Wednesday, 1 July 2020

"कविता : दृष्टि एवं पाठ" : श्रीप्रकाश शुक्ल // गोलेन्द्र पटेल


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अर्चनीयात्मा आदरणीय आचार्य वरिष्ठ कवि आलोचक श्रीप्रकाश शुक्ल【मेरे काव्यगुरु】 आज शाम 5 बजे...LIVE ON Social Media : FACEBOOK , YOUTUBE , INSTAGRAM , TWITTER , Whatsapp etc.आप सभी के लिए यह सुनहरा अवसर है "कविता : दृष्टि एवं पाठ" को समझने के लिए।इस अनमोल ख़ज़ाने {साहित्य निधि} को लेना ना भूलें।समय ५ बजे।।....
Shri Prakash Shukla हमारे समय के सुपरिचित कवि हैं | SHODH RANG【 बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ के फेसबुक पेज https://www.facebook.com/shodhrangbbau/】पर 2 जुलाई, शाम 5 बजे वे कविता सम्बन्धी अपनी दृष्टि का बयान करेगें, साथ ही पाठ भी करेगें |
आजादी के बाद हिंदी कविता में झमेले बहुतेरे हैं | एक खास तरह की विचारधारात्मक प्रवृत्ति का ग्रहण जैसे अब तक उस पर लगा हुआ है | भावक,पाठक दूर जा रहे कविता से | उम्मीद है कि इस ग्रहण से निराकरण का कोई मार्ग वे सुझायेगें | क्योंकि बाएं रहकर कविता रचने, आलोचने की इतिश्री तो बहुतेरे कर ही  रहे हैं |
-जगन्नाथ दुबे ,Kumar Mangalam ,डॉक्टर सर्वेश्वर सिंह , Golendra Gyan ,etc.

"कविता : दृष्टि एवं पाठ"                             
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-श्रीप्रकाश शुक्ल
कवि एवं आचार्य
हिंदी विभाग, बीएचयू, वाराणसी
02 जुलाई 2020, शाम 5 बजे
नब्बे के दशक के महत्वपूर्ण कवि और आलोचक
श्रीप्रकाश शुक्ल इलाहाबाद विश्विद्यालय से  एम. ए(हिन्दी) व पीएचडी हैं. उन्होंने हिन्दी कविता की आंतरिक लय के दायरे में अपनी कविता में लोकधर्मी परंपरा का विस्तार किया है जहां लोक रूढ़ न होकर एक गतिशील अवधारणा है।एक कवि के रूप में वे हिंदी कविता की  प्रतिरोधी परंपरा के  महत्वपूर्ण कवि हैं।शास्त्र से लेकर  लोक तक में उनकी गहरी रुचि है और उनकी कई  कविताओं में अनेक देशज शब्द प्रयुक्त होकर नया अर्थ प्रकट करते हैं।अभी अभी 'वागर्थ' जुलाई,2020 के अंक में प्रकाशित  अपने  एक साक्षात्कार में वे कहते हैं कि 'कवि कविता की संसद का  स्थायी प्रतिपक्ष होता है'।
उनकी प्रकाशित  कृतियाँ हैं---
कविता संग्रह:---
”अपनी तरह के लोग”,”जहाँ सब शहर नहीं होता” ,”बोली बात” ,”रेत  में आकृतियाँ”, ”ओरहन और अन्य कवितायेँ ”. "कवि ने कहा" .
'क्षीरसागर में नींद' .
*आलोचना:----
”साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौन्दर्य “ और “नामवर की धरती “ .
*संपादन:---“परिचय “ नाम से एक साहित्यिक पत्रिका का संपादन.
*पुरस्कार:--- कविता के लिए “बोली बात ” संग्रह पर वर्तमान साहित्य का मलखानसिंह सिसोदिया पुरस्कार , “रेत  में आकृतियाँ” नामक कविता संग्रह पर उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान का नरेश मेहता कविता  पुरस्कार,. "ओरहन और अन्य कवितायेँ" नामक कविता संग्रह के लिए  उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का ‘विजय देव नारायण साही कविता पुरस्कार’ ।
---*वर्तमान में बी०एच०यू० के हिंदी विभाग में  प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं तथा भोजपुरी अध्ययन केंद्र,बी. एच. यू. के समन्वयक(Coordinator) हैं।
ई मेल: shriprakashshuklabhu@gmail.com
मो:09415890513(गुरुजी)
मो:08429249326(मेरा ह्वाट्सएप नं.)
नोट : यहाँ भी सुन सकते हैं...निम्न लिंक http://www.youtube.com/golendragyan/

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https://www.facebook.com/golendrapatelkavi/




दिव्यांग सेवक : युवा कवि गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू

Monday, 22 June 2020

प्रतिभा श्री के कुछ कविताओं पर गोलेन्द्र पटेल....."स्त्री / भूख / श्रमिक / पलायन / आत्महत्या / एक पन्ना / उत्तर आधुनिक कविताएँ / फर्क"


"स्त्री / भूख / श्रमिक / पलायन / आत्महत्या / एक पन्ना / उत्तर आधुनिक कविताएँ / फर्क" : प्रतिभा श्री【बीएचयू】
गोलेन्द्र पटेल


