Thursday, 1 June 2023

कबीर : कल और आज / कबीर का करघा : गोलेन्द्र पटेल

एक).


कबीर तार्किक हैं

बुद्धिवादी हैं

सत्यवादी हैं 

सत्यान्वेषी हैं

सजग-सच्चे साधक एवं जननायक हैं

वे हर चीज़ को तर्क के तेराजू पर तौलते हैं

अब वह चाहे परिभाषिक शब्द हो

या फिर कोई बात


कबीर बुनकर हैं

युगद्रष्टा हैं

क्रांतिकारी हैं

समाज-सुधारक हैं

सामाजिक वैज्ञानिक हैं

निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी हैं

वैष्णव भक्त हैं

मानवधर्म-प्रवर्तक हैं

मानवताप्रेमी कालजयी कवि हैं

दार्शनिक हैं

साधना के क्षेत्र में युग-पुरुष हैं

काव्य के संभाव्य स्रष्टा हैं

भ्रमणशील व्यक्ति हैं

सारग्राही संत हैं

और अब कबीर किताबों के भीतर कराह रहे हैं

वे नहीं सोये हैं वाया रात


वे नाथों से प्रभावित हैं

सिद्धों से प्रभावित हैं

बुद्ध से प्रभावित हैं

और हम उनसे!


दो).


मेरे कबीर किसी किताब के कबीर नहीं ,

बल्कि जनमानस के कबीर हैं

इसलिए कोई कितना ही बड़ा कोविद क्यों न हों

मैं उनकी वही बातें ग्रहण करता हूँ

जो लोकमन की कसौटी पर खरी उतरती हैं! 


-गोलेन्द्र पटेल


कबीर का करघा : गोलेन्द्र पटेल

विषय :- 'कबीर : कल और आज'

सम्मानित मंच एवं प्रिय पथप्रदर्शक गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल जी, प्रिय गुरुजन एवं सहृदय साथियो! आज कबीर की 625वीं जयंती के अवसर मुझे कुछ बोलने और कविता पाठ का मौका मिला है। यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष का पल है।

कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहना है कि 'कबीर की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई।' मुझे लगता है कि उस भक्ति के बीज का बीज मैं हूँ।


चौदह सौ पचपन साल गए, चंद्रवार एक ठाठ ठए।

जेठ सुदी बरसात को पूरणमासी तिथि प्रकट भए।

घर गरजे दामिनी दमके बूँदें बरसें झर लाग गए।

लहर तलाब में कमल खिले तँह कबीर भानु प्रकट भए।



कबीर का जन्म 1455 संवत में हुआ या संवत 1456 में या किसी अन्य तिथि-विथि को। मुझे डेट को लेकर फर्क़ नहीं पड़ता। मैं व्यक्तिगत तौर मध्यकाल के किसी भी कवि के जन्म तिथि व जन्मस्थान और उनके निर्वाण तिथि, मृत्यु-स्थान को लेकर ज़्यादा विचार विमर्श नहीं करता हूँ। मेरा मानना है कि कवि का जन्म तब होता है जब उसे कोई दिशा दिखाने वाला मिलता है या कोई पथप्रदर्शक उसे पा जाता है। जैसे कबीर को उनके गुरु रामानंद ने पाया था, या कि कबीर ने रामानंद को। उनके प्रथम मिलन को ही मैं उनका जन्मदिन मानता हूँ। खैर, कबीर के संदर्भ में यह मिलन तिथि भी विवादस्पद है।


कबीर काशी के दूसरे वरिष्ठ कवि हैं जिन्होंने अपने प्रखर व तेजस्वी व्यक्तित्व के कारण न केवल मध्यकालीन भक्ति-साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई बल्कि पंद्रहवीं शताब्दी की संपूर्ण सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त तमस को अपनी ज्ञान-रश्मियों की आभा से दूर करने का प्रयास किया। कबीर की प्रासंगिकता उनकी वाणी की व्यापकता से है। कबीर की वाणी 'तेरा मेरा मनवा कैसे एक होई रे!' इस दिशा में समानता, सद्भावना और समृद्धि का समाज बनाने के लिए सांस्कृतिक पहल है। कबीर के बारे में किसने क्या कहा है? उन्हें ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, जो कबीर के परिवेश से आते हैं। जो उनके पेशे से अभी भी जुड़ें हैं। जैसे कि मैं किसी पर ध्यान नहीं देता हूँ।



कबीर भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रमुख सूत्रधार हैं। वे मृत्युंजय कलाकार हैं और कलाकारों की एक ही जाति होती है मनुष्यता। लेकिन दुःख की बात यह है कि कबीर के अधिकांश अध्येताओं ने कबीर को अपनी-अपनी जाति की आँखों से देखा है और कबीर को अपनी जाति का सिद्ध करने का (कु)प्रयास किया है। वे सब कबीर के कुछ पदों को लेकर हिंदू-मुस्लिम के बीच झुल रहे हैं। जैसे- 'जाति जुलाहा नाम कबीरा। बनि-बनि फिरौं उदासी।।' और 'परिहर काँम राँम कहि बौर सुनि सिख बंधू मोरी। हरि कौ नाँव अभैपददाता, कहै कबीरा कोरी।।' इनमें 'जुलाहा' (मुसलमान) और 'कोरी' (हिन्दू) शब्द उनकी बहस के बीजतत्व के रूप में उपस्थित हैं। किसी ने कोरी को जुगी (न हिंदू न मुसलमान अर्थात् एक भ्रष्ट जाति) बताया, तो किसी ने बनिया, तो किसी ओबीसी। कबीर पेशे से बुनकर थे यानी मध्यकाल के जुलाहे थे। इसलिए मुझे कबीर करघे पर मानवीय चेतना के चादर बिनने वाले कवि नज़र आते हैं। उनकी बुनकरी के ताने-बाने में जीवन के नये गाने और ज्ञान के मोती हैं। जिसे आप 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' पद में सुन सकते हैं इस संदर्भ मुझे अपने प्रिय पथप्रदर्शक शब्द-शिक्षक कवि व विभागाध्यक्ष सदानंद शाही जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं वे कहते हैं कि


'मुरदों के गांव में सब मर जायेंगे 

कबीर नहीं मरेंगे 

जब तक संसार जलता रहेगा 

कबीर धाह देते रहेंगे 

जब तक कागज की लेखी

खड़ी करती रहेगी भ्रम की टाटी

आती रहेगी ज्ञान की आंधी 


बैठे ठाले पंडे और पुरोहित 

चादर मैली करते रहें-

कबीर का करघा चलता रहेगा 

और नई चादर बुनी जाती रहेगी'



कबीर नाथों-सिद्धों की तरह ही बुद्ध से भी बहुत प्रभावित हैं। इसीलिए वे अनुभव पर बल देते हैं।

'तू कहता कागद की लेखी, 

मैं कहता आँखिन की देखी।

मैं कहता सुरझावन हारि,

तू राख्यौ उरझाई रे!!'



मेरे मन में कुछ सवाल ये हैं कि क्या हम कबीर के वारिस हैं? हम कबीर को कितना जीते हैं? हमें कबीर पढ़ाने वाले शिक्षक कबीर को कितना जीते हैं? क्या कबीर किताब की चीज़ हैं? आज कबीर के करघे की क्या स्थिति है? आख़िर जुलाहों को अपना जीवन ज़हर क्यों लग रहा है? आख़िर मेरे पिताजी अपने करघे बेच क्यों दिये? इन सवालों का जवाब हम सब को पता है।


आज हमें जरूरत है कि हम कबीर को जीयें। ताकि मुट्ठी भर लोग हमारी जीवटता की हत्या न कर सकें।


अंत में गुरुवर रामाज्ञा राय शशिधर जी के शब्दों में इतना ही कि


'करघा खेत कपास सब चले मौत की रेस।

बुन बुनकर बेहाल हूँ फिर भी नंगा देस।।' 

-गोलेन्द्र पटेल (क्रमशः)



आज के क्रान्तिचेता कवि करघे पर


बहुत समय पहले ही कबीर का करघा

कोई चुराया लिया है धरम...

