Monday, 8 February 2021

प्रिय कवि चंद्रेश्वर की कुछ कविताएँ || 2020-21 की कविताएं || गोलेन्द्र पटेल || Chandreshwar

आत्मीय कवि , आलोचक व आचार्य चंद्रेश्वर की कुछ कविताएँ :-

संक्षिप्त परिचय :-

नाम - चंद्रेश्वर, जन्मः 30 मार्च, 1960 ,आशा पड़री, बक्सर,बिहार | पिता का नाम श्री केदार नाथ पांडेय और माता का नाम श्रीमती मोतीसरा देवी | लेखन के आरंभ में वाम लेखक संगठनों से  गहरा जुड़ाव |  उच्च शिक्षा आयोग ,प्रयागराज से चयनित होने के बाद 01 जुलाई सन् 1996 से एसोसिएट प्रोफेसर एवं  हिन्दी विभागाध्यक्ष,

एम.एल.के.पी.जी.कॉलेज,बलरामपुर,उत्तर प्रदेश | हिन्दी की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में सन् 1982-83 से कविताओं और आलोचनात्मक लेखों का लगातार प्रकाशन | अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित | दो कविता संग्रह -'अब भी '(2010),'सामने से मेरे' (2017) ; एक शोधालोचना की पुस्तक 'भारत में जन नाट्य आंदोलन'(1994) एवं एक साक्षात्कार की पुस्तिका 'इप्टा-आंदोलनःकुछ साक्षात्कार' (1998) का प्रकाशन

एक भोजपुरी गद्य में पुस्तक--'हमार गाँव' (स्मृति आख्यान) |

शीघ्र प्रकाश्य हिन्दी पुस्तकें ---1.तीसरा कविता संग्रह 'डुमराँव नज़र आयेगा',2.'हिन्दी कविता की परंपरा और समकालीनता' (आलोचना),

3. 'बात पर बात और बलरामपुर',

4. 'इयाद में आरा'(भोजपुरी)|

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संपर्क सूत्र :-

संपर्क


631/58 ज्ञान विहार कॉलोनी, कमता, चिनहट, लखनऊ-226028 (उत्तर प्रदेश)

फोन

09236183787

ई-मेल

cpandey227@gmail.com

👁️कविताएँ👁️

1.बदलाव


कुछ जगहें या चीज़ें बदलती नहीं

जब देखो तब दिखतीं

यकसाँ 

जैसे आगरे का ताज़महल

जैसे वह शिलाखंड

केन किनारे

जैसे वो स्मारक

एक राजा का

सुरेमनपुर में 

जैसे वृंदावन की गलियाँ

जैसे काशी की मणिकर्णिका

जैसे हवामहल

जैसे जलमहल

जैसे किला आमेर का

जयपुर में 


कुछ लोग भी होते ऐसे ही

जगहों या चीज़ों की तरह 

जब मिलो उनसे दिखते नहीं बदले 

तनिक भी 

वहीं पुरानी मनहूसियत छाई रहती

काली बदली की तरह 

उनके चेहरे पर

दुनिया चाहे जितनी बदल जाये 

वे खूँटे की तरह रहते गड़े

अपने दरवाज़े के सामने की 

ख़ाली ज़मीन पर 

लाख बदलाव हो मौसम में

हेमंत हो या वसंत 

वे खोए रहते अपनी ही किसी लंतरानी में 


पत्थर भी सराबोर हो सकता 

पानी से

हो सकता रससिक्त

उगाई जा सकती उसपर 

नरम-नरम दूब


यमराज भी हो सकते कृपालु 

पर कुछ चेहरे बने रहते 

भावहीन...

जड़वत...

मूर्तिवत...

जिनका कोई लेना-देना नहीं 

आसपास की दुनिया से


ऐसी जगहों 

ऐसे लोगों से मिलकर 

नाउम्मीद होते हम


बदलती जगहें

बदलती स्थितियाँ

बदलते लोग 

बदलाव को स्वीकार करते लोग

अच्छे लगते मुझे

एक चिराग जल उठता

काँपते लौ वाला मेरे भीतर 

उम्मीद का ...!


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2.प्रेमपत्र


पहली बार किसी मामूली कर्मचारी ने कहा होगा

दिलग्गी या हँसी- मज़ाक में

किसी सरकारी दफ़्तर में

अपने बॉस या हाक़िम के विरोधपत्र को

प्रेमपत्र तो कितनी उर्वरता 

और ज़िन्दादिली से

भरा रहा होगा

उसका मन- मस्तिष्क

ग़लत विरोधों और आरोपों की 

उड़ाता हुआ धज्जियाँ

ताक़त और पद के दुरूपयोग का 

बनाता हुआ मज़ाक

यह एक शब्द 'प्रेमपत्र' 

कितना भारी पड़ा होगा !


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3. एक तो वैसे ही 


एक तो वैसे ही 

उदास करती 

फरवरी 

ऊपर से जबरन पिला रहे 

लेक्चर पर लेक्चर

कुछ बात निकल कर आती नहीं 

काम की

हमारा घाव जाने कब से 

टभक रहा  

और तुम दूर से ही मचा रहे

चिल्लपों

क़रीब आते नहीं

तुम्हें अंदाज़ा  ही नहीं 

कि कितना असह्य होता है 

टभकना

किसी घाव का 

ख़ाली सब्जबाग़ दिखा रहे 

दूसरों के दामन पर दाग़ दिखा रहे

अपने कंधे पर सफ़ेद चादर डाले हो

पर दिल -दिमाग़ में तो सड़ा पड़ा है

कचरा जो मार रहा बदबू


कम से कम अभी तो  

हम जनवरी के पाला और कोहरा से 

थे परेशान

फरवरी को तो बक़्श दो 


हे हमारे शब्दवीर !

हम सच में अब कचुवा गए हैं

बुरी तरह से पक गए हैं 

सुनते -सुनते तुम्हारी

खलबानी !


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4.किसी मुल्क में 


एक मुल्क था

उस मुल्क में मरते ही रहते थे लोगबाग

कभी बाढ़ से,कभी सुखाड़ से

कभी बीमारी-महामारी से,भूख से कभी


कभी रेल हादसे से,कभी दंगे-फ़साद से

कभी अात्महत्या से ,मॉब लिंचिंग से कभी


एक मुल्क था

उस मुल्क में बेमानी था उठाना सवाल रोज़गार का

रोटी कपड़ा मकान का,महँगाई का

अपने किसी हक़-हक़ूक का


एक मुल्क था

उस मुल्क में  एक नेता था

उस नेता की एक पार्टी थी

उस पार्टी की एक सरकार थी

उसपर या उसकी सरकार पर शक करना

देशद्रोही हो जाना था


एक मुल्क था

उस मुल्क की एक राजधानी थी

उसका नाम दिल्ली था

दिल्ली में जंतर-मंतर था

जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन था

नारे थे जोशीले प्रतिरोध की चेतना से अाप्लावित

उनके बीच था एक टीवी पत्रकार

उसका नाम था रवीश कुमार

रवीश कुमार बन चुका था आवाज़

लोकतंत्र का उस मुल्क में अकेले दम पर


यह वही मुल्क था जिसमें ईरोम शर्मीला रहती थी

जो कभी-कभी चमक उठता था 

मेधा पाटकर के अनशन से

किसानों के आंदोलन से 


एक मुल्क था जिसमें कवि भी थे,शायर भी थे

जो होते ही रहते थे गुत्थमगुत्था आपस में

फेंकते रहते थे कीचड़ एक-दूसरे पर


लिखना नहीं ,थूकना या छींकना ही जिनकी  नियति बन चुकी थी


एक मुल्क था-------!

      


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5.पूँजी की माया


पूँजी दूर करती अपनी जड़ों से ही

बनाती हमें अनुदार ......अनैतिक...... अविश्वासी


अश्लीलता प्रदान करती हमारे व्यक्तित्व को

अपनों के सम्मोहन से

वतन की माटी के जादू से भी अलग करती


ग़लत पाठ पढ़ाती

क्रूरता में तलाशती सौन्दर्य

संचय करना सिखाती


सत्ता को जोड़ती

अमंगल के विधान से

सताती किसान-मज़दूर को


वह काला-अँधियारा बादल बन बरसती

कीचड़ ही कीचड़ करती पैदा


कभी घना कोहरा बन कहर बरपाती

तो कभी प्रचंड धूप बन झुलसाती

किसी ग़रीब का तन-बदन


वह बकौल कवि धूमिल 'अकाल में दया' बन 

सामने आती

( "दया अकाल की पूँजी है !")

कभी बेवा के चेहरे पर दिखती हया बनकर झूठमूठ


ज़रूरतमंद को ललचाती

कान पकड़वाकर करवाती उठा-बैठक


वह क्या नहीं करती

भलमानुस को बना डालती अमानुस !


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6.ऐन मौके पर ही


बड़ा से बड़ा तैराक़ डूब जाता 

पोरसा भर पानी में

घर के पास की गड़ही में ही


रात -रात भर जागकर पढ़ने वाला विद्यार्थी 

हो जाता फेल वार्षिक परीक्षा में ही 


अखाड़े में अपने ऐन मौके पर ही

जाता भूल दाँव असल

अव्वल पहलवान 


मंचीय कवि हो जाता हूट

अच्छे गले के बावज़ूद

अपने ही  शहर में


आउट हो जाता जीरो पर

महान बल्लेबाज

अपने ही देश की ख़ूबसूरत पिच पर

नहीं ले पाता एक भी विकेट

महान गेंदबाज


कार हादसे में जाता मारा बेमौत

सबसे ज़्यादा कुशल ड्राइवर ही

अपने इलाक़े की 

जानी- पहचानी सड़क पर


भूल जाता बात मुख्य

महान वक्ता मंच पर ही 

अपने चिर -परिचित श्रोताओं के सामने


निपुण रसोइया ही भूल जाता 

डालना नमक दाल में !

