Sunday, 14 April 2024

'ग्राम ज्ञान संस्थान' की कार्यकारी समिति

 "ग्राम ज्ञान संस्थान" (शिक्षा , स्वास्थ्य, सफाई, सेवाभाव) में आप सभी ग्रामवासियों का सादर स्वागत है।... जुड़ें और औरों को जोड़ें। धन्यवाद!🙏


“सबसे क़ीमती धन ज्ञान है 

विद्यार्थियों का, 

विद्यार्थियों के द्वारा, 

विद्यार्थियों के लिये 'ग्राम ज्ञान संस्थान' है 

शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, सेवाभाव इसकी पहचान है!-गोलेन्द्र पटेल


'ग्राम ज्ञान संस्थान' की कार्यकारी समिति :-

1. संरक्षक:-

2. संस्थापक:-

3.अध्यक्ष:-

4.उपाध्यक्ष:-

5. सह उपाध्यक्ष:-

6. महासचिवः-

7. सचिवः-

8. सहसचिव:-

9. उपसचिव:-

10. सह उपसचिव:-

11. कोषाध्यक्षः-

12. सहकोषाध्यक्षः-

13. संगठन मंत्री:-

14. व्यवस्था मंत्री:-

15. सूचना मंत्री:- 

16. आंतरिक लेखा परीक्षक:-

17. प्रेस-मीडिया प्रभारी:-

18. परामर्श मंडल प्रमुख:-

19. सलाहकार सदस्य:-

20. कार्यकारिणी सदस्य:-

21. कला पक्ष प्रमुख:-

22. संयोजक:-

23. सदस्यगण:-


* 'ग्राम ज्ञान संस्थान' विद्यार्थियों का, विद्यार्थियों के द्वारा, विद्यार्थियों के लिये है। यह संस्था अव्यावसायिक है। इस संस्था के सभी सदस्य अवैतनिक हैं। 

* कार्यकारी समिति के कुछ पद परिवर्तनीय हैं। इसमें प्रत्येक वर्ष संशोधन होगा।

* सर्वसम्मति से शीघ्र ही उन पदाधिकारियों का नाम घोषित किया जाएगा।

*संशोधन के साथ शीघ्र ही नये बैनर का लोकार्पण किया जाएगा, जिस पर नये पदाधिकारियों व नये सदस्यों की विशेष उपस्थित होगी।


संस्थापक संपर्क सूत्र:-

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


YOUTUBE:-

https://youtube.com/@gramgyansansthan?si=rXnIz1n0rmPopRzu


Facebook Page:- https://www.facebook.com/profile.php?id=61556711291827


WhatsApp:- https://chat.whatsapp.com/DMIdnHBHMIl3AredWv97Qi


जागो और जगाओ, 

सीखो और सीखाओ,

पढ़ो और पढ़ाओ।

#ग्राम_ज्ञान_संस्थान

#graam_g

yaan_sansthaan

#gram_gyan_sansthan

#Village

Friday, 29 March 2024

कविता : फ़रज़ाना का अफ़साना

 

फ़रज़ाना का अफ़साना

ज़माना ख़राब है

क्या तुमने सुना है?
लाशों को लोरियाँ गाते हुए
या फिर दाउदी बोहरों की सफेद दाढ़ियों से
स्त्रियों के ख़तना पर
असभ्य-स्वर
यह कितना अश्क़िया-क्रूर रिवाज़ है!
इस अज़ाब से मुक्ति का क्या इलाज है?

क़ब्रिस्तान में क़ब्र से आती है आवाज़
वे कर्म नहीं,
जाति-धर्म को महत्त्व देते हैं
जो जीवन-मर्म नहीं समझते हैं

उनको धर्म की खेती करनी है
और काटनी है जाति की फ़सल
सवधान, राजनीति दंगा-फ़साद की जननी है
नफ़रत की नज़र से वंचित नहीं है वक्त

जीत का जश्न जारी है
विपक्ष में खड़ी नज़्म ज़ख़्मी है
क्योंकि वह सत्य का प्रवक्ता है

फ़रज़ाना फफकते हुए
सोच रही है कि कुछ लोगों के लिये चाँद
रोटी है
तो कुछ लोगों के लिये
सिक्का है
तो कुछ लोगों के लिये
रूपक है

इस वक्त
जब कि चारों ओर 'जय श्री राम' का नारा गूँज रहा है
मैं कैसे कहूँ 'अल्लाहु अकबर'
नमाज़ पढ़ने वाले मारे जा रहे हैं
सड़क पर शौहर मारे गए, अहबाब!

हिन्दू-मुस्लिम शोक में डूबे हैं
अल्लाह चुप है
उसकी चुप्पी चुभ रही है
ईश्वर चुप है
उसकी चुप्पी चुभ रही है
मंदिर-मस्जिद के चिराग़ बुझे हैं मन दु:खी है, अहबाब!

संतान जीने की हिम्मत होती है

बच्चों के बिना न ईद अच्छी लगती है
न बक़रीद अच्छी लगती है
न होली अच्छी लगती है
न दीवाली अच्छी लगती है

उधर ख़ून की नदी है इधर
उनकी स्मृति
सेवईं की तरह है
गोया अब्सार में इल्म की ईदी है
जहाँ आब-ए-चश्म अंतर्मन का आईना है
और अब्रू पर सर-ए-सबद
इज़्तिराब है, अहबाब!

मुझे अमीना की चिंता है,
उसके लिये
यह कितना कठिन समय है!
एक बच्चा आगे, एक गोद में और एक पेट में है
या ख़ुदा!
यह कैसा अन्याय है?
मेरी बच्ची के साथ, मेरे साथ
बिना पुरुष की स्त्री अनाथ हो जाती है न?
मैं अनाथ हो चुकी हूँ, अहबाब!

मुझे इंतज़ार है उस दिन का
जो मुझे मेरे हिस्से का सुकून दे सके
मुझे इंतज़ार है उस रात की
जो मुझे मेरे हिस्से की नींद दे सके
अल्लाह के बंदे इंतज़ार करने के सिवाय और क्या कर सकते हैं?
आफ़त में अल्लाह की याद आती है न?
अल्लाह मेरी इबादत कब सुनेंगे?
क्या दरगाह जाने से मेरा दुख दूर हो जाएगा?
मैं कुरान के किस अंश का पाठ करूँ
कि मेरा दुख पहाड़ से छोटा हो जाए!
बताओ न मौलवी साहब!

मेरी बेटी उदारवादी मुसलमान है
वह कुरान ही नहीं, बल्कि गीता का भी अध्येता है
उसने 'मुसलमान कवियों की कविता में हिन्दुत्व' पर शोध किया है
हे हिन्दू फ़कीर!
उसके अच्छे दिन कब आएंगे?

अहबाब, क्या तुम्हें पता है?
मैं एक राष्ट्रवादी मुस्लिम हूँ
मेरे जीवन का अफ़साना क़ौम का क़िस्सा है
यानी कि मैं तुम्हारी भी कहानी हूँ

अहबाब अमीना की तलाक़शुदा ख़ाला हैं
वे अफ़सुर्दा में अश्फ़ाक हैं!

