Wednesday, 5 May 2021

कविता : दिल्ली से देहात की ओर || गोलेन्द्र पटेल

 कविता : दिल्ली से देहात की ओर 



ईश्वर के यहाँ देर है अंधेर नहीं 

लगे रहिए/ चलते रहिए 

मैं ईश्वर को मानता हूँ


सच कहूँ

तो मैं अपने दुःख का कारण जानता हूँ


बुरे वक्त में सुखद क्षण को रोता देखकर

मुझे पता चला कि

मैं खुद को दूसरों से बेहतर जानता हूँ


हम किसी के चेले नहीं, विवेकी हैं

बोल रहे हैं चौराहे पर चिल्ला चिल्ला कर

चुप रहो  ---   न दायें , न बायें

इधर चलना है

नहीं नहीं उधर चलना है

सन्नाटे में साथ चलना अच्छा होता है

चल रहे हैं पैरों के बल पर पथरीली पथ को नापते हुए

दिल्ली से देहात की ओर 


दोपहर में दोगुनी शक्ति से देखता है सूरज

कोई नहीं ठहरना चाहता

किसी अजनबी छाँव में

सब चल रहे हैं

भूखे-प्यासे थके-हारे उम्मीद के सहारे

सारे मजदूर लौट रहे हैं गाँव में

आह! कोई कहीं गिर रहा है

कोई कहीं चिर रहा है किसी पहाड़ की छाती

कोई कहीं सो रहा है 

कोई कहीं ढो रहा है अपना मृत बच्चा


हे मजदूर मजबूर मुसाफिर!

आखिर जाना है वहीं जहाँ सब जा रहे हैं

तो फिर तुम क्यों नहीं पहुँच पाये अपने घर

मैं इसका मूल वजह मानता हूँ


भूख को जन्म देने वाली सारी व्यवस्थाएँ हैं

फिर भी मैं चुप हूँ

कि घुप रौशनी से अच्छी धूप है

जिसमें साफ दिख रहा है

शोषक भूप है/और अपना शोषित रूप है/ सूखा कूप है/ उदास सूप है/ 

मन की पीड़ा पसेरी भर नहीं, 

केवल कुछ पौन है

और यह सदैव साथ रहना चाहती है

मैं उजाले में अचानक आँखें बंद करने वाले को भी पहचानता हूँ

कि वह कौन है?

©गोलेन्द्र पटेल

ईमेल : corojivi@gmail.com

कविता श्रृंखला : "दिल्ली से देहात की ओर" से 


Sunday, 2 May 2021

गोलेन्द्र पटेल की लम्बी कविता : "तुम्हारे संतान सदैव सुखी रहें" से

तुम्हारे संतान सदैव सुखी रहें || गोलेन्द्र पटेल


सभ्यता और संस्कृति के समन्वित सड़क पर

निकल पड़ा हूँ शोध के लिए

झाड़ियों से छिल गयी है देह

थक गये हैं पाँव कुछ पहाड़ों को पार कर

सफर में ठहरी है आत्मा

बोध के लिए


बरगद के नीचे बैठा कोई बूढ़ा पूछता है

अजनबी कौन हो ?

जी , मैं एक शोधार्थी हूँ

(पुरातात्विक विभाग ,....विश्वविद्यालय)

मुझे प्यास लगी है


जहाँ प्रोफेसर और शोधार्थी

पुरातात्विक पत्थर पर पढ़ रहे हैं

उम्मीद की उजाला से उत्पन्न उल्लास

उत्खनन के प्रक्रिया में

खोज रही है

प्रथम प्रेमियों के ऐतिहासिक साक्ष्य

मैं वहीं जा रहा हूँ


बेटा उस तरफ देखो

वहाँ छोटी सी झील है

जिसमें यहाँ के जंगली जानवर पीते हैं पानी

यदि तुम कुशल पथिक हो

तो जा कर पी लो

नहीं तो एक कोस दूर एक कबीला है

जहाँ से तुम्हारी मंजिल

डेढ़ कोस दूर नदी के पास

फिलहाल दो घूँट मेरे लोटे में है

पी लो बेटा


धन्यवाद दादा जी!