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7. स्मृतियाँ


उम्र गुज़रने के साथ-साथ दृश्य अनगिन 

दबते जाते हमारी स्मृतियों के तहख़ाने में

कई -कई चेहरे जाने-पहचाने,बेपहचाने भी 

जगहें, चीज़ें, उन सब की शक़्लें बस दबती चली जातीं

वे  नष्ट नहीं होतीं तबतक  

मिट नहीं जाता जबतक

हमारा दिमाग़ कि पूरा वज़ूद

हर पल कुछ भरता रहता इस तहख़ाने में

ये कुदरत का करिश्मा या अनमोल तोहफ़ा 

कि सारे दृश्यों के बावज़ूद भी बची रहतीं

कुछ और दृश्यों के लिए रिक्त जगहें ......

और कमाल कि सारे दृश्य एक -दूसरे से नहीं होते क्षतिग्रस्त चाहे लाख करे कोई बमबारी इस पर

बना रहेगा यह ता -उम्र 

जबतक ज़िंदा इंसानियत मेरे भीतर !

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8.फेफना वाले गुड्डू यादव उर्फ़ पहलवान जी


अच्छी चाय के लिए 

ज़रा -सा वक़्त चाहिए ;

देश को बचाने के लिए 

नया भगत सिंह चाहिए |

तप्त अंगारे से उतारकर 

कुल्हड़ 

उबालते हुए 

चाय तंदूरी,

बोले गुड्डू यादव उर्फ़ पहलवान जी--

किसानों और भूखे-नंगे 

इंसानों के लिए 

अब इंसाफ़ चाहिए ;

अमानी-अदानी नहीं,

मिले महादानी का प्यार ;

चलाने के लिए देश

अदद एक सरकार चाहिए |

कवि जी तो कहते हैं

शब्दों पर ज़ोर देकर, 

गुड्डू यादव उर्फ़ पहलवान जी को

कंधे पर अवश्य ही 

चार-चार स्टार चाहिए !

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9.विज्ञापन 


दैनिक अख़बारों के मुख पृष्ठ ढके 

एक कार्पोरेट की पुण्य तिथि के

महँगे...चमकीले विज्ञापनों से 

गोया तेईस जनवरी को पैदा हुआ था 

महान देशभक्त के रूप में 

ये ही

 

किसी प्रमुख अख़बार के

किसी पृष्ठ पर 

दो शब्द भी नहीं छपे

'नेता जी' के लिए 


एक सच्चे देश नायक की

जन्म तिथि के दिन 

ये विज्ञापन कर रहा 

कोशिश 

उनकी स्मृतियों को पोंछने की


खेल जारी...पूँजी,बाज़ार एवं 

कार्पोरेट की दुनिया का 


विज्ञापन ढँक रहे चेहरे 

असली देश नायकों के

जनता बेख़बर

कम लोग बचे हुए 

अपनी स्मृतियों के साथ 


कोई जैसे ही करता 

बात असहमति की

करार दे दिया जाता 

देशद्रोही 

 

ये ऐसा दौर जब 

असली और नक़ली की जंग में 

लाली और हरियाली दिखती

नक़ली चेहरों पर  ही !


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10.अगर मनुष्य हम


अगर ठंड ज़्यादा हो तो सिकुड़ने और 

जमने लगते हैं विचार 


अगर ताप ज़्यादा हो तो पिघलने और 

गलने लगते हैं विचार  


सिकुड़ना या जमना 

पिघलना या गलना

विचारों का  

सही नहीं होता 

हर हाल में 


अगर हम मनुष्य 

तो रहना ही होगा सजग हमें 

मौसम की 

उलटबाँसियों के ख़िलाफ़ !


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11.कल हो कि आज

कि आनेवाला कल 

कि गुज़र गया पल 

अभी -अभी का  

कोई भी समय 

होता नहीं निरपेक्ष 


ऐसा भी नहीं कि 

कि एक समय पूरा हो 

सपाट...   परती या नीलाम 

किसी 'एक' के नाम 


वह 'एक'

किसी एक समय का

चाहे जितना बली हो कि 

हो महाबली 


किसी एक समय के

कई -कई पाठ

बनते रहते अनवरत


किसी एक ही समय में 

कोई देख लेता

'उम्मीद' की वापसी 

तो किसी को दिख जाती 

खल मायावी की  वापसी !


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12.मनुवा बेपरवाह 


जाड़े में जाड़ा कम

गर्मी में गर्मी कम

बारिश में बारिश कम


नदी -पोखर में पानी कम

घास में हरापन कम

गन्ने में मिठास कम

दूध में मलाई कम


ताप कम सूरज में

धवलता कम चाँदनी में


इन्सानियत कम इन्सान में

बड़प्पन कम बड़ों में

मर्दानगी कम मर्दों में

स्त्रीत्व कम स्त्रियों में

बालपन कम बालकों में


आचार में विचार कम

आतिथ्य में सत्कार कम


कविता में संवेदना कम

शब्द में अर्थ कम

रोशनाई में चमक कम

सियासत में सफ़ेदी कम


जीवन में साँस कम

साँस में कम दम

फिर भी मनुवा बेपरवाह! 

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13.बहरहाल 


एक अरसे बाद दिखा

झुंड भेड़ों का 

सड़कों पर

अपने गड़रियों के साथ 

वे चल रही थीं 

बाँस की पतली छड़ी के इशारों पर

डरी-सहमी-सकुचाई-सी


उनकी न तो कोई क़तार बन पा रही थी 

न उनको कोई अलग राह ही सूझ रही थी

 

वे गिर -भहरा रही थीं एक-दूसरे पर


वे मंज़िल का पता नहीं जानती थीं

सिर्फ़ चलना जानती थीं


अब तो बहुत ही कम बचे थे

उनके लिए घास के मैदान......

पलिहर खेत......

जहाँ उनको हिराया जाता रहा है


अपने-अपने पलिहर खेतों में 

उनको हिरवाने के लिए आतुर-उत्सुक 

खेतिहर किसान ही कितने बचे थे

जो बचे थे उनकी आँखों से 

जैसे नीर नहीं

टपकता रहता मानो रक़्त


बहरहाल, भेड़ें तो भेड़ें थीं

तमाम उम्र अपनी-अपनी पीठों पर 

ऊन की बेहतरीन फ़सल उगाने के बाद भी 

थीं वे किसी बुरे वक़्त के हवाले

वे भेड़चाल के क़िस्सों ...और मुहावरों के नाम पर 

पहले से  बहुत बदनाम थीं !


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14.पहले और अब


पहले पैसेन्जर रेलगाड़ियाँ भी चलती थीं

पहले सरकारी ग़लत नीतियों के विरोध में 

रैलियाँ और जनसभाएँ भी होती थीं

लोग रेलगाड़ियों और बसों में भर-भर कर जाते थे 

दिल्ली पटना लखनऊ जयपुर कोलकाता भोपाल और चेन्नई तक

बड़े-बड़े मैदान गुलज़ार हो उठते थे

जन के पदचापों से खिल उठती थी

वहाँ की धरती

नारों के शोर से आसमान कुछ और चौड़ा दिखने लगता था

डर नाम की चिड़िया विलुप्त हो जाती थी 

बड़े से बड़ा शासक भी निकल आता था

महल से बाहर 

फरियाद सुनी जाती थी 

वादे किए जाते थे

कि ज़रूर हल कराये जायेंगे

मसले आगामी दिनों में 

चाहे वे जितने विकट हों 

अब तो फरियाद और फरियादी बचे हुए हैं 

उनको सुनने वाला सुनकर भी महटियाए हुए है

पता नहीं किससे गलबहिया मिलाए हुए है

ताऊ कहते हैं कि वे सब  सठियाए हुए हैं !


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15.आज़ादी 


सबसे ज़्यादा ख़राब और ख़तरनाक माना गया

मेरा वो ख़्याल जिसमें शामिल 

मेरी आज़ादी


साहब की आँखों की 

किरकिरी था इसी के नाते


यार भी कहाँ निभाते थे

यारी 

यारी में ईमान था अब

गुज़रे ज़माने की बात 

सब करना चाहते थे

अपहरण

किसी न किसी तरीके से 

इसी  आज़ादी का

परिजन -दुर्जन सबके निशाने पर थी

यही एक चीज़

मेरी आज़ादी


गिरोह या कि संघ

दल या कि मंच

सब लगे थे छीनने में

इसी एक आज़ादी को

जिससे बनती या आकार पाती थी

मेरी शख़्सियत


इसकी चाहत ने नहीं छोड़ा मुझे

कहीं का


हर किसी को पसंद आती थी 

मेरी चुप्पी 

मेरी  वैचारिक विकलांगता


हर किसी को चाहिए था 

मेरा समर्थन


मैं एक ऐसे ही दौर में था 

विवश और अभिशप्त

जीने के लिए !

