Thursday, 18 December 2025

कहानी: कर्ज खेत में नहीं उगता, शरीर में उतर आता है || गोलेन्द्र पटेल

कहानी: कर्ज खेत में नहीं उगता, शरीर में उतर आता है


1. (साँझ का समय — खेत की मेड़)

सूरज आधा डूब चुका था।
मिंथुर गांव के बाहर वही पुरानी मेड़, जहाँ कभी बच्चे खेलते थे, आज दो किसान बैठे थे—रोशन और शिवाजी।
शिवाजी ने बीड़ी सुलगाई।
धुएँ का एक छल्ला बनाकर बोला—
“आज खेत में गया था?”
रोशन ने सिर हिलाया—
“अब रोज़ नहीं जाता, शिवा। शरीर साथ नहीं देता।”
“शरीर?”
शिवाजी ने उसकी ओर देखा—
“खेत से पहले आदमी टूटता है क्या?”
रोशन हल्का-सा हँसा।
“अब हाँ।”
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर शिवाजी बोला—
“लोग कहते हैं—किसान आत्महत्या कर लेता है।
पर कोई ये नहीं पूछता कि मरने से पहले किसान कितनी बार मारा जाता है।”
रोशन ने मिट्टी उठाकर हथेली में मसल ली।
“मरना आसान होता है, शिवा।
जीते रहना भारी होता है।”

2. (कर्ज की शुरुआत)

शिवाजी:
“तेरा कर्ज कब शुरू हुआ था?”
रोशन:
“जिस दिन मैंने सोचा कि बच्चों का भविष्य खेत से बड़ा होना चाहिए।”
शिवाजी:
“मतलब?”
रोशन:
“मतलब डेयरी।
सोचा—खेती भगवान भरोसे है, दूध रोज़ निकलेगा।
दो गायें लाऊँगा।
दूध बेचेगा, घर चलेगा।”
शिवाजी:
“तो इसमें गलती क्या थी?”
रोशन:
“गलती सपने देखने में नहीं थी।
गलती यह मानने में थी कि साहूकार इंसान होता है।”
शिवाजी ने बीड़ी बुझाई।
“हम सब यही गलती करते हैं।”
रोशन:
“पहले दस हज़ार लिए।
फिर बीस।
फिर तीस।
हर बार लगा—फसल आते ही लौटा दूँगा।”
शिवाजी:
“और फसल?”
रोशन:
“फसल को भी कर्ज़ का पता चल गया था।”
दोनों हँस पड़े,
पर हँसी में जान नहीं थी।

3. (बारिश, बीमारी और साहूकार)

शिवाजी:
“मेरे यहाँ भी वही हुआ।
बारिश या तो आती ही नहीं
या ऐसी आती है कि खेत बहा ले जाती है।”
रोशन:
“हम बीज बोते हैं, शिवा—
पर मौसम सूदखोर है।
ब्याज समेत काट लेता है।”
शिवाजी:
“साहूकार घर आने लगे थे?”
रोशन:
“पहले फोन।
फिर दरवाज़ा।
फिर आंगन।
फिर सीधे सीने पर।”
शिवाजी:
“मेरे घर भी आए थे।
बच्चों के सामने बोले—
‘तेरे बाप का खेत अब हमारा है।’”
रोशन:
“मेरे यहाँ बोले—
‘अब गिनती नहीं, हिसाब चलेगा।’”

4. (कर्ज का पहाड़)


शिवाजी:
“एक लाख से चौहत्तर लाख कैसे हो गया, रोशन?”
रोशन देर तक चुप रहा।
फिर बोला—
“जैसे आदमी का डर बढ़ता है,
वैसे काग़ज़ पर रकम बढ़ती है।”
शिवाजी:
“हम पढ़े-लिखे नहीं,
इसलिए काग़ज़ हमें डराते हैं।”
रोशन:
“डराते नहीं, शिवा—
वे हमें हमारी औक़ात बताते हैं।”

5. (बेचने की शुरुआत)

शिवाजी:
“तूने ज़मीन बेची?”
रोशन:
“पहले आधी।
फिर बाकी।”
शिवाजी:
“घर?”
रोशन:
“घर तो बस दीवारें थीं।
असली घर तो उसी दिन टूट गया था।”
शिवाजी:
“पत्नी ने कुछ कहा?”
रोशन:
“उसने कहा—
‘जान बची रहे, बस।’”
शिवाजी ने गहरी सांस ली।
“और साहूकार?”
रोशन:
“उन्होंने कहा—
‘अब शरीर बचा है।’”

6. (किडनी प्रसंग)

शिवाजी ने चौंककर देखा।
“शरीर?”
रोशन:
“हां।
एक ने बड़े आराम से कहा—
‘किडनी बेच दे।’”
शिवाजी:
“ऐसे?”
रोशन:
“ऐसे जैसे बीज बदलने की सलाह दे रहा हो।”
शिवाजी के हाथ कांपने लगे।
“और तू?”
रोशन:
“मैं उस रात पहली बार
अपने शरीर को
अपने खेत की तरह देखने लगा।”

7. (देह की कीमत)

शिवाजी:
“डर नहीं लगा?”
रोशन:
“डर था।
पर डर से बड़ा था—अपमान।”
शिवाजी:
“किस बात का?”
रोशन:
“कि मेरे बच्चे
कर्ज़दार के बेटे कहलाएंगे।”
शिवाजी:
“और तू चला गया…”
रोशन:
“हाँ।
कोलकाता।
फिर कंबोडिया।”

8. (अस्पताल)

शिवाजी:
“ऑपरेशन के वक्त?”
रोशन:
“डॉक्टर ने पूछा—
‘स्वेच्छा से दे रहे हो?’”
शिवाजी:
“और तूने?”
रोशन:
“कहा—
‘जब सारे रास्ते बंद हो जाएं,
तो मजबूरी स्वेच्छा बन जाती है।’

9. (पैसे और धोखा)

शिवाजी:
“आठ लाख मिले थे न?”
रोशन:
“हाँ।
हाथ में आए,
हाथों में रुके नहीं।”
शिवाजी:
“कर्ज खत्म?”
रोशन:
“नहीं।
काग़ज़ बोला—
‘अब भी बाकी है।’”
शिवाजी की आँखें भर आईं।
“तो फिर शरीर क्यों लिया?”
रोशन:
“क्योंकि इस देश में
कर्ज कभी पूरा नहीं होता—
बस आदमी खत्म हो जाता है।”

