Tuesday, 7 November 2023

धूमिल को समर्पित कविताएँ (dhoomil ko samarpit kavitayen) / धूमिल पर केंद्रित कविताएँ (dhoomil par kendrit kavitayen)

धूमिल से संबंधित गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ :-

दस कविताएँ :-

1). धूमिल जयंती
2). धूमिल! मैं तुम्हें गाऊँगा
3). सत्ता से सवाल
4). धूमिल की पुण्यतिथि
5). याद आते हैं
6). धूमिल का घर मेरा दिल है
7). धूमिल होना
8). कविता मरने के बाद भी कवि को ज़िंदा रखती है
9). नज़्र-ए-रत्नशंकर पाण्डेय
10). धूलिम की धरती 

1).

धूमिल जयंती


आसमान में धुआँ ही धुआँ है

युद्ध जारी है

पूरी दुनिया युद्ध में उलझी हुई है


पुरखों की जयंतियाँ बीत जा रही हैं

और पता भी नहीं चल रहा है

ऐसे में


जनकवि धूमिल जयंती की पूर्वसंध्या पर

मैं देख रहा हूँ

इस बार खेवली में नहीं

बल्कि खजूरगाँव में धूमिल जयंती की धूम मचने वाली है

उनकी पुनर्खोज की तैयारी चल रही है


खेवली केवल खजूरगाँव का रूपक नहीं,

बल्कि राष्ट्र का रूपक है


उनका सौंदर्य, श्रम का नया सौंदर्य है

वे मानवीय दृष्टि से कविता और भाषा को 

अपने समय में सबसे अधिक परिभाषित करते हैं

उनका संघर्ष, उनके सृजन को निखारा है

वे अँधेरे में शब्दों को दीपक सा धरते हैं


उनके आत्मचिंतन में समुचित आत्मसंवेग है

सामाजिक सरोकार है, सभ्यता-समीक्षा है

वे भूख और भाषा की दूरी को समझाते हैं

उनकी कहन के अंदाज़ का कायल हूँ मैं

मुझे उनसे असीम प्यार है


उनका गढ़ा ख़ूब पढ़ा जाता है

वे ठंड में धूप की नदी की तरह हैं

उनकी कविता राजनीतिक झूठ का पर्दाफ़ाश करती है

वे अपनी सहजता में गहरी बात के कवि हैं


उनकी क्रांतिकारी चेतना से गुज़रते हुए

मैं साहसिक हो रहा हूँ


उनकी रचनाधर्मिता अवसाद से आश्वस्तता की ओर उन्मुख है

वे दुःख के दौर में दरकते 

व टूटते मन को बचाने की कोशिश भी करते हैं

उनकी अभिव्यक्ति पाठक को शक्ति देती है


मैं वक्त का वाचक हूँ

यह स्मृतियों को बचाने का समय है

उनकी स्मृतियों को कोटि-कोटि नमन!


2).

सत्ता से सवाल


एक दिन

एक किसान कवि चुपचाप

भूख की भूमि में बोया जब अपना दुख

तब उगा दोहा

जो ले रहा है लोकतंत्र से लोहा


जहाँ जनता का जश्न

केवल चुनाव है

उसका पसीना पूछता है प्रश्न____

क्या सत्ता से सवाल करना

धूमिल होना है?



3).

धूमिल! मैं तुम्हें गाऊँगा


राजनीति के रंगमंच पर


‘क्या मैं तुम्हें काशी का दूसरा कबीर कहूँ?’

“नहीं”

‘क्या मैं तुम्हें अस्सी और खेवली के द्वंद्व की उपज कहूँ?’

“नहीं”

‘क्या मैं तुम्हें भदेस भाषा का जादूगर कहूँ?’

“नहीं”

‘क्या मैं तुम्हें लोकतंत्र का सजग प्रहरी कहूँ?’

“नहीं”

‘क्या मैं तुम्हें जनविमुख व्यवस्था की विद्रोही वाणी कहूँ?’

“नहीं”

‘क्या मैं तुम्हें सपनों का संघर्ष कहूँ?’

“हाँ”

‘क्या मैं तुम्हें मोहभंग का कोह कहूँ?’

“नहीं, ‘कूह’ कहो”


वे जो बेलाग और बेलौस

शब्द सजग चिंतक हैं

वे जो जनधर्मी चेतना के तीख़े स्वर हैं

वे जो बेचैन कर देने वाली प्रश्नाकुलता की परंपरा के प्रेरणास्रोत हैं

वे जो वक्त के वक्ता व वकील हैं

वे जो भास्वरता के कवि हैं

‘क्या तुम वही हो?’

“हाँ, मैं वही हूँ

जो ख़ुद के सवालों के सामने खड़ा हो जाता है

जो अवचेतन की भाषा में बड़ा हो जाता है

हाँ, मैं वही हूँ

जिसकी तुक का जोड़ नहीं

जिसके मुहावरे का तोड़ नहीं

हाँ, मैं वही हूँ

नक्सलबाड़ी का नायक

भारतीय संस्कृति का गायक

हाँ, मैं वही हूँ

जो तुम समझ रहे हो

हाँ, मैं वही हूँ!”