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16.बारहमासा दलदल


मेरी कॉलोनी के एक ख़ाली प्लॉट में डेयरी है नंदू की

डेयरी में कोई दो दर्ज़न भैंसे 

गायें हैं नौ-दस

इन भैंसों और गायों में से 

कुछ के पड़वे और बछड़े जीवित हैं


डेयरी में कीचड़ ही कीचड़ 

दलदल बना रहता बारहमासा

गायें और भैंसे अकुलाती रहतीं 

चारा -पानी को 

बँधीं खूँटों से बेबस 

जब निकालना होता दूध 

तभी नंदू सामने लाता इनके नादों में

भूसा -दाना -पानी

मानो नेता हो वह  

किसी प्रजातंत्र में

वोट लेने के समय जो प्रजा के सामने 

जोड़ता अपने दोनों हाथ

कि पेन्हाने के समय इनके सामने 

फेंकता कुछ चारा-पानी


गायों और इन भैंसों और इन पड़वों 

और इन बछड़ों की देखता 

रोज़ सुबह-शाम की लाचारी

नंदू महाराज की हत्यारी

फिर भी बना रहता मूकदर्शक

निज स्वार्थ में मैं भी


नंदू की भी होगी कोई न कोई लाचारी

निज घर -बार चलाना 

उसको भी तो

बच्चों को करना 

पाल-पोसकर बड़ा 

लिखा -पढ़ाकर करवानी 

उनसे सरकारी नौकरी

उसने भी तो  सजा रखा सपना कि

अपनी भावी पीढ़ियों को निकालेगा

इस बारहमासा दलदल कि 

बदबूदार कीचड़ से बाहर ! 


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17.( क )दुःख 


मैंने अपना दुःख कहा

तुमसे

तुम मुझसे ज़्यादा

दुःखी हुई

आगे से बंद कर दिया 

बताना मैंने

तुमसे

अपना कोई दुःख! 

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(ख) सुख


तुम धँसी थी

दलदल में

दुःख के गहरे

तुम्हारा चेहरा भर दिखता था

मैंने अपने सुख की पोटली को

रहने दिया

बँधा का बँधा ही

मैं लौटा था 

एक लंबे सफ़र से! 

🔘


( ग) क़िस्से


मेरे पास क़िस्से ही क़िस्से थे

सुख के

हँसी और ठहाकों से 

गुलज़ार 

एक दुनिया थी

अतीत की

तुम्हारे पास यातनाएँ थीं

दुःख ही दुःख थे

जो क़िस्से नहीं बने थे !


🔘

( घ)ईश्वर और मफलर


तुम ईश्वर को तलाश रही थी 

मैं तुमको

तुम पूरा बदल चुकी थी 

तलाशते हुए

एक अदद ईश्वर को

इस सर्द दिसंबर की

दोपहर में 

ईश्वर से भी बड़ा दिखता था

मुझे मेरा मफलर

मेरा फुल स्वेटर 

काला कंबल 

और सामने भाप छोड़ता कप 

चाय से भरा! 

🔘

18.वैसे सच पूछिए तो ......!


मेरा हिन्दुस्तान पहचान में नहीं आ रहा

उसकी शक्ल को कुछ शासकों ने

तो कुछ कोरोना ने 

बिगाड़ कर रख दिया 


अब रेलगाड़ियाँ पहले की तरह 

नहीं चल रहीं

क्या पता,कब चलेंगी

कैसे चलेंगी


बसों में भीड़ है भारी

उनमें सवार लोग

एक-दूसरे को धकियाते-रगड़ते हुए

कर रहे महँगा सफ़र


पीएम जी के दूर्दरशन पर 

बार-बार के आग्रहों के बाद भी

ग़ायब सोशल डिस्टेंसिंग

मास्क पहने दिखते 

एकाध चेहरे ही

एकाध ही दिखते 

लिए हाथ में 

सेनेटाइजर की बोतल

किसी पिस्टल या रिवॉल्वर की तरह


भूख की आग कबतक सही जा सकती 

सब निकल पड़े दुबारा

रोज़ी-रोज़गार की तलाश में

सड़कों पर

कोई मोची हो या रिक्शावाला

ठेलेवाला हो या खोंमचेवाला

फेरीवाला हो या दूधवाला

फूल-माला वाला हो या पंक्चर बनाने वाला

चायवाला हो या फलवाला

मंदिर का पुजारी हो या मस्ज़िद का मौलाना....


इंतज़ार की भी एक हद होती ......


लोग अब कोरोना से कम 

भूख से ज़्यादा बेहाल

फिर लोग भाग रहे 

बड़े शहरों की तरफ़

ये कहते हुए कि गाँव में 

रखा ही क्या


एक ओर तमाम सरकारी हिदायतें

गोया कितना ख़्याल रखती हो वह 

अपनी प्यारी-सी पब्लिक का

दूसरी ओर चुनाव पर चुनाव

जन सभाएँ

सभाओं में धक्का-मुक्की करती भीड़

पता नहीं,नेताओं से क्या पाना 

शेष रह गया अब भी

आज़ादी के इतने बरसों बाद भी


इन सभाओं में क्या सुनने जाती भीड़

क्या सुनती भीड़

उसे तो बुरी तरह से 

जकड़ दिया गया 

जाति-बिरादरी 

धर्म-मज़हब के सींकचों में


नेताओं की ज़ुबान से सच 

वैसे ही नदारद 

जैसे ग़रीब के बुझे चूल्हे से

तसला भात का


मेरा हिन्दुस्तान नहीं आ रहा

पहचान में

साल भर में बढ़ी महँगाई 

कई गुना


सत्ता बन बैठी 

हरज़ाई बालम


शिक्षा ऑनलाइन

नेट बाधित


सबकुछ डिजिटल

अटल कुछ भी नहीं 

नर्वस हर पल


बलात्कार......उत्पीड़न

हत्या की 

ख़बर-दर-ख़बर

हाँफता लोकतंत्र


शहर से भगा दिए 

गँवई मज़दूर

कोरोना-कोरोना का 

मचाकर 

कर्कश शोर

वे शापित जीने को

मज़बूर


चीख-चीख....

भूख-भूख......

महँगाई-महँगाई.....

बेरोज़गारी-बेरोज़गारी.......

गुम चोट की मार


ऐसे में क्या बिसात 

कोरोना महामारी की


वैसे सच पूछिए तो 

कोरोना है


नहीं भी है  !


🔘

19. बहुत पीछे 


अब नहीं बाँधता बाईं कलाई पर घड़ी


साइकिल खड़ी पड़ी दीवार के सहारे स्टोर रूम में


तसले का भात माड़ पसाया


बटलोही में बनी दाल अरहर की 


लोहे की कड़ाही में बनी सब्जी सतपुतिया की


तवे की रोटी मिट्टी के चुल्हे पर की नहीं खाया बरसों से


मिठाइयों में कुटकी- पटौरा और ... जलेबी गुड़ही

नहीं मिली एक लंबे अरसे से परदेस में


पता नहीं किस जुनून में जीता रहा

देखा नहीं मुड़कर...और पार कर गया साठ

देशी स्वाद को छोड़ते हुए बहुत पीछे !

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20. याद को करना याद  


कई पुराने दोस्तों से मिलने का निकाल नहीं पाया वक़्त


भागमभाग में रहा हरदम


दोस्त भी थे मेरी तरह ही

जी रहे थे वे भागते हुए


वक़्त नहीं था किसी के पास


कितनी सुखद थीं यादें

जिन्हें यादकर हुआ जा सकता था सुखी ...

पर उन सुखद यादों को करना याद भी 

कितना मुश्किल  !

🔘


21. उजबक 


वो तो कहिए कि मेरे बूढ़े पिता एक दिन मोबाइल पर 

बात करते -करते मुझसे नहीं,मेरी पत्नी से जब रो पड़े फफक-फफक कर इस कोरोना काल में तो जाना कि 

उनको दरकार है सेवा की...और वे बूढ़े हो चले हैं

कोरोना की आड़ में सरकारें ही नहीं

संवेदनशील इंसान भी होते जा रहे थे

हद से ज़्यादा पर्सनल और निर्मम


देखते ही देखते गाँव बेगाना लगने लगा था


मैं कितना बड़ा उजबक कि बसाये हुए था दिल में

बचपन के गाँव को

अब भी !

🔘


22. बदल जाना


जब लिखना शुरू किया था कविता तो अक्सर 

आरा-पटना जाता

मिलता साथियों और अग्रज कवियों से


एक दिन लखनऊ में मुलाक़ात हो गई अचानक

एक पुराने अग्रज कवि से किसी सरकारी संस्थान में 

जो कविता लिखना कब का छोड़ चुके थे

और देते चल रहे थे व्याख्यान


सबकुछ कितना बदल जाता है

वक़्त के बदलने के साथ


बाहर भी.........

भीतर भी.........!


