Tuesday, 14 January 2025

'असहमति' सहमति से अधिक रचनात्मक है (सर्वश्रेष्ठ संपादक कौन हैं?)

 

“हमारे समय का संपादक होना, भाषा में ही नहीं, बल्कि भूमि पर भी मनुष्य होना है।

अच्छा संपादक होने के लिए किसी लेख, किताब या सामग्री को सुधारने और बेहतर बनाने में सक्षम होना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि एक श्रेष्ठ मनुष्य होना ज़रूरी है, क्योंकि एक अच्छा संपादक न केवल व्याकरण और शैली पर ध्यान देता है, बल्कि लेख की भावनात्मक गहराई, संवेदनात्मक संदर्भ और उद्देश्य को भी समझता है। वह लेखन की गुणवत्ता को सुधारने में कुशल होने के साथ-साथ सृजनात्मकता, सूझबूझ और सटीकता के साथ काम करता है। वह रचनाकार के विचारों को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से पाठकों तक पहुँचाता है। वह रचनाकारों के साथ सहयोग करके उनके विचारों को सही दिशा में मार्गदर्शन करता है।

श्रेष्ठ मनुष्य ही त्रिकालदर्शी होते हैं। त्रिकालदर्शी संपादक केवल वर्तमान के संदर्भ में नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा और विकास को समझते हुए अपने संपादन निर्णयों को लेते हैं। वे न केवल सामग्री की गुणवत्ता और प्रस्तुति पर ध्यान देते हैं, बल्कि यह भी सोचते हैं कि इस सामग्री का प्रभाव भविष्य में क्या हो सकता है और इसे किस तरह से व्यापक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से बेहतर किया जा सकता है, क्योंकि वे मौजूदा समय के साथ-साथ भविष्य की संभावनाओं को भी समझते हैं। एक बेहतरीन संपादक रचनाकार को बेहतर दिशा और संरचना देने के लिए सुझाव देता है।

निःसंदेह हिंदी में सम्यक दृष्टि वाले सहृदय संपादक बहुत कम हैं! 

हमें वे संपादक कत्तई पसंद नहीं हैं, जो उन युवा स्वरों को प्रकाशित नहीं करते हैं, जो हाशिये की आवाज़ हैं, जिनके घरों में कोई कवि, लेखक, संपादक, प्रकाशक, प्रोफेसर, शिक्षक नहीं हैं। जिनके लिए कोई यह कहने वाला नहीं है कि यह 'युवा स्वर' हमारी जाति, धर्म, घर-परिवार, ज़िला-जवार से है, अपना है, इसमें अपार संभावनाएं हैं!

जो भी संपादक जाति-धर्म-भाषा निरपेक्ष हैं, परिवारवाद और मित्रवाद से अधिक मानवतावाद के करीब हैं, वे हमें पसंद हैं, क्योंकि वे हाशिये की रचनाधर्मिता को प्रकाशित करते हैं, निखारते हैं।

हमारे जैसों को जो छापते हैं, वही हमारी नज़रों में सर्वश्रेष्ठ संपादक हैं, हमारा प्रिय संपादक हैं, हमारे हीरो हैं। शेष संपादकों के लिए निराला ने 'सरोज स्मृति' में 'निरानंद' विशेषण का प्रयोग किया है, लेकिन हम उनके लिए 'निकृष्ट' विशेषण प्रयोग करते हैं।

जो मेरे प्रिय कथाकार हैं, लेकिन अप्रिय संपादक भी हैं, हमने उनके बारे में सुना है कि वे सबको नहीं छापते हैं, वे जिसे छाप देते हैं, वे स्थापित हो जाते हैं, वे इस भ्रम में हैं! 

ख़ैर, उन्होंने न हमें छापा है, न ही हमारे जैसे किसी और को, शायद इसलिए हम स्थापित नहीं हुए, लेकिन वे यह मानते हैं कि हम अपने समय के 'सजग स्वर' हैं! 

'असहमति' सहमति से अधिक रचनात्मक है, पर परास्नातक के दौरान जब हमने फ़ेसबुक पर उनकी संपादकीय के संदर्भ में टिप्पणी की थी, तो हमारे शुभचिंतक शिक्षकों ने पोस्ट डिलीट करवा दी थी। बहरहाल, जिस दिन वे हमारी पृष्ठभूमि के किसी 'युवा स्वर' को छापेंगे, उस दिन वे हमारे प्रिय संपादक हो जायेंगे। धन्यवाद!”―गोलेन्द्र पटेल

Monday, 23 December 2024

जीवन राग के कवि हैं विनय बौद्ध

 जीवन का होना

उत्सव होना है

मतलब नया राग बोना है।


बोना है धरती में पीड़ा को

जो वीणा की धुन सुनाती इड़ा को

खुल जाता ज्ञान की इंद्रियाँ

सराबोर हो जाता पंचतत्व

जीवन के इस उत्सव में।

-विनय बौद्ध 

विनय कुमार विश्वकर्मा/विश्वा/बौद्ध जी युवा पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण कवि, लेखक, शिक्षक व शोधार्थी हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं का गहरा प्रभाव देखा जाता है। विनय बौद्ध की संवेदना को समझने के लिए "जीवनोत्सव", "कवि हृदय", "महाभिनिष्क्रमण", "लोकतंत्र के आड़ में", "सबसे बड़ा दुःख", "न्याय के देवता" आदि रचनाओं को देखा जा सकता है। वे अपनी रचनाओं में हमेशा उन लोगों के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं, जो समाज में शोषित और उत्पीड़ित हैं। उनकी रचनाओं में एक प्रकार का विद्रोह और संघर्ष का स्वर दिखाई देता है, जिसमें वे समाज के असमानताओं और अन्याय के खिलाफ बोलते हैं। वे कभी-कभी प्रकृति से अपने जीवन के संघर्षों और विचारों को जोड़ते हैं, जिससे उनका साहित्य और भी गहन हो जाता है। प्रकृति से जुड़ने से आत्मा की शांति और संवेदनाओं में गहराई आती है। इस संदर्भ में उनकी आगामी पंक्तियों को पढ़ें, "पहाड़ों में ही क्यों सारी माई भगवती हैं/कहीं ऐसा तो नहीं 

बुद्ध के ताप से/पहाड़ स्त्री हो गई/और पूजी जाने लगी।/

जब नारी जन्म जन्मांतर से पूजनीय हैं/तो तुलसी बाबा भी नारी से लाग कैसा..."

विरोध और विद्रोह की धरती पर विनय बौद्ध जी के धूमिल के करीब हैं, तो करुणा और दर्शन की भावभूमि और मनोभूमि पर बुद्ध और कबीर के करीब हैं। उनमें विद्रोही चेतना है, जो भोजपुरी जनपदी जीवन की असंतुलन और गरीबी के खिलाफ है। उनके रचनाओं में गहरी कड़वाहट और आक्रोश दिखता है, जो वर्तमान समय के भोजपुरी जनपदी जीवन के विद्रूप पहलुओं को सामने लाता है।

विनय बौद्ध जी की कविताओं में भारतीय ग्रामीण जीवन की कठिनाइयाँ और संघर्ष प्रमुखता से दिखाई देती हैं। वे उन किसानों और मजदूरों के जीवन की त्रासदी को प्रस्तुत करते हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं। उनकी रचनाओं में साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामाजिक असमानता के खिलाफ विरोध देखा जा सकता है। बहरहाल, विनय बौद्ध जी की संवेदना में समाज के प्रति एक प्रकार की क्रांति और बदलाव की इच्छा है। 

उनकी संवेदना एक उग्र और सत्य के प्रति निष्ठा से भरी हुई है। मुझे उनकी रचनाधर्मिता से काफ़ी उम्मीद है, क्योंकि उनकी रचनाओं में आत्मा की उन्नति, आत्मसाक्षात्कार और जीवन के गहरे उद्देश्यों के प्रति गहरी संवेदना पाई जाती है।

"मेरा 'पटेल से 'पेरियार' और उनका 'विश्वकर्मा' से 'बौद्ध" होने का एक दिलचस्प किस्सा है, जिस पर कभी चर्चा परिचर्चा होगी। ख़ैर, विनय जी मेरे अग्रज हैं, मैं उन्हें अपना गार्जियन मानता हूँ, लेकिन वे मुझे अपना गुरु मानते हैं। शायद इसलिए कि वे उम्र नहीं, अनुभव को महत्व देते हैं। ख़ैर, मैं ख़ुद अभी सीखने की प्रक्रिया से गुज़र रहा हूँ और शायद यह सीखने और सिखाने की क्रिया-प्रक्रिया उम्रभर बनी रहेंगी! जब वे मुझे काव्यगुरु कहते हैं, तब अच्छा नहीं लगता है। मैं सच कहता हूँ कि मैंने उनको जितना सिखाया नहीं, उससे ज़्यादा सीखा है।... किसी को कुछ सिखाने के लिए बहुत कुछ सीखना पड़ता है!...

