Wednesday, 17 August 2022

क्या तुम इसका उत्तर जानते हो? : गोलेन्द्र पटेल


क्या तुम इसका उत्तर जानते हो?

यह है आज़ादी के
अमृत महोत्सव का वातावरण
भाषा पर भुजा
व भूख पर भय हावी है
आँसू की नदी में नीति की नाव नहीं
डूबा भावी नावी है
मटके पर मुल्क का मन अटक गया
पर , पानी की पीड़ा पसीने को पता है
धर्मराज!
मैं अछूत की कविता हूँ
सृजनात्मक समाज का सोच नया शब्द-स्वर
जाति की ज्योति - जीवन की जीवटता
जन्मजात जिज्ञासा - जीव की जिजीविषा
मैं मानवीय संवेदना की सरिता हूँ
आज़ाद भारत के महाभारत का भविष्यपर्व
अर्थात् अनकहा गीता हूँ
मुझे मालूम है
मेरा शब्दसपूत अर्थार्जुन से जंग जीता है
वह सहृदय में समय का सविता है
मृत्यु की गोद में सोना
उसके लिए अंतिम बार रोना है

कृष्ण!
मेरे एकलव्य को देखे हो
द्रोणाचार्य को दिया उसका अँगूठा
अक्षर से आकृति बना रहा है
अँधेरे के चेहरे पर
मैं चाहती हूँ कि वह इसे रोके
अन्यथा आवाज़
अंतःकरण से बाहर आते ही
धर्म की ध्वनि को शोर में परिवर्तित कर देगी
और तुम्हारा सपना 
संघर्ष के संग्राम में स्वाहा हो जाएगा
मृत्यु का मौसम वसंत से अच्छा है
जंगल - यह ख़ून से गीला
किसका कच्छा है?

पहाड़ का हाड़ पहाड़ा से जोड़ता प्रश्न
भूगोल के लिए कठिन है
हर! हर
दिन दीन के लिए दुर्दिन है 
भीष्म को अपनी प्रतिज्ञा प्यारी है
किन्तु कर्ण को परिवर्तन की चाह है
बेवजह चालान कट रही है
यह कैसी राह है?

मेरी आँखों का तारा
हालात से हारा है
समरसता का स्वाद उसे मारा है
उसकी प्यास इतिहास का आन्दोलन है
वह पाण्डुलिपियों में
पेड़ के प्रतिबिंब का प्रदोलन है
हवा में ख़ुशबू नहीं
तैर रही है सनसनी ख़बर 
व्यवस्था के विरुद्ध युद्ध की बात
कर रही है रात
अपनी है न 
जात
भात के लिए तरस रही है!

आँचल के कोर भोर होने से पहले भीग गये हैं
चाक चरमपंथी के आगे कब तक चुप रहेगा?
नाथ! दुख का हाथ 
सुबह से शाम तक उसके साथ है
आज मिट्टी बिना वह अनाथ है
मगर मिट्टी पास है
जो आँवाँ में नहीं
चेतना के चूल्हे में पकेगी
एक अनूठी अभिव्यक्ति के रंग में राग अड़ा है
औंधा घड़ा पर बड़ा 
किन्तु एकदम गोल सवाल खड़ा है
जो अपने अस्तित्व के लिए
बहुत लड़ा है

संजय!
क्या तुम इसका उत्तर जानते हो?
क्या तुम उस माँ की चीख सुन सकते हो?
गंधारी की पट्टी से बाहर झाँक रही हैं पुतलियाँ
व्यास वीरों के तीरों की वृष्टि से आहत हैं
इंद्र की आँखों से ढुलकीं
आँसू की बूंदें उनकी स्याही में जा मिलीं 

वे लिख रहे हैं इंद्रनामा
जिसे धृतराष्ट्र की तरह
संवैधानिक संज्ञा - न्याय पढ़ने में असमर्थ है
क्या उनका लिखना व्यर्थ है?

उत्तर दो गुरु!

(©गोलेन्द्र पटेल
17-08-2022)

कवि : गोलेन्द्र पटेल

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com





 

Friday, 12 August 2022

आज़ादी का अमृत महोत्सव : गोलेन्द्र पटेल / 15 अगस्त पर ख़ास कवित

 

आज़ादी का अमृत महोत्सव

पचहत्तर साल बाद आज़ादी का अमृत महोत्सव
वहाँ मनाया जा रहा है
जहाँ हर आदमी नंगा है
उनका प्रधानमंत्री भिखमंगा है
उनके घर नहीं, तिरपाल पर तिरंगा है
जो धूमिल की आँखों में
सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है
सावन में बहुत घाम है
मानो किसान-मजदूर के लिए सुबह ही शाम है

उनके वोट का दाम सड़े हुए गेहूँ की एक रोटी है
उनका नारा है - 'तुम मुझे अन्न दो , मैं तुम्हें वोट दूँगा'
लोकतंत्र के लोक और लोग अब सवाल हैं
संविधान के शब्द संसद की सड़क पर उतर गये हैं
लेकिन संत और सिपाही उनके ढाल हैं

चारों ओर आश्वासन की आवाज़ गूँज रही है
धरती धधक रही है
सारे जंगल जल रहे हैं , गाँव-शहर सुलग रहे हैं
नदी-समुद्र के जल खौल रहे हैं
पर , आसमान में धुआँ तनिक भी नहीं है
मौसम मुस्कुरा रहा है मंद-मंद
भूख गुनगुना रही है आँत में आँसू का छंद
उनको चारण कवि का कलाकंद पसंद है
लेकिन वे समय सापेक्ष सत्य के स्वर से डरते हैं

पहाड़ की चीख से चौक चौंक रहा है
चाय की चुस्की से उत्पन्न
बहस की बातें लंबी उड़ान भर रही हैं
हृदय को चीरता हुआ चित्र अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर है
चूल्हा गर्भवती चुहिया को देखकर
लज्जा महसूस कर रहा है
उसकी दृष्टि में देश का नक्शा उसकी पीड़ा की परछाँई है
अँधेरे का आरा आज़ादी को तीन बराबर हिस्सों में काट चुका है
(आ-ज़ा-दी : एक खंड उनका है
दूसरा खंड इनका है
तीसरा खंड बाँटने वाली बिल्ली की है
कोई आवाज़ - दिल्ली की है!)
सहानुभूति बुरे समय में सूखे की पूँजी है
कतार में खड़े लोगों के हाथों में
सत्ता की सड़ी सूजी है