©चंद्रेश्वर



     {विषय :- नक्सलबाड़ी और कविता : प्रो. चंद्रेश्वर}

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Sunday, 7 February 2021

हमारा समय हमारी कविता By स्वप्निल श्रीवास्तव || जनपक्षधर और लोक जीवन-राग की कविताएं : कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव By डॉ.अवनीश मिश्र | मुक्तिपथ

हमारा समय हमारी कविता By स्वप्निल श्रीवास्तव || जनपक्षधर और लोक जीवन-राग की कविताएं : कवि  स्वाप्निल श्रीवास्तव By डॉ.अवनीश मिश्र



https://youtu.be/PD7WfDD2BOo

 वक्ता-परिचय

कवि : स्वप्निल श्रीवास्तव


जन्म : 5 अक्तूबर 1954, मेहनौना, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश


भाषा : हिंदी


विधाएँ : कविता, कहानी, यात्रा संस्मरण


मुख्य कृतियाँ


कविता संग्रह : ईश्‍वर एक लाठी है, ताख पर दियासलाई, मुझे दूसरी पृथ्‍वी चाहिए, जिंदगी का मुकदमा, जब तक है जीवन


 


सम्मान


भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार,  फिराक सम्‍मान 


संपर्क


510, अवधपूरी कालोनी, अमानीगंज, फैजाबाद – 224001



*नोट 💐👌👏

जनपक्षधर और लोक जीवन-राग की कविताएं : कवि  स्वाप्निल श्रीवास्तव


('हमारा समय हमारी कविता' शृंखला में इस बार के आमन्त्रित कवि हैं श्री स्वप्निल श्रीवास्तव। वे 31 जनवरी को शाम 4 बजे से 'मुक्तिपथ' पर अपनी कविताओं का पाठ और बातचीत करेंगे। इस अवसर पर यह आलेख युवा अध्येता डॉ.अवनीश मिश्र ने लिखा है। वे कविता की वस्तुनिष्ठ आलोचना करते हैं। डॉ. मिश्र इन दिनों केंद्रीय विद्यालय में अध्यापन करते हैं। इस अवसर पर लिखे गए इस लेख के लिए हम उनके प्रति आभारी हैं।)


समकालीन हिन्दी कविता में स्वाप्निल श्रीवास्तव नवें दशक के एक  सशक्त हस्ताक्षर कवि हैं। जिनकी कविताएं अपने समकाल के महत्त्वपूर्ण सवालों से व्यापक सरोकार रखतीं हैं। वे बराबर एक वैचारिक हस्तक्षेप व प्रतिरोध करती दिखाई देती हैं। उसके साथ ही लोक जीवन व जगत से भी कवि का गहरा संबंध परिलक्षित होता है।कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव के अब तक कविता के पाँच संग्रह : "ईश्‍वर एक लाठी है, ताख पर दियासलाई, मुझे दूसरी पृथ्‍वी चाहिए, जिंदगी का मुकदमा, जब तक है जीवन" प्रकाशित हो चुके हैं। 

स्वाप्निल श्रीवास्तव का काव्य संसार विविधताओं और बहुरंगी छटा से भरा है। उनकी कविताओं की अंतर्वस्तु में आया लोक, जीवन से नाभिनालबद्ध है, वे वहीं से अपनी रचनाओं के लिए उपजीव्य ग्रहण करते हैं। उसकी ग्राह्यता अपने परिवेश से समाविष्ट होकर उद्बुद्ध होती है। स्वाप्निल का समय लोक से शिष्ट में संक्रमण का समय है। आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता का और पत्राचार से यातायात व संचार का समय है। सत्ता और साम्प्रदायिक शक्तियों के उभार व गठबंधन का समय है। जनांदोलनों के उभार का समय है। उस समय एक कवि छोटे से शहर में जिन्दगी के दोराहे पर खड़े आम आदमी की पीड़ा, अपने समय में हो रहे षडयंत्र के प्रति सचेत दृष्टिकोण, किसान जीवन, सुमधुर आत्मीय लोक, जीवन राग और प्रेम के उल्लासपूर्ण भावों से भरा संवेनात्मक सृजन करता है। उनकी कविता में बहुत सी खिड़कियां हैं, किसी भी खिड़की से प्रवेश करने पर आपको निराशा हाथ नहीं लगेगी।  बुध्द की धरती पर पैदा हुए कवि स्वाप्निल की कविताओं में लोक और जीवन का एक देशज राग बजता है। वे जीवन को आस्तिक दृष्टिकोण से देखने वाले आस्थावादी कवि हैं। उनके यहाँ बुध्द और कबीर जैसे एकमेव हो गये हों।किसी भी परिवार की इकाई पति-पत्नी और माता पिता किस तरह आपसी समझदारी से एक मकान को घर में रुपान्तरित कर देते हैं। जीवन के ताने बाने को वे अपने श्रम, त्याग व समर्पण से सिरजते हैं। अस्तु -ताना बाना~


"माँ एक करघा थी

जिस पर हम बच्चों को

बुना गया था

पिता कबीर के पद थे

जिसे अन्तरँग क्षणों में

गाया करती थी माँ

उसके गाने से खिलते थे

कपास के फूल

पवित्र होते थे सफ़ेद रँग

माँ ताना थी तो पिता थे बाना

दोनों बुनने का काम करते थे।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव के कवि व्यक्तित्व का निर्माण और वैचारिक भावभूमि की तलाश सन् 75 के भारतीय आपातकाल के आस पास से शुरु होती है। यही वह समय है जब इस देश के भीतर की सामाजिक व राजनीतिक स्थितियों में तेजी से परिवर्तन घटित हो रहा था। भारत की आम जनता में आजादी के मोहभंग से उपजी हुई निराशा ने आपातकाल के बाद उसे तोड़कर रख दिया था। राजनीतिक रुप से यह अलोकतांत्रिक और अराजक किस्म का समय था। इस दौर में आम आदमी की व्यापक अनदेखी हुई। समाज से बहुत सारे नैतिक मान मूल्यों तिरोहित हो रहे थे जिससे मनुष्य और मनुष्य के बीच में भेद कर पाना मुश्किल था। सांमती शक्तियां अपने ताकतवर रुप में उपस्थित हैं और फिलहाल उनके खिलाफ हवा का रुख भी नहीं था। यह ऐसा समय था कि गहन नैराश्य के स्याह में डूबी हुई आम जनता में भय ,आशंका व अविश्वास घर कर गया था। यहाँ कवि कविता के कथ्य से अपने पुरखे कवि मुक्तिबोध से जुड़ता हुआ दिखाई देता है। मसलन-'यह एक ऐसा समय था'~


"अजीब सा समय था

कोई किसी से बोलता नहीं था

न इशारे से बात करता था

उन्हें डर था कि उन्हें देखा जा रहा है

जगह–जगह जासूसी कैमरे छिपा

दिये गये थे

हवाओं की तरह आसपास

मुखविर थे

जो बोलने के लिये विख्यात थे

उन्होंने मुखौटे पहन लिये थे

लिखने वालों ने कलमदान को अपनी

कलम सौंप दी थी

स्याही बनाने वालों ने किसी दूसरे पेशे

का चुनाव कर लिया था

आदेश न मानने वालों को एकांतवास

में भेज दिया गया था

यह एक ऐसा समय था जब हमें

अपने सांसो से भय लगने

लगा था ।" 


या - हमलावर ~


"जिन हमलावरों ने उसकी हत्या की थी

वे उसकी अन्तिम यात्रा में शामिल थे

हत्यारों को जानती थी पुलिस

वे राजनेताओं के क़रीब थे

नगर के लोग उनसे परिचित थे

उनके दुस्साहस के सामने छोटा था

लोगों का साहस

जो हत्यारों के ख़िलाफ़ बोलता था

वह मारा जाता था।"


आपातकाल से लेकर उत्तर आपातकाल के दौर तक का समय रचनात्मकता व लेखन के लिए सबसे कठिन समय था। कवि इस तरह के कुचक्रों और शोषणकारी षडयंत्रों को भलीभाँति पहचानता है। कवि स्वाप्निल अपने नाम के बरक्स यथार्थ के हर रेशे को उघाड़कर उसके भीतर से कालिमा को पहचानने वाले कवि हैं। इस स्याह समय में हत्या, आत्महत्या और मौत में फ़र्क करना बहुत दुश्कर है। रात के अंधेरे में किस तरह हत्याकांड को एक स्वाभाविक मृत्यु में तब्दील कर दिया जा रहा है। लेकिन हत्या सिर्फ हत्या को बढ़ावा देती है और हत्यारे की नियति भी उसे हत्या की तरफ ले जाती है। यह हमारे समय और समाज की सबसे बड़ी विडंबना है कि हत्यारे खुलेआम घूम रहें हैं और हत्या और गायब हो जाने वाले लोगों पर किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। इस तरह का हत्यारा मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय और राजेश जोशी की भी कविताओं में आता है। बहरहाल, समय भले ही और कठिन हो गया हो परन्तु हत्या के तरीके और ज्यादा आसान हो चले हैं।  यथा -फ़र्क कविता में देंखें।


"बहुत-सी मौतें हत्या की तरह होती है

उसे हम अन्त तक नही जान पाते

आदमी की मृत्यु स्वाभाविक दिखती है

यह पता नही चलता उसे कितने सलीके से

मारा गया है

उसकी मृत्यु सिर्फ़ मृत्यु दिखाई देती है ।

कुछ दिनो बाद लोग हत्या और मृत्यु का फ़र्क

भूल जाते है ।

इतिहास में ऐसी बहुत सी मौतें दर्ज हैं

जो वास्तव में हत्याएँ हैं ।

जो हत्याएँ करते हैं उन्हें भी मार दिया

जाता है ।"


  या  'गायब होने वाले आदमी के बारे में।'