इस जीवन में मैंने सबसे अधिक फ़ोन पर विनय जी से ही बातचीत की है, शायद ही कभी एक घंटे से पहले फोन कटा हो! उनकी बातें मुझको जीवन, संघर्ष और आत्मोत्थान के विषय में गहरे विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। विनय जी यह मानते हैं कि भारतीय गाँवों में समाज के सबसे निचले स्तर के लोग, जैसे दलित, आदिवासी और छोटे किसान, अपनी मूलभूत जरूरतों से भी वंचित हैं। उनका कवि इस असमानता को समाप्त करने के लिए जागरूकता पैदा करने की कोशिश करता है। ऐसा उनकी अधिकांश रचनाओं का प्रथम पाठक होने तौर पर नहीं, बल्कि उनकी रचनाओं से गुज़र हुए मैं अक्सर महसूस करता हूँ। बहरहाल, आज उनका जन्मदिन है, उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं, हार्दिक बधाई एवं आत्मिक अभिवादन! वे इसी तरह अपनी कविताओं में गहरी संवेदनाओं और मानवता के प्रति एक उत्कट अनुराग व्यक्त करते रहें और उनकी रचनाएं समाज में परिवर्तन और जागरूकता की दिशा में प्रेरक बनें!...प्रस्तुत हैं उनकी कुछ ताज़ी पंक्तियाँ :-

यह जागने का समय है

अपनी थाती सँभालने का समय है

अपनी जागीर बचानी है

अपनी ज़मीन बनानी है

क्योंकि हर युग में हम शास्त्र - शस्त्र में निपुण हैं

चाहे अश्वघोष

चाहे वाल्मीकि

चाहे रावण

चाहे शंबूक

चाहे व्यास

चाहे एकलव्य

चाहे आंबेडकर

शास्त्र तो हमीं लिखे, पर

अफ़सोस हमारे ही लोग नहीं जगे

क्या आप हमें पढ़ते हैं ?

या सिर्फ़ पूजते हैं

या हमारे सिर्फ़ अनुयायी बन कर रहना चाहते हैं

ऐ मेरे वंशज मैं चाहता हूँ तुम मुझे पढ़ो 

मुझे जियो

जैसे जिया हूँ मैं

तब मेरे तुम्हारे जीवन की संगीत बनेगी

क्योंकि अब तुम्हारे जागने का समय है।


टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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Wednesday, 11 December 2024

अंकिता अग्रहरी की कविताएँ

अंकिता अग्रहरी की कविताएँ

लेखन के शुरुआती दिनों में जो कवि/कवयित्री/लेखक/लेखिका रचनात्मक भूमि में अपने नए वैचारिकी बीज, नयी संवेदनात्मक पौध के साथ एक किसान की भाँति उपस्थित होते हैं/होती हैं, उन्हें नवोदित, नवांकुर, नए रचनाकार के रूप में संबोधित किया जाता है, क्योंकि उनकी रचनाएँ आमतौर पर अनुभवहीनता, अपरिपक्वता और विचारों की ताजगी का मिश्रण होती हैं। अर्थात् उनकी रचनाएँ ताजगी और नए विचारों की खोज की खेती हैं, उनके लेखन में समाज, संस्कृति और व्यक्तिगत अनुभवों का कच्चापन मौजूद होता है, लेकिन उनमें ताजी, तटकी अनुभूति की अभिव्यक्ति होती है, एक तरह की मिठास होती है। उनका लेखन अधिक परिपक्व नहीं होता है, लेकिन उसमें नयापन, ऊर्जा और बदलाव की संभावनाएँ होती हैं। नवोदित रचनाकार अक्सर नए विचार, दृष्टिकोण और शैलियों के साथ रचना लिखते हैं, भले ही उनकी भाषा में व्याकरणिक त्रुटियाँ हों, लेकिन उनके भाव में चुंबकीय शक्ति होती है। वे नये शैलियों, शब्दों और विचारों के प्रयोग से अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं। वे अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत चुनौतियों को रचना के माध्यम से व्यक्त करते हैं, जिससे उनकी रचनाओं में ताजगी, समकालिकता और नवीनता की छाप दिखाई देती है, क्योंकि वे अपने लेखन की दिशा, शैली या स्थानिक पहचान पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते हैं, उनकी रचनाओं में सहानुभूति और स्वानुभूति का संगम है। मेरे प्रिय नवोदित साथियो! सृजनात्मक संसार में हर नये रचनाकार को पुराने रचनाकारों से टकराना होता है, उनसे बेहतर लिखने के लिये उनसे बेहतर सोचना पड़ता है, उनके लेखन के साथ-साथ अपने समय और समाज को ख़ूब पढ़ना पड़ता है! सच्चे भूतपूर्व रचनाकार नये रचनाकारों को ही जन्म नहीं देते, बल्कि सच्चे नये रचनाकार भूतपूर्व रचनाकारों को पुनर्जीवित भी करते हैं, क्योंकि साहित्य भाषा में पुनर्जीवन है!

पुरुषप्रधान समाज में स्त्री चेतना का विकास तब होता है, जब स्त्रियाँ अपने अनुभवों को साझा करती हैं, अपनी आवाज़ को प्रमुखता से दर्ज करती हैं और समाज की रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती देती हैं। मानवतावादी स्त्री की अभिव्यक्ति स्त्री चेतना, स्त्री अस्मिता, आत्म-संवर्धन, आत्म-प्रकाशन, आत्मनिर्भरता, सम्मान, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार देती है। इस संदर्भ में नवोदित कवयित्रियों की रचनाएं दृष्टव्य हैं।

सुश्री अंकिता अग्रहरी जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बी.ए. द्वितीय वर्ष की मेधावी छात्रा हैं। जो कविता की दुनिया में अभी प्रवेश कर रही हैं और अपने रचनात्मक यात्रा के प्रारंभिक चरण में हैं। उनकी कविताओं में एक विशेष रूप से कोमलता और शुरुआती अवस्था की छवि है, अंतर्मन की सादगी है। उनकी कविताओं में शक्तिशाली भावनाओं का सहज प्रवाह तो है ही; साथ में हृदय की मुक्ति की साधना का स्वर भी है, उनकी कविताओं में मानवीय संवेदना है, मूल्य है, जीवन के रंग हैं, ख़ुशबू है, सृजनात्मक स्मृतियों की तरंग है और उनकी कविताओं में समसामयिक दर्द, द्वंद्व, अँधेरा, उजाला, उम्मीद, टूटन, जिज्ञासा, जीजिविषा जैसे तत्व भी हैं। बहरहाल, मुझे उनकी रचनाधर्मिता से उम्मीद है, वे आने वाले दिनों में और बेहतर रचेंगी! 

मैं उनके रचनात्मक उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उनकी कुछ कविताएँ सुधी पाठकों के प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

(संपादकीय: गोलेन्द्र पटेल)


1).

मैं कहाँ हूँ? 

ख़ुद से कुछ कहने जा रही हूँ, 

एक ऐसी मुलाकात करने जा रही हूँ, 

मत पूछो कौन हैं वो, 

बस ख़ुद से ही मिलने जा रही हूँ! 


कहाँ हो तुम, 

ख़ुद से सवाल किये जा रही हूँ, 

अपने मन की गहराइयों को छूने जा रही हूँ, 

जो हार रहा था;

बस उसे ही उँचाईयों तक पहुँचाना चाह रही हूँ! 


मेरी ख़ुद से मुलाकात बहुत दिनों बाद होती हैं;

वैसे रोज तो बहुतों से मिलते हैं हम;

बस ख़ुद से मिलना भूल जाते हैं;

शायद ख़ुद को पहचानने से इंकार करते हैं, 

या फिर सच्चाईयों से दूर भागते हैं हम! 


मेरी ख़ुद से इतनी शिकायते हैं कि किताब लिख डालूँ;

मगर मेरी क़लम ही मुझे धोख़ा दे जाती है!

2).

मैं एक अमिट निशानी बन जाऊँ!

