Monday, 2 November 2020

नवोदित कोरोजयी कवियों की कोरोजीवी कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल{बीएचयू}

 🙏आत्मिक आदर आभार सादर नमस्कार!

इस संकलन के कवि क्रमशः -

१.आर्यपुत्र दीपक

२.कुमार मंगलम

३.कार्तिकेय शुक्ल

४.सर्वेश सिंह राजन

५.जागेश्वर सिंह

६.शिवम कुमार

७.

८.

९.

१०.




कवि आर्यपुत्र दीपक की कोरोजीवी कविताएँ :-

१.

" बाढ़ और उसके बाद "


     (  बाबा नागार्जुन से क्षमा मांगते हुए )

 कई  दिनों  तक  चूहा  तैरा  कनगोजर  के साथ

 कई दिनों तक बकरी ठहरी वन कुत्तिया के साथ

 कई दिनों  तक  छप्पर  पर  लगी सांपों की गस्त

 कई दिनों  तक  गाय - भैंस की हालत रही पस्त


कई दिनों तक सांप-छछूंदर सब सोए एक साथ 

कई दिनों तक जच्चा-बच्चा सब  रोए एक साथ

कई दिनों   तक  लूटपाट  सब  चला  जबरदस्त

कई दिनों तक मां - बाबू की हालत रही शिकस्त


सुशासन बाबू की नींद खुली कई दिनों के बाद

सरकार ने फेकवायीं पुड़िया कई दिनों के बाद

पानी  निकला  घर  से बाहर कई दिनों के बाद

अपनों  की  उतराई  लाशें  कई  दिनों  के बाद


घर - आंगन  में  बच्चे खेले  कई  दिनों  के  बाद

लंगड़ा कुत्ता चौखट पर आया कई दिनों के बाद

बाबू - भैया  पसीना  पोछे  कई  दिनों  के   बाद

बासमती  से  पूरा  घर  महका कई दिनों के बाद


२.

    " बोलो कवि "

बोल सको तो बोलो कवि

बोलो युवाओं के बेरोजगारी पर 

बोलो नेताओं की कलमकारी पर

बोलो मजलूमों के लाचारी पर

बोलो सत्ता जनित बीमारी पर 

कुछ तो ऐसा बोलो कवि....

 

जब असहाय मुँह बाये देखें

अपने अपनों की हत्याएं देखें

समाज निर्दोषों की चिताएं देखें

देश सीमा पर बढ़ती विपदाएं देखें

तब इनके साथ तुम हो लो कवि

बोल सको तो बोलो कवि....


जब सपनों पर हो आघात 

षड्यंत्रों में बढ़ता विश्वास

प्राणवायु में कोई विष घोले

तब तुम अमृत घोलो कवि

भेद साजिश का खोलो कवि

बोल सको तो बोलो कवि


जब आस्था का भयंकर विस्फोट हो

उम्मीदों,आकांक्षाओं पर गहरी चोट हो

जीवन का उद्देश्य ,उम्मीद मात्र नोट हो 

समाजसेवी बुद्धिजीवी के मन में खोट हो

तब समाज का विष तुम पी लो कवि

तुम आदि शंकर बन जी लो कवि

बोल सको तो बोलो कवि....


बोलो ऐसे कि दसों दिशाएं सुनें

सत्ता की फड़कती भुजाएं सुनें

किसान - मजदूर की रोटी सुने

समाज का हर बेटा - बेटी सुने

वैमनस्य फैलाता हर दंगाई सुनें

बाजार की कपटी पढ़ाई सुने

कुछ तो ऐसा बोलो कवि....


इस कोरोना जनित त्रासद कुसमय में 

समाज के असामाजिक समय में

आजादी का जमकर जश्न मनाओं 

या बढ़ती समस्याओं पर रो लो कवि

तुम समाज का मुँह खोलो कवि

बोल सको तो बोलो कवि ....

नहीं तो चिर निद्रा में सो लो कवि...


३.

अ , ब सीखने से पहले 

सिखाया गया ' वसुधैव कुटुम्बकम '

सिखाया गया अपनों का महत्व

समझाया गया जग अपना है

अपनों के साथ रहा करो


स्नेहार्थ उनसे गले मिलाया करो

ज्ञानार्थ उनका चरण छुआ करो

सेवार्थ उनके पास जाया करो

पुरूषार्थ उनसे कदम मिलाया करो

प्रेमार्थ हर पल साथ निभाया करो


अचानक एक अदृश्य वायरस ने 

इन मिथकों से पर्दा हटा दिया

नंगी हो गई मायावी दुनिया

नंगी हो गई सबकी सोच


४.

------------------ बहन ---------------

 बहन मतलब साधना सम्मान और संतुष्टि

 बहन मतलब अविरल अद्वितीय संस्कृति

 

 बहन मतलब धन्य धान्य और सम्पत्ति

 बहन मतलब सुख शांति और उन्नति

 

 बहन मतलब सम्पूर्ण संस्कार

 बहन मतलब तपस्विनी का प्यार

 

 बहन मतलब बेमतलब की लड़ाई

 बहन मतलब सबके सामने खिचाई

 

 बहन मतलब पल पल का सहयोग

 बहन मतलब सब संबंधों का योग

 

 बहन मतलब सब रिश्तों की जिम्मेदारी

 बहन मतलब सामज के प्रति वफादारी

 

 बहन मतलब निकम्मा भाई का हाथ -पांव

 बहन मतलब मां - बाबू का धूप - छांव

 

 बहन मतलब हर राज की पुड़िया

 बहन मतलब हर आंगन की गुड़िया

 

 बहन मतलब थकान में एक गिलास पानी

 बहन मतलब दादी-नानी की अकथ जुबानी

 

 बहन मतलब हर रोग की एक दवाई

 बहन मतलब हर पर्व की पहली मिठाई

 

 बहन मतलब शब्दहीन सार्थक संवाद

 बहन मतलब एक बिस्कुट के लिए विवाद

 

 बहन मतलब गुस्से में चुगलखोरी

 बहन मतलब गुप्त चिट्ठी - पत्री की चोरी

 

 बहन मतलब आदतन चिढ़ाना

 बहन मतलब चिढ़ाकर मनाना

 

 बहन मतलब कलाई की सुन्दरता

 बहन मतलब घर की चंचलता


 बहन मतलब सबसे पवित्र रिश्ता 

 बहन मतलब सब रिश्तों में फरिश्ता

 

 बहन मतलब आधी उम्र की पूरी कहानी

 बहन को क्या लिखूं कितना लिखूं बस यही कि

 

 बहन बिन अधूरा बचपन अधूरी जवानी

 उस लाडली के बिन

आज राखी का त्योहार और आंखों में पानी


५.

अपने हिस्से का दूध 

अब बछड़ा नहीं पी पाता

पी जाती है टाटा की गोवर्धन मशीन


अपने हिस्से का दूध

दिहाड़ी मजदूर के नवजात को कहाँ नसीब

सोख लेती हैं सुलगती पसलियाँ

धमनियों में उमड़ आता है लावा

और दूधमुँहे के हिस्से का दूध 

दवा बन सूख जाता है सीने में


अपने हिस्से का दूध

नहीं ले पाया कुपोषित बच्चा

क्योंकि भगवान सूखे थे 

भक्तगण बेहद भूखे थे

और भूखी थी उनकी इच्छाएँ

किसी मरणासन्न बच्चों से ज़्यादा


अपने हिस्से का दूध

जबरन चूस लेता है साँप

और सूखा देता है उस स्तन को

जबकि पचता उसे बिल्कुल नहीं


अपने हिस्से का दूध

मैं दे देता हूँ 'माँ' को 

क्योंकि माँ ने बताया है

दूध पर हक़ केवल

'माँ' और बच्चों का होता है


६.

" रूसवाई "

प्रेम तेरी रूसवाई पर

बोलों कैसा गीत लिखूं ?

तेरे मन का प्रीत लिखूं

या मैं जग की रीत लिखूं


लिखूं नयन के प्रथम छूअन को 

या लिखूं उर के प्रथम स्पंदन को !

लिखूं प्रेम पर किये दमन को 

या लिखूं प्रेम के सात वचन को !


लिखूं प्यासी पथराई आंखें

या लिखूं कैसे कटती है रातें

लिंखू मिलन की मधुर पीड़ा 

या लिखूं समाज की नैतिक क्रीड़ा


प्रेम तेरी रूसवाई पर

बोलों कैसा गीत लिखूं ?

©आर्यपुत्र दीपक



कवि कुमार मंगलम रणवीर की कोरोजीवी कविताएं :-

१.

महाभारत से पूर्व हार गए थे

जुआ मे पंचाली को पांडव...

उस पल पंचाली के मन मे

क्या नहीं उठते होंगे विचारों

के तांडव....!

आज न वह युग रहा न तब

की पंचाली....

पर आज मुझे लगता हैं

जुआ सा प्रेम!

जहाँ हर रोज हारती हैं

पंचाली पांडव को.....

दुःशासन की रोबदार आवाज

पर

दुर्योधन की चुटीले प्रहार पर

युयुत्सु के रसिक मिजाज पर

पता है सबको पांडव का प्रेम

बौना नहीं हुआ..

बस कुम्हलाया है समय और

पांडव के मदद के लिये आज

द्वारकाधीश खड़े नहीं हैं!

खो रहा है अपना वह आत्मविश्वास!

बस विधना हार की फांस गले

मे डालने वाली है...

पर आज पांडव कौरव से कम

अपनी आत्मा से लड़ रहे हैं इस

युग का महाभारत!

जहां लाल खून के छींटे कम दिख

रहे हैं

सुनाई दे रही हर ओर से आत्मा की चीखें।


२.

गंगा के ऊपर चारों बगल से

दिखाई दे रही है धुंआ-धुंआ 

नीचे उफ़न रहे आग के लपटों

के बीच हाथ-पांव मार रहा है 

एक आदमी!

दूसरा आदमी घाट किनारे बैठे

अपने प्रिय अजनबी के साथ...

रहा है देख उस पहले आदमी मे

खुद को!

तभी पेट के आतंक से लिपटा

चार साल का लड़का आया 

बेचता दीपक!

करने लगा मिन्नत एक दीपक लेने

की

रोशनी बेचना तो सुफल काज है

बेधड़क जेब से निकालकर उस

दूसरे आदमी ने रख दी दस की

नोट मुस्कुराते हुए ....

तभी उस प्रिय अजनबी ने मांगा

दीपक और उस जलाय दीपक

को दो चार पल रखा हथेली पर

अपने

वह भटका दूसरा आदमी उस

अजनबी को मान लिया थोड़े

समय के लिए देवता...

दिए रखा जिसने सहारा रोशनी

को

फिर थमा दिया दीपक दूसरे आदमी के हाथों मे और वह

आदमी अब देखने लगा उस

दीपक मे खुद को...

हां मन टूट चुका है!

अपने छूट चुके है फिर भी

मिलते रहते हैं अजनबी के

वेश मे...

हां वह दूसरा आदमी उस अजनबी से करता है आगाध

प्रेम!

भोगना चाहता है वह नरक

भी उसके साथ पर अजनबी

वह नरक तक उसके साथ

रहना करती है स्वीकार पर

स्वर्ग के तरफ मुड़ने पर जाती

हैं बदल ख्वाब!

जैसे अजनबी ने दीपक को दिया

आज सहारा ठीक वैसे ही उसने

सम्भाला था कल मुझे.....

दीपक को जलते रहने की प्रक्रिया

मे अजनबी का योगदान स्वागत-योग्य है!

वह अजनबी मानता है दूसरे आदमी के दिल मे जल रहे प्रेम

रूपी दीपक भी उसी ने जलाया

है!

दूसरा आदमी एक टक से देखें

जा रहा है गंगा के सतह पर जलते

उस दीपक को

सहसा उस अजनबी ने कहां देखो

तुम्हारा दीपक बीच मझधार मे है

तभी दूसरा आदमी चीखा- देखों

मेरा दीपक किनारे पर है....!

चौंक गया अजनबी उसके सकारात्मक सोच को 

देखकर फिर कहा-कब तक किनारे पर

जलता रहेगा....

जवाब मे दूसरे आदमी ने मुस्कुराते हुए बोला- प्रिय अजनबी!

इस संसार मे आने वाला हर जीव ही नश्वर है!

देख रहा हूं मैं इस गंगा सतह पर तैरते दीपक मे अपने जीवन की अंतर्यात्रा!

रुक जाऊंगा मै बुझ जाऊंगा दीपक की तरह.....

पर छोड़ जाऊंगा यहाँ एक प्रेमी

की इच्छाशक्ति जो कण-कण मे

बिखरकर फिर जोड़ता है खुद को

कि अगले पल वह अपने प्रिय से प्रेम कर सके!

३.


हे रामचन्द्र शुक्ल!

आपकी मूँछों का जिक्र कर

केदारनाथ सिंह चले गए...

हिंदी की पाठशाला के पहले

आचार्य!

आपने हिंदी की जड़ को 

बांधकर अपनी माटी से 

दिया हम हिंदी-भाषियों को सृजन करने के लिए मौका!

गढ़ी कविता की परिभाषा....

आज होते आप तो मैं पूछता

आपसे केवल एक प्रश्न!

क्या अहंवादी कभी अच्छे कवि हो सकते हैं....

नहीं-नहीं, ऐसा लगता है मुझे!

शब्दों और भावों से खेलने आना

कवि का नैसर्गिक गुण तो नहीं!

कह गए आप कविता मनुष्यत्व

की उच्च भूमि पर ले जाती है..

पर आज तो कविता खिखियाने

का अवसर दे जाती हैं....

आप से जाना कि सौंदर्य भीतर

की वस्तु है...

पर आज का श्रेष्ठ कवि भीतर

मैल रखकर बाहर से हवा-पानी

देने मे मशगूल है...

मेरे द्वारा लिखी दो पंक्ति उसे

शायद कविता नहीं लगेगी....

प्रेम की बात करने वाला अभी

तक ईर्ष्या से बाहर नहीं निकला

है!

पर मंच से चढ़कर पान की पिक

की तरह प्रेम थूकता है....

हमारे जैसे लोग कविता पर अत्याचार करना नहीं भूले हैं

पर मुझे महाकवि कहने वाला

मुझसे बड़ा अत्याचारी होगा..!

दर्शन-विज्ञान-इतिहास न हो

पर कविता का प्रसार रहेगा

ऐसा कह गए आप....!

हे हिंदी के अंतर्ध्वनि रामचन्द्र शुक्ल!

मैं महाकवि नहीं, कविता होना

चाहता हूँ।


४.

सड़क पर चलते कुत्ते की झुंड मे

एक कुत्ता के सिर पर गहरा चोट!

दूसरे के टांग के साथ किसी प्रबुद्ध

ने किया था ईख के फुनगी सा व्यवहार.....

सड़क पर खड़े कुत्ते को समझ

लिया जाता है यतीम-आवारा..

पर आधी रात मे है वह सड़क

से सटे मुहल्ले का रखवाला.....

उन लूटेरों से जो पेट भरने के 

बजाय लूटता है दुनिया को शौक

के लिए....

इंसान की दोगली जात का तो पता होगा जिसने महादेवी के गौरा गाय तक को नहीं बख्शा

था....

उत्तर आधुनिक दौर मे मानुस

चांद और मंगल पर जाने की

घर बसाने की बात करता है...

पर श्यामल धरती को उजाड़

देने का हक उसे किसने दिया...

कौआ-मैना-खुदबुदी को जैसे

किसी ने कर लिया अगवा और

लूटकर उसके वजूद को फेंक

दिया हो कहीं कूड़े पर या कहीं

कल-कल बहती गंगा मे......

तुम जो कर रहे हो इस सह्रदय जीवों के साथ 

उसकी हाय!तो तीनों लोक के किसी छोर पर

जाने के बाद भी तुम्हारी पीछा नहीं छोड़ेगी!

इतिहास दुहराता है! सम्भल जाओ!

ह्रदय से प्रायश्चित करो ढोंग नहीं

वरण किसी दुर्वासा के शाप से

हो जाओगे तुम अपनी जाति के

साथ यहां ही भस्म!


५.

मैं किसान बनकर

खड़ा हूं गांव की खेत मे

मेरे पास है कटे-फ़टे कपड़े

के साथ दो कठा पुश्तैनी जमीन

जिसपर आंखें  जमाय रखे हैं...

रसूखदार

वह ताख मे लगे रहते है

पड़ जाए हम बेमारी-हेमारी

के लपेटे मे

जीवन के आखिरी समय तक

नहीं खोना चाहता हूं जमीन को

जिससे मुझे हैं आगाध प्रेम!

देखा है कभी रमुआ को जो

जमीन रखकर लिया है रसूखदार

से चंद पैसा अपनी बिटिया की बिदाई के लिए......

हां एक बात और कहना है आपसे

लहलहाते पौधों की उपज के लिये आधुनिक खाद्य