नवोदित प्रख्यात युवा कवयित्री प्रतिभा श्री के काव्य-क्यारी में कर्षित कलि युक्त नवांकुरित कविता "स्त्री" 'स्त्री विमर्श वाटिका' का सुंदरतम सुमन है।जिसके प्रत्येक पंखुड़ी में पितृसत्तात्मक भौरों के लिए विशेष विष या मधु है जो रुढ़िवादी पुरुषार्थ के लिए चुनौती है और समाज के श्यामपट्ट पर लिखे जा रहे है इतिहास के लिए "सैन कोश"।इस सैनकोश के निर्माण में कवयित्री का कविकर्म निम्नलिखित पंक्तियों से सस्पष्ट है -
"जब दुनिया के / तमाम पन्नों पर/लिखे जा रहे थे/पुरुषार्थ के प्रशस्ति गान / तब / समाज ने हासिये पर/लिखा दिया  तुम्हारा नाम/तब भी तुम रचती रही./हसिये से समाज /सृजन के गर्भ से/जन्म देना चाहती रही/एक समतामूलक समाज" आज भी समाज में स्त्रियाँ 'देह दशा दोहरे दर्द' को ; दो दिवारों के बीच से अपने चीख के प्रतिध्वनि को किस प्रकार खुले आँगन तक पहुँचा रही हैं। यह इस कविता के संवेदना का सुगंध है जिसे एक सहृदय ही सूँघ सकता है।

वर्तमान स्थिति ऐसा ही है कि बच्चों के पेट में पर फैले उड़ते पक्षियों के उड़ान को देखना भूख के उबलते अदहन में खदकते चावल के ध्वनि को सुनना है "भूख की  उबाल /अदहन में खदकते चावल से / होती है/बहुत अधिक/इसलिए बार-बार जीतती है 'भूख' / दिन में दो-तीन बार/बड़ी तीव्रता के साथ/इसे महसुसा जा सकता है/उस भूख की तीव्रता को मापा जाना चाहिये /जिसे नहीं मिलती /दो वक्त की रोटी।"
'भूख के साथ भूखे का उम्र पकना' आजकल 'कोरोना के संकट में रोटी के लिए रोड़ पर रोना' आँख के आयु का पकना ही है।....
"पकते हुए चावल के साथ-साथ / पकती है तुम्हारी उम्र/जैसे कोई फल हो/ अब गिरे... तब गिरे../ मेरी संतोषी/भात के पकने तक/ तुम्हें रखना होगा धैर्य /  रोटी की लड़ाई में /पानी को बनना पड़ता है /भोजन का विकल्प/बार -बार / बदहजमी/और भूख मिटाने वाली दवा के बीच /एक अदद पेट है/जो लड़ता है रोटी से/मुझे सपने में दिखाई देते हैं/भूख से तड़पते बच्चे /मैं पकाना चाहती हूं /कटोरी भर भात
भूख के विरुद्ध"
                  
श्रमिकों के पसीने से लिखे गए इतिहास को पढ़ते वक्त उन्हें कितना याद किया जाता है यह आप सभी जानते हैं।उनके प्रति प्रेम का आवाहन करती और शोषित मजदूरों के दर्द का दर्शन करती हुई कवयित्री कहती है
-
"जब तुम प्रेम और युद्ध के द्वंद में फंसे थे /कोई लिख रहा था/ उस वक्त अपने पसीने से /"परिश्रम"/ तुम्हारे महलों के दरवाजे पर/ टांग दिया गया था उसका स्वप्न/उसे चेतावनी दी गई थी कि /वह आगे से ना देखे कोई स्वप्न /न सोते होते हुए / न जागते हुए....जब तुम चांद  पर जाने की तैयारी में थे /कोई दे रहा था हाशिए से आवाज/ अंततः जब  तुमने  चुन लिया  युद्ध /कोई  करना चाहता था तुमसे प्रेम /सिर्फ प्रेम।"