आज की फिजाओं का हाल ना पूछों, 

बदलते  लोगों का सवाल ना पूछों;

यहाँ हर रोज़ प्रेमियों की बदलती कहानी है, 

ख़ुदा की इनायत हैं हीर- राँझा की आज भी निशानी है

आज फ़िर वक़्त मेरी दहलीज पर आया है, 

खुदा की खैरियत मुझसे फ़िर वही वायदा पाया है! 


काश! कोई कहानी बन जाए, 

मैं जो लिखूँ मेरी निशानी बन जाए, 

मेरी राहों में कोई पत्थर न आए, 

जो मुझे कभी गले से लगाए! 


मैं अम्बर सी अनंत बन जाऊँ;

मैं ऊँचाईयों से भी ऊँची हो जाऊँ, 

चाँदनी की चमक सी;

सूरज की किरणों सी, 

मैं भी एक चमकती अमिट निशानी बन जाऊँ! 


मैं बादलों जैसी श्वेत बन जाऊँ, 

जिसमें एक भी दाग न हो इतनी विशेष बन जाऊँ;

मैं आसमां की तारा बन जाऊँ

अगर तारा न बन सकूँ

तो ज़मीं की धारा बन जाऊँ! 


न भूल पाए कोई, मैं ऐसी कहानी बन जाऊँ, 

काश! मैं एक अमिट निशानी बन जाऊँ! 

3).

मेरी सादगी

किसी को मेरी सादगी पसंद आई, 

तो किसी को वो चाँदनी पसंद आई, 

किसी को मेरी मुलाक़ाते पसंद आई, 

तो किसी को मुझसे बिछड़ना पसंद आया, 

किसी को मेरी बाते पसंद आई, 

तो किसी को मेरी यादें पसंद आई, 

किसी को मेरी फरमाइशें पसंद आई, 

तो किसी को मेरी गुज़ारिशें पसंद आई, 

किसी को मेरे अल्फ़ाज़ पसंद आये, 

तो किसी को मेरी खामोशी पसंद आई, 

किसी  को मेरी रूह पसंद आई, 

तो किसी को मेरे जिस्म पसंद आये, 

किन लब्ज़ों से बयां करू , 

लोगों को खुदसे ज्यादा मुझमें क्या पसंद आई! 

काश! मुझमे पसंद करने से ज्यादा, लोगों को खुद मे भी कुछ पसन्द आई होती! 


एक दिन आयेगा जब लोगों को, 

खुद से ज्यादा मुझमें सब कुछ पसन्द आयेगा! 


वो होता हैं न जुबां होते हुए भी बेजुबां होते हैं लोग, 

वही रहेंगे ये लोग! 

वो सारी फ़िज़ूल बाते होंगी लोगों से लिपटे हुए, 

मगर टकराने से ज्यादा उस जुबां को भी, 

मुझसे दूर रहना पसंद आयेगा! 


4).

लक्ष्य

तेरा लक्ष्य पूरा करने का समय कब आयेगा? 

तु खुद से पूछ कब अपने जीवन को साजयेगा, 

तु खुद से झूठा वादा कर कब तक रह पायेगा, 

जो पाने की विप्लव तेरे मन मे उमड़ी थी, 

उसको कितने दिनों तक टालता जायेगा! 


माना तेरा बचपन था कभी, 

खुद को न समझा पाया तू, 

निष्काम की चीजों से भी दिल लगाया तू;

कहकर यूँही टालता गया जवानी का दिन आयेगा अभी, 

जो इस दिन को सजायेगा कभी! 


जवानी के दिन दस्तक दिये जब, 

यौवन प्रेम और लालसाओ से खुद को न रोक पाया तु, 

सुदृढ़ व भावशून्य से, वहाँ न संभल पाया तु, 

थोड़ा मिट गया, यह संदेशा जब पाया तु, 

फिर भी शेष फिसलता गया तु, 

बुढ़ापे के लोभ से, 

एक ऐसी सोच से, 

इस विष भरी आबादी से, 

पृथक् स्थान मे खुद को ले जाना चाहा तू, 

कुछ दिन हीं तो बचे हैं जिस्त के, 

निशंक फिर डगमगाया तू! 


तु कब मिट गया यह कभी न समझ पाया तु;

अपनी पैगामी का निशाना न दे पाया तु, 

सोच खुद को कितना जर्फ बनाया तू! 

5).


मेरे प्रिये

मैं फूल की महकती खुशबू;

जिसके बिना तुम अधूरे प्रिये, 

मैं गुलशन की इत्र;

जो तुमको महकाये प्रिये, 

मैं फूलों की हार;

जिसे गले मे तुम सजाओ प्रिये, 

मैं हाथों की लकीरें;

जिसे तुम कभी न मिटा पाओ प्रिये, 

मैं वो गीत;

जिसे हर शाम तुम गुनगुनाओ प्रिये, 

मैं वो तश्वीर;

जिसे सीने से तुम लगाओ  प्रिये, 

मैं वो वक़्त;

जिसे जब चाहो बुला लो प्रिये, 

मैं वो आदत;

जिसे चाह के भी न दूर कर पाओ प्रिये

मैं ऐसी अमिट  निशानी;

जिसे तुम चाह के भी न भूल पाओ प्रिये! 

6).

दिल का शहर

मेरे दिल के शहर का तू फसाना हो गया, 

मेरे दिल  को बहलाने का तू बहाना हो गया;

मेरे गम को भुलाने मे जमाना हो गया, 

तू आया तो एक पल मे ये गम भी बेगाना हो गया;


मेरा गम भी तेरा अफसाना हो गया

क्योंकि ये भी तेरा आशिकाना हो गया;

मेरे दिल के अम्बर में मेरे ख्वाहिशों का चाँद था, 

मगर वो चाँद भी तेरा दीवाना हो गया! 


ता उम्र तकती रही मैं उस चाँद को

मगर तु आया तो वो चाँद भी मुझसे बेगाना हो गया

ख्वाहिशें नही थी तुझे पाने की, 

मगर मेरी ख्वाहिशें भी तेरे दीवाने हो गये! 


तु उस चाँद को  मेरी आँखों से कुछ

इस तरह ओझल किया, 

मानो उस चाँद से रिश्ता टूटे मेरा

जमाना हो गया, 


तेरे आने की ख़ुशी मनाऊ, 

या उस चाँद को भूलने का गम, 

मुझे यह तराशते जमाना हो गया! 


दिल को जब  से तेरे आने की आहट हुई,

न जाने तब से क्यूँ? 

दिल के शहर को तुझे पाने की चाहत हुई! 

                          ©अंकिता अग्रहरी

                     नवोदित कवयित्री- अंकिता अग्रहरी 

पिता - विनोद कुमार अग्रहरी

माता- श्रीमती प्रभावती देवी

पता- सिद्धार्थनगर

कक्षा- बी.ए.( द्वितीय वर्ष), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।

संपादक : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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Sunday, 24 November 2024

जनविमुख व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष के कवि हैं संतोष पटेल

 जनविमुख व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष के कवि हैं संतोष पटेल 

साहित्य वह कला है, जो मानव अनुभव, भावनाओं, विचारों और जीवन के विभिन्न पहलुओं को कलात्मक और सृजनात्मक रूप से व्यक्त करने का एक माध्यम है, जो कि सही अर्थों में दर्पण की भूमिका में है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और भाषा उसकी सामाजिकता का मूल आधार है। मनुष्य भाषा का उपयोग करके समाज, संस्कृति और व्यक्तिगत अनुभवों को अभिव्यक्त करता है, क्योंकि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि संस्कृति, सभ्यता और पहचान का भी अभिन्न हिस्सा है। साहित्य के माध्यम से लेखक या कवि अपने विचारों को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं, जो पाठकों पर मानसिक, भावनात्मक और बौद्धिक प्रभाव डालते हैं। साहित्य न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि समाज की समस्याओं, संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम भी है। कवि शब्दों के माध्यम से गहन अनुभूतियों और संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ० संतोष पटेल जी मूलतः हिंदी और भोजपुरी में लिखते हैं। उनका जन्म बिहार प्रदेश के पश्चिम चंपारण जिला मुख्यालय बेतिया के पुरानी गुदरी स्थित सुप्रसिद्ध भोजपुरी-हिंदी साहित्यकार डॉ० गोरख प्रसाद मस्ताना जी के घर हुआ। श्रीमती चिंता देवी उनकी माताजी हैं। वे हमारे समय के सजग कवि-लेखक हैं। उनकी चर्चित पुस्तकें हैं 'भोर भिनुसार', 'अदहन' (दोनों (भोजपुरी काव्य संग्रह मैथिली भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा  प्रकाशित), 'शब्दों की छाँव में' (हिंदी काव्य संग्रह), 'जारी है लड़ाई' (हिंदी काव्य संकलन), 'नो क्लीन चिट' (हिंदी काव्य संग्रह) आदि।