(©गोलेन्द्र पटेल / 30-03-2024)

संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Wednesday, 20 March 2024

असली शराबी अच्छे इनसान होते हैं (Asali Sharabi Achchhe Inasan Hote Hain)

 

असली शराबी अच्छे इनसान होते हैं


असली शराबी अच्छे इनसान होते हैं


घीसू-माधव हों या महान ग़ालिब

इनकी कथाएँ कहती हैं,

शराब पीने से शरीर ख़राब होता है, मन नहीं।


मैं कोई नशा नहीं करता 

मैंने कभी नहीं किया कोई नशा

पर, जानता हूँ नशा से नृत्य निखरता है

नज़र निथरती है...


मैं पूरे होशोहवास में कह रहा हूँ

चाय की चुसकी और शराब का चषक

चीख और चुप्पी के पर्याय हैं 


यह सच है कि वे समुद्र से अधिक

शराब में डूबते हैं जिनके लिए

शराब अमृत है  

जो अधिक शराब पीते हैं

शराब उन्हें पीती है


यहाँ शराब का पर्याय समुद्र है


मैं आग की ओर नहीं,

आँसू की ओर इशारा कर रहा हूँ

क्योंकि उसकी एकता का नाम समुद्र है। खैर,


जिनका एक पैक में सिक्स पैक बन जाता है 

वे ख़ुद को टॉपों-टॉप में महसूस करते हैं

भले ही वे सबेरे का सूरज नहीं देखते हैं 

लेकिन आधी रात का चाँद उन्हें पहले से कुछ और सुन्दर नज़र आता है 

वे स्वप्न में भी शराब पीते हैं नये-नये ब्रांड

और ख़ास बात तो यह है 

कि उनका हर स्वप्न नया स्वप्न होता है

हर दिन नया दिन होता है 

हर यात्रा नयी यात्रा होती है 

और वे थोड़े से चढ़ने पर ख़ुद कुछ नया हो जाते हैं

अंत में एकदम नया मुसाफ़िर 


मदिरा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है

जैसे मुहब्बत 

वह किसी से भेदभाव नहीं करती है

और पीने वालों को यह सीख देती है

कि वे किसी से भेदभाव न करें

वह मनुष्य को धर्म, जाति, अमीरी-गरीबी से ऊपर उठाती है 


वैद्य से पूछिए,

शराब एक बेहतर औषधि है कि नहीं 

अमुक बीमारी के लिए?

सरकारें भी जानती हैं

कि शराब से उनकी रीढ़ मज़बूत होती है 

शराब सरकार और शबाब के लिए ख़तरा तो नहीं है

फिर भी, कुछ लोग शराब को बेवजह बदनाम किये हैं 


जहाँ शराब बंद है

वहाँ कई साहित्यकार शराब पीते हैं 

जो शराब पीकर लिखते हैं 

वे धूम्रपान निषेध दिवस मनाते हैं

और इस वक्त शराब की पाबंदी पर चुप हैं 

  

मैं नहीं पीता हूँ

पर, मुझे महान शराबी पुरखे याद आ रहे हैं

क्या वे होते तो अपने यहाँ शराब बंद होती?


अब तो स्त्रियाँ भी पीती हैं शराब


मैंने स्त्रियों के मुँह से सुना है

कि मद्य सिर्फ़ मर्द के लिये नहीं है

किसी भी मदिरालय पर नहीं लिखा होता है

कि मरद-मेहरारू को दारू नहीं पीना चाहिए

भले ही लिखा होता है

कि शराब सेहत और समाज के लिये हानिकार है! 


©गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि, आलोचक व संपादक)

संपर्क सूत्र :-

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

asalee sharaabee achchhe inasaan hote hain

Saturday, 30 December 2023

कुछ रचनाकारों की माँ पर केंद्रित कुछ रचनाएँ / kuchh rachanaakaaron kee maan par kendrit kuchh rachanaen

कुछ रचनाकारों की माँ पर केंद्रित कुछ रचनाएँ :-

1).

लोक-रिश्ता

यह हर तरह के सामाजिक संबंध पर लिखने का समय है

कुँवारी लड़कियाँ बुआ कहलाती हैं
लेकिन कुँवारे लड़के फूफा नहीं
कुँवारे लड़के चाचा कहलाते हैं
लेकिन कुँवारी लड़कियाँ चाची नहीं

कुँवारे लड़के मामा होते हैं
लेकिन कुँवारी लड़कियाँ मामी नहीं

हाँ, दोनों कुँवारेपन में मौसी-मौसा हो सकते हैं।

कुँवारे लड़के अपने युवावस्था में कइयों के चाचा,
तो कइयों के दादा, तो कइयों के बुढ़ऊ बाऊ लगते हैं
जैसे हम अपने गाँव में।
खैर,
वे विवाहित स्त्रियाँ जो बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं हैं,
उन्हें समाज बाँझ की संज्ञा देता है
जो कि गलत है
क्योंकि वे मातृत्व से वंचित नहीं होती हैं
वे लोक में किसी न किसी की छुटकी या बड़की माई होती हैं
वे वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद देती हैं

धरती बंजर हो सकती है
पर, स्त्री बाँझ नहीं।

©गोलेन्द्र पटेल , संपर्क : डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।  पिन कोड : 221009


2).

मां

मां मेरी अलौकिक निधि,

जग जननी है मेरी।

भाग्य फैसला करने वाली,

अमूल्य धरोहर है मेरी।

     संस्कृति को बढ़ाने वाली,

     संसार को बसाने वाली।

      पुत्र हेतु चिंता करने वाली,

      दुखों को हरने वाली।

      मेरी अमूल्य माता है।

       मेरी भाग्य विधाता है।

ममता की करुणा निधि,

प्यास की तृप्ति करने वाली।

प्यार की संचित विधि,

गलती को माफ़ करने वाली।

मेरी अमूल्य माता है।


मेरी भाग्य विधाता है।


- दुर्गेश मोहन

समस्तीपुर(बिहार)


3).

माँ की याद


हृदय से  माँ की तस्वीर मिटती नहीं

घर में अब माँ  की आवाज गूंजती नहीं। 


छिप गई है माँ दूर बादलों के पार

निगाहें फिर भी माँ को ढूंढती है बार -बार। 


धुआंते चूल्हे पर खाना बनाती, आंखें पौंछती माँ

याद आती है बहुत, पर अब केवल तस्वीर वहां। 


जहां- जहां जाऊं माँ हमेशा साथ होती है

यह अनुभूति हमेशा मेरा साथ देती है। 


भावों से भरा भारी मन, क्लांत तन मेरा 

स्मरण करता हूँ तब सौम्य, धैर्यवान मुख तेरा। 


चल तो पड़ा हूँ शहर से गांव की ओर

लेकिन नदारद है वो अधीरता, वो लहू में जोर। 


-शेर सिंह

नाग मंदिर कालोनी, 

शमशी, कुल्लू, 

हिमाचल प्रदेश - 175126.