10. (लाओस)

शिवाजी:
“फिर विदेश गया?”
रोशन:
“हाँ।
कहा—नौकरी मिलेगी।”
शिवाजी:
“और मिली?”
रोशन:
“गुलामी।”
शिवाजी:
“मतलब?”
रोशन:
“पासपोर्ट छीन लिया।
दिन-रात काम।
मार।”

11. (बचाव)

शिवाजी:
“बच कैसे गया?”
रोशन:
“एक संदेश।
बस एक।”
शिवाजी:
“किसे?”
रोशन:
“एक आदमी को,
जो शायद अभी इंसान था।”

12. (वापसी)

शिवाजी:
“अब क्या करेगा?”
रोशन:
“अब जीने की कोशिश।”
शिवाजी:
“किसलिए?”
रोशन:
“ताकि मेरे बच्चे
कभी अपनी देह पर
दस्तखत न करें।”

13. (कर्षित कृषककथा)


शिवाजी बोला—
“कर्ज खेत में नहीं उगता, रोशन।
वह आदमी की रीढ़ में उतरता है।”
रोशन ने आसमान देखा—
“और जब रीढ़ टूट जाती है,
तो अख़बार में
एक लाइन छपती है—
‘किसान ने आत्महत्या कर ली।’”

14. (अंतहीन दुःखगान)

सूरज पूरी तरह डूब चुका था।
दो किसान अंधेरे में बैठे थे।
शिवाजी बोला—
“हम मरते नहीं, रोशन।
हमें धीरे-धीरे मारा जाता है।”
रोशन ने सिर हिलाया।
“और जब तक हमारी बातें
आपस में ही रह जाती हैं,
तब तक यही होता रहेगा।”
दोनों उठे।
घर की ओर चले।
खेत पीछे रह गया—
जैसे कोई गवाह,
जो सब कुछ देखता है,
पर कुछ कह नहीं पाता।
★★★

कहानीकार: गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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Saturday, 6 December 2025

माँ विंध्यवासिनी विश्वविद्यालय, मिर्ज़ापुर के साथियों के लिए दो गीत

माँ विंध्यवासिनी विश्वविद्यालय, मिर्ज़ापुर के साथियों के लिए दो गीत:-

1).

विंध्य की गोद में नव प्रज्ञा-दीप

हरित नभों की जोत जगा कर,

ज्ञान-द्युति का दीप जलाता—

हमारा यह विश्वगुरु-आलय,

उषा-सा नवदिन ले आता।

सभ्यता के प्राचीन सुरों में

नव-विज्ञान का स्पंदन हो—

मानव-मूल्य, समता–करुणा का

अविरल, अमृतमय वंदन हो।

हमारा विश्वविद्यालय—

भारत–भाव का शाश्वत परिसर—

नभ से ऊँचा स्वप्न प्रखर।

जहाँ गंगा–यमुना का संगम,

जहाँ हिमगिरि की छाया वंदित,

जहाँ बुद्ध, कबीर, तुलसी के

स्वर की स्मृति अनन्त अखंडित—

वहीं खड़ा यह ज्ञान–निकेतन,

अक्षर–अंजन, तप की वाणी;

शांति, साहस, सत्य, विवेक का

सदियों से रचता अभिराम प्राणी।

हमारा विश्वविद्यालय—

संस्कृति–विज्ञान का पुल निर्मल,

मानव–धर्म का दीप उज्ज्वल।

जनपद–जननी के गौरव-अंचल

में अंकित गौरव-साधन यह;

कृषि, कला, प्रज्ञा, तकनीकि

सबका संतुलित आवाहन यह।

राजर्षियों की संतति इसका

स्वप्न देशनिर्माण बनाता—

चिंतन की गंगा–धार यहाँ से

नवयुग का समुदित मंत्र सुनाता।

हमारा विश्वविद्यालय—

नवोन्मेष का पावन स्थल,

श्रम–सृजन का गान सफल।

राग मिर्ज़ापुरी, वेदध्वनि,

संघर्षों की गाथा संग—

यहाँ धरा और आकाश मिलें,

शिल्प, नृत्य, कला, विज्ञान के रंग।

सद्भावों के पुष्प खिले हैं,

धर्म–समन्वय का सहज स्वरूप;

सत्यशोध के तप–उद्यान में

खिलता मानवीयता का रूप।

हमारा विश्वविद्यालय—

एकता का आलोक धरा पर,

विश्वमानव के स्वप्न-सुमन भर।

अनुसंधान के विस्तृत वन में

उद्भवते नव-विचार अनंत;

योग्यता के मेरु-शिखर को

छू लेता यह उत्साहित अंतःकंत।

कौशल, कर्म, नवाचारों की

प्रज्ञा-धारा निरंतर बहती—

अदृश्य सत्य के अंधकार में

यह दीपक बनकर राह कहती।

हमारा विश्वविद्यालय—

प्रयासों का पावन आयतन,

युगधर्म का उजला स्पंदन।

जहाँ शिक्षक ममता की छाया,

विद्यार्थी साहस का संबल लें;

जहाँ हर आँगन से उठती

‘तेजस्विनावधीतमस्तु’ की वंदना ध्वनि प्रतिदिन खेलें—

वही हमारा भवन सुभग यह,

कर्मभूमि, चिंतन का आश्रम;

ज्ञान-दीपों के संभारों से

दीप्तिमय होता प्रतिमुहूर्रम।

हमारा विश्वविद्यालय—

उत्कर्ष-मार्ग का अमृत-थल,

नव-जीवन का शांति-कुंज कल।

नवयुग के उजले पंखों पर

उड़ता यह शत-शोध धाम;