उत्खनन स्थल पर पहूँचते ही पुरातत्वज्ञ ने

लिख डाली डायरी के प्रथम पन्ने पर मिट्टी के पात्रों का इतिहास

लोटा देख कर आश्चर्य है

यह बिल्कुल वैसा ही है

जैसा उक्त बूढ़े का था

(वही नकाशी वही आकार)

कलम स्तब्ध है

स्वप्नसागर में डूबता हुआ

मन

सोच के आकाश में

देख रहा है

अस्थियों का औजार

पत्थरों के बने हुए औजारों से मजबूत हैं


देखो

टूरिस्ट आ गये हैं

पुरातात्विक पत्थरों के जादा पास न पहुँचे सब

नहीं तो लिख डालेंगे

इतिहास पढ़ने से पहले ही प्रेम की ताजी पंक्ति


किसी ने आवाज दी

सो गये हो क्या ?

शोधकर्ता सोते नहीं है शोध के समय

सॉरी सर!

कल के थकावट की वजह से

आँखें लग गयीं

अब दोबारा ऐसा नहीं होगा


ठीक है

जाओ देखो उन टूरिस्टों को

कहीं कुछ लिख न दें

( प्रिय पर्यटकगण! आप लोगों से अतिविनम्र निवेदन है कि किसी भी पुरातात्विक पत्थरों पर कुछ भी न लिखें)


श्रीमान! आप मूर्तियों के पास क्या कर रहे हैं ?

कुछ नहीं सर!

बस छू कर देख रहा हूँ

कितनी प्राचीन हैं

महोदय! किसी मूर्ति की प्राचीनता पढ़ने पर पता चलती है

छूने पर नहीं

जो लिखा है मूर्तियों पर उसे पढ़ें

और क्रमशः आप लोग आगे बढ़ें


सामने एक पत्थर पर लिखा है

जंगल के विकास में

इतिहास हँस रहा है

पेड़-पौधे कट रहे हैं

पहाड़-पठार टूट रहे हैं

नदी-झील सूख रही हैं

कुछ वाक्य स्पष्ट नहीं हैं

अंत में लिखा है

जैसे जैसे बिमारी बढ़ रही है

दीवारों पर थूकने की

और मूतने की

वैसे वैसे चढ़ रही है

संस्कार के ऊपर जेसीबी

और मर रही हैं संवेदना


आगे एक क्षेत्र विशेष में

अधिकतम मानव अस्थियां प्राप्त हुई हैं

जिससे सम्भावना व्यक्त किया जा सकता है

कि यहाँ प्राकृती के प्रकोप का प्रभाव रहा हो

जिसने समय से पहले ही

पूरी बस्ती को श्मशान बना दी

 

संदिग्ध इतिहास छोड़िये

मौर्य-गुप्त-मुगलों के इतिहास में भी नहीं रुकना है

सीधे वर्तमान में आईये

जनतंत्र से जनजाति की ओर चलते हैं


आजादी के बाद शहर में आदिवासियों के आगमन पर

हम खुश हुए

कि कम से कम हम रोज हँसेंगे

उनकी भाषा और भोजन पर

वस्त्र और वक्त पर

व्यवसाय और व्यवहार पर


बस कवि को छोड़ कर

शेष सभी पर्यटक जा चुके हैं

जो जानना चाहता है

प्राचीन प्रेम का वह साक्ष्य

जिस पर सर्वप्रथम उत्कीर्ण हुआ है

वही दो अक्षर

(जिसे 'प्रेम' कहते हैं / दो प्रेमियों के बीच / संबंधों का सत्य / सृष्टि की शक्ति / जीवन का सार )


पास की कबीली दो कन्याएँ

पुरातत्व के शोधार्थी से प्रेम करती हैं

प्रेम की पटरी पर रेलगाड़ी दौड़ने से पहले ही

शोधार्थी लौट आता है शहर

शहर में भी किसी सुशील सुंदर कन्या को हो जाती है

उससे सच्ची मुहब्बत


दिन में रोजमर्रा की राजनीति

रात में मुहब्बते-मजाज़ी की बातें

गंभीर होती हैं


प्रिये!

जब तुम मेरे बाहों में सोती हो

गहरी नींद

निश्चिंत

तब तुम्हारे शरीर की सुगंध

स्वप्न-सागर से आती

सरसराहटीय स्वर में सौंदर्य की संगीत सुनाती है

भीतर

जगती है वासना

तुम होती हो

शिकार

समय के सेज पर


संरक्षकीय शब्द सफर में

थक कर

करता है विश्राम

चीख चलती है हवा में अविराम


साँसों के रफ्तार

दिल की धड़कन से कई गुना बढ़ जाती है

होंठों पर होंठें सटते हैं

कपोलों पर नृत्य करती हैं

सारी रतिक्रियाएँ

एक कर सहलाता है केश

तो दूसरा स्तन को

एक दूसरे की नाक टकराती है

नशा चढ़ता है

ऊपर

(नाक के ऊपर)

आग सोखती हैं आँखें आँखों में देख कर

स्पर्श की आनंद


तभी अचानक

बाहर से कोई देता है आवाज

यह तो स्वप्नोदय की सनसनाहट है

देखो वीर अपना बल

अपना वीर्य

अपनी ऊर्जा


प्रियतम!

