Monday, 9 February 2026

कहानी:: वर्ण से आगे || लेखक:: गोलेन्द्र पटेल

कहानी:: वर्ण से आगे
लेखक:: गोलेन्द्र पटेल


पहला अंक: सभा में बोला गया नाम (एक समकालीन वैदिक कथा)

हस्तिनापुर के बाहरी भाग में स्थित था निक्षेप-गृह “धनवेध”।
यज्ञ नहीं होते थे वहाँ,
पर लेन–देन की अग्नि दिन-रात जलती रहती थी।
उस दिन सभा असामान्य रूप से भरी हुई थी।
काउंटर के पीछे बैठी थी शिखंडी राठौरी—
युवती, शिक्षित, संयमी।
वह वर्षों से धनवेध में कार्यरत थी।
सामने खड़े थे श्रुतकीर्ति त्रिपाठी—
माथे पर तिलक, वाणी में अधीरता।
उनके साथ थीं उनकी पत्नी सावित्री त्रिपाठी,
जो उसी निक्षेप-गृह की लेखाकार थीं
और आज उनका अंतिम कार्य-दिवस था।
“त्याग-पत्र की प्रक्रिया इतनी विलंबित क्यों?”
श्रुतकीर्ति का स्वर प्रश्न नहीं, आदेश था।
शिखंडी ने शांति से कहा—
“प्रविष्टि शेष है, आर्य। नियम सबके लिए समान हैं।”
श्रुतकीर्ति हँसे—
“नियम? हम वे हैं जो नियम समझाते हैं।”
सभा में खड़े लोग चुप रहे।
चुप्पी—सदैव की तरह—सत्ता के पक्ष में थी।
सावित्री ने धीरे से कहा—
“स्वामी, छोड़ दीजिए… मुझे देर नहीं।”
पर अहंकार को विराम कहाँ।
श्रुतकीर्ति का स्वर तीखा हुआ—
“कुछ लोग अपनी मर्यादा भूल जाते हैं।”
यही वह क्षण था
जब शिखंडी ने लेख-पट्ट से दृष्टि उठाई।
“मर्यादा वाणी की होती है,”
उसने कहा,
“जन्म की नहीं।”
श्रुतकीर्ति ने तिरस्कार से पूछा—
“तुम जानती हो मैं कौन हूँ?”
सभा में सन्नाटा छा गया।
शिखंडी ने उत्तर दिया—
“और आप जानते हैं—मैं कौन हूँ?”
क्षण भर की नीरवता।
फिर उसने कहा—
“मैं क्षत्राणी हूँ।”
बस इतना।
न कोई गर्जना,
न कोई धमकी।
पर जैसे किसी ने
सभा के भीतर छिपे दोहरे नियमों को उजागर कर दिया हो।
श्रुतकीर्ति हँसे—
“तभी यह साहस।”
शिखंडी का स्वर स्थिर रहा—
“साहस नहीं—अनुभव।”
“जन्म लिया—तो राज्य की योजनाओं से बाहर।
आश्रम में पढ़ी—तो छात्रवृत्ति नहीं।
गुरुकुल गई—तो सर्वोच्च मापदंड।
सेवा हेतु आवेदन किया—तो सबसे अधिक शुल्क।”
सभा में खड़े एक वृद्ध ने कहा—
“यदि पहचान पूछी जाती है हर द्वार पर,
तो उसे बोलना अपराध कैसे?”
श्रुतकीर्ति मौन थे।
पर कथा वहाँ समाप्त नहीं हुई।
★★★


कट टू: जनसभा–ए–डिजिटल
किसी ने आधे संवाद का अंश
ताम्र-पट पर अंकित कर प्रसारित कर दिया।
संदर्भ गायब था।
निर्णय तैयार।
घोषणाएँ गूँजने लगीं—
“अहंकार!”
“दबंगई!”
जो कल तक कहते थे—
“इस युग में वर्ण नहीं”—
आज वही सबसे ऊँची आवाज़ थे।
कोई बोला—
“यदि उसने कहा होता—‘मैं वंचित हूँ’—तो साहस होता।”
कोई बोला—
“यदि कहा होता—‘संविधान की संतान’—तो सम्मान।”
पर उसने कहा था बस—
“मैं क्षत्राणी हूँ।”
और यही असह्य ठहरा।
★★★


शिखंडी का पक्ष
शिखंडी ने सभा के बाहर कहा—
“जिस राज्य में
हर दस्तावेज़ में वर्ण पूछा जाता है,
हर अवसर पर पहचान माँगी जाती है,
वहाँ अपने नाम के साथ
अपना वर्ण कहना अपराध कैसे हो गया?
मुझे बार-बार बताया गया
कि मैं कौन हूँ।
आज यदि मैंने स्वयं कह दिया—
तो यह अहंकार कैसे?”
★★★


अंतिम दृश्य
धनवेध के अधिपति की मेज़ पर ताम्र-पत्र रखा गया।
“जाँच होगी।”
शिखंडी ने द्वार से बाहर जाते हुए कहा—
“मेरी नहीं—
उस व्यवस्था की जाँच होनी चाहिए
जो वर्ण से लाभ लेती है
और सत्य से भय खाती है।”
द्वार बंद हुआ।
बाहर लोग थे—
कुछ समर्थन में,
कुछ विरोध में।
पर निष्कर्ष स्पष्ट था—
यह युद्ध ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय का नहीं।
यह युद्ध है—
चयनात्मक नैतिकता
और
सुविधाजनक आक्रोश
के बीच।
और इस युग का सबसे बड़ा अपराध—
अपने नाम के साथ सच बोल देना।
★★★


दूसरा अंक : “वर्ण का उच्चारण”(ब्राह्मण बनाम ठाकुर)

1. सभा-गृह “अर्थनिधि”

हस्तिनापुर के दक्षिणी छोर पर स्थित था
अर्थनिधि सभा-गृह—
जहाँ धन नहीं,
विश्वास जमा किया जाता था।
काष्ठ-स्तंभों के बीच बैठी थी
वीरजा सिंहदत्ता।
क्षत्रिय कुल में जन्मी,
पर वर्षों से उसने अपने वर्ण से अधिक
अपने कर्म पर भरोसा किया था।
सामने खड़े थे
देवव्रत उपाध्याय—
श्रुतियों के ज्ञाता,
वाणी में शास्त्र,
और व्यवहार में अधीरता।
उनकी पत्नी शारदा उपाध्याय
उसी सभा-गृह की गणनाकार थीं।
आज उनका अंतिम दिवस था।
★★★


2. टकराव
“गणना-पत्र अब तक पूर्ण क्यों नहीं?”
देवव्रत ने पूछा।
वीरजा ने शांति से कहा—
“नियमों के अनुसार प्रक्रिया चल रही है, आर्य।”
देवव्रत मुस्कराए—
“नियम?
हमने ही तो नियम गढ़े हैं।”
सभा में बैठे लोग चुप रहे।
ब्राह्मण की वाणी—अक्सर प्रश्न नहीं होती,
निर्णय होती है।
शारदा ने धीरे से कहा—
“स्वामी, विवाद न बढ़ाइए…”
पर देवव्रत का स्वर तीखा हो गया—
“कुछ लोग अपनी सीमा भूल जाते हैं।”
वीरजा ने लेख-पट्ट से दृष्टि उठाई।
“सीमा कर्म की होती है,”
उसने कहा,
“जन्म की नहीं।”
देवव्रत ने तिरस्कार से पूछा—
“तुम जानती हो मैं कौन हूँ?”
★★★


3. नाम का उच्चारण

क्षण भर का सन्नाटा।
फिर वीरजा बोली—
“और आप जानते हैं—मैं कौन हूँ?”
सभा सिमट आई।
“मैं ठाकुर हूँ।
क्षत्राणी।”
बस इतना।
न ललकार।
न धमकी।
पर जैसे सभा-गृह में
पुराने समीकरण हिल गए हों।
देवव्रत हँस पड़े—
“तभी यह अकड़।”
वीरजा का स्वर स्थिर था—
“इसे अकड़ मत कहिए।
इसे हिसाब कहिए।”
★★★