पेड़ के नीचे आदमी जब गहरी नींद में होता है
तब कुत्ता भी कभी-कभी मुँह पर मूत देता है
चिड़िया तो खैर दिनदहाड़े चेहरे पर हगती है
मैं मात्रा की यात्रा में सोचता हूँ___
क्या भारत की संतानें पेड़ के नीचे सोना छोड़ दें?
फिर चुपचाप चला जाता हूँ दिमाग से दिल में
जहाँ मासिकधर्म में डूबे हुए दो-चार विचार हैं
अजीब सी संबंध की गंध है
तीमार क्रियाएँ वक्ष के वक्तव्य में बीमार हैं

मैं अचानक जले हुए स्वप्नों के ढेर पर देखता हूँ
रंगा-सियार मस्त है
आज उसी का पन्द्रह अगस्त है
बगल में कोई आदमी उल्टी-दस्त से पस्त है
मानो वह अस्त है
सो, सभ्य सियार अपने में व्यस्त है!

फिर भी मृत्यु आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रही है
वह प्रश्न की पीठ पर आत्महत्या का बोझ लाद रही है
वह नीति की नाक को परंपरा की पालिश से चमका रही है
लेकिन चमड़े की मुहावरे से चुनाव का चेहरा
देखो, दृश्य में देवता का दोहरा चरित्र है
नफरत की नयी नज़र में बुद्ध, तुलसी व गाँधी वगैरह
सब मर चुके हैं बची हैं केवल घृणा-तृष्णा

सिर्फ़ एक अक्षर बीज-मन्त्र
चरैवेति, चरैवेति, अब भी कोई चीख
शब्द के भीतर गूँज रही है
बेचैन बुद्धि की ज़र्द जिरह में संभोग से सिद्ध तन्त्र
क्या जनतंत्र है?
जादुई जुल्म की दिशाएँ दुनिया में अनेक हैं
पर , आज भी कुछ इरादे नेक हैं
जो भाषा में अमर हैं!!

©गोलेन्द्र पटेल
रचना : 13-08-2022

कवि : गोलेन्द्र पटेल
🙏संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Wednesday, 10 August 2022

बहन पर केंद्रित कविताएँ / रक्षाबंधन / बौद्ध रक्खासुत्तबंध दिवस : गोलेन्द्र पटेल

बहन पर केंद्रित कविताएँ :  गोलेन्द्र पटेल 
1).

जरई

धूल में धम्मधर्मी ध्वनि की जय है

धूप ने खिले हुए फूलों से कहा 
कि शब्द और संवेदना के बीच 
मानवीय संबंधों की लय है 

एक स्त्री को रोते देख 
दूसरी स्त्री का रोना 
असल में एक दूसरे का दु:ख समझना है 

पाँच दाने गेहूँ 
शेष जौ 
भूखे पेट सींचना 
रक्षाबंधन जैसा पर्व मनाना है 

कजरी के दिन जरई कबारती हुयीं बहनें
नदी में डुबकी लगाकर 
क्या कहती हैं?

यह तो हम नहीं जानते
न ही हमने कभी यह जानने की कोशिश की
कि वे क्या कहती हैं 

लेकिन हमने यह ज़रूर महसूस किया है 
कि बहनों के बिना 
आँगन की तुलसी सूख जाती है 
और सूख जाते हैं पेड़ 
उनके बिना न घर चिक्कन होता है 
न दुआर 

उनके होने से होता है 
चिड़ियों का कलरव 
झरनों के स्वर में पर्वत के गीत 
और भाइयों की भाषा में आँखों की नमी 

वे विश्वास का पर्याय होती हैं 
जैसे संतान के लिए माँ

बहनें कलह नहीं, कला प्रिय होती हैं 
वे बनाती हैं पतलो-काशा की कुरई, डोलची, सिकौली, झाँपी...
वे बनाती हैं बाँस का बेना
बुनती हैं एक से एक डिज़ाइन वाले स्वेटर 
वे रचती हैं रूमाल पर नई रचना
नई चेतना 

उनकी जरई स्नान से जुड़ी हुयीं यादें 
उन्हें पूरे साल 
धरती होने का बोध कराती हैं 
वे चूल्हे की आँच से सींझती हुई कहानी सुनाती हैं 
वे सुनाती हैं नाँद में चाँद के उतरने के किस्से 
सपनों के संगीत 

उनके स्नेह से अँजोरिया है 
उनकी बातें सुनने के लिये ढिबरी जलती है पूरी रात 

वे कतकी व तीज पर कूजती हैं
उनसे जरई बँधवाते हुए हमने जाना 
बहनापा का वैश्विक मतलब भाईचारा से व्यापक है 
और हमने उनसे सीखा 
बुरे वक्त में 
वेदना को उत्सवगान में बदलने का हुनर

हमारी बहनें 
साहस व सहजता के धरातल पर 
उम्मीद हैं!

2).

धागा

पाण्डुलिपियों में पर्व की परंपरा बची है
लेकिन आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से
अभी तक प्रेम का प्रमेय हल नहीं हुआ है
गणितज्ञ के यज्ञ में श्लोक नहीं,
सूत्र का स्वाहा है
हर युग इसका उदात्त उत्तर चाहा है

धरती और आसमान आँसू की आवाज़ सुनो!

न तो उसका कोई भाई है
न तो उसकी कोई बहन
वह तो महज़ एक पेड़ है
फिर भी उसे धागा बाँधा जा रहा है
पत्थर को भी धागा बाँधा जा रहा है
क्या इस धागे में रक्षाबंधन की रक्षा सूत्र नहीं है?

