गोलेन्द्र छंद : लक्षण
गोलेन्द्र छंद हिंदी का एक मौलिक, सममात्रिक तथा समवर्णिक छंद है।
इसके प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं—
- इसमें चार चरण (पाद) होते हैं।
- प्रत्येक चरण में 20 मात्राएँ तथा 20 वर्ण होते हैं।
- प्रत्येक चरण में 10–10 मात्राओं एवं 10–10 वर्णों पर यति होती है।
- यह सममात्रिक एवं समवर्णिक छंद है; अर्थात प्रत्येक चरण में मात्राओं और वर्णों की संख्या समान रहती है।
- समचरणों (द्वितीय एवं चतुर्थ चरण) में तुक (अन्त्यानुप्रास) अनिवार्य है; अर्थात दोनों चरणों के अंतिम वर्ण-समूह में समान ध्वन्यात्मक आवृत्ति होती है।
- विषम चरणों (प्रथम एवं तृतीय) में तुक आवश्यक नहीं है, यद्यपि काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से उसका प्रयोग किया जा सकता है।
गोलेन्द्र छंद (प्रस्तावित मानक स्वरूप)
गोलेन्द्र छंद हिंदी का एक मौलिक, सममात्रिक एवं समवर्णिक छंद है। इसका उद्देश्य सरल प्रवाह, गेयता और विचारप्रधान अभिव्यक्ति का समन्वय करना है।
लक्षण
- इसमें चार चरण (पाद) होते हैं।
- प्रत्येक चरण में 20 मात्राएँ तथा 20 वर्ण अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक चरण में 10–10 मात्राओं तथा 10–10 वर्णों पर यति होती है।
- समचरणों (द्वितीय एवं चतुर्थ) में तुक (अन्त्यानुप्रास) अनिवार्य है।
- विषम चरणों (प्रथम एवं तृतीय) में तुक वैकल्पिक है।
गुरु–लघु व्यवस्था
- प्रत्येक चरण में कुल 20 मात्राएँ पूर्ण होना अनिवार्य है।
- गुरु और लघु का कोई निश्चित गण-विन्यास अनिवार्य नहीं है।
- शब्द-विच्छेद करके मात्राएँ पूरी करना वर्जित होगा।
- यति सदैव पूर्ण शब्द पर ही होगी।
- अनावश्यक गुरु-लघु परिवर्तन (छंद-भंग) स्वीकार्य नहीं होगा।
गण-विन्यास
गोलेन्द्र छंद किसी एक निश्चित गण पर आधारित नहीं है। यह मात्रिक-प्रधान छंद है। अतः किसी भी गण का प्रयोग किया जा सकता है, बशर्ते—
- प्रत्येक चरण में 20 वर्ण हों।
- प्रत्येक चरण में 20 मात्राएँ हों।
- 10–10 पर यति बनी रहे।
- लय और उच्चारण स्वाभाविक रहें।
चरणांत नियम
- प्रत्येक चरण का समापन पूर्ण शब्द पर हो।
- चरणांत में गुरु वर्ण वांछनीय माना जाएगा, किन्तु लघु भी ग्राह्य होगा यदि लय बाधित न हो।
- द्वितीय एवं चतुर्थ चरण समान तुक पर समाप्त होंगे।
- विरामचिह्न छंद का अंग नहीं माने जाएंगे।
वर्जनाएँ
- शब्द-भंग करके मात्रा-पूर्ति नहीं।
- कृत्रिम उच्चारण नहीं।
- यति के भीतर शब्द-विच्छेद नहीं।
- केवल मात्रा-पूर्ति के लिए अर्थहीन शब्दों का प्रयोग नहीं।
उदाहरण (संरचनात्मक)
(1)
शीघ्र ही प्रस्तुत किया जाएगा।
नोट: “गोलेंद्र छंद” संपूर्ण भारतीय काव्यशास्त्र का सबसे कठिन छंद है।

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