"वह बाज़ार को बहुत ध्यान से देख रहा था

जैसे अपने घोंसले के लिए कोई जगह

खोज रहा हो

वह चिड़िया नहीं आदमी था, शायद वह

यहाँ बसना चाहता हो

विडम्बना देखिए, वह बसने के पहले ही

उजड़ गया।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव वस्तुतः किसान जीवन चेतना, किसानी सभ्यता और लोक जीवन के अप्रतिम कवि हैं, जहाँ पर उनकी कविता की जड़ें गहरे पैबस्त हैं। उनकी कविता में मां की बोरसी की आग भी है और कछार के किनारे बगुले भी हैं, आम की गुठली भी है और परिंदे व बारिश भी है, अपने पुरखे किसानों के पगचिह्न भी है तो लाठी भी है; जो उनकी कविता के वृहत्तर आयाम को द्योतित करती है। कविता के भीतर इस विस्तृत फ़लक का प्रकटीकरण उस संस्कृति में गहराई तक धँसें बिना संभव नहीं है। उनकी कविता का भूगोल ही असल रुप से कवि का वास्तविक संसार है। मसलन गेंहूँ कविता~


"गेंहूं  के  पौधे  .घुघरूं   की  तरह 

बजते  हैं तो  मुझे  याद  आती  है

खलिहान  में  चलती  हुई  माँ


मां  कहती  थी  -गेंहूं  सबसे  स्वादिष्ट

अनाज  है 

शंख  की  तरह  सुघड़  दाने  मां  को 

पसंद  थे


रोटी  का  स्वाद खेत  से  शुरू होता  है

जब  वह  नही  पहुंच  पाता  है 

भूखे  आदमी  के  मुंह  तक  

तब  भूखा  आदमी  भूकम्प  की  तरह

पूरे  ग्लोब  पर  उठता  है 

और  सारी  चीजें  उसके  इशारे  पर 

नाचने  लगती  है।"


स्वाप्निल जी की कविताओं में बहुआयामी तेवर है। उनकी कविताएं जितनी अपनी संवेदना और शिल्प में सरल व सहज दिखाई देती हैं, अपनी अर्थवत्ता में वे उतनी ही बेधक हैं। भावबोध और वैचारिकी में उनकी कविताओं का पक्ष और मानी स्पष्ट है। पश्चिमी साहित्यकारों की तरह उनके यहाँ भी आत्मीय प्रेम और जीवन संघर्ष का रुपक साथ साथ चलते दिखाई देतें हैं। उनकी कविताएं प्रेम, स्नेह और आकांक्षा से उत्पन्न होती है और दुःख, जिज्ञासा और संघर्ष में और भी खिलती व निखरती चली जातीं हैं। हर तरह के राग-द्वेष, कुंठा और तृष्णा जैसे भाव तिरोहित हो जाते हैं, इसी से निखरता है जीवन और इसी जीवन की अभिव्यक्ति है कविता। जनपक्षधरता और गहन भाव संवेदना में उनकी कविताएं अपने समकालीन परम्परा के दो कवियों राजेश जोशी और अरुण कमल से मिलती हैं। वसंत का उल्लसित भाव कवि के मिज़ाज का परिचायक है, जिसे उसके स्वभाव से अलग नहीं किया जा सकता। उदास मौसमों के खिलाफ वह और निडर व उत्साहित हो उठता है। उनके यहाँ वसंत क्रांति का प्रतीक है।

बकौल - स्वाप्निल श्रीवास्तव - वसंत आएगा~


"वसन्त आएगा इस वीरान जंगल में जहाँ

वनस्पतियों को सिर उठाने के ज़ुर्म में

पूरा जंगल आग को सौंप दिया गया था

वसन्त आएगा दबे पाँव हमारे-तुम्हारे बीच

सम्वाद कायम करेगा उदास-उदास मौसम में

बिजली की तरह हँसी फेंक कर वसन्त

सिखाएगा हमें अधिकार से जीना।"


स्वाप्निल अपनी कविता में कल्पना के उड़ान बनिस्बत यर्थाथ की ठोस भूमि पर विचरण करते हैं जिससे कवि का अपनी जड़ों से उसका जैविक व भौतिक संबंध बना रहे।स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं में भूमंडलीकरण और बाजारवाद के बढ़ते प्रसार व बिकने की चिंताएं भी हैं और गांवों से विस्थापित लोगों का दर्द भी है। साथ ही मनुष्यता के बिकने की वाज़िब चिंतना भी। मनुष्य अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की नियति का मारा है। भौतिकवादी लोलुपता उसे कहीं भी सूकून नहीं दे सकती है। जब तक वह अपनी इन्द्रियों पर विजय नहीं पा लेता। ऐसे में उसे कांक्रीट के जंगलों और बाज़ारवाद के व्यामोह से दूर रहना होगा, अन्यथा परिणाम सामने है।

 जैसे- विस्थापन~


"जो गाँव में रहते हैं 

वे नगर में जाने के लिए बेचैन हैं 

नगर के नागरिक 

महानगर में बसने के लिए हैं लालायित 

छोटी जगह पर अब कोई नहीं चाहता रहना 

सबको चाहिए बड़ी जगह 

ज़मीन पर रहने के लिए कोई राज़ी नहीं है।"


या- बिकना ~ 


"जो कभी नहीं बिके थे

वे इस बार के बाज़ार में बिक गए

सौदागर ने उनकी जो क़ीमत मुकर्रर की

वह उनकी औक़ात से ज़्दाया थी

इसलिए वे ख़ुशी- ख़ुशी बिक गए

इस ख़रीद- फरोख़्त में दलालों ने

ख़ूब माल और शोहरत कमाई

अपनी सात पुश्तों का इन्तज़ाम

कर लिया।"


कवि स्वाप्निल जी के यहाँ संबंधों के निर्वाह, मिलन की इच्छा और दरवाजे पर किसी आगन्तुक के आने का दस्तक भी है और स्मृतियों का एक भरा पूरा संसार भी है। ईश्वर एक लाठी है,खरीदारी, विस्थापन, लेटरबाक्स, तितलियां,नंगे लोग, हँसना, बंदूक, मलबे,दस्तक, बुनकर स्त्रियाँ और प्रूफरीडर आदि कविताएं कवि के भौगोलिक विस्तार और भाव प्रसार की परिचायक हैं। मनुष्य जीवन की बहुत सारी उत्पत्तियाँ व आविष्कार उसके दिमाग की उपज है। क्योंकि दिल और दिमाग से बहुत सारे काम किये जाते हैं। चुनांचे कवि दिमाग को उत्तम विचारों की जगह मानता है न कि कूड़ेदान। इस माने में उनकी कविता बराबर एक वैचारिक हस्तक्षेप की मांग करती हैं। यथा- सही जगह~


"कूड़ा रखने की सही जगह कूड़ेदान है 

अतः इसे दिमाग़ में मत रखिए 

दिमाग़ उत्तम विचार रखने के लिए बने हैं 

खूटियाँ कपड़े टाँगने के लिए बनी हैं 

इस पर ख़ुद को टाँगने की कोशिश मत करिए 

इसी तरह रहने की निर्धारित जगह घर है 

अन्य जगहों पर मत करिए यक़ीन 

अन्यथा दर-ब-दर होने के ख़तरे बढ़ सकते हैं।"


सन् नब्बे के बाद आर्थिक उदारीकरण और सन् 92 में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना को उस समय के हर रचनाकार ने किसी न किसी रुप में अपनी अभिव्यक्ति दी है। कुँवर नारायण, राजेश जोशी और बाद के कवि अदनान कफील दरवेश ने उस पर बेहतर कविताएं लिखीं और रचीं हैं। ईश्वर जब व्यक्तिगत आस्था का विषय हो गया हो तो धर्म के ठेकेदार पैगम्बर व रहनुमाओं के वेश में जनता को दिग्भ्रमित करने और बरगलाने लगते हैं। कवि स्वाप्निल भी उस घटना से अछूते नहीं रहे, वे भी धर्म की आड़ में चलने वाले इस साम्प्रदायिकता की आग को बखूबी पहचानते हैं। हत्या और जादू जैसे शब्द उनकी कविता में बारहा आते हैं, इस विरोधाभास व तनाव से कविता के तत्वों की अर्थवत्ता और बढ़ जाती है। समाज से सत्य, विनम्रता, नैतिकता, आदर्श जैसे मानवीय मूल्य सब गिर गयें हैं। चारो ओर सिर्फ झूठ का बोलबाला है। ऐसे समय में उनकी कविताएं हमें आश्वस्त करती प्रतीत होती हैं। 

 मसलन- झूठा आदमी~


"झूठा आदमी इतने यकीन के साथ झूठ बोलता है

कि हम उसे सच समझने की गलती करने

लग जाते हैं

वह हमारी बुद्धि हर लेता है

और हमें अपने अनुकूल बना लेता है

झूठा आदमी एक जादूगर की तरह

चमत्कार दिखाता है।"


या- नई खोज कविता देखें।~


"उसने सत्य और अहिंसा की जगह

लोगों के हाथ में त्रिशूल और तलवार

थमा दिया और कहा - तुम्हें एक

धर्मयुद्ध लड़ना है

बचोगे तो जनता तुम्हें अपना

नायक मान लेगी

शहीद हो जाओगे तो तुम्हारे लिए

स्वर्ग के दरवाजे खुल जाएँगे

नए तथ्य बताते हैं कि यह

पागलपन का दौर है

जो सच बोलेगा उसे मार दिया जाएगा।"


सत्ता और साम्प्रदायिकता का जब आपस में गठजोड़ हो जाता है तो समय और समाज का चेहरा विकृत और भयावह हो जाता है। साधारण मनुष्य इसमें घुटने और पिसने को विवश है। उसकी नियति में सिर्फ़ संघर्ष और जद्दोजहद की असंख्य रोड़े हैं। चुनांचे कवि अपने लिए दूसरी पृथ्वी की तलाश में है, जहाँ फ़कत मनुष्य रहते हों और मनुष्यता ही वहाँ का मजहब हो। उनकी कविताएं इस बात तस्दीक़ करती व विश्वास दिलाती हैं और साथ ही हमें आगाह भी करती हैं। द्रष्टव्य- विनम्रता ~


"मैं मनुष्य होना चाहता हूं

और वे मुझे मनुष्यहीन बनाना चाहते हैं

इस आदमखोर समय में लोग एक दूसरे को

भक्ष रहे हैं

क्या हम किसी जंगल में आ गये हैं ?"