पत्थर पेड़ की तरह मनोवांछित फल देता है
ओ रूढ़ रव!
ऐसी सामाजिक व्यवस्था है 
कि धागे से अटूट आस्था है

एक धागा प्रेम का प्रतीक है
जिसके टूटने से तन नहीं,
मन टूट जाता है

क्या यह वही है?

3).

गगरी

माँ ने बहन से कहा कि मेरी बच्ची
जहाँ चार-छह गगरी होंगी
वहाँ से ठन-ठन की आवाज़ आना स्वाभाविक है

लेकिन आज से ठीक तेइस बरस पहले
नानी ने माँ से कहा था कि मेरी बच्ची
यदि गगरी ठनठनही निकल जाए,
तो उसे चार बार बदली जाती है

गगरी वही है 
पर, परिस्थिति अलग है
जो कि उसका अर्थ बदल रही है
बेटी माँ की तरह गल रही है!

4).

बहन का मतलब

अंग्रेजी में ‘बहन’ को ‘सिस्टर’ कहते हैं
जिसका मशहूर मतलब है
‘स्वीट’, ‘इनोसेंट’, ‘सुपर’, ‘टैलेंटेड’, ‘एलिगेंट’ और ‘रिमार्केबल’

हिन्दी में बहन का पहला मतलब है
‘ब’ से ‘बज़्म’ है बहन 
‘ह’ से ‘हथौटी’ है बहन 
‘न’ से ‘नज़्म’ है बहन

बहन का दूसरा मतलब है
‘ब’ से ‘बल’ है बहन (भाई का)
‘ह’ से ‘हल’ है बहन (हर सवाल का)
‘न’ से ‘नल’ है बहन (पानी का)

बहन का तीसरा मतलब है
‘ब’ से बाप के लिए बधाई बन जाना 
‘ह’ से हक के लिए हथियार उठाना
‘न’ से नीच के लिए नाख़ून बढ़ाना

बहन! बहन का चौथा मतलब क्या है?
“दूसरे की बहन को अपनी बहन समझना!”
■ 

5).

मेरे घर की स्त्रियों का बाल झड़ रहा है

बचपन में
जब भी आता था बाल लेने वाला
मैं मुँक्की-मुँक्का में, 
मँड़ई में माँ का बाल ढूँढ़ता था
बाल मिलते ही
मेरी आँखें चमक उठती थीं
लेकिन अब जब बाल लेने वाले के डमरू की आवाज़ सुनता हूँ 
मेरी आँखें नम हो जाती हैं
मेरा हृदय हहरा उठता है
मेरे आँसू की ढुलकीं
 बूँदें
मेरे पसीने की बूँदों से मिलती हुयीं
उन स्त्रियों का दुःख गाती हैं
जिनके बाल तेजी से 
झड़ रहे हैं, टूट रहे हैं!

मैं अपनी माँ के झड़े हुए बालों के साथ
सेल्फ़ी ले रहा हूँ
कि बहन कह रही है 
कि उसके बाल भी तेजी से झड़ रहे हैं
चाची का भी झड़ रहा है
दादी तो खैर चंडूलाहिन हो गयी हैं

स्त्रियों के बालों का झड़ना
उनके सौंदर्य का झड़ना है

वे स्मित चेहरे के पीछे कितनी दुखी हैं
दिन के दुख से कहीं अधिक गहरा होता है
रात का दुख
और ऊपर से यह बाल का झड़ना
उनके मन को कुतर रहा है
जैसे तन को चिंता!

मुझे अपने घर की स्त्रियों को चंडूलाहिन होने से बचाना है
उन्हें बेलचट होने से बचाना है
उन्हें तकला होने की तकलीफ़ से उबारना है

प्रिय पाठको!
मेरी यह अभिव्यक्ति
किसी बाल चिकित्सक तक पहुँचाने की कृपा करें!
मेरी माँ का बाल तेजी से झड़ रहा है
मेरी बहन का भी
मेरी चाची का भी
मेरी पड़ोसिन स्त्रियों का भी
मेरा भी!

6).

गंजा

अक्सर गंजा आदमी खड़ंजा की संज्ञा पाता है
और औरत बेलमूँड़ी की

दोनों ही घने बालों वालों के लिए
हास्यास्पद बन जाते हैं
कभी-कभी!

7).
माँ राखी बाँधना छोड़ दी

बहन का ब्याह बहुत दूर हुआ है
राह ताक रही माँ से पूछा
"माँ तूने क्यों छोड़ दिया
राखी बाँधना?"
आँखों से टपकती आँसू के बूँदें उत्तर हैं!

मौन टूटने पर माँ ने कहा
___बीमार थी न
रोपनी नहीं कर पायी
रुपये-पैसे नहीं थे इसलिए

बहन को भाई पर गर्व है
तीमार भावाविष्ट रक्षाबंधन
पवित्र प्रेम का पर्व है!!

8).

केवल रक्षाबंधन
 
जग में कोई नहीं है अपना
दो वक्त की रोटी है सपना
वह एकजुआर रोज़ रोती है

चूल्हे की ओर ताक रही है भूख
तवा उदास है और सुना रहा है 
डकची को कड़ाही का दुख-दर्द 
और आत्मा के आँसू की व्यथा-कथा

चौका-बेलना बिलख रहे हैं
सून्ठा-सिल सिसक रही हैं
आँखों में बह रही है नदी 

गरीब के गालों पर देख रहा है 
बुरे समय में उगा ऊख
आह! ये कैसी विपदा? ये कैसी बदी?

कुएँ का पानी विकल्प है
बच्चों के जीवन के लिए
आज नैहर जाना है - प्राणनाथ स्वर्ग से लौट आओ!

बच्चों को नानी के घर
मिलेगा हलवा-पुड़ी-मिठाई
सब उल्लास से उछल रहे हैं

भईया पहले अपने ससुराल जाएंगे
फिर लौट कर आएंगे हमें लेनें
साँझ हो गयी मामा कब आएंगे? माँ!

बेटी! उम्मीद मांगती है वक्त
बस थोड़ा और इंतजार करो, सब्र करो
मामा आ गए, मामा आ गए, बड़े मामा आ गए...