मानवता के गौरवगान में

अपना जोड़ रहा अविराम नाम।

वसुधैव-कुटुम्बकम् की ध्वनि

प्रत्येक श्वास में बसी रहे—

राष्ट्र–समृद्धि, विश्व–प्रगति का

सुदृढ़ संकल्प नवीन रहे।

हमारा विश्वविद्यालय—

हम सबके स्वप्नों का आधार,

उज्ज्वल भारत का उजला द्वार।

विंध्याचल की पावन वेला,

ज्ञान-सुमन फिर खिलने लगे,

माँ की छत्र-छाया पाकर,

पथ उजियारे मिलने लगे।

देवरी-कला की पावन धरती,

नव-अंकुरिता नव ज्योति यहाँ,

गंगा-जमुनी संस्कारों से,

गूँजे शिक्षा की प्रीति यहाँ।

माँ विन्ध्यवासिनी के नाम पर,

उठता है नव विश्व-विहार,

जहाँ परंपराएँ मिलकर रचतीं,

नव विज्ञानों का सत्कार।

ग्रामीण अंचल का हर बालक,

स्वप्न यहाँ आकार करे,

ज्ञान-शक्ति के संग-संग अब,

उज्ज्वल अपना संसार करे।

नारी-शक्ति का ध्वज फहराता,

यह शिक्षा-मंदिर क्षितिज तले,

हर बेटी को अधिकार मिले,

ऊँची उड़ानें भरने चले।

सशक्त बने हर गृह-आँगन,

स्वावलंबन की सीख मिले,

माँ अष्टभुजा की महिमा-सा,

साहस-पथ पर दीख मिले।

गाँव-गाँव तक फैल रहा है,

नव विकास का शुभ संवाद,

ज्ञान बने उपजाऊ धरती,

शिक्षा बने जीवन-उत्साद।

कृषि-शोध, उद्यम, लोक-कला—

सबको मिलकर सँवारेंगे,

मिर्ज़ापुर-भदोही-सोनभद्र के

स्वप्न नए अब निखारेंगे।

चुनार-दुर्ग की गाथाएँ हों

या कजरी-धुन की मधुर पुकार,

विश्वविद्यालय का यह कुलगीत,

जोड़ रहा सबको बारंबार।

विंधम दरी की जल-ध्वनि-सा,

सतत बहें अनुसंधान यहाँ,

कालीखोह की तप-गंध-सा,

जागे नित ज्ञान-ध्यान यहाँ।

कालीन-कला, पीतल-शिल्प,

लोकगायन की शालीन लय,

परंपरा संग आधुनिकता का,

यहाँ रच रहा नवीन अभय।

छात्र यहाँ से जाएँ आगे,

संस्कृति का हो मान सदा,

समग्र शिक्षा, सम्यक दृष्टि—

यही कुलगीत की पावन वंदना।

★★★

2).

विन्ध्यगिरि का नव विश्वविद्यालय

विन्ध्यगिरि की छाँह सुहानी, गंगा-धारा की यह भूमि,

ज्ञान-जागरण की पावन बेला, उजली होती आज यहीं।

माँ की महिमा, शक्ति स्वरूपा, देती हमको सत्य-दिशा,

उनके चरण चिह्न पथ-दीपक, बनते हैं शिक्षा की आशा।

देवी के पावन मंदिर से, जब-जब उठती मंत्र-धुनें,

वही स्वर शिक्षा-पथ पर अब, नव उजियारे भरते हैं।

विंध्य क्षेत्र का गौरव बनकर, उगता नव विश्वविद्यालय,

जहाँ पुरातन मर्म सहेजा, मिलता आधुनिकता का साथ।

मिर्ज़ापुर की कजरी-धुन में, बिरहा का उत्साह नया,

लोक-राग से जुड़कर जगता, नव युग का विश्वास नया।

चुनार-दुर्ग की शौर्य परंपराएँ, देती मन में नव संबल,

गंगा-जमुनी संस्कृति का यह, शिक्षा-मंदिर अद्भुत स्थल।

भदोही के कालीनों जैसी, सूक्ष्म शिल्प की स्नेह लय,

सोनभद्र की हरियाली जैसी, पावन आशा की मधुर छटाएँ।

इन तीनों का संगम बनकर, यह शिक्षा का युग मंदिर,

ज्ञान-वृक्ष की इस छाया में, मिले सभी को उजला पथ।

गंगा पवन पवित्र धारा-सा, हमारा लक्ष्य स्वच्छ, सरल,

माँ विन्ध्यवासिनी की वंदना, करती मन को दृढ़, अविकल।

सत्य, सेवा, विज्ञान-शक्ति—तीनों मिलकर दें संदेश,

विद्यार्थी का प्रथम धर्म यही—मानवता का शुद्ध परिवेश।

पर्वत जितनी दृढ़ता लाएँ, सागर जितनी गहराई,

ज्ञान पताका रहे ऊँची, चाहे राह रहे कितनी कठिनाई।

अनुसंधान से नव-सृजन हो, श्रम-संस्कार से शक्ति मिले,

यही विन्ध्य की पावन गोद हमें, कर्म की ऊष्मा देती रहे।

सत्याग्रह की सीख पुरानी, काशी से विंध्य तक आई,

दलित, वंचित, ग्रामीण जनों की, शिक्षा-प्यास बुझाने भाई।

समान अवसर, सम्यक जीवन—यही हमारा दृढ़ संकल्प,

समानता के दीप जलाएँ—नव-विकास का यही विकल्प।

विंध्याचल की पावन वेला, ज्ञान-सुमन फिर खिलने लगे,

माँ की छत्र-छाया पाकर, पथ उजियारे मिलने लगे।

देवरी-कला की पावन धरती, नव-अंकुरिता नव ज्योति यहाँ,

गंगा-जमुनी संस्कारों से, गूँजे शिक्षा की प्रीति यहाँ।

नारी-शक्ति का ध्वज फहराता, यह शिक्षा-मंदिर क्षितिज तले,

हर बेटी को अधिकार मिले, ऊँची उड़ानें भरने चले।

गाँव-गाँव तक फैल रहा है, नव विकास का शुभ संवाद,

ज्ञान बने उपजाऊ धरती, शिक्षा बने जीवन-उत्साद।

चुनार-दुर्ग की गाथाएँ हों या कजरी-धुन की मधुर पुकार,

विश्वविद्यालय का यह कुलगीत, जोड़ रहा सबको बारंबार।

परंपरा संग आधुनिकता का, यहाँ रच रहा नवीन अभय,

समग्र शिक्षा, सम्यक दृष्टि—यही कुलगीत की पावन वंदना।

माँ विन्ध्यवासिनी की कृपा से, जागे मन में दृढ़ विश्वास,

ज्ञान-साधना के उजियारे से, हो विंध्य-भूमि का उत्कर्ष-विकास।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

संपर्क सूत्र :-

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

मोबाइल नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


नोट: उपर्युक्त दोनों गीत “माँ विंध्यवासिनी विश्वविद्यालय, मिर्ज़ापुर” के कुलगीत नहीं हैं, ये मिर्ज़ापुर के साथियों के कहने पर यहाँ प्रस्तुत है। आप इन्हें पढ़कर/ गुनगुनाकर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

Friday, 7 November 2025

कवि गोलेन्द्र पटेल से संवाद : एक विशेष साक्षात्कार (कविता, दर्शन, समय और समाज पर विस्तृत वार्ता)

 

कवि गोलेन्द्र पटेल से संवाद : एक विशेष साक्षात्कार

(कविता, दर्शन, समय और समाज पर विस्तृत वार्ता)

प्रश्नकर्ता: अर्जुन पटेल & इंद्रजीत सिंह

प्रश्न 1. आपकी कविताओं में समाज, दर्शन और प्रतिरोध — तीनों की सशक्त उपस्थिति दिखाई देती है। कविता की यह यात्रा आपके जीवन में कहाँ से आरंभ हुई?