ओ साठोत्तरी पीढ़ी के प्रतिनिधि,

मेरे प्रियतम पुरखे धूमकेतु, अग्निधर्मा, आक्रोश के कवि!

मैंने तुम्हें याद करते हुए

महसूस किया कि

तुम्हारा दुःखबोध ही तुम्हारी कविता का प्राणतत्त्व है

तुमने नीली पलकों पर थरथराती हुई

आँसुओं की जो आवाज़ सुनी

वह मेरे युग की महाकाव्यात्मक पीड़ा है

क्या स्याह संवेदना सत्ता के लिए

विषैला कीड़ा है?


तुम चेतना के धरातल पर मेरे बहुत करीब हो

मैं अक्सर लोगों से कहता हूँ

कि धूमिल की धरती मेरी धरती है

खेवली और खजूरगाँव के बीच

शब्द-शिक्षक और शब्द-शिष्य का संबंध है

मैंने तुमसे भाषा में आदमी होने की तमीज़ सीखी

मेरे और तुम्हारे बीच एक ही माटी की गंध है


तुम मेरी आत्मा के प्रकाश हो

तुम मेरी मनोभूमि के आकाश हो

तुम मेरी भावभूमि के विचार हो

तुम मेरी धार हो

तुम मेरे आधार हो

तुम मेरे कवि का पहला प्यार हो


हे सामाजिक मन के सर्जक

युवा ऋषि कवि!

मैं तुम्हारी रचनाओं में ऊब और उदासी के बीच

उम्मीद को पाता हूँ

मैं तुम्हें अंतर्मन से गाता हूँ

तुम बन जाओ मेरा गीत

सरस-सरल-सहज संगीत

मैं तुम्हें गाता हूँ— ‘संसद से सड़क तक’


तुम मेरे प्रिय कवि हो

जैसे होते हैं सबके

वैसे ही


तुम्हारी जनपक्षधरता अद्भुत है

मैं चाहता हूँ— तुम ‘कल सुनना मुझे’

मेरे राग में तुम्हारी आग होगी

और मेरी लय में तुम्हारी जय

मैं तुम्हें गाऊँगा!

कल, मैं तुम्हें गाऊँगा!!


4).

धूमिल की पुण्यतिथि


सड़कें जानती हैं कि

जब एक सूखी हुई नदी 

न्याय की माँग करती है

तब लहरें चीखती हैं

और

रेत रक्त से लिखती है

कि माँ के आँसू

द्वीप को डूबो देंगे!


जहाँ धारा की ध्वनि है

चिता की राख से फूटी हुई

रोशनी बिजली में बदल रही है

क्या ख़ूब आँखों से बारिश होगी

इस धरा पर!


आह! रेत में सूरज डूब रहा है

सत्ता का सेतु गिर रहा है


चाँद को लग रहा है कि आज

किसी ऐसे कवि की पुण्यतिथि है

जिनकी कविताओं में बदलाव की एक अमर,

अपराजेय, अप्रतिहत अनुगूँज है

वेदना वैभव, सार्थक वक्तव्य, विचारवीथी है


नदी में नाव स्मृतिकथा कह रही है 

कवि धूमिल की!


5).


याद आते हैं


छब्बीस जनवरी के दिन

मुझे नागार्जुन का गणतंत्र याद आता है

मुझे याद आता है

'सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र'

मुझे याद आते हैं वे कवि

जो कहते हैं कि 'मुझे दूसरी पृथ्वी चाहिए'


मुझे याद आता है

ज्ञानेंद्रपति की 'संशयात्मा' का 249 वाँ पृष्ठ

मुझे याद आती हैं

अरुण कमल व श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताएँ

'उत्सव' से लेकर 

'देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के एक नागरिक का ख़त'


मुझे 'क्षमा करो'

अशोक वाजपेयी भी जानते हैं

कि यह कैसा षड्यंत्र है

मैं देख रहा हूँ मदन कश्यप की आँखों से 

कि 'अपना ही देश' में 'लहुलुहान लोकतंत्र' है

मुझे याद आती हैं राजेश जोशी की कुछ पंक्तियाँ

कि 'जो विरोध में बोलेंगे, 

जो सच बोलेंगे, 

वो मारे जाएंगे'


आज़ादी के अमृत महोत्सव पर 

मैंने कहा था कि

मुझे रवीन्द्रनाथ ठाकुर का लिखा राष्ट्रगान नहीं

रमाशंकर यादव 'विद्रोही' की रची गयी कविता

'जन-गण-मन' याद आ रही है


मुझे ऐसी कविताएँ याद आती हैं

पंद्रह अगस्त पर

या फिर गाँधी जयंती के दिन

लुढ़ियाया तिरंगा को देखकर!

6).


