Wednesday, 1 December 2021

वाचस्पति की टिप्पणियाँ : गोलेन्द्र पटेल

 
{युवा कवि 
गोलेंद्र पटेल चंदौली ) और लेखक वाचस्पति वाराणसी )}
वाचस्पति की टिप्पणियाँ


1.
मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल माडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किये हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आयी है वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। 'युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के कऱीब रहे अध्येता समीक्षक)


2.
कवि धूमिल
(९ नवंबर, १९३६-१० फरवरी, १९७५) 
■★■

'तुमने धूमिल का नाम सुना है ?
' संसद से सड़क तक ' का कवि
बोल्डरों की तरह लुढ़काता-फेंकता था वह अपने शब्द
कुछ बदनीयत दिलों में गड्ढे हो जाते थे
अधिकतर भोरे दिमागों की गड़हियां पट जाती थीं '
गंगातट के कवि ज्ञानेन्द्रपति की काव्य पंक्तियां
(खेवली तक सड़क नहीं आती से - पहले पहल यह कविता इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी में छपी थी। जो संशयात्मा में संग्रहित है।)

विद्रोही कवि धूमिल और उनके सुविधा वंचित गाँव खेवली को ज्ञानेन्द्रपति ने अपनी कविता में बहुत अच्छी तरह याद किया है। "धूमिल समग्र" का पारायण करके हम उन्हें वास्तविक रूप में याद कर सकते हैं क्योंकि धूमिल को "गालबजाऊ पाण्डित्य" से हमेशा बाजिब चिढ़ रही!
लगभग बारह सौ पृष्ठों में धूमिल के योग्य पुत्र डाक्टर रत्नशंकर पाण्डेय ने तीन खण्डों में समग्र का संपादन कुशलतापूर्वक किया है। यद्यपि रत्नशंकर किसी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय में हिन्दी-आचार्य नहीं रहे तथापि!
साठोत्तरी दौर में बीएचयू परिसर में कविश्री त्रिलोचन-धूमिल की "गरिमापूर्ण उपस्थिति" रही।
जो गुरुडम से विमुख रहे वे इन कवियों के सान्निध्य में रहे!
धूमिल आईटीआई की नौकरी के लिये बीएचयू परिसर होकर जाते रहे। वे मित्रकवि लीलाधर जगूड़ी के प्रज्ञाचक्षु अनुज मुरलीधर का हालचाल नित्यप्रति लेते रहे।
मैं भी मुरली के सहपाठी के बतौर बिरला छात्रावास के मध्य में एक कमरे में रहते हुये धूमिल जी का स्नेहभाजन बना।
ब्रेनट्यूमर के घातक रोग से पीड़ित होकर धूमिल बीएचयू के सुन्दर लाल अस्पताल में 18 अक्टूबर, 1974 को भर्ती हुये। जाँच में अंततः ब्रेनट्यूमर ही होने पर धूमिल को 1 नवम्बर, 1974 को लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती किया गया जो अब चिकित्सा विश्वविद्यालय है। केजीएमयू लखनऊ के अति निकट इमामबाड़ा उर्फ भूलभुलैया है। न्यूरोसर्जरी मेलवार्ड, बेड नंबर 2 पर  धूमिल को मैं लखनऊ में कवि-पत्रकार विनयश्रीकर के साथ देखने गया तो वे भीषणतम कष्ट के बावजूद गर्मजोशी से मिले।विनयश्रीकर तब नेशनल हेराल्ड में प्रूफरीडिंग करते हुये अस्पताल में धूमिल के पास रोज़ाना जाते रहे। ठाकुर प्रसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, कुँवरनारायण आदि लखनऊ के समर्थ साहित्यिकों की सक्रियता से धूमिल को बेहतर  संभव चिकित्सा व्यवस्था सुलभ हुई। पर 10 फरवरी, 1975 की रात करीब पौने दस बजे धूमिल दिवंगत हुए!इसके चन्द रोज़ पहले कवि अक्षय उपाध्याय के साथ कविश्री त्रिलोचन बनारस से लखनऊ जाकर धूमिल से मिले। हालात में कुछ सुधार बताया पर अनहोनी होकर रही!
11 फरवरी, 1975 की शाम महाश्मशान मणिकर्णिका पर बनारस में धूमिल की अन्त्येष्टि हुई। बनारस में कवि धूमिल का कोई स्मृति चिह्न नहीं है। यहाँ कवियों में मोहनलाल गुप्त भैयाजी बनारसी, शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह की ही मूर्तियां स्थापित हैं।कबीर-रैदास-तुलसी-जयशंकर प्रसाद-जगन्नाथ दास रत्नाकर-गिरिधर कविराय-त्रिलोचन-धूमिल का साहित्य जहाँ कहीं भी हो, वही उनका वास्तविक स्मारक है!
झूठ की सत्ता और सत्ता के झूठ को यदि जानने-पहचानने में किसी की दिलचस्पी हो तो धूमिल सरीखे कवि हमेशा मददगार हो सकते हैं बशर्ते ईमानदारी से हम उनकी रचनाओं के पास तक तो जायें।
पद्म पुरस्कारों वाला रास्ता धूमिल के गाँव खेवली तक नहीं जाता। दब्बू-चापलूस-ख़ुदगर्ज़ और सत्तामुखी वाचाल प्रतिभाशाली धूमिल की छवि धूमिल
करने में कभी पीछे नहीं रहते! धूमिल का समग्र साहित्य  ऐसे मौकापरस्त तत्त्वों की पहचान का मौका तो देता ही है!




3.
कवि-कविता और हिन्दी-समाज
      ★★★
                   
"वागर्थ" में बुन्देलखंड यात्रा और हरिद्वार में गुमनाम शहीद जगदीश वत्स को याद करते हुए "अमर उजाला" में प्रसंगवश सुधीर विद्यार्थी ने  क्रमशः बाँदा के केदारनाथ अग्रवाल और कहीं के भी कविश्री त्रिलोचन का जिक्र किया है। काव्यप्रयोजन में कविता से पहले यश मिलने और फिर अर्थ (धन) पा लेने की बात है।
देश-विदेश के महानगरों में जा बसे साहित्यिकों के वंशज अपनी पुश्तैनी ज़मीन-जायदाद बेच कर अपने नये ठिकानों पर चल देते हैं। पैसे से एकमात्र लगाव होने से कोई व्यर्थ का भावनात्मक निर्णय हावी नहीं हो पाता।कवियों के खानदान की नयी पीढ़ी की बेहद खर्चीली पढ़ाई और आवासीय व्यवस्था के लिए अच्छी खासी रकम की जरूरत होती है। उसमें कवि का यश एक हद तक मददगार होता है। होलटाइमर कवि कविता को अपना पूरा जीवन दे डालते हैं। न कोई फंड, न कोई पेंशन! बड़ी नौकरी के बड़े प्रभामण्डल से कमाई भी होती है। सरकारों को भी सांस्कृतिक कारोबार के लिए हर किस्म के साहित्यकारों की जरूरत पड़ती है।
लखनऊ में सत्तर पार कर चुके भूतपूर्व पत्रकार-कवि हैं जिनकी पत्नी पुरानी मानसिक रोगिणी हैं।
एकमात्र पुत्र विदेश में मोटे वेतन का मालिक है।
लखनऊ के माता-पिता से वह कहता है कि आप कामरेड-प्रगतिशीलता के चक्कर में रहे तो उन्हीं से मदद लें, हमें परेशान न करें! लखनऊ के वे मित्र मेर कहने पर कवि धूमिल की ब्रेनट्यूमर की बीमारी में उनके पास नित्यप्रति जाते रहे। आज हृदयरोग की दवाओं को ख़रीदने और जीवनयापन के लिये उनके पास न्यूनतम धन नहीं है।
कवि और उनकी कविता से परिवार को उतनी ही भौतिक उपलब्धियों का हासिल हो पाता है जो छोटे-बड़े साहित्यिक पुरस्कारों के द्वारा मिल पाता है!
हिन्दी-समाज को सच्चाई यही है कि कवि और कविता से कुछ लेना-देना नहीं है। महिमामंडन के लिए कुछ पुरस्कार कवियों के नाम पर चला दिये जाते हैं। शोध संस्थान नाम से कुछ जेबी संस्थायें बन जाती हैं। कुछ संस्मरण वगैरह भी कवियों पर माँग और पूर्ति के आधार पर बन जाते हैं।इन दिनों यह शुभ ट्रेण्ड है कि साहित्यकारों के वंशज भूलकर भी साहित्य के इलाके में अपना सिर नहीं खपाते!
राजनेताओं-क्रिकेटर्स-फिल्मी महानायकों के मन्दिर बना दिये जाते हैं। किसी गायक पालटीशियन कवि का हिन्दी-प्रदेश में कहीं मन्दिर आगे चलकर दिखलाई भी दे जाये तो किम् आश्चर्यम्! तथास्तु!



4.