उनकी रचनाएं हिंदी और भोजपुरी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उनकी रचनाओं में जीवन की सच्चाइयाँ, मानवीय संवेदनाएँ और सामाजिक मुद्दों को सरल और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया है। वे अपनी रचनाओं में आम आदमी की भावनाओं और संघर्षों को अभिव्यक्त करते हैं। संतोष पटेल का लेखन समाज में बदलाव की आवश्यकता और मानवता की महत्ता पर जोर देता है। उनकी भाषा लोकोन्मुखी है। उनकी रचनाओं में ग्रामीण परिवेश, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण मिलता है। उनके लेखन में शोषण, संघर्ष और उम्मीद की झलक दिखाई देती है, क्योंकि उनमें श्रमिक समाज के संघर्षों के प्रति गहरा अनुराग है, कहीं-कहीं आग का राग भी है! इसलिए उनकी रचनाएं दिल-दिमाग को झकझोरती ही नहीं, बल्कि अंतर्मन को द्रवित भी करती है अर्थात् भावभूमि और मनोभूमि को मानवीय संवेदनाओं से सिंचती हैं। उनकी रचनाएं सहृदय को मैत्री, प्रेम, प्रज्ञा, शील, करुणा, दया की ओर उन्मुख करती हैं।

उनकी सृजनात्मक संसार को देखेंगे, तो आप पायेंगे कि उनकी रचनाओं में महामानव तथागत बुद्ध, गुरु संत रविदास, संत शिरोमणि कबीरदास, संत तुकाराम, भोजपुरी के कालिदास भिखारी ठाकुर, राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले, राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले, ई०वी० रामा स्वामी पेरियार नायकर, संत गाडगे, छत्रपति शाहू जी महराज, विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ० भीमराव अम्बेडकर, अमर शहीद जगदेव प्रसाद, महामना राम स्वरूप वर्मा और जननायक कर्पूरी ठाकुर से लेकर तमाम बहुजन शुभचिंतकों के स्वर हैं। उनका लेखन जनपक्षधर्मी है। उनकी रचनाओं में सामाजिक विद्रूपताओं से सीधे मुठभेड़ है। उनकी रचनाएं सामाजिक न्याय, पाखंड, रूढ़िवादिता, जातिवाद, अस्पृश्यता, छूआछूत, धर्म-लिंग आधारित भेदभाव का प्रतिपक्ष रचती हैं, सत्ता से सवाल करती हैं, क्योंकि सच्ची रचनाएं मनुष्यता की आवाज़ होती हैं। उनकी रचनाओं में जनविमुख व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष है।

राजनीति की बर्बरता का प्रतिपक्ष साहित्य में है। मानवता-केन्द्रित कविता ही कवि का प्राण हैं। संतोष जी के तेवर और तर्क इधर और नुकीले हुए हैं, उनकी बेधकता बढ़ी है। संतोष जी की रचनाएं संघनित स्मृतियां, गहन अनुभव व आतंरिक विचारों से ओतप्रोत हैं अर्थात् उनकी रचनाएं सामाजिक विसंगतियों, उसकी मूल्यहीनता और संवेदनहीनता के आन्तरिक परतों और विडंबनाओं को भेदती हैं, क्योंकि जीवन की विसंगति और विद्रूपताओं की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति कर के वे मनुष्यता का पक्ष गढ़ने की कोशिश करते हैं। प्रत्येक रचना में उनका आलोचकीय विवेक सदैव सजग रहता है, वे सामाजिक मन को पहचानते हैं। इसलिए उनकी अधिकांश रचनाएं अनुकरणीय हैं, जो मानव धर्म को अपनाने की अपील करती हैं। वे सामाजिक सरोकार के शब्दावली में सच्चाई, संवेदनशीलता और स्वाभिमान के कवि हैं! उनके स्वर सहानुभूति के नहीं, बल्कि समानानुभूति के स्वर हैं, समवेत स्वर हैं, क्रांतिधर्मी आवाज़ हैं। वे भावावेग के बजाय संयम और सांद्रता के साथ अपने समय को रचते हैं। उनकी रचनाएं मन ही नहीं, बल्कि चेतना को प्रभावित करती हैं, क्योंकि उनकी रचनाओं में रचना की मानवीय शक्ति तो दिखती ही है, साथ में प्रतिरोध का उसका साहस भी प्रखरता से सामने आता है, जो कि उनकी रचनात्मकता की अपनी ख़ास विशेषता है।

इन दिनों डॉ० संतोष भोजपुरी जनजागरण अभियान और तथागत बुद्ध पर केंद्रित अपनी कविताओं को लेकर चर्चा में हैं। भोजपुरी भाषा को संवैधानिक सम्मान मिले इसके लिए वे सामूहिक प्रयासरत हैं। तथागत बुद्ध के विचारों ने मानवता को सत्य की खोज, आत्मज्ञान और अहिंसा का मार्ग दिखाया है। उनके सिद्धांत आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा अनुसरण किए जाते हैं और वे जीवन के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर प्रदान करते हैं। उनके उपदेशों का उद्देश्य हर व्यक्ति को अपनी आत्मा की सच्चाई को जानने और जीवन को शांति, संतुलन और करुणा से जीने की प्रेरणा देना रहा। आप संतोष जी के शब्दों में बुद्ध-दर्शन को समझने के लिये उनकी कुछ कविताएं पढ़ने से पहले उनकी आगामी पंक्तियों पर गौर करें कि "मेरे शब्द तुम्हारे स्वर में/ लगते सभी दुलारे हैं/ जितनी हँसी अधर पर मेरे/रख लो सभी तुम्हारे है।"(संपादकीय: गोलेन्द्र पटेल)


1).

अपनाने के लिए हैं बुद्ध

विडंबना है कि बुद्ध 

हो गए हैं लोगों के लिए 

सजावट की वस्तु

लेकिन आश्वस्ति यह है कि

अब भी लोगों को वे ही भाते हैं।


आज भी वे उनके यहां भी 

दिख जाते हैं

जिन्होंने बुद्ध को अब तक जाना नहीं 

उनको अब तक पहचाना नहीं।


पर अच्छा है कि 

दुनिया में जो तबाही का मंजर है

हिंसा और हथियार का जो होड़ है

ताकतवरों का गठजोड़ है

उनकी जीत होने से रही।


जीत तो होगी एकदिन

शांति, सद्भाव और प्रेम की ही

दुनिया करेगी याद बुद्ध की बातें

मेत्ता, करुणा, मुदिता

समता, दान, सहनशीलता 

तब समझ में आयेगा कि 

बुद्ध केवल सजाने के लिए नहीं

अपनाने के लिए हैं।


2).

दीप का महत्व

दीप केवल महाप्रकाश ही नहीं 

है दीपक प्रतीक ज्ञान का

विवेक और त्याग का

साधना और ध्यान का

बुद्ध का दीप है अखंडदीप

जलते हैं एक दीप से हजारों दीप

तब बनता है वह रत्नदीप।


दीप मंदिर में जले तो अक्षय जोत

देवस्थान में अक्षय अग्नि

यहूदी में जले तो सवाय

ईसाई में जले में बड़ा दिन

मुस्लिम में शब-ए-बारात।


शास्त्रों ने कहा कि 

अंधकार से प्रकाश की ओर चलो

तीनों लोक के अंधेरे का नाश करता है

सूर्य का एक अंश दीप

तभी तो कबीर 

अपने घट में बारते हैं दीप

और रैदास ज्ञान का दीपक जलाते हैं

दीप का महत्व सर्वोत्तम कह

कोई दिवाली तो कोई दीपदान मानते हैं।


3).

करुणापूर्ण समर्पण 

दृष्टि में हो स्नेह व दया 

मुक्त होता घृणा व अंहकार

मुस्कुराता हो मुखमंडल

दूर रहता अनेक विकार

नम्रता से बोलो सबसे

प्रसन्न हो जाता है संसार

आदरभाव का  समर्पण 

स्वभाव में हो ऐसा दरकार 

सच्चे हृदय से बातें करना

व्यवहार हो सबको स्वीकार

आदरपूर्वक स्थान देकर

सम्मान हो सबका अधिकार

स्वागत कर रहे सबका अपने घर

ना हो किसी का तिरस्कार

तथागत ने यही कहा कि 

दूसरों को प्रसन्न रखना हो तो

संवेदना से भरा हो संस्कार

करुणापूर्ण समर्पण में ही

मानवता का होता अभिसार।


4).