4).

आयला भी आकर चली गई,

लैला भी आकर चली गई,

वायु भी आकर चला गया,

अम्फन भी आकर चला गया,

हुए देश विदेश में बहुत नुकसान,

गई हजारों लाखों लोगों की जान,

लेकिन मैं बच गया,

क्योंकि मैं मां के गोद में था।

क्योंकि मैं मां के गोद में था।


-डी.सी.पी. दिनेश

कलकत्ता

5).
"" प्रेमलता ""
   ( प्रेममयी माँ )
*************

(1) " प्रे ", प्रेरणापुँज
               दिव्यस्वरूपा माँ
               करते प्रणाम आपको नमन  !
               आपसे पाते नित शक्ति ऊर्जा.....,
               करते आपका स्मरण हम प्रतिदिन !!

(2) " म ", ममतामयी
               प्रेमस्वरूपा माँ
               आप बसती हमारे ह्रदय  !
               नित देख आपकी सुंदर मूरत.....,
               बन आए दिवस हमारा आनंदमय !!

(3) " ल ", ललितकांता
                प्रेममयी माँ
                हमारे संस्कारों की कुँजी  !
                हो प्रेम वात्सल्य की देवी......,
                आप बनी हमारी असली पूँजी !!

(4) " ता ", तादात्म्य
                था शिवमय 
                माँ अद्भुत विलक्षण अप्रतिम  !
                आपकी वाणी में समायी वाग्देवी.......,
                हर शब्द बन आता था निरुपम  !!

(5) " प्रेमलता ", प्रेमलता
                        खिल-खिल आयी है
                        मेरे मन कानन में हरओर  !
                        नित रोज सवेरे कर लेता दर्शन......,
                        पाता मधु मकरंद जीवन में चहुँओर !!

¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥

"" प्रेमलता""
    ( माँ )
***************

(1)"प्रे ", प्रेरणा की स्रोत रही सदा "माँ",
           जीवनभर कुछ ना कुछ सिखलाया !
           "माँ", थी अनुभव की अनंत आसमां...,
           जीवन जीने का गुर और पाठ पढ़ाया  !!

(2)"म ", ममता स्नेह दया प्रेम की मूरत
           था "माँ", का वात्सल्य बड़ा ही अप्रतिम !
           जीवन की हरेक कठिन परिस्थितियों में.,
           रहा "माँ", का सदा खिलता शुभानन !!

(3)"ल ", लगन धुन की पक्की थी "माँ",
              भरा धैर्य संतोष था उनमें अथाह  !
              सबसे मुस्कुराकर मिलती थी "माँ"..,
              कभी करती नहीं थी चिंता परवाह !!

(4)"ता ", ताउम्र बनी रहीं "माँ" सदा सक्रिय
           हर काम किया बड़ी मेहनत के संग-साथ !
           जीवन के हरेक उतार चढ़ाव को....,
           निभाया बड़ी ही सूझ-बूझ के साथ !!

(5)" प्रेमलता ", प्रेम लता सी "माँ", सदा लिपटी रहीं
           सभी में रहीं बांटती स्नेह प्यार  !
           जीवन में हमेशा मुस्कुराती रहीं.....,
           और लुटाया जी भरके अपना दुलार !!

(6) माँ " प्रेमलता ", की पावन स्मृति पर
         हम सभी विनम्रता से हैं श्रद्धावनत  !
         चढ़ाकर मधुर स्मृतियों के पुष्प सुमन...,
         कर रहे "माँ",को नमन प्रणाम शत-शत वंदन!!