नई चाल वाली पत्रकारिता
               जनसत्ता आज ही निकलना शुरू हुआ था।
(याद है प्रभाष जोशी जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय की तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'तीसरी दुनिया के देशों में ज्ञान एवं संस्कृति के समक्ष चुनौतियाँ' के अंतिम दिन मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे। वाचस्पति जी ने उन्हें जनसत्ता के पहले अंक की प्रति दिखलाई तो प्रभाष जी गदगद हो उठे।
सहेजकर रखने की वाचस्पति जी के उद्यम और लगाव की सराहना की। उस पर हस्ताक्षर दिए। जनसत्ता की स्थापना दिवस पर वाचस्पति जी की यह टिप्पणी-)

नयी दिल्ली, बृहस्पतिवार, 17 नवम्बर, 1983 ई. को
नई चाल की हिन्दी का नया अख़बार शुरू हुआ।
वर्ष 01अंक 01 अपने संग्रह से मैंने निकाल कर देखा।तब मैं 'सज़ायाफ़्ता' हिन्दी-प्राध्यापक के तौर पर जैहरीखाल के सरकारी महाविद्यालय में कार्यरत रहा।
वहाँ से छह किमी पर लैंसडाउन सैनिक छावनी के बाज़ार में"जोशी मेडिकल स्टोर" पर इंडियन एक्सप्रेस समूह की एजेंसी थी। वहाँ पहुँचकर मैंने पचास पैसे (अठन्नी) में यह दैनिक ख़रीद लिया। कार्टूनिस्ट काक के मुखपृष्ठ के मध्य में कार्टून ने ध्यानाकर्षित किया। एक सूखे से
"आम आदमी" की तरफ हाथ का इशारा कर इन्दिरा जी कह रही हैं"...गुमराह न हों....चर्बी है कहाँ...." दरअसल उसी समय वनस्पति घी में चर्बी की मिलावट का मामला बहुत चर्चित हुआ। उसी पर यह व्यंग्य चित्र बना। जनसत्ता लम्बे समय तक अपने प्रतिरोधी तेवर और आमफ़हम भाषा के लिये बहुचर्चित रहा। मेरे पास बाद के भी काफी अंक रहे जो तबादले की  परेशानी के चलते मैंने लखनऊ के श्री वीके सिंह जी को सौंप दिये।
बनारस के काशी विश्वविद्यालय में "जनसत्ता" के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी जी से 10 फरवरी, 2005 को एक कार्यक्रम में भेंट होने पर पहले पेज पर उनके हस्ताक्षर लिये। उन्होंने हस्ताक्षर के नीचे अपना पूरा पता लिखकर दिल्ली आकर मिलने का न्यौता भी दिया।
"जनसत्ता" में अनेक पत्रकार प्रभाषजी के मार्गदर्शन में तत्कालीन सत्ता के विरुद्ध आलोचनात्मक तेवर में लिखते हुए मशहूर हुए। बाद में कुछ ने "जनसत्ता" से अलग होकर सत्ता की निकटता का राजमार्ग चुना और वे बड़े सफल पत्रकार सिद्ध हुए!
पत्रकारों के लिए अनेक शहरों में  "पत्रकारपुरम" हैं। क्या कहीं किसी नगर में आपने "साहित्यकारपुरम" का नाम सुना है?

5.
'पक्का महाल' के लेखक की याद किसे है!
             ★★★
काशी के अमर कथाकार प्रेमचन्द जी की याद "लमही गाँव "में 31जुलाई को हर साल मेले के जश्न से मनाई जाती रही।इस साल विद्वानों ने कोरोना वायरस के चलते आनलाइन डिजिटल होकर प्रेमचन्द सप्ताह मनाया !
2019 में31जुलाई को कथाकार ,बनारसी जीवन शैली के विशेषज्ञ अजय मिश्र(1946-2019ई.)हमारे बीच से हमेशा के लिए चले गए थे।काशी -कथा हिन्दी में "बहती गंगा",गली आगे मुड़ती है,काशी का अस्सीऔर अजय के उपन्यास"पक्का महाल" से चर्चित रही है।पुराने बनारस के ध्वस्तीकरण से खिन्न प्रतिरोध की कविताएं"दर-बदर"में दर्ज हुईं जिसके लोकार्पण के लिए बनारस07अप्रैल2019ई.को दिल्ली से आलोचक-कला-समीक्षक ज्योतिष जोशी जी आए।उन्होंने अजय की रचनाओं के बेहतर प्रकाशन की प्रबल इच्छा व्यक्त की।वे स्वयं भी बातचीत में यह आग्रह करते रहे।अजय मिश्र अपना दूसरा उपन्यास"ढकोसला"छपा देख कर चर्चा उस पर चाहते थे।प्रो.सत्यदेवत्रिपाठी से बात भी कर ली थी।दुर्गाकुण्ड बनारस का प्रकाशक दाबे रहा।निधन के बाद बनारस के ही किसी अल्पज्ञात ने छापा।बनारसी जीवन का रंग-ढंग उनकी रचनाओं में रचा-बसा है।
बनारस में अजय मिश्र अपने"मन की बात"कहने-सुनने जितेंद्र नाथ मिश्र, राजेंद्र आहुति, रामाज्ञा शशिधर,रामानंद तिवारी, योगेन्द्र नारायण, लोलार्क द्विवेदी, दीनबन्धु तिवारी, अवधेश प्रधान, बलराज पाण्डेय,सदानन्द शाही से अक्सर मिलते-भटकते रहे।झारखंड के धनबाद में पत्रकारिता से आजीविका चलाकर अंततः बनारस लौटे।अंत नींद में हृदयाघात से हुआ!उनकी निजी लाइब्रेरी और अप्रकाशित रचनाओं का क्या हुआ,कोई मित्र नहीं जानता!
जयपुर में उनके बनारसी मित्र सुधेन्दु पटेल, लखनऊ में"लमही"संपादक विजय राय हैं।चर्चा कर लेते हैं।पहली बरसी पर उनकी स्मृति को प्रणाम!



6.
"मिट्टी का एक पूरा चेहरा" झारखण्ड से समकालीन कविता के इस संचयन में दिखलाई दिया।आदिवासी जीवन की जटिल सरलता अनेक कवियों की कविताओं में मौजूद है।चौबीस कवियों के काव्य की बानगी प्रत्येक कवि की पाँच प्रतिनिधि कविताओं से मिल जाती है।स्थापित वरिष्ठ कवि ऐसे साझा संग्रह से दूरी बनाये रखते हैं।मेरा मानना है युवाओं के प्रोत्साहन के नज़रिए से भी ऐसे आयोजनों को देखा जाना चाहिए।
आदिवासी जीवन पर विकास के आँधी-तूफान का सीधा असर है।बहुराष्ट्रीय निगमों के हितार्थ जल-जंगल-ज़मीन से आदिवासियों को बेदख़ल किया जा रहा है।उन्हें "सभ्य"बनाने की सुनियोजित कोशिशें जारी हैं।कथित साहित्यिक"मुख्यधारा" मूल निवासियों से उनके सहज स्वाभाविक जीवन को अपहृत करने में सक्रिय है।असंतोष-आक्रोश-प्रतिरोध-विद्रोह के स्वर यहाँ अनेक कवियों-कवयित्रियों में मौजूद हैं।इस तरह की प्रतिनिधि जनचरित्री कविताओं के संग्रह अन्य हिन्दी प्रदेशों से आने चाहिए।कल यह पुस्तक मिलने पर अभी तो मैं इन रचनाकारों की सोहबत से आनन्दित हूँ।


7.
गुरुवर भोलाशंकर व्यासजी (जन्म: 16अक्टूबर, 1923 ई. बूँदी , राजस्थान-
23 अक्टूबर, 2005, वाराणसी ) के सुपुत्र लक्ष्मीदत्त व्यास कुछ महीनों से दिखलाई नहीं दे रहे थे। मैं लंका से संकटमोचन के अंदरूनी रास्ते से गुज़रते हुए व्यासजी के घर के सामने रुका। रात हो जाने से मैंने भीतर जाना मुनासिब नहीं समझा। अस्सी पर सहपाठी डाक्टर गयासिंह के यहाँ जाने पर वे नहीं मिले। आगे बढ़ने पर भारत कला भवन से संबद्ध राजेन्द्र सिंह जी दिखे। मैंने उनके सहकर्मी लक्ष्मी दत्त व्यास के बाबत पूछा। उद्देश्य था कि गुरुवर व्यास जी की जन्मशताब्दी के सिलसिले में कुछ चर्चा की जाये। राजेन्द्र जी ने बताया कि लक्ष्मी कोरोना की दूसरी लहर में चले गये। कहा कि कोई बहुत दिन तक न दिखे या लंबे समय तक फोन-वार्ता न हो तो समझिये कि वह दुनिया छोड़ गया! लक्ष्मी दत्त मेरे सहपाठी स्नातक कक्षाओं में रहे। उनकी इच्छा तो रही कि वे अपने पिताश्री की जन्मशताब्दी अच्छी तरह से मनायें। अब उनके न रहने से यह सब अधूरा स्वप्न है! गुरुवर व्यास जी का फोटो मैंने एक पुस्तक के आवरण से लिया है।
जो मित्र घर से बाहर नहीं निकलते या बहुत कम न के बराबर फोन करते हैं मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घजीवन की कामना करता हूँ। वे घर पर ही रहें, सुरक्षित रहें। कभी न कभी कहीं न कहीं तो भेंट हो सकेगी! जियेंगे तो मिलेंगे!!