गोलेन्द्र पटेल:

कविता मेरे लिए कोई अकस्मात घटना नहीं थी, यह भीतर की बेचैनी का स्वाभाविक विस्तार थी। गाँव-गली के जीवन, श्रमशील लोगों की हताश मुस्कानें और उनके भीतर छिपी करुणा ने मुझे लिखने के लिए विवश किया। जब भाषा में संवेदना ने दरवाज़ा खटखटाया, तभी कविता का जन्म हुआ। यह यात्रा समाज के दर्द से होकर शुरू हुई और अब दर्शन की ऊँचाइयों तक पहुँचने की कोशिश कर रही है।

***

प्रश्न 2. ‘तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव’ जैसी कविताएँ संवेदना और संघर्ष का दस्तावेज़ हैं। आपके काव्य की मुख्य चिंताएँ क्या हैं?

गोलेन्द्र पटेल:

मेरी कविताओं का केंद्र मनुष्य है—वह मनुष्य जो हाशिए पर है, जो संघर्षरत है, जो अपने अस्तित्व के लिए लड़ता है। मैं प्रेम, करुणा, असमानता और मुक्ति की बात करता हूँ। मेरे लिए कविता सिर्फ़ अनुभूति नहीं, एक वैचारिक प्रतिरोध है। मेरी चिंता यह है कि समाज में जो मौन हैं, उनकी आवाज़ कविता के माध्यम से गूँजे। ‘तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव’ में मित्रता, मुहब्बत, मानवता और मुक्ति की उदात्त अभिव्यक्ति है।

***

प्रश्न 3. आपकी लेखनी में दर्शन और लोक–चेतना साथ-साथ चलती है। क्या आप कविता को साधना मानते हैं या संघर्ष का माध्यम?

गोलेन्द्र पटेल:

कविता मेरे लिए दोनों है। यह साधना भी है और संघर्ष भी। साधना इसलिए कि यह भीतर के अंधकार को उजाला देती है और संघर्ष इसलिए कि यह बाहर के अन्याय को चुनौती देती है। कविता आत्मा और समाज के बीच सेतु है — एक पुल जो भीतर की चेतना से बाहर के परिवर्तन तक जाता है। मैंने ’दुःख दर्शन’ शीर्षक से एक लंबी कविता लिखी है, जिसमें तथागत बुद्ध, कबीर, गुरुनानक, गोरखनाथ, सरहपा से लेकर निराला, अज्ञेय एवं समकालीन कवियों के दुःख चिंतन के साथ अपने समय और समाज के दुःख का दार्शनिक अध्ययन किया है।

***

प्रश्न 4. आपके ऊपर किन कवियों, चिंतकों या आंदोलनों का प्रभाव रहा है?

गोलेन्द्र पटेल:

मुझे पर बुद्ध, सरहपा, कबीर, रैदास, तुकाराम, पलटूदास से लेकर फुले, अंबेडकर, पेरियार, राहुल सांकृत्यायन, मार्क्स, ओशो, स्टीफन हॉकिंगइत्यादि वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले कवियों, चिंतकों, विचारकों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों

के विचारों का प्रगतिशील प्रभाव है। मुझे कबीर की निर्भीकता, अंबेडकर की तर्कशीलता, लोहिया की सामाजिक दृष्टि और ओशो की मौन-चेतना ने प्रभावित किया। इन सबमें एक साझा तत्व है — बंधन तोड़ने की आकांक्षा। मैं इन्हीं से सीखता हूँ कि विचार तभी जीवित रहता है जब वह विद्रोह और करुणा दोनों को साथ लेकर चलता है।

***

प्रश्न 5. आपने ‘गोलेन्द्रवाद’ जैसी एक मौलिक वैचारिक अवधारणा रखी है। इसका मूल तत्व क्या है?

गोलेन्द्र पटेल:

गोलेन्द्रवाद किसी व्यक्ति की पूजा नहीं, बल्कि मनुष्य की मुक्ति का दर्शन है। यह विचार कहता है — "कला तब तक अधूरी है जब तक वह अन्याय के विरुद्ध नहीं खड़ी होती।"

गोलेन्द्रवाद मानवीय चेतना का विज्ञान है, जो भक्ति, दर्शन और समाज–सुधार — तीनों को एक बिंदु पर मिलाता है। यह वाद नहीं, आत्मजागरण की प्रक्रिया है।

“गोलेन्द्रवाद (Golendrism) मानवीय जीवन जीने की पद्धति है, जो जाति, धर्म, भाषा और भूगोल से निरपेक्ष, समय-सापेक्ष वैज्ञानिक दर्शन के साथ मानवतावाद पर केंद्रित है।”

मित्रता उसका मूलाधार है, मुहब्बत उसका प्रवहमान हृदय; मानवता उसका सत्यस्वरूप है और मुक्ति उसकी परम परिणति— यही गोलेन्द्रवाद का चतुष्कोण, जीवन और सृष्टि का समग्र दर्शन है।

***

प्रश्न 6. आज के बाज़ारवादी समय में कविता की भूमिका आप कैसे देखते हैं?

गोलेन्द्र पटेल:

आज कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘दृष्टि की स्वतंत्रता’ है। बाज़ार कविता को मनोरंजन में बदल देना चाहता है, पर सच्ची कविता मनोरंजन नहीं, मुक्ति का साधन होती है। जो कविता सत्ता को प्रश्न नहीं करती, वह केवल शब्दों का शृंगार है। मुझे विश्वास है कि कविता ही वह आख़िरी भाषा है जो मनुष्य को बचा सकती है और वही मानवता की मशाल जलाती रहेगी।

***

प्रश्न 7. आपकी कविताओं में बहुजन चेतना, स्त्री दृष्टि और वर्ग संघर्ष एक साथ गूँजते हैं। क्या आप अपने लेखन को किसी विशेष ‘वाद’ से जोड़कर देखते हैं?