-सुनीलानंद 
जयपुर,
राजस्थान

6).
माँ के दिल जैसा दुनियाँ में कोई दिल नहीं 

यदि हम वात्सल्य भाव की बात करते है तो उसमें माँ का प्रेम सर्वोपरि माना जाता है क्योंकि माँ सारे गुणों की खान होती हैं। बात यदि अपने बच्चों की आती है तो माँ कभी अनदेखा नहीं करती। 
उस दौर में मैंने कई माताओं को देखा वो सभी कम संसाधन में काफ़ी व्यवस्थित रूप से बच्चों का लालन-पालन करती थी। पहले मोहल्ले की गली में बैठ कर सारी माताएँ मिल कर बच्चों के लिए क्या सही क्या गलत सब की चर्चा करती थीं। बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन जो घर का बना होता था, उस पर बल देती थी, बाहरी सामान से होने वाले नुकसान-फ़ायदे सब बताया करती थी। बच्चों की नज़र उतारना, भाई-बहनों को परिवार के साथ बैठाना, एकता बनायें रखने की काफी सीख देती थी। अब तो मोबाइल उपकरण आने से ये सारी व्यवस्था ही बदल गई है, ना कोई माँ के साथ बैठता है और ना परिवार के साथ सामंजस्य बैठा पाते है बच्चे!
संस्कार आज भी हैं लेकिन सब बदल गया।
आधुनिक युग में फायदे की बात लिखूं तो आज की माँ पहले से ज्यादा शिक्षित हैं और घर-ऑफिस सब संभाल रही है, सुगमता से सारे कार्य घर के मशीन से करने लगी हैं। अपने फैसले लेने में सक्षम है माँ-बहनें। कुरीतियां समाप्त हो चुकी हैं। अच्छी शिक्षा-दीक्षा बच्चों को दे पा रही है, सपने साकार हो रहे है। अब अत्याचार और उत्पीड़न का उत्तर देने में सक्षम हैं। जो सुविधाएं माँ खुद के लिए नही जुटा पाई आज अपने बच्चों की छोटी से छोटी इच्छा पूर्ण करने में सक्षम हैं, वो भी अकेले।
मुझे गर्व हैं हर माँ पर वो अब अबला नहीं सबला बन चुकी है वो सारे कार्य जो पुरुष कर सकते हैं, एक एकल मदर भी कर लेती है।
शादी-विवाह समारोह में एक एकल मदर पूरी ज़िम्मेदारी निभा रही हैं, हर क्षेत्र में नारी शक्ति इज्जत कमा रही है।
लेकिन आजकल पैसे की चकाचौंध और सुनहरे भविष्य की चाह ने भारतीय बच्चों को विदेश में खींच लिया है और उसके पीछे छूट गई है उसकी मां। मां का अकेलापन क्या होता है, उनका यादों में लिपटा हुआ जीवन बहुत तकलीफदेह होता है। 
"मेरी आँखे रो पड़ी भीगा मां का आंचल। 
मन से मन की बात पढ़ जानी दिल की बात!"
आजकल यह लिखी हुई पंक्तियां भी कहीं धूमिल हो गई है। कितने साल गुजर जाते हैं एक बच्चे को पालने में मां के, उसके बाद पीढ़ी दर पीढ़ी सभी जवान हो जाते हैं और बदल जाता है उनका जीवन और उनकी जीवन शैली। आजकल बात करने के माध्यम, एक दूसरे की जानकारी के लिए भले ही इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध हो गई है फोन पर बात करना सरल हो गया हो और कई रिश्तें की भावना ने, संवेदना ने भले ही कई बार सांप की तरह केंचुली उतार ली हो, लेकिन मां-बेटे बेटियों का रिश्ता आज भी इस देश में गर्माहट के साथ मौजूद है। सभी की आकांक्षाएं और कामनाओं की लिस्ट बहुत लंबी है समय बहुत कम है और संघर्ष बहुत बड़ा। जीवन की परिभाषाओं में बहुत फेरबदल हुआ हो पर विदेश में बसा हुआ बेटा मां को बहुत याद करता है और कुछ बेटे अपनी मां को विदेश में बसने के बाद अकेला छोड़ दिए हैं। उनके पास अपनी मां के लिए वक्त ही नहीं। इतनी एडवांस तकनीक आने की वजह से कुछ नई संगत से बच्चों के व्यवहार भी बदल रहे है। बेटा और बेटियां कमाने के लिए बाहर चले जाते हैं अपने सपनों को पूरा करने के लिए, पैसे कमाने में उस मां को छोड़ जाते हैं। कुछ बच्चे वादा करते हैं कि वह लौटकर आएंगे और कुछ बच्चे विदेश में ही रहकर अपना घर बसा लेते हैं फिर वह भारत में रह रही मां के पास आना उचित भी नहीं समझते हैं। मां जिंदा है या मर गई है उन्हें परवाह भी नहीं होती है और बस डाक द्वारा पैसा भेज देते हैं यही बहुत होता है। कुछ बेटा-बेटियां रोजाना अपने मां के कांटेक्ट में रहते हैं और यह विश्वास दिलाते हैं कि अब हम आएंगे जरूर से आएंगे और मां तुम्हारा सपना हम पूरा करेंगे। 
एक मां बचपन से अपने बच्चों की हर तकलीफ को समझती है। बेटा क्या खाता है? क्या पीता है? उसे बचपन में क्या पसंद था जब रूठ जाया करता था तो वह उसे कैसे मनाती थी और मां दूसरे कामों को निपटा कर अपने बच्चे की परवरिश में लग जाती थी। बच्चे कब बड़े हो गए पता ही नहीं लगा और चले गए अपनी मंजिल पाने। आज भी भारत वर्ष में ऐसी कई माऐं हैं जिनके आंसू थम नहीं रहे। वह अपने बेटे की आने की प्रतीक्षा में रोती रहती है उनकी व्यथा को समझने वाला कोई नहीं होता है। मां परिवार में कितना भी सबके साथ हंस बोल ले, लेकिन एक तन्हाई अपने बच्चों के लिए जरूर से उसके मन में होती है। मां बीमार हो जाती है तब चिट्ठियां भेजी जाती है, तब बच्चों के फोन आते हैं। उसके बाद भी कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो यह कहते हैं कि किसी कारणवश नहीं आ पाएंगे मां। अपना ख्याल रखना। सोचो उस समय उस मां पर क्या बीतती होगी। अकेले रहने वाली मां कितने भी डॉक्टर के चक्कर लगा ले, लेकिन अपने बेटा-बेटियों का विछोह बर्दाश्त नहीं कर पाती है। 
कुछ बेटा-बेटी विदेश में अपनी मां को बहुत मिस करते हैं, उनके बनाए हुए खाने की याद उन्हें सताती है जब उन्हें विदेश में मां के जैसे बना हुआ भोजन नहीं मिलता है, तो वह अपनी मां को याद करते हैं और उन्हें हमेशा फोन करते रहते है। दिनभर की आपबीती वह अपनी मां से शेयर करते हैं और वीडियो कॉल करके अपनी मां को रूबरू देखते हैं, उनके लिए समय देते हैं जिससे मां को भी यह तसल्ली रहती है कि हमारे बच्चे जहां भी हैं सुरक्षित है और बेटा-बेटियों को भी तसल्ली हो जाती है कि हमारी मां किस हाल में है। कई बार ऐसा हुआ है कि त्यौहारों में बच्चे अपनी मां के पास नहीं आ पाते हैं, लेकिन जब भी आते हैं तो अपनी मां को गले से लगा लेते हैं, उनके सामने वही छोटे बच्चे बन जाते हैं और मां भी अपने बेटा-बेटियों को उनके मनपसंद का खाना खिलाती है जब तक वह घर में रहते हैं। 
एक मां को चिंता रहती है कि जब मेरे बच्चे बाहर रहते हैं तो वह क्या खाते पीते हैं? कैसे रहते होंगें? इसलिए बेटा-बेटियों के आते ही उनकी आवभगत में मां लग जाती है। बस मैं इतना कहना चाहती हूं जो बच्चे बाहर जाकर अपनी मां से अलग रह रहे हैं, वह अपनी मां के संपर्क में सदा रहे। अपने परिवार से कांटेक्ट बनाए रखें ताकि घर में रह रही मां अकेली ना पड़े। मां से अच्छा दोस्त कोई नहीं होता है, यह बात बच्चे समझ ले तो विदेश में भी मां-बेटा बेटियों को एक दूसरे से अलग ना होना पड़े। प्रेम की भाषा सभी समझते है अपनें प्रेम पर आस्था बनाए रखें। भावुकता की नदी में बहती हुई मां हमेशा बच्चों का भला चाहती है और अपना दिल कठोर करके बच्चों को बाहर भेजती है पढ़ने के लिए। बच्चे इसका दुरुपयोग ना करें, अच्छी संगति करें, अच्छे लोगों के बीच में रहे। जितना हो सके मां के लिए विदेश से नई-नई चीजें भेजते रहें ताकि आपके भेजे हुए उपहार में मां आपका प्रेम महसूस कर सके। सभी त्यौहारों में फोन लगाकर मां से हंस बोल कर बात कर लेने से मां को इतनी खुशी मिलेगी इसकी कल्पना जैसे स्वर्ग मिल गया हो एक मां को। बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति ना भूले बीच-बीच में आकर अपनी मां की तकलीफ समझ कर उन्हें सुख प्रदान करें। छोटी-छोटी खुशियों में अपनी मां के साथ समय बिता लेना पर अपनी मां को कभी अकेला मत छोड़ना, क्योंकि मां की पीड़ा केवल मां ही जानती है, बस बच्चों को इसका एहसास होना अति आवश्यक है। यदि कार्य के कारण बच्चे व्यस्त हैं तो उससे ज्यादा वक्त अपने परिवार अपनी मां को दीजिए। दूर रहकर प्रेम की डोर को बांधे रखिए, तभी अपनी मां की पीड़ा को आप समझ पाएंगे! उनका प्रेम समझ पाएंगे। बस याद रखिए "सब पराये हो जाए, पर मां पराई कभी ना होए"! 