चरखा तो गाँधी तक चला भी


वे बुनकरों पर कविता लिखते हैं

ताकि वे कबीर कहला सकें

कबीर नहीं तो कबीर के वंशज कहला सकें


कबीर होना इतना आसान नहीं है

कबीर इतना आसान होना भी इतना आसान नहीं है

कबीर हिंदी के पहले क्रान्तिचेता कवि हैं न!


वे कबीर पर लिखी कविता किसी ए.सी. कमरे में पढ़ते हैं

वे करघे के 'खाटी-राग' क्या जानें?

वे टेकुए की चुभन क्या जानें?

वे कपास का काला होना क्या जानें?

वे तानी की तान क्या जानें?

वे क्या जानें कि कैसे बुनी जाती है

करघे पर नई चेतना की नई चादर!

वे क्या जानें कि कपड़ों के थान का गान कैसा है

कि मानवीय रेज़े का रंग कैसा है

कि धरती की गति किस ढरकी की गति जैसी है!

वे कबीर के शब्द किताबों से सीखते हैं न?


वे धन्य हैं कि वे कबीर के कोविद हैं

और काशी धन्य है कि कबीर उसके यहाँ के हैं 

और हम धन्य हैं कि कबीर पेश से हमारे पुरखे हैं!


(©गोलेन्द्र पटेल / 01-06-2023)


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लिंक :- https://youtu.be/Q2S2ATbd6Js



Friday, 26 May 2023

ऑक्सफोर्ड के आँसू / नालंदा पर नज़र / गोलेन्द्र पटेल

 


ऑक्सफोर्ड के आँसू


चूहो!

गिद्धों के गीत बाज़ बाँच रहे हैं

ऐसे में मुर्दा मौन के कौन को सुनना

बुरा तो है


नालंदा के मरसिया में

तक्षशिला की तकलीफ़

विक्रमशीला से कम नहीं है

और वल्लभी की पुष्पगिरी से...!


जहाँ एक आचार्य मस्त है

दूसरा पस्त

तीसरा अस्त हो चुका है

चौथा व्यस्त है

ऐसे वक्त में समस्त शिक्षार्थिगण उल्लुओं की आवाज़ें 

और गीदड़ों की हुआँ हुआँ सुन रहे हैं

और कुत्ते-बिल्लियों का प्रलाप भी!


खैर, एक पैर पर

ऑक्सफोर्ड के आँसू को पढ़ना

बुरा तो है


बजबजाती हुई बद्दुआओं की बत्तियाँ जल रही हैं

शेर और भेड़िए के पेट में हिरण और भैंस

की चीख उनकी भूख शांत कर रही है


साँप ज्ञान के अवशेषों पर

इंतज़ाररत है

उस पर्यटक का जो मनुष्यता का मुसाफ़िर है

वह जीभ पर डँसने की कला में 

माहिर है

उसकी फुफकार को सीने पर झेलना

बुरा तो है


'शोकमग्न' और शोक-'मगन' के बीच

नीचता-नफ़रत-निंदा की नागिन ख़ुश है

शिक्षा-व्यवस्था में इनका नाम

उरुस है


यह परिसर में उड़ती हुई उम्मीद की चिड़िया

का थरथराते चोंचों से शांतिपाठ है

इसे सुनना उनके लिए

बुरा तो है!!


(©गोलेन्द्र पटेल  / 13-04-2023)



नालंदा पर नज़र


आपको जानकर हैरानी होगी,

मुझे चंद्रगुप्त मौर्य ने बताया है

इतिहासकार इतिहास में एक सत्य लिखना भूल गये हैं

वह यह कि नालंदा में चाणक्य जब विद्यार्थी थे

तब वहाँ के आचार्यों की बात आपस में तनिक भी नहीं बनती थी 

लेकिन चाणक्य यह ज़रूर सोचते थे कि इनकी आपस में छनती है

पर धीरे-धीरे सब स्पष्ट हो गया


चाणक्य अक्सर अपने साथियों से कहा करते थे

यह शिक्षालय नहीं, जंगल है

यहाँ हर शिक्षार्थी हिरण है

और हर शिक्षक शेर

शब्दों में हेर-फेर हो सकता है, पर; भाव वही है

जो मुझे चंद्रगुप्त मौर्य ने बताया है


चाणक्य, आख़िर चाणक्य थे

च्युत दोपायों को चील समझ कर चाप देते थे

गिद्धों पर भी अपनी गुलेल से 

दो-चार सुलगते हुए शब्दों को दाग देते थे


उनकी बुद्धि की बंदूक में गोली नहीं,

आग भरी होती थी

ये सब जंगलराज के महाहिंसक महाराजाधिराज जानते थे


चाणक्य कनफुँकवों की कुटनीति से परिचित थे

क्योंकि उनके गुरु की नज़र पूरे नालंदा पर थी

जो भेड़ियों की भाषा ही नहीं,

कुत्तों के भोंकने तक का अर्थ उन्हें पहले ही समझा देते थे


उनके गुरु नालंदा के आँगन के महावृक्ष थे!



(©गोलेन्द्र पटेल / रचना : 27-05-2023)

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Tuesday, 16 May 2023

नाऊन (सोनू भइया को समर्पित कविता) : गोलेन्द्र पटेल

 

ये मेरे प्रिय सोनू भैय्या हैं, सहज, सरल, संवेदनशील, मृदुभाषी व हँसमुख व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हैं। ये विद्यालय के दिनों में मेरे सीनियर रहे हैं। खैर, मैंने 24 साल में एक बार भी अपने से अपनी दाढ़ी नहीं बनायी है आगे भी नहीं बनाऊँगा। इन्हीं से मैं अपना बाल कटवाता हूँ। ये बाल को हर तरह के स्टाइल व डिज़ाइन में काटते हैं। सोनू भइया को समर्पित निम्नलिखित कविता पढ़ें :-

नाऊन

मैंने सोचा—
नाउन’ एक ऐसी ‘संज्ञा’ है
जो समाज को सभ्यता की ओर उन्मुख करती है

फिर सोचा—
नाउन’ के ‘उ’ का दीर्घीकरण करना
ब्लेड से हमारी पशुता को कुतरना है

जहाँ कंघी और क़ैंची के बीच बाल का हाल
एक नाई समझता है
लेकिन वह क्या करे, उसे तो हमें सभ्य बनाना है न!

ईश्वर यदि कहीं झुकते हैं,
तो इनके यहाँ ही!

©गोलेन्द्र पटेल  

  रचना : 17-05-2023

कवि : गोलेन्द्र पटेल

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Monday, 17 April 2023

आलोचक कवि बन रहे हैं / वह कवि होना चाहता है / त्रयी की चाह : गोलेन्द्र पटेल

 

आलोचक कवि बन रहे हैं


अब जब 'खोजो कम खोदो जादा' 

हर विमर्श का नारा है

तब आलोचना, समालोचना, समीक्षा, टीका, टिप्पणी,

नुक्ताचीनी, छिद्रान्वेषण और भाष्य

क्रिटिसिज़म की क्यारी में कविता को कहानी बता रहे हैं

और निबंध को नाटक...

खैर, बिना पैर के संबुद्ध संपादक व प्रबुद्ध पाठक ख़ुश हैं 

कि कोरोना ने आलोचक को कवि बना दिया


किसी भी भाषा में कवि होना, विशेष होना है

काव्य-हेतु पर बात करते हुए 

दण्डी जैसे आचार्यों ने अभ्यास पर ज़ोर दिया है

शायद इसीलिए अब प्रतिभा से अधिक अभ्यास के

कवि जन्म ले रहे हैं

और आलोचक कवि बन रहे हैं

कवि तो खैर आलोचक होता ही है

ऐसे में सवाल यह है कि आज की आलोचना की

स्थिति क्या है?


क्या आलोचक होना 

व्युत्पत्ति के व्याकरण को समझना है?

या सिर्फ़ यश की चाह में कलम का

रोना है?


या उत्तर-कोरोना में करुणा लोक का श्लोक बन रही है

और उनके भीतर वाया वाल्मीकि का उदय हो रहा है

बात जो भी हो, 

उनकी आलोचना पर उनकी कविता हँस रही है

और मुझ जैसे अबोध शोधार्थी भी!


वे शब्द के पथिक हैं

उनके पास अनुभव अधिक है

उनकी उम्र उनकी रचना में बोलती है

उनके विचारों को खोलती है

क्या सच में वे नवोदितों में शामिल होना चाहते हैं?