गोलेन्द्र पटेल:

नहीं, मैं किसी वाद का कैदी नहीं हूँ, लेकिन मैं प्रत्येक ‘वाद’ से संवाद करता रहता हूँ। मैं अनुभव का कवि हूँ। मेरा लेखन दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, स्त्री, ट्रांसजेंडर और श्रमिक — इन सबकी सामूहिक चेतना से जन्म लेता है। मैं उन सबकी आवाज़ हूँ जिन्हें समाज ने ‘दूसरा’ या ‘तीसरा’ बना दिया। अगर किसी वाद से जोड़ना ही हो तो कह सकता हूँ — मेरा वाद मानववाद है, लेकिन वह भी संघर्षशील मानववाद।

***

प्रश्न 8. आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?

गोलेन्द्र पटेल:

मैं कविता को सोचकर नहीं लिखता। कविता पहले आती है, शब्द बाद में। विचार जब बहुत गहराई तक उतर जाते हैं और भाषा उन्हें रोक नहीं पाती, तब कविता फूट पड़ती है। कई बार एक पंक्ति महीनों तक भीतर गूँजती रहती है और जब उसका अर्थ पूरा होता है, तब वह कविता बन जाती है।

***

प्रश्न 9. आने वाले समय में आप किन परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं?

गोलेन्द्र पटेल:

मैं अभी “कल्कि-महाकाव्य” और “अंबेडकर के जीवन चरित पर केंद्रित महाकाव्य”, महाकाव्यात्मक लंबी कविता “पहाड़िन” पर काम कर रहा हूँ। यह श्रृंखला भविष्य के मनुष्य — विवेकशील, न्यायप्रिय और समतामूलक मनुष्य — की प्रतीकात्मक कथा है। इसके अतिरिक्त मैं “गोलेन्द्रवाद और समकालीन दर्शन” पर एक विस्तृत ग्रंथ तैयार कर रहा हूँ जो विचार और साहित्य के संबंध को नए सिरे से परिभाषित करेगा।

***

प्रश्न 10. नई पीढ़ी के कवियों और पाठकों के लिए आपका क्या संदेश है?

गोलेन्द्र पटेल:

मैं यही कहना चाहता हूँ —

“सिर्फ़ लिखो नहीं, जियो भी कविता को।”

“हम कविता का पाठ नहीं, जीवन में प्रयोग करें।”

कविता तभी सच्ची होती है जब कवि अपने शब्दों की जिम्मेदारी जीता है। नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे कविता को फैशन नहीं, चेतना के रूप में अपनाएँ। शब्दों की शक्ति समाज बदल सकती है, बशर्ते कवि उनमें आग और करुणा दोनों भर दे। हम शब्द, अग्नि और चेतना के प्रकाश को जनपक्षधर्मी बनायें।

***

सार:

कवि गोलेन्द्र पटेल के शब्दों में कविता आत्मा की औषधि है।....कविता कोई विलास नहीं — यह भीतर की क्रांति है। कविताएँ हमें याद दिलाती हैं कि भाषा तभी सार्थक है जब वह अन्याय के विरुद्ध खड़ी होती है और मनुष्य के पक्ष में बोलती है।

 

Friday, 31 October 2025

धूमिल: क्रांति का प्रार्थना-पत्र // धूमिल की कविताओं में समय, समाज और संवेदना

// धूमिल: क्रांति का प्रार्थना-पत्र //

“बाबूजी सच कहूँ—मेरी निगाह में

न कोई छोटा है

न कोई बड़ा है

मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है

जो मेरे सामने

मरम्मत के लिए खड़ा है।” ("मोचीराम" से)

सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ (9 नवंबर 1936 - 10 फ़रवरी 1975) की कविताएँ हिंदी की नई कविता के तीखे प्रतिरोधी स्वर हैं। इनमें ‘समय’, ‘समाज’ और ’संवेदना’ तीनों एक-दूसरे में घुले-मिले हैं। धूमिल की कविताएँ समय के भ्रष्टाचार, समाज के शोषण और निम्नवर्ग की पीड़ा को तीखे क्रोध में उकेरती हैं। बाबू, रिक्शेवाला, दलित, शोषित, भिखारी, किसान, मज़दूर उनकी संवेदना के केंद्र हैं। “समय मर चुका है” जैसे बिंब सत्ता-विरोधी विद्रोह जगाते हैं—क्रांति का प्रार्थना-पत्र।


धूमिल की कविताएँ—‘पटकथा’, ‘मोचीराम’, ‘नक्सलबाड़ी’, ‘रोटी और संसद’ तथा ‘अकाल दर्शन’—अपने समय की राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय सच्चाइयों का तीखा दस्तावेज़ हैं। वे सत्तर के दशक के भारत की विडंबनाओं, अन्यायों और मोहभंग से उपजी बेचैनी को स्वर देती हैं। ‘मोचीराम’ में वर्ग और पेशागत पहचान के भीतर छिपे आत्मसम्मान की गूंज है—यह कविता साधारण आदमी के भीतर छिपे बौद्धिक विवेक को उजागर करती है। ‘पटकथा’ और ‘रोटी और संसद’ सत्ता, लोकतंत्र और आम जन के बीच की गहरी खाई को उजागर करती हैं, जहाँ भाषा और राजनीति दोनों ही आम आदमी के विरुद्ध काम करती दिखती हैं। ‘नक्सलबाड़ी’ में विद्रोह को एक नैतिक ऊर्जा के रूप में देखा गया है—यह शोषित जनता के भीतर उभरती क्रांति की चेतना का प्रतीक है। वहीं ‘अकाल दर्शन’ संवेदना के सूखते स्रोतों और भूख से जूझते जीवन की करुण त्रासदी का बिंब है। इन कविताओं में धूमिल का काव्य-स्वर आक्रोश, करुणा और बौद्धिक ईमानदारी से निर्मित है। वे समय के साक्षी कवि हैं, जिनकी संवेदना समाज के हाशिए पर खड़े मनुष्य के साथ गहराई से जुड़ी है—इस प्रकार धूमिल की कविता अपने युग का नैतिक और वैचारिक दस्तावेज़ बन जाती है। ‘पटकथा’ का समय अपना वर्तमान है:-