©पूजा गुप्ता
मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
7).
एक ग़ज़ल
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दूर रहकर भी सदा पास रहा करती है
वो सिवा माँ के भला कौन हुआ करती है

बच गयी जब भी बलाओं से तो मुझको लगा यूँ
माँ ही तो है जो मेरे हक़ में दुआ करती है

उसका जादू है, हुनर है कि कोई शक्ति है जो
बात मन की मेरे माँ जान लिया करती है

उसको धरती कहूँ, नदिया कहूँ या पेड़ कहूँ
देने बस देने का ही काम किया करती है

घर की उठती हुई दीवार में बँटती रही माँ
फिर भी बेटों के लिए ही तो दुआ करती है

उसके कदमों में नवाते रहें हम शीष सदा
ईश का ख़ुद में जो प्रतिमान गढ़ा करती है

हम भी सेवा व समर्पण से रखें ख़ुश उसको
कुछ न कहकर भी यही चाह रखा करती है
--/////------
डाॅ. कविता विकास 
धनबाद, झारखंड

8).

माँ पर दोहा
========
माता  महा  यथार्थ  है, नहीं कथा या गल्प।
जननी का संसार में, मिलता नहीं विकल्प।।
     -रशीद अहमद शेख़ 'रशीद'

9).

ऐसी होती है मांँ

कौन कहता है
मेरी माँ मुझे छोड़कर चली गई
मैं कहता हूंँ 
वह मुझे टोले-मुहल्ले से जोड़ कर गई है
मांँ की देन है कि कोई चाची बन जाती है
और वह अपनत्व दिखाती है
अपने खाने से पहले मेरे आगे 
रोटी की थाली रख जाती है
कम नहीं होने देती कोई समान
कम नहीं होने देती कोई अरमान 
जिससे कहता हूंँ मैं कि 
मेरी माँ का वजूद बोलता है और,,,, और 
मेरे अंदर से मेरी मांँ का 
दूध बोलता है 
माँ की बदौलत बढ़ते जा रहा हूंँ मैं 
अपने जीवन-पथ में निरंतर 
जलाते जा रहा हूंँ अंधियारे में दीप निर्बाध 
ऐसी होती है माँ।

बीतती है जिंदगी फुटपाथ

मेरी कविता लिखकर तुम नाम कमा लिए
लेकिन हमारी जरूरत अभी भी बाकी है
रोटी अभी भी बाकी है कपड़े भी बाकी है 
बीतती है जिंदगी फुटपाथ पर घर बाकी है
अच्छे दिन आयेंगे कह कैमरे में समा लिए
लेकिन हमारी जरूरत अभी भी बाकी है।
उड़ाती धूल जाती है मोटर गाड़ियांँ हजार
उसकी होती है गर्मी उसका अपना बाजार
और सभी गलियां की बतियां बुझा दिए
जमीन मिलनी बाकी है बिस्तर बाकी है।

-विद्या शंकर विद्यार्थी
C/0- राजेश यादव (खटाल)
बंगाली टोला 
रामगढ़, (झारखण्ड)
पिनकोड -829122
10).
मां, क्या तुम बीमार हो?

मां तुमने ही दी हमें
ये ज़िन्दगी,ये सांसें
ये स्नेह-प्यार-दुलार
पाला तुमने हमें
संस्कारों से अपने
ममता की घनी छांव में।
मां, मैं जब भी
लिपटता तुमसे
यमदूत सरीखे 
आकर भैया
परे धकेल देते मुझे
और कहते
ये मां तो मेरी है
मैं रो पड़ता
और तुम 
हम दोनों को भर लेती
अपने स्नेह की बाहुपाश में
पर आज 
भैया कहते हैं
मां तेरी है...
मां, क्या तुम बीमार हो ?
         

-रशीद ग़ौरी, सोजत सिटी।
11).
खाना बनाने वाली बाई 
 
खाना बनाने वाली बाई 
खाने की सुगंध अपनी देह में लपेटे 
ले जाती है घर 
आवारा हवाओं से बचाते हुए 
बच्चे पूछते हैं- 
माँ आज क्या बनाई है?
माँ कहती है-शाही पनीर...
बच्चे चुपचाप उसके  स्वाद  के साथ 
खाना खाकर सो जाते हैं।
 
बच्चे जानते है- 
माँ है तो उम्मीद है 
माँ है तो सपने ज़िन्दा हैं…
बच्चे खुश हैं कि उनके 
गंध,एहसास,स्वाद और....दृष्टि ज़िन्दा है 
एक दिन माँ नहीं लौटी 
गंध चोरी के आरोप में जेल में बंद है!
भूखे बच्चे ताक रहे हैं आसमान.....।

-रमेश कुमार सोनी
रायपुर, छत्तीसगढ़

12).
माँ

न तुलना कभी की है
न करने का इरादा है 
 हाँ , वो माँ का प्यार ही है
जो दुनिया के किसी भी प्यार से 9 महीनों ज़्यादा है।

 दुनिया की सभी माँओं की एक ही परिभाषा है, 
सुखी रहें हमारे बच्चे,
बस यही सबसे बडी उनकी आशा है!!

-श्रवण सिंह राव, आहोर और जिला जालौर राजस्थान
13).
जब तरल सुबह, तपती बातें, मन उद्वेलित कर जाती हैं।
होठों पर स्मित सजल लिये, माँ मुझे बहुत याद आती है।।

       पक्षी कलरव और पत्तों संग,      
       जब सड़क सजी सुस्ताती   
       है।
       तब बांँट जोहती आँखो संग, 
       माँ मुझे बहुत याद आती    
       है।।

कोई शाख फलों का भार लिए, सर झुका नमन करती दिखती।
तब उचक देखती खिड़की से, माँ मुझे बहुत याद आती है।।

       रिश्तों के कच्चे धागों संग,       
       बातें बदरंगी उलझ पड़ें।
       तब अश्रु छिपाती, मुस्काती,    
       माँ मुझे बहुत याद आती    
       है।।

थकता,  बोझिल,  हर भाव लगे, कदमों की जब रफ्तार रूके।
लादे अनुभव की गठरी सी,  माँ मुझे बहुत याद आती    
है।।

       अब रच पाऊँगी सपन नहीं,     
       ये सोच आँख मुँद जाती है।
       बाँहें फैलाये जीवन सी..माँ    
       मुझे बहुत याद आती है।।

-रश्मि 'लहर'
इक्षुपुरी काॅलोनी
लखनऊ उत्तर प्रदेश
14).
जब एक माँ चूल्हा जलाती है

जब एक माँ चूल्हा जलाती है
मानों रोज यज्ञ करती है.
रोज अपने एक सपने की
आहुति देती है वह।

जब एक माँ, आँगन बुहारती है 
तो कुछ कुछ बुदबुदाती रहती है 
और बुरी बलाओ को ढूँढ
बुहार, बाहर फेंक देती है 
जब एक माँ पूजा करती है 
अपने दोनों हाथों से आँचल 
फैला, बच्चों की सलामती 
की दुआ माँगती है

जब एक माँ थककर बैठती है
बच्चों के लिये सपने बुनती रहती है
या फिर अच्छी यादों को सिलती रहती है

-मनोरमापंत, भोपाल

15).