धूमिल का घर मेरा दिल है

जब सपने धूमिल होते हैं
कवि धूमिल पैदा होते हैं
नई भाषा, नई कहन के साथ

वे गढ़ते हैं नये मुहावरे
और पढ़ते हैं आदमी को आदमी से

उनकी चेतना की चोट से चिनगारी उत्पन्न होती है

उनके प्रेम में गुस्सा है
गुस्सा में प्रेम है
उन्होंने कला में जीवन को वरीयता दी
उनकी आँखों को देखकर
मुझे अपनी आँखों की याद आयी
वे मेरी आँखों की भाषा जानते हैं
मैं साँस भर हवा हूँ
  आँचल भर धूप हूँ
  अँजुरी भर रूप हूँ
  प्यास भर पानी हूँ
  भूख भर अन्न हूँ
  जीवन भर प्यार हूँ
सृजन भर सम्पन्न हूँ
वैयक्तिक-सामाजिक यथार्थ से लैस हूँ
मैं संवेदना और शब्द के बीच हाइफ़न हूँ
समय और समाज के बीच डैश हूँ

मैं धूमिल की धरती से हूँ
मुझे उनके घर जाने की आवश्यकता नहीं
क्योंकि उनका घर
मेरा दिल है!


7).

धूमिल होना

एक शब्दवाहक में व्यंग्य के रंग अनेक हैं
और चेतना की चोट से उत्पन्न दूरगामी चिंगारी भी

वे कवि जो अपनी कविताओं में शब्दों को खोलकर रखते हैं
जिनकी टिप्पणियाँ जनता की ज़बान पर होती हैं
जो प्रजातंत्र को प्रश्नांकित करते हैं
जो भय, भूमि, भूख, भाषा
और भाव को परिभाषित करते हैं
जो धुंध में रोशनी देते हैं
जो कविता के किसान हैं
जो सच का सबूत पेश करते हैं
जो बीमारी, बसंत और बनारसी बात के ही नहीं
बल्कि स्वप्न, संघर्ष और मानवीय सौंदर्य के कवि हैं
जिनकी पहचान श्रम-संस्कृति की तान है
उन्हीं का नाम धूमिल है

धूमिल होना
कविता में आदमी होना है
भारतीय समाज की यंत्रणा का कवि होना है!


8).

कविता मरने के बाद भी कवि को ज़िंदा रखती है


ब्रेन ट्यूमर की वजह से 

तुम ही नहीं

कई कवि अल्प आयु में चल बसे

पर, तुम्हारा जाना

एक युग की सबसे बड़ी क्षति है

अब अभिव्यक्ति के नाम पर

कविता में गति नहीं,

यति है

केवल कोरा विचार 


काश कि जब तुम बाहर आये

तुम्हारे हाथों में कविता के बजाय

दिमाग़ का एक्स-रे होता

तुम ज़िंदा होते!

पर, तुम्हारे दिमाग़ में आँतों का एक्स-रे था

और हाथों में कविता

क्योंकि

तुम जानते थे कि कविता मरने के बाद भी

तुम्हें ज़िंदा रखेगी!


9).


नज़्र-ए-रत्नशंकर पाण्डेय


धुंध सूरज को कब तक रोकेगी?

गंध रंग को कब तक टोगेगी?

कोई मोचिन कब तक करेगी

अच्छे दिन का इंतज़ार?

भाषा की रात कब तक बीतेगी?

चाँद कब तक करेगा

नदी में डूब कर रोहिणी से प्यार?

खेवली में धूमिल के नाम से कब तक बनेगा गेट?

क्या कवि-पुत्र को मालूम है?


क्या रत्नशंकर ने धूमिल के कंधे पर काशी देखी है?

(मतलब, बेटा बाप के कंधे पर बनारस देखा है

या बनारसी रामलीला का रावण-दहन?

क्या ख़ूब है कवि की कहन!)

कविरत्न कैसे पिता थे रतन!

क्या वे कविता के बाहर भी गरम थे?

आक्रोशित दिखते थे?

वे बहुत ज़िद्दी थे न? रतन!


कभी ऐसा हुआ है कि वे कोई गीत लिख रहे थे

और उनके रत्न रोने लगे!

या फिर वे कुछ लिखकर रखे थे

उनके रत्न उसका जहाज़ बनाकर उड़ा दिए?

या बारिश में तैरा दिए?

फिर पीठ-पूजा हुई हो, कोई ऐसी घटना याद है रतन?


बहुत सुन लिया मैंने

उनके साथियों का संस्मरण

अब मैं जानना चाहता हूँ कि उनकी कौन सी रचना है

जिसका पहला श्रोता रतन हैं

और पहला पाठक भी

क्या कविरत्न की तरह रतन का बचपन भी आर्थिक संघर्षों में बीता है?


खैर, अब मुझे माता मूरत देवी को सुनना है

उनकी स्मृति के आलोक में आलोकित होना है

क्योंकि वे बिन भाषा

थके-हारे

धूमिल के उदास मन को राहत देती थीं!

10).