“हर तरफ धुआँ है

हर तरफ कुहासा है

जो दाँतों और दलदलों का दलाल है

वही देशभक्त है

अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है—

तटस्थता। यहाँ

कायरता के चेहरे पर

सबसे ज्यादा रक्त है।

जिसके पास थाली है

हर भूखा आदमी

उसके लिये, सबसे भद्दी

गाली है।”

धूमिल की कविताएँ 1960-70 के दशक के भ्रष्ट जनतंत्र, नक्सल विद्रोह और आर्थिक संकट को तीखे व्यंग्य में उकेरती हैं। #समय को वे “पुरानी पटकथा” (पटकथा) मानते हैं—आजादी का वादा धोखा, जहाँ “समय मर चुका है”। #समाज शोषण का अखाड़ा है: "मोचीराम" में जूता सिलता मजदूर “न छोटा है, न बड़ा”—समानता की झूठी छवि उघाड़ी। "नक्सलबाड़ी" में संसद को “जंगल” कहा—किसान विद्रोह और सत्ता-दमन। "रोटी और संसद" में आर्थिक विषमता चित्रित: “एक बेलता है, एक खाता है, तीसरा खेलता है”—तीसरा सत्ता-खिलाड़ी। "अकाल दर्शन" में गांधी-छवि का दुरुपयोग, नेहरू युग का मोहभंग—“जनतंत्र की नग्नता”।

#संवेदना क्रोध में डूबी करुणा है। बाबू, मोची, किसान की पीड़ा कवि की पीड़ा बनती है। "मोचीराम" में संवाद से मानवीयता, "नक्सलबाड़ी" में संघर्ष-चेतना, "रोटी और संसद" में भूख की मार्मिकता। धूमिल पीड़ित को आवाज देते हैं—व्यंग्य हथियार, क्रोध जागरण। उनकी कविता “क्रांति का प्रार्थना-पत्र” है, जो पाठक को विद्रोह की प्रेरणा देती है। अंत में,

“जो मैं चाहता हूँ—

वही होगा। होगा—आज नहीं तो कल

मगर सब कुछ सही होगा।”

★★★


टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ युवा जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Tuesday, 7 October 2025

कवि रामेश्वर : जीवन, साहित्य और वैचारिक यात्राएँ || तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी

कवि रामेश्वर : जीवन, साहित्य और वैचारिक यात्राएँ


जन्म और प्रारंभिक जीवन :- कवि रामेश्वर का जन्म १६ जुलाई १९४४ को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद के ग्राम पिसौर में हुआ। यह गाँव वाराणसी के सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवेश से गहराई से जुड़ा हुआ है। रामेश्वर का बचपन भारतीय गाँवों की सादगी, लोकसंस्कृति और संघर्षशील जीवन के बीच बीता। यही ग्रामीण जीवनबोध आगे चलकर उनकी रचनात्मक चेतना का मूल स्रोत बना। वर्तमान में वे ग्राम भवानीपुर (पोस्ट-पिसौर, शिवपुर, वाराणसी – २२१००३) में निवासरत हैं।

शिक्षा और अध्यापन :- रामेश्वर ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने एम.ए. (हिन्दी), बी.एससी. और बी.एड. की उपाधियाँ अर्जित कीं। विज्ञान और साहित्य — इन दो पृथक धाराओं का समन्वय उनकी सोच और लेखन में स्पष्ट दिखाई देता है। वे लंबे समय तक शिक्षक रहे और सेवानिवृत्ति के पश्चात वर्तमान में स्वाध्याय एवं लेखन में संलग्न हैं। शिक्षा जगत में बिताए वर्षों ने उन्हें समाज के गहरे अनुभव दिए, जिन्हें उन्होंने अपनी कविताओं और गद्य में रूपांतरित किया।

रचनात्मक यात्रा और प्रमुख कृतियाँ :- रामेश्वर की रचनाएँ जीवन, समाज, राजनीति और लोक के जीवंत अनुभवों से गुँथी हुई हैं। उनकी रचनात्मकता में जनपक्षधरता और लोक-संवेदना केंद्रीय तत्व हैं। वे अपने समय के आम आदमी की पीड़ा, प्रतिरोध और आकांक्षा को स्वर देते हैं।

प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ :- ब्यूहजयी (खण्ड काव्य), नये मुहिम पर (काव्य संग्रह), घेराव टूट रहा है (कविता संग्रह), कटीले तारों के बाड़े (गद्य संकलन), ठहराव से मुठभेड़ लेते हुए (कविता संग्रह), आलोचना का लोक-चित्त (समीक्षात्मक लेख), लोक-संस्कृति का सफेद और स्याह पक्ष (लोक-तत्व और लोक-बोध पर आधारित आख्यान), अग्निपक्षी ! एक दंशगाथा (आत्मकथा), अग्निपक्षी ! एक दंशगाथा (आत्मकथा भाग-दो)

इन कृतियों में जीवन के संघर्ष, समाज की विषमता और बदलाव की चाह गहराई से व्यक्त हुई है। विशेष रूप से ‘अग्निपक्षी! एक दंशगाथा’ उनकी आत्मकथा होते हुए भी उनके युग का दस्तावेज़ बन जाती है — एक ऐसे व्यक्ति की कथा जो ज्वालामुखी के समान भीतर से धधकता है।

सम्पादन और पत्रकारी योगदान :- कवि रामेश्वर ने ‘सार्थवाह’ नामक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया। यह पत्रिका उनके वैचारिक और जनसांस्कृतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है। इसके माध्यम से उन्होंने अनेक रचनाकारों को मंच दिया और साहित्यिक विमर्श को लोक-केन्द्रित दृष्टि प्रदान की।

उनकी कविताएँ, समीक्षाएँ और संस्मरण जनपक्ष, जनमुख, कृति ओर, चौथी दुनियाँ, चौराहा साप्ताहिक, उत्तर प्रदेश, निष्कर्ष, हांक, अभिनव कदम, आइडियल एक्सप्रेस, स्वतंत्र भारत 'दैनिक' जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

पुरस्कार और सम्मान :- रामेश्वर की साहित्यिक सेवाओं को अनेक मंचों पर सराहा गया है। उन्हें प्राप्त प्रमुख सम्मान हैं —'मदर हलीमा अवार्ड' (प्रथम), निगार-ए-बनारस, 'हिन्दी साहित्य' एवं 'समाज-सेवा' सम्मान वाराणसी।