यह दौर श्रमिकों के "पलायन" का दौर है वे लौट रहे हैं महानगरों से एक गठरी में जीवन को गठियाये हुए गाँव। इस संघर्ष के संसार में 'सफ़र-ए-सड़क' का अंतिम पड़ाव अपना सदन है जिसे "मुक्ति-मकान" कहते हैं मजदूर मुसाफ़िर और आकाश के आँधियों से तंग चिड़ियाँ "घर-ए-घोसला"।इसे पढ़ते वक्त टॉमस स्टर्न्स इलियट(१८८८-१९६५) की कथन *कविता कवि-व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं ,व्यक्तित्व से पलायन है।* का स्मरण होना 'पलायन' के महत्व को रेखांकित करता है...इस लौटने के त्रासदी का जीवंत उदाहरण -
वे ऐसे  लौट रहे हैं /जैसे किसी तूफान के उठने से पहले/ पंछी लौट जाना चाहते हैं /अपने घोसले में/वे लौट रहे हैं /अपनी जिंदगी की सारी कमाई/ गठ्ठरी में बांधे /नंगे पांव /लहूलुहान है उनके पैर /सड़कें खून से रंग गयी हैं/समय की आग से/ झुलस गए हैं उनके चेहरे /जिन्होंने सभ्यता के विकास में /अपना श्रम और पसीना दिया है /आज उनसे उनका लहू भी
मांगा जा रहा है/वे लहू भी देने को तैयार हैं क्योंकि-
वह जानते हैं /लोकतंत्र में " मजदूरी" का पर्याय "मजबूरी" होता  है / वे मजबूर हैं/ जिन सडको को बनाया है उन्होंने /वही सड़के/उनके खून की प्यासी हो गई हैं /रेल की  पटरियों के आगोश में /समा चुकी है कई जिंदगियां /धरती अपने अक्ष से हिल गई है /मानो वह कह रही हो/ यह विस्थापित युग है /निर्वासित युग हैं/ इस "भेड़तंत्र" में /जन प्रतिनिधि को /जनता ने "विधाता" की संज्ञा दी है/और उसी "विधाता"ने  उनके/भाग्य में लिख दिया है /"निर्वासन","पलायन" ,"दमन"और "शोषण"/वे बार-बार अपनी "जन्म कुंडली" टटोलकर देखते हैं ,/और निराश हो जाते हैं/वे लौट रहे हैं क्योंकि/ उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है/ इससे पहले कि वह दूसरे/शोषण के शिकार हो/वे लौट जाना चाहते हैं /अपने गांव/इसी वादे के साथ कि /अब वे दोबारा लौट कर नहीं  जाएंगे।"
'आत्महत्या' शीर्षक नामक कविता में साहित्यिक सृजन सामर्थ्य को सड़क छाप मंच पर किस प्रकार पराजित किया जा रहा है उसी यथार्थ का यथा वर्णन-
  कविताओं की भी होती है हत्या/कवि के गर्भ में /भूख से तड़पते पेट में...मैंने देखा है /दम तोड़ती कविता को /हर वर्ष कत्ल भी की जाती हैं सैकड़ों कविताएं...विश्वविद्यालय के मंच पर जो हुआ था
वह कत्ल ही थी/विश्वविद्यालयों के भेंट चढ़ जाती हैं अनेकों कविताएँ/कवि सम्मेलन और गोष्ठियों से
कर दी जाती है निष्कासित /अच्छी कविताएं/और अच्छे कवि उपेक्षित...
कवयित्री को भविष्य के कविकर्म की चिंता है वह चाहती है कि भविष्य के गर्भ में छुपे यथार्थ के असहमतियों को दर्ज करने और लोकतंत्र के भावी प्रश्नों को पूछने के लिए अपने काव्यकागज़ का 'एक पन्ना' रिक्त छोड़ दिया जाय।यथा- "जब तुम लिखना कविता /तो एक पन्ना  छोड़ना रिक्त/ आने वाली पीढ़ी के लिए/ आने वाली पीढ़ी / लिखेगी उस पर/उस युग का यथार्थ/एक  पन्ना छोड़ना /इसलिए भी आवश्यक है /यह बताने के लिए/ कि तुम लोकतांत्रिक हो
उस पन्ने पर दर्ज की जाएंगी असहमतियाँ/ पूछे जाएंगे सवाल/ जिरह के लिए भी छोड़ना एक पन्ना/क्योंकि कविता का मतलब/ तानाशाही नहीं होता।
'आत्माभिव्यक्ति का नाम कला है' और कला के कई भेद-उपभेद हैं।उसी कला में कविकर्म के सहृदय से शब्द सुमन रस छन छंद बन कंठ से फूट कविता बन जाती है जिसके विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि "आत्मा के मुक्तावस्थ को ज्ञानदशा कहते हैं और हृदय के मुक्तावस्था को रसदशा कहते हैं।हृदय के मुक्ति के साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है ,उसे कविता कहते हैं।
"उत्तर आधुनिक  कविताएं" शीर्षक नामक कविता में कविता के कठिन दौर का सजीव चित्रण किया गया है-
जहां कविता विज्ञापन है /और/कला सूचना मात्र /अतार्किकता /असंगति/प्रतिमानों का विस्मरण/यह उत्तर आधुनिकता के खतरे हैं/ नहीं देता कोई निश्चित उत्तर...जहां मतभेद सबूत है जिंदा होने का/ एकरूपता पर नहीं की जाती है विश्वास / क्या कठिन समय में यह देंगी हमारा साथ? / उत्तर आधुनिक कविताएं।"
                          
     "फर्क" कविता में कवियत्री बढ़ते प्रतिस्पर्धा के जड़ों को उजागर करती हुई 'संघर्ष' सुख की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहती है-
"कंधे से कंधा /और कदम से कदम मिलाने में/ फर्क है मेरे मित्र/ जब तुम कदम से कदम/ मिलाने को
राजी होते हो तो / तुम साथ चलने को होते हो राजी/ लेकिन जब कंधा मिलाकर /चलने की करते बात/तो जन्म लेती है एक प्रतिस्पर्धा /तुम्हें अच्छा नहीं लगता कि/मेरा कंधा तुम्हारे कंधे से हो ऊँचा/यही होड/ अंततः संघर्ष के जन्म देती है ।
©गोलेन्द्र पटेल
【बीएचयू】
रचना : २१-०६-२०२०
नोट : कम से कम शब्दों में समेटा हूँ
💐आत्मीय धन्यवाद!