मुन्नी कैसी हो? 
ठीक हैं
रात हो गयी

दीदी रास्ते में गाड़ी खराब हो गई थी
सारे दुकान बंद थे
"लॉकडाउन लगा है चारों ओर
लोग घर में रहते-रहते लंगड़ हो गए हैं"

चलो जल्दी करो! 
माई फोन करवा रही है
वह विशेष धागों के साथ पहुँच गई जब मायके में
तब बैग में ढूँढ़कर, देखकर 
हँसी-ठिठोली में भुक्खड़ भौजाई बोली है
हे बूढ़िया! आपकी धीया
हे मुनुवाँ के पापा! आपकी बहन
मिठाई नहीं केवल रक्षाबंधन लायी हैं
केवल रक्षाबंधन!
केवल रक्षाबंधन!
केवल रक्षाबंधन!

9).

केवल राखी

एक).
मैंने देखा___
सावन का मस्तीला मौसम मेघों का मधुर संगीत सुन रहा है
और धरती चाँद को इंद्रधनुषी राखी बाँध रही है
लेकिन त्यौहार की बयार कह रही है कि
यह श्रेय और प्रेय के बीच संबंधों के क्षय होने का समय है
ऐसे में रोशनी के लिए रूह की राखी में चेतना की चिनगारी का चिंघाड़ना
चुप्पी से चीख को उघाड़ना है
कोई बहन बाज़ार में चेतावनी की चमक देख
आँखों में संचित कर लीं संघनित स्मृतियाँ

यह गंध-रूप-रस-रंग का कैसा राग है?
तपस्वी शब्द के शरीर पर नाख़ून का दाग है
अर्थ की यात्रा में गहरे रिश्ते का रोना
प्रतिदिन मनुष्यता के प्रत्यय का गायब होना है

बहन प्यार की कसौटी पर धागे में अपना बल परोर
भाई की कलाई में कला की तरह बाँध देती है
उसकी भुजा में भाषा की ताकत तप से अधिक तोप है
तुम्हारे रक्षाबंधन से रक्षा का लोप है
किन्तु बंधन बचा है जो तुम्हारे पाँव की बेड़ी है
तुम्हारी पीड़ा के प्रश्नों को पुरुषार्थ के पत्थर पर पनपते देख
प्रलय की आहटें अँखुआने लगी हैं
खूँटे पर बकरी की लेड़ी है और खेत में खेड़ी है
तुम्हारी फटी हुई एड़ी है
मेरी दृष्टि में मैं बहुत चिंतित हूँ!

दो).
अपनी व्यथा-कथा को भूल
मेरी बहन इस पावन पर्व पर सूरदास का पद गा रही है
(राखी बांधत जसोदा मैया।
विविध सिंगार किये पटभूषण, पुनि पुनि लेत बलैया॥
हाथन लीये थार मुदित मन, कुमकुम अक्षत मांझ धरैया।
तिलक करत आरती उतारत अति हरख हरख मन भैया॥
बदन चूमि चुचकारत अतिहि भरि भरि धरे पकवान मिठैया।...)
मैं उसे सुना रहा हूँ श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता 'रक्षा बंधन'
(...मासूम कलाइयों के बदलते हुए खूँखार पंजों के लिए
तुम महज़ एक देह हो
जिसको खुद ही रखना है महफूज
इन रक्षक भाइयों से...)

तीन).
वक्त की वेदना बड़ी है
घाट पर हिलोरों को निहारती हुई
मेरी बहन खड़ी है

सुलगती जा रही है ज़िन्दगी
हथेलियों में हरे हैं ढेर सारे घाव
स्वप्न के संघर्ष में विश्राम नहीं है
बिखर रहा है भाव
बिलख रही है नाव
रेत डूब गई अपने आँसू में

रक्षा बंधन पर नदी का नैहर जाना संभव नहीं है
वह बस अपनी बेटी की तरह रो रही है
जब एक स्त्री रोती है 
तब अन्य स्त्रियों का रोना स्वाभाविक क्रिया है
अब मछलियाँ भी रो रही हैं
बाढ़ आने की स्थिति बन चुकी है

बाँध टूटेगा तो नदी अपने ससुराल पहुँचेगी!

चार).
इस सौहार्दपूर्ण पर्व पर राखी ने पूछा___
क्या प्रेम की पंक्ति में सुरक्षा की सूक्ति है?
क्या रूढ़िवादिता की रस्सी से मुक्ति है?
अभिमंत्रित रेशम ने उत्तर दिया___
रिश्ते की रोशनी अँधेरे में रास्ता दिखाती है

भाई-बहन का प्रेम धर्म-जाति से ऊपर है
इतिहास में मुसलमान हुमायूँ को 
हिंदू कर्णवती ने राखी बाँधी है
जिसकी बहन नहीं, वह आधा है
अपूर्ण है, अभागा है आज भी
कृष्ण की कलाई में द्रौपदी का धागा है

रीति और नीति के बीच नये सोच की सुई है
सत्य से समय का संबंध ख़ास है
मेरी बहन दो घरों का उजास है!

पाँच).
जैसे पिता के लिए ताकत होती है बेटी
वैसे ही छोटे भाई के लिए दाई होती है बहन
मेरी बहन मुझसे छोटी है 
लेकिन वह मेरी बुद्धि का बिंब है
उसकी बहस बहस नहीं बल्कि निंब है

वह अपने तर्क से तिल को ताड़ या राई को पर्वत बनाने में सामर्थ्य है
उसके हठ को हराने में अनर्थ है
मैं बहस में बहन से हार जाता हूँ

हारने का हर्ष जीत की ख़ुशी से अधिक आनंददायक है!