8.
जबलपुर में 92 के मलय जी
★★★

१९नवम्बर अनेक महान विभूतियों का जन्मदिन है।
बाबा गुरु नानक जी , रानी लक्ष्मीबाई,  इन्दिरा गांधी,  लोकबद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह कुछेक ऐसे नाम हैं जो इस तारीख़ को याद आते हैं। पुराने भारत में इन पुरानों का अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट योगदान है।
न्यू इण्डिया के न्यू पीएम का भी आज के  ही दिन बहुत ख़ास योगदान है क्योंकि सालभर से आन्दोलन कर रहे किसानों के हित में पारित कानूनों को वापस लेने की घोषणा हुई है!
19 नवम्बर, 1929 को मध्यप्रदेश के जबलपुर जनपद के सहसन गाँव के किसान परिवार में मलय जी का जन्म हुआ। उनकी रचना-यात्रा करीब सात दशकों तक विस्तृत है। कवि के बतौर उनके दर्जन भर संग्रह प्रकाशित हैं।हिन्दी के नब्बे पार के क्लब के वे एक सम्मानित चैतन्य सदस्य हैं। डा. रामदरश मिश्र, डा.विश्वनाथ त्रिपाठी, 
डा. रमेश कुन्तल मेघ को इस प्रसंग में सहज ही याद किया जा सकता है। मलय जी का शीर्ष व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई से अनन्य सम्बन्ध रहा।
कवि मुक्तिबोध से उन्हें जोड़कर देखा जाता है। परसाई जी के सान्निध्य का ही नतीज़ा है कि उनके खाते में "व्यंग्य का सौन्दर्यशास्त्र" , "सदी का व्यंग्य-विमर्श" जैसी विवेचनात्मक कृतियाँ हैं। "खेत में" कहानी-संग्रह के साथ ही "समय के रंग" में कवि का गद्य है।
विगत वर्ष उनका अब तक सम्पूर्ण साहित्य छह खण्डों में आया है। उनके सुपुत्र संजुल शर्मा, प्रखर कवि असंग घोष, युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने रचनावली संपादित की है।
वरिष्ठ कवि ओमभारती ने मलय जी के रचनाकर्म पर "जीता हूँ सूरज की तरह!" एक मूल्यवान पुस्तक का संपादन किया है। इसमें पुराने-नये रचनाकारों ने मलय जी के संपूर्ण साहित्य का सम्यक् मूल्यांकन किया है।ओमभारती की भूमिका और उनके एक स्वतंत्र लेख में मलय जी के प्रदेय की गहरी पड़ताल की है।
असंग घोष के मलय से लम्बे साक्षात्कार में उनकी सृजनशीलता और जीवन-दर्शन पर विचारणीय बातें हैं।हिन्दी में कवि त्रयी बनाने का पुराना फैशन आज भी चलन में है! मुक्तिबोध-शमशेर-मलय की त्रयी की कुछ जगहों पर चर्चा है। पर मलय जटिल सरलता के ऐसे कवि हैं जो अपनी ही बनाई राह पर चलते चले आये हैं।उनके सृजन में जनजीवन को गति प्रदान करनेवाले ताप और प्रकाश के घटक विद्यमान हैं।
मलय प्रगतिशील जीवन-मूल्यों से आबद्ध रहे।वैचारिकी मजबूत रही, साहित्यिक राजनीति में कभी उलझे नहीं। वे "पैदा करते हैं जीवन की आग" अपनी कविताओं मेंऔर पूछते हैं--
एक हिमालय से ऊँची चढ़ाई
चढ़ना है मुझे
साथ दोगे क्या?
मलय जी जैसे सच्चे जनप्रतिबद्ध रचनाकार का दीर्घकालीन साथ पाने की विनम्र अभिलाषा के साथ जन्मदिन की सादर शुभकामनाएँ!

©वाचस्पति, वाराणसी।

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Thursday, 18 November 2021

2. अंतर्दृष्टि के अन्वेषी कवि हैं अनिल कुमार पाण्डेय : गोलेन्द्र पटेल

2. अंतर्दृष्टि के अन्वेषी कवि हैं अनिल कुमार पाण्डेय : गोलेन्द्र पटेल



समय का सूर्य पहाड़ की आड़ में छुपता हुआ नज़र आ रहा है और साँझ आ रही है हमारी ड्योढ़ी की ढिबरी से बतियाने। रोशनदान से देख रहा हूँ। रात रो रही है। चाँद चिहुँक रहा है। तारे तकलीफ़ में सिसक रहे हैं। उल्का गिर रही है नीचे और हवा हँस रही है। मेरे भीतर भयंकर युद्ध छिड़ा है। जहाँ अनूभूति की अभिव्यक्ति की चाहत में शब्द का शस्त्र लेकर दौड़ रही है संवेदना और उसका समय की सत्ता से संग्राम जारी है। बिल्ली मेरे हिस्से का दूध पीकर ख़ुश है। परंतु दादा के दिमाग की दही जमा रहे हैं कुत्ते। द्वन्द्व व्यंग्य की बात सुनकर कुछ समय के लिए रूक गया है। बच्चे उड़ा रहे हैं खिल्ली नये विचारों और नवीन स्थापनाओं का। मैं भी हवा की तरह उनके पास से हँसता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि अनिल कुमार पाण्डेय की आगामी पंक्तियों की आँच आज की सरसराहट में सुबह से शाम तक बनी रही है। जिसकी वजह से मेरी देह थोड़ी गरमी महसूस कर रही है और मेरा दिल दुहरा रहा है कि "समय और मेरे बीच का युद्ध समाप्त हो गया है/ कभी कभी आता है ऐसा विचार/ हँसता हूँ और आगे बढ़ जाता हूँ।" आगे बढ़ने के संदर्भ में मेरे गुरु श्रीप्रकाश शुक्ल भी अपने आत्मकथ्य में कहते हैं कि "मैं राह के पत्थरों से नहीं टकराता और न ही उन्हें तराशने की कोशिश करता हूँ लेकिन जहां स्पन्द देखता हूँ, फिर वह कंकड़ ही क्यों न हो, उसे उठाकर समष्टि गत चित्त की धारा में रख देता हूँ। अब वह बहे या रहे, उसे तय करना है।"  विचारों के ब्रम्हांड में मेरे मन का घोड़ा दौड़ रहा है। पर उसका पूरा पैर है धरती पर। वह देखना चाहता है जन-जमीन-जंगल और जल को। पूरी की पूरी सृष्टि चेतना की आँखों में नाच रही है। एक कुम्हार कवि की भूमिका निभा रहा है। उसकी परिवेशगत संलग्नता मानवता की मिट्टी खाच रही है। चिंतन का चाक चल रहा है अपनी धुरी पर। मैं विचारों की दुनिया से बाहर की बस्ती में झाँक आना चाहता हूँ। जैसे कवि व लेखक अपनी खुली आँखों से भ्रमण कर रहे हैं भूख के भूगोल में। जहाँ अक्सर होता है भय का जन्म। जहाँ अक्सर होती है मृत्यु की मचान। जहाँ के चूल्हे में अक्सर जलती हैं मसान की अधजली हुई लकड़ियाँ। ऐसे स्थानों पर मैं भी दौड़ कर जाना चाहता हूँ और अपने आत्मीय कवि अनिल पाण्डेय की तरह पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाना चाहता हूँ। वे कहते हैं कि "दस कदम दौड़ लगा आना चाहता हूँ / पूरे परिवेश में।"  यहाँ आप दस कदम दसों दिशाओं के लिए कवि का वामन अवतार रूपी मावनवीय जिजीविषा का एक-एक कदम समझे तो बेहतर है। अपने वातावरण का वास्तविक दुःख देखना है तो कुछ पल के लिए अपनी पुतलियों को पत्थर करना ही होगा।


दुःख देवताओ की तरह सार्वभौमिक होता है। देवगण भले ही कोरोना के कहर से डरकर अपने केत में कैद थे। परन्तु दुःख सबकी ख़बर लेता रहा। सबके पास जाता रहा। लोग सबको अपने पास आने से रोक सकते हैं परंतु इसे नहीं। यह बहुत बेहया और असंवेदनशील होता है। यह किसी का नहीं सुनता है और किसी का परवाह नहीं करता है। पूरी सृष्टि इसकी चपेट में है, हम कह सकते हैं कि कब्जे में है। यह जहाँ चाहे वहाँ राज करे। मैं तो इसे संकट का सम्राट कहता हूँ और इसकी सम्राज्ञी किसी भी बिमारी को। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि महामारी इसकी राजमाता होती है। इसकी वजह से प्रत्येक जीव परेशान रहते हैं। इसे दूर से ही देखकर सुख मनुष्य का साथ छोड़ देता है। वह अपने समय से पहले ही भाग जाता है। कहीं किसी अज्ञात स्थान पर। मैं भी मानता हूँ कि होनी को कोई टाल नहीं सकता है परंतु दुःख को दूर से देखकर हम अपने सुख को समय से पहले नहीं जाने की सौगंध तो ले ही सकते हैं। सौगंध हमें सुख की सड़क पर चलना सीखाती है और संघर्ष के सफ़र में शक्ति देती है। जिसे जिद कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है। यदि आप में जिद है तो आप कोई भी जंग जीत सकते हैं। अतः जहाँ जिद है वहीं जीत है। जिसे लक्षित करते हुए अनिल कुमार पाण्डेय कहते हैं कि "ठीक है कि दुःख का आना/ रोक नहीं सकता कोई/ सुख को न जाने देने की जिद अपनी है।" 