यथा- रहनुमा ~ 


"वे हमारे लिये भूख का इलाज नहीं

मजहबी किताबें लेकर आये थे

और कहा था कि मजहब और खुदा

तुम्हारे सारे दुख दूर कर देंगे

धीरे – धीरे टिड्डी दल की तरह

हमारे इलाके में फैल गये

उन्होंने हमारे खेत नहीं हमारे

दिमाग को ढँक लिया था

हम अनाज बोने की तरकीब भूल कर

खेत में मजहब उगाने लगे

यह समझ हमें बहुत दिनों बाद

आयी कि जिन लोगों ने हमे लूटा था

वे हमारे ही रहनुमा थे."


आठवें नवें दशक की कविता में लोक का भाव संसार कवियों का प्रिय क्षेत्र बन गया था। ज्ञानेन्द्रपति, लीलधर मंडलोई, मदन कश्यप, अष्टभुजा शुक्ल, श्रीप्रकाश शुक्ल, एकांत श्रीवास्तव और स्वाप्निल श्रीवास्तव जैसे कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से पुनश्च लोक की महत्ता को स्थापित किया। कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविता का मुख्य स्वर उनका अपना लोक संसार है। जहाँ कवि का भावुक मन स्वच्छंद विचरण करता है। लोक उनकी कविता का स्थायी भाव है। हालांकि अब लोक तक शहर,सड़क और बाजार की पहुंच बढ़ती जा रही है। गाँव भी अब ग्लोबल में तब्दील होते जा रहे हैं।  महानगरों के बरक्स छोटे शहरों व कस्बो में रहते हुए कवि ने गाँव और शहर के जीवन को एक साथ साधा है और साथ ही उनके यहाँ प्रकृति और मनुष्य की वाज़िब चिन्ताएं भी हैं। 

जैसे- परिन्दे कम होते जा रहे हैं~


"परिंदे कम होते जा रहे हैं

शहरों में तो पहले नहीं थे

अब गाँवों की यह हालत है कि

जो परिंदे महीने भर पहले

पेड़ों पर दिखाई देते थे

वे अब स्वप्न में भी नही दिखाई देते

सारे जंगल झुरमुट

उजड़ते जा रहे हैं

कहाँ रहेंगे परिंदे

शिकारी के लिए और भी सुविधा है

वे विरल जंगलों में परिंदों को

खोज लेते हैं।"


जैसे - गुठली ~ 


"यह गुठली नही क्रांतिबीज है

जिसमें वृक्षों की अनेकानेक संततियाँ

जन्म लेने के लिए बेचैन हैं

इसके भीतर

वृक्षों की दुनिया को कोलाहल से भरनेवाले

परिंदे छिपे हुए हुए हैं।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं में प्रेम के स्वाप्निल लोक संसार के कई तहें हैं, जो उनकी गहन ऐन्द्रीकता की तासीर का पता देती है। उनके यहाँ प्रेम के उदात्त व सात्विक रुप हैं। और उनके उदाहरण भी जीवन जगह की रोजमर्रा से होकर आते हैं। यह निरा वायवीय नहीं बल्कि दुनियावी प्रेम है, जो भौतिकता के बाह्याडंबर से कोसों दूर है। उनके यहाँ दोनों तरफ का प्रेम एक रुपक की तरह है। जैसे दरवाजे और खिड़कियां एक दूसरे की पूरक हैं। उनकी ही तीन कविताओं के मार्फ़त यह बात और स्पष्ट होगी। उनकी कविता में प्रकृति और प्रेम की ऐहिकता का एक अद्भुत संयोग है, जो एक दूसरे में अनुस्यूत है। जैसे नदी में नाव, बाँसुरी में साँस और सुई में धागा एक दूसरे के बिना अधूरे हैं वैसे ही प्रेम के बिना मनुष्य जीवन। प्रेम के लिए नदी का नाव से संबंध इसका सबसे मुफीद व मौज़ू उदाहरण है। 

यथा- भवसागर ~


"जिस नांव को तुम मझधार में

छोड़ कर चली गयी थी

उसे किनारे तक लाने में काफी

समय लगा

कभी नदी में आ जाती थी बाढ़

कभी तूफान का सामना करना

पड़ता था

कभी नदी में इतना कम पानी

हो जाता था कि ठहर जाती थी नांव

मुझे बारिश का इंतजार करना

पड़ता था"


या - जैसे - बाँसुरी~


"मैं बाँस का एक टुकड़ा था

तुमने मुझे यातना दे कर

बाँसुरी बनाया

मैं तुम्हारे आनंद के लिए

बजता रहा

फिर रख दिया जाता रहा

घर के अँधेरे कोने में

जब तुम्हें खुश होना होता था

तुम मुझे बजाते थे

मेरे रोम रोम में पिघलती थीं

तुम्हारी साँसें

मैं दर्द से भर जाया करता था

तुमने मुझे बाँस के कोठ से

अलग किया

अपने ओठों से लगाया

मैं इस पीड़ा को भूल गया कि

मेरे अंदर कितने छेद हैं"


जैसे- कमीज़ ~


"आज आलमारी से मैंने

तुम्हारे पसंद की कमीज निकाली

उसके सारे बटन टूटे हुए थे

तुमने न जाने कहाँ रख दिया

मेरी जिंदगी का सुई धागा

बिना बटन की कमीज

जैसे बिना दाँत का कोई आदमी"


समय और युग में परिवर्तन के साथ मनुष्य और ईश्वर के बीच के संबंधों में भी परिवर्तन अवश्यसंभावी था। ईश्वर अब व्यक्तिगत आस्था के विषय के साथ जो प्रत्यक्ष था, उसे ही उसके स्थानापन्न के रुप में स्वीकार किया। यहाँ किसी अपरोक्ष या मनुष्येत्तर सत्ता के लिए अवकाश न रह गया था। स्वाप्निल की कविताओं में ईश्वर जीवन के साथ लगा हुआ साहचर्य के रुप में आता है। अगरचे जीवन का फ़लसफा इतना आसान नहीं है, कि एक टेक भर से उसे जिया जा सके। अलबत्ता एक लाठी ईश्वर के मानिन्द उसके यहाँ भी मौजूद है। द्रष्टव्य- ईश्वर एक लाठी है।~


"ईश्वर एक लाठी है जिसके

सहारे अब तक चल रहे हैं पिता

मैं जानता हूँ कहाँ कहाँ दरक गई है

उनकी कमजोर लाठी

रात को जब सोते हैं पिता उनके

लाठी के अंदर चालते हैं घुन

वे उनकी नींद में चले जाते हैं।"


स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं का शिल्प,अंतर्वस्तु अनुरूप ऊपर से सहल और सरल तो दिखाई देती हैं,परन्तु उसके भीतर एक हाहाकार और उष्णता है। वह जटिलता और दुर्बोधता के आवरण से मुक्त लेकिन निरा सपाटबयानी से अलग एक आंतरिक लय को आत्मसात करके चलती है। जहाँ शिल्प का आवरण कमजोर है वहाँ उनकी कविताएं आश्वस्त करती हैं। कवि स्वाप्निल का ध्यान शिल्प के चमत्कार से ज्यादा कविताओं के अंतर्वस्तु पर टिका है। लोक के बदलते स्वरूप व भाव के अनुसार उनकी भाषा है। उनकी भाषा में खड़ीबोली हिन्दी के साथ ही अवधी और भोजपुरी के भी शब्दों का मेल है। गुठली, लाठी,घुन, कमीज, दरक, ताख, कोठ, दियासलाई,झुरमुट, मझधार, ठहरना,खूँटी, कलमदान इत्यादि जैसे शब्द लोक से होकर आते हैं, जो उनकी कविता में स्वाभाविक रुप से समाहित हो जाते हैं,जिससे उनकी कविता को दूर से ही बिना कवि का नाम लिए पहचाना जा सकता है। प्रतीक ,बिम्ब और मुहावरे उनकी कविता का नैसर्गिक रुप हैं जैसे लाठी को ईश्वर के प्रतीक के रुप में प्रयोग और 'बिना बटन की कमीज जैसे बिना दाँत का कोई आदमी' का उपमान भी द्रष्टव्य है। स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताओं का आस्वाद में लोक का गहरा बयान है। जो कविता के माँग के अनुरूप है। जैसे गमछा के अनुरूप उनकी कविताओं के गंध को भी दूर से पहचाना जा सकता है। जैसे-गमछा~


"फसलें कट चुकी हैं

किसी मजूर का पसीने से

तरबतर गमछा यहाँ

छूटा हुआ है

उसका लड़का ढूँढ़ते हुए

यहाँ आएगा

पसीने की गंध से

पहचान जाएगा कि यह

उसके बाप का गमछा है"