छह).
मैं महासूत्र के पवित्र-महाबंधन पर बहन के नाम छंद रच रहा हूँ
यह रक्षाबंधन पवित्रता का अनूठा संगम है
रेशमी धागों के बंधन में बँधा है संसार का प्यार
यह जाति-धर्म से ऊपर है सबसे बड़ा त्यौहार

इसमें संस्कृति और सभ्यता की तान है
यह स्त्री-रक्षा का अभियान है
ज़िंदगी की नोंक-झोंक में एक दृढ़ विश्वास है
लेकिन आधुनिकता की आँच से सिकुड़ रहे हैं संबंध
भौतिकवाद की भेंट चढ़ रही है राखी
रेशम हो रहा है तार-तार
अब नहीं रह गए रस्म के संस्कार

अक्षय-अक्षुण धुन-ध्वनि-धन्य-धान्य शब्द सखा सगा भाई
सुख-दुख के मौलिक मूल्यों की मर्यादा की मणि है
बहन के लिये आदर्श का आलोक है, घड़ी है
और है चेतना शून्य समय में जीवन का संचार
आश्वासन का उपहार
साक्षात ढाल, मृत्यु समक्ष वज्र प्रहार
महारक्षासूत्र रेशमी बंधन
कुमकुम रोली से सज गये घर-द्वार
मनुष्यता की नाव खे रही है प्रेमपर्व की पतवार!

सात).
रोपनहारिन बहन रोपाई के रुपये से राखी खरीद
मायके आयी है और मिठाई लायी है
नेह से लिपटे चिपटे चाकलेट और हाथ के बने पेड़े
श्रावण पूर्णिमा की श्रद्धा फल
अटूट प्रेम का प्रतीक है

झमाझम बारिश हो रही है माँ की आँखों से
आँगन में गौरैयाँ आ गयी हैं 
तुलसी की पत्तियाँ और हरी हो गयी हैं
पिता के कंठ से फूट रही है आशीष
___चिरंजीवी हो बेटी

मैं बहन की चकती युक्त पुरानी धोती में धुन तलाश रहा हूँ
हे धरती! ध्वनि दे वेदना की असाध्य वीणा में
मेरे हृदय को गार कर शब्द निकाल तू
हे सूर्य! मेरी हड्डियों पर साध हथौड़ा
चोट से उत्पन्न चिनगारी को करने दे यात्रा
हे समुद्र! संगीत का स्वाद जीभ को पसंद है 
लहरों से पूछ ले, यह मेरे आँसू का छंद है

हे लय! हे बचपन! हे मृग-मन! हे सज्जन!
निःस्वार्थ, सहज और आत्मिक अभिनन्दन!
यह अनूठा मिलन रक्षा बंधन
एक यादगार ऐतिहासिक दिन है
चुभी, बहन के पाँव में पिन है

मिठाई के डिब्बे पर रबर है 
पर पुतली में रोता हुआ घर है!!

आठ).
रेशम की डोरी में संबंध की शक्ति है
हे अग्नि!
भूखे पेट पर्व की भक्ति है
आँसू से अनुरक्ति है 

जहाँ पीड़ा की पाखी है साखी
केवल राखी!
केवल राखी!
केवल राखी!

नौ).
इस अनुगूँज के बीच 
बौद्ध रक्खासुत्तबंध दिवस पर चर्चा करती हुई 
एक भिक्खुनी बहन ने कहा 
कि बुद्ध स्त्रियों के पहले शुभचिंतक एवं मार्गदाता हैं 
पर, रक्खासुत्तबंध का रक्षाबंधन होना 
स्त्री को पुरुष के अधीन करना है 

स्त्री पितृसत्तात्मक समाज में असुरक्षित है 

स्त्री के लिए 
रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं,
बल्कि उसे यह अहसास कराने वाला त्यौहार है 
कि तुम अपनी रक्षा ख़ुद नहीं कर सकती 
तुम कमज़ोर हो 
तुमसे श्रेष्ठ है तुम्हारा भाई

एक स्त्री 
इसलिए विद्रोह नहीं करती है 
कि उसकी माँ ने उसे सहना सिखाया है 
उसकी माँ को उसकी नानी ने इस तरह रहना सिखाया है 
कि ऊपर वाले सब कुछ देखते हैं 
वे न्याय करेंगे

बहनो!
अधिकार और न्याय के लिए 
लड़ना पड़ता है 
लड़ना सीखो, ग़लत को ग़लत कहना सीखो
नींद के विरुद्ध 
यह स्त्रियों के जागने का समय है।

दस).

माँ ने सुना 
और कहा 
कि बेटी बाप की शक्ल है 
और बेटा उनका अक्ल

बेटियों के साथ दरिंदगी की ख़बर 
आ रही है लगातार 
हम दुखी हैं, बहुत दुखी हैं
किस के पास इस दु:ख से उबरने का उपाय है?

बेटियों का असुरक्षित होना 
बेटों का बर्बर होना है 
उनका ठीक से परवरिश न करना है 
उन्हें उचित संस्कार न देना है 
और सड़क पर सरकार का कमज़ोर होना है 

घाव 
राखी-पानी नहीं,
दवा बाँधने से ठीक होता है 
बहन बाँध रही है स्नेहसूत 
भाई मंगलगीत गा रहा है 

पड़ोसी परिवार उदास है 
कि उनके घर बेटी नहीं है

क्योंकि हमारे लिए बेटियाँ
ख़ुशियाँ हैं!

नाम : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि व लेखक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से नेट।
भाषा : संस्कृत, पालि, अपभ्रंश, हिंदी, भोजपुरी, अंग्रेजी, फ़्रेंच एवं मराठी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : उत्तम देवी
पिता : नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं।

लम्बी कविता : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' एवं 'दुःख दर्शन'


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
***

जिज्ञासा : गोलेन्द्र पटेल (poem : curiosity / poet : golendra patel)

 

जिज्ञासा


ओ उदात्त उच्चारण!

पृथ्वी, नदी, गाय व भाषा-साध्वी स्त्री सूचक संज्ञा

स्याह संवेदना के शब्द में डूब रही हैं

उनकी वेदना का विषय विचारणीय उदाहरण है

(शायद समुद्र का पानी मछलियों के रोने से खारा है

समय स्वयं हालात से हारा है)

आँसू के अर्थ को जानने की एक लंबी प्रक्रिया है

अँधेरे के आशिक आसमान में देखो

काल कवलित करुणा की क्रिया है

जहाँ औंधी नाव बादलों की धारा में बह रही है

लेकिन जिज्ञासा का जहाज़ विपरीत दिशा में जा रहा है!