©गोलेन्द्र पटेल


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Wednesday, 17 November 2021

अंतर्दृष्टि के अन्वेषी कवि हैं अनिल कुमार पाण्डेय : गोलेन्द्र पटेल

 अंतर्दृष्टि के अन्वेषी कवि हैं अनिल कुमार पाण्डेय// गोलेन्द्र पटेल



मेरे गाँव से बनारस में बहुत से लोग राजगीरी का काम करने जाते हैं। बनारस में ही मेरे पिता भी मजदूरी करते हैं। वहीं उनके काम पर एक राजगीर उनसे कहता है कि आपका लड़का फेल हो गया है और मेरे फेल होने की यह झूठी सूचना उस मिस्त्री को वहीं पर काम करने वाला मेरे गाँव का एक सज्जन मजदूर ने अतिशयोक्ति भरी बात-बात में दी। इस सूचना को सच मानकर पिताजी घर आते हैं और माँ को बताते हैं कि मैं बी.ए. में फेल हो गया हूँ। रातभर माँ पर क्या बीती होगी इसका अनुमान आप खुद लगा सकते हैं। जब सोकर उठा तो तुरंत माँ ने सहजता से कहा कि सुना है। तुम फेल हो गए हो? बेटा! क्या यह सच है? मैं कुछ देर शांत रहा फिर धीरे से कहा कि हाँ। जबकि इस बात को सुनते ही मेरे हृदय में हँसी की हिलोरें उठने लगी। लेकिन मैंने उसे भीतर ही दबाते हुए अपने चेहरे पर चिंता की रेखा खींची। जिसे देखकर माँ को यकीन हो गया कि मैं फेल हो गया हूँ। खैर, मनुष्य कब तक हँसी को कंट्रोल करेगा? हँसना तो तय था और खुब हँसा, जी खोलकर हँसा। माँ की दशा को देखकर आँखों का रस टपकना चाहता था। परन्तु उसी समय अनिल कुमार पाण्डेय की आगामी कुछ पंक्तियाँ याद आईं। वे कहते हैं कि "स्वप्न माँ का था/ अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ/ इच्छा भाईयों की थी/ संभालने लगूँ कुछ ज़िम्मेदारियाँ/ गुरुओं ने चाहा था/ योग्यता का क्षरण न हो किसी भी रूप में/" और फिर क्या था इन पंक्तियों पर विचार करने लगा। 'फेल' के फलक पर युवा पथप्रदर्शकों का प्रकाश दिखाई देने लगा। जहाँ से मेरी यात्रा शुरू हुई। वहीं पर मेरी इच्छाएँ और जिज्ञासाएँ एक साथ दौड़ने के लिए उद्धत हुई। मैंने महसूस किया कि अँधेरे में आदमी की चाल उजाले की अपेक्षा तेज हो जाती है और योग्यता की शक्ति सड़क पर पथिक की गति को खुद-ब-खुद बढ़ती है। चाहे भले ही सड़क पैदल चलने के अनुकूल न हो। लेकिन जब हम सफ़र में बुरे समय से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। तब उम्मीद की उर्जा हमें हमारे लक्ष्य तक कभी न कभी पहुँचाती है। इस बात की पुष्टि मैं अनिल पाण्डेय की आगामी पंक्तियों कर रहा हूँ। वे लिखते हैं कि "अब निकले हैं कदम/ पहुंचेंगे तो ज़रूर/ कहीं न कहीं समय से/ या फिर अपने स्वभाव में देर से ही सही"


भारतीय लोक संस्कृति में प्रसिद्ध है कि माँएँ सुबह सुबह स्नान कर के एक लोटा जल का अर्घ्घ सूर्य या तुलसी को देने के बाद उनसे अपने संतान के लिए सुख-सुविधा मांगती हैं। इस एक लोटा अर्घ्य के द्वारा माँओं में संतानों की सरकारी नौकरियां और पदोन्नति की चाहत दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। पर इस संदर्भ में मैंने कभी भी अपनी माँ को अर्घ्य देते हुए नहीं देखा है। हाँ, नवरात के दिनों में जब गाँव की सभी माताएं देवियों को पानी देती हैं तो मेरी माँ भी धार, कपूर व फूल वगैरह लेकर उनके साथ जाती है। गाँव के कुछ लोक देवी-देवताओ का नाम माँ से सुना हूँ जैसे कि जीउतिया माई, सम्मो माई, कोटि माई, बनसत्ति माई, भवानी माई, डीह बाबा, बरम बाबा, दइतरा बाबा, चकिया बाबा, तीन तड़वा बाबा इत्यादि। वैसे मेरी माँ नियमित पूजारिन है पर मिट्टी के चूल्हे का, जिसे वह रोज सुबह लीपती पोती है। माँ चूल्हे की राख उठा रही है। पिताजी आते ही पूछ रहे हैं कि रिजल्ट कैसा है? कहीं फेल तो नहीं हो गए। उन्हें चक्की से आटा लाने जाना था इसलिए कोई मजाक नहीं, क्योंकि ऐसे प्रश्न पर पिता से मजाक भारी पड़ सकता है। यही सोचकर तुरंत कहा कि नहीं, मैं पास हूँ। तभी टपाक से टपक पड़े एक भाई साहब। वे कह रहे हैं कि अनिल कुमार पाण्डेय कौन हैं? चर्चा परिचर्चा में किसी का परिचय पाना अच्छी बात है। परंतु भाइया जी का फार्म भर भरकर एम.फिल. तक पहुंचने की यात्रा में छूपी जिज्ञासा जब बीच में टोकती है तो कुछ खटकता है कि वे हिंदी के कितने महान विचारक व चिंतक हैं। बहरहाल बड़े हैं इसलिए मेरी बेबसी गई तेल लेने। उन्हें बताना पड़ा कि अनिल पाण्डेय कौन हैं। बताने की प्रक्रिया में एक वाक्य अनायास ही निकला है पर है महत्वपूर्ण। वह यह है कि कविताई अवनि की अंतर्दृष्टि के अन्वेषी कवि हैं अनिल कुमार पाण्डेय।


सुबह का संवाद शब्दबद्ध कर रहा हूँ। तो सोच रहा हूँ कि ये मानवीय रिश्ते-नाते-संबंध ही जीवन का बुनियादी आधार होते हैं। जो हमारी मनुष्यता को दीर्घजीवी बनाते हैं। घर परिवार रिश्तेदार सब के सब इस आधार पर टीके हैं और इसकी केंद्रीय बिंदु पर समाज का वह खूँटा है जिससे हम सब बँधे हैं। जहाँ दुनिया सुख दुःख में एक दूसरे से बातें करती हैं। वहीं इस महामारी के दौर में बातें तो दूर की बात है। हम अपने सगे संबंधियों को ठीक से याद भी नहीं करते थे कि कहीं हमारी वजह से किसी को हुँटकी न आया जाये और वह चला न आये कोरोना को लेकर हमारे पास। फिर भी इसी समाज का सबसे संवेदनशील प्राणी कवि व लेखक अपने सगे संबंधियों को याद करते थे। वे उन्हें उन लोगों को भी याद करते थे जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते थे। मौका मिलने पर कोरोना से कुश्ती भी लड़ते थे। कई कवियों व लेखकों को

कोरोना ने पटका तो कई कवियों ने कोरोना को। मेरे अत्यंत आत्मीय कवि मंगलेश डबराल को कोरोना ने पटक पटक कर मारा है, तो वहीं मेरे प्रिय मार्गदर्शक व कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने उसे पटक पटक कर उस पर विजय पाई है। संभवतः जब वे चारपाई पर थे तब वे यादों के यात्री रहे होंगे। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि जब मनुष्य स्मृति के सागर में डुबकी लगता है तो उसका परिवेशगत प्रेम पहले की अपेक्षा बढ़ जाता है। उसके सृजनात्मक संसार में प्रेम का प्रसार होता है। प्रेम मनुष्य की रक्षा करता है और परिवेश की रक्षा करने की सलाह देता है। प्रेम का होना, जीवन के जागतिक जगत का होना है। यह हमें जागते हुए गंतव्य तक जाने की प्रेरणा देता है। इसी दिशा में अनिल कुमार पाण्डेय की दीर्घदृष्टि दौड़ती हुई कहती है कि हमें उन्हें याद करना चाहिए, जो हमारी जिंदगी की नाव का निर्माण करते हैं। कम से कम उस वक्त अवश्य याद करना चाहिए, जब नदी में उफान हो और उस पार जाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़े। ऐसी परिस्थितियों में अनिल पाण्डेय की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं कि "सोचा कि याद कर लूँ एक बार/ घर परिवार, नात रिश्तेदार सगे सम्बन्धियों को/ याद अक्सर जो करते हैं मुझे/ समय इतना नहीं कि कह सकूं उन्हें/ मैं तुम सबके साथ हूँ/ प्रेम भाव पहले से कहीं /अधिक है इधर के दिन/ कई बार सोचा बता दूं/ आज तक बस सोच रहा हूँ सोचता जा रहा हूँ।"


आज यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़े होने वाले बहुत कम कवि व लेखक हैं। ऐसे में यदि कोई कवि या लेखक केवल खड़ा ही नहीं, बल्कि साथ साथ सहयात्री बनकर चल रहा है तो वह निश्चय ही पाठकों के स्मृतियों में जिंदा रहने वाला कोई कोरोजयी ही है।