बहरहाल, कवि स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताएं अपने समय समकाल को उद्घाटित करती चलती हैं। वे लोक से संबंध्द होकर समाज और परिवेश से गहराई से जुड़ती हैं। उनकी कविताएं मनुष्यता की पैरोकार हैं और यह हमारे समय के लिए आश्वस्तिकारक है कि जब प्रकृति,लोक और मनुष्य के ऐहिक संबंध को बचाना सबसे जरुरी है,ऐसे में कविता ही इसमें अपनी मौजूदगी से सार्थक हस्तक्षेप कर सकती है। जब समाज को बर्बर और क्रूर होने से बचाना है और सत्ता व साम्प्रदायिकता की चिंगारी से उसे सुरक्षित रखना है तो ऐसे में कविता ही एकमात्र विकल्प है जो सत्ता का प्रत्याख्यान व प्रतिपक्ष रच सकती है। इस तरह स्वाप्निल श्रीवास्तव की कविताएं हमारे मौजूदा समय में मनुष्यता, लोक संवेदना और जनपक्षधर हकीकत का सार्थक बयान करती हैं।


                           डॉ.अवनीश मिश्र

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हिंदी विभाग , काशी हिंदू विश्वविद्यालय , वाराणसी।

Monday, 11 January 2021

रविशंकर उपाध्याय (12 जनवरी, 1985 - 19 मई, 2014) : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू

 


कवि परिचय : रविशंकर उपाध्याय (12 जनवरी, 1985 - 19 मई, 2014)

रविशंकर उपाध्याय का जन्म ग्राम अकोढ़ी, जिला कैमूर (बिहार) के एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ। इन्होंने प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा गाँव से प्राप्त की और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक और परास्नातक हुये। यहीं से कुँवर नारायण की कविताओं पर शोध किया और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 'अखिल भारतीय युवा कवि संगम’ का सफल आयोजनकर्ता रहे।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित। का.हि.वि.वि. के हिन्दी विभाग की पत्रिका 'सम्भावना’ के आरम्भिक तीन अंकों का सम्पादन तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सृजनशीलता पर केन्द्रित 'संवेद’ पत्रिका के फरवरी, 2013 अंक का अतिथि सम्पादन। निधन के बाद 'उम्मीद अब भी बाकी है' (कविता संग्रह) राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित।

युवा कवि रविशंकर उपाध्याय का 19 मई 2014 को बीएचयू अस्पताल में तीस वर्ष की अवस्था में ही ब्रेन हैमरेज से निधन हो गया था।

उनकी स्मृति में 'रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार’ क्रमशः  पहला पुरस्कार वर्ष 2015 में रांची की युवा कवयित्री जसिंता केरकेट्टा को ,दूसरा पुरस्कार  वर्ष 2016 में बलिया के अमृत सागर को,तीसरा पुरस्कार वर्ष 2017 में दिल्ली के निखिल आनंद गिरि को , चौथा पुरस्कार वर्ष 2018 बलिया  के अदनान कफ़ील दरवेश को , पांचवां  पुरस्कार सीतापुर के शैलेन्द्र कुमार शुक्ल को  , छठवाँ गोसाईंगंज(अम्बेडकर नगर) युवा कवि संदीप को और सातवाँ दिल्ली के गौरव भारती को दिया जा चुका है।

सम्मान समिति के सम्मानित सदस्य :-
कवि अरुण कमल(पटना), आलोचक अरुण होता (कोलकाता), कवि मदन कश्यप(दिल्ली),कथाकार अखिलेश(लखनऊ), और  कवि प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल(वाराणसी) ,वंशीधर उपाध्याय एवं अन्य।

आज रविशंकर की जन्मतिथि है. इस अवसर पर उन्हें याद करते हुए। आज उनकी एक कविता 'सम्भावना समूह' में प्रस्तुत है...

उम्मीद अब भी बाकी है

जब धुंधली होने लगती है
उम्मीद की किरण
जब टूटने लगता है आशा और विश्वास
तभी प्रकृति की अनंत दुनिया में से
आती है आश्वासन की एक आवाज
जो धीरे-धीरे भर देती है
एक ललक जीवन की उद्दाम आकांक्षाओं की

भय और विश्वास के बीच
जीतता सदैव विश्वास ही है
भले ही सीता को हर ले जाए रावण
भले ही भिक्षा में मांग ले जाए इंद्र कवच-कुंडल
भले ही कारागार में डाल दिए जाय देवकी और वासुदेव
भले ही अनसुनी कर दी जाए
नागासाकी और हिरोशिमा से उठती कराह…
भले ही मिट्टी में मिला दी जाए
करुणा और शांति की आदमकद प्रतिमाएं
भले ही बार-बार प्रहार करें
मनुष्यता के दुश्मन बनारस और लाहौर पर
भले ही न बख्शा जाए
घंटे की ध्वनि और अजान की आवाज
भले ही न बख्शी जाए
गंगा और जमुना की अजस्र धारा
भले ही न छोड़ी जाए
कोयल की कोकिल कंठी तान से मुलायम हो रही डाल
भले ही उजाड़ दिए जाएं
चिड़ियों के घोंसले

अपने वजूद और अपनी मिट्टी से
जुड़े लोगों को
उनकी आदिम आकांक्षाएं बचा ही लेंगी
जब तक बची रहेगी
पृथ्वी!


रविशंकर उपाध्याय की अन्य कविताएँ निम्न लिंक पर प्रस्तुत हैं...

https://golendragyan.blogspot.com/2020/12/drravishankar-upadhyaya.html


-गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू

मो.नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Wednesday, 23 December 2020

👁️दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए अनमोल ख़ज़ाना : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू 👁️

 

 👁️दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए अनमोल ख़ज़ाना : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू  