इस लिंक पर प्रोफेसर हैं अवश्य देखें -
https://www.youtube.com/playlist?list=PLHsxjpPyxBWj76Ddxni2RD4RgfktNSHR1


Sunday, 21 June 2020

कब्र-ए-माँ : तस्वीर-ए-मोहब्बत दफ़न! // गोलेन्द्र पटेल // Golendra Patel




                 *कब्र-ए-माँ : तस्वीर-ए-मोहब्बत दफ़न!*
                ---------------------------------------------------
सखी!
गर्भ में
सृष्टि का सृजन
ढोना
सत्य-ए-संज्ञा
संकेत का क्षण
होना
"माँ" शब्द है!
मुल्क-ए-मर्ज़
अदृश्य भारत-
                   भूख-ए-भविष्य!
गाँव छोड़ चले थे
महानगर में ; महामजदूर-
                                  हिन्दुस्तान-ए-हविष्य!
"घर"
लौट रहे हैं
आँख में आँसू-
                    आँत में अकड़न ले
                    पाथेय ;
संघर्ष की सड़क धर
रेल के पटरियों पर-
                           पैदल पैदल...!
बहुत-सी मजदूरनी गर्भवती हैं
बहुत-सी सूखी छाती चुचकी चाम से
चमचमाती घाम में ;
अपने नवजात शिशु का भूख-प्यास शांत कर
चल रही हैं निरंतर
शांत शोषित सड़क पर
निराश निशब्द निःसहाय निरोपाय..... 
अपने घर की ओर!
शोषित सड़क टूटे फूटे गड्ढेदार कंकडीले पथरीले हैं
जिस पर पड़े सारे गिट्टी पैर का प्रश्न-ए-पीर ;
जिसे देख नयन-ए-नीर
नदी बन गयी
और औरतें दोहरे दर्द-ए-देह!!-१
एक विधवा गीत गाती-
देश में वह भी स्थान है
जहाँ न भोजन न ज्ञान है
फिर भी हम कहते हैं ;
हमारा पहचान 'हिन्दुस्तान' है!
कभी चूल्हा हँसता है
कभी चूल्हा रोता है ;
कभी पेट भरा होता है
कभी भूखे पेट सोता है
रोज़ कुआँ खोदकर प्यास बुझाने वाला परिवार!
चूल्हे की मुखिया 'माता' 
अंत में कड़ाही पोंछ कर सूखी रोटी खाकर पानी पीती है ,
अपने एक दो तीन चार पाँच वर्षीय बच्चों के लिए
और गर्भ में पलने वाले पति के अंतिम प्रेम के लिए ;
रेल की पटरी उनके जीवन का गठरी छीन ली वक्त से पहले
अब वे इस दुनिया में नहीं रहे!
कविता के सरिता में
अनेक पथिकों के चिता को विसर्जित करते 
देख रहा हूँ ;
अनेक कवियों द्वारा मुक्ति का मंत्र भी सून रहा हूँ 
बच्चें नदी बीच पंडित के वक्तव्य जो दोहरा रहे हैं उसे भी!
एक भूखी बच्ची रेलवेस्टेशन पर जगा रही है
अपनी क्षीरदाई जननी को
जो भूख का चादर ओढ़ सो गई है सदा के लिए ;
एक अनाथ बच्चा अपनी नन्ही परी बहन को
अपने हाथों से खाना खिला रहा है सान सान!
एक माँ का बेटा दम तोड़ बैग पर लेटा 
एक माँ की बेटी घर के पथ पर चलते चलते स्वर्ग चली गई!
एक पुत्री साईकिल से पिता को घर पहुँचाई
लॉकडाउन में श्रवण कुमार-सा धर्म निभाई
यह समय भयावह है
जिसे एक "स्त्री" 
अपने कथा-कहानी-कविता-गीत-प्रगीत में 
कहर-ए-कंठ से कोयल-सी स्वर दे रही हैं!
और वे स्वयं अनुभूतियों के भीतर 
स्थिर हो जाती हैं
अनुभूति स्त्रियों का घर है ;
पुरुष उन्हें ,जब खोजते हैं देह में
तब नहीं मिलती हैं ,वे अंत तक उन्हें
आख़िरी में लाचार आदमी
लौटना चाहता है बार बार युवावस्था में
जैसे लौटना चाहते हैं फँसे मजदूर अपने घर!
निर्जन द्विप के अकेले मुसाफ़िर मनु थे क्या?
क्या कोई विधुर एकाकी होता है?
या कोई नायक नायिका के विरह में?
सफ़र-ए-कहर में
एक मर्द अपने मंजिल के द्वार पर जा गिरा 
एक वीर वन के बाहर
वीर पति पुत्र पिता में से कोई एक हो सकता है ;
अपनो को गिरा देख स्त्रियाँ रोती हैं
और उनकी यही रुदन संवेदना के सुमनवाटिका में
सुगंध बिखेरने लगती है 
हवा में फैली गंधपथ धर भौंरें चले आ रहे हैं
रुदनरस को चूसने!
कुछ चूसते हैं कुछ सोखते हैं
कुछ रंगों के मोह में भटकते हैं फूलों पर
कुछ अधखिले कलियों को देखते आँखें फार
देखना प्रायः प्रातःकाल और संध्याकाल की क्रिया है
पर भूखे काले भौंरें दोपहर में भी दिखते हैं
अलग अलग फूलों पर मँडराते हुए!
उनका वहाँ मँडराना फूल का ताज़ा रहना है
धूप के विरुद्ध ,
मालिन सोहती नेरती सिंचती कर्षित क्यारी को
जो आकर्षित करती भ्रमरी बेचारी को
भ्रमरी शहर घूँम-घाम आती है खेत में
खेतहरीन सूरजमुखी पर कपड़े बाँध रही होती हैं ;
वह दुःखी हो पहुँची मजदूरों के समाधि स्थल
जहाँ अनेक फूल हैं स्थूल में सूक्ष्म मूल हैं
वहाँ बैठ स्त्रियों के समाधि लेख पढ़ रही होती है 
कि कोरोना से पीड़ित हो मरी स्त्री का शव आता है
मृतक माँ को सीधे अस्पताल से लाया गया है यहाँ
वरिष्ठ अधिकारियों के देख रेख में कफ़न दे कर
फिर भी कबरिस्तान के आत्मा उसे वहाँ
दफ़नाने से रोक रहे हैं....!
उसका कब्र उसके पति के ठिक बगल में खोदा गया था
जो दो वर्ष पूर्व ही कब्र में जा उसकी प्रतिक्षा कर रहे हैं
शव वहाँ से लौट जाती है उसी सरकारी गाड़ी में
पति की आत्मा विरोधी आत्माओं से हार
लाचार बेबस कब्र से चिल्ला चिल्ला पूकार रहा है
मेरी प्रियतमा को मत ले जाओ मुझसे दूर
हे ख़ुदा! रहम करो रहम करो मुझ पर रहम करो!
उसका बच्चा उन दोनों के इश्क-ए-मजाज़ी को
इश्क-ए-हकिकी में बदल दिया
कब्र में माँ का तस्वीर-ए-मोहब्बत दफ़ना
माता-पिता प्रसन्न हुए पुत्र के इस पावन कार्य से
आशीर्वाद दे कबरिस्तान से आधीरात घर भेज दिए उसे
भ्रमरी इस घटना को सार्वजनिक करने के लिए
उस बालक के साथ उसके मुहल्ले पहुँची
घटना सार्वजनिक हो गयी कानो-कान
कोरोना ने जब ले लिया मुल्क-ए-जान!!-२...