सुबह की सरसराहट में सुलगते सपनों की साँसों के स्वर हैं

धूल के फूल चुप; रूप की धूप एकदम चुप 

सुनो, घुप संबंध के स्तूप पर आत्मा के अक्षर हैं

भूख की भूमि में भय, डर और ख़ौफ़ के जन्म होते रहे हैं

पूरी उम्र मन की मिट्टी में मनुष्यता का बीज बोते रहे हैं

रव के रवि; प्रेम के प्रिय कवि


हे दर्द के दोस्त! देखो! दुख के दर्पण में दुनिया की छवि

हे हवि के अवि! ध्यान से सुनो

आँखों में अँखुआयी बातें बर्फ की बारिश सह लेती हैं

पसीने की बूँदें श्रम के सौंदर्यशास्त्र की सूक्ति कह देती हैं

दोहरी दोहित देह की माँदगी जानती है कि

जिरह जिज्ञासा की जननी है

जिजीविषा जीवटता की 

किन्तु कहावत है कि जैसी करनी वैसी भरनी है!!


©गोलेन्द्र पटेल

कवि : गोलेन्द्र पटेल

संक्षिप्त परिचय :-


नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम/उपाधि : गोलेंद्र ज्ञान , युवा किसान कवि, हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय, काशी में हिंदी का हीरा, आँसू के आशुकवि, आर्द्रता की आँच के कवि, निराशा में निराकरण के कवि, दूसरे धूमिल, अनुप्रासाधिराज एवं दिव्यांगसेवी

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र।


मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर हैं।


संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


■■■★★★■■■


--Golendra Patel

BHU , Varanasi , Uttar Pradesh , India

धन्यवाद!

■■★★■■

https://youtube.com/c/GolendraGyan


https://www.facebook.com/golendrapatelkavi




Tuesday, 2 August 2022

प्रेमचंदनामा (प्रेमचंद का प्रशस्तिगान) : गोलेन्द्र पटेल / प्रेमचंद पर कविताएँ

 

प्रेमचंदनामा प्रेमचंद का प्रशस्तिगान


 
गोलेन्द्र पटेल के 'प्रेमचंदनामा' से चार कविताएँ :-


1. प्रेम के प्रदीप प्रेमचंद


दुखिया चमार के चेहरे पर

दर्द का दाग है

उसे देखने वाली आँखों में आग है

जहाँ जड़ता की जड़ का फटना

सद्गति की सड़क पर अंतिम यात्रा करना है


संवेदना के श्यामपट पर लिखा है

सामंतवाद मुर्दाबाद!

प्रत्येक पंक्ति में प्रसव की पीड़ा है

कर्ज वह कीड़ा है

जो एक बार काट ले 

तो आदमी की मृत्यु निश्चित है

होरी इस बात का गवाह है


आज जो चरवाह है

वह सत्ता का चारा है

हर हलधर हालात का मारा है

आह! जीवन की रंगभूमि में खड़ा सूर

लाचार बेसहारा बेचारा है

मरजाद की बेड़ी से मुक्त किसान

हल्कू मजदूर

'पूस की रात' से हारा है


महाजनी व वर्णव्यवस्था का मुँह लाल है

जो क्रांतिकारिन धनिया के गाल का कमाल है

मालती व सोफिया प्रेम की ममतामयी मूर्ति हैं

मेहता व विनय की स्फूर्ति हैं

सिलिया वंचना के भीतर वंचना का शिकार है

विधवा झुनिया से गोबर को प्यार है

अपने मर्द द्वारा मार खाती स्त्री को 

उसकी छाती पर चढ़कर 

उसकी मूँछ उखाड़ने का अधिकार है


अब जब न्याय अमीर के लिए भोग है

गरीब के लिए रोग है

तब सब योग सोग है

यह शब्द और अर्थ का कैसा संयोग है!


बुधिया की चीख यह सीख है कि

भूख हर आदमी की मति हर लेती है

आह! घीसू और मावध 

असंवेदनशीलता की आँच में आलू भुनते रहें

शराब के नशे में कबीर के पद चुनते रहें


मुन्नी, गंगी, सोना, रूपा, सरोज, आनंदी, गोविंदी

मनोविज्ञान की दृष्टि से सार्थक पात्र हैं

सिमोन द बोउआर के प्रेमी-पथप्रदर्शक पॉल सा‌र्त्र हैं

(मालती व मेहता के बीच का संबंध

भारतीय व पश्चात संस्कृति की समन्वित गंध है)


'पंच परमेश्वर' के 'रामधन' का मन पढ़ना

असल में न्याय के पक्ष में खड़ा होना है

जाति और धर्म से मनुष्यता का बड़ा होना है


प्रेमचंद कहानी के छंद में प्रेम के प्रदीप हैं

करुणा की कसौटी पर कथा में कथ्य व कला की कीप हैं!

रचना : 31-07-2022



2. प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना


प्रिय धनपतराय!

अपनी पीढ़ी की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ

मेरा कवि मुझसे कह रहा है कि

काश कि सभी को पता होता कि

विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश है

पर भयभीत भाषा में यथार्थ का विनाश है!


हे रव के रवि!

क्या कथा में चरित्र की छद्म छवि

उद्देश्य की 'सौत' है?