वत्सा की प्रवज्या 

सुनते पढ़ते महाभारत का 

'आदि पर्व ' बड़े हुए कि 

चली गई थी देवयानी

अपने पति ययाति को छोड़ 

अपने पिता के घर

केवल इसलिए कि देवयानी को बर्दाश्त नहीं हुआ था

ययाति की बेवफ़ाई।


गार्गी, वाचनक्वी, घोषा

मैत्रेयी को उपनिषद काल में 

दिया गया संज्ञा ब्रह्मवादिनी का

लेकिन कात्यायनी को रखा गया

वंचित इस पद से।


ऐसी रही कई स्त्रियां वंचित 

थेरीगाथा में भी

दर्ज नहीं हो पाया उनका नाम

ऐसी ही थी एक 

स्थिरचित्तवाली स्वतंत्र विचारिका उच्छेदवादिनी भिक्षुणी

है भी पहचान उसकी थेरीगाथा में

"वत्सा" वैशाली की एक भिक्षुणी

गृहस्थ, साधारण सी गृहिणी।


भोजन पकाते हुए उससे

जल गया कड़ाही में साग

मन में भर आया वैराग्य 

क्यों अधिक देर तक

भोजन को मिली आग

तो यह बात समझ में आई

अंतर का पट खुल गया

अधिक समय समाधि और कर्म से

जल जाता है द्वेष - राग।


गृहस्थी से मन गया उचट 

पति से लेकर मुक्ति 

महागौतमी से पाई धर्म दीक्षा 

प्रवज्या ग्रहण कर पाई शिक्षा

तथागत को शीश नवाया

अपनी आंतरिक वैराग्य के लिए

बुद्ध से सराहना पाया।


5).

मन की शुद्धि

मन अगुआ है सभी प्रवृतियों का

मन नियंत्रक है समस्त आवृत्तियों का

मन की पूर्ण रिक्ति 

रोकती है अंतर्विरोधों की पुनरावृति।


मन की शुद्धता 

इसलिए भी आवश्यक है कि 

चित्त की समस्त अवस्थाएं 

उत्पन्न ही होते हैं मन में

मन प्रधान है चेतनाशीलता के लिए।


मन साफ है तो सुख

रहता है साथ छाया की तरह

यदि मन दूषित है तो दुःख 

ऐसे ही पीछा करता है 

जैसे बैल के पीछे गाड़ी का पहिया

धम्मपद में उल्लेखित है

यह बात व्याख्यायित है


मन को शुद्धता हेतु प्रशिक्षित करें

मन को शुद्धता में समायोजित करें

मन यदि हो गया शुद्ध हो जाएगा

सम्यक ध्यान मानव पाएगा

अंत:करण, कार्य और वाणी होगा शुद्ध

निश्चित है आप भी होंगे बुद्ध।


6).

सुशांत की साहस

भंते! व्यतीत करना चाहता हूं

अपना चतुर्मास 

नगरवधू सोमलता के पास

विनम्रता से भिक्षु सुशांत ने

बुद्ध को बतलाया।


सुनकर बात सुशांत की

तथागत मुस्काये

सच्चा साधक के सब गुण

सुशांत में देख पाये।


दूसरे भिक्षुओं को आपत्ति भारी 

हो जाएगा सुशांत 

विचलित पथ से अपने

सोमलता की सुंदरता तोड़ देगी

उसके सारे सपने।


फिर भी बुद्ध थे निश्चित

दिया आशीष सुशांत को

जाओ ! सुशांत

करना पूरी अपनी साधना 

सहनी पड़ेगी मानसिक यातना।


पहुंचे सुशांत नगरवधू के पास

मन थी एक ही आस

रिझाती रही सोमलता

सुशांत को हर पल 

निर्लिप्त था सुशांत

दूर था उसका चित्तमल।


व्यतीत हुए तीन माह

एक के बाद एक

बधाएं आईं अनेक

अडिग रहा सुशांत

अपनी साधना में रहा लीन 

सोमलता और दूसरी सुंदरियों से

होकर बेखबर साधना में तल्लीन।


सोमलता को अब उसपर

सहानभूति आई

अब चौथे मास में

सुशांत के साधना में मदद की हाथ बढ़ाई।


चौथा मास निकट था

समय तो विकट था

फिर भी सुशांत मन पर नियंत्रण पाया

कारण था कि वह

संगीत को वह बुद्ध वाणी माना

नृत्य के आलय को देवालय जाना।


इसका हुआ सोमलता पर ऐसा असर

छोड़ छाड़ कर नगरवधू का जीवन बसर

सुशांत के पीछे पीछे मठ की ओर

चल गई 

संघ के शरण में आकर

भिक्षुणी में बदल गई।


7).

मध्यम मार्ग

जीवन में ऐसे आते हैं कुछ लोग

जैसे बाढ़ का पानी हो

जलराशि इतनी अत्याधिक कि 

सब कुछ अस्त व्यस्त

जीवन भी पस्त 

तृप्ति की अधिकता 

सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम की तरह होता है

रह नहीं जाता कुछ और

पाने की लालसा।


फिर वे जीवन से जाते हैं ऐसे

लगता है मानो

नदी में कभी पानी था ही नहीं 

चारों तरफ रेत ही रेत 

कहीं कहीं से पतला सा 

बहता जलस्रोत

सब कुछ शांत मानो

वह श्रापित फल्गु नदी हो

जहां हटा कर रेत

ढूंढना पड़ता है पानी।


किसी चीज की अधिकता 

या हो उसकी अनुपस्थिति

दोनों ही अर्थों में वह है दुःखदायी 

तथागत बुद्ध ने तभी कहा 

जीवन जीने के लिए

सर्वोत्तम मार्ग है मध्यम मार्ग।


8).

सब्ब दुःख 

बुद्ध ने कहा सब्ब दुःख 

नैराश्य में डूबे लोगों ने

घोषित किया उन्हें निराशावादी

बिना अन्य तीन अरिय सत्य को

संज्ञान में लेते हुए।


कभी देखा है सागर में हिम पहाड़ 

बस दिखने वाला हिस्से का नाम है "सब्ब दुःख"

हिम पर्वत का बाकी तीन हिस्सा 

समुद्र में ही पानी के भीतर होता रहता है उत्प्लावित

जिसमें छिपा है सब्ब दुःख का निदान।


लेकिन कवियों ने दुःख को जैसा

देखा वैसा गाया 

पर कौन है जो दुःख से पार पाया

"दु:ख ही जीवन की कथा रही"

दुःख ने निराला को जब तोड़ा

तब केदारनाथ ने तो दुःख को ही

कविता की ममता से जोड़ा।


तारा ने दुःख को अंगीकार किया

कहा कि

मैं दुःख से श्रृंगार करूंगी।


दुःख का क्या 

वह तो मणिकर्णिका को भी आता है

तब श्रीकांत बोल पड़ते हैं

दुखी मत होना

मणिकर्णिका

दुःख तुम्हें शोभा नहीं देता।


बुद्ध ने दुःख तो स्वीकारा

कवियों ने उसको माना है

दुःख यदि सत्य है

तो सत्य को क्यों झुठलाना है।


9).

भूमि स्पर्श मुद्रा

ऊरवेला का वह विशाल पीपल वृक्ष

समाधिस्थ हैं शाक्यमुनि 

गहरी समाधि, गहन तपस्या में।


बधाएं दस दिशाओं से

अनवरत रूप से प्रलोभक 'मार' का

कर चुका है आक्रमण

बोल चुका है धावा 

अपनी दसों सेनाओं के साथ।


शामिल हैं जिसमें उसकी तीन पुत्रियाँ 

तृष्णा, अरति और राग*

अन्य दूसरे भी हैं हमलावर

असंतोष, भय और शंका

साथ में आते हैं मिथ्या शोक दंभ

अंत में युद्ध में शामिल होता है भूख प्यास ।


तोड़ना है आज गौतम का प्रयास

यही है मार को आस

होता है भयंकर संघर्ष 

आखिरकार

होता पराजित है मार

पर उसको विश्वास कहां?