-©युवा कवि गोलेन्द्र पटेल
०१-०६-२०२०
*शेष और कभी*
https://www.youtube.com/playlist?list=PLHsxjpPyxBWj76Ddxni2RD4RgfktNSHR1 : By Professors BHU ,JUN ,DU ,etc.

Monday, 1 June 2020

"कब्र-ए-माँ : तस्वीर-ए-मोहब्बत दफ़न!" - गोलेन्द्र पटेल // golendra patel // golendra gyan // गोलेन्द्र ज्ञान // #COVID19 #Coronavirus #Wuhan_Virus #कोविड_19 #कोरोना_वायरस #WHO_2020 #BHU #JNU #Indian




                 *कब्र-ए-माँ : तस्वीर-ए-मोहब्बत दफ़न!*
                ---------------------------------------------------
सखी!
गर्भ में
सृष्टि का सृजन
ढोना
सत्य-ए-संज्ञा
संकेत का क्षण
होना
"माँ" शब्द है!
मुल्क-ए-मर्ज़
अदृश्य भारत-
                   भूख-ए-भविष्य!
गाँव छोड़ चले थे
महानगर में ; महामजदूर-
                                  हिन्दुस्तान-ए-हविष्य!
घर
लौट रहे हैं
आँख में आँसू-
                    आँत में अकड़न ले
                    पाथेय ;
संघर्ष की सड़क धर
रेल के पटरियों पर-
                           पैदल पैदल...!
बहुत-सी मजदूरनी गर्भवती हैं
बहुत-सी सूखी छाती चुचकी चाम से
चमचमाती घाम में ;
अपने नवजात शिशु का भूख-प्यास शांत कर
चल रही हैं निरंतर
शांत शोषित सड़क पर
निराश निशब्द निःसहाय निरोपाय
अपने घर की ओर!
शोषित सड़क टूटे फूटे गड्ढेदार कंकडीले पथरीले हैं
जिस पर पड़े सारे गिट्टी पैर का प्रश्न-ए-पीर ;
जिसे देख नयन-ए-नीर
नदी बन गयी
और औरतें दोहरे दर्द-ए-देह!!-१
एक विधवा गीत गाती-
देश में वह भी स्थान है
जहाँ न भोजन न ज्ञान है
फिर भी हम कहते हैं ;
हमारा पहचान हिन्दुस्तान है!
कभी चूल्हा हँसता है
कभी चूल्हा रोता है ;
कभी पेट भरा होता है
कभी भूखे पेट सोता है
रोज़ कुआँ खोदकर प्यास बुझाने वाला परिवार!
चूल्हे की मुखिया माता
अंत में कड़ाही पोंछ कर सूखी रोटी खाकर पानी पीती है ,
अपने एक दो तीन चार पाँच वर्षीय बच्चों के लिए
और गर्भ में पलने वाले पति के अंतिम प्रेम के लिए ;
रेल की पटरी उनके जीवन का गठरी छीन ली वक्त से पहले
अब वे इस दुनिया में नहीं रहे!
कविता के सरिता में
अनेक पथिकों के चिता को विसर्जित करते देख रहा हूँ ;
अनेक कवियों द्वारा मुक्ति का मंत्र भी सून रहा हूँ
बच्चें नदी बीच पंडित के वक्तव्य जो दोहरा रहे हैं उसे भी!
एक भूखी बच्ची रेलवेस्टेशन पर जगा रही है
अपनी क्षीरदाई जननी को
जो भूख का चादर ओढ़ सो गई है सदा के लिए ;
एक अनाथ बच्चा अपनी नन्ही परी बहन को
अपने हाथों से खाना खिला रहा है सान सान!
एक माँ का बेटा दम तोड़ बैग पर लेटा
एक माँ की बेटी घर के पथ पर चलते चलते स्वर्ग चली गई!
एक पुत्री साईकिल से पिता को घर पहुँचाई
लॉकडाउन में श्रवण कुमार-सा धर्म निभाई
यह समय भयावह है
जिसे एक स्त्री अपने कथा कहानी कविता गीत-प्रगीत में
कहर-ए-कंठ से कोयल-सी स्वर दे रही हैं!
और वे स्वयं अनुभूतियों के भीतर स्थिर हो जाती हैं
अनुभूति स्त्रियों का घर है ;
पुरुष उन्हें जब खोजते हैं देह में