ये सम्मान उनके जनसरोकारों और सृजनात्मक प्रतिबद्धता की सार्वजनिक स्वीकृति हैं।

वैचारिक आधार और साहित्यिक प्रभाव:- “रामेश्वर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर जितना प्रभाव पुरखे कवि कबीर का है, उतना ही प्रभाव कथा सम्राट प्रेमचंद का भी है।”

वास्तव में, रामेश्वर की रचनाओं में कबीर का निर्भीक लोकस्वर, प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि और कार्ल मार्क्स के प्रगतिशील चिंतन — तीनों की संगति देखने को मिलती है। उनकी कविताएँ वर्गीय अन्याय, धार्मिक पाखंड और सामाजिक दमन के विरुद्ध प्रतिरोध का दस्तावेज़ हैं।

वे अपने समय के जनकवियों की परंपरा में आते हैं— तथागत बुद्ध, कबीरदास, निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, गोरख पाण्डेय, राजशेखर, धूमिल, पाश और ध्रुवदेव मिश्र पाषाण तक की यह परंपरा उन्हें गहराई से प्रभावित करती है।

रामेश्वर का नाम विशेष रूप से सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की मित्र परंपरा में भी उल्लेखनीय है। यह निकटता न केवल आत्मीय, बल्कि वैचारिक और कविताई धरातल पर भी महत्वपूर्ण रही है। दोनों कवियों में व्यवस्था-विरोध और जनपक्षीय चेतना समान रूप से विद्यमान है।

रचनाशैली और विषय-विस्तार :- रामेश्वर की कविता का स्वर संघर्षशील, ईमानदार और संवेदनशील है। वे कविता को केवल भावाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम मानते हैं। उनके यहाँ लोकजीवन की गंध है, किसानों-मजदूरों की पीड़ा है और सत्ता के विरुद्ध आक्रोश भी। उनके गद्य में आलोचनात्मक सूझ और लोक-संस्कृति के जटिल पक्षों की व्याख्या मिलती है।
उनकी भाषा सधी हुई, प्रवाहपूर्ण और सच्ची लोकभाषा के स्वाद से युक्त है।

समकालीन महत्त्व :- आज जब कविता का केन्द्र शहरों में सीमित होता जा रहा है, ऐसे समय में रामेश्वर जैसे कवि लोक और जन के स्वर को कविता में प्रतिष्ठित करते हैं। वे ‘घेराव टूट रहा है’ जैसी रचनाओं से आशा जगाते हैं कि साहित्य अभी भी संघर्षरत समाज के साथ खड़ा हो सकता है।

कवि रामेश्वर की रचनाएँ साहित्य के साथ-साथ समाज की आत्मा की दास्तान हैं। वे परंपरा और आधुनिकता, लोक और विचारधारा, संवेदना और विवेक — इन सबको एक ही धरातल पर जोड़ने वाले कवि हैं।
उनकी रचनात्मक दृष्टि भारतीय जनजीवन के लिए उसी तरह अनिवार्य है जैसे मिट्टी के लिए जल।

उनका जीवन-संदेश स्पष्ट है — “कविता का अर्थ केवल शब्द नहीं, बल्कि परिवर्तन की चेतना है।”

(कवि धूमिल की प्रतिमा, कवि रामेश्वर और गोलेन्द्र पटेल)

रामेश्वर जी की कृति तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी विचार, संस्मरण और समीक्षा का संगम है। इसमें कवि रामेश्वर के बहुआयामी रचनात्मक संसार की झलक है, जिसमें कविता, संस्मरण, समीक्षा, व्यंग्य और जनचिंतन का समावेश है। यह “नाजी फॉसिज्म के ख़िलाफ़ कविता” से लेकर “संस्मरण: संगीत, कला, साहित्य और धर्म पर ग़ज़ल गायक उस्ताद ‘गुलाम अली’ की सोच” तक कुल 39 इकाइयों और 111 पृष्ठों में है। इस पाथेय पुस्तक के लिए प्रिय पथप्रदर्शक व आत्मीय कवि रामेश्वर त्रिपाठी जी को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनायें सह सादर अभिवादन।

प्रथम संस्करण: 2025
मूल्य: 150₹
पृष्ठ: 111
प्रकाशक: सार्थवाह प्रकाशन, भवानीपुर, शिवपुर, वाराणसी-221003


★★★


टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Tuesday, 30 September 2025

भक्ति = प्रेम × श्रद्धा² (भक्ति का सूत्र)

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल द्वारा प्रस्तुत भक्ति का सूत्र :
भक्ति = प्रेम × श्रद्धा²

यह सूत्र गणितीय न होकर सांकेतिक और दार्शनिक है। इसका प्रयोजन है—भक्ति को प्रेम और श्रद्धा के संतुलन के रूप में समझाना।

“प्रेम और श्रद्धा के वर्ग का गुणनफल है भक्ति।”

प्रेम हृदय की मूल है, श्रद्धा उसकी थाह।  

गुणन से उपजे भक्ति, जीवन पाए राह।।


1. भक्ति का आधार : प्रेम

भक्ति की जड़ प्रेम है।

प्रेम के बिना भक्ति केवल रीति-रिवाज या औपचारिकता रह जाती है।

जब हृदय में इष्ट, गुरु, मानवता या आदर्श के प्रति गहरी आत्मीयता उमड़ती है, तभी सच्चा भक्ति भाव जागृत होता है।


2. भक्ति की शक्ति : श्रद्धा²

श्रद्धा का अर्थ है विश्वास, भरोसा और आत्मसमर्पण।

सूत्र में श्रद्धा को वर्ग (²) के रूप में रखा गया है, जो दर्शाता है कि भक्ति के लिए साधारण श्रद्धा नहीं, बल्कि गहन और दृढ़ श्रद्धा चाहिए।

श्रद्धा जितनी गहरी होगी, भक्ति उतनी ही स्थायी और प्रभावशाली होगी।


3. सूत्र का निहितार्थ

प्रेम बिना श्रद्धा हो तो भक्ति भावुकता बन जाती है।

श्रद्धा बिना प्रेम हो तो भक्ति कठोर अनुशासन या अंधविश्वास का रूप ले सकती है।

प्रेम और श्रद्धा² मिलकर ही भक्ति को पूर्ण करते हैं, जिससे यह आत्मा और परमात्मा का मिलन बन जाती है।