©गोलेन्द्र पटेल


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Friday, 12 November 2021

गोलेन्द्र पटेल को रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022

 गोलेन्द्र पटेल को रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022

      (डॉ. रविशंकर उपाध्याय)

बी .एच .यू . ‘हिंदी विभाग’ के शोध छात्र रहे युवा कवि डॉ. रविशंकर उपाध्याय की स्मृति में प्रति वर्ष दिया जाने वाला 'रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार :2022 , खजूरगांव,चंदौली,उत्तर प्रदेश के रहने वाले युवा कवि गोलेन्द्र पटेल को  दिया जायेगा। 5 अगस्त 1999 को जन्में  गोलेन्द्र पटेल वर्तमान में कला संकाय बी.एच.यू. में स्नातक के छात्र हैं।वे साहित्यिक रुचि रखने वाले सचेत रचनाकार और वर्तमान युवा कविता के उभरते हुए एक संभावनशील युवा कवि हैं।उनकी काव्य रुचि और रचनात्मकता को ध्यान में रखते हुए इस समिति के निर्णायक मण्डल ने उन्हें इस वर्ष के पुरस्कार के लिए चुना है।

(कवि गोलेंद्र पटेल)

इस पुरस्कार का निर्णय महत्वपूर्ण कवि मदन कश्यप (दिल्ली), प्रतिष्ठित आलोचक अरुण होता (कोलकाता), प्रसिद्ध कवि अरुण कमल (पटना), चर्चित कथाकार अखिलेश(लखनऊ) और  महत्वपूर्ण कवि श्रीप्रकाश शुक्ल(वाराणसी) की समिति ने सर्वसम्मति से किया है।यह पुरस्कार 12 जनवरी 2022 को रविशंकर उपाध्याय के जन्मदिन पर बनारस में आयोजित एक कार्यक्रम में दिया जायेगा।

(आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल)

निर्णायक मंडल के  सदस्य के रूप में गोलेन्द्र पटेल  के नाम की अनुशंसा करते हुए महत्वपूर्ण कवि श्रीप्रकाश शुक्ल ने लिखा  है कि -'युवतर पीढ़ी के कवियों में गोलेन्द्र पटेल एक समर्थ व ऊर्जावान कवि के रूप में अपनी कविताओं से चकित करते हैं। उनके यहाँ एक असहाय आदमी का दुःख तो है लेकिन इस दुःख पर विजय की आकांक्षा भी है।उनकी कविताओं की भावभूमि व भाषा हिंदी कविता में धूमिल की याद दिलाती है ।कह सकते हैं कि निराशा में निराकरण के कवि के रूप में लक्षित किये जाने योग्य गोलेन्द्र हिंदी कविता के शानदार भविष्य हैं जिनके यहां संवेदना का विस्तार और अभिव्यक्ति का  संघर्ष  चकित करता है।'


ध्यातव्य है कि प्रतिभाशाली युवा कवि डॉ. रविशंकर उपाध्याय का 19 मई 2014 को बी .एच .यू .के अस्पताल में तीस वर्ष की अवस्था में ब्रेन हैमरेज से निधन हो गया था। वे छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय थे और बी. एच. यू. में 'युवा कवि संगम' जैसे आयोजन के संस्थापकों में थे। उनका पहला कविता संग्रह "उम्मीद अब भी बाकी है" नाम से उनकी मृत्यु के बाद वर्ष 2015 में प्रकाशित हुआ था। उनकी स्मृति में पहला पुरस्कार वर्ष 2015 में रांची की युवा कवयित्री जसिंता केरकेट्टा को ,दूसरा पुरस्कार  वर्ष 2016 में बलिया के अमृत सागर को, तीसरा पुरस्कार वर्ष 2017 में दिल्ली के निखिल आनंद गिरि को ,  चौथा पुरस्कार वर्ष 2018 में  बलिया  के अदनान कफ़ील दरवेश को, पांचवा पुरस्कार वर्ष 2019 में सीतापुर के शैलेन्द्र कुमार शुक्ल को, छठा पुरस्कार वर्ष 2020 में संदीप तिवारी को तथा सातवां पुरस्कार वर्ष 2021 में दिल्ली के गौरव भारती को दिया जा चुका है।

(डॉ. वंशीधर उपाध्याय)


प्रेषक/

वंशीधर उपाध्याय

सचिव 

रविशंकर उपाध्याय स्मृति संस्थान,वाराणसी

फोन-08448771785


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Wednesday, 3 November 2021

जिंदगी ही जुआ है : गोलेन्द्र पटेल

 जिंदगी ही जुआ है//



इस दीवाली पर दुनिया डूब रही है दुःख में। मैं तलाश कर रहा हूँ स्मृतियों के सागर में मानवीय मोती और अँधेरी गुफाओं में मणि। हताश-निराश जनता खेल रही है जुआ-ताश। वे कच्ची उम्र दुखी दिख रही हैं। जिनके घर की पकी उम्र पी रही है दारू-दक्कड़। लक्कड़-फक्कड़ देहाती दोस्त पूछ रहे हैं कि मैं जुआड़ी से जिज्ञासु विद्यार्थी कैसे बना। इस में कोई संदेह नहीं है कि हर किसी की जिंदगी ही जुआ है।लुच्चों-लफंगो की संगत का असर कुछ न कुछ तो जीवन पर पड़ता ही है पर यह एक विचित्र कहानी है। मेरा जन्म गाँव में हुआ है। मेरी देह और दिमाग का विकास खेत में हुआ है। वैसे मैं किसान नहीं हूँ न ही मेरे पिता। हाँ, मेरे पिता के पिता किसान थे पर मेरे पिता मजदूर हैं और मेरी मजबूरी थी खेतों में खटना। मेरी बाललीला में गँवई खेल के साथ खुरपातीपन के रंग भी शामिल रहे हैं। यहाँ गँवई खेल का आशय है गुल्ली-डण्डा, गोली-कौड़ी, होला-पाती, गाजर-गुजरिया, लुक्का-छीपी, आइस-पाइस, डाकू-पुलिस, खो-खो सो-खो, कबड्डी-सबड्डी, फोटो-सोटो, जुआ-ताश, तुल-भाई-तुल, हाँकी व सटर्रा आदि और खुरपातीपन यानी होलिका माई में किसी की टाटी-छप्पर को झोंकना, किसी के खेत में रात को धावा बोलना, किसी के पेड़ का फल-फूल तोड़ना, किसी के ब्याह में बिना नेवता का भोजन करना आदि। मैं अपने खुरपातीपना की वजह से बहुत डांट खाया हूँ। मेरी माँ अँगूठा छाप है पर पिता दस्तख़त करना जानते हैं। पिता पिटते नहीं थे पर माँ खुब पिटाई करती थी। यहाँ तक की रात में घर से भगा देती थी। लेकिन मैं भी कम टेकी नहीं था। घर से निकल जाता था। रात भर पड़ोसी दोस्त के यहाँ सोता था। यही किस्सा सभी साथियों का था। सब एक-दूसरे के घर ऐसे हालात में सोते थे। जब मुझे दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा या कोई अन्य खेल खेलना होता था तब मैं शौच का बहाना बनाता था। जब टीवी देखना होता था तब किसी मंदिर पर रामकथा सुनने जाने का। खैर, माँ मुझे पढ़ाना चाहती थी पर माँ को 'क', 'ख' , 'ग' , 'घ', 'ङ'.... पूरा अक्षर नहीं आता था। अंग्रेजी वर्णमाला भी नहीं आती थी और न ही पहाड़ा वगैरह। 


पिता भी पढ़ें लिखे नहीं हैं इसलिए पढ़ाते कम थे। पर हर-किर्तन और रामकथा सुनने के लिए दूर-दूर दूसरे गाँव में ले जाते थे। मैं तो केवल हलवा-पूड़ी और प्रसाद खाने के चक्कर में जाता था। मेरे कुछ मित्र जो मेरे साथ गाय-भैंस चराते थे। वे बहुत हरामी थे। जो  राम-कृष्ण के भक्त उनके आगे बैठकर कथा सुनते थे। वे सब पीछे से उनका कूरता काट देते थे। मैं जहाँ भी उन मित्रों के साथ रामकथा सुनने गया हूँ। देखा हूँ कि वे सब ब्लेड लेकर जाते थे और अपना खुरपाती हुनर दिखाते थे। बचपन में फोटो-ताश के लिए शिवरात्रि का मेला प्रसिद्ध था। वहाँ सभी दोस्त यह खेल जमकर खेलते थे। मुझे याद है कि एक बार शिवरात्रि के मेला में ही एक मित्र कोहड़वा वाली मिठाई चुराकर भाग रहा था और ठीक भारतीय स्टेट बैंक के सामने उस ठेलेवाले का लड़का जो कि हमउम्र का था। उसे पकड़ लिया था और संजोग से मैं वहीं खड़ा होकर किसी अन्य मित्र का इंतजार कर रहा था। आखिर बचपन में पडोसी ही मित्र होते हैं। कौन गलत है कौन सही? इस पर बिना विचार किये ही ठेलेवाले के लड़के पर टूट पड़ा मैं। उसको पिटने के बाद हम दोनों चले आयें घर। फिर कुछ सालों के बाद ठेलेवाले का लड़का छठवीं कक्षा में मेरा सहपाठी बना। एक साल तक मैं उसके साथ पढ़ा। हम दोनों के बीच कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं हुआ। लेकिन अन्य लड़कों से हुरा-फाइटिंग और उठा-पटक खुब हुआ। मैं सातवीं-आठवीं कक्षा में दूसरे विद्यालय में चला गया और वहाँ भयंकर युद्ध हुआ। विद्यालयों में युद्ध का कारण तो आप लोग जाते ही हैं। इस भयंकर युद्ध में दो गाँव झोंका गये थे। बहरहाल बचपन से ही पिता के साथ माइनस (इस जुआ में चार लोग एक साथ खेलते हैं। प्रत्येक को तेरह-तेरह ताश के पत्ते मिलते हैं।) खेल रहा था। 