तब नहीं मिलती हैं वे अंत तक उन्हें
आख़िरी में लाचार आदमी
लौटना आना चाहता है बार बार युवावस्था में
जैसे लौटना चाहते हैं फँसे मजदूर अपने घर!
निर्जन द्विप के अकेले मुसाफ़िर मनु थे क्या?
क्या कोई विधुर एकाकी होता है?
या कोई नायक नायिका के विरह में?
सफ़र-ए-कहर में
एक मर्द अपने मंजिल के द्वार पर जा गिरा
एक वीर वन के बाहर
वीर पति पुत्र पिता में से कोई एक हो सकता है ;
अपनो को गिरा देख स्त्रियाँ रोती हैं
और उनकी यही रुदन संवेदना के सुमनवाटिका में
सुगंध बिखेरने लगती है
हवा में फैली गंधपथ धर भौंरें चले आ रहे हैं
रुदनरस को चूसने!
कुछ चूसते हैं कुछ सोखते हैं
कुछ रंगों के मोह में भटकते हैं फूलों पर
कुछ अधखिले कलियों को देखते आँखें फार
देखना प्रायः प्रातःकाल और संध्याकाल की क्रिया है
पर भूखे काले भौंरें दोपहर में भी दिखते हैं
अलग अलग फूलों पर मँडराते हुए!
उनका वहाँ मँडराना फूल का ताज़ा रहना है
धूप के विरुद्ध ,
मालिन सोहती नेरती सिंचती कर्षित क्यारी को
जो आकर्षित करती भ्रमरी बेचारी को
भ्रमरी शहर घूँम-घाम आती है खेत में
खेतहरीन सूरजमुखी पर कपड़े बाँध रही होती हैं ;
वह दुःखी हो पहुँची मजदूरों के समाधि स्थल
जहाँ अनेक फूल हैं स्थूल में सूक्ष्म मूल हैं
वहाँ बैठ स्त्रियों के समाधि लेख पढ़ रही होती है
कि कोरोना से पीड़ित हो मरी स्त्री का शव आता है
मृतक माँ को सीधे अस्पताल से लाया गया है यहाँ
वरिष्ठ अधिकारियों के देख रेख में कफ़न दे कर
फिर भी कबरिस्तान के आत्मा उसे वहाँ
दफ़नाने से रोक रहे हैं....!
उसका कब्र उसके पति के ठिक बगल में खोदा गया था
जो दो वर्ष पूर्व ही कब्र में जा उसकी प्रतिक्षा कर रहे हैं
शव वहाँ से लौट जाती है उसी सरकारी गाड़ी में
पति की आत्मा विरोधी आत्माओं से हार
लाचार बेबस कब्र से चिल्ला चिल्ला पूकार रहा है
मेरी प्रियतम को मत ले जाओ मुझसे दूर
हे ख़ुदा! रहम करो रहम करो मुझ पर रहम करो!
उसका बच्चा उन दोनों के इश्क-ए-मजाज़ी को
इश्क-ए-हकिकी में बदल दिया
कब्र में माँ का तस्वीर-ए-मोहब्बत दफ़ना
माता-पिता प्रसन्न हुए पुत्र के इस पावन कार्य से
आशीर्वाद दे कबरिस्तान से आधीरात घर भेज दिए उसे
भ्रमरी इस घटना को सार्वजनिक करने के लिए
उस बालक के साथ उसके मुहल्ले पहुँची
घटना सार्वजनिक हो गयी कानो-कान
कोरोना ने जब ले लिया मुल्क-ए-जान!!-२...
-©युवा कवि गोलेन्द्र पटेल
०१-०६-२०२०
*शेष और कभी*
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Thursday, 21 May 2020

"कवि के भीतर स्त्री" से 'देह विमर्श' : गोलेंद्र पटेल 【{©Golendra Patel} (BHU)】

देह विमर्श
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जब

स्त्री ढ़ोती है
गर्भ में सृष्टि
तब

परिवार का पुरुषत्व
उसे श्रद्धा के पलकों पर

धर

धरती का सारा सूख देना चाहते हैं
   घर।।

एक कविता
जो बंजर जमीन और सूखी नदी की है
समय की समिक्षा शरीर-विमर्श

सतीत्व के संकेत
सत्य को भूल

उसे बांझ की संज्ञा दी।...