या फिर ढंग का आलोचक न बन पाने का दुःख है उन्हें

अपनी उम्र के कवि को देखकर


उनके मन की पीड़ा 

उनकी रचना में एक टीस की तरह मौजूद है

अधेड़ या वरिष्ठ होकर कवि होना

समय का सृजनात्मक सूद है


उनसे अन्य आलोचक प्रेरणा ले सकते हैं

कि कवि होना, आलोचक होना है

किन्तु आलोचक होना, कवि होना नहीं है

कविता लिखने से कोई कवि थोड़े होता है

कविता तो पुरखे आलोचक भी लिखे हैं

तो क्या वे कवि हैं?

वह कवि होना चाहता है


लोचन तो उसके पास है ही नहीं

उसकी आलोचना से 'लुच्' धातु गायब है

वह 'लुच्चा' तो नहीं,

लेकिन उसका नायब है

क्योंकि 'लुच' से 'लुच्चा' बना है न?


आजकल वह देखता कम, 

दिखता ज़्यादा है

शायद भाषा में माँदा है!


उस पर कवि बनने का भूत सवार है

अब वह शब्द के अर्थ को उछालने की

कला सीख रहा है और

पद्य की जगह गद्य लिख रहा है


उसे याद है- 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।'

वह वाक्यों का कवि होना चाहता है

दूसरे कवियों को पढ़कर!


(©गोलेन्द्र पटेल  / 18-04-2023)

त्रयी की चाह


5 अगस्त 2021 के दिन

कवि होता हुआ आलोचक ने फोन पर मुझसे कहा—

मुझे ऐसी संस्था का युवा प्रतिनिधि के रूप में चुना गया है

जिसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत 

चार कवि हैं और

दो मेरे कक्षा अध्यापक हैं यानी प्रोफ़ेसर

फिर मुझे बधाई और शुभकामनाएँ दीं!


मैंने बातचीत के क्रम में पूछा कि आप तो आलोचक हैं न?

अभी पाँच-छह महीने से आपकी कविताएँ आ रही हैं

तो मैं आपको वरिष्ठों की लिस्ट में रखूँ, 

या फिर युवाओं की लिस्ट में,

या फिर नवोदितों की लिस्ट में, किसमें रखूँ?

क्योंकि आजकल कवि, आलोचक व आचार्य की त्रयी

पाने की होड़ लगी है

आप दो तो थे ही! बस कवि की कमी थी

उसने भी अभ्यास के आगे घुटने टेक दी


आपकी कविता अच्छी न हो, 

फिर भी आप अच्छे कवि मान लिये जाएंगे


ऊपर से आप इस संस्था के सचिव हैं

क्या आलोचना में आपका पाँव नहीं जमा सर?


खैर, मैं आपकी संस्था से जुड़ नहीं सकता

क्योंकि मेरी क्या औकात है कि इतने बड़े रचनाकारों को

कुछ सलाह दे सकूँ या कि कह सकूँ कि आपने गलत निर्णय लिया है!


सर, मुझे पूँछ पकड़ कर तैरने की आदत नहीं है

मैं स्वयं एक मल्लाह मछुआरा हूँ

नदी-सागर की भाषा में मनुष्यता का मज़दूर हूँ

मुझे बाढ़ से डर नहीं है भले ही मेरे पास

घर नहीं है, मैं गोधूलि में लौटता हूँ

जैसे लौटते हैं चौपाये या पंक्षिगण


मैं लौटता हूँ अतीत से वर्तमान में

और देखता हूँ खुले आसमान में अपने हिस्से का चाँद!


(©गोलेन्द्र पटेल  / 19-04-2023)

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Tuesday, 11 April 2023

प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के संग्रह 'वाया नई सदी' में 'कोरोजयी लय' : गोलेन्द्र पटेल

 


 'वाया नई सदी' में 'कोरोजयी लय': गोलेन्द्र पटेल


भाषा के माध्यम से प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों, भावों एवं अनुभूतियों आदि को दो प्रकार से व्यक्त करता है। पहला गद्य रूप में और दूसरा पद्य रूप में। गद्य शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के 'गद्' धातु के साथ 'यत्' प्रत्यय जोड़ने से होती है, जिसका अर्थ होता है- बोलना, बताना या कहना। और पद्य से तात्पर्य है- काव्य या कविता। काव्य वह छंदोबद्ध, छंदमुक्त एवं लयात्मक साहित्यिक रचना है, जो श्रोता या पाठक के मन में भावात्मक आनंद की सृष्टि करती है। काव्य के दो पक्ष होते हैं- भाव-पक्ष एवं कला-पक्षा। अर्थात् कविता के दो स्वरूप होते हैं- १. बाह्य स्वरूप। जिसके अंतर्गत लय, तुक, ताल, शब्द-योजना, लक्षण, व्यंजना, रीतियाँ, रस, छंद, अलंकार एवं भाषा आदि तत्व आते हैं और २.आंतरिक स्वरूप। जिसके अंतर्गत अनुभूति की तीव्रता, अनुभूति की व्यापकता, कल्पनाशीलता, रसात्मकता और सौंदर्यबोध, भावों का उदात्तीकरण एवं रागात्मकता आदि अवयव आते हैं। ये दोनों एक-दूसरे के सहायक और पूरक होते हैं। भाव-पक्ष का संबंध काव्य की वस्तु से है और कला-पक्ष का संबंध आकार-शैली से है। सामन्यतः विचारात्मकता और भावात्मकता गद्य और पद्य साहित्य के भेदक तत्व माने जाते हैं लेकिन इसका यह कतई आशय नहीं है कि गद्य भावात्मक और पद्य विचारात्मक नहीं हो सकता। ये दोनों तत्व दोनों में हो सकते हैं बल्कि आधुनिक काव्य में ख़ासकर साठोत्तरी कविता में इन दोनों तत्वों को एक साथ देखना सुखद है। इस संदर्भ में स्वयं पहले तार-सप्तक (1943 ई.) के कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की चर्चा की है। गद्य साहित्य में बौद्धिक चेष्टाएँ और चिंतनशील मनःस्थितियों की अभिव्यक्ति सहजता से होती है और पद्य साहित्य में भावपूर्ण मनःस्थितियों की। 


गद्य और पद्य मिश्रित रचना को चम्पु काव्य कहते हैं। जैसे "नल चम्पू" जिसकी रचना त्रिविक्रमभट्ट ने 10वीं शताब्दी में की और हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त की "यशोधरा" को चम्पू काव्य माना जाता है। काव्य के दो भेद किये जा सकते हैं- १.श्रव्य काव्य और २.दृश्य काव्य । श्रव्य काव्य में रसानुभूति पढ़कर या सुनकर होती है, जबकि दृश्य काव्य में रसानुभूति अभिनय एवं दृश्यों के द्वारा ही संभव है। अब 'रस क्या है?' मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यह प्रश्न जितना छोटा है, इसका उत्तर उतना ही जटिल और बड़ा है। संस्कृत काव्यशास्त्र में कहा गया है- 'रसस्यते असौ इति रसाः।' या 'रस्यते आस्वाद्यते इति रसः।' अर्थात् जिसका आस्वादन किया जाए वही रस है। रस का व्युत्पत्तिपरक अर्थ आस्वाद है। इसे काव्यानंद भी कहा जाता है। आचार्य भरतमुनि ने 'रस' और 'भाव' का विवेचन 'नाट्यशास्त्र' के षष्ठ और सप्तम अध्यायों में किया है। उनके अनुसार, 'विभावानुभावव्यभिचारि संयोगाद्रसनिष्पत्तिः।' अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव (संचारी भाव) के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। अब इस सूत्र के 'संयोग' और 'निष्पत्ति' के अर्थ को लेकर रस की अवस्थिति किस में होती है? इस संदर्भ में इसकी व्याख्या करने वाले आचार्य चतुष्टय हैं- १.भट्टलोल्लट (मीमांसा दर्शन), २. श्रीशंकुक (न्याय "), ३.भट्टनायक (सांख्य '') एवं ४.अभिनवगुप्त (शैव ")। इन व्याख्याओं का प्रभाव हिंदी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉक्टर नागेंद्र आदि पर पड़ा है। इसके अंतर्गत भट्टनायक का साधारणीकरण प्रमुख है। 'रस' और 'कविता' के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने निबंध 'कविता क्या है?' में लिखा है- "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।" (चिंतामणि, संजय बुक सेंटर, वाराणसी। पृष्ठ संख्या-83)