धूमिल की धरती


प्रश्नाकुलता के साथ 

प्रगीत में प्रज्ञा की तलाश के करते हुए 

धूमिल की धरती पर किसी ने पूछा 

कि मेरा उनसे क्या रिश्ता है

मैंने कहा कि जो संबंध लमही और लहरतारा के बीच है, 

वही संबंध खेवली और खजूरगाँव के बीच है

वे अक्षरों के बीच गिरे हुए 

आदमी को पढ़ते थे 

और मैं अक्षरों के नीचे दबी हुईं चीखें 

सुनता हूँ!


©गोलेन्द्र पटेल

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Friday, 3 November 2023

मेरा इलाहाबाद जाने का मन नहीं है! : गोलेन्द्र पटेल (Mera Allahabad Jane Ka Man Nahin Hai! : Golendra Patel)

 



1).

मेरा इलाहाबाद जाने का मन नहीं है!


इलाहाबाद ने अपना नाम बदला है

मैंने नहीं,

मेरा नाम वही है, जो कल था

जिस नाम से इलाहाबाद मुझे पुकारता था


हालांकि शिक्षाव्यवस्था ने मेरे नाम को बदलने की कोशिश की

मेरे मना करने पर भी

उसने मेरा नाम बदल दिया

अब मुझे कई उपनामों से जाना जाता है

भले ही वे उपनाम मुझे स्वीकार नहीं हैं


मैं अपने उपनामों से पुकारने पर नहीं सुनता हूँ

मुझे अपने पहले नाम से असीम प्यार है, इलाहाबाद!


शायद तुम्हारा नाम भी किसी व्यवस्था ने बदला है

और तुमने वह नाम सहजता से स्वीकार कर लिया

ताकि मैं तुम्हें पहचान न सकूँ


मुझे घटनाएँ याद हैं प्रयागराज!

एक दो नहीं, सब याद हैं


मैं तुम्हें भीतर तक पहचान रहा हूँ

तुम्हारी शक्ल बरछी की तरह चुभ रही है मेरे हृदय में

मैं तुमसे नाराज़ हूँ न!

मेरा तुम्हारे यहाँ आने का मन नहीं है!


2).

हिचकी तो है!


इलाहाबाद! पिछले पाँच सालों में 

मैंने तुम्हें कभी याद नहीं की

पर, इस पीएचडी प्रवेश परीक्षा ने तो तुम्हारी याद करा दी


क्या सच में तुम बदल गये हो?

या सिर्फ़ तुम्हारा नाम बदला है?


क्या तुम सच में मुझे याद कर रहे हो?

या कोई और?

हिचकी तो है!


(©गोलेन्द्र पटेल / 04-11-2023)


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Thursday, 14 September 2023

हिन्दी हिन्दुस्तान की माँ है / हिन्दी मानवता की माँ है / 14 सितंबर / हिन्दी दिवस / गोलेन्द्र पटेल

 

हिन्दी हिन्दुस्तान की माँ है

हिन्दी दिवस पर
जो हिन्दी-हिन्दी चोकर रहे हैं
वे अँग्रेज़ी में हस्ताक्षर करते हैं
उन्हीं की देने है कि हिंदी
अब भ्रम और भ्रष्ट के बीच की भाषा हो चुकी है
और
यह स्थिति तब तक बनी रहेगी
जब तक कि हिन्दी बोलने वाले अँग्रेज़ी का अनुवाद बोलना छोड़ न देंगे
जब तक कि वे लोकधर्मी न होंगे
जब तक कि उनकी हिन्दी लोकोन्मुखी न होगी।

मैं हिन्दी का शिक्षार्थी हूँ
मैं जब भी अपना अंकपत्र देखता हूँ
मुझे लगता है कि मैं हिन्दी में हाशिये पर हूँ

हिन्दी दिवस पर
जो हिन्दीजन हिन्दी के हित की बात करते हैं
उनके बारे में सोचते हुए
मेरे लंठ कंठ से यह फूटता है
कि
अभी भी हिन्दी के नमक चाटने वाले अँग्रेज़ी के गुलाम हैं
उनकी नसों में लहू नहीं, लालच है
उन्हें यह सीख कौन दे
कि लोकोन्मुखी भाषाएँ स्वार्थ को नष्ट करती हैं!

वह हिन्दी ही है जिसके पास एक लिए
अनेक शब्द हैं
वह हिन्दी ही है
जिसके शब्द उलटने पर भी
सार्थक होते हैं
मसलन ‘वाह’ से ‘हवा’
मसलन ‘वायु’ से ‘युवा’
मसलन ‘दीन’ से ‘नदी’ 

मेरी हिन्दी हृदय की भाषा है
मैं अपने अनुवादकों से कहता हूँ
कि हृदय के संवाद अनुवाद नहीं होते!