क्यों हाँफ रहे हो

क्यों काँप रहे हो

मैं सोई थी

निश्चिंत फोहमार कर गहरी नींद में

मुझे बताओ

क्या हुआ?

तुम्हें क्या हुआ है?

तुम्हारे चेहरे पर

यह चिह्न कैसा है?

यौन कह रहा है

मौन रहने दो

प्रिये!


ठीक है

जैसा तुम चाहो


अल्हड़ नदी

मुर्झाई कली के पास है

साँझ श्रृंगार करने आ रही है

तट पर

हँसी ठिठोली बैठ गई

नाव में


लहरें उठ रही हैं

अलसाई ओसें गिर रही हैं

दूबों के देह पर

इस चाँदनी में देखने दो

प्रेम की प्रतिबिम्ब

आईना है

नेह का नीर

नाराजगी खे रही है पतवार

दलील दे रही है

देदीप्यमान द्वीप पर रुकने का संकेत


कितनी रम्य है रात

कितने अद्भुत हैं

ये पेड़-पौधे नदी-झील पशु-पक्षी जंगल-पहाड़

यहाँ के फलों का स्वाद

प्रिये! यही धरती का जन्नत है

हाँ

मुझे भी यही लगता है


उधर देखो

हड्डियाँ बिखरी हैं

यह तो मनुष्य की खोपड़ी है

अरे! यह तो पुरुष है

इधर देखो

स्त्री का कंकाल है


ये कौन हैं?

जाति से बहिष्कृत धर्म से तिरस्कृत

पहली आजाद औरत का पहला प्यार

या दाम्पत्य जीवन के सूत्र

या आदिवासियों के वे पुत्र

जिन्हें वनाधिकारियों के हवस-कुंड में होना पड़ा है

हविष्य के रूप में स्वाहा

हमें हमारा भविष्य दिख रहा है

अंधेरे में


प्रियतम पीड़ा हो रही है

पेट में

प्रिये!

तुम भूखी हो

कुछ खा लो

नहीं , भूख नहीं है

तब क्या है?


तुम्हारा तीन महीने का श्रम

ढो रही हूँ

निरंतर

इस निर्जनी उबड़खाबड़ जंगली पथ पर

अब और चला नहीं जाता

रुको...रु...को

ठहरो...ठ...ह...रो

सुस्ताने दो


प्रिये!

मुझे माफ करो

मैं वासना के बस में था

उस दिन

आओ मेरे गोद में

तुम्हें कुछ दूर और ले चलूँ

उस पहाड़ के नीचे

जहाँ एक बस्ती है

पुरातात्विक साक्ष्य के संबंध में गया था

वहाँ कभी

तो दो लड़कियों ने कर ली थी

मुझसे प्रेम

जिनका भाषा नहीं जानता मैं

वे वहीं हैं

हम दोनों

उनके घर विश्राम करेंगे

निर्भय


गोदी में ही पूछती है

प्रियतमे!

तुम मुझे

कब तक ढोओगे?

प्रिये!

जन जमीन जंगल की कसम

जीवन के अंत तक

ढोऊँगा

तुम्हें

अविचलाविराम


मेरे जीने की उम्मीद

तुम्हारे गर्भ में पल रही है

तुम मेरी प्राण हो

तुम्हारा प्रेम मेरी प्रेरणा

देखो सामने झोपड़ी है

जो , उसी का है

वह रहा उसका घर


आश्चर्य है प्रियतम

यह तो पेड़ पर बना है

केवल बाँस से

हाँ

ये लोग खुँखार जानवरों से

बचने के लिए ही ऐसा घर बनाते हैं

बस अंतर इतना है कि हम शहरी हैं

ये वनजाति

(अर्थात् आदिवासियों के पूर्वज)

हम देखने में देवता हैं

ये राक्षस

खैर ये सच्चे इंसान हैं


कबीलों वालों

मालिक आ रहे हैं

स्वागत करो

मालिक... मा...लि..क

यह लीजिए एक घार केला

यह लीजिए कटहर

यह लीजिए बेर

यह कंदमूल फल फूल स्वीकार करें

मालिक

हम कबीले की राजकुमारी हैं

सरदार कहता है

मालिक ये दोनों मेरी पुत्री

आपकी राह देख रही थीं

आपके आने से

कबीलीयाई धरती धन्य हुई

अब आप इन्हें वरण करें


आपको अपना परिचय

उस बार हम दोनों बहनें नहीं दे सकी

इसके लिए हमें क्षमा करना

ये कौन हैं?