©गोलेन्द्र पटेल
लम्बी कविता "कवि के भीतर स्त्री"से】
मो.नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com





Thursday, 7 May 2020

मॉब लिंचिंग - गोलेन्द्र पटेल // मॉबलिंचिंग // #मॉबलिंचिंग // golendra patel // golendra gyan // #BHU#JNU#DU#University




*मॉब लिंचिंग*
अद्भुत-
अवैमत्य
अफ़वाह का आवाज़
अनन्त आकाश में
नहीं
आदमी से आदमी के भीतर
अविराम उड़ता रहा
अविस्मरणीय
अश्लथ
अस्त्र बन!
अविवेक का अँकुर
शिक्षित व अशिक्षित के मनःखेत में
सनसनीखेज़ ख़बर का है
जो आतंक के आतिथ्य का वृक्ष होगा
एक दिन
तो ताकता रहेगा तकदीर नयन में लिये नीर
वे घिन
समय के चेतना को चीर
रे बिन!
गिन हीन एक-दो-तीन
तिन के तलवार से
मनुष्य के मनुष्यता को जब मार दिया जाएगा
तब कर्षित पराधीन पत्नी बेटी माँ
या दोहरे शोषित :
दलित स्त्री
"मॉब लिंचिंग" के शिकारियों का शिकार होंगी
तपती धूप में चौंधिया कर गीर पडे़ मृग के भांति
या भयंकर रेगिस्तान में फसें प्यासे असहायों के
अभी यहाँ-वहाँ जहाँ-तहाँ
रूढ़िवादिता के पितृसत्तात्मक भट्ठी में जल रही हैं औरतें
इस आग से हृदय और मन जलना कलम से कविता रचना है :
अहम के विरुद्ध
या पुरुषार्थ के प्रशस्ति गान के
सामाजिक शोषण के शमशीरों से
हाथ में हाशिए के हँसुए लें सीना तान के
लड़ाना चहती हैं स्त्रियाँ : आत्मसम्मान के लिए
शीघ्र जीतेंगी तब
जब हम जीताएंगे अपने घर के स्त्रियों को
जीताना ही होगा पूर्ण पुरुष होने के लिए
स्त्री को विजयी भवः बोल
नहीं तो
वो खुद जीत जाएंगी पुरुष को पराजित कर
एक दिन!...
©गोलेन्द्र पटेल
सितंबर,2019

दृष्टिबाधित सेवक // दिव्यांग सेवक // दृष्टिबाधित विद्यार्थी // golendra patel // #BHU#JNU#DU#MU#University//golendra gyan // गोलेन्द्र पटेल