श्रव्य काव्य के भी दो उपभेद हैं- १.प्रबंध काव्य और २.मुक्तक काव्य। प्रबंध काव्य में कोई महान कथा होती है, जबकि मुक्तक काव्य में स्वतंत्र पदों के रूप में भावाभिव्यक्ति की जाती है। प्रबंध काव्य के भी दो प्रकार हैं- १.महाकाव्य और २.खण्डकाव्य। यहाँ पर मुझे बिहारी के मुक्तक के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन स्मरण हो रहा है, वे कहते हैं कि 'यदि प्रबंधकाव्य एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।' मुक्तक काव्य के दो भेद हैं- १.पाठ्य मुक्तक एवं २.गेय मुक्तक। महाकाव्यों और खंडकाव्यों के नाम से तो आप सब परिचित ही हैं। जैसे (रचना-कवि)- पृथ्वीराजरासो-चंद्रबरदाई,  पद्मावत-जायसी, रामचरितमानस-तुलसीदास, साकेत-मैथिलीशरण गुप्त, प्रियप्रवास- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' एवं कामायनी-जयशंकर प्रसाद आदि महाकाव्य और हल्दीघाटी-श्यामनारायण पाण्डेय, पथिक-रामनरेश त्रिपाठी एवं रश्मिरथी-रामधारी सिंह 'दिनकर' आदि खंडकाव्य है।

  

पंत की 'पतझड़', निराला की 'भिक्षु', 'वह तोड़ती पत्थर', एवं श्रीप्रकाश शुक्ल की 'हड़परौली' आदि पाठ्य मुक्तक हैं और गेय मुक्तक के अंतर्गत गीति, प्रगीति, लोकगीत, गीत, नवगीत एवं ग़ज़ल रचनाएँ आदि आती हैं। इसमें भावप्रवणता, आत्माभिव्यक्ति, सौंदर्यमयी कल्पना, संक्षिप्तता, संगीतात्मकता की प्रधानता होती है। रविदास, कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, रसखान, रहीमदास, मीराँ, बिहारी, मतिराम, देव , महादेवी वर्मा आदि की रचनाएँ इसी कोटि में आती हैं। दृश्य काव्य के अंतर्गत नाटक, एकांकी एवं पटकथा आदि आती हैं।


साहित्य समाज का दर्पण है। वह एक सृजनात्मक अभिव्य्क्ति है। साहित्य जीवन का सौंदर्य है। सौंदर्य प्रियता मनुष्य की एक प्रधान मनोवृत्ति है। उसकी इस मनोवृति की प्रेरणा से ही सभ्यता, संस्कृति, कला, साहित्य एवं सिनेमा का विकास हुआ है। मानव भावों, विचारों, कल्पनाओं एवं अनुभूतियों की लालिल्यपूर्ण अभिव्यक्ति ही साहित्य है। असल में साहित्य भाषा में पुनर्जीवन है। प्रत्येक भाषा का साहित्य उस भाषा को बोलने वाले समाज का सजीव चित्र होता है। इस संदर्भ में आप आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आगामी पंक्तियों को पढ़िए- 'प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।' (हिंदी साहित्य का इतिहास, काल विभाग) साहित्य को परिभाषित करना कठिन है लेकिन विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से इस पर चिंतन किये हैं। एक और महत्त्वपूर्ण कथन आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का देखें- 'ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।' या फिर बालकृष्ण भट्ट की परिभाषा देखें- 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है।' अतः भाषा के द्वारा जीवन की मार्मिक अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यक्ति को ही साहित्य कहते हैं। साहित्य उस समाज को बदलने और उसको प्रगति की प्रेरणा देने का समर्थ साधन भी है।


'सौंदर्य' को केंद्र में रखते हुए पाश्चात्य विद्वान एडगर एलन पो ने लिखा है- 'Poetry is a rhythmic creation of beauty.' अर्थात् कविता सौंदर्य का लयात्मक सृजन है। मानव, जिसे प्रकृति द्वारा अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता प्राप्त है, सृष्टि की सुंदरतम् देन है। कवि मानवीय सौंदर्य का पक्षधर है। उसके भावों की अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से होती है। कविता शब्दों की नवनवोन्मेषशालिनी सृष्टि है। कविता में अंतःसौंदर्य का बोध होने के कारण इसे गद्य से ऊँची स्थिति प्राप्त है। कविता का सौंदर्य उपयुक्त शब्द-चयन द्वारा ही दृष्टव्य होता है। जीवन के सुख-दुख के प्रति कवि की प्रतिक्रिया कविता के रूप में फूट पड़ती है। कविता रचते समय जैसी अनुभूति कवि को होती है, वैसी ही अनुभूति वह पाठकों एवं श्रोताओं के मन में जगाना चाहता है। कवि-कर्म और कविता के महत्व को स्पष्ट करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि 'कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूति का संचार होता है' (चिंतामणि, संजय बुक सेंटर, वाराणसी। पृष्ठ संख्या-83) नक्सलवाड़ी कविता के दौर में धूमिल ने कविता के बारे में कहा है कि 'कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है।'



युग और युगधर्म में बिंब और प्रतिबिंब भाव से प्रतिभाषित होता है। कवि और युग एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं। कवि के अंर्तमन की गंभीर अनुभूति कविता का रूप धारण करती है। सृजन पूर्व कोई भी कवि एक अंतःप्रकृति से गुज़रता है जिसमें उसे सृजन के कई घटक तत्त्वों से जूझना पड़ता है।


कविता, मनुष्य-चेतना की सबसे महत्तम रचना है। वह भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करने के लिए शब्दचित्र, अर्थचित्र, ध्वनात्मक, बिंबात्मक, लयबद्ध और तालबद्ध भाषा विकल्पों के माध्यम से व्यक्त अनुभव के बारे में कल्पनाशील जागरूकता होती है। लय और तुक कविता को सहज गति और प्रवाह प्रदान करती हैं। कविता की एक समान गति को लय कहा जाता है। संगीत में लय की तीन कोटियाँ हैं- १.विलंबित लय, २.मध्य लय एवं ३.द्रुत लय। लेकिन कविता में मोटे तौर दो ही लय होती हैं, पहली शब्दलय और दूसरी अर्थलय। कविता लयबद्ध तथा तालबद्ध हो कर ही मनुष्य को आनंद और रस की अनुभूती करा सकती है। वह चाहे गद्यात्मक ही क्यों न हो? उसमें लय मौजूद होती है। क्योंकि वह मानव जीवन का सार है। संगीतात्मकता कविता की हृदय-गति होती है। लय, ताल एवं स्तरों के अरोहावरोह के कारण ही कविता के भाव भरकर आते हैं। लय-तत्व सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। झरने से लेकर सागर की लहरों में, चींटी से लेकर हाथी की चिंघाड़ तक में, चिड़ियों की चहचहाहट से लेकर भूख से बिलखते चूहे तक में, जंगल के जलने से लेकर पहाड़ टूटने तक में, आग में, पानी में और हवा में। वह हर जगह है।


लय मनुष्य के जीवन का आधार है। प्रकृति के एक रूप में लय के दर्शन होते हैं। सार्थक शब्दों के सुव्यवस्थित क्रम से कालजयी लय की व्युत्पत्ति होती है। इस लय में सत्य के स्वर, ताल और तान के सन्तुलित मिश्रण की मधुर सुरीली जय है। जो मनुष्यमात्र के चित्त को आनंदित करने के साथ-साथ उसके चेतना को जाग्रत करती है। इसी से हृदय में रंजक प्रस्फुटन होता है। इसके अभाव में कविता का कार्य संचालन नितान्त असंभव है। क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन लय से ही नियंत्रित होता है और इसको प्रकट करने की प्रक्रिया नाम ताल है। इसकी पहचान गति है। अलौकिक साहित्य में सामवेद गेय है, उसमें लय के प्रारंभिक स्वरूप को देखा जा सकता है। आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र लेकर आधुनिक कविता पर विचार करने वाले चिंतकों ने 'लय और प्रवाह' के महत्त्वपूर्ण को स्पष्ट किया है। लय के द्वारा मनोभावों के प्रदर्शन में रमणीयता, रोचकता, माधुर्य, सुन्दरता और उदात्तता आती है। इसकी कोई सीमा नहीं है, यह तो सभी सीमाओं से परे है। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि लोकोन्मुखी लय महान लय होती है और इस अर्थ में कोरोजयी लय अद्वितीय है।