जब मेरे घर दो जुआड़ी आते थे तब तीसरे जुआड़ी पिताजी होते थे और चौथा स्वयं मैं था। मैं उन्हें कई बार हरा भी देता था। ताश का लगभग सभी खेल खेला हूँ; जैसे कि तिरेल (तीन पत्ते), नहला-दहला-पक्कड़-पक्कड़, माइनस, जोड़ पत्ती और खींच पत्ती आदि। अतः आज से लगभग सात साल पहले मैं पक्का जुआड़ी था और प्रतिदिन खेलता था। यानी मैं नवीं कक्षा से जुआ खेलना छोड़ दिया हूँ। मैं जुआ के पास जाता भी नहीं हूँ पर जुआ मेरे पास आता है। जब मैं परीक्षा हाल मैं बैठता हूँ तब भीतर का जुआ जाग जाता है और मैं अपने पिता जी को कोसने लगता हूँ कि जिनसे आज मेरा कंपटीशन है जब इनके पिता इन्हें पढ़ना-लिखना सीखा रहे थे। इनके भावी भवन की मजबूत दीवार खड़ा कर रहे थे तब मेरे पिता मुझे जुआ खेला रहे थे और मेरी जिंदगी को जुआमय कर रहे थे। यहाँ एक बात तो तय है कि कोई जन्म से जुआड़ी नहीं होता है। वह अपने परिवेश से सीखता है या फिर मेरी तरह अपने परिवार से। मेरी नज़र में जुआ खेलना गलत नहीं है बस जुआ से जीवन का पतन वाली स्थिति न हो। जुआ तो श्रीकृष्ण भी खेलते थे पर वे जब खेलते थे तब जीतते थे। क्योंकि वे मनुष्य नहीं थे। मनुष्य तो धर्मराज युधिष्ठिर थे, जो अपनी पत्नी तक को इसी जुए में हार गये। जिसे आप उनके जीवन का कलंक कहो या फिर पतन। पर मनुष्यता की प्रकृति तो यही कहती है कि जुआ जीवन के लिए खतरनाक सिद्ध होता रहा है। जनतंत्र में जुआ खेलना अपराध माना जाता है। लेकिन लोकतंत्र में लोग खेल रहे हैं। बस ताश की जगह कुछ और है। जिसे हम सब जाते हैं कि वह क्या है।


दीपोत्सव तो असल में जुआड़ियों का उत्सव ही है। जहाँ देखो वहाँ जुआ हो रहा है। बाजार के भाव से लेकर संसद भवन तक नज़र दौड़ाई तो यही दिखेगा कि राजनीति व पूँजीपतियों की प्रत्येक चाल पर प्रजा की शक्ति क्षरित हो रही है अर्थात् जनता जिंदगी की ज्योति जुआ में हार रही है। जीवन के पथ में प्रजा की जिजीविषा का जन्म होने पहले ही उसकी भ्रूण हत्या हो जा रही है। जुआ बहुतों को जहर देता हुआ, मुझे दिखाई देता है। मैं उसे खाने से किसी को रोक नहीं पाता हूँ। किसी को रोकना उसके रोष को जगाना है और समझना उससे झगड़ा करना है। जुआ की जगह पर विचित्र बात यह है कि जुआड़ियों के पास नोट दस रुपये का हो या हजार रुपये का। उसे आप उनके पैरों तले दबते हुए देखते हैं और उनके मुँह से गालियाँ गीता के श्लोक की तरह उच्चरित होती हैं। अगल-बगल की धरती सुरती, सर, एवन, गुटका व पान की पीक से प्रकाशित हो रही होती है। हर गेम में एक जुआड़ी खड़ा-खड़ा कहता है कि इतना तू मान जा, शेष मैं मान रहा हूँ। यहाँ मानना असल में अपनी ताकत दिखना है। जिसकी वजह से लोग आपकी हिम्मत की दाद देते हैं।


जीतने वाले की प्रशंसा करना तो हमारी परंपरा रही है। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जीत कहाँ हुई है और क्या जीते हैं। वर-वधू का जुआ हो या फिर ताश का जुआ। जीतने पर खुशी तो सभी को होती है और सभी जीतना चाहते हैं। आजकल जीतने की ललक लोगों में कुछ जादा होती जा रही है। कोई हारना नहीं चाहता है। पर जब कोई हारकर जीतता है तब उसे बाज़ीगर कहा जाता है। बाजीगर होना बहादुर होना नहीं है बल्कि विपरीत परिस्थितियों में दुर्गम पथ का पथिक होना है। मैं ये सब प्रथम प्रश्नकर्ता के सामने बक ही रहा था कि अचानक बिजली चली गई और आवाज आई कि कुएँ की जगत पर दीया लुटने वाला कोई बच्चा जर गया है। एक किसान जो कि पास में ऊख चूह रहा है। वह पूछ रहा है कि क्या हुआ। तो मैं बताते वक्त बात-बात में एक लघु कविता रचकर पढ़ डाली। जिसका शीर्षक है "हुआ"। जिसका संदर्भ उक्त जगत से नहीं है बल्कि उस जगत और जमीन से है। जहाँ से जीवन है। जो कि निम्नलिखित है :-


हुआ//


हुआ यह कि

एक दिन नदी ने कहा 

खेत से

कि मैं उलटकर हो जाती हूँ दीन

और मेरे दुःख को देखकर

वायु हो जाती है युवा


टंग जाता है जिसके कंधे पर जुआ

वह अक्सर है रुआ!


(©गोलेन्द्र पटेल

04/11/2021)

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

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Tuesday, 26 October 2021

कविता का किसान : गोलेन्द्र पटेल || kavita ka kisaan : Golendra Patel

 कविता का किसान // गोलेन्द्र पटेल



कविता अत्यंत गतिशील विधा होने की वजह से किसी परिधि विशेष की परिभाषा में स्वयं को कैद होने से मुक्त रखती है और इसकी गतिशीलता की बड़ी विशेषता यह है कि इसकी गति कवि के मन की गति की तरह है। यह हमारी मनुष्यता को बचाये रखने वाली समय की शक्ति है जो कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी न किसी रूप में विद्यमान होकर उसकी सौंदर्यमयी सृष्टि की कल्पना को मूर्तरूप देती है। हमारी जिजीविषा को जिंदा रखने में अहम भूमिका अदा करती है और मनुष्य में जीने की ललक पैदा करती है। यह ललक ही लोक को लक्ष्य तक पहुँचती है और लोग को योग तक। यहाँ हम योगत्रयी की बात कर रहे हैं। जिसके अंतर्गत ज्ञानयोग, कर्मयोग व भावयोग आते हैं। भावयोग को अनुभूति की अभिव्यक्ति की भक्ति की तरह देख सकते हैं। यह अपनी यात्रा में आधुनिकता की आँखों और परंपरा की पुतलियों से जिंदगी के जीवद्रव्य को देखती हुई अविचलाविराम आग बढ़ती रहती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कविता अपने समय और समाज की परिवेशगत उपज होने के साथ-साथ जीवन की यात्रा में जिम्मेदारी की ज्योति है।


संस्कृत साहित्य से लेकर हिन्दी-अंग्रेजी के तमाम विद्वानों ने काव्य के विविध रूपों पर चर्चा-परिचर्चा एवं विचार-विमर्श किये हैं। यहाँ हम काव्य का संदर्भ कविता से ले रहे हैं। आलोचकों ने भी आलोचना की आलोकित दृष्टि से कवियों की कला व कौशल की खुब प्रशंसा की और करते रहेंगे। बस, कविता में वे तत्व व तथ्य मौजूद होने चाहिए जो सृष्टि के जीवन को सौंदर्यता प्रदान करने में सक्षम हों। परंतु आज का दौर कविता की बाढ़ का दौर है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि इस समय हमें सोशल मीडिया पर संवेदना का समुद्र दिखाई दे रहा है। जहाँ सुकवियों का मोती व शंख हैं तो कुकवियों का घोंघा व कंख भी। इस दैन्य दैनिकी दृश्य से हम अच्छी कविता और अच्छे कवि का चुनाव करने में काफी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। नवोदित कवियों की रचनाधर्मिता की प्रतियोगिता में प्रतिष्ठित कवि भी अपने कवि-कर्म से विमुख होते हुए दिखाई देते हैं। कुछ तो अपने समकालीन रचनाकारों के होड़ में जीतोड़ लगे हुए कि वे हमसे अधिक रचना कैसे कर सकते हैं। वे हमसे अधिक पुस्तकें कैसे लिख सकते हैं या सकती हैं? और विडंबना यह है कि इन्हीं प्रतिष्ठितों के चक्कर में प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाएँ नवोदित रचनाकारों की प्रतिष्ठित रचनाओं को छाप भी नहीं रहे हैं। संभवतः आप कुछ के संपादकीय दृष्टि से परिचित भी हैं। ऐसे में यदि कोई संपादक किसी नवोदित रचनाकार से उसकी रचनाओं को माँग कर और अपने मार्गदर्शन के साथ छापता है। तो हमें अत्यंत खुशी होती है और हम उन्हें ही अपने समय का सच्चा संपादक समझते हैं।