**मैं कैसे बना दिव्यांग सेवक** *सारांश*
*2018 की बात है मुझे सेकंड NDA का पेपर इलाहाबाद में देना था, और अगले ही दिन मुझे बड़ी माता (अर्थात् मिज़ल्स : चेचक) हो गया लेकिन मैं नहीं माना रात्रि में तकरीबन 8:30 के ट्रेन से चला गया।सुबह के पेपर तक सम्पूर्ण देह में जलन ज्वालामुखी के भाँति दहक रहा था लेकिन2बजे के पेपर में आँखों के पुतलियों में भी दो दानें उभर गए।आँखें बंद ही नहीं होते थे, नयन नीर लगातार खौलता हुआ चेहरे को जला रहा था, बेचैनी चर्मोत्कर्ष पर थी, जो दवा ले गया था वो अपने अस्तित्व को भूल गए थे, कोई असर उनके भीतर नहीं रह गया था फिर भी हम उनकी सांत्वना के लिए खाता रहा।क्योंकि की किसी वरिष्ठ डॉक्टर का दिया था।जो भभूत माई भगवती का पिता ने दिलाया था उसे भी लगता रहा।मौत का पेपर किस  तरह दिया यह यमराज भी देख रहे थे, NDA विभाग के परीक्षा केंद्र पर आए अधिकारियों ने भी दवा दिलाया पास के मेडकल से । मजे की बात यह है कि उसमें तीन दवा मेरे पास थी, एक नहीं।उसे खाने पर कुछ राहत हुआ मैं एक घंटे बाद पुनः मुघलसराय का टिकट ले ट्रेन पकड़ घर वापस चल पड़ा,ट्रेन पैसेंजर ट्रेन था सभी डिब्बे खाली जैसे लगा ईश्वर मेरे देह के दर्द का दर्शन कर मुझ पर अपना कृपा दृष्टि फेरी हो।जब सीट पर सोता था तो मिजल्स के दाने ऐसे लगते जैसे कोई सुई चुभो रहा हो।रास्ते में आते आते विन्ध्याचल स्टेशन पर ट्रेन रूकी मैं ब्याकुल हो ट्रेन से उतर गया, घूमने लगा।एक ट्रेन सुपरफास्ट कुछ समय में वहाँ आई ।मैं तुरंत उसमें चढ़ गया।लोग बैठने नहीं दे रहे थे।बहुत मुस्किल से पैखाने के पास बैठने का जगह मिला।जहाँ एक कोढ़ी व्यक्ति बैठा था, और उसकी बुढ़ी पत्नी साथ में।जो मुझसे पूछती है बेटवा कहा जात हया? मैं वत्सलवचन प्रश्न सून कहा माई घरे।हमार घर मुघलसराय के पास है।उन्होंने मेरे दर्द को अपने भीतर लेत हुए कहा कि बेटवा आपको माता जी हैं हे माई भगवती इस अबोध की रक्षा करी।हम शिघ्र ही अपने स्टेशन के पास ज्यूनाथपुर फाटक आ गए जहाँ सभी ट्रेन रूकती हैं चाहे वह कोई भी हो क्योंकि वहाँ से सभी अपने रूट धरती अर्थात् पटरियों की संख्या कम हैं एक जाए तो दूसरी आए।वहाँ से मेरे घर का दूरी मुघलसराय स्टेशन के समान था।रात १२बज रहे थे।मैं उतरा अपने पिता पर फोन किया फोन किसी ने नहीं उठाया कारण फोन साइलेंट में था।थक हार एक चाचा पर किया जो संजोग से रात में पंपूसेट से पानी भर रहे थे।उन्होंने कहा ठीक है वहीं फाटक के पास रूक मैं बाईक ले आ रहा हूँ।मैं आश्चर्य में था मेरे सामने एक भी फाटक नहीं था ।ट्रेन फाटक से एक किमी आगे जा रूकी थी।मैं ट्रेन के उस पार जा देखा छोटा स्टेशन था।जहाँ कुछ अनजान यात्री सोए थे।वहीं चाय बेचने वाले से पूछा चाचा फाटक कहाँ है बोले एक किमी पिछे ही था।मैं फाटक की तरफ जाने लगा।कुत्ते ऐसे भोंक रहे थे जैसे लगता था वे झुंड बना मेरा शिकार करना चाहते हैं वैसे ट्रेन के पटरियों पर घूमने वाले कुत्तों से आप परिचित होंगे।मैं जब फाटक पहूँचा सब कुछ बदल चुका था क्योंकि मैं उस रास्ते लगभग 6 वर्ष पूर्व गया था तब कोई पुल ओगर नहीं था अब है। चाचा भी उस छोटे स्टेशन को नहीं जनते थे।जहाँ मैं रूक था।अच्छा फाटक तक पहुंच तो गया वहाँ इतने लोग कट मेरे थे कि उनमें मेरे गाँव से मेरा एक प्राईमरी सहपाठी भी।जिसका स्मृति मन में भय का नाव तैयार कर उस पर स्वयं को बैठ तुफानी सागर का यात्रा कर रहा था।चाचा आ गए हमें उनके संग घर आए।माँ ने पानी गर्म किया।पिता ने ठंडा पानी दो बाल्टी लाए।हाथ-मुह धोया, ब्रस किया फ्रेश हुआ, कुछ खाया और गर्म पानी पी सोया।प्रातःकाल पिताजी ने एक माईजी छेकने वाले बाबा के पास ले गए वहाँ उन्हें मुझे देखाए फिर झाड़ फूक हुआ, फिर हम वापस घर आयें खाना-वाना खा पी 8बजे रामनगर(वाराणसी) गये एक बडे़ डॉक्टर के पास जो चार दिन का दवा दिए जो था "अंग्रेजी संजीवनी" अर्थात् रामबाण।उसे खाते ही एक घंटे में आराम मिला घर के लोग हमें नींम के पत्तियों से पंखा करते थे अर्थात् मुझमें जो माँ थी उसे।एक हफ्ते में मिजल्स ठीक हुआ पुर्णतः ठीक एक माह में लेकिन दगादियाँ आज भी हैं।मैं उन दिनों मुलायम बिस्तर पर पडे़ पडे़ यही सोचता था कि मेरे पिता एक विकलांग व्यक्ति हैं कहीं जायसी की तरह मेरी आँखें गई तो मेरे परिवार का क्या होगा?मैं बड़ा हूँ इसलिए परिवार का प्रथम हाथ पैर हूँ... मुझे महाकवि जायसी की तरह मत बनाना माँ एक आँख का काना, नहीं सूर जैसा...नहीं तो उनके काव्यगुण भी देना होगा मुझे । यही जाप था मेरा : *दिव्यांगसेवापरमोधर्मः** *मेरी जननी के दूःख हरो और मुझे भी हरने दो जगतजननी!*
★★★नोट★★★
प्रिय सहपाठी साथियों क्या आप CSE (UPSC) का परीक्षा देना चाहते हैं Hindi Optional से।दो दृष्टिबाधित बहन दिल्ली से Request की हैं हिन्दी Optional पेपर को रिकार्डिंग करने के लिए जिसमें हम मन्नू भंडारी के उपन्यास "महाभोज" को रिकार्डिंग कर चैनल पर भेज दिए हैं और भाषा खंड के कुछ हिस्सों को भी।अब "मैला आँचल" का रिकार्डिंग चालू है...यदि आप में से कोई भी एक सहपाठी साथी इस परीक्षा के लिए तैयार हुआ तो मैं आपको आत्मविश्वास दिलाता हूँ कि मैं खुद धीरे धीरे हिन्दी मिडियम के विद्यार्थियों के लिए वायस रिकार्डिंग आपके जरूरतों के अनुसार करता रहूंगा।इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र व राजनिति विज्ञान की कुल 26 NCERT के पुस्तकें किसी तरह एक मित्र के साझेदारी में खरीद लिया हूँ। उनका भी रिकार्डिंग हिंदी आपशनल के बाद शुरू करूँगा।जो भी विद्यार्थी इच्छुक हैं वे इस नंबर 8429249326 पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।
- **गोलेन्द्र पटेल (*बीएचयू बीए द्वितीय वर्ष** )*

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बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...