जब भी देखा

जर्जर वस्त्र में देह का दीपक अधिक देखा

फटे जूते में अनंत 'समर-यात्रा' का पथिक देखा

शायद पिता अजायबराय प्रसिद्ध पोस्टमैन थे

बाल्यकाल में ही दुनिया के लेखकों से परिचित

कलम का सच्चा सिपाही देखा


जब भी सुना

'सूरा' और 'होरी' की तबाही सुना 

'गोबर' और 'धनिया' की गवाही सुना

'बुधिया' की चीख सुना

मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुना


और सुना

'सोजेवतन' में 'बलिदान' का गान 

सार्थक स्वर का स्वाभिमान

'अफसाना कुहन', 'कफ़न' ,'सद्गति', 'सेवादसदन', 'निर्मला' 

'प्रेरणा', 'कायाकल्प', 'सवा सेर गेहूँ', 'प्रेम-पचीसी',

'ईदगाह', 'पंच-परमेश्वर', 'परीक्षा' , 'बालक' , 'नमक का दरोगा', 'प्रेमाश्रम'

'बड़े घर की बेटी', 'दो बैलों की कथा', 'रंगभूमि', 'गोदान', 'गबन' व 'कर्बला'

'आत्माराम'! इनमें भारतीय आत्मा की आवाज़ है

सारे संसार की स्याह संस्कृति का संपूर्ण समाज है


तुम्हारी स्वतंत्रता की चाहत में 

एक अलग तरह का स्वराज है

'सोफिया' से लेकर 'मालती' तक, 'विनय' से लेकर 'मेहता' तक

सभी के बीच 'गोविंदी' के गुणों की चर्चा है

बहुत मिठी मिठाई मर्चा है

कुर्सी पर 'जॉन' की जगह 'जयसिंह' का परचा है

स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि

सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है

और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है

जहाँ विचारोत्कर्ष है सौंदर्य का वास्तविक शृंगार


'सर्वहारा वीर' तो तुम नहीं थे

दिशाहारा तो तुम नहीं थे

राहहारा तो तुम नहीं थे

हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!

थे तुम 'बलिदान-पथ' के चिरंजीवी चिंतक

तुम्हारे सोच की सृजन में शामिल रहे

'गोर्की' और 'लूशुन' के विचार


हे दलित के दीपक! हे गाँव के गायक!

हे नर के नायक!

दोस्त-दुश्मन की पहचान थी तुम्हें खूब

बूढ़ी महाजनी सभ्यता और 

मरजाद की बेड़ियों को काटने की कला

भला कौन नहीं सीखना चाहता है?

तुमने सीखाया क्रांति के पक्ष में खड़ा होना

तुमने सीखाया बुरे वक्त में बुद्धि से बड़ा होना


हे चेतना के चिराग!

तुमने लगाई शोषकों के महल में आग

तुमने गाया सदा रोशनी का राग

तुमने सीधी-साधी बात सीधी-साधी जनता को

सरल-सहज-सरस भाषा में समझाया


हे सत्य के साधक!

परिवर्तन के युद्ध के बुद्ध!

स्नेह, समता, न्याय से प्रतिबद्ध, साहित्य के सूर्य!

ज़िन्दगी की तान के तूर्य!

तुम्हारी कथा की धमनियों में धरती की धुन,

खेतों की ख़ुशबू, विविध फूलों के रंग, नदी की उमंग

और भोर का भक्त नक्त है, संवेदना सशक्त है

शहर का राजनीतिक रक्त है, वाया वक्त है


हे 'शतरंज के खिलाड़ी'!

अँधेरे में मानवता की मणि!

गगन भी गाता है तुम्हारा गौरव गीत, हे मुंशी मीत!

लमही से आ रही है जय की लय

तुम्हारे शब्द दुख की दुपहरी में वृक्ष बन गए

और तुम्हारी प्रोक्ति 'लाल फीता' का बंधन तोड़ने की 'प्रेम-प्रतिज्ञा'

तुमसे हर आदमी आदमी होने का हुनर हासिल करता है


हे 'प्रेम सरोवर' के अरुण कमल!

तुम स्वप्न, संघर्ष व साहस के स्रष्टा हो

तुम भविष्य द्रष्टा हो

तुमने बताया, 'एक गिलास पानी' का महत्व 

____'नवजीवन' का तत्व

चारों ओर दुविधा और दहशत का धुआँ है

'गंगी' के पति 'जोखू' के सामने मौत का कुआँ है

जी हाँ, जो एक 'ठाकुर का कुआँ' है


हे ऋषि-कथाकार प्रेमचंद!

कहानी के अद्वितीय छंद!

संकल्प के अभियान में तब्दील होना

असल में आगामी प्रलय की प्रयोगशाला में पुरखों को बोना है

हवा नहीं है अनुकूल

परिवेश है प्रतिकूल

मैं तुम को बो रहा हूँ कविता की क्यारी में किसान की तरह

तन-मन से बहुत जतन से, साधना के सपूत! 


हे मानस के हंस!

'नवनिधि' के 'मंगल सूत्र'!

नये 'संग्राम' में 'प्रेम की वेदी' पर चढ़ने की शक्ति दो मुझे!

मैं 'कर्मभूमि' में 'पूस की रात' का 'हल्कू' हूँ

'प्रेम-प्रमोद' की गोद में ले लो मुझे

आज 'प्रेम-पंचमी' है परसों नागपंचमी

'प्रेम-तीर्थ' के पथ पर 

मुझ अबोध पाठक की यही प्रार्थना है रोज़

कि हर सुबह हर घर खिले 'सप्तसुमन' व 'सप्त सरोज'!

रचना : 30-07-2022


3. यथार्थ के पार्थ प्रेमचंद


हे आकाशधर्मा अध्यापक! शिवरानी के सोहाग!
बहुत दिनों के बाद मिला है यह सौभाग्य
कि मैं लिखूँ काव्य में तुम्हारी रोशनी का राग
जाग! जाग!! महात्याग तू जाग!
अंतःकरण में आग लगी है लेकिन जल रही है लाग
भाग! भाग!! झाग तू भाग!
धारा की विपरीत दिशा में अनवरत
तैरने की कला है तेरे साथ
और हिम्मत के हाथ भी

हे उदात्त कलाकंद!
अवनि की आत्मा की आँख और आकाश का
पसंद---- प्रेमचंद!
तुम महाजनी मानसिकता एवं सामंती सोच के विरुद्ध
युद्ध हो
शांति की क्रांति का बुद्ध हो
जीवन के रंगमंच पर सामाजिक चित्त के चित्रकार हो
सांस्कृतिक टिप्पणीकार हो
भाषा में उदार हो
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के मंत्र हो
असली लोकतंत्र हो
प्रत्येक पाठक की पुतली हो

तुम्हारे सामने कल्पना और विचारधारा क्षुद्र सिद्ध हो चुकी हैं
आलोचना के अस्त्र-शस्त्र हो रहे हैं बेकार
तुम वेदना के वेत्ता व बुद्धि की वृष्टि हो
नवोन्मेषी इतिहास-दृष्टि हो
नवजागरण की सृष्टि हो