ऐसी होती है मांँ

कौन कहता है
मेरी माँ मुझे छोड़कर चली गई
मैं कहता हूंँ 
वह मुझे टोले-मुहल्ले से जोड़ कर गई है
मांँ की देन है कि कोई चाची बन जाती है
और वह अपनत्व दिखाती है
अपने खाने से पहले मेरे आगे 
रोटी की थाली रख जाती है
कम नहीं होने देती कोई समान
कम नहीं होने देती कोई अरमान 
जिससे कहता हूंँ मैं कि 
मेरी माँ का वजूद बोलता है और,,,, और 
मेरे अंदर से मेरी मांँ का 
दूध बोलता है 
माँ की बदौलत बढ़ते जा रहा हूंँ मैं 
अपने जीवन पथ पर निरंतर।
ऐसी होती है माँ।

-विद्या शंकर विद्यार्थी
C/0- राजेश यादव (खटाल)
बंगाली टोला 
रामगढ़, (झारखण्ड)


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Wednesday, 27 December 2023

मैं हिन्दू हूँ (कविता) / main hindu hun

 


मैं हिन्दू हूँ

इस धरती की धड़कनें
सांस्कृतिक स्वर की ऊँची अनुगूँज हैं

अपनी सनातनी अर्थ-प्रक्रिया में
यह हिन्दुत्व के ध्वजोत्तोलन का समय है
मैं हिन्दू हूँ
मेरे आध्यात्मिक गुरु ऋषिचित्त हैं
मैं शैशवावस्था से शाकाहारी हूँ
माँ सरस्वती का भक्त हूँ
और माँ दुर्गा का भी
पर, मैंने सत्रह सालों तक शिव की उपासना की है
कई सालों तक कतकी नहायी है
मुझे जब से जानकारी है
तब से रोज़ हनुमान का ध्यान करता आ रहा हूँ
मैं उदार, उदात्त व धर्मनिरपेक्ष धार्मिक हूँ
क्योंकि मैं सभी धर्मों के शक्ति-स्रोतों को मानता हूँ
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा जाता हूँ !

मैं बुद्ध को ख़ूब पढ़ता हूँ
पर, मैं बौद्ध नहीं हूँ
मैं महावीर स्वामी को ख़ूब पढ़ता हूँ
पर, मैं जैन नहीं हूँ
मैं कबीर को भी ख़ूब पढ़ता हूँ
पर, मैं कबीरपंथी नहीं हूँ
मैं तुलसी को भी ख़ूब पढ़ता हूँ
पर, मैं रामनामी नहीं हूँ
न ही मैं भगवाधारी हूँ

मैं ग्रामदेवता को पूजता हूँ
प्रकृति की पूजा करता हूँ
माँ का पाँव छूता हूँ
पिता का पाँव छूता हूँ
गुरु का पाँव छूता हूँ
पुरखों का पाँव छूता हूँ
मैं वादियों का पढ़ता हूँ
पर, मैं वादी नहीं हूँ
सिवाय इसके कि मैं स्पष्टवादी हूँ
जो कहना होता है
वो मुँह पर कह देता हूँ

मैं अपनी दायीं आँख से जितना देखता हूँ
उतना ही बायीं आँख से
मेरी नज़र में
न कोई सिर्फ़ दायें पैर से लंबी यात्रा कर सकता है
न कोई सिर्फ़ बायें पैर से लंबी यात्रा कर सकता है
न ही कोई सिर्फ़ दायें हाथ से ताली बजा सकता है
न ही कोई सिर्फ़ बायें हाथ से ताली बजा सकता है

मैंने हिन्दू जीवन मूल्य को समझते हुए
यह महसूस किया है,
भारत में
सहल ही सहज है, सरस है, सरल है,
सुलभ है और सुंदर भी
जहाँ जाति से ऊपर
धर्म
भारतीयता के लिए
ज़रूरी चीज़ है
पर, इसकी कुत्सित राजनीति
सभी के लिए
घातक है
धर्म की राजनीति और राजनीति के धर्म में फ़र्क है न?

मैं भाषा के महारूपकों को जीता हूँ
पर, उनका अंध अनुसरण नहीं कर करता हूँ
अनुकरण तो कतई नहीं
मैं धार्मिक मिथकों के नये मतलब को समझने का प्रयास करता हूँ
मैं जन्म से हिन्दू हूँ
किसी शब्द के अनुस्वार या नुक़्ता या चन्द्रबिन्दु जैसा!

यदि मैं अपने बारे में यह कहूँ
कि मैं किसी का अंधभक्त नहीं हूँ,
तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है

मेरा हिन्दू होना
असल में सहृदय मनुष्य होना है!

(©गोलेन्द्र पटेल / 28-12-2023)

 गोलेन्द्र पटेल (कवि व लेखक)

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Thursday, 23 November 2023

गाँव पर केंद्रित विनय विश्वा और सुरेन्द्र प्रजापति की कविताएँ (gaanv par kendrit vinay vishva aur surendra prajaapati kee kavitaen)

 गाँव पर केंद्रित विनय विश्वा और सुरेन्द्र प्रजापति की कविताएँ :- 


विनय विश्वा की कविताएँ :-


1).

क्या किसान भगवान है!


विकास की गाथा लिखते - लिखते

हम  विनाश की दहलीज पर खड़े हैं

जिसका गवाह है जलवायु परिवर्तन।


आए दिन मौसम का बदलना

शरीर में रोग होना 

भौतिकता में रम होना

जीवन का बेतरतीब होना

पाना है सुख सुविधा को

पर  आनंद का न होना है

जो मिट्टी, मिट्टी में सना होता था


आज वही मिट्टी के देवता मारे जा रहे हैं

किसी की ज़मीन हड़प कर तो किसी की फसल रौंद कर

जिस खेत को युगों -युगों से संजोए रखे हैं

जिन पर उनकी कई पीढ़ियां टिकी है

आज उनकी कमर टूटी है

क्योंकि उनके जमीर को किसी ने लूटी है

 एक किसान की खेती उसकी खेती नहीं बेटी है।

भारतमाला, गंगाएक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाएं किसानों के लिए भस्मासुर बनकर आए 

जिनका जीवन दुभर हो जाए


कभी सड़कों पर कभी अदालत कभी कार्यालयों का चक्कर काटते - काटते पूरे ब्रह्मांड को जैसे ये भगवान नाप दिए हों


फिर भी सत्ता पर बैठे भगवान को तनिक दया न आई और 

और एक किसान का अंत होता है 

अब तो यह जैसे लगता है अंतहीन शाम है

जिसकी कोई सुबह नहीं

कुछ तो समझो ए पत्थर पड़े आदमी ।

धरती के भगवान आज मारे जा रहे हैं

जब से यह ज़माना आधुनिकता के रंग में रंगी

एक जंग छिड़ गई है 

कारपोरेट और किसान में।


हां वहीं किसान जिसे राष्ट्रकवि अपनी कविता में देवता कहते हैं - 

किसे ढूंढता है मूरख देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में

आज उसी खेत के देवताओं की दानशीलता दानवी प्रवृति के दलालों से छीनी जा रही है

जिसका परिणाम किसानों की जान गवाने की सजा हो रही है।


2).