कोरोजयी लय रचना की युगीन यथार्थ को इंगित करती हैं। सफल व सार्थक कविता लिखने के लिए अर्थ की लय निर्वाह जरूरी हैI कवि को भाषा के संगीत की पहचान होनी चाहिए। कोरोजीवी कविता में आंतरिक लय का निर्वाह गुरुवर प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता 'कोइलिया जल्दी कूको ना' में द्रष्टव्य है। इसमें लोक-संगीत के तत्व मौजूद हैं। यह एक ऐसी कोरोजीवी गीतात्मक कविता है जो अँधेरे की आकृति के विरुद्ध चेतना के चित्र सा चमक चुकी है। इसमें मनुष्यता का मानवीय स्वर है। अर्थात् इसमें आत्मा की आवाज़ की उदात्त लय है और इस लय में जीवन की जय की आलोकितालोड़ित अनुभूति है। जो युग बदलाव का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम है। वह अपनी सम्पूर्णता में जीवन है। प्रकृति, परिवेश, समय और समाज लय के प्रमुख स्रोत हैं। उसका समस्त राग कविता के एक सुन्दर शब्द में समाहित होता है। क्योंकि कविता एवं संगीत में चेतन और अवचेतन दोनों महत्त्वपूर्ण होते हैं। मैंने इस कविता को कई बार चर्चा की है। इसलिए उनकी एक अन्य कविता 'सुबह-ए-बनारस' की पंक्तियाँ देखें-

"पूर्णमदः की गूँजों से जब

पूर्णमिदं परिपूर्ण हुआ

कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू

सजल स्नेह

शत घूर्ण हुआ।" (वाया नई सदी, पृष्ठ संख्या-100)


इस कविता की भाषा तत्सम प्रधान है। इसमें बनारस के शास्त्रीय संगीत को सुना जा सकता है। इस संगीतात्मकता की पृष्ठभूमि में रविदासिया राग की ऊँची अनुगूँज है। (क्रमशः)


©गोलेन्द्र पटेल

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Sunday, 9 April 2023

प्रो. विजय बहादुर सर की स्मृति को समर्पित बारह कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल (छात्र, हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)


ॐ शांति!😭

बीएचयू हिन्दी विभाग के अध्यक्ष व कला संकाय प्रमुख, प्रो. विजय बहादुर सर का असमय जाना मन को व्यथित कर गया। ईश्वर पुण्यात्मा को शान्ति व परिजनों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!!


प्रिय पथप्रदर्शक प्रो. विजय बहादुर सर की स्मृति को समर्पित बारह कविताएँ :-गोलेन्द्र पटेल

1). 


शताब्दी अध्यक्ष


हे शताब्दी अध्यक्ष!

मैंने सोचा—

रात की ख़बर

सुबह झूठ साबित होगी

लेकिन ऐसा हुआ नहीं,

यह सच अनहोनी है!


हे शिष्यों के शुक्लपक्ष!

भावभूमि और मनोभूमि के मानवीय मणि

ज्ञान के द्रष्टा, शब्दाग्नि के सर्जक

वक्त के वक्ता, प्रबुद्ध प्राचार्य

प्रिय पथप्रदर्शक विजय बहादुर सर


एक शिकायत है कि आपने कभी मेरी कक्षा ली नहीं

आपकी कक्षा जिन्होंने ली वे भी संवादप्रिय हैं

मैंने आप से पढ़ा नहीं

पर आपको पढ़ा है सर

जब-जब आपके साथ छपा हूँ


खैर , जायसी कहते हैं—

‘फूल मरै पै मरै न बासू।’


हे हिंदी के हृदय !

यह भावभीनी श्रद्धांजलि का समय है

और मैंने यह शिकायत संस्मरण में रोते हुए की है


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!!


2).


करवटें


करवटें

बिस्तर पर कहती हैं—


वह नींद

नींद नहीं होती है

जिसके पीछे सपने पड़े हों ;


या फिर आँखों में

उनके स्मरण अड़े हों


जो चले गए हैं!


3).


उदास


नीम बौरा गया है

मौसम है उदास ;


मुरझा गए हैं फूल

खिले रहें जो पास!


4).


दहन-राग


हृदय के भीतर

हृदय का फूटा

दहन-राग ;


दुखी है विभाग!


5).


निःशब्दता


पेड़

यात्रारत हैं ;


परछाइयाँ निःशब्द हैं

सड़क पर!


6).


चिड़ियों की भाषा


चेखुर का

बबूल पर

चढ़ना व्यर्थ है ;


चिड़ियों के पास

बची है

उनकी भाषा

क्योंकि

उनके शब्दों के पास

अर्थ है!


7).


बरछी


सपने 

अजीब हैं ;


बरछी की तरह

नींद

आँखों में

चुभ रही है!


8).


अवाक्


ख़ामोशी

सागर की ;


अवाक् कर देती है

नदी को!


9).


स्मृति-प्रसंग


स्मृति

आँखों में

फँस गई है

नींद उड़ गई है 


डोर 

कट गई है 

पतंग की


आसमान भहरा गया

धरती पर!


10).


विदा


यादें

विदा होती हैं

आँसू की बूँदें बन कर

आँखों से ;


जैसे 

धरती से नर!


11).


महाप्रयाण


जब कोई अंतिम यात्रा पर
जाता है तब

स्मृतियों के झुरमुट से
गुज़रता हुआ
समय
भावभीनी भावभूमि पर
श्मशान वैराग्य का
गीत गाता है

अभिव्यक्ति के अखाड़े में
शब्द चित है
ज्योति शेष में अटका
प्राण है
स्तब्ध और दुखी भाषा में
भावोद्गार उचित है
जहाँ मिट्टी की महक का
महाप्रयाण है!

12).


मृत्यु


हे मन!
‘मृत्यु’
वैसे ही सत्य है

जैसे जीवन!!


©गोलेन्द्र पटेल


नाम : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि व लेखक)
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ईमेल : corojivi@gmail.com


Thursday, 30 March 2023

लोकोन्मुखी समुज्ज्वल भाषा के कवि हैं श्रीप्रकाश शुक्ल : गोलेन्द्र पटेल

लोकोन्मुखी समुज्ज्वल भाषा के कवि हैं श्रीप्रकाश शुक्ल

©गोलेन्द्र पटेल


नमस्ते साथियो!