मेरे लिए
हिन्दी में लिखना
हिन्दी को सार्वजनिक बनाते जाना है
हिन्दी सर्जक, पाठक और श्रोता का साझा सच है

बहरहाल, मुझे विश्वास है
कि हिन्दी मेरी रीढ़ की हड्डी को मज़बूत बनाये रखेगी
मैंने महसूस किया है कि हिन्दी भाषा का भाषा में गुरु है
हिन्दी का होना मेरे होने की गारंटी है
क्योंकि हिन्दी हिंसा की हिंसा करती है
हिन्दी मेरी संवेदना की परतें उधेड़ती है
जिससे मेरा जीना अधिक जीवंत होता है

शमशान वह जगह है,
जहाँ सारी भाषाएँ मौन हो जाती हैं
पर, हिन्दी में वह शक्ति है कि उसका मौन भी अभिव्यंजना है

इस कविता में हिन्दी के अनेक संस्मरण हैं
हिन्दी मानवता की माँ है

हिंदी हिन्दुस्तान की माँ है!!

(©गोलेन्द्र पटेल / 14-09-2023)

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Thursday, 31 August 2023

बहन का मतलब (meaning of sister)

बहन का मतलब

अंग्रेजी में ‘बहन’ को ‘सिस्टर’ कहते हैं
जिसका मशहूर मतलब है
‘स्वीट’ , ‘इनोसेंट’ , ‘सुपर’ , ‘टैलेंटेड’ , ‘एलिगेंट’ और ‘रिमार्केबल’

हिन्दी में बहन का पहला मतलब है
‘ब’ से ‘बज़्म’ है बहन
‘ह’ से ‘हथौटी’ है बहन
‘न’ से ‘नज़्म’ है बहन

बहन का दूसरा मतलब है
‘ब’ से ‘बल’ है बहन (भाई का)
‘ह’ से ‘हल’ है बहन (हर सवाल का)
‘न’ से ‘नल’ है बहन (पानी का)

बहन का तीसरा मतलब है
‘ब’ से बाप के लिए बधाई बन जाना
‘ह’ से हक के लिए हथियार उठाना
‘न’ से नीच के लिए नाख़ून बढ़ाना

बहन! बहन का चौथा मतलब क्या है?
“दूसरे की बहन को अपनी बहन समझना!”

(©गोलेन्द्र पटेल / 31-08-2023)

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Tuesday, 29 August 2023

बहनापा : रक्षाबंधन / माँ-बहन की जीवनगाथा : गोलेन्द्र पटेल

1).

लड़के सिर्फ़ बचपन में रोते हैं
लेकिन लड़कियाँ हमेशा,
लड़कियों को यह कहा जाता है
कि पेड़ों पर मत चढ़ना, उनमें जिन्न होते हैं;
एक लड़के ने एक लड़की से पूछा,
लड़कियों के खाद्य लड़कों से क्यों भिन्न होते हैं?
जबकि अन्य जीवों में ऐसा नहीं है!

2).

हमारे और हमारी बहन के बीच

नारीवादी आलोचना पर बहस जारी है
हमने अपनी बहन से कहा—

स्त्री-विमर्श की दृष्टि से
यह बात सही है 
कि बहनापे में जो आत्मीयता है
वो भाईचारे में नहीं है।

हम शब्दों के दुनिया से परिचित हैं
अभी स्त्रियों की भाषा पुल्लिंग प्रधान है
उन्हें ख़ुद का व्याकरण गढ़ना है
हम पुरुष हैं
पर, हमें उनका दुःख पढ़ना है
ताकि हमारे भीतर की स्त्री ज़िन्दा रहे
जो कहे, ‘वेदना विभूति है
स्त्री पुरुष की अनुभूति है।’ (कवितांश : 'बहनापा' से)

3).

इस दुनिया में 
जीवन से जीवन मसले गये हैं

आधी आबादी
कब तक
अक्स से आँसू का आयतन मापेगी?

अब वक्त आ गया है
अस्मिता को खोजने के लिए
हो सके तो नदी में
ख़ुद डूबें

अगर देह
आत्मा की बेगार की जननी है
अगर आँखें
दिन के दुःख रात में छुपा रही हैं
तो समझना 
सच के मुहावरे क्रांति चाहते हैं

4).

प्रश्न
_____________
आग से प्रश्न :
पानी 
मेरा पति है
पर , हवा पत्नी ।
मैं कौन हूँ ?

5).

माँ-बहन की जीवनगाथा


क्या लिखूँ मैं जननी पर, जन्मभूमि पर, भगिनी पर...


यदि मेरी माँ महाकाव्य है

तो मेरी बहन उपन्यास है

और अभी तक मैंने इन पर एक शब्द भी नहीं लिखा है

जब लिखूँगा, तो निःसंदेह

मैं अमर हो जाऊँगा

लेकिन अमरता का अपना दुःख है न?

उसी से भय लगता है मुझे, माँ शारदे!


माँ शारदे, मैं तुम्हारी आज्ञा की अवहेलना नहीं कर रहा हूँ

सच बता रहा हूँ मैं डरता हूँ अमर होने से

मेरे जो पुरखे आसमान में धरती की कथा लिखकर अमर हुए हैं

उन्होंने मुझे यह सीख दी है कि पानी पर लिखा हुआ सत्य

पत्थर पर लिखा हुआ सत्य से कई गुना अधिक दीर्घजीवी होता है 

बशर्ते पानी स्त्री की आँखों का हो


पर, पानी पर लिखे हुए अक्षर

उन्हें ही नज़र आते हैं जिनकी आँखों में सागर जितना पानी होता है

अभी मेरी आँखों में उतना पानी नहीं है, माँ शारदे!