गाँव का विद्यालय


निगाहें देखती हैं

गाँव की ओर हाँ वहीं गाँव जहाँ प्रेम की नाव चलती है

जिस नाव के खेवनहार किसान, मजदूर, गंवार हैं

जो अपने लाल को ढाल बनाने भेजते हैं गांव के स्कूल।


 गांव का विद्यालय जीवन की पहली पाठशाला है

जो अब उत्पादशाला हो गई है

इंस्पेक्शन की , कागज़ पर थोपा हुआ परीक्षा की जो विचारों को परिक्षा में लिए जा रही हैं।


वहीं गांव जहां सुनहरे ईमानदार विचार  हैं जो साहित्य का आधार है - प्रेमचंद, नामवर, केदार, त्रिलोचन,धूमिल,गोलेंद्र

पुराने, नए, तुम और मैं सरीखे ज्ञान है जो मानवता का आधार है


आज मानवता की एक कुंडी फंस गई है जो लीलने के लिए आतुर है

शहर की चाकचौबंद की तरह

जहां विष ही विष घुली है मानव को दानव बनाने के लिए।

©विनय विश्वा (युवा कवि-लेखक , शिक्षक व शोधार्थी। संपर्क : 91100 84157 )


सुरेन्द्र प्रजापति की कविताएँ :- 

1).

पीड़ाओं का रेगिस्तान है मेरा गाँव


प्रिय मित्र!

तुम्हारा स्नेह निमंत्रण सराहनीय है 

और हमसे यह उम्मीद की मै उत्सव में शामिल रहूँगा, स्वागतयोग

शुक्रिया, पर क्षमा करना

मेरी अक्षमता है मै कोई कविता पाठ  करने नहीं आ सकूँगा


ऐसी कोई खास आफत विपत नहीं है 

बस एक बहुत ही जीवन को विचलित कर देनेवाली 

टीस उभरा हुआ है

इस समय  मैं, एक बहुत ही जरूरी विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनने जा रहा हूँ


अगड़े-पिछडों में एक घमासन है 

अगड़ा हक हकीकत सबकुछ छीनने को बेचैन है

पिछड़ा अपनी घिनौनी मानसिकता लेकर रोने को लाचार

खुलकर बोलने में प्रतिबंध है 

विचारों पर पहरा है, 

अधिकारों पर षड्यंत्र रचा जा रहा है

मै, मेरा कवि उन सभी पुरातन नियमों से असहमत हूँ

कि अपने ही देश में खानाबदोष कि जिंदगी जी रहे हैं लोग

मेरे पाठकों, बंधुओं, मेहनती लोगों से पहचान तलाशी जा रही है


सनातन धर्म मानने वाले

घृणित संस्कृति को जानने वाले

पूछ रहे हैं जाति

कुतर्कों की चाल में पूछ रहे हैं खानदान

मै उसके विरोध में खड़ा हूँ

अराजकता के निष्ठूर काँटों पर पड़ा हूँ


मेरे गाँव का एक खुशहाल किसान

जिसके जवान बेटे को नक्सली बताकर हत्या कर दिया गया

मै उसके लिए विरोध प्रदर्शन कर रहा हूँ


मुहल्ले के एक पिछड़ी जाति के छोरी को 

दवंगो ने स्तन काट दिया 

इसलिए कि वह उनके खेतों में साग खोट रही थी 

मै उसके लिए विरोध में जा रहा हूँ


मेरा एक चिर प्रतिद्वंदी है

जिसे कारगार में बंदी बनाकर कठोर यातना दिया जा रहा है

उसने एक समाजवादी नेता के घिनौने चरित्र को उजागर करने का दुःसाहस किया था


पेट की भूख इंसान को बावला बना देती है

और, स्वार्थ की लालसा, एक खूँखार कमीना

यह विरोधों को चिंगारी देने का समय है

और कविताओं में हुंकार भरने का

धूप से तपति हुई धरती एक मजदूर के फेफड़े को जला देती है

यह विचारों को धारदार बनाने का समय है


पेट की आग से लड़ता हुआ इंसान भीड़ में भिखारी बन जाता है

और ईंट गारे से बने महल की घृणा इन्हे समाज के लिए कोढ बताती है


मै चाहता हूँ जब मै विरोध प्रदर्शन में हूँ 

मेरी कविता सच की गवाही दे और

शहादतों के पक्ष में बिगुल फूंके

अपनी उपस्थिति का कीमत चुकाए

अपने पूर्वजों के हक में गौरव का गीत गाए


इसी जरूरी समय में न्याय को मनुष्यता के हक में रक्तदान करने की वकालत करता हूँ 

चाहता हूँ सौरमंडल के इस एकलौते ग्रह पर मानव के आदिम सभ्यता के हक में फैसला हो

चाहता हूँ मेरी कविता अपनी उपस्थिति की कीमत चुकाए


तब आपके दम्भ से सजे मंच पर विस्मरणीयता के स्वार्थ में असाधारण कविता की पंक्तियाँ बोलना

बहुत ही उबाऊ और निरर्थक और घटिया किस्म की जान पड़ेगी दोस्त

आपके स्नेह में सिक्कों की खनक है


पीड़ाओं का रेगिस्तान है मेरा गाँव, 

मेरे मुहल्ले में दुःखी काका पुस्तैनी किसान थे

कहने को किसानी करते

रक्त-पसीने से सींच कर फ़सल उगाते

उनके अथक परिश्रम से पंडित साहूकर आघते

लेकिन कभी भरपेट अन्न नहीं खाते

तंत्र के छल की बाँसूरी पर वे नसीब को कोसते

रीरीयाते घिघीयाते, पीड़ा के गीत गाते


सता की नालायकी ने कभी उनके लहलहाते फ़सल की कीमत तो नहीं चुकाया

लेकिन मौत ने उनकी बिछुड़ी हुई हड्डियों पर ऐसा जश्न मनाया

कि बादल भी गला फाड़ कर रो पड़ा

कीचड में सने उनकी लाश को कफ़न कौन दे 

भूख से तड़पती उनकी सात साल कि बच्ची को पिता की लाश पर चीख-चीखकर मरते पुरा आकाश देखा है दोस्त

इंसान के गाढ़ी खुन के साथ इससे घिनौना छल क्या हो सकता है


पुराणों के पवित्र श्लोकों के विपरीत एक ईमानदार संघर्ष होती है, उम्मीद की हूक होती है

मेरे विरोध प्रदर्शन, मेरे कवि के सत्य समर्पण को

सता का धारदार छुरा सीने में पेवस्त न कर दे

इससे पहले मुझे शांति जुलूस में जाना होगा

मै उस हर प्रदर्शन में जा रहा हूँ जहाँ मलीन बस्तियों का शरीर

लाठी का प्रहार झेलते खेत हो जा रहा है

जहाँ उनके मांस के लोथड़े हवा में लहराते रेत हो जा रहा है

एक कवि ने अपनी महान कविता में कहा था

इंसान हर रस और श्रृंगार की कविता से बड़ा है

इसी कारण तो वह शताब्दियों से खड़ा है


दोस्त यही समय है, मै अपनी कविता के साथ

रेगिस्तान में तप जाऊँ

खेतों में गड़ जाऊँ

बंजरों में तन जाऊँ

अपने कवि को लेकर राजमार्ग पर गड़े किलों पर चलूँ और सत्ता के हुक्मरानों से लड़ जाऊँ

जीत की गुहार पर सौ सौ बार मर जाऊँ।

2).