मेरी पत्नी

जो आपकी भाषाओं से एकदम अपरचित है

ये पेट से तीन महीने की है

थक गई हैं

सफर में चलते चलते


हम दोनों आपके उपकारों का सदैव ऋणी रहेंगे

यह मेरा सौभाग्य है

कि मैं आप लोगों से पुनः मिल पा रहा हूँ


कुछ दिन बाद

दोनों शहर आ जाते हैं

जहाँ सभ्य समाज के शिक्षित लोग रहते हैं


क्या धर्म के पण्डित?

इस कुँवारी कन्या की भारी पैर पर व्यंग्य के पत्थर मारेंगे

या फिर इन्हें संसद के बीच चौराहे पर

जाति के संरक्षक-सिपाही बहिष्कृत-तिरस्कृत का तीर मारेंगे


कुछ भी हो

कंदमूल की तरह

दोनों ने दुनिया का सारा दुख एक साथ स्वीकार कर लिया

तुम्हारे हिस्से का अँधेरा भी कैद कर लिए

अपने दोनों मुट्ठियों में

ताकि

तुम्हें दिखाई देता रहे प्रकाशमान प्रेम

और तुम्हारे संतान सदैव सुखी रहें


प्रियतम !

पीड़ा पेट में पीड़ा... पी...ड़ा

आह रे माई ! माई रे !


गर्भावस्था के अंतिम स्थिति में

अक्सर अंकुरित होती है आँच

अलवाँती की आँत से आती है आवाज

प्रसूता की पीड़ा प्रसूता ही जाने


औरत की अव्यक्त व्यथा-कथा कैसे कहूँ?

मैं पुरुष हूँ


नौ मास में उदीप्त हुई

नयी किरण

किलकारियों के क्यारी में

रात के विरुद्ध

रोपती है

रोशनी का बीज

जिसे माँ छाती से सींचती है

नदी की तरह निःस्वार्थ


अवनि आह्लादित है

आसमान की नीलिमा में झूम रहे हैं तारे

चाँद उतर आया है

हरी भरी वात्सल्यी खेत में

चरने के लिए

फसल


प्रेम की पइना पकड़े

खड़े हैं

पहरे पर पिता

उम्र बढ़ रही है

ऊख की तरह

मिट्टी से मिठास सोखते हुए

मौसम मुस्कुराया है

बहुत दिन बाद बेटी के मुस्कुराने पर

 

सयान सुता पूछती है

माँ से

क्या आप मुझे जीने देंगी

अपनी तरह

क्या मैं स्वतंत्र हूँ

अपना जीवनसाथी चुनने के लिए  

आपकी तरह

आप चुप क्यों हो?


बापू आप बाताई

जिस तरह माँ ने की है

आपसे प्रेमविवाह

क्या मैं कर सकती हूँ?

धैर्य से उठाकर

पिता ने दे दी

धीमी स्वर में उत्तर

मेरी बच्ची तुम स्वतंत्र हो

शिक्षित हो

जैसा उचित समझो

करो...!


(©गोलेन्द्र पटेल

२८-११-२०२०)

छात्र, बीएचयू

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*नोट : लम्बी कविता : "तुम्हारे संतान सदैव सुखी रहें" से



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Monday, 1 March 2021

संक्षिप्त परिचय : कर्मजीत सिंह गठवाला {©Karamjit Singh Gathwala}

 

आदरणीय कर्मजीत सिंह गठवाला सर का संक्षिप्त परिचय :- hindi-kavita.com


                संगरूर (पंजाब ) /गुरतेज प्यासा : कर्मजीत सिंह गठवाला, निदेशक, विश्व प्रसिद्ध वेबसाइट पंजाबी-कविता.कॉम को चंडीगढ़ के कला भवन में विश्व 

मातृभाषा दिवस के अवसर पर एक विशेष समारोह में पंजाब कला परिषद द्वारा सम्मानित किया गया। पंजाब सांस्कृतिक मामलों और तकनीकी 

शिक्षा मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पंजाब कला परिषद के अध्यक्ष डॉ सुरजीत पात्र ने कर्मजीत सिंह को सम्मानित किया। कर्मजीत सिंह ने बिना 