मैं कैसे लिखूँगा पानी पर अपनी माँ-बहन की कहानी?

क्या एक पत्ते पर उनके बारे में लिखकर तैरा दूँ नदी में?

पर, एक पत्ते पर तो सिर्फ़ पत्र लिखा जाता है

मुझे तो उन पर महाकाव्य और उपन्यास लिखने हैं

जिसके लिए दुनिया के सारे पेड़ के पत्तों की ज़रूरत होगी

यानी पृथ्वी के सभी हरे पेड़ों को नग्न होना होगा

तब जा कर इनकी पूरी कथा पानी पर होगी


इनकी पूरी कथा पूरी पृथ्वी पर भी नहीं लिखी जा सकती है

पत्तों पर लिखने से यह फ़ायदा होगा 

कि वे नदी-सागर में भी तैरेंगे

जो बचेंगे उन्हें धरती पर फैला दिया जाएगा

क्योंकि इनकी जीवनगाथा एक पर एक सरियाने से 

इतनी ऊँची हो जाएगी कि वह आसमान से सट जाएगी

मानो मनुष्य की निगाह में क्षितिज


अभी तुम्हीं बताओ, माँ शारदे!

क्या ब्रह्मदेव मुझे इतने पत्ते, इतनी रोशनाई देंगे

कि मैं लिख सकूँ अपनी माँ-बहन की पूरी जीवनगाथा!

यदि मिलने की संभावना है, तो

मैं उनकी कठोर तपस्या करने को तैयार हूँ

कई हजार वर्षों तक समाधि में लीन रहने को तैयार हूँ

चाहे मेरी हड्डियों को दीमक चाट जाए

या फिर मुझे अजगर निगल जाए

मैं साधनारत रहूँगा

ऐसा मुझे शिव से वरदान मिला है

विष्णु ने अपना शंख दिया है लेखनी के लिए

बस, पत्ते और स्याही चाहिए, माँ शारदे!


माँ शारदे, तुम्हें तो यह ज्ञात है

कि यह अतिशयोक्ति नहीं, परम सत्य है 

इनकी कथाओं को लिपिबद्ध करना कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है?

इसे तो विघ्नहर्ता श्रीगणेश भी लिपिबद्ध करने में असमर्थ हैं 

तो फिर मैं यह कैसे कर सकता हूँ?

मैं तो मनुष्य हूँ, मुझे कुछ वरदान मिले हैं तो क्या हुआ

अभी अपनी माँ-बहन की कथा लिखने के लिए

और वरदान चाहिए

अभी और तपस्या करनी है, साधना करनी है मुझे

वह मंत्र दो, माँ शारदे!

जिससे ब्रह्मदेव प्रसन्न होते हैं

ताकि मैं तुम्हारी आज्ञा की अवज्ञा न कर सकूँ


माँ शारदे!

मुझे भी लिखनी है अपनी माँ-बहन की जीवनकथा

आज नहीं, तो कल।


(©गोलेन्द्र पटेल / 29-08-2023)

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Thursday, 24 August 2023

मुक्तिबोध पर मुक्तिबोध की तरह कविता : गोलेन्द्र पटेल

मुक्तिबोध पर मुक्तिबोध की तरह कविता

शब्दबद्ध— उत्कृष्ट तीव्र अनुभव

युगबोध...
इस अर्थ क्रीड़ा के दौर में और क्या है?
काव्य-नायक का

उसकी क्या पहचान है?
जो आत्मा सभ्यता को मरता देख,
अपने अर्थ से अनजान है
क्या वह इनसान है?

कैसा है उसका रिश्ता?
स्याह आसमान की आह से
सागर में नदियों के आँसू
संचित हैं; धरा का हरापन गायब हो रहा है
आहिस्ता! आहिस्ता!! आहिस्ता!!!
किन्तु, किन्तु-परन्तु उपस्थित रहेंगे
लेकिन के साथ
और इत्यादि भी; पर,
दुःख, पीड़ा, वेदना व संवेदना के बाद


क्या यह उसके सत्य का संवाद है?
नहीं, अपने मूल्य में सिर्फ़ नाद है
उसके अनुप्रासिक आयतन का, 
शायद आंतरिक आवाज़ का

क्योंकि वह वाद है
वह अपने मूल में त्रिकोणीय चक्कर लगा रहा है
लगातार
वह अँधेरा रचता है, उसके लिए
रात रचनात्मक है
वह सुबह के इंतज़ार में रात रच रहा है
(रोशनी की भाषा में रात
पेड़ों की आँखों से
टपकती है
और नींद के मुहावरे जाग जाते है
स्मृति की बात
उसकी कविता है!)
यह उसके सपनों का ज्ञानोदय है