4. क्षत्रिय का हिसाब

“जन्म लिया—तो राज्य की योजनाओं से बाहर।
आश्रम में पढ़ी—तो सहायता नहीं।
गुरुकुल पहुँची—तो सबसे ऊँचा मापदंड।
सेवा-पत्र भरा—तो सबसे अधिक शुल्क।”
सभा में एक वृद्ध क्षत्रिय बोला—
“जब हर द्वार पर वर्ण पूछा जाता है,
तो उसे बोल देना अपराध कैसे?”
देवव्रत चुप थे।
पर मौन भी एक पक्ष होता है।
★★★


5. ब्राह्मण का प्रतिवाद

देवव्रत ने कहा—
“वर्ण बोलना नहीं,
वर्ण का रौब दिखाना दोष है।”
वीरजा ने उत्तर दिया—
“और वर्ण का लाभ लेना?
वह दोष नहीं?”
“आप कहते हैं—
देश में वर्ण नहीं।
पर हर दस्तावेज़ में
पहला प्रश्न यही है—
‘तुम कौन हो?’”
सभा में फुसफुसाहट फैल गई।
★★★


6. अधूरी कथा

उसी समय
किसी ने सभा का अधूरा संवाद
ताम्र-पट पर उतार लिया।
बस इतना लिखा गया—
“मैं ठाकुर हूँ।”
बाक़ी सब—
हटा दिया गया।
अगले ही दिन
जनसभा में घोषणाएँ होने लगीं—
“सामंती अहंकार!”
“क्षत्रिय दबंगई!”
जो कल तक कहते थे—
“वर्ण कहना गर्व है”—
आज वही बोले—
“यह ज़हर है।”
★★★


7. अंतिम दृश्य

अर्थनिधि के अधिपति ने कहा—
“जाँच होगी।”
वीरजा ने द्वार से बाहर जाते हुए कहा—
“यह जाँच मेरी नहीं,
उस व्यवस्था की हो
जो ब्राह्मण को ‘परंपरा’ कहकर
और ठाकुर को ‘अहंकार’ कहकर
एक ही शब्द को
दो अलग अर्थ देती है।”
द्वार बंद हुआ।
★★★


8. निष्कर्ष

यह युद्ध
ब्राह्मण बनाम ठाकुर का था—
पर तलवारों का नहीं।
यह युद्ध था—
वर्ण बोलने की आज़ादी
बनाम
वर्ण से लाभ लेने की चुप्पी
और इस युग में
सबसे बड़ा अपराध यही है—
अपने नाम के साथ
सच का उच्चारण।
★★★


तीसरा अंक : “बहुजन का प्रश्न”(ब्राह्मण, ठाकुर बनाम बहुजन दृष्टि)
1. जब बहस ऊँचाई पर अटक जाती है
नगर-सभा में फिर भीड़ थी।
मंच पर दो ध्रुव साफ़ थे—
एक ओर
देवव्रत उपाध्याय—
शास्त्र, परंपरा और मर्यादा की बात करते हुए।
दूसरी ओर
वीरजा सिंहदत्ता—
सम्मान, कर्म और समान अवसर की भाषा में।
सभा तालियों और आरोपों में बँटी हुई थी।
पर भीड़ के पीछे,
जहाँ कोई मंच नहीं होता,
वहाँ खड़ा था
कालू नायक।
ना शास्त्री।
ना क्षत्रिय।
बहुजन।
★★★


2. बहुजन का प्रवेश

कालू धीरे-धीरे आगे आया।
न उसकी आवाज़ ऊँची थी,
न शब्द सजावटी।
उसने पूछा—
“क्या मैं भी कुछ कह सकता हूँ?”
सभा रुकी।
पहली बार यह प्रश्न
किसी ब्राह्मण या ठाकुर ने नहीं,
बहुजन ने पूछा था।
★★★


3. सवाल जो असहज करते हैं

कालू बोला—
“आप दोनों लड़ रहे हैं
कि वर्ण बोलना सही है या ग़लत।
पर मेरा प्रश्न अलग है—
जिस वर्ण को बोलने की ताक़त भी नहीं,
उसका क्या?”
लोग चुप।
“जब ब्राह्मण कहता है—
‘वर्ण हमारी पहचान है’
तो उसे संस्कृति कहते हैं।
जब ठाकुर कहता है—
‘वर्ण मेरी गरिमा है’
तो उसे अहंकार कहते हैं।
और जब बहुजन कुछ कहे—
तो उसे
‘राजनीति’
या ‘आरक्षण का लालच’ कह दिया जाता है।”
★★★


4. बहुजन का यथार्थ

“मैं उस समाज से हूँ,”
कालू ने कहा,
“जहाँ—
नाम से पहले जाति लगाओ, तो अपमान
नाम से जाति हटाओ, तो पहचान गुम
आगे बढ़ो, तो ‘कोटा’
पीछे रहो, तो ‘कर्मफल’”
उसने दोनों की ओर देखा—
“आप दोनों का संघर्ष
ऊपर की सीढ़ियों पर है।
हम तो
सीढ़ी बनाने वालों में हैं—
जिनका नाम कहीं लिखा नहीं।”
★★★


5. पहली दरार

वीरजा ने सिर झुकाया।
देवव्रत की उँगलियाँ थम गईं।
कालू ने कहा—
“समस्या यह नहीं कि
ब्राह्मण या ठाकुर कौन है।
समस्या यह है कि
निर्णय हमेशा वही करते हैं,
और कीमत हमेशा बहुजन चुकाता है।”
★★★


6. समरसता का अर्थ

“सामाजिक समरसता,”
कालू बोला,
“मतलब यह नहीं कि
हम सब एक जैसे बन जाएँ।
मतलब यह है कि—
कोई भी जन्म से बड़ा या छोटा न हो
अवसर वर्ण से नहीं, योग्यता से मिले
और इतिहास सिर्फ़ विजेताओं का न हो”
उसने साफ़ कहा—
“जब तक ब्राह्मण और ठाकुर
आपस में तय करेंगे
कि बहुजन को कितना दिया जाए—
तब तक बराबरी एक भाषण ही रहेगी।”
★★★


7. परिवर्तन की शुरुआत

देवव्रत ने पहली बार कहा—
“शायद शास्त्रों को
समय के प्रश्नों से
फिर पढ़ना होगा।”
वीरजा बोली—
“और सत्ता को
अपनी चुप्पियों का
हिसाब देना होगा।”
कालू ने सिर हिलाया—
“और बहुजन को
ख़ुद को ‘अनुग्रह’ नहीं,
अधिकार समझना होगा।”
★★★


8. नया संकल्प

सभा-गृह में एक प्रस्ताव रखा गया—
निर्णय समितियों में
बहुजन की बराबर भागीदारी
शिक्षा और सेवा में
समान मापदंड
और सबसे ज़रूरी—
सम्मान की भाषा
यह कोई क्रांति नहीं थी।
यह संतुलन था।
★★★


9. अंतिम दृश्य

सभा विसर्जित हुई।
कालू बाहर निकलते हुए बोला—
“आज आपने
ब्राह्मण बनाम ठाकुर से आगे
सोचना शुरू किया है।
यही समता की पहली सीढ़ी है।”
वीरजा और देवव्रत
दोनों ने पहली बार
एक साथ सिर हिलाया।
★★★


समापन

यह कथा किसी एक वर्ण की जीत नहीं है।
यह उस समाज की संभावना है—
जहाँ
ब्राह्मण ज्ञान के लिए सम्मानित हो,
ठाकुर जिम्मेदारी के लिए,
और बहुजन—
मनुष्य होने के लिए।
यहीं से
समतामूलक समाज शुरू होता है।

★★★

चौथा अंक : “जाति है—कि जाती नहीं”

1. आधुनिक भवन, प्राचीन मन

शहर के मध्य में खड़ा था
नवीनतम तकनीक से सुसज्जित
निजी वित्त संस्थान—
“आर्यावर्त कैपिटल बैंक”।

काँच की दीवारें थीं,
पर भीतर बैठे मन
अब भी पत्थर के थे।

काउंटर पर थी
सुचिता सामंती—
तेज़, प्रशिक्षित, समय की पाबंद।

आज उसका सामना था
रुचि त्रिपाठी से—
वरिष्ठ अधिकारी,
जिनका त्याग-पत्र
औपचारिकताओं में अटका था।
★★★

2. प्रक्रिया बनाम प्रभुत्व

“इतनी देर क्यों?”
रुचि का स्वर ऊँचा था।

सुचिता ने सुजाता से कहा—
“प्रक्रिया पूर्ण होते ही स्वीकृति मिलेगी, मैडम।”

शब्द सामान्य थे,
पर अर्थ को
अहंकार ने खींच लिया।

रुचि का चेहरा कठोर हुआ—
“तुम जानती हो, मैं कौन हूँ?”

बैंक-हॉल में
वही पुराना प्रश्न गूँजा
जो सदियों से गूँजता आया है।
★★★

3. पहचान का टकराव

सुचिता ने सिर उठाया—
“और आप जानती हैं,
मैं कौन हूँ?”

क्षण भर की नीरवता।

“मैं क्षत्रिय परिवार से हूँ,”
उसने कहा—
न गर्व में,
न धमकी में—
सिर्फ़ तथ्य की तरह।

यहीं से
संवाद फिसल गया।
★★★

4. पुरुष की मध्यस्थता—या साज़िश

घटना यहीं समाप्त हो सकती थी।
पर रुचि के पति
ऋषभ तिवारी 
ने इसे
सोशल माध्यमों पर
“जातीय अपमान”
शीर्षक से डाल दिया।

संवाद काटे गए।
संदर्भ हटाए गए।
और कथा
वायरल हो गई।

अब यह
दो स्त्रियों का टकराव नहीं,
“बाभन बनाम ठाकुर”
घोषित कर दी गई।
★★★

5. मानवतावादी हस्तक्षेप

उसी शाम
एक ऑनलाइन परिचर्चा में
एक आवाज़ उभरी—
नीलम नायक की।

न ऊँची,
न उत्तेजित।

उसने कहा—

“आप दोनों
अपनी-अपनी जाति की बात कर रही हैं।
पर क्या आपने
यह पूछा कि—

इस व्यवस्था में
स्त्री की जाति क्या है?”

लोग चुप।

“मनुस्मृति में
ब्राह्मण स्त्री भी
स्वतंत्र नहीं थी।
क्षत्रिय स्त्री भी
उत्तराधिकार से वंचित थी।

आप दोनों
जिस व्यवस्था पर गर्व कर रही हैं,
वहाँ आप
पूर्ण मनुष्य नहीं थीं।”
★★★

6. बाबासाहेब की याद

नीलम बोली—

“यदि आज
आप बैंक में बैठी हैं,
वेतन पा रही हैं,
निर्णय ले रही हैं—
तो वह
वर्ण व्यवस्था की देन नहीं।

वह देन है
डॉ. अंबेडकर की—
जिन्होंने
स्त्री को
धर्म से नहीं,
अधिकार से जोड़ा।”

हॉल में खामोशी थी।
★★★

7. असली प्रश्न

“असली सवाल यह नहीं,”
नीलम ने कहा,
“कि किसने
कौन-सी जाति बोली।

असली सवाल यह है—

जब बैंक का फॉर्म
आज भी जाति पूछता है,
जब समाज
आज भी जाति से आँकता है—
तो फिर
जाति बोलने पर
नैतिकता क्यों जागती है?”
★★★

8. निष्कर्ष

यह संघर्ष
ब्राह्मण बनाम ठाकुर का नहीं था।

यह संघर्ष था—

जाति पर गर्व
बनाम
जाति से मुक्ति का।

और मानवतावादी दृष्टि
साफ़ कहती है—

जब तक
जाति पहचान का स्रोत रहेगी,
तब तक
स्त्री, श्रमिक और बहुजन
सिर्फ़ मोहरे रहेंगे।

जाति को
न गौरव चाहिए,
न गाली—
उसे चाहिए
विदाई।
★★★

9. अंतिम पंक्ति

नीलम ने कहा—

“जाति पूछने वाली व्यवस्था में
जाति बोलना अपराध नहीं।

अपराध है—
उस व्यवस्था को
हमेशा के लिए
बनाए रखना।”

और यहीं
कथा
वर्ण से आगे
वास्तव में
कदम रखती है।
★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, 3 February 2026

बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक || गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप — गोलेन्द्र पटेल

बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक

बहुजन आंदोलन किसी एक काल या व्यक्ति की उपज नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे उस प्रतिरोध की निरंतरता है, जो बुद्ध की करुणा से शुरू होकर कबीर–रविदास की निर्भीक वाणी, फुले–सावित्रीबाई की शिक्षा-दृष्टि, शाहू की सामाजिक न्याय नीति और डॉ. अंबेडकर के संवैधानिक संघर्ष तक विकसित हुआ। पेरियार और कांशीराम ने इसे वैचारिक और राजनीतिक धार दी—जहाँ आत्मसम्मान, शिक्षा और सत्ता बहुजन मुक्ति के केंद्रीय औज़ार बने।

इसी ऐतिहासिक परंपरा में गोल्डेन दास एक समकालीन हस्तक्षेप के रूप में सामने आते हैं। वे बिहार में सक्रिय उस बहुजन नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सड़क, थाना और अदालत—तीनों स्तरों पर व्यवस्था से सीधा संवाद करता है। अनेक मुकदमे, बार-बार की जेल यात्राएँ और निरंतर विवाद—दरअसल उनके संघर्ष की सामाजिक कीमत हैं। गोल्डेन दास का नेतृत्व बहुजन समाज के उस आक्रोश को स्वर देता है, जो पुलिसिया दमन, जातिवादी अन्याय और संस्थागत चुप्पी के विरुद्ध खड़ा है।

बहुजन आंदोलन का लक्ष्य आज भी वही है—सामाजिक समानता, राजनीतिक भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक प्राप्ति। यह आंदोलन न तो स्मृति है, न नारा; यह एक जीवित संघर्ष है, जो नए समय में नए रूप लेकर सामने आ रहा है। गोल्डेन दास जैसे युवा नेता, सामाजिक योद्धा इसी परिवर्तनशील बहुजन चेतना के समकालीन संकेत हैं।

गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप

यह कोई एक नाम की कथा नहीं है
यह सदियों की चलती हुई पदचाप है
जिसमें तथागत की मौन करुणा है
और कबीर की आँखों में जलता प्रश्न।

रैदास ने सपने को
चर्मकार की झोपड़ी से उठाया
तुकाराम ने भक्ति को
ब्राह्मणवाद की कैद से छुड़ाया
फुले ने इतिहास को
पहली बार
शूद्र की आँख से पढ़ा
और सावित्रीबाई ने
ज्ञान को
स्त्री के हाथों में सौंप दिया।

शाहू ने सत्ता को
नीचे झुकना सिखाया
अंबेडकर ने संविधान में
बहुजन का हस्ताक्षर दर्ज किया
पेरियार ने ईश्वर से सवाल किया
कांशीराम ने कहा,
सत्ता ही सबसे बड़ा धर्म है।

यह परंपरा
किसी मंदिर में नहीं ठहरी
यह सड़क पर उतरी
थानों में दाख़िल हुई
और अदालतों से आँख मिलाकर बोली।

इसी परंपरा में
एक नाम और जुड़ता है
गोल्डेन दास।

वे किताब नहीं हैं
वे फ़ाइल भी नहीं
वे एफआईआर के पन्नों में
लिखा हुआ प्रतिरोध हैं
सत्तर मुक़दमे
दरअसल सत्तर बार
सिस्टम से की गई पूछताछ हैं
बीस जेल यात्राएँ
दरअसल बीस बार
अन्याय को दी गई चुनौती हैं।

वे थाने में जाते हैं
डर के साथ नहीं
संविधान लेकर
वे पूछते हैं
कानून किसके लिए है?
और जवाब न मिले तो
आवाज़ को और ऊँचा कर देते हैं।

बिहार की गलियों में
जब उनका नाम गूँजता है
तो दलित स्त्री की आँख
थोड़ी कम डरी होती है
पिछड़े मज़दूर की पीठ
थोड़ी कम झुकी होती है
अल्पसंख्यक बच्चे
थोड़ा सीधा चलते हैं।

वे विवाद हैं
क्योंकि अन्याय को
शांति पसंद नहीं आती
वे आक्रामक हैं
क्योंकि सदियों का अपमान
नरमी से नहीं टूटता।

बहुजन आंदोलन
कोई बीता हुआ अध्याय नहीं
यह वर्तमान का खुला घाव है
जो शिक्षा माँगता है
सम्मान माँगता है
और सत्ता में हिस्सेदारी माँगता है।

यह आंदोलन कहता है
हम 85 प्रतिशत हैं
फिर भी हाशिए पर क्यों?
यह आंदोलन कहता है
बहुजन हिताय
अब सिर्फ नारा नहीं
बहुजन सुखाय
अब नीति बनेगा।

इसलिए गोल्डेन दास
कोई अकेला व्यक्ति नहीं
वे एक निरंतरता हैं
बुद्ध से अंबेडकर तक
और अंबेडकर से
आज की सड़क तक।

यह क्रांतिकारी आवाज़ 
किसी महिमा का गीत नहीं
यह एक घोषणा है
कि बहुजन
अब इतिहास में नहीं
इतिहास के केंद्र में
खड़े होने आ रहे हैं

और यह यात्रा
अब लौटने वाली नहीं।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com





Monday, 2 February 2026

राजकुमार यादव : बहुजन बिरहा की समकालीन चेतना — गोलेन्द्र पटेल

राजकुमार यादव : बहुजन बिरहा की समकालीन चेतना


राजकुमार यादव आज के समय में बिरहा को केवल लोकगायन नहीं, बल्कि बहुजन समाज की वैचारिक आवाज़ में रूपांतरित करते हैं। पूर्वांचल की मिट्टी से निकली उनकी गायकी मनोरंजन से आगे बढ़कर जागरण का मिशन बन जाती है। वे उस बिरहा परंपरा के गायक हैं, जहाँ विरह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक होता है।

उनके गीत तथागत बुद्ध, संत कबीरदास, संत रविदास, संत तुकाराम, राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज, विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर, पेरियार, कांशीराम, ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा की वैचारिकी से संचालित हैं। जाति-व्यवस्था, मनुवाद, धार्मिक पाखंड, मीडिया-सत्ता गठजोड़ और संविधान की अवहेलना—ये सभी विषय उनकी गायकी में प्रतिरोध की भाषा पाते हैं। मंच पर उठता “जय भीम” और “नमो बुद्धाय” केवल नारे नहीं, बल्कि बहुजन आत्मसम्मान की उद्घोषणा हैं।


राजकुमार यादव की बिरहा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अशिक्षित और ग्रामीण समाज तक भी सामाजिक न्याय की जटिल अवधारणाओं को भावनात्मक और संगीतमय ढंग से पहुँचाती है। यही कारण है कि उनकी गायकी समर्थन और विवाद—दोनों के केंद्र में रहती है। समर्थकों के लिए वे बहुजन की सच्ची आवाज़ हैं, और आलोचकों के लिए असुविधाजनक प्रश्न।

वस्तुतः राजकुमार यादव की बिरहा यह सिद्ध करती है कि लोक-संस्कृति जब चेतना से जुड़ती है, तो वह आंदोलन बन जाती है। बहुजन आंदोलन का दिमाग जहाँ विचार गढ़ता है, वहीं उनकी बिरहा उसकी वह आवाज़ है, जो समाज को सुनाई देती है।


मिशन बहुजन बिरहा गीत
(चाल: “मनुवाद की खटिया खड़ी कर देहला” – बहुजन बिरहा सम्राट राजकुमार यादव जी को समर्पित)

(ढोलक – ठेकेदार चाल, प्रवेश हुंकार)
अरे सुनो रे भाई सुनो,
आज बिरहा आग उगले!
जय भीम! नमो बुद्धाय!
मनुवाद का खेल न चले!


मुखड़ा (Hook Line – बार-बार आएगा)

खटिया हिल गई रे बाबा,
जब संविधान बोला,
जय भीम की गूँज पड़ी तो
झूठा भगवान डोला।



पूरब की माटी बोले आज,
आजमगढ़ से तान चली,
गाजीपुर–सुल्तानपुर
हर चौपाल में बात चली।

हम गाना नहीं आए साथी,
हम मिशन लेकर आए,
जो सदियों से दबा पड़ा था
आज वही सवाल उठाए।

मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब बहुजन जागा,
जिसने पचासी को लूटा था
उसका हिसाब माँगा।



पहले बिरहा साजन रोवे,
अब बिरहा समाज रोए,
भूख, जाति, अपमान की पीड़ा
सुर बनके बाहर होए।

बाबासाहेब जब उतरे स्वर में,
भीड़ नहीं—इतिहास खड़ा,
किसी की आँख में आग जली,
किसी का कलेजा फटा।


मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब भीम बोला,
संविधान की एक-एक पंक्ति
सत्ता को चुभोला।



कांशीराम जब रावण बनें,
मनुवाद काँप जाए,
जो झंडा ओढ़ के लूट करे
उसका नक़ाब उतर जाए।

रविदास बोले—सब एक समान,
फुले पूछें—ज्ञान किसका?
पेरियार तर्क की आग जलाएँ,
अंधविश्वास का दम घुटता।


मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब सवाल उठा,
जिस मूर्ति को खुद गढ़ा हमने,
उससे डर क्यों लगा।



(संवादात्मक बोल – राजकुमार यादव स्टाइल)
बताओ रे भाई बताओ,
कुम्भ से पेट भरता है?
या बाबा साहेब का संविधान
भूखे को रोटी देता है?



EVM सोए, मीडिया बिके,
दलाल धर्म बेचें,
संविधान की कमाई खाने वाले
जनता को कैसे देखें?

जो वोट को मंदिर में बेचे,
जो धर्म से राज चलाए,
उनकी खटिया यही मंच पर
बिरहा आज गिराए।

मुखड़ा (तेज़, हुंकार के साथ)
खटिया हिल गई रे बाबा,
अब गिरने वाली है,
बहुजन एक हुआ है अब
सरकार बदलने वाली है।



भीम आर्मी की नीली हवा
गीत बनके फैल जाए,
भीम पाठशाला की हर बच्ची
कल संविधान पढ़ाए।

नगीना से गूँजे पैग़ाम,
युवा कंधे से कंधा जोड़ें,
SC–ST–OBC–अल्पसंख्यक
एक ही सुर में बोलें।

अंतिम मुखड़ा (सबसे तेज़, क्लोज़िंग)
खटिया गिर गई रे बाबा,
अब राज नहीं चलेगा,
जय भीम! नमो बुद्धाय!
बहुजन ही देश संभालेगा।


(हुंकार)
जय भीम! जय भीम!
राजकुमार की तान,
यह बिरहा नहीं रे बाबा,
यह बहुजन की पहचान।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Saturday, 31 January 2026

मंडल कमीशन से लेकर UGC बिल 2026 तक की राजनीतिक चुप्पियों का सामाजिक विश्लेषण : गोलेन्द्र पटेल

दान नहीं, अधिकार चाहिए

विश्वविद्यालय, बहुजन और लोकतंत्र की असहज परीक्षा :

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि अन्याय होता है, बल्कि यह है कि अन्याय के समय सबसे अधिक शोर वही करते हैं जिन्हें समानता से सबसे ज़्यादा भय है। उच्च शिक्षा संस्थानों में समता स्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए नए नियामक प्रावधानों पर उठे विवाद ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि हमारे समाज में ज्ञान, सत्ता और विशेषाधिकार के पुराने गठजोड़ अब भी कितने मज़बूत हैं।

विश्वविद्यालय केवल इमारतें नहीं होते—वे भविष्य की प्रयोगशालाएँ होते हैं। यहाँ तय होता है कि आने वाली पीढ़ियाँ किस तरह का समाज रचेंगी। जब ऐसे संस्थानों में जाति, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव को समाप्त करने की बात होती है, तो उसे “खतरा” बताकर रोका जाना दरअसल लोकतंत्र की आत्मा पर अविश्वास है।

राजनीतिक मौन और वैचारिक संकट :
इस पूरे विमर्श में सबसे अधिक बेचैन करने वाली बात तथाकथित सामाजिक न्याय के राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी है। जिन आवाज़ों से संघर्ष की अपेक्षा थी, वे या तो अस्पष्ट हैं या सुविधाजनक मौन में डूबी हुई। यह मौन किसी एक निर्णय पर नहीं, बल्कि एक लंबे वैचारिक पलायन पर मुहर लगाता है—जहाँ प्रतिनिधित्व सत्ता में बदलते ही उत्तरदायित्व से कट जाता है।

इसके उलट, कुछ सीमित लेकिन स्पष्ट स्वर ऐसे भी हैं जो बिना लाग-लपेट के यह कहने का साहस रखते हैं कि शिक्षा में समता कोई रियायत नहीं, संवैधानिक अधिकार है। ये स्वर संख्या में भले कम हों, पर लोकतांत्रिक नैतिकता के लिए उनकी मौजूदगी निर्णायक है।

दान-दक्षिणा की संस्कृति बनाम नागरिक चेतना :
भारतीय समाज में सदियों से एक मानसिकता विकसित की गई—कि वंचित वर्ग अधिकार नहीं माँगे, बल्कि कृपा की प्रतीक्षा करे। यही वह संस्कृति है जो दान को पुण्य और अधिकार की माँग को उद्दंडता बताती है। जब तक यह मनोवृत्ति बनी रहेगी, तब तक सामाजिक असमानता नए-नए रूपों में लौटती रहेगी।

आज ज़रूरत इस बात की है कि नागरिक स्वयं से यह प्रश्न पूछें—क्या सम्मान दान से मिलता है या बराबरी से? क्या शिक्षा पर कुछ लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है? और क्या संविधान केवल किताबों में पढ़ने की वस्तु है या व्यवहार में लागू करने की जिम्मेदारी?

समता से डर क्यों? :
यदि किसी नियमन से वास्तव में किसी का अधिकार नहीं छिनता, बल्कि वंचित तबकों को सुरक्षा मिलती है, तो उसका विरोध क्यों? इस प्रश्न का उत्तर कानून की भाषा में नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान में छिपा है। असल डर प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि विशेषाधिकार के खत्म होने से है। वह विशेषाधिकार, जो सदियों से कुछ समूहों को बिना जवाबदेही के लाभ देता रहा है।

इतिहास गवाह है—जब भी समानता की कोई ठोस पहल हुई, उसे “समाज टूट जाएगा”, “मेधा खत्म हो जाएगी” या “संस्कृति खतरे में है” जैसे नारों से रोका गया। मंडल आयोग से लेकर आज तक, तर्क बदलते रहे हैं, लेकिन भय वही रहा है।

समाधान का रास्ता :
इस टकराव का समाधान टकराव में नहीं, बल्कि स्पष्टता में है।
स्पष्टता—कि समता किसी के खिलाफ नहीं, सबके लिए है।
स्पष्टता—कि कानून का उद्देश्य बदला नहीं जा सकता, केवल उसका दुरुपयोग रोका जा सकता है
और स्पष्टता—कि लोकतंत्र में अंतिम सत्ता जनता की चेतना होती है, न कि कुछ प्रभावशाली वर्गों की असहमति।

आज ज़रूरत है शिक्षित, संगठित और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने की। न उन्माद से, न अपमान से—बल्कि तथ्यों, मूल्यों और नैतिक साहस के साथ।

अंत में

यह समय दान माँगने का नहीं, अधिकार समझने का है।
यह समय चुप रहने का नहीं, प्रश्न करने का है
और यह समय किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा का है।

यदि विश्वविद्यालय समता के पक्ष में खड़े नहीं हो पाए, तो वे ज्ञान के नहीं, वर्चस्व के केंद्र बनकर रह जाएंगे और यदि समाज ने इसे समय रहते नहीं समझा, तो इतिहास एक बार फिर वही प्रश्न पूछेगा—
जब बराबरी की बात आई थी, तब आप किस ओर खड़े थे?

NFS का हल :

विश्वविद्यालयों में “NFS” (Not Found Suitable) अब चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि बहिष्करण की रणनीति बन चुकी है। आरक्षित पदों पर योग्य अभ्यर्थियों के रहते बार-बार NFS किया जाना किसी अकादमिक असफलता का नहीं, बल्कि संरचनात्मक जातिवाद का प्रमाण है। विडंबना यह है कि जहाँ अनारक्षित पदों पर ‘सूटेबल’ आसानी से मिल जाते हैं, वहीं वही पात्रता OBC-SC-ST के लिए अचानक अयोग्य घोषित कर दी जाती है।

चयन समितियों में प्रतिनिधित्व का अभाव इस अन्याय को और गहरा करता है। जब आरक्षित वर्गों के साक्षात्कार अनारक्षित वर्ग के प्रभुत्व वाली समितियाँ लेती हैं, तो निष्पक्षता एक भ्रम बन जाती है। यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर स्तर पर OBC, SC और ST की हिस्सेदारी आबादी के अनुपात से बहुत नीचे है और अधिकांश पद आज भी खाली पड़े हैं।

NFS को बिना ठोस कारण के लागू करना अकादमिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जवाबदेही-विहीन सत्ता का दुरुपयोग है। यदि अभ्यर्थी न्यूनतम पात्रता पूरी करता है, तो उसे ‘अयोग्य’ ठहराने का स्पष्ट, लिखित और जाँच-योग्य आधार होना चाहिए। अन्यथा यह संवैधानिक समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

नेतृत्व और प्रतिनिधित्व रोकने के लिए नियमों का नया जाल—जैसे विभागाध्यक्ष बनने के लिए केवल प्रोफेसर की शर्त—उसी मानसिकता का विस्तार है जो बहुजन समाज को निर्णय-स्थलों से दूर रखना चाहती है। यह लड़ाई नौकरी भर की नहीं, सम्मान, बराबरी और प्रतिनिधित्व की है।

अब समय है कि विश्वविद्यालय व्यवस्था इस साज़िश से बाहर आए। NFS नहीं, न्याय चाहिए—भीख नहीं, संवैधानिक हक चाहिए। समानता कोई अनुकंपा नहीं, हमारा मौलिक अधिकार है।

उपर्युक्त गंभीर समस्याओं से निजात पाने का एक तरीक़ा यह है कि ओपन सीटों के साक्षात्कार हेतु गठित चयन समितियों में OBC, SC और ST वर्गों के प्रोफेसरों की न्यूनतम 50 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। अर्थात् चयन प्रक्रिया में सभी सामाजिक वर्गों का समुचित और संतुलित प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो।

OBC विद्यार्थियों के साक्षात्कार में केवल OBC प्रोफेसर ही सम्मिलित हों; उसमें एक भी General श्रेणी का प्रोफेसर न हो। इसी प्रकार SC–ST विद्यार्थियों के साक्षात्कार में केवल SC–ST प्रोफेसर ही बैठें और General विद्यार्थियों के साक्षात्कार में General श्रेणी के प्रोफेसर ही हों। जब तक अनारक्षित वर्ग के प्रोफेसर आरक्षित वर्ग के पदों के लिए साक्षात्कार लेते रहेंगे, तब तक NFS की समस्या बनी रहेगी।★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Thursday, 29 January 2026

प्रेस विज्ञप्ति : NFS (Not Found Suitable)

 // प्रेस विज्ञप्ति //

विश्वविद्यालयों में “NFS” (Not Found Suitable) अब चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि बहिष्करण की रणनीति बन चुकी है। आरक्षित पदों पर योग्य अभ्यर्थियों के रहते बार-बार NFS किया जाना किसी अकादमिक असफलता का नहीं, बल्कि संरचनात्मक जातिवाद का प्रमाण है। विडंबना यह है कि जहाँ अनारक्षित पदों पर ‘सूटेबल’ आसानी से मिल जाते हैं, वहीं वही पात्रता OBC-SC-ST के लिए अचानक अयोग्य घोषित कर दी जाती है।

चयन समितियों में प्रतिनिधित्व का अभाव इस अन्याय को और गहरा करता है। जब आरक्षित वर्गों के साक्षात्कार अनारक्षित वर्ग के प्रभुत्व वाली समितियाँ लेती हैं, तो निष्पक्षता एक भ्रम बन जाती है। यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर स्तर पर OBC, SC और ST की हिस्सेदारी आबादी के अनुपात से बहुत नीचे है और अधिकांश पद आज भी खाली पड़े हैं।

NFS को बिना ठोस कारण के लागू करना अकादमिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जवाबदेही-विहीन सत्ता का दुरुपयोग है। यदि अभ्यर्थी न्यूनतम पात्रता पूरी करता है, तो उसे ‘अयोग्य’ ठहराने का स्पष्ट, लिखित और जाँच-योग्य आधार होना चाहिए। अन्यथा यह संवैधानिक समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

नेतृत्व और प्रतिनिधित्व रोकने के लिए नियमों का नया जाल—जैसे विभागाध्यक्ष बनने के लिए केवल प्रोफेसर की शर्त—उसी मानसिकता का विस्तार है जो बहुजन समाज को निर्णय-स्थलों से दूर रखना चाहती है। यह लड़ाई नौकरी भर की नहीं, सम्मान, बराबरी और प्रतिनिधित्व की है।

अब समय है कि विश्वविद्यालय व्यवस्था इस साज़िश से बाहर आए। NFS नहीं, न्याय चाहिए—भीख नहीं, संवैधानिक हक चाहिए। समानता कोई अनुकंपा नहीं, हमारा मौलिक अधिकार है।

उपर्युक्त गंभीर समस्याओं से निजात पाने का एक तरीक़ा यह है कि ओपन सीटों के साक्षात्कार हेतु गठित चयन समितियों में OBC, SC और ST वर्गों के प्रोफेसरों की न्यूनतम 50 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। अर्थात् चयन प्रक्रिया में सभी सामाजिक वर्गों का समुचित और संतुलित प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो।

OBC विद्यार्थियों के साक्षात्कार में केवल OBC प्रोफेसर ही सम्मिलित हों; उसमें एक भी General श्रेणी का प्रोफेसर न हो। इसी प्रकार SC–ST विद्यार्थियों के साक्षात्कार में केवल SC–ST प्रोफेसर ही बैठें और General विद्यार्थियों के साक्षात्कार में General श्रेणी के प्रोफेसर ही हों। जब तक अनारक्षित वर्ग के प्रोफेसर आरक्षित वर्ग के पदों के लिए साक्षात्कार लेते रहेंगे, तब तक NFS की समस्या बनी रहेगी।

—गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ UGC NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

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Tuesday, 27 January 2026

एकलव्य अभी ज़िंदा है, बराबरी अभी बाक़ी है : गोलेन्द्र पटेल

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दो कविताएँ:-

1).

एकलव्य अभी ज़िंदा है

एकलव्य कमज़ोर नहीं है
कमज़ोर हुई है
वह व्यवस्था
जो अंगूठा माँगती है
और उसे गुरुदक्षिणा कहती है

हर जगह द्रोणाचार्य हैं
क्लासरूम में
कैंपस के गलियारों में
इंटरव्यू पैनल की कुर्सियों पर
और उस फ़ाइल में
जिस पर लिखा है— NFS
(योग्य, पर अनुपयुक्त!)

वे कहते हैं
“मेरिट”
और तीर निशाने से पहले
अंगूठा काट लेते हैं

महाभारत कोई बीता ग्रंथ नहीं
यह आज का नोटिफ़िकेशन है
जिसमें
राजकुमारों के लिए
मार्ग प्रशस्त है
और निषाद के लिए
सिर्फ़ आत्मसम्मान त्यागने का विकल्प

एकलव्य ने मूर्ति बनाकर सीखा था
आज का एकलव्य
PDF पढ़कर सीखता है
फॉर्म भरता है
फीस देता है
फिर भी सुनता है,
“सीट खाली रहेगी।”

दलित
आदिवासी
पिछड़ा
ये शब्द नहीं
ये वे कंधे हैं
जिन पर टिकी है
इस देश की इमारत
लेकिन प्रवेश द्वार पर
अब भी लिखा है,
“पहचान जाँच अनिवार्य।”

कैंपस में
जाति फुसफुसाहट में रहती है
मेरिट के भाषणों में छुपी
और
कभी-कभी
होस्टल की छत से गिरती हुई
ख़ामोशी बन जाती है

UGC का नया नियम
कोई दया-पत्र नहीं
यह उस सवाल की दस्तक है
क्यों हर बार योग्य वही होता है
जो पहले से अंदर है?

यह नियम कहता है
अब अँगूठा नहीं माँगा जाएगा
अब हर खाली सीट
अपना हिसाब देगी
अब “Not Found Suitable”
सिर्फ़ बहाना नहीं होगा
बल्कि सवालों के कटघरे में खड़ा होगा

लेकिन सावधान!
समता समिति
अगर सिर्फ़ नाम की हुई
अगर अधिकार
फ़ाइलों में बंद रहे
अगर न्याय
प्रशासन की कृपा बन गया
तो यह समता नहीं
नई किस्म की चुप्पी होगी

संविधान
किसी कमेटी का परिशिष्ट नहीं
वह सड़क पर लिखा गया
एक जीवित वाक्य है
जिसे लागू करना
अनिवार्य है
वैकल्पिक नहीं

क्यों
किसी के रंग
किसी की भाषा
किसी के नाम पर
लिंचिंग को छूट मिले?
क्यों
किसी क्षेत्र
किसी जाति
किसी जेंडर के नाम पर
अपमान को वैधता मिले?

कानून झूठे मुक़दमे से नहीं डरता
डरता है
लागू न होने से

इसलिए
हे एकलव्य!
अब मूर्ति मत बनाना
संविधान पढ़ना
नियम पूछना
हिसाब माँगना

और हे द्रोण!
अब अँगूठा माँगने से पहले
तैयार रहना
क्योंकि
यह समय
गुरुदक्षिणा का नहीं
जवाबदेही का है

एकलव्य अभी ज़िंदा है
और इस बार
उसका निशाना
सिर्फ़ तीर नहीं
व्यवस्था है।
★★★


2).


बराबरी अभी बाक़ी है


मैं चाहता हूँ
गिनती हो
सिर्फ़ साँसों की नहीं
सत्ता की भी

जाति की गिनती
संपत्ति की गिनती
कुर्सियों पर बैठे चेहरों की गिनती
चपरासी से लेकर
चीफ़ जस्टिस तक
किसके हाथ में
कितनी ताक़त है
यह भी दर्ज हो

किताबों में छपे नामों की गिनती
पाठ्यक्रम में घुसे देवताओं की गिनती
और बाहर खड़े
एकलव्यों की गिनती

अगर तुम शोषक नहीं
तो गिनती से डर क्यों?
अगर बराबरी में यक़ीन है
तो आँकड़े तुम्हें
काँप क्यों देते हैं?

सौ में नब्बे
भूखे हैं
नंगे हैं
अपमानित हैं
और वही नब्बे
आज पूछ रहे हैं
धन, धरती और राजपाठ
कब तक तुम्हारी जागीर रहेंगे?

UGC कोई काग़ज़ नहीं
यह उन आँखों का सवाल है
जो क्लासरूम में
झुकी रखी जाती हैं
यह उन ज़ुबानों का सवाल है
जिन्हें
जाति सूचक गालियों से
चुप कराया जाता है

तुम जो साधु-संन्यासी का मुखौटा
ओढ़े घूमते हो
बताओ
क्या तुम्हारा धर्म
सिर्फ़ वर्चस्व की पूजा है?
क्या तुम्हारा न्याय
वर्ण की चारदीवारी से
आगे नहीं बढ़ता?

सोशल मीडिया पर
जब प्रधानमंत्री की जाति उछाली जाती है
जब मुख्यमंत्री को
नीचा दिखाने के लिए
कुलनाम खोजा जाता है
तो सोचो
विद्यालयों में
हमारे बच्चों के साथ
क्या होता होगा?

रोहित वेमुला
एक नाम नहीं था
वह चेतावनी था
कि संस्थान
जब जाति बन जाते हैं
तो छात्र
लाशों में बदल दिए जाते हैं

UGC का समर्थन
किसी सरकार का समर्थन नहीं
यह उस आख़िरी उम्मीद का समर्थन है
कि कम से कम
ज्ञान के परिसर में
इंसान को
इंसान समझा जाए

तुम कहते हो,
“हम सब एक हैं”
लेकिन बराबरी आते ही
तुम्हारा हिंदुत्व
हकलाने लगता है
बताओ
SC, ST, OBC
क्या इस देश के नागरिक नहीं?

गिनती से भागो मत
इतिहास गवाह है
जब-जब हिस्सेदारी की बात आई
विरोध सवर्ण गलियों से ही निकला

अब वक़्त है
पुरखों की गंदी विरासत छोड़ने का
ऊँच-नीच की नशा उतारने का
और इंसान बनने का

UGC इक्विटी रेगुलेशन्स
कोई अंतिम जीत नहीं
यह सिर्फ़ शुरुआत है
संघर्ष अभी बाक़ी है
क्योंकि बराबरी
क़ानून से नहीं
लगातार प्रतिरोध से आती है

हम गिनती माँगते रहेंगे
जब तक शिक्षा
जाति से मुक्त नहीं होती
और इंसान
पूरा इंसान नहीं बन जाता।
★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी बहुजन कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Saturday, 24 January 2026

महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति — गोलेन्द्र पटेल

"महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति" रचना महावारी को लज्जा या अशुद्धि नहीं, बल्कि स्त्री की जीवनदायी शक्ति के रूप में स्थापित करती है। यह रचना वैज्ञानिक तथ्य, सामाजिक अनुभव और नारीवादी दृष्टि को जोड़ते हुए महावारी से जुड़े मिथकों, पाखंड और वर्गीय असमानताओं को उजागर करती है। विशेष रूप से ग्रामीण स्त्रियों की अमानवीय परिस्थितियाँ—राख, रेत, उपले के प्रयोग—और शहरी सुविधाओं के बीच की खाई को सामने लाया गया है। रचना पुरुष-सत्ता, धार्मिक व सामाजिक निषेधों पर तीखा प्रश्न उठाती है और कहती है कि स्त्री की देह, पीड़ा और श्रम का सम्मान किए बिना कोई समाज सभ्य नहीं हो सकता।
महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति

—गोलेन्द्र पटेल 


1.
माहवारी अपमान नहीं, जीवन का अनुबंध,
जिस रक्त से धरती जने, वही क्यों हो निषिद्ध?

2.
जिसे कहो तुम ‘पीरियड’, ‘महीना’ या ‘रजोधार’,
वही स्त्री की देह रचे, सृष्टि का आधार।

3.
गर्भाशय की साधना, हर मास रचती नीति,
त्याग करे वह परत को, तब चलती यह रीति।

4.
जो रक्त बहा उपहास में, वह गंदा कैसे हो?
जिससे जन्मे मानव-जात, वह अशुद्ध कैसे हो?

5.
मंदिर बंद, रसोई बंद, बंद किए हर द्वार,
पर उसी देह से जन्म लो, फिर भी इतना तिरस्कार!

6.
शहरों में कप, पैड हजार, खुशबूदार अभिमान,
गाँव-गली में राख बंधी, उपले का समाधान।

7.
महीने भर जो खेत झुके, पीठ झुकाए काम,
माहवारी आई तो फिर, ‘अछूत’ उसका नाम!

8.
रेत-राख की पोटली, भीतर रखे अंगार,
फिर भी स्त्री मुस्कान सहे, पीड़ा का व्यापार।

9.
जिस देह को ‘ऑब्जेक्ट’ कहो, उसी से जन्मे तुम,
यह विडंबना नहीं अगर, तो क्या है फिर भ्रम?

10.
महावारी कोई विकल्प, कोई शौक न चाह,
यह कुदरत का नियम है, नारी की परवाह।

11.
कमर टूटे, देह जमे, भीतर उठे बवंडर,
ऊपर से चुप्पी का बोझ—युद्ध यही हर अंदर।

12.
वीर्य चले सत्तर बरस, गर्भ मांगे सेहत,
फिर भी दोषी वही स्त्री, कैसी यह व्यवस्था-रीत!

13.
प्रसव पीड़ा, ऑपरेशन, दूध न उतरे साथ,
फिर भी स्त्री को सिखलाओ, ‘त्याग ही है सौगात’!

14.
जो देह रचती भविष्य, वही देह उपेक्षित,
पूजनीय कहकर भी स्त्री, हर क्षण ही नियंत्रित।

15.
फेमिनिज़्म कप सुखाना नहीं, धूप की बात,
जब देह छुपानी पड़े, तब कैसे हो संवाद?

16.
जो माहवारी पर हँसते, पहले इतना कर लें,
पाँच दिवस उपला बाँध, दिनभर बोझा भर लें।

17.
फिर पूछें वे पीड़ा क्या, फिर बोलें अधिकार,
अनुभव बिना ज्ञान भी, होता केवल अहंकार।

18.
स्त्री न केवल देह है, न केवल बलिदान,
वह समाज की शिल्पकार, भविष्य का विधान।

19.
जिस समाज में स्त्री न हो, वह श्वेत स्याही-सा,
दिखता सब है दूर से, पढ़ना पर असंभव-सा।

20.
आसान नहीं स्त्री होना, जानो यह संसार,
हर मास जने जीवन को, सहकर सारा भार।

21.
माहवारी अपमान नहीं, जीवन की है रीत,
जिस रक्त से संसार जने, वह कैसे हो नीच?

22.
मासिक, रजोधर्म कहो, पीरियड या महीना,
नाम बदलने से क्या बदले, स्त्री का सच पुराना?

23.
गर्भाशय की साधना, हर मास रचती त्याग,
परत टूटे, रक्त बहे—तभी बचे अनुराग।

24.
जो रक्त कहो तुम गंदा है, सोचो एक बार,
उसी धारा से जन्म ले, हर मानव परिवार।

25.
मंदिर-द्वार बंद किए, रसोई भी निषिद्ध,
पर उसी देह से जन्म लो, फिर क्यों इतना क्रुद्ध?

26.
धर्म नहीं यह रीत है, सत्ता का विस्तार,
देह नियंत्रित करने का, पुराना हथियार।

27.
शहरों में पैडों का शोर, कप का फैशन राज,
गाँव-गली में राख बंधी, उपलों का समाज।

28.
रेत, धूल की पोटलियाँ, भीतर रखी पीड़ा,
फिर भी खेतों में झुकी, स्त्री की हर एक रीढ़ा।

29.
जब पुरुष रजाई तले, हुक्का गुड़गुड़ाए,
तब स्त्री सरसों के खेत, पत्ते तोड़ लाए।

30.
महीना अधिक बहा तो, कपड़ा क्या निभाए?
रेत बदलती हर घड़ी, दर्द किसे बताए?

31.
ना अंडरवियर, ना दवा, ना पानी का मान,
फिर भी काम करे स्त्री, लेकर सारा जहान।

32.
उपले बाँध नाजुक अंग, दिनभर ढोती भार,
फिर भी कहलाती वही, ‘कमज़ोर’ हर बार।

33.
कॉलेज, शहर, दफ्तरों में, लेख लिखे विचार,
गाँव की स्त्री का दर्द क्या, जाने कौन अख़बार?

34.
तीन दिन की पीरियड लीव, लेखों का विस्तार,
पर उपले वाली स्त्री को, ना छुट्टी ना उपचार।

35.
वास्तविक पीड़ा यह नहीं, जो शब्दों में आए,
पीड़ा वह जो जीते-जी, भीतर ही सड़ जाए।

36.
छिली जाँघ, फटा बदन, मीलों पानी ढोना,
फिर भी घर के कोने में, ‘अछूत’ ही होना।

37.
संक्रमण, सूजन, गाँठें, श्वेत प्रवाह का रोग,
पर डॉक्टर तक पहुँचने में, मर्यादा का शोक।

38.
जब हालत हो अति गंभीर, तब अस्पताल जाए,
बच्चेदानी काट निकालें—‘निजात’ कहाए।

39.
सोचो यह मुक्ति कैसी, किस कीमत पर आई?
देह का एक अंग कटा, चुप्पी बनी दवाई।

40.
फेमिनिज़्म धूप नहीं, कप सुखाने का नाम,
जब देह छुपानी पड़े, तब कैसा अभियान?

41.
जो माहवारी पर हँसते, पहले इतना कर लें,
पाँच दिवस उपला बाँध, दिनभर बोझा भर लें।

42.
फिर पूछें वे पीड़ा क्या, फिर समझें अधिकार,
अनुभव बिना ज्ञान भी, होता केवल अहंकार।

43.
वीर्य चले सत्तर बरस, उम्र न पूछे कोय,
गर्भ माँगे स्वस्थ देह, दोषी फिर भी वोय।

44.
महावारी स्त्री की चाह नहीं, न कोई शौक,
यह कुदरत का विधान है, झेलती हर लोक।

45.
कमर जमे, देह अकड़े, भीतर उठे तूफान,
ऊपर से समाज कहे—‘छुपाओ यह निशान’।

46.
प्रसव पीड़ा सहने को, टूटें बीस हड्डियाँ,
फिर भी कहो सहज उसे—वाह रे मर्दानगियाँ!

47.
गर्भ धरे नौ मास तक, उलटी, दर्द, अवसाद,
फिर भी सारे काम करे, यही उसका प्रसाद।

48.
इंजेक्शन, चीरा, टांके, निशान जीवन भर,
फिर भी देह पर अधिकार, किसी और का डर।

49.
नींद त्याग, देह लुटा, तीन बरस केवल बाल,
फिर भी पूछो स्त्री से—‘क्या करती हो कमाल?’

50.
पूजनीय कहकर भी स्त्री, उपभोग में बंधी,
उसकी इच्छा, निर्णय पर, हर पहरे की संधि।

51.
जो इज़्ज़त करना न जाने, वह मर्द नहीं कहलाए,
सत्ता की इस मर्दानगी, एक दिन टूट जाए।

52.
पीरियड, रजस्वला कहो, क्यों लगे यह बला?
जिससे बना तुम्हारा वजूद, वही क्यों छलना?

53.
चाँद छुए, विज्ञान बढ़े, पर सोच वही पुरान,
काले पैकेट में आज भी, लिपटी स्त्री पहचान।

54.
दर्द छुपाओ, चुप रहो—यह शिक्षा दी जाए,
मुस्कान ओढ़ पिता देख, रोना भीतर जाए।

55.
पुरुष कहे—हम क्या करें? दोष हमारा क्या?
बस ‘मैं हूँ’ कह देना ही, पहला धर्म सिखा।

56.
गरम पानी, चाय का कप, पैड समय पर लाना,
तीन दिन इतना कर लो, क्या इतना है भारी जाना?

57.
स्त्री पर सबसे अधिक लिखे, वही करे उपेक्ष,
अपवादों से मत ढको, पूरी सामाजिक द्रेष।

58.
केवल पुरुष या स्त्री का, समाज नहीं बन पाए,
श्वेत काग़ज़ पर श्वेत स्याही, पढ़ी न जाए।

59.
रसोई, सीमा, संसद तक, स्त्री का श्रम अपार,
फिर भी ‘आसान’ कह दिया, उसका हर अवतार।

60.
आसान नहीं स्त्री होना, समझो यह संसार,
नारी समाजस्य वास्तुकारा—यही सत्य विचार।

61.
पाठशाला की घंटी बजी, भीतर उठा तूफान,
बैग में दर्द दबा लिए, बैठी बिटिया मौन।

62.
कॉपी पर अक्षर कांपते, देह जमे पत्थर-सी,
मासिक की चुप्पी ओढ़े, पढ़ती वह अक्षर-सी।

63.
कक्षा में उठना कठिन, पेट पकड़कर रोए,
पर शिक्षक से क्या कहे, ‘महीना’ कौन बोले?

64.
यूनिवर्सिटी की भीड़ में, पैड की चिंता साथ,
बाथरूम में पानी नहीं, शर्म बनी हथियार।

65.
पुस्तक भारी, देह भी भारी, सीढ़ी चढ़ना भार,
फिर भी नंबर काट लिए—‘डिसिप्लिन’ का वार।

66.
ग्रामीण बिटिया भोर उठे, पानी लकड़ी ढोए,
माहवारी आई तो भी, काम कहाँ से छोड़े?

67.
स्कूल गई तो डर लगे, दाग न दिख जाए,
पीछे हँसी, आगे प्रश्न—देह कहाँ छुपाए?

68.
माँ कहे—चुप रह बेटी, यह तो नारी धर्म,
दर्द सहना सीख ले, यही जीवन कर्म।

69.
पैड महंगे, कप फटे, राख मिले घर द्वार,
शहर की बेटी कप चुने, गाँव की बेटी भार।

70.
रेत बंधी कपड़ों तले, भीतर जलता घाव,
पर खेत, स्कूल, रसोई—सबका एक स्वभाव।

71.
छात्रावास के कमरे में, खिड़की बंद अँधेर,
कप सुखाए चोरी से, धूप भी लगे गैर।

72.
फीमेल वार्डन डाँट दे, ‘गंदगी मत फैलाओ’,
पर दर्द की इस राजनीति को, कौन समझाओ?

73.
ग्रामीण कॉलेज की बिटिया, रोज़ पैदल जाए,
मासिक के दिन भी मीलों, चुपचाप चल पाए।

74.
न मेडिकल, न सलाह, न समझने वाला कोई,
बस सहना ही पाठ बना, हर उम्र की होई।

75.
खून बहा तो डर लगे, बदन हुआ शर्मसार,
किसी ने पूछा नहीं—दर्द कैसा अपार?

76.
पीरियड लीव सपना है, हकीकत में डर,
छुट्टी माँगो तो लेबल—‘बहाना’, ‘कमज़ोर’ ठहर।

77.
ग्रामीण स्त्री सिखलाए, बेटी को यह ज्ञान,
“देह तुम्हारी पवित्र है, मत मानो अपमान।”

78.
पर वही माँ जब झेले, उपले-राख की मार,
बेटी देखे चुपचाप, पीढ़ीगत संस्कार।

79.
यूनिवर्सिटी की बहसों में, जेंडर पढ़ाया जाए,
पर बाथरूम में पैड कहाँ—यह कोई न बताए।

80.
सिलेबस में न महावारी, न देह का सच,
डिग्री मिले तो क्या बदले, पीड़ा वही बच?

81.
ग्रामीण आंगन, शहरी कैम्पस—दोनों का एक हाल,
देह वही, नियम वही, बदली बस भाषा-चाल।

82.
जो छात्रा प्रश्न उठाए, उसे ‘विद्रोही’ कहें,
जो चुप रहे पीड़ा में, वही ‘अच्छी’ गिनें।

83.
शिक्षा यदि मुक्ति होती, तो डर क्यों होता साथ?
देह की बात करें तो, कांप उठे हर हाथ।

84.
सेनेटरी नहीं, संवेदना चाहिए पहले,
देह को समझे समाज, फिर आए पैड के झेले।

85.
ग्रामीण स्त्री, छात्रा दोनों, एक ही संघर्ष-धार,
एक खेत में खपती है, एक किताबों के भार।

86.
किसने कहा पढ़ी स्त्री को, दर्द नहीं सताए?
ज्ञान बढ़े पर देह वही, हर मास टूट जाए।

87.
डॉक्टर दूर, बस किराया, डर बड़ा जहान,
इसलिए रोग पले भीतर, मौन बना पहचान।

88.
पढ़ाई छोड़ी, काम बढ़ा, माहवारी बनी शत्रु,
समाज ने काटे पंख, फिर पूछे—‘क्यों न उड़ू?’

89.
अगर स्कूल में सिखलाया जाए, देह का सम्मान,
तो गाँव और शहर दोनों, बदलें अपना मान।

90.
अगर पैड से पहले मिले, समझ और अधिकार,
तो हर बिटिया कह पाए—‘मैं भी हूँ संसार।’

91.
ग्रामीण स्त्री के श्रम में, शिक्षा का बीज छुपा,
उसे सम्मान मिले जब, भविष्य खुद लिखा।

92.
छात्रा की चुप्पी तोड़ो, सवालों को दो स्वर,
यही नारीवाद असल, बाकी सब है डर।

93.
महावारी पाठ बने, विज्ञान की भाषा में,
तभी मिटेगी शर्म की, जड़ें हर दिशा में।

94.
जो देह सिखाए सहना, वही सिखाए बोल,
नारी को अब चाहिए, अधिकारों का खोल।

95.
ग्रामीण माँ और बेटी की, एक ही पुकार,
“देह हमारी, नियम हमारे—बस इतना स्वीकार।”

96.
कॉलेज, स्कूल, आंगन तक, यह संवाद चले,
मासिक को छुपाने की, हर दीवार गिरे।

97.
नारी को शिक्षा दो, पर देह से मत काटो,
अधूरा ज्ञान वही है, जो पीड़ा से न नाटो।

98.
जब बिटिया हँसकर कह दे—‘आज पीरियड है’,
तब समझो समाज ने, पहला पाठ पढ़ा है।

99.
ग्रामीण रास्ते, शहरी गलियाँ—एक संग गूँजें तान,
महावारी कोई कलंक नहीं, यह जीवन-गान।

100.
आसान नहीं स्त्री होना, पर अब यह ऐलान,
ग्रामीण हो या छात्रा—नारी स्वयं संविधान।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि-लेखक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं स्त्रीवादी चिंतक)


संपर्क सूत्र :-
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अर्जकवाद : श्रम, तर्क और मानव-मुक्ति का दर्शन || विश्वरत्न महामना रामस्वरूप वर्मा || क्रांतिकारी अर्जक कवि गोलेन्द्र पटेल

अर्जकवाद : श्रम, तर्क और मानव-मुक्ति का दर्शन जय अर्जक! जय संविधान! जय मानववाद! भारत की धरती पर सामाजिक परिवर्तन की अनेक धाराएँ जन्मी हैं। ...