किसी सरकारी या संस्थागत मदद के पंजाबी-कविता.कॉम वेबसाइट के माध्यम से बाबा फरीद से लेकर नवीनतम कवियों तक कविता को संरक्षित 

करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास किया है। डॉ पात्र ने कहा कि इस वेबसाइट को पंजाबी कविता का विश्वकोश कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है।  

गठवाला खुद एक लेखक हैं और लगभग दस साल पहले मानक कविता के संरक्षण का सपना देखते थे।  यह वेबसाइट पंजाबी कविता की पहली 

वेबसाइटस में से होने पर भी गर्व करती है। प्रिंसिपल गठवाला का जन्म 23 मार्च 1951 को संगरूर जिले (पंजाब) के 

नारायणगढ़ गाँव में हुआ था।  वह पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला से पंजाबी, हिंदी और अंग्रेजी में एम.ए. तक शिक्षित हुए, उन्हें बचपन से ही 

जीवन के हर पहलू को करीब से देखने के कारण और साहित्य के प्रति अपने प्रेम के कारण यह कार्य किया। यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने किर्ति 

किसान संघर्ष से जुड़ी करीब 600 कविताओं को संग्रहित कर उन्हें वेबसाइट में सहेजा है। पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना के पूर्व अध्यक्ष गुरभजन 

गिल, अध्यक्ष प्रो.रविंदर भट्टल, डॉ गुरिकबल सिंह, सहप्रीत सिंह मंगत, त्रेलोचन लोची, मनजिंदर धनोआ और कंवलजीत सिंह शंकर ने कर्मजीत सिंह 

गठवाला को शुभकामनाएं दीं।

ps: कर्मजीत सिंह गठवाला, निदेशक, हिन्दी-कविता.कॉम पर किसान मजदूर संघर्ष 2020 से सम्बंधित कविताएँ 'हलधर फिर हुंकार उठे' कृति में 

प्रकाशित कर रहे हैं ।

लिंक :- http://www.hindi-kavita.com/Kisan-Majdoor-Sangharsh.php


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Wednesday, 24 February 2021

हाशिये पार की संवेदना : सीमांकन यादव - गोलेन्द्र पटेल

 

         सीमांकन यादव


 हाशिये पार की संवेदना


हमारे देश में संवेदना
केन्द्र में नहीं वरन् 
हाशिये पर है,
जोकि आवश्यकता पड़ने पर आती है केन्द्र में-अस्थाई तौर पर꫰
तबकि जब लुट चुकी होती है
किसी स्त्री की अस्मिता,
याकि हो जाती है निर्मम हत्या꫰
अन्ततः फिर लौटने लगती है संवेदना
हाशिये पर!

ठहरिये हुज़ूर! कुर्ता झाड़ लीजिए
हाँ कपासी कुर्ता,जो आता है किसानी खेत से,
छप्पन भोग खाते जाइये
हाँ गन्ना-अन्न-सब्जी से बना छप्पन भोग,जो आता है किसानी खेत से,
ग़ौर फ़रमायेंगे तो पायेंगे
कि आप चलते हैं किसानी खेत से,
लेकिन आज किसान खेत की मेड़ पर नहीं,
बैठा है लम्बे अरसे से अधखुले वितान तले
प्राचीरों के शहर में,आपकी तरफ टकटकी बाँधे꫰
आप कुछ नहीं कहना चाहते हुज़ूर?
कोई बात नहीं,मैं कहता हूँ आपकी चुप्पी को -'हाशिये पार की संवेदना',
जो कभी नहीं आती केन्द्र में꫰

2.

सरकारी बसंत

सुना है बसंत चल रहा है!
लेकिन, कहाँ?
किसान के खेतों में?
या बेरोज़गार हाथों में?
या महँगाई की दुनिया में?
या ये कहें कि बसंत का निजीकरण हो गया है,
अब वह चल रहा है सरकारी आदेश में,
पूँजीपतियों के इशारे पर!

- सीमांकन यादव
मो.न.- 6387482349
(रायबरेली,उत्तर प्रदेश)
परास्नातक,प्रथम वर्ष(हिन्दी)
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय꫰



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Monday, 22 February 2021

जारी है संकलन : "पतंग और पतंगा" / मकरसंक्रांति : पतंग पर केंद्रित कविताएँ

जारी है संकलन : "पतंग और पतंगा"



 

 ◆"पतंग" पर केंद्रित कविताएँ◆


1.

