्ठान।
जहाँ तनी हुई मुठ्ठी
उठ खड़ी हुई ये आवाज़ें
प्रतिरोध की आग से उपजी हैं
आग समाज नहीं गढ़ती
आग खत्म करती है
सर्वधर्म समभाव की भावना
समाज में फैली हर आग
एकाकार हो
जले केवल चूल्हों में
जिसकी पकी रोटी 
खा सकें रहमान चचा और रामूकाका 
के भूखें बच्चे
घर जलाना नहीं होता 
आग का काम
आग का केवल 
एक ही काम होना चाहिए
पेट में लगी आग 
को बुझाना।

6.

रास्ते


"रास्तों पर चलने वाले

संसद में पहुँचते ही

भूल जाते हैं रास्तों पर

चलने वालों की पीड़ा


कौन चाहता है रास्तों पर

मीलों मील चलना 

अपने देश ने जिनके

पेट पर जड़ दिए हैं

सुरक्षा के नाम पर ताले

ऐसे मुश्किल समय में

साथ नहीं देता कोई अपना

साथ देते हैं वो रास्ते

जिन पर सपनों के पंख लगा

उड़ आये थे हम

उम्मीदों का झोला टाँगे 

कितनी दूर इस शहर में


ये वही शहर है

जिसकी विकसित इमारत

की एक एक ईंट

हमने उठाई है

अपने वृषभ कंधों पर

आज उसी विकसित शहर ने

हमें घरों से निकाल

भूख और बेबसी के चौराहे पर छोड़ दिया 


ऐसे संकट के समय में

रास्ते थाम लेते हैं हाथ

रास्ते वही होते हैं

बस बदल लेते हैं 

अपनी दिशाएँ

मुश्किल समय में।" 


7.

यही तो जीवन है


" हर तरफ छाई है खामोशी

बाग में खाली पड़े झूले 

बच्चों के इंतजार में

खुद ही झूल रहे हैं 

अपने दुःखों की रस्सी में

बाग के बीचों बीच रक्खा

सकोरा

पानी के इंतज़ार में

अंदर ही अंदर सूख रहा है

एक कवि गाहेबगाहे

उसमें डाल जाता है पानी

बाग की नीरसता को देख

सकोरा

अपने आँसुओं को

छिपाता है 

अपने ही पानी में

उसके दुःख से दुःखी

पेड़ से झड़ने को

बेताब हैं हरी पत्तियाँ

पीली पत्तियों को गिरते देख 

वे भी झड़ जाती हैं उसी में

उसके दुःख में शामिल होने

पत्तियाँ जानती हैं

पेड़ों से बिछड़ने का दर्द

दूसरों के दुःख को

अपना दुःख समझना

उन्होंने सीखा है पेड़ से

पेड़ लड़ता है मुश्किल समय से

और देता है हमें खुशियाँ

सकोरा फिर भी उदास है

कुछ दिनों से

नहीं आई श्यामा चिरइया

न आई गबद्दो गिलहरी 

जो खेलते थे पकड़म पकड़ाई

उसके चारों ओर

और वह मचल जाता था

एक बच्चे की तरह

बाग में खिले फूल 

सूख गए हैं

उड़ गए हैं उनके रंग

जिनमें बैठ 

मधुमक्खियों गपसप करती हुईं

लेती थीं जीवन के लिए

रंग,गंध और रस

जीवन रस लिए

औरों को सुखी बनाने

की चाह में

निकली ये मधुमक्खियाँ

थक-हार बैठ गई हैं

सकोरे के ऊपर

उसके उदास पानी को देख

उड़ेल दिए उन्होंने

अपने जीवन के लिए 

सहेजे सारे रंग और रस

सकोरा इस उदारता से

अंदर तक भीग गया

और मुस्कराकर बोला

यही तो जीवन है।"


8.

फूल का एकांत


" एकांत ने घरों में 

डाल लिया है डेरा

कबूतर बालकनी में बैठ

झाँकते हैं घरों के अंदर

घरों के अंदर पसरा सन्नाटा

उन्हें बेचैन करता है

और वो उड़ जाते हैं कहीं दूर

बाग के कोने में खड़ा फूल

बगल से गुजरती

स्कूल जाती उस लड़की

का रास्ता देख रहा है

जो साझा करती थी

हर रोज़ उससे 

अपना सुख-दुःख

उसके कोमल छुवन से 

झूम जाता था उसका

अंतर्मन

और खिल जाते थे अनंत 

फूल वहाँ

आज उसके पास तितलियाँ

भी नहीं आतीं रस लेने

एकांत में खड़ा फूल 

आज बहुत उदास है

उदास है वहाँ की हवा

जिसमें जहर घुल गया है

अनायास

लोग उसे ही कोस रहें

कि इसी ने फैलाया है

उस वायरस को सब जगह

जिसने बढ़ा दी हैं दूरियाँ

आपसी संबंधों के बीच

हवा जाना चाहती है

सृष्टि के किसी दूर

एकांत कोने में

उस फूल को भी 

ले जाना चाहती

अपने साथ

जो उस बाग के एकांत में 

खड़ा है चुपचाप। "


9.

पलाश 


"केन की कगार पर

उसके कर्मठ पानी को निहारता

उन्नत सर किये खड़ा है पलाश

अपनी बाहें फैलाये

पक्षियों को न्यौतता

कि आओ अपना घरौंदा बनाओ

मुझ में बस जाओ

पलाश की जड़ें 

बुंदेलखण्ड की भूमि में धसीं

पी रही हैं केन का ऊर्वर पानी

जिससे संचित हुआ ये पलाश

उगल रहा है लाल-लाल फूल

जो क्रांति के गीत गाते

झूल रहे हैं

बसंती हवा में

विषम-परिस्थिति में भी

अपने अस्त्तित्व की लड़ाई

लड़ता हुआ ये पलाश

हमें इस विकट समय में

लड़ने का साहस देता है।"

©नीरज कुमार मिश्र
संपर्क सूत्र : 08076366801



संपादक परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष का छात्र {हिंदी ऑनर्स 

सम्पर्क सूत्र :-

ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत। 221009

ह्वाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

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