4. परवलय और भक्ति का संबंध

प्रेम = x (स्वतंत्र चर)

→ भक्ति का आधार। प्रेम दिशा देता है।

श्रद्धा = y (निर्भर चर)

→ श्रद्धा जितनी बढ़ेगी, उतना प्रभाव गुणात्मक होगा। इसलिए इसे वर्ग (y²) के रूप में रखा गया है।

भक्ति = y² = 4ax प्रकार का रूप

→ यहाँ भक्ति एक परवलय वक्र है, जो "प्रेम" और "श्रद्धा" की संयुक्त रचना है।

अर्थात् भक्ति एक परवलय है, जिसका फोकस ईश्वर है, डायरेक्ट्रिक्स अनुशासन है, प्रेम उसका अक्ष है और श्रद्धा उसकी शक्ति।

जैसे परवलय अनन्त की ओर खुलती है, वैसे ही प्रेम और श्रद्धा² से जन्मी भक्ति साधक को अनन्त ईश्वर की ओर ले जाती है।


निष्कर्ष:

भक्ति का सार है—

प्रेम से उत्पन्न आत्मीयता + श्रद्धा की गहराई का वर्गफल।

यह सूत्र सिखाता है कि भक्ति न केवल हृदय का प्रेम है, न केवल मन की आस्था; बल्कि दोनों का संतुलित और गहन संगम है।


सूत्रार्थ:

भक्ति वह परवलय है, जिसका फोकस ईश्वर 

है और जिसका समीकरण है—प्रेम × श्रद्धा²।


विशेष: ↑अंधभक्ति; 0>श्रद्धा (नकारात्मक)

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
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Wednesday, 24 September 2025

लोकोक्ति–मुहावरा : लोकबुद्धि और व्यंग्य का संगम —गोलेन्द्र पटेल

 मैं भाषा वैज्ञानिक नहीं, विद्यार्थी हूँ। निम्नलिखित कविता अपने जनपद के गाँवों में बोली जाने वाली लोकोक्तियों और मुहावरे पर केंद्रित है, एक कहावत है कि "कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।" अतः हो सकता है कि आपके यहाँ इसमें प्रयुक्त लोकोक्तियों और मुहावरों का अन्य रूप प्रचलित हो।

लोकोक्ति–मुहावरा : लोकबुद्धि और व्यंग्य का संगम

              —गोलेन्द्र पटेल 

एक हाथ की लौकी, 
नौ हाथ का बिया।
किसने तलवार से, 
फटा पजामा सिया।

गधे के सिर पर सींग न पाया,
अंधे के घर दीपक किसने जलाया।
खोदा पहाड़ निकला चूहा,
नौ सौ चूहे खाकर भूखा।

ऊँट के मुँह में जीरा डाला,
बंदर ने काजल हाथ से हाला।
घर की मुर्गी दाल बराबर,
साँप भी मरे लाठी सुस्थिर।

आम के आम गुठलियों का दाम,
सोने पे सुहागा अद्भुत काम।
जिसकी लाठी उसकी भैंस,
मूरख नाचे बिना परवेस।

चोर की दाढ़ी तिनका बोले,
माँग का खोट कहाँ तक टोले।
उल्टा चोर कोतवाल डाँटे,
राखी चुनरिया भीतर बाँटे।

साँप निकल लाठी को पीटा,
कुएँ का मेढ़क भीतर सीता।
नाच न जाने आँगन टेढ़ा,
खिसियानी बिल्ली खंभा घेड़ा।

थोथा चना बाजे गली,
साँप-छछूंदर दशा भली।
धोबी का कुत्ता घर न गली,
लाला जी पर्वत राई गली।

निंदक घर बैठे माला जपे,
अंधों में काना राजा थपे।
नकली सिक्का चले बाजार,
हाथ कंगन को आरसी पार।

पढ़े-लिखे को फारसी क्या,
कौआ हंस की चाल सिया।
नदी में डूबे काग नहाए,
तिल का ताड़ राई चढ़ाए।

आधा तीतर आधा बटेर,
नक्कारखाने में तूती ढेर।
डूबते को तिनका सहारा,
आगे कुआँ पीछे खाई प्यारा।

आसमान से गिरे खजूर पे अटके,
भैंस के आगे बीन खटकें।
तेल देखो तेल की धार,
रस्सी जलि पर बल न हार।

बाँझ गाएँ बछड़ा जने,
ऊल जलूल की बातें गढ़े।
नौकर से बैर नहीं भाता,
चोर-उचक्का माला गाता।

सिर मुँडाते ही ओले पड़ें,
आटे दाल बराबर झगड़ें।
ऊँची दुकान फीका पकवान,
चलती चक्की देखे इंसान।

बूँद-बूँद से घड़ा भरे,
एक अनार सौ बीमार धरे।
ओखली में सिर दिया जो,
मूसल से डर काहे को।

नेकी कर दरिया में डाल,
काजल की कोठरी काजल हाल।
चिट्ठी आई साँप निकल गया,
बकरे की माँ कब तक जिया।

नहीं माया तो क्या रैन बसेरा,
रंग-बिरंगा तोता चेरा।
लंगड़ी बिल्ली ऊँचा फाँद,
गागर में सागर बिन बाँध।

भेड़चाल सब दौड़ लगाएँ,
अंधी नागिन सीढ़ी चढ़ाएँ।
नौ दिन चले अढ़ाई कोस,
राम भरोसे ढोलक रोस।

दाने-दाने पर लिखा नाम,
रस्सी का साँप बना गुलाम।
आटे में नमक बराबर,
निंदक सिर पर धरे सितार।

जाके पैर न फटी बिवाई,
वो क्या जाने पीर पराई।
घर फूँके भगवान मिले,
अंधा बाँटे रेवड़ी खेले।

घी के दीये बिना न दीपे,
लाख करे पर ढाक न सीपे।
एक पंथ दो काज सजे,
साँच को आँच कहाँ तक भजे।

आखिर यही सिखावन प्यारी,
लोकोक्ति–मुहावरा बुद्धि हमारी।। 

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
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पेरियार पर केंद्रित कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

तर्क और विद्रोह के पुरोधा : पेरियार —गोलेन्द्र पटेल भारतीय समाज का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है; यह उन विचार...