कि मिली संबोधि गौतम को

अब वे कहे जाएंगे बुद्ध।


संशय से भरा मार

पूछ लिया साक्ष्य आखिरकार

सच में मिल गई संबोधि

बुद्ध ने उठाया दाहिना हाथ

निकाली हाथ से मध्यमा ऊंगली 

करते हुए स्पर्श भूमि को

माना साक्षी भू को।


वही पीपल वृक्ष कहलाया बोधि वृक्ष 

उरुबेला है आज बना बोधगया

जिसके नीचे विराजमान 

सम्यक सम्बुद्ध तथागत बुद्ध

भूमि स्पर्श मुद्रा में।


10).

नंदनगढ़ का स्तूप

कहता है कोई मौर्यकालीन गौरव 

कोई कहता घनानंद का रहस्यमयी किला

कोई बुद्ध का देसना स्थल

कोई बुद्ध का अस्थि स्थल

कोई कहता बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण से जुड़ा स्थल

स्थानीय लोगों के लिए महत्वहीन

आँख रहते हुए भी हुक्मरानों के

आँखों से ओझल।


बामियान का ग़म है

लेकिन हम कौन से कम हैं?

बुद्ध का यह पवित्र स्थल

बना है आज मवेशियों का चरागाह

नशेड़ियों का गुप्त स्थल

चिलमचियों का अड्डा

दारूबाजों का आरामगाह

बच्चों का क्रीड़ास्थल।


स्तूप की ईंटें भराभरा कर

गिर रहीं है रोज रोज 

मानों इतिहास का पन्ना 

विनष्ट हो रहा है रोज रोज।


बचा रहा पुष्यमित्र शुंग के दंड से

बचा रहा शशांक के कोप से

बचा रहा बख्तियार के हमले से

लेकिन अब ऐसा लगता है

कि बेकार में ही हुआ इसका उत्खनन

अच्छा था यूं ही पड़ा रहता

जमीन के भीतर 

"चत्तारो महाभूतानी" में एक के पास 

सदा के लिए।


कविताएं साभार: डॉ० संतोष पटेल के फेसबुक वॉल से 

डॉ० संतोष पटेल 

सम्प्रति: सहायक कुलसचिव (असिस्टेंट रजिस्ट्रार), दिल्ली कौशल व उद्यमिता विश्वविद्यालय, दिल्ली सरकार, नई दिल्ली। 

सम्पर्क:

आर जेड एच 940 

राजनगर -2 पालम कॉलोनी 

नई दिल्ली-110077

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Monday, 21 October 2024

धम्म दीपोत्सव / धम्म दीपदानोत्सव / प्रज्ञात्मक प्रकाशोत्सव / बौद्ध धम्म दीपोत्सव पर्व / बौद्ध महामहोत्सव : गोलेन्द्र पटेल

 'धम्म दीपोत्सव' की हार्दिक शुभकामनाएं!


नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।

बुद्धं सरणं गच्छामि।

धम्मं सरणं गच्छामि।

संघं सरणं गच्छामि।


चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय

लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं।

-देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मंझे कल्याणं- परियोसान

कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ।

[महावग्ग: : विनयपिटक]

सवर्णवादी/ ब्राह्मणवादी बौद्ध भिक्खुओं का मानना है कि "धम्म दीपोत्सव" वैशाख पूर्णिमा या आषाढी पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा या अशोक धम्मविजय दसमी या 14 अप्रैल को मनाया जाना चाहिए, कार्तिक अमावस्या के दिन नहीं, क्योंकि इस दिन उनकी सजातियों की दीपावली है। बहरहाल, हमारा मानना है कि असली बौद्ध भिक्खुओं, भिक्खुनियों, उपासकों, उपासिकाओं को अपने उत्सव, महोत्सव, पर्व, त्योहार या किसी भी तरह की धम्मतिथि को हाइजै़क होने से बचाना चाहिए। कार्तिक अमावस्या के दिन ही धम्म दीपोत्सव/धम्म दीपदानोत्सव/प्रज्ञात्मक प्रकाशोत्सव मनाना चाहिए, क्योंकि ज़्यादातर इस दिन आपके लोग ही यानी बहुजन समाज के लोग ही अंधविश्वास की ओर उन्मुख होते हैं, ओझा-सोखा, पंडित-पुजारी-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी एवं धर्म के ठेकेदारों का अंधभक्त बनते हैं और फिर जीवन भर रोते हैं!

धम्म दीपोत्सव का आयोजन बौद्ध धर्म के सिद्धांतों, जैसे कि करुणा, प्रेम, प्रज्ञा, शांति, शील, अहिंसा, सद्भावना और समता को फैलाने और मानवता के कल्याण के लिए किया जाता है। धम्म दीपदानोत्सव के दिन बौद्ध अनुयायी मंदिरों/मठों में दीप जलाकर उन्हें बुद्ध, धम्म (बुद्ध के उपदेश) और संघ (बौद्ध भिक्षु संघ) के प्रति समर्पित करते हैं। इसे आध्यात्मिक जागरूकता और आत्मशुद्धि का अवसर माना जाता है, जहाँ लोग धम्म के पथ पर चलने की प्रतिज्ञा करते हैं। दीपदान का उद्देश्य अज्ञानता के अंधकार को दूर करना और ज्ञान का प्रकाश फैलाना है। धम्म दीपदानोत्सव विशेष रूप से ध्यान, प्रार्थना और सामाजिक सेवा के माध्यम से व्यक्तिगत और सामाजिक सुधार का संदेश देता है, जिसमें करुणा, शांति और अहिंसा पर जोर दिया जाता है।

वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन बुद्ध का जन्म हुआ, इसी दिन वे बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे सिद्धार्थ से बुद्ध हुए, उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई, इसी दिन उनका महापरिनिर्वाण हुआ। अर्थात्, उनका जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण (मृत्यु) तीनों ही वैशाख पूर्णिमा के दिन हुए। 

आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि आषाढ़ पूर्णिमा को ही तथागत गौतम बुद्ध ने सारनाथ के मृगदाय वन में पंचवग्गीय भिक्षुओं को धम्मचक्कपवत्तन उपदेश देकर धम्म देशना की शुरुआत की थी। इस दिन को धम्म चक्र दिवस भी कहा जाता है, बौद्ध धर्म के अनुयायी महाउपोसथ व्रत रखते हैं और बौद्ध विहारों में धम्म देशना के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन धम्मसेनापति भंते सारिपुत्र एवं देवानं पिय पियदसि सम्राट (प्रियदर्शी सम्राट) अशोक का परिनिर्वाण दिवस है। इस दिन बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम ने माता महामाया की कोख में प्रवेश किया। इसी दिन 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ गौतम ने गृह त्याग किया था और इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। नव-बौद्धों का मानना है कि इस दिन राजा अशोक द्वारा 84,000 स्तूपों का निर्माण पूरा किया गया था। महाराजा अशोक ने इसी दिन 84 हजार स्तूपों का अनावरण किया था, जिसकी सजावट दीपों से किया गया था। इसलिए इसे दीपदानोत्सव कहते हैं। पालि साहित्य में 84,000 देशनाएँ संग्रहित हैं, जिनमें 82,000 सम्यक सम्बुद्ध की हैं और 2,000 भंते सारिपुत्र एवं भंते महामौद्गलायन की हैं। भंते सारिपुत्र भगवान बुद्ध के शिष्यों में प्रमुख थे और उन्हें भगवान ने धम्मसेनापति कहा था। वर्षावास (वस्सावास) का आरम्भ आषाढ मास की पूर्णिमा से होता है और समापन आश्विन पूर्णिमा के दिन होता है। आश्विन पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक कठिन चीवरदान के समारोह होते हैं, जिनमें उपासक – उपासिकाऐं विभिन्न महाविहारों में जाकर दान करते हैं।

धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस भारतीय बौद्धों का एक प्रमुख उत्सव है। दुनिया भर से लाखों बौद्ध अनुयाई एकट्ठा होकर हर साल अशोक विजयादशमी एवं 14 अक्टूबर के दिन इसे मुख्य रुप से दीक्षाभूमि, महाराष्ट्र के साथ-साथ अब सारे भारत में मनाते हैं। इस उत्सव को स्थानीय स्तर पर भी मनाया जाता है। 20 वीं सदी के मध्य में बोधिसत्व, भारत रत्न, विश्व ज्ञानपुंज, सिंबल ऑफ नॉलेज डॉ॰ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने अशोक विजयादशमी के दिन 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अपने 5,00,000 (5 लाख से अधिक) अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था। 