मतलब, उसकी नयी ज़िंदगी की नयी लय है
सपनों की दुनिया में
उसने सोचा,
वक्त के वाचक को पता है,
सच्चा प्रेम स्वतंत्रता का हेतु है
वह लोकोन्मुख शास्त्रज्ञ है
कोई महान दुःख
उसके हृदय और मन का सेतु है

वह भावनात्मक विचार में डूब गया है
उसकी नसों में बिजली दौड़ रही है
उसने अपनी साँसों की गति पर काबू करते हुए कहा,
जनता के शोर से नहीं,
शब्दों के शोर से सत्ता को डर लगता है
शब्द हथियार होते हैं
इसीलिए वह भावभूमि और मनोभूमि में शब्दों की खेती कर रहा है

वह खेत भर कुदाल से लिखता है
कि वह सिर्फ़ वह नहीं है, इस वह में कई वह शामिल हैं

वह पानी पर पदचिन्हों को पढ़ता है

उसका;
जो उसके रक्त की राजनीति करता है

उसके निर्णय और निष्कर्ष के बीच
सभ्यता-समीक्षा का दृष्टिकोण है
स्वतः स्फूर्त संवेदन व साध्य गतिशीलता
उसकी दुरूह व कठिन संप्रेषणीयता को नयी दिशा
व दृष्टि प्रदान करती हैं
उसके जीवन का ताना-बाना
सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक एवं नाना
प्रकार की मानवीय क्रिया-प्रतिक्रिया है
जहाँ नवोन्मेषी चेतना
उसकी सोच की पहली इकाई है
वह शोध कर रहा है
बाह्य जगत के स्रोतों को आधार बनाकर
आंतरिक जगत पर
अपने इस शोध के बाद
वह विश्वदृष्टि का रूपक हो जाएगा

लयबद्ध— उसकी उदात्त आत्मा
व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख है
और उसकी भाषा
शास्त्र से लोक की ओर
वह हजारों गुफाओं से गुज़रता हुआ
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर
तपस्यारत है

वह कभी नहीं सोता है
समाधि में सिर्फ़ शिव उसे टक्कर दे सकते हैं
वह परम-अनंत का अनंत हो चुका है
उसके उच्चरित मंत्र से
सृष्टि की संपन्नता है

उसकी आँखें एकांत में हैं
किन्तु, कान नहीं
उसकी आँखों से विश्वदर्शन के प्रकाश फूट रहे हैं
वह समय सापेक्ष सत्य का स्रष्टा है
उसकी वाणी में नदी-सागर के संगीत हैं
जंगल की हरियाली है, चिड़ियों के मधुर स्वर हैं
पर्वत-पठार के प्रगीत हैं

और है अग्नि की ध्वनि
वह परम-अभिव्यक्ति का पर्याय है
उसी के शिष्य प्रियतम पुरखे मुक्तिबोध हैं

मुक्तिबोध?...मुक्तिबोध??...मुक्तिबोध???

स्याह संवेदना को शस्त्र
एवं अँधेरा को अस्त्र में रूपांतरित करने वाले
सर्जक हैं मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की 'अंधेरे में' कविता
मेरे लिए कविता नहीं
नाटक है
उसमें चार दृश्य हैं परंतु आठ अंक हैं
सो , सब कविता समझते हैं
उसमें आत्मचेतस् से अधिक विश्वचेतस् की ठूँसाठूँसी है
अर्थात् शब्दों की सघनता में विचार लगातार
बार-बार उहापोह होते हुए भी
आशंका के आकाश में उदात्तता की उड़ान भरता है
एक नये उजास के साथ उस पार
पहुँच जाता है कवि

उसकी भीतरी छवि देखने पर पता चला कि
मन और हृदय के बीच
बुद्धि का अद्वितीय अनुरोध है
प्रतिबद्ध प्रसंग में आधुनिक सभ्यता का बोध
मुक्तिबोधीय चेतना का शोध है
जहाँ भाव विकल और ज्ञान पिपासु समय के साधक ने
जीवन के वन में व्यक्तित्व वृक्ष के नीचे
अपना विराट विवेक विपश्यना की मुद्रा में बैठाकर
अनुभव की उर्ध्वगति साध ली है
उसके संवेदित सच का आधार
स्याह संवेदना है
उसके लिए मनुष्यता मूल्यवान निधि है
यह आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की
अत्यंत पुरातन साधना-विधि है

उजाले की तलाश में भविष्यवक्ता भटकता है
कहीं और नहीं, अपने भीतर
आनंद के नहीं
आघात के अन्वेषक हैं वे
जटिल मन:स्थिति के लेखक हैं
आत्मा के शिल्पी हैं

वाद-विवाद से दूर
निनाद और संवाद प्रिय वक्त के वक्ता हैं

उनके द्वारा अँधेरे की आवाज़ को
अभय व कर्म तत्परता का मंत्र मिला है
वे आंतरिक पुनर्रचना के प्रगतिशील स्वर हैं