अंधेरे में 'आपका चित्र' आलोक है
'ख़ून सफे़द' दूध जैसा आर्यसमाज का श्लोक है
तुम्हारी लय का व्यापक लोक है
तुम प्रगतिशील जिज्ञासा के जहाज़ हो
तिमिर की तान के ताज हो

हे समय के शब्द! सत्य के स्वर!
मानवीय मशाल! स्मृति के बरगद विशाल!
काल-त्रिकाल सब मानते हैं कि तुम्हारी कृति अमर है
क्या ख़ूब किया तुम ने
समोज्ज्वल संवाद का इस्तेमाल!
सर्वप्रथम तुम ने देखा 'मनुष्यता का अकाल'
सत्ता से पूछा सवाल

हे संवेद्य, संवेदन, संवेदना व संवेदनशील के चतुष्टय!
अनुभव, ज्ञान, संकल्प व चेतनाधारी नज़र के नंद
--- प्रेमचंद!
मन की हिलोरें हँस रही हैं मंद-मंद
मैं डूब रहा हूँ तुम्हारे पसीने में जहाँ श्रम की सुगंध है
पहुँच गया हूँ 'कल्पकाया' के भीतर
ओ हो! यहाँ नीति और नीयत के बीच नियति है
मगर मष्तिष्क में मौजूद मति है

हे प्रयत्न के रत्न! यथार्थ के पार्थ!
तुम वैश्विक विश्वास हो
आधुनिक भारत का महाभारत लिखने वाले व्यास हो
सच कहूँ तो तुम एक अतृप्त प्यास हो
परम अभिव्यक्ति आलोकित आत्मा-सम्भवा हो
प्रत्येक पुनरुक्ति में पुनर्नवा हो

मैं चाहता हूँ____
तुम मुझे सृजन के 'संग्राम' में दाँव-पेंच सीखाओ!
मैं चाहता हूँ____
मैं तुम्हारे सम्मुख 'प्रेम प्रतिज्ञा' लूँ
कि अब 'नवजीवन' की 'कर्मभूमि' में श्रमरत रहूँगा!!

रचना : 01-08-2022


4. ॐ प्रेमचंदाय नमः


हे कहानी के प्रतिमान! हल के फाल!

लमही के छत्रसाल! युग ख़याल!

स्वप्नों की शीतल सहानुभूति के समस्वर, समताल!

मुझे दिख रहा है

रूप, रस, गंध व स्पर्श का फटाहाल

देश का दर्दनाक दृश्य

मैंने किया जाँच-पड़ताल

और पाया____ चमकती चाल


मेरा कवि मेरे पाठक पथिक से कह रहा है

यदि तुम मुझे सिक्का समझकर

ऊपर उछालोगे

तो एक तरफ निराला और

दूसरी तरफ प्रेमचंद

तुम्हें नज़र आयेंगे

लेकिन शर्त है कि शब्द नाचता हुआ

धरती पर खड़ा हो जाए

और अर्थ की आकृति आकाश में बन जाए

एक आवाज़___ भई! उठा दो कंधे पर जीवन का जुआ


अरे! अरे! निहाल

क्यों? निकाल रहे हो बाल के खाल

देखो! आ गया

आत्मा के शिल्पी 'अमृतराय' का ननिहाल

जरा रूको! ठहरो!

सामने देखो, ताल ही ताल

इधर देखो, हल्कू का खेत चर रही है नीलगाय

साथी, उधर होरी का ऊख उखाड़ रहा है हाथी


यह घास, फूस व बाँस का छाता-मचान

इसी पर पूस और माघ की रात में सोता है किसान

पास मेंड़ पर कोई दुखिया छील रहा है घास

मेरे साथ पगडंडियों पर यात्रा कर रहा है 

विश्व का श्वास यानी प्रेमचंदी विश्वास


मानो फ़सलें आपस में अठखेलियाँ कर रही हैं

गोधूलि में लौटते हुए चौपाये चोन्हरा रहे हैं

पतलो की आड़ में आनंदक्रीड़ा की आवाज़ उठ रही है

खैर, पैर अपने पथ को छोड़ना नहीं चाहते हैं

वे अरहर के बीच से नाप रहे हैं जाड़ा में डाड़ा

उन्हें पहुँचना है उस टीले पर जहाँ पहचान का पदचिह्न है

असल में वह प्रेमचंद की आत्मा का आवास है

मैंने सुना है कि जाति में जयंती की ज्योति ख़ास है

लेकिन कलम के मजदूर तो कलाकार हैं

उनकी जाति एक है और वह है मनुष्यता


हे वैश्विक विचार! अपूर्व कल्पकथाकार!

तुम्हारी प्रत्येक पंक्ति में बहुत दुखी इड़ा है

संभाव्य नाव्य की वाणी में महाकाव्य की पीड़ा है

तुम बहो मेरी रचना की धमनियों में, पर

मेरी कविता की सरिता में सविता की तरह

तुम रहो मेरे हृदय में पथप्रदर्शक पिता की तरह


मानवता का आवाहन 'मंत्र' है ॐ प्रेमचंदाय नमः

जिसे मैं मन से उच्चारण कर रहा हूँ बार-बार

भूख के भवसागर में पीड़ा की पतवार

भाषा खे रही है लगातार

आशा है मैं जल्द पहुँच जाऊँगा 

अरहर के उस पार!!

रचना : 02-08-2022


कवि : गोलेन्द्र पटेल

संक्षिप्त परिचय :-


नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम/उपाधि : गोलेंद्र ज्ञान , युवा किसान कवि, हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय, काशी में हिंदी का हीरा, आँसू के आशुकवि, आर्द्रता की आँच के कवि, निराशा में निराकरण के कवि, दूसरे धूमिल, अनुप्रासाधिराज एवं दिव्यांगसेवी

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र।


मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर हैं।


संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


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--Golendra Patel

BHU , Varanasi , Uttar Pradesh , India

धन्यवाद!

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बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...