साथियों, आज का समय कवियों के लिए बहुत कठिन है। अच्छी कविता लिखना कितना चुनौतीपूर्ण काम है। इस ओर संकेत करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'कविता क्या है?' निबंध में लिखा है कि 'ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि-धर्म कठिन होता जाएगा।' (चिन्तामणि, संजय बुक सेंटर, वाराणसी।, पृष्ठ संख्या-85) इस फेसबुकिया दौर में रोज़ हजारों कवि पैदा हो जा रहे हैं और जो ख़ुद को कवि, लेखक, आलोचक व आचार्य के रूप में आपके सामने प्रस्तुत करते रहते हैं। हमें उन्हें पढ़ने से बचना चाहिए। समय सबसे मूल्यवान चीज है। आइए अपने समय के एक ऐसे सच्चे कवि को पढ़ें, जिनकी कविताएँ पाठक को विचलित कर देती हैं, उसके भावबोध का परिष्कार करती हैं और उसकी दृष्टि को बदल देती हैं, जिनकी कविताएँ मनुष्यता का ऐसा दस्तावेज़ जो अपने समय के अन्याय और क्रूरता को चुनौती देती हैं। जिनकी कविता की गूँज बहुत ही गहरी और विस्तृत हैं। जो समय के सच को स्व-चेतना और आत्म-दृष्टि से बयान करता है। अर्थात् मैं आप सभी के बीच अपने गुरु, नब्बे के दशक के महत्त्वपूर्ण कवि, कोरोजीवी कविता के सूत्रधार, संवाद प्रिय शिक्षक, समीक्षक व बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के नये कविता संग्रह 'वाया नई सदी' पर विद्यार्थी की दृष्टि से चर्चा करूँगा। यदि इस बातचीत की कड़ी में कहीं मेरे आलोचक की आँख टिक जाए और मेरी निर्निमेष नज़रों में कुछ अच्छी चीज़ें आयेंगी, तो मैं आपको उनसे अवश्य अवगत कराने का प्रयास करूँगा। बातचीत शुरू करने से पहले एक बात पर विशेष ज़ोर कर मैं यह कह रहा हूँ कि शिष्य को गुरु को पढ़ना चाहिए। क्योंकि अच्छे गुरु दिल, दिमाग, दृष्टि और दृष्टिकोण को नयी दिशा की ओर अग्रशित करते हैं। हिंदी की समकालीन कविता का संसार काफ़ी समृद्ध और बहुवर्णी है। इसके कवि अपने उदात्त उतार-चढ़ाव के साथ संवेदना के सागर में डूबते हुए नज़र आते हैं। वे डूब कर अनेक मानवीय रत्नों को खोज़ निकालते हैं। इस दौर की कविताओं की यात्रा के क्रमिक विकास और उनके वैशिष्ठ्य पर बोलना मेरे लिए हर्ष का विषय है। क्योंकि इस काल के अधिकांश कवियों को अपने अतीत से बेइंतहा मुहब्बत है। वे अपनी पूरी चेतना को अतीत के बोझ से मुक्त करते हुए, उससे अतीत के मैल को निकालकर उसे शुद्ध करते हुए और मनुष्य को शुद्ध चैतन्‍य में प्रवेश की विधियाँ एवं मार्ग प्रशस्त करते हैं। उनकी समकालीनता के विशिष्ट अर्थों को समझने के लिए पाठक को यायावर की तरह उनकी कविताओं में यात्रा करना होगा। इस यात्रा में अपने दृष्टिकोण के कोण को बचाये रखना भी बेहद जरूरी है क्योंकि इस काल के कवि पाठक पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हुए उन पर हावी हो जाते हैं। यह उनकी थिराई हुई भाषा का जादू है। ऐसा उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति में अनुभूति का गुरुत्वाकर्षण बल होने से संभव हो पा रहा है। उनके शिल्प के संस्कार पर शास्त्र का संस्कार है, तो स्वर पर लोक का। साहित्य में शास्त्र और लोक के अद्भुत समन्वय के हस्ताक्षर कवि श्रीप्रकाश शुक्ल अपने वर्तमान के साथ पुरखों से संवाद करने वाले सचेत सर्जक हैं। कोरोनाकाल में उनकी सक्रियता कई कवियों के लिए प्रेरणा रही, तो कइयों के लिए दिमाग की दवा। कोविड के दौर में उन्होंने ही कहा है कि महामारी हमें भावुक करती है और भावुकता हमें किंचित अतीत की ओर ले जाती है। उनकी अतीतजीविता वर्तमान के लिए रोशनी है। उनकी रचनाओं से गुज़रना अपने समय व समाज से परिचित होना ही नहीं, अपितु सृजनात्मक शक्ति से सम्पन्न होना है। उनका काव्य-संसार 'अपनी तरह के लोग' प्रथम कविता संग्रह से लेकर राधाकृष्ण प्रकाशन नयी दिल्ली से सद्यः प्रकाशित 'वाया नई सदी' कविता संग्रह तक व्यापक है। इस संग्रह में पिछले आठ वर्षों में लिखी उनकी कविताएँ शामिल हैं। इन कविताओं का अपना समकाल है। इन कविताओं का अपना अनुभव संसार है। कुछ कोरोना के पहले की और कुछ कोरोनाकाल की। उनकी कविताएँ संस्कृति से जुड़ी हुई हैं। जो सृजन की सामाजिक धरती पर रविदास, तुलसीदास, निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध और मदन कश्यप की परंपरा में आती हैं। उनकी कविताओं में निराला का दुःखबोध है, तो नागार्जुन और मुक्तिबोध की राजनीतिक चेतना अपने नये कलेवर में मौजूद है। लोकपीड़ा की लय उनकी कविताओं का प्राणतत्व है। उनकी कविता में जन-जीवन का होना, उनकी कविताई की विशेषता है। हालांकि इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ कोरोजीवी कविताएँ हैं। जो अपने परिवेशगत संलग्नता, सेहत और संबंधों की बहुत ही सूक्ष्मता से चर्चा करती हुई समय का सवाल मानस में छोड़ती हुई पाठक को ठहर कर सोचने के लिए कहती हैं। इस संग्रह की कविताओं से गुज़रते हुए मैंने महसूस किया है कि चरम परिवेशगत संलग्नता ही कोरोजीवी कविता का केंद्र बिन्दु है। लेकिन मानवीय सेहत और संबंध पर कोरोजयी कवि की अद्वितीय अंतर्दृष्टि पड़ी है। शुभ और अशुभ, सफलता और विफलता, प्रशंसा, निंदा, रोग-स्वास्थ्य, जवानी -बुढ़ापा, जन्म-मृत्यु, जीवन के तमाम पहलुओं की ओर उनकी अंतर्दृष्टि गयी है और जो अस्पर्शित सत्य को उजागर किया है।


शुक्ल जी की कविताएँ अपने समय के विभिन्न रंगों को पढ़ती हुईं, गढ़ती हुईं, उसके तनाव और ताप को बाँचती हुई कविताएँ हैं। ये कविताएँ हैं कठिन समय में भी जीवन के उल्लास को, प्रेम को सहेजती हुईं, भविष्य में झांकती हुई सी जान पड़ती हैं। प्रेम और विश्वास जीवन के महत्त्वपूर्ण तत्व हैं। इन तत्वों का क्षरण बहुत तेज़ी से हो रहा है। यह ऐसा समय है कि हमारे जीवन से मानवीय तत्व गायब होते जा रहे हैं। इन्हें बचाने के लिए कवि हृदय से छटपटाते हुए इस संग्रह की पहली कविता के शुरुआत में ही अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हुए कहा है कि 


"यह कैसा समय है जिसकी सबसे ज्यादा बात हम करते हैं

वही हमारे जीवन में अनुपस्थित रहता है

मसलन प्यार

मसलन विश्वास

मसलन जनतंत्र


मसलन सत्ता से जुड़ा हुआ बहुत कुछ का प्रतिरोध

जब हम सत्ता के बाहर होते हैं।"(पृष्ठ संख्या-9)


इन तत्वों से जीवन और समाज चलते हैं, इनको बचाए रखने के लिए वे हर बुरी ताकत से टकराने को तैयार हैं। वे इस कविता में चुप्पी से क्रांति का शोर उत्पन्न करते हैं। पीड़ा-प्रबोधन से उपजी श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताएँ उम्मीद की कविताएँ हैं। मैं अन्य कविताओं पर बात शुरू करूँ, उससे पहले मैं आप लोगों को एक बात बताना चाहता हूँ। इस संग्रह की सूचना अपने फेसबुक वॉल पर साझा करते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल जी ने लिखा था कि "इनके आने की ख़बर आई है। इनके पहुंचने का इंतजार है। चल चुके हैं। अभी यह 'स्क्रीन स्पर्श' है। 'स्किन सुख' का इंतजार है।" इस संग्रह में 'इंतजार' शीर्षक से एक मार्मिक कविता है। जिसमें वे सीझती हुई करुणा की बात करते हैं और बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान भूख-प्यास से ब्याकुल जनता कैसी परिस्थिति में थी। उस समय की ऐसी तसवीरें जो दिल को चिर देने के लिए सोशल मीडिया पर उछलती हुई सामने आ रही थीं, वे सारी तसवीरें पुनः चलचित्र की तरह चेतन मन में चलने लगी हैं। उन्हें देखने के बाद सहृदय के आँसू न टपकें, यह कैसे हो सकता है! मनुष्यता के धरातल पर श्रीप्रकाश शुक्ल इस कविता में किसका इंतजार कर रहे हैं? क्या यह इंतजार वही इंतजार है जो फ़ैज अहमद फ़ैज 'सुब्हे-आज़ादी' में कर रहे हैं? क्या यह इंतजार वही इंतजार है जो शमशेर बहादुर सिंह 'टूटी हुई बिखरी हुई' में कर रहे हैं? क्या यह इंतजार वही इंतजार है जो धूमिल 'पटकथा' में कर रहे हैं?