ज्येष्ठ पूर्णिमा  इस दिन महान सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा 5 अर्हतों (संघ, गुट) के साथ श्रीलंका गए थे। इसी दिन वहां के राजा देवानामप्रिय तिस्स से मिले और श्रीलंका में बुद्ध धम्म की शुरुआत की। सम्राट अशोक द्वारा बुलाई गई तीसरी धम्म संगीति का समापन हुआ।

बौद्ध धर्म में पूर्णिमा का विशेष महत्व है। बौद्ध जगत में आषाढ़ी पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, माघ पूर्णिमा और वैशाख पूर्णिमा को खास तौर पर मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि विश्वगुरु शाक्यमुनि भगवान् तथागत गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़ी हर पूर्णिमा को कोई न कोई घटना घटी है। नव-बौद्ध बुद्ध के अंतिम शब्दों - "अप्प दीपो भव" के माध्यम से बौद्धों के रूप में इस त्यौहार की प्रामाणिकता का दावा करते हैं, जिसका अर्थ है "अपना प्रकाश स्वयं बनो।" 

॥भवतु सब्ब कल्याणं॥

'भग्गरागोति, भग्गदोसोति, भग्गमोहोति, भग्ग किलेसोति, भग्गमानोति भगवा'

पालि साहित्य में  "भगवान्" का मतलब ईश्वर या परमेश्वर नहीं है। पालि भाषा में 'भगवान्' शब्द का अर्थ उन अर्थों से सर्वथा भिन्न है, जिन अर्थों में यह शब्द आजकल प्रचलित है।

भगवान् का अर्थ :-

भग्ग + वान = भगवान 

भग्ग = भग्भंजन (नष्ट) करना, भंग करना,  तोड़ना, भाग करना, विभाजन, विश्लेषण करना, उपलब्धि को बाँटना आदि।

वान = तृष्णा (इच्छा), धारणकर्ता आदि।

जिसने अपनी तृष्णाओं को भंग कर दिया वह भगवान् है अर्थात् जिस मानव ने जीवन में सभी तृष्णाओं, इच्छाओं, रागों, द्वेषों, वासनाओं, मोहों, अहम्मन्यताओं का भंजन / नष्ट किया हो, उस महान मानव को  "भगवान्" कहा जाता है। इसी अर्थ में महामानव तथागत गौतम बुद्ध को भगवान् कहा जाता है।

तथागत का अर्थ :-

तथ्य + आगत = तथागत 

तथ्य = सत्य (सच्चाई )

आगत = अवगत (सचेत, आगाह करना) 

अर्थात् तथ्य के साथ सच्चाई से अवगत करने वाले तथागत कहे जाते हैं, जो कि "बुद्ध" हैं। तथागत का पालि भाषा में मतलब 'यथाचारी' या 'तथाचारी'बोधिसत्व उसे कहते हैं, जिसे सम्यक संबोधी (मानवीय प्रज्ञा, सही ज्ञान) हासिल हुई है, जो महान दया से प्रेरित, बोधिचित्त जनित, सभी संवेदनशील प्राणियों के लाभ के लिए सहज इच्छा से बुद्धत्व प्राप्त किया है।

1. गौतम बुद्ध का जन्म कब हुआ था ? → 563 ई०पू०

2. गौतम बुद्ध का जन्म स्थान का नाम क्या है ? → कपिलवस्तु के लुम्बिनी नामक स्थान

3. बुद्ध के अनुयायी कितने भागों में बंटे थे ? → दो भिक्षुक और उपासक

4. जिस स्थान पर बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति की थी, वह स्थान क्या कहलाया ? → बोधगया

5. गौतम बुद्ध के पिता का नाम क्या था ? → शुद्धोधन

6. बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे ? → गौतम बुद्ध

7. सिद्धार्थ के गृह त्याग की घटना को बौद्ध धर्म में क्या कहा जाता है ? → महाभिनिष्क्रमण

8. बुद्ध ने अपना प्रथम गुरु किसे बनाया था ? → आलारकलाम

9. महात्मा बुद्ध के पत्नी का नाम क्या था ? → यशोधरा

10. गौतम बुद्ध के पुत्र का नाम क्या था ? → राहुल

11. किसे Light of Asia के नाम से जाना जाता है ? → महात्मा बुद्ध

12. गौतम बुद्ध के बचपन का नाम क्या था ? → सिद्धार्थ

13. गौतम बुद्ध के सारथी का नाम क्या था ? → चन्ना

14. तृतीय बौद्ध संगीति कहाँ हुआ था ? → पाटलिपुत्र

15. गौतम बुद्ध के सबसे प्रिय और आत्मीय शिष्य कौन थे ? → आनंद


 

16. गौतम बुद्ध कितने वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सत्य की खोज में निकाल पड़े ? → 29 वर्ष

17. सबसे अधिक संख्या में बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण किस शैली में किया गया था ? → गांधार शैली

18. बौद्ध का परम धर्म लक्ष्य है → निर्वाण

19. बुद्ध ने अपने प्रथम गुरु से कौन सी शिक्षा प्राप्त की ? → सांख्य दर्शन

20. गौतम बुद्ध के दुसरे गुरु का नाम क्या था ? → रुद्रक

21. उरुवेला में कितने ब्राह्मण बुद्ध के शिष्य बने ? → पांच

22. बुद्ध के पांचों शिष्य के नाम क्या थे ? → कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, अस्सागी और महानामा

23. 35 वर्ष की आयु में बिना अन्न-जल ग्रहण किए आधुनिक बोधगया में निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर, पीपल वृक्ष के निचे कितने वर्ष की कठिन तपस्या के बाद बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई ? → 6 वर्ष

24. ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ को क्या कहा गया ? → गौतम बुद्ध और तथागत

25. सिद्धार्थ का गोत्र क्या था ? → गौतम

26. गौतम बुद्ध को किस रात्रि के दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई ? → वैशाखी पूर्णिमा

27. बौद्धधर्म के त्रिरत्न कौन-कौन है ? → बुद्ध, धम्म और संघ

28. बौद्ध धर्म में प्रविष्टि को क्या कहा जाता था ? → उपसम्पदा

29. बुद्ध के अनुसार देवतागण भी किस सिद्धान्त के अंतर्गत आते है ? → कर्म के सिद्धान्त

30. महात्मा बुद्ध की मृत्यु कब और कहाँ हुई थी ? → 483 ई०पू० में कुशीनगर उत्तर प्रदेश


 

31. महात्मा बुद्ध की मृत्यु की घटना को बौद्ध धर्म में क्या कहा गया है ? → महापरिनिर्वाण

32. महात्मा बुद्ध द्वारा दिया गया अंतिम उपदेश क्या था ? → “सभी वस्तुए क्षरणशील होती है अतः मनुष्य को अपना पथ-प्रदर्शक स्वयं होना चाहिए

33. गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया था ? → वाराणसी के निकट सारनाथ

34. उपदेश देने की इस घटना को क्या कहा जाता है ? → धर्मचक्रप्रवर्तन

35. सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म में किसने दीक्षित किया था ? → मोगलीपुत्त तिस्सा

36. चतुर्थ बौद्ध संगीति कहाँ हुआ था ? → कुण्डलवन कश्मीर

37. महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश को किस भाषा में दिया ? → पाली

38. प्रथम बौद्ध संगीति किसके शासन काल में हुआ था ? → अजातशत्रु

39. बौद्धों का सर्वाधिक पवित्र त्योहार क्या है ? → वैशाख पूर्णिमाति गौतमी

40. भारत से बाहर बौद्ध धर्म को फैलाने का श्रेय किस राजा को जाता है ? → सम्राट अशोक

41. बुद्ध के प्रथम दो अनुयायी कौन कौन थे ? → काल्लिक तपासु

42. बौद्ध धर्म को अपनाने वाली प्रथम महिला कौन थी ? → बुद्ध की माँ प्रजाप

43. बुद्ध की प्रथम मूर्ति कहाँ बना था ? → मथुरा कला

44. धार्मिक जुलूस की शुरुआत सबसे पहले किस धर्म से शुरू की गयी थी ? → बौद्धधर्म

45. वैशाख पूर्णिमा किस नाम से विख्यात है ? → बुद्ध पूर्णिमा

46. बुद्ध ने तृष्णा की घटना को क्या कहा है ? → निर्वाण

47. अनीश्वरवाद को मानने वाले कौन-कौन धर्म है ? → बौद्धधर्म एवं जैनधर्म

48. इनके मा का नाम था ? → मायादेवी

49. महात्मा बुद्ध के सौतेली मा का नाम क्या था ? → प्रजापति गौतमी

50. बुद्ध ने किसके प्रमाणिकता को स्पस्टतः नकार दिया था ? → वेदों के

*~1971 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पेरियार रामास्वामी नायकर और पेरियार ललई सिंह यादव बौद्ध की सच्ची रामायण की सुनवाई के दौरान यह साबित किया गया है कि रामायण काल्पनिक महाकाव्य है , कोई इतिहास नहीं है , इसलिए राम भी काल्पनिक पात्र हैं।

**सिख सम्प्रदाय में कार्तिक पूर्णिमा का दिन प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था।


टिप्पणीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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Monday, 12 August 2024

दंगे देश को नंगे करते हैं : गोलेन्द्र पटेल

बेरोज़गारी व्यक्ति को बर्बरता की ओर ढकेलती है!