हिंदी साहित्य : विषय और वक्ता【लिंक पर क्लिक कर वीडियो डाउनलोड करें।】
तुलसी के राम :- प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह【आलोचक व आचार्य ~ जेएनयू】
लिंक : https://youtu.be/8K4WGoZELz4
1. महामारी में तुलसीदास :-  प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल 【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/I3u2XqxGhSA
2. भारतीय भक्ति काव्य :- प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय【आलोचक व  - जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/Nh7ButeWqCs
3. तुलसी की कविता और मनुष्य :- प्रोफेसर उमेश कुमार राय 【गौरी देवी राजकीय महिला महाविद्यालय- अलवर】
लिंक :- https://youtu.be/RZYnPHmZXVs
4. तुलसी की कविताई :- डॉक्टर मलखान सिंह 【जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/dM0ahhRkERg
5. वाल्मीकि रामायण का सामाजिक महत्त्व : - प्रोफेसर अवधेश प्रधान 【कवि , आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/_Lwc2eBOczY
6. निराला की कालजयी कृति “राम की शक्ति पूजा” :- प्रोफेसर प्रमोद कुमार सिंह【आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/p2GwRiqw-k8
7. निराला की राम की शक्ति पूजा :- प्रो. आशीष त्रिपाठी【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/uzo0Cq_pXzE
8. तुलसी के दलित सरोकार :-  प्रोफेसर श्रीभगवान सिंह【आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/rFN_z5--_2g
9. भारतीय संस्कृति और तुलसीदास :- प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित【आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/F0qlRqQcgms
10. तुलसीदास और आधुनिक कवि मन :- प्रोफेसर प्रभाकर सिंह【आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/XACje_o7vPc
11. तुलसीदास और क्वचिदन्यतोऽपि :- अष्टभुजा शुक्ल【कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/3J7MYMxQIAI
12. तुलसी के काव्य स्रोत :- प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी【संस्कृताचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/ZX56gsGpFhY
13. कलिकाल और रामराज्य :-  डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/HrBDLQK9kI4
14. लोक की सीता :- प्रोफेसर अवधेश प्रधान 【कवि , आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/ydZigMRxJn0
15. आदिकाल और भक्तिकाल (वर्चस्व बनाम प्रतिरोध की संस्कृति और साहित्य) :- प्रोफेसर चौथीराम यादव【लोकधर्मी आलोचक व आचार्या】
लिंक :- https://youtu.be/lxP9NDtxUs0
16. संत काव्य में लोक जागरण :- प्रोफेसर अशोक कुमार【आचार्य - पंजाब वि.वि.】
लिंक :- https://youtu.be/3IyfyiQ97aI
17. गोरखनाथ “धीरे धरिबा पाँव” :- प्रोफेसर सदानंद शाही【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/CqjqKhZZNko
18. हिंदी समाज और गोरखनाथ :- प्रोफेसर मनोज सिंह【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/3NnoVYQ7Nj4
19. हिन्दी साहित्य का आदिकाल कुछ उधेड़बुन :- प्रो. सदानंद शाही【कवि , आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/kcjpjp43JwM
20. पद्मावत और जायसी :- प्रोफेसर रामबक्ष जाट【आचार्य – जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/vx9JFC3WS6k
21. सूरदास की कृष्ण कथा “भ्रमरगीत सार” :- प्रोफेसर रामबक्ष जाट【आचार्य – जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/me0rRMpo904
22. निराला का चिंतन परक साहित्य :- प्रोफेसर श्रद्धा सिंह【आलोचक व आचार्य - बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/dsSU2Wz13yE
23. “जायसी : एक पुनर्विचार” :- प्रोफेसर मनोज सिंह【आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/J75cJYjT0Sc
24. कबीर की कविताई :- प्रोफेसर के.के. सिंह【महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा】
लिंक :- https://youtu.be/DC3dfX8DCrI
25. हिंदी में कृष्ण काव्य परंपरा :- असि.प्रो. श्रीहरि त्रिपाठी【बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी】
लिंक :- https://youtu.be/xpmGNk37VDY
26. “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : पुंसवाद और धर्मनिरपेक्षता” :- प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी【आलोचक व आचार्य – कोलकाता विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/gw9flfexf68
27. प्यार और आलोचना के द्वंद्वात्मक संबंध के प्रतिक डॉ. नामवर सिंह :- प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
लिंक :- https://youtu.be/cN25mtoX-io
28. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास दृष्टि :- प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
लिंक :- https://youtu.be/35u48IxuSjY
29. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि :- प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी
लिंक :- https://youtu.be/UHq0qPaAM6k
30. स्त्री आत्मकथा के विविध पक्ष :- प्रोफेसर सुधा सिंह【आलोचक व आचार्य – दिल्ली विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/XT4-sbxcaGc 
31. स्त्री : संस्कृति और स्वाधीनता :- प्रोफेसर सुधा सिंह【दिल्ली विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/C4EOTniRufg
32. स्त्री संदर्भ में मेरी रचनाशीलता :- प्रोफेसर चंद्रकला त्रिपाठी【आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/4L6_y_i7M4o
33. कथा साहित्य का सृजन :- प्रोफेसर ममता कालिया【कवि व कथाकार】
लिंक :- https://youtu.be/bEqp6Y10jXM
34. प्रगतिशील आलोचना और रामचरितमानस :- प्रोफेसर सर्वेश सिंह【कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/S4Az-ExMob8
35. रीतिकाव्य : एक पुनर्विचार :- प्रोफेसर सर्वेश सिंह
लिंक :- https://youtu.be/sn5u5Mafm6E
36. नक्सलबाड़ी और कविता :- प्रोफेसर चंद्रेश्वर【कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/RENZeV_BZHk
37. रीतिकाव्य : पढ़ने के सूत्र :-  प्रोफेसर प्रभाकर सिंह【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/QCNhKa37VoU
38. हिंदी कविता और समकाल :- कवि मंगलेश डबराल
लिंक :- https://youtu.be/THlyHbrgrqY
39. भूमंडलीकरण और हिन्दी कविता :- प्रोफेसर अरुण होता【आलोचक व आचार्या】
लिंक :- https://youtu.be/jCaRsUrD_Io
40. कोरोजीवी कविता और श्रीप्रकाश शुक्ल :- अनिल कुमार पाण्डेय【युवा कवि व आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/GxILOrPzTH0
41. दलित स्त्री एवं दलित हिन्दी कविता :- डॉ.प्रियंका सोनकर【कवयित्री , असि.प्रो.- बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/-FX6qydSuPw
42. प्रेमचंद और आज का समय :- प्रोफेसर अजय तिवारी【आचार्य – दिल्ली वि.वि.】
लिंक :- https://youtu.be/28BXlcDhJXY
43. डॉक्टर नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि :- कवि राजेश जोशी
लिंक :- https://youtu.be/WUtKaF4ZHaM
44. अज्ञेय की कविताई :- प्रोफेसर अनंत मिश्र【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/WdxlQWntuwI
45. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की काव्य यात्रा :-  प्रोफेसर नरेंद्र मिश्र【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/YElgLr9AzE8
46. नयी कहानी आन्दोलन और फणीश्वरनाथ रेणु :- प्रोफेसर नीरज खरे【कवि ,आलोचक व आचार्य-बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/1AVo5YVSpPc
47. प्रेमचंद : कल ,आज और कल :- प्रोफेसर विनय कुमार【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :-भाग-1 -  https://youtu.be/GdaeC7qUKgE ,2-  https://youtu.be/GkQ659rzn04
48. छायावादी कविता में मुक्ति का स्वर :-  प्रोफेसर चंद्रदेव यादव【कवि , आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/vkz-1qGKkiw
49. मनुष्य प्रकृति और साहित्य :- प्रोफेसर सुरेंद्र दुबे【आलोचक , आचार्य व  कुलपति - सिद्धार्थ विश्वविद्यालय , कपिलवस्तु , सिद्धार्थनगर】
लिंक :- https://youtu.be/iYMKxHkCrFw
50. भारतेंदु और उनका युग :- प्रोफेसर राजेश गर्ग【आलोचक व आचार्य – इलहाबाद वि.वि.】
लिंक :- https://youtu.be/fyrFXISCN8k
51. मुंशी प्रेमचंद का गोदान :- प्रोफेसर जितेंद्र श्रीवास्तव【कवि , आलोचक व आचार्य -इग्नू】
लिंक :- https://youtu.be/MlGFc1tYAy4
52. विद्यापति और स्त्री :- प्रोफेसर चंद्रदेव यादव【जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय , नयी दिल्ली】
लिंक :- https://youtu.be/zbvhmz-fB9E
53. विद्यापति की पदावली : स्त्री की नजर से :- प्रोफेसर पुनम कुमारी【जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/Zqw8xuW6Y_U
54. तारसप्तक , प्रयोगवाद और रामविलास शर्मा :-  प्रोफेसर सत्यपाल शर्मा【आलोचक व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/a8HvXPy1BaE
55. नवगीत आज की कविता :- डॉक्टर इंदीवर पाण्डेय【नवगीत के आलोचक】
लिंक :- https://youtu.be/CApoemR8ahY  ,     https://youtu.be/tnGhZ4BKCOI
56. लोक साहित्य (लोकगीत) :-  उदय पाल【शोधार्थी – बीएचयू , हिंदी विभाग】
लिंक :- https://youtu.be/ltpr5aWkkIw
57. बाबा नागार्जुन की कविता का सौंदर्य पक्ष :- अमरजीत राम【युवा कवि व असिस्टेंट प्रोफेसर】
लिंक :- https://youtu.be/uXuPmvsCPE0
58. हिंदी पत्रकारिता : तब और अब :- प्रोफेसर रामशरण जोशी 
लिंक :- https://youtu.be/GmpneMgXvDU
59. आदिवासी साहित्य में शोध की संभावनाएं :- डॉक्टर गंगा सहाय मीणा【असिस्टेंट प्रोफेसर – जेएनयू】
लिंक :- https://youtu.be/Jpjz5aDqWKk
60. शोध प्रविधि में नवाचार :-  प्रोफेसर देवशंकर नवीन【आलोचक व आचार्य】
लिंक :- https://youtu.be/xSz4f66n02g
61. अज्ञेय और मुक्तिबोध : प्रतिश्रुति के क्षेत्र :-  प्रोफेसर अनिल राय【आचार्य – दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/pprMVAgEeec

62. कोरोजीवी कविता : प्रक्रिया और पाठ :- प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल【कवि व आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/BSor_9zVY-s
63. महामारी में मदन कश्यप :- कवि श्रीप्रकाश शुक्ल【आचार्य – बीएचयू】
लिंक :- https://youtu.be/8ScfqJBOrmY
64. डॉक्टर राहत इंदौर साहब :- डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता【असिस्टेंट प्रोफेसर – इलहाबाद विश्वविद्यालय】
लिंक :- https://youtu.be/tHVxRFcbF5A
65. अन्य विषयों के लिए यूट्यूब लिंक :- https://www.youtube.com/c/GolendraGyan


संकलन कर्ता :- युवा कवि गोलेन्द्र पटेल【स्नातक का छात्र , काशी हिंदू विश्वविद्यालय , वाराणसी】

परिचय :-
नाम :- गोलेन्द्र पटेल
जन्म :- ०५-०८-१९९९
शिक्षा :- बीएचयू में स्नातक का छात्र【हिंदी हॉनर्स , तृतीय वर्ष】
माता-पिता :- श्रीमती उत्तम देवी – श्री नन्दलाल
भाषा :- हिंदी
विधा :- कविता 
पता :- ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी ,जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत।
पिन कोड :- 221009
ह्वाट्सएप नं. :- 8429249326
ईमेल :- corojivi@gmail.com


नोट :- यह पीडीएफ नोटस् दृष्टिबाधित विद्यार्थी साथियों के कहने पर तैयार किया गया है। अतः आप से साहित्यिक सहृदय सविनय निवेदन है कि आप इसे दृष्टिबाधित एवं दिव्यांग विद्यार्थियों तक पहुंचने की कृपा करें। जिससे वे हिंदी भाषा व  साहित्य का अध्ययन-अनुशीलन करने में “उक्त वक्तव्य निधियों” का सहयोग ले सकें। 

दिव्यांग साथियों के अभिभावकों से अतिविनम्र निवेदन है कि आप निम्न लिंक पर क्लिक कर यूट्यूब चैनल , फेसबुक पेज और ब्लॉग पेज से जुड़ें। यहाँ अध्ययन के लिए बहुत सारी सामग्री उपलब्ध है और होता रहेगा। आप हमारे ह्वाट्सएप नंबर पर रविवार को संपर्क कर सकते हैं। संपर्क समय :- सुबह 8 बजे से 12 बजे तक।

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ह्वाट्सएप :- 8429249326
दिव्यांगसेवी
गोलेन्द्र पटेल
स्नातक का छात्र
काशी हिंदू विश्वविद्यालय , वाराणसी

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...