तो उत्तर है कुछ वैसा ही यह इंतजार भी है, भूख की भाषा में भाव को अभिव्यक्ति करते हुए वे 'इंतजार' में लिखते हैं कि 

"एक क्रिया से जुड़ता हूँ

अनेक प्रतिक्रियाएँ कुलबुलाने लगती हैं


दूर बहुत दूर कोई माँ रो रही है

अर्थ तो बचा नहीं

भाषा भी खो रही है। (पृष्ठ संख्या-112)



आज हम देख ही रहे हैं कि किस तरह से सत्ता रोटी से खेल रही है और जो रोटी से खेलते हैं उन लोगों से धूमिल 'रोटी और संसद' में परिचय करवाये हैं। रोटी के राग को अनुराग की शब्दावली में ढालते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल ने लिखा है कि


"रोटी बन रही है


अनेक के इंतजार में

लोई पड़ी है


लोई से रोटी बनने के बीच एक जगह है

जहाँ उम्मीद है।" (पृष्ठ संख्या-130)


श्रीप्रकाश शुक्ल की इंतजार एक उम्मीद की तरह है। उनकी कविताओं से भावक वर्ग को काफ़ी भरोसा है।  जैसे चिड़ियों की चहचहाहट से कवि को नई सुबह का भरोसा है। वे 'भरोसा' शीर्षक कविता में लिखते हैं कि 'आकाश से झड़ रही हैं अँधेरे की पाँख/ और सुबह का भरोसा अब/ इसी चिड़िया से है!' (पृष्ठ संख्या-11)


उनकी कविताओं में जड़ता का नकार और नवता का स्वीकार है। उनकी कविताएँ दिल और दिमाग के समन्वय से लिखी गई हैं। जो लोकविश्वास और लोकसम्भावनाओं की कविता हैं। उनकी कविताएँ आम आदमी की पीड़ा और उसकी संवेदना को उभार कर रख देती हैं। वे जनता को सत्ता से सवाल करने का साहस देती हैं। उनका मूल स्वर अन्याय के विरुद्ध आवाज़ है और अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार तभी होता है जब दुःखबोध होता है। उनकी कविताओं से गुज़रते हुए आप महसूस करेंगे कि जीवन में जितना अधिक ताप होगा ,संताप उतना ही कम होगा। खैर, इस संग्रह में करीब एक दर्जन कविताओं का विषय चुप्पी है। चुप्पी के बारे में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने कहा कि 'मौन भी अभिव्यंजना है।' लेकिन याद रहे कि मौन, चुप्पी और सन्नाटा ये तीनों ही एक सीमा के बाद अहित कर हो जाते हैं। इनको तोड़ने के बारे में कवि सोच रहा है। चुप्पी कभी कभी आदमी को अतीत में ले जाती है। लेकिन किसके अतीत में? इस संदर्भ में श्रीप्रकाश शुक्ल 'भविष्य' कविता में लिखते हैं कि "चुप्पे लोग हमेशा चुप रहते हैं और अतीत में सोचते हैं/ बोलता आदमी भविष्य की बातें करता है और वर्तमान में सोचता है/ जिन्हें उनका अतीत प्यारा हो वे चुप्पी के साथ रहें व संटुष्ट भी।" (पृष्ठ संख्या-49)



 'चुप्पी के खिलाफ' शीर्षक कविता में कवि तमाम सत्ताओं की क्रूरता व पाखंड का खुलासा करता है। यह कैसा दौर है। अब बोलना भी मुश्किल है। उस देश में जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्ति का मूल अधिकार है। शुक्ल जी इस संदर्भ में भी कहते हैं कि "यहाँ हर आदमी दूसरे को चुप करा रहा है और गम्भीर बनाए रखने के की/ कोशिश में हर अगंभीर काम करता है/सत्ता का इतिहास भी इसी गंभीरता का इतिहास है।" (पृष्ठ संख्या-48)


इस संग्रह की कविताएँ सचमुच एक अलग तरीके से प्रभावित करती हैं। जब शक्ति और समृद्धि से ओतप्रोत देश अपने नागरिकों को बचाने में असमर्थ रहीं। कोरोजीवी कविताएँ संघर्षशील जनमानस को एक उम्मीद से ढांढस बंधाती रहीं। कविता बदलते परिदृश्य की ज़िम्मेदारी है, जो सत्ता और प्रतिसत्ता के बीच के संघर्ष को बहुत स्वाभाविक तौर पर रेखांकित करती हैं। इस संग्रह में कवि प्रकृति के तमाम जीवों की अस्मिता की आवाज़ बन कर आया है। वह झींगुर, गूलर, गाय, देवदारु की दुनिया, समुद्र, पेड़, गुलमोहर, कचकचिया आदि कविताओं में वैसे ही मौजूद है, जैसे छायावादी कवि अपनी प्रकृतिपरक कविताओं में। इस वाया नई सदी में कचकचिया (Babbler) का कचराग कितना मनोहारी है! यह तो आप आगामी पंक्तियों से समझ सकते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल लिखते हैं कि "घोंसला बन रहा है/सृष्टि के विधान में नई साँस का उदय हो रहा है/ स्पर्श सुख का कहना ही क्या/ नेह गान थिरक रहा है।" (पृष्ठ संख्या-144)


 ‘कोइलिया जल्दी कूको ना’ शीर्षक कविता में कवि अपनी पूरी लय में विराट जिजीविषा लिए हुए उपस्थित है। इसमें कवि भावभूमि से मनोभूमि की यात्रा दृष्टि सम्पन्न यायावर की भाँति करता हुआ मानो महामारी में युग का मंगलाचरण गा रहा है। लेकिन इतिहास में 'कोयल' राजनीतिक प्रतीक है। इस संदर्भ में आप माखनलाल चतुर्वेदी की कविता 'कैदी और कोकिला' देख सकते हैं या फिर नागार्जुन की कविता 'शासन की बंदूक'। उसमें नागार्जुन लिखते हैं कि "जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक/ बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक।" (आधुनिक एवं छायावादोत्तर काव्य-संग्रह, पृष्ठ संख्या-182)


यहाँ 'कोइलिया' शांति और क्रांति का प्रतीक तो है ही, साथ-साथ आशा और उम्मीद का भी। उसका कूकना उल्लासमय जीवन का अनुष्ठान है। आपदा में अवसर के विरुद्ध वह युद्ध नहीं, बुद्ध की करुणा से रसमग्न हो कर कूक रही है। ऊपर भी बताया जा चुका है कि कवि चिड़ियों से नये सवेरा की बात करता है। वे कहते हैं कि "गौरैया भी जगी हुई है/ तिनका तिनका बीन रही है/ सृजन राग से इस दुनिया में/ जाग, भाग को साध रही है/ हुआ सवेरा दौड़ी आई/ मिला नहीं जो ढूँढ रही हैं!/ कोइलिया जल्दी कूको ना!" (पृष्ठ संख्या-127)



उनकी कविताओं में 'पेड़' कई अर्थों में प्रयोग हुए हैं लेकिन 'पेड़' शीर्षक कविता में पेड़ भावी पीढ़ी का प्रतीक है। श्रीप्रकाश शुक्ल को युवाओं से काफ़ी उम्मीद है। वे युवा रचनाकारों से अभिवावक की तरह पेश आते हैं। यही कारण है कि वे काफ़ी चर्चा में रहते हैं। वे अपनी उम्मीद को दर्ज करते हुए कहते हैं कि "जब हम नहीं होंगे/ ये पेड़ ही होंगे/ जो अपनी ऊँचाई में/ हमारी गहराई का पता देंगे।" (पृष्ठ संख्या-109) श्रीप्रकाश शुक्ल कविता की भाषा पर भी ख़ूबसूरत प्रयोग कर रहे हैं। जैसे प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत, त्रिलोचन, अज्ञेय, धूमिल और ज्ञानेन्द्रपति ने किया है। वे भारतीयता के क्षरण के प्रति अपनी असहमति, अपना प्रतिरोध दर्ज करने वाले कवि हैं। जैसे मुक्तिबोध 'अँधेरे में' मुखर होकर कहते हैं वैसे ही श्रीप्रकाश शुक्ल एक मुखर आदमी के पक्ष में अपना बयान देते हुए लिखते हैं कि "...कि लोकतंत्र के मुद्दे भुजा से नहीं/ भाषा से तय होते हैं।" ('मैंने कहा था' कविता से, पृष्ठ संख्या-61)