 

पतंग : आलोक धन्वा

(एक)

उनके रक्तो से ही फूटते हैं पतंग के धागे
और
हवा की विशाल धाराओं तक उठते चले जाते हैं
जन्म से ही कपास वे अपने साथ लाते हैं

धूप गरुड़ की तरह बहुत ऊपर उड़ रही हो या
फल की तरह बहुत पास लटक रही हो-
हलचल से भरे नींबू की तरह समय हरदम उनकी जीभ
                                       पर रस छोड़ता रहता है

तेज़ आँधी आती है और चली जाती है
तेज़ बारिश आती है और खो जाती है
तेज़ लू आती है और मिट जाती है
लेकिन वे लगातार इंतज़ार करते रहते हैं कि
कब सूरज कोमल हो कि कब सूरज कोमल हो कि
कब सूरज कोमल हो और खुले
कि कब दिन सरल हों
कि कब दिन इतने सरल हों
कि शुरू हो सके पतंग और धागों की इतनी नाज़ुक दुनिया
 
(दो)

सबसे काली रातें भादों की गयीं
सबसे काले मेघ भादों के गये
सबसे तेज़ बौछारें भादों की
मस्तूतलों को झुकाती, नगाड़ों को गुँजाती
डंका पीटती- तेज़ बौछारें
कुओं और तलाबों को झुलातीं
लालटेनों और मोमबत्तियों को बुझातीं
ऐसे अँधेरे में सिर्फ़ दादी ही सुनाती है तब
अपनी सबसे लंबी कहानियाँ
कड़कती हुई बिजली से तुरत-तुरत जगे उन बच्चोंह को
उन डरी हुई चिड़ियों को
जो बह रही झाड़ियो से उड़कर अभी-अभी आयी हैं
भीगे हुए परों और भीगी हुई चोंचों से टटोलते-टटोलते
उन्होंने किस तरह ढूँढ लिया दीवार में एक बड़ा सा सूखा छेद !

चिड़ियाँ बहुत दिनों तक जीवित रह सकती हैं-
अगर आप उन्हें मारना बंद कर दें
बच्चेप बहुत दिनों तक जीवित रह सकते हैं
अगर आप उन्हें मारना बंद कर दें
भूख से
महामारी से
बाढ़ से और गोलियों से मारते हैं आप उन्हें
बच्चों को मारने वाले आप लोग !
एक दिन पूरे संसार से बाहर निकाल दिये जायेंगे
बच्चों को मारने वाले शासकों !
सावधान !
एक दिन आपको बर्फ़ में फेंक दिया जायेगा
जहाँ आप लोग गलते हुए मरेंगे
और आपकी बंदूकें भी बर्फ़ में गल जायेंगी

(तीन)

सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादों गया
सवेरा हुआ
ख़रगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ानेवाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके-
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला काग़ज़ उड़ सके-
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके-
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाज़ुक दुनिया

जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अक्सर
छतों के खतरनाक किनारों तक-
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वीन और भी तेज़ घूमती हूई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।

1976 , कविता संग्रह  : "दुनिया रोज़ बनती है" से

आलोकधन्वा

आलोकधन्वा

परिचय

जन्म : 2 जुलाई, 1948

भाषा : हिंदी

विधाएँ : कविता

मुख्य कृतियाँ

कविता संग्रह : दुनिया रोज़ बनती है

सम्मान

पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, प्रकाश जैन स्मृति सम्मान

फोन

09931611041



2.

पतंग


अपनी ही नदी के तरंगों में फंसी रेत की तरह

यह एक पतंग है 

जो पत्तों  में उलझकर फड़फड़ा रही है


यह नहीं है इसकी थकान

नए उड़ान की तैयारी है


हवा शिथिल है 

विषाक्त जीवाणुओं से भरे इस समय में 

शिशिर की कठुआती छुवन के बीच 

अभी भी खूब चटकदार हैं इसके रंग


वह जानती है कि बसंत की नर्म हवाओं के भीतर से 

उठेगा कोई हाथ 

जिसका तप्त स्पर्श पा

वह लहरा उठेगी 

एक नए समय में!