चेतना का चित्र संकेतधर्मिता के साँचे में प्रस्तुत करने वाली शक्ति है कविता। जो गद्य की सपाटबयानी से परे संवेदनागत सर्जनात्मक संसार का संवेदन है और यहाँ जो गूँज है वह कल्पना और यर्थाथ के संगम पर सुनाई देने वाला समय का स्वर है। कवि के शब्दों में उसके युग का ताप होता है जिसकी वजह से उसकी अभिव्यक्ति में आँच महसूस होती है। जहाँ आँच उसकी शितलता का पूरक है। जिसे मैं जीवन रूपी जल के दर्पण में देख रहा हूँ और मेरे भीतर का कवि मुझसे कह रहा है कि जैसा दौर होता है वैसा दर्पण होता है और इस दर्पण का निर्माण रचनाकार की मानवीय दृष्टि करती है। जिस रचनाकार की दृष्टि जितनी अधिक दीर्घी होगी उसका दर्पण उतना ही अधिक मजबूत और टिकाऊ होगा। यानी किसी भी रचनाकार का दृष्टिकोण ही उसे दीर्घजीवी बनाता है और उसकी रचना को दीर्घजयी। दुनिया की हर चीज रचनात्मक भूमि का बीज है। बसरते उसे बोने से पहले कोई रचनाकार अपनी भूमि को अपने श्रम से कितना उपजाऊ बनाया है और बोने के बाद उसकी कितनी देखभाल करता है। एक बात और कि उस बीज का भावी भविष्य मौसम पर निर्भर करता है। जिसे मैं मानस का मौसम कहता हूँ। दरअसल मनुष्य की अनुभूति की अभिव्यक्ति में परिवर्तन की प्रक्रिया का वह समय जब इसका मानसून मन को विचलित करता है तब कोई बीज अंकुरित हो रहा होता है। जो आगे चलकर उस भूगोल को उम्मीद की उपज देता है। जहाँ उसे उगाया गया है।


इस उगाने की चाहत में चित्त चयन करता है कविता का उर्वर प्रेदश। इस प्रदेश में नये किसानों के लिए बहुत सारी समस्याएं हैं, चुनौतियाँ हैं। लेकिन जो अपने पूर्वजों से कृषि का संस्कार ग्रहण किया है या कि उनके साथ रहा है उसे उतनी दिक्कत नहीं होगी। जितनी परेशानी सामान्य नवोदित कृषक को होती है। खैर, इस मामले में तो मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मेरे अनेक अनुभवी मार्गदर्शक हैं जिन्हें आप कविता का किसान कह सकते हैं। जिनके जीवन से मैं सीख रहा हूँ कविता की खेती करना। इसलिए मेरी कविताओं के केंद्र में गाँव की गाथा होती है, मिट्टी की मिठास होती है और खेतों की ख़ुशबू होती है। ऐसा नहीं है कि शहर मेरे यहाँ गायब है। वह भी उतना ही है जितना गाँव है। जब गाँव का धुआँ और धूल शहर जाती है। उस शहर, जहाँ फ़सल का मूल्य तय होता है तो किसान की मृत्यु दर बढ़ जाती है। तब उस शहर के प्रति और शहर के शिक्षितों के प्रति मेरे कवि की दृष्टि थोड़ी रूखी हो जाती है। असल में यहाँ रूखा होना प्रतिरोधी होना है और प्रतिरोधी होना पीड़ा से परिचित होना है। जाहिर सी बात है कि जो पीड़ित है वह प्रतिरोध का स्वर अपनायेगा ही और समाज के नीचले तबके लोगों के प्रति उसकी साहनुभूति होगी। एक तरह से कह लिया जाये तो वह दमित, दलित, शोषित, उपेक्षित, मजदूर, मजबूर गरीब किसान, कोयरी, कुर्मी, कुम्हार, लोहार, चमार, चूड़ीहार, गोड़, नट, मुसहर एवं धोबी-खटिक आदि की आवाज़ है। बहरहाल एक कवि का वक्तव्य उसकी कविताएँ ही होती हैं।


©गोलेन्द्र पटेल

     ■■★■■ संक्षिप्त परिचय :-


नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम : गोलेंद्र ज्ञान

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) , बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी

विधा : कविता, कहानी व निबंध।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


प्रसारण : राजस्थानी रेडियो, द लल्लनटॉप , वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : मैं भोजपुरी अध्ययन केंद्र (बीएचयू) में तीन-चार बार अपनी कविताओं का पाठ किया हूँ और 'क कला दीर्घा' से 'साखी' के फेसबुक पेज़ पर दो बार लाइव कविता पाठ। अनेक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठी में।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" और अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र।


संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Sunday, 17 October 2021

"सतरंगी संवेदना" :: मैं अपनी माँ को छल रहा हूँ : वसंत सकरगाए {©Vasant Sakargaye} | गोलेन्द्र पटेल

 

                                       {चर्चित कवि व लेखक : वसंत सकरगाए}

{आज यहाँ अहिन्दी भाषी एवं विदेशी (मारीशस ,सिंगापुर व नेपाल आदि) साहित्य प्रेमियों/साथियों के माँग पर आत्मीय कवि वसंत सकरगाए की कविताएँ प्रस्तुत करते हुए मुझे अत्यंत आनंद की अनुभूति हो रही है...|खैर|}


1).

*जग़ह*

                         

पायदान पर पाँव रखा ही था और 

तुम लोगों ने उसे रोक दिया बस में चढ़ने से

कहकर कि सीट खाली नहीं है!


हालाँकि बहुत मिन्नते कीं उसने

किसी से नहीं कहेगा थोड़ा-थोड़ा खिसकने को

तुम्हारी निर्धारित जग़हों के बीच

नहीं बनाएगा कोई जग़ह अपने लिए


मुँह से मुँह मिलाकर

कोई खलल नहीं डालेगा तुम्हारी बातों में

बल्कि तुम्हारी सीट के ऊपर बने केबिन से

तुम्हें ज़रूरत होगी अपने सामान से किसी चीज़ की

तुम्हें ज़हमत नहीं उठानी पड़ेगी

हिचकोले खाते हुए खड़े होने की

उतारकर तुम्हें दे देगा तुम्हारा सामान

एक कृतज्ञ की भाँति


बावजूद इसके कि तुम्हें ज़रा भरोसा नहीं उस पर

मगर एक पक्के भरोसे की तरह वह

तुम्हें थाम लेगा सामान उतारते वक़्त

अपने किसी सहयात्री

पर गिरते समय


पर तुम्हें लगा, रेलिंग पकड़कर खड़ा यह ठूँठ 

तुम्हें देखने नहीं देगा

एक-दूसरे को


वह देखता रहा बस को 

आँखों से ओझल होने तक

और तुमने पलटकर भी नहीं देखा

एक आदमी कितना वंचित हो गया जीवन से


यह आख़िरी बस थी 

और उसे

अपने घर लौटना था!

रचना : 18/10/2021



2).

* मैं अपनी माँ को छल रहा हूँ *


बचपन में जो-जो छल-कपट माँ ने किए मुझसे

अब उसका सारा हिसाब 

चूकता कर रहा हूँ माँ से


वे तमाम चीज़ें जो सख़्त नापसंद थीं खाने में मुझको

जिन्हें देखते ही मुँह फेर लेता था दूसरी तरफ़

उसी तरफ़ से कोई ज़ाएकेदार छलावा  

ईज़ाद कर लेती थी माँ

मेरी अच्छी सेहत के ख़ातिर


आटे में गूँद देती थी घिसकर रात का गला बादाम

इतना महीन पिसती थी अखरोट की गिरियाँ

कि संभव न था तरकारी के रसे में उसकी शिनाख़्त करना

कटोरे भर-भर खीर पी जाता था

मगर पता नहीं चलता था कि इसमें घुला है

लाल मस्से जैसा चिंरोजी का बीजा


दवाई की शीशियों में अनार-मौसम्बी का रस भर देता हूँ

दूध में घिसकर बादाम

माँ कहती है सिर्फ़ दो मुनक्का और मैं

तवे पर गर्म करते समय

छ: मुनक्कों की बनाता हूँ दो परतें


माँ तुम्हीं तो कहती हो

जैसा देव 

वैसी पूजा!

                                 रचना : 15/ अक्टूबर/2021



3).

*स्मृतिशेष बरगद*


किसी ने दिया हो कुछ भी नाम उसे

अनुरूप काम के अपने बनाया हो धाम उसे

पर मुझे बहुत माक़ूल लगा

उसे कहना

प्रतीक्षालय !