मृत उपमाओं का देश


आदर्श विहीन इस समाज में

यह मेरा है यह तेरा परिवार में

मानवता रहित इस संस्कार में

जहाँ शब्द मूल्यहीन कंकड बन गए

बेजान, परिष्कृत; और हमें

इसी मृत शब्द और उदास कविता के साथ रहना है


थके, हारे और उदास लोगों का है यह शहर

और मृत उपमाओं का यह देश

दुःख से बिलबिलाता, षड्यंत्रों से खेलता

पीड़ा का लम्बा आख्यान यह जनादेश

ईमानदारी, आदर्श, नैतिकता सब जार-जार

इज्जत, आवरू, प्रतिष्ठा सब तार-तार

कविताएँ सब हटाश, कहानियाँ सब झूठी

एक युद्ध पल रहा है

पल रहा है और चल रहा है बिना शस्त्र बल के

युगों से हारता जीतता

रोता मुस्कुराता

कभी आनंद कभी पीड़ा का चादर तानता मै

खुद से लड़ रहा हूँ

न जीता न मर रहा हूँ


लिख रहा हूँ एक लम्बी कविता

एक छोटे से जीवन के लिए

वह जीवन जो किसी पेड़ से लटककर झूल रहा है


मैं उस नदी में बह रहा हूँ जो मेरी धमनियों में है

उस बंजर पर हाँफ रहा हूँ, जो मेरे फेफड़े में है

शरीर पर एक परछाई है

जो मुझे ही डराता है लगातार


एक बदहवास, निरुदेश्य बेनाम कवि मै

गली के नुक्क्ड़ पर खड़ा

पूरे बजूद के साथ चिल्ला रहा हूँ

नहीं...! चिल्लाने की कोशिश कर रहा हूँ

शहर, समाज, परिवार

नदी, पेड़, संस्कार

कि आदर्श और जीवन

कि जीवन और कविता

और कविता.....!


3).

उम्मीद की टहनी


धीरे-धीरे  हम बढ़ रहे हैं गंतव्य की ओर

लेकिन आशा के विपरीत हमारी उपस्थिति को

अनदेखा कर दिया जा रहा है


स्वयं को नकारा जाना, 

जीवन से भटक जाना है

फिर हम जाकर भी कहाँ जा रहे हैं?

समंदर में भी बून्द कहाँ पा रहे हैं?

उर्वर पर रेगिस्तान फैल रहा है


सीने पर एक सुरज उग आया है

सुबक रही है व्यथा की दारुण दशा

चन्द्रमा से उतरकर अंधेरे में टहल रही है

उम्मीद की टहनियाँ

हो रहा है वेदना का विस्तार 

अभिलाषा तार-तार


विचार पर पहरा है

अभिव्यक्ति छुट रहा है 

पकड़ से धीरे-धीरे

बहुत धीरे-धीरे सारे तर्क

स्वर्ग को लूट रहा है।


4).

जीवन के गीत


          *१*

एक उम्मीद है आशा है

क्या चाह हृदय में पलता है

पल्लवित होते छिपे भावों में

कौन खाधोत सा जलता है

एक विश्राम तक जाते-जाते

भूल जाता हूँ पंथ सदा

मंजिल तक जाने को आतुर

कौन श्रम को अर्पित करता है


          *२*

भरने दे अभी रंग चित्र में

अद्भुत कृति को गढ़ने दे

पथ पर विचित्र फूल खिला दे

कंटक पर साँसों को चलने दे

इस दर्द की पीड़ा मधुर जान 

तू व्यर्थ इतना घबराता है

बीते रात, प्रभात आने दे

मेरे दीपक को जलने दे।


          *३*

कहो जुगनू कौन, कैसा सुख?

छिप-छिप चमक दिखाने में

यह कैसा मदहोश उमंग है

जलते हुए परवाने में

स्वाधीनता में आनंद है, लेकिन

बता मनोहर, तोता बोलो

लौह पिंजड़े में कैसा सुख है

कितनी तड़प है दाने में।

©सुरेन्द्र प्रजापति (ग्रामीण चेतना के कवि व कथाकार, संपर्क : 70618 21603)


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संपादक : गोलेन्द्र पटेल (कवि व लेखक)
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📖चोकर की लिट्टी कविता का लिंक : https://golendragyan.blogspot.com/2023/11/chokar-ki-litti-golendra-patel.html




            

                


चोकर की लिट्टी (Chokar Ki Litti ) : गोलेन्द्र पटेल (Golendra Patel)

 


चोकर की लिट्टी


मेरे पुरखे जानवर के चाम छिलते थे 

मगर, मैं घास छिलता हूँ


मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ

मेरे सिर पर 

चूल्हे की जलती हुई कंडी फेंकी गयी

मैंने जलन यह सोचकर बरदाश्त कर ली

कि यह मेरे पाप का फल है

(शायद अग्निदेव का प्रसाद है)


मैं पतली रोटी नहीं, 

बगैर चोखे का चोकर की लिट्टी खाता हूँ


चपाती नहीं, 

चिपरी जैसी दिखती है मेरे घर की रोटी

मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ


मुझे हमेशा कोल्हू का बैल समझा गया

मैं जाति की बंजर ज़मीन जोतने के लिए

जुल्म के जुए में जोता गया हूँ

मेरी ज़िंदगी देवताओं की दया का नाम है

देवताओं के वंशजों को मेरा सच झूठ लगता है

मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ

 

मैं कैसे किसी देवता को नेवता दूँ?

मेरे घर न दाना है न पानी

न साग है न सब्जी

न गोइंठी है न गैस

मुझे कुएँ और धुएँ के बीच सिर्फ़ धूल समझा जाता है

पर, मैं बेहया का फूल हूँ

देवी-देवता मुझे हालात का मारा और वक्त का हारा कहते हैं

मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ


देखो न देव, देश के देव! 

मैं अब भी चोकर का लिट्टा गढ़ रहा हूँ, 

चोकर का रोटा ठोंक रहा हूँ

क्या तुम इसे मेरी तरह ठूँस सकते हो?

मैं भाषा में अनंत आँखों की नमी हूँ

मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ


-गोलेन्द्र पटेल 

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

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बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...