(©श्रीप्रकाश शुक्ल : 18/1/2021)


श्रीप्रकाश शुक्ल

श्रीप्रकाश शुक्ल

परिचय

जन्म : 18 मई 1965


भाषा : हिंदी

विधाएँ : कविता, आलोचना

मुख्य कृतियाँ

कविता संग्रह : अपनी तरह के लोग, जहाँ सब शहर  नहीं होता, बोली बात, रेत  में आकृतियाँ, ओरहन और अन्य कविताएँ
आलोचना : साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौंदर्य, नामवर की धरती 
संपादन : परिचय (साहित्यिक पत्रिका)

सम्मान

मलखानसिंह सिसोदिया पुरस्कार, नरेश मेहता कविता  पुरस्कार (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान)

संपर्क

909 काशीपुरम कॉलोनी, सीर्गोवर्धन वाराणसी, उत्तर प्रदेश -221005

फोन

09415890513

ई-मेल

shriprakashshuklabhu@gmail.com










3.

१).
पतंग : गोलेन्द्र पटेल


पीढ़ी दर पीढ़ी की पीड़ा
परित्रस्त पूर्वजों के पत्र में दर्ज
कन्नी खाती हुई 
मेरी पतंग पढ़ती है 
आसमान में मौन

आँसुओं की बूँदें टपकती हैं
खेतों की दरार में
जड़ें मिट्टी से सोख लेती हैं
किसानी का पसीना
हवा में फैल जाती है
श्रम की गंध
जीवन की डोर खिंचती है पतंग

उमंग उड़ रही है
संबंधों के सारे रंग
बिखर गये हैं
घास में

गेहूँ बिता भर 
बढ़ा है
ठिगना चना संग मटर
खड़ा है
बथुआ खोट कर 
चली है
बूढ़ी माँ घर की ओर
मेंड़ पर
सरसों फूली है
तरुणी तीसी की पत्ती हिल रही है
पास में

धूप खिल गयी है
पेड़ पर
रिश्ते की रेशमी रील
लिपट रहा हूँ
प्रेम के परेते में
चमकती हुई 
चेतना की चमकिदी गुड्डी उड़ रही है
आकाश में

जिस तरह भूख बढ़ने पर खूँटे से बँधी गाय
तोड़ डालती है मजबूत से मजबूत पगहा
ठीक उसी तरह उखड़ कर 
चिड़ियों के भाँति नापना चाहती है धरती 
मेरी पतंग

नहीं नहीं
यह संभव नहीं है
आत्मा पूछती है पीड़ा से
तुम कौन?

मेरी पतंग...!

(©गोलेन्द्र पटेल : 29-12-2020)


२). आसमान में पतंग 

चाह है कि 
पावन पर्व पर प्यार बढ़े
रोष की रस्सी टूटे
प्रसन्नता की पतंग तने आसमान में

चेहरे पर चेतना की चमक चढ़े
बुरी आदत छूटे
सभी सहृदय बने इंसान में

हर कोई खुद को गढ़े
मानवता की महक हरदम जूटे
जिंदगी के जहान में

हर कोई परोपकारिता का पाठ पढ़े
बच्चे खुशियाँ लूटे
समय के सीवान में।

(©गोलेन्द्र पटेल : 14/01/2021)

३).

पीड़ा की पंतग

तकलीफ़ की ताँत में बधी हुई
पीड़ा की पंतग
तनती है जब आसमान में
तब मेरी स्मृति का चाँद
ख़त पढ़ने के लिए
उतर आता है बादलों पर
पर बुरी नज़र की नख़
पढ़ने से पहले ही काट देती है
उसकी प्रसन्नता की पतंग!

रचना : 14-01-2022

गोलेन्द्र पटेल




परिचय

जन्म : 5 अगस्त 1999

भाषा : हिंदी

विधाएँ : कविता , कहानी, आलोचना, उपन्यास एवं अन्य विधाएँ।

संपर्क

ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत 221009

फोन

08429249326

ई-मेल

corojivi@gmail.com            





"पतंगा" पर केंद्रित कविताएँ

1.

एक पतंगा

इस लोह-खम्भ से एक पतंगा उड़ता हुआ
अभी-अभी टकराया है बुरीतरह

कुछ देर तड़पा और शांत हो गया
मुझे लगा शायद मर गया 

लेकिन नहीं,
थोड़ी देर बाद उसमें हुई थोड़ी हलचल 
खाई अलटी-पलटी पँख फैलाए कोशिश की उड़ने की
कई बार लुढ़का गश्त खाकर
फिर उठा और उड़ा कुछ देर
फिर उठा और उड़ा और कुछ दूर
फिर उठा और और उड़ा अधिक देर
अधिक दूर 

इस बार उठकर उड़ा तो निकल गया कहाँ-का-कहाँ
पता नहीं

कुछ देर बाद उड़कर आए लोह-खम्भ के आसपास 
कुछ वैसे ही पतंगें
कुछ लटके और कुछ जा बैठे लोह-खम्भ के शिखर पर
और नोंचने लगे पाँवों से खम्भ का लोहा

शिनाख़्त बहुत मुश्किल है, कि इनमें तो शामिल नहीं
मौत से टकराकर जीना सीखा है 
जिसने अभी-अभी
एक पतंगा !