उनकी रचनाओं से गुज़रते हुए
मैंने महसूस किया है कि
नये शिल्प की सम्भावनाओं को लेकर
वैचारिक द्वन्द्व की अभिव्यक्ति जनपक्षधरता की ओर
अभूतपूर्व ऊर्जा और आवेग से आगे बढ़ती है
जो स्वयं को गढ़ती है

सघन अंधकार में सहर्ष स्वीकार का मौलिक संसार
आत्मालोचना की भाषा में अंतर्मन का विस्तार है
उनकी चिन्ता में वह मनुष्य है
जो पूँजीवादी तंत्र में उत्पीड़न का शिकार है
यह हम सबके प्रियतम पुरखे का साहित्यिक सरोकार है

संवेदना के सफ़र में स्वप्नजीवी की संघर्षरत सम्प्रेषणीयता
आग के राग से है
जो आँखों में नवोन्मेषकारी शक्ति की तरह
मौजूद है
वरना वाचक का क्या वजूद है?

उनकी अंतर्यात्रा में सौंदर्य का संवेदन है
वे लगातार चेतना की चित्रकारी में फैंटेसी का प्रयोग करते हैं
वे कविता के नये प्रतिमान हैं
उनकी पंक्ति-पंक्ति में राजनीति का रस है
अस्मिता की खोज की प्रक्रिया को प्रेरणा देने के लिए
असल में अँधेरे की भयानक आकृति
ब्रह्मराक्षस है!

जनपक्षधरता— आधुनिकता-भाष्य

नई अस्मिता, पुराने स्व-संवाद

मशीनी मनुष्य की ज्वलंत समस्या

विद्या और विधा के बीच— वैविध्य विधि-प्रसंग

जादुई यथार्थ, रचना-शीलता

उत्थान-पतन, नाटकीयता— कथा-भंग

वर्चस्व के ख़िलाफ़ लगातार संघर्षरत व्यक्ति

सहज शक्ति, सजग भक्ति

ऊँची सतह, गहरी अनुभूति

द्वंद्वात्मक संबंध— उत्तम उमंग

निर्बंध-गंध, रस-रंग, सौंदर्य-संग, निःसंदेह

परिवर्तनकारी शांतिपूर्ण क्रांति के महासूत्र

ये सब के सब हैं इनके पास

और आत्म-इतिहास भी।

(©गोलेन्द्र पटेल / रचना : 30-05-2022)

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com



Monday, 31 July 2023

लहरतारा से लमही (प्रेमचंद की 143वीं जयंती) / धुआँ और कुआँ : गोलेन्द्र पटेल

लहरतारा से लमही


लहरतारा से लमही जाते हुए
मैंने जाना—
मन और हृदय के योग से बुद्धि का विस्तार होता है

हे महाप्राण!
मुझे प्रेमचंद जयंती पर नागार्जुन क्यों याद आ रहे हैं?

मैंने जब भी पकड़ी है कुदाली
मेरे लिए
तब खेत कागज़ बना गया है
और कुदाली कलम
और स्याही
मेरे पसीने से मंठा माटी

मैंने जो लिखें अक्षर
वे बीज की तरह उग गये
पूरे खेत में

एक वाक्य मेंड़ पर उगा—
समय के शब्द शोषण मुक्त समतामूलक समाज के पक्षधर हैं

संघर्ष के स्वप्न श्रम के सौंदर्यशास्त्र रचते हैं
क्योंकि कलम के सिपाही सेवा, संयम, त्याग
और प्रेम के किसान हैं
जहाँ नई फ़सलों के नये गान हैं
कि कथा के प्रतिमान प्रेमचंद हैं
वे मानवीय पीड़ा की प्रतिध्वनि के छंद हैं।


धुआँ और कुआँ


क्या धुआँ तुम्हारे फेफड़े को पसंद है?

हुक्का पीते हुए
मैंने सोचा—
क्या भाषा में दुःख का हुक्का-पानी बंद है?

चिन्तन और चेतना के संगम पर
जाति की अस्मिता है

मैं गहरा कुआँ हूँ
मेरे सोते उस पानी को खींचते हैं
जिसके ऊपर अछूत रहते हैं

मेरे भीतर नेह की नदी बहती है
पर, जो मेरे पानी पीते हैं
उनके भीतर इतनी घृणा क्यों?
वे उन्हें जगत पर क्यों चढ़ने नहीं देते हैं?
जो मेरे ऊपर रहते हैं

अरे! अब
कहाँ?
किसे?
कौन?
कुएँ पर चढ़ने नहीं देता है

दुनिया में कुछ अपवाद होते हैं न?

अपवादों से दुनिया नहीं चलती है
दुनिया चलती है अधिकांश के अनुसमर्थन से....

खैर, मुझे याद है कि स्कूल के उस बच्चे ने घड़े से
सिर्फ़ एक गिलास पानी लिया था
जो पैर के प्रहार से मरा है

आह! घाव हरा है, दुःखी धरा है!!

(©गोलेन्द्र पटेल / 31-07-2023)

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

 

नोट: प्रेमचंद पर केंद्रित मेरी तीन दर्जन कविताएँ हैं।

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...