'पथ हारा', 'शुभकामनाएँ' एवं 'घर से काम' जैसी उनकी कुछ कविताओं में शब्दों का अद्भुत प्रयोग हुआ है। जिनको पढ़ने के बाद छठी शताब्दी के भामह और सत्रहवीं शताब्दी के पंडितराज जगन्नाथ के सूत्रों का याद आना स्वाभाविक है। जहाँ भामह ने कहा है कि "शब्दार्थौ सहितौ काव्यम् गद्यं पद्यं च तद्विधा।" या "शब्दाभिधेयेविज्ञाये कृत्वातद्विद्पासना।/ विलोक्यन्य निबन्धाश्च कृत्वाकाव्यक्रियादरः।।" (काव्यालंकार-भामह, चौखम्भा प्रकाशन वाराणसी।) अर्थात् शब्द और अर्थ को ठीक से समझकर कवियों को काव्य रचना की कोशिश करनी चाहिए। वहीं जगन्नाथ ने कहा है कि "रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्।" इन्हीं से मिलता जुलता है पाश्चात्य विद्वान कॉलरिज का कथन। वे कहते हैं कि "Poetry is the best words in best order." (भावार्थ : कविता सर्वोत्तम शब्दों का सर्वोत्तम क्रम है।) 'घर' और 'काम' इन दिनों शब्दों के प्रयोग से बनी कविता 'घर से काम' में ध्वन्यात्मकता की गूँज देखिए, वे लिखते हैं कि "घर से काम/घर में काम/ घर का काम!/ घर पर काम/ घर भर काम/ घर हर काम/ घर घर काम/ घर जब काम/ घर तब काम/ घर कब काम/ घर अब काम!/ घर ही काम/ जय जय काम/घर भी काम/ जर जर काम!" अज्ञेय भी कहते हैं कि "कविता सबसे पहले और सबसे अंत में शब्द है।" अतः श्रीप्रकाश शुक्ल को शब्दों का कवि कहा जा सकता है लेकिन मैंने उनके 'बोली बात', 'क्षीरसागर में नींद' और 'वाया नई सदी' इन तीनों संग्रहों से गुज़रने के बाद यह पाया है कि उनके यहाँ भोजपुरी की क्रियाओं का अधिक प्रयोग हुआ है। मसलन 'वाया नई सदी' में जैसे कुछ क्रियाएँ क्रमशः पियराता, पोंछना, गरियाने, बरियाने, लतियाने, छोपकर, छींटता, पुचकारते, लहराता, थिरकना, थूरना, जहकना, थसरने, फनफनाती, बिखराने, लीपने, पोतने, बड़बड़ाने, पपड़िया, खिसिया एवं कुलबुलाना आदि हैं। वे अपनी कविताओं में लोक की सुंदर संज्ञाओं का प्रयोग भी किये हैं लेकिन वे क्रियाओं की अपेक्षा कम हैं। अतः कविता के बने की प्रक्रिया में जो क्रिया होती है, उसी के कवि हैं श्रीप्रकाश शुक्ल। अर्थात् वे क्रिया के कवि हैं। वे क्रियाओं की गतिशीलता के नए संदर्भ को उद्घाटित करते हैं और जिससे कि उनकी कविताएँ अपना अर्थ पाती हैं। उनकी भाषा सहज, सरस, लयात्मक, प्रवाहपूर्ण, संगीतात्मक एवं चित्रात्मक है। उनकी भाषा लोकोन्मुखी समुज्ज्वल भाषा है। वे 'झुकना' शीर्षक कविता में भाषा की आर्द्रता और आँच का समन्वय करते हुए कहते हैं कि "जैसे कि यह पेड़/ जिसकी हर शाखा में/ किसी न किसी के/ झुकने की भाषा दर्ज है।" 'वाया नई सदी' की भाषा के संदर्भ में अग्रज कवि अनिल कुमार पाण्डेय ने कहा है कि 'कहाँ क्रांति की भाषा अपना कार्य करेगी और कहाँ संवेदना से लसित भावनाएं यह कवि जानता ही नहीं है अपितु व्यावहारिकता में इस संग्रह में अपनाया भी गया है।' भाषा का सवाल समय और समाज का सबसे बड़ा सवाल होता है। उसकी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा होती है। इसके बिना मानवीय अस्तित्व संभव ही नहीं है। इस ओर कवि ने बार-बार इशारा किया है।


मनुष्य की छवि जब व्यक्तित्व में रूपांतरित होने लगती है, तो वह सामाजिकता में रूपांतरित हो जाती है। यह एक छवि ही है जो उसे सामाजिक बनाती है। सामाजिकता एक संक्रमणशील इकाई है। वह जितनी ही संक्रमणशील होगी सामाजिकता उतना ही विस्तार पाती है यहीं विस्तार मनुष्य को गतिशील बनाता है। ताकि वह भाषा में आदमी हो सके। वह भूमंडलीकरण के वैश्विक बाज़ार में वस्तु होने से बच जाए। बाजार के विरुद्ध उसका व्यक्तित्व बना रहे। इस संदर्भ को समझने के लिए आप 'आदमी जहाँ टैग है!' कविता को पढ़ें। उसमें श्रीप्रकाश शुक्ल ने स्पष्ट किया है कि


"इस पीड़ा को किससे कहें

आदमी जहां टैग है

प्लास्टिक का एक बैग है

×         ×           ×     ×

इंसानियत अब

महज एक काश है!" (पृष्ठ संख्या-131) 


निकर्षतः हम कह सकते हैं श्रीप्रकाश शुक्ल की कोरोजीवी कविताएँ सत्ता के भय व जनता के त्रास के बीच धरती पर गिर रहे आँसुओं के मूल्य को समझती हुई उसके संघर्ष पक्ष की शिनाख्त करने वाली हैं। इस संग्रह की कविताएँ प्रेम के माध्यम से दूसरे के होने को गौरव प्रदान करती हैं। जो मनुष्य की सामाजिकता को संकुचित होने से बचायी रखने वाली कविताएँ हैं। जिनके भीतर से जनतंत्र का जन झाँकता है। शुक्ल जी मनुष्य के लिए कविता को प्रेरक, स्वास्थ्यवर्धक एवं स्फूर्तिदायक मानते हैं। इनकी कविताएँ मनुष्य के मस्तिष्क को सक्रिय कर उसके भीतर तेजी से प्रतिरोधी क्षमता का विकास करने वाली हैं, जो स्वप्न, संघर्ष और सौंदर्य की अपार सम्भावनाओं से युक्त हैं। इस संग्रह की कुछ कविताओं का वस्तु जगत अंत-र्बाह्य के द्वंद्व से उपस्थित हुआ है, जो अखंड जिजीविषा की कविताएँ हैं। जीवन से जुड़ी इन कविताओं को पढ़कर लगता है कि ये कविताएँ हमसफ़र की तरह हमारे साथ-साथ चल रही हैं। शुक्ल जी गहरी मानवीयता के प्रति हमारे भरोसे को और मज़बूत करते हैं। उनकी कविताएँ पाठक को वैचारिक दृष्टि से समृद्ध ही नहीं, अपितु उसके अंदर के मनुष्य को झकझरती हुई सार्थक कविताओं का आनंद देती हैं। इस संग्रह का कवि संसार को जैसा दिखाना चाहता है, वैसा वह दिखाने की कोशिश किया है। गुरुवर के यहाँ आलोड़ित, आह्लादित व आलोकित का त्रिवेणी अक्ष पर भूत, वर्तमान व भविष्य में घूमते हुए नज़र आ रहे हैं। अंत में इतना ही कि "अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः।/ यथास्मै रोचते विश्वं तथेकं परिवर्तते।।"


(©गोलेन्द्र पटेल / 30-03-2023)


पुस्तक : वाया नई सदी

कवि : श्रीप्रकाश शुक्ल

पहला संस्करण 2022

राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड जी-17, जगतपुरी दिल्ली-110051

मूल्य : ₹495


टिप्पणीकार : गोलेन्द्र पटेल

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