                                                     -वसंत सकरगाए-
                                                       23/02/2021


*कवि परिचय : संक्षेप में*


कवि वसंत सकरगाए 2 फरवरी 1960 को हरसूद(अब जलमग्न) जिला खंडवा मध्यप्रदेश में जन्म। म.प्र. साहित्य अकादमी का दुष्यंत कुमार,मप्र साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी सम्मान,शिवना प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान तथा अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता के लिए ‘संवादश्री सम्मान।
-बाल कविता-‘धूप की संदूक’ केरल राज्य के माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल।
-दूसरे कविता-संग्रह ‘पखेरु जानते हैं’ की कविता-‘एक संदर्भ:भोपाल गैसकांड’ जैन संभाव्य विश्विलालय द्वारा स्नातक पाठ्यक्रम हेतु वर्ष 2020-24 चयनित।दो कविता-संग्रह-‘निगहबानी में फूल’ और ‘पखेरु जानते हैं’

संपर्क-ए/5 कमला नगर (कोटरा सुल्तानाबाद) भोपाल-462003


कवि : स्वप्निल श्रीवास्तव

पूर्वी उ प्र के जनपद सिद्धार्थनगर के एक गांव में 05 अक्टूबर 1954 को जन्म । शुरुवाती शिक्षा गांव में हुई । हाई स्कूल इंटर जनपद कुशीनगर के एक कस्बे में । गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम ए के साथ यल यल बी । उ प्र सरकार में एक अधिकारी के रूप में राज्य के अनेक जनपदों में तैनाती । कवि के साथ कहानी लेखन ।
 कविता संग्रह
ईश्वर एक लाठी है , ताख पर दियासलाई , मुझे दूसरी पृथ्वी चाहिए , जिंदगी का मुकदमा ,जब तक है जीवन
 कहानी संग्रह 
एक पवित्र नगर की दास्तान , स्तूप और महावत 
 संस्मरणों की किताब - जैसा मैंने जीवन देखा ।
 कविता के लिए , भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार के साथ फ़िराक सम्मान , केदार सम्मान , शमशेर सम्मान ।
   तथा रूस का अंतराराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान ।
  कविताओं के अनुवाद रूसी नेपाली , बंगाली , मराठी ,पंजाबी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में ।
 फिलहाल सेवानिवृत्त के बाद फैज़ाबाद में स्थायी निवास ।
सम्पर्क -510 -अवधपुरी कालोनी , अमानीगंज 
फैज़ाबाद -224001
मोबाइल - 9415332326


कविता

पतंग उड़ाते बच्चे : स्वप्निल श्रीवास्तव

टेलिफ़ोन के तारों के बीच फँसी हुई है पतंग
बच्चे डोर का आख़िरी सिरा खोज रहे हैं
वे उसे उड़ाएंगे नए आकाश में

पतंग बच्चों के हाथ में है
जिससे वे छुएंगे आकाश
और विद्युत की कंपन महसूस करेंगे अपने शरीरों में
बच्चों के शरीरों में आएगी स्फूर्ति
वे दौड़ेंगे-- इस छत से उस छत
पतंग के साथ

छत पर तमाम बच्चे हैं
आकाश में तमाम पतंगें
माता-पिता मना करते हैं बच्चों को
बच्चे परवाह नहीं करते
वे जोख़िम उठाने के लिए रहते हैं हर वक़्त तैयार

पतंग उड़ाते हुए वे नहीं सोचते कि
उनके पीछे कहाँ ख़त्म हो रही है छत
या ज़मीन पर कहाँ है अन्धा कुँआ
उनकी आँखों में है नीला आकाश
आकाश में तैरती हुई पतंगें
पतंगें-- जैसे ग्लास-टैंक में तैर रही हों
रंग-बिरंगी मछलियाँ

पतंग उड़ाते बच्चे आकाश को भेजते हैं संदेश
कि वे आकाश को जीतने आ रहे हैं

(साभार- कविता कोश)



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★ संपादक संपर्क सूत्र :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र}

ह्वाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


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◆ संकलन कर्ता : आलोचक अर्जुन◆



 


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