आह! वेदना हो रही है वायरल 

इंसानियत से बड़ी कोई चीज़ नहीं

संवेदना को महसूस करने के लिए 

संगीत काफ़ी है 


बेरोज़गारी व्यक्ति को बर्बरता की ओर ढकेलती है!


भीड़ अँधी-बहरी ही नहीं, बल्कि बर्बर भी होती है 

ओह! राजनीतिक उथल-पुथल की ख़बरें आ रही हैं 

तख़्त गिराए जा रहे हैं, ताज उछाले जा रहे हैं


ये आक्रोश, गुस्सा और घृणा के दिन हैं

करुणा! भाषा में क्रूरता कूज रही है 

क्योंकि, मानवाधिकार के ख़िलाफ़ साम्प्रदायिक हथियार हैं

चीख़ और चुप्पी के बीच से समझदारी गायब है 

दुविधा और उदासीनता के स्वर ऊँचे हैं

लोग ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे हैं 

प्रगतिशीलजन अमानवीय घटनाओं पर नहीं बोल रहे हैं 

बुद्धजीवी परजीविता और आतंकवाद की राह पकड़ रहे हैं 

जन प्रतिरोध नया सवेरा लाने में असमर्थ है 

हक़ और हुकूमत के बीच लड़ाई जारी है 


स्वतंत्रता और स्वाधीनता से कोसों दूर 

जो संवेदनशील हैं, वे प्रतिक्रियावादी हैं 

वे हवा में अमन, चैन, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की कामना कर रहे हैं


वे कह रहे हैं,

दंगे देश को नंगे करते हैं 

उस देश में उनके धर्म के लोग 

प्रताड़ित किये रहे हैं, मारे जा रहे हैं 

उनकी स्त्रियों की इज़्ज़त लुटी जा रही है 

उनके देवों के ठीहे पर दैत्यों का कब्ज़ा हो गया है

उनके घर जलाये जा रहे हैं 

उनके पुरखों की प्रतिमाएँ तोड़ी जा रही हैं

लूट, हत्या, बलात्कार, दरिंदगी के दृश्य सामने आ रहे हैं 

सड़कें ख़ून की नदियाँ हो चुकी हैं 

उनके रिश्तेदार मृत्यु को करीब से देख रहे हैं

वहाँ अत्याचार की ऊँची अनुगूँज है 

मानवता ख़तरे में है

कट्टरपंथियों ने देश पर कब्ज़ा कर लिया है

आग में आज़ादी स्वाहा हो चुकी है 

पड़ोसी सरहदों पर शरणार्थियों का सैलाब है!


वे कह रहे हैं,

सांस्कृतिक जातीय अस्मिताबोध के लिहाज़ से 

सताये जाने वाले अल्पसंख्यक अपने हैं

उन पर ख़ूब हमले हो रहे हैं 

भूखों के कितने बुरे सपने हैं?

उनके चीत्कार के पक्ष में कोई चेतावनी नहीं है

उस देश की घटनाएँ दूसरे देश के लिए बेहद चिंताजनक हैं

उस देश के हालातों को लेकर इस देश में राजनीति हो रही है


वह देश अल्पसंख्यकों एवं बहुसंख्यकों के बीच 

क़ब्रिस्तान होने से बचना चाह रहा है 

कोई उसका सुन नहीं रहा है, आह! राष्ट्र रो रहा है...

क्रांति काल बन चुकी है 


इस समय जाति-धर्म पर बोलना ठीक नहीं है 

लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है 

कि उनके आरक्षण विरोधी संघर्ष 

और अपने आरक्षण विरोध के बीच कोई समानता नहीं है

कि यदि ताकतवर को और ताकतवर बनने के लिये

आरक्षण दिया जाएगा,

तो ऐसा ही होगा


ख़ैर, देश का दर्द से दायित्व की ओर जाना 

पुनः खड़ा होना है

वह अपने पैरों पर खड़ा होगा यथाशीघ्र 

ऐसा विश्वास है दुनिया के दुखी जन में, 

उस देश के नागरिकों में

जो अभी जल रहा है

जो अस्थिरता के ज्वार में तबाह हो रहा है!


(©गोलेन्द्र पटेल /13-08-2024)

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Saturday, 20 July 2024

तुझसे डर नहीं मृत्यु (आत्मकथा)

तुझसे डर नहीं मृत्यु


आसमान नीचे देख रहा है


फूल की व्यथा 

रंग नहीं, गंध कहती है 


खेत की आत्मकथा 

कलम से नहीं, कुदाल से लिखी जाती है 

किस के हाथों में कुदाल है?

किस के दिल में फाल है?

किस के दिमाग़ के स्मृतिकक्ष में कोई जीवित पात्र है?

लेखन में कौन ईमानदार है?

सच लिखने का साहस किस में है?

किस का जीवन आलोक पुंज है?

किस की प्रत्येक वाणी में महाकाव्य-पीड़ा है?

कौन जानता है आँसू की क़ीमत?

भाषा में कितनी दुखी इड़ा है!

सागर शांत है

सड़क पर सन्नाटा पसरा है

जंगल बोल रहा है कि पहाड़ का घाव गहरा है 


वन-बुद्धिजीवी! जन-बुद्धिजीवी!

यादें ज़िन्दा रहेंगी...


सफ़र के संधि स्थल पर 

दु:ख में तपे हुए इंसान की कथनी-करनी में कोई अंतर नहीं होता 


न तो मैं जूठन पढ़कर विचलित हुआ 

न ही मुर्दहिया 

न ही कोई जातिदंश की दस्तावेज़

न ही कोई अपमानबोध की अंतहीन कथा 

न ही कोई अन्तरावलंबित समाज की अंतर्कथा पढ़कर 


मुझे आधी आबादी की आत्मकथाएँ भी नहीं रुला पातीं

ऐसा नहीं है कि उनमें क्षमता नहीं है 

या फिर उनमें वह आग नहीं है 

जो हृदय में रोष का राग छेड़ सके

जो करुणा को क्रोध में तब्दील कर सके

अन्याय के ख़िलाफ़ 


अस्मिता और अस्पृश्यता की कितनी ऊँची अनुगूँज है! 


इस वक्त वेदना के वाक्य विद्या से नहीं,

बल्कि करुणा से उपजते हैं 


जो इंसान बुरे अनुभव से गुज़रा है 

या अपने किसी स्वरूप को गुज़रता हुआ देख रहा है 

वह लहुलुहान दृश्य से जुड़ता तो है 

पर, उसकी आत्मा गीली नहीं होती है 

उसके कंठ से तर्कवादी तान के साथ 

संघर्ष का संगीत फूटता है 

उसका मन हरा होता है 

उसका विवेक सत्य पर संवेदनात्मक शब्द कूटता है

जैसे कोई वैद्य जड़ी-बूटी 


यदि रात का संबंध ख़ुद से है 

तो बात कोई भी करे

वह अपनी ही है


दिन अमानवीय घटनाओं पर चुप क्यों है?


दीन हो चुकी नदी चीख रही है 

रेत कविता सुना रही है

आत्मकथा लिख रही है नहर 

और नाव गढ़ रही है कहानी 

सरकार की तरह 

मगर, मछलियों को द्वीप के देवता पर संशय है!

वे पानी के बाहर कहती हैं 

कि तुझसे डर नहीं मृत्यु!


(©गोलेन्द्र पटेल / 20-07-2024)

कवि परिचई :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि व लेखक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से नेट।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : उत्तम देवी
पिता : नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं।

लम्बी कविताएं : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' एवं 'दुःख दर्शन'


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

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