अधीन नहीं था वो किसी घर-आँगन का

पर सुनता था दु:ख-सुख

राष्ट्र, समाज और कितने ही बाखल-बरामदों का

कि जटाओं से जिसकी लूम-झूम लेते थे

स्कूल आते-जाते कितने ही बच्चे

कि स्त्रियों ने बाँध रखी थीं

तन पर जिसके कच्चे सूत की पक्की मन्नतें

कि ताज की तरह ही उसके भी तन पर

उकेरे गए कितनी ही मुमताजों के नाम

कि जिसके पत्ते-पत्ते पर गूँजते रहे

परिंदों की प्रणय-लीलाओं के गीत-मधुर

कि चुनावों में उसके देवत्व की लेकर शपथ

दिए गये झूठे आश्वासन

कि राष्ट्रीय समस्याओं पर आड़ से उसकी

शब्दवीरों ने छोड़े तीर भोथरे

कि चाल-ढाल में बेढब निपट लोगों तक ने

बैठकर नीचे उसके कोसा,समय के ढब को कितनी ही बार

कि जिसके साये में पनपी तक नहीं

जातपात धर्मभेद की कोई मीमांसा कभी


और क्या प्रमाण दूँ कि वो था कितना व्यवाहरिक!

वो एक जीवंत प्रतीक्षालय था

कुछ ग्रामीण बस-यात्रियों का

अंधाधुंध विकास के हाथों

जिबह किया गया जिसे

दिन दहाड़े एक दिन


फ़िलहाल जो बस-यात्री हैं विस्थापित

उनके लिए  प्रस्तावित है

प्रायोजक किसी निजी बड़ी  कम्पनी का यह विज्ञापन

कि आकर्षक रंग-रोगन और सुविधाओं से लैस

बनेगा एक प्रतीक्षालय

स्मृतिशेष उस विराट बरगद की जग़ह

जिसकी उखड़ी-बिखरी यहाँ-वहाँ पड़ी जड़ों में

उखड़-बिखर गई हैं हाल-फ़िलहाल

प्राकृतिक बोध, परम्परा की मजबूत जड़ें


एक अदृश्य में दृष्टिगत और स्पष्ट है जो

आसन्न किसी नए भ्रष्टाचार की

जड़रहित अमरबेल की अदृश्य जड़ें

जो जमती हैं प्रायः

किसी विराट चरित्र को काटकर ही

खड़े-खड़े

देखते-देखते ही।

                              ('निगहबानी में फूल' से)


4).

*मेरे तकिए में डाकिया रहता था*


पिंजारे के पास अपना तकिया ले जाता हूँ और कहता हूँ धून दो इसके कपास का रेशा-रेशा

अर्से से परेशान हूँ कि कहाँ ग़ायब हो गया पता नहीं

कि इसके भीतर कभी एक डाकिया रहता था


पिंजारे की हैरत भरी नज़रों को खूब समझता हूँ

मगर अब बड़ा मुश्किल है उसे समझा पाना

कि इस तकिए से निकलकर एक डाकिया

अक्सर मेरे सपनों में आता था

पत्र-पत्रिकाओं का एक पुलिंदा 

स्वीकृत-अस्वीकृत रचनाओं की चिट्ठियाँ

और छपी रचनाओं का मानदेय

मनीऑर्डर फॉर्म पर दस्तख़त लेकर दे जाता था

वह तो वापस चला जाता था लेक़िन

उसके दिए रुपये और चिट्ठियों को अक्सर

अपने इसी तकिए के नीचे रख लेता था

और अपनी इसी ख़ुशबू में छुपकर

एक डाकिया मेरे तकिए में रह जाता था


दूसरों के सुख-दुख बाँटते-बाँटते 

कभी फुर्सत में होता तो अपना दुखड़ा सुनाता था 

कि चढ़ना-उतरना होता है दस-दस माले

सुरसा की तरह बढ़ते इस शहर के मुँह में 

उसकी हैसियत मच्छर जैसी

इस मोहल्ले में ऐसा कौन था जिसे वह नहीं जानता था

और पूरा मोहल्ला उसे जानता था

वह हर घर का पारिवारिक सदस्य होता था


ईमेल व्हाट्सएप मैसेज मैसेंजर और 

ऑनलाइन पेमेंट के इस दौर में

अर्सा हुआ दिखा नहीं डाकिया

आता होगा तो सिक्युरिटी-गार्ड ले लेता है चिट्ठी-पत्री


एक डाकिया कभी मेरे तकिए में रहता था

और अक्सर मेरे सपनों में आता था

रचना : 09/10/2021



5).

*मैं तुम्हारा अपराधी हूँ माँ!*


अस्पताल के बिस्तर पर 

यह जो रह-रहकर तुम चीख़ रही हो माँ!

हड्डियों के दर्द से तड़पकर

इस दर्द से बावस्ता

कितनी ही तारीख़ें चीख़ रही हैं मेरे भीतर

और मेरी पलकें भींग रही हैं बारहा


और कितना ज़ालिम खूँखार यह दर्द तुम्हारा 

कि देखते ही तान देता है 

अस्थिरोग विशेषज्ञ पर बंदूक

और वह हाथ खड़े कर देता है


मैं तुम्हारी प्रथम प्रसव-पीड़ा का कारण 

कि मेरे जन्म के दौरान

तुम्हारी हड्डियों में पैबस्त हुआ होगा यह दर्द पहली बार

मानो टूट ही गई थी

तुम्हारी देह की एक-एक हड्डी


तुम्हारी हड्डियों रक्त माँस-मंजा से निर्मित 

कि चीख़ना चाहूँ तो चीख़ नहीं पाता हूँ

इतना लाचार बेबस निरुपाय 

मैं तुम्हारा अपराधी

मुझे क्षमा कर दो

माँ!

रचना : 30/सितम्बर/2021



6).

*मेरी प्रिय पुस्तक*


कितनी तो जुगत की और क्या-क्या नहीं किए धतकरम 

हाथोंहाथ उठवायी,बिकवायी चेले-चपाटियों से

शोधार्थियों से अकाल पड़वाया 

छपे कई-कई संस्करण 

क्या संतरी और क्या मंत्री

किसके नहीं लगाए चक्कर

यहाँवहाँ पुस्तक खपवायी

बचा नहीं कोई विश्वविद्यालय-पुस्तकालय


कहाँ नहीं आया पहाड़-झरना

रसूल हमज़ातोव का उकाब बैठाया डाल पर

पिरोये इतने सूत्र जैसे रिल्के की चिट्ठियाँ 

और चीफ की दावत का मर्म कहाँ परोसा नहीं

छत्तीस पकवानों से भरे थाल में 

दुबका रहा एक कली अचार

चाटुकारिता के लिए 


छूटा नहीं कोई सिद्ध आलोचक 

तुलसी ग़ालिब टॉलस्टॉय चेखव नेरुदा की

जिसने नहीं दी दुहाई 

गढ़े नहीं कसीदे


और इस साहित्य-समर में कौन ऐसा प्रतिस्पर्धी

जहाँ न मिले पानी

ऐसी जग़ह जिसे निपटाया नहीं


पर,हाय री क़िस्मत!

किसी भी पाठक की "प्रिय पुस्तक"

हो न सकी-

'मेरी पुस्तक' !                                      

                                           रचना : 29/09/2021

लिंक :-  https://youtu.be/Fb5mddPCT80

7).

*निर्भीकता एक ज़िद है*


मुझे पता है धँस सकती ज़मीन और 

मेरा घर हो सकता है धराशायी

इसका मतलब यह तो नहीं

मैं छोड़ दूँ घर बनाना


मुझे पता है धँस सकती है सड़क 

हो जाऊँ जम़ीदोज़,लौटकर न आऊँ घर

इसका मतलब यह तो नहीं

निकलूँ ही नहीं घर से


गोली लगने से एक पक्षी

मर जाता है आसमान में

इसका मतलब यह तो नहीं

पक्षी बंद कर देते हैं उड़ना


हर भय के विरुद्ध एक ज़िद है

निर्भीकता!

रचना : 16/09/2021


■■■★★★■■■



संक्षिप्त परिचय :- कवि वसंत सकरगाए 2 फरवरी 1960 को हरसूद(अब जलमग्न) जिला खंडवा मध्यप्रदेश में जन्म। म.प्र. साहित्य अकादमी का दुष्यंत कुमार,मप्र साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी सम्मान,शिवना प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान तथा अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता के लिए ‘संवादश्री सम्मान।

-बाल कविता-‘धूप की संदूक’ केरल राज्य के माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल।

-दूसरे कविता-संग्रह ‘पखेरु जानते हैं’ की कविता-‘एक संदर्भ:भोपाल गैसकांड’ जैन संभाव्य विश्विलालय द्वारा स्नातक पाठ्यक्रम हेतु वर्ष 2020-24 चयनित।दो कविता-संग्रह-‘निगहबानी में फूल’ और ‘पखेरु जानते हैं’


संपर्क-ए/5 कमला नगर (कोटरा सुल्तानाबाद) भोपाल-462003

मो.नं. : 9893074173

ईमेल : vasantsakargaye@gmail.com

                              {ई-सम्पादक : गोलेन्द्र पटेल}

★ संपर्क सूत्र :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{कवि , लेखक व सम्पादक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक ,

 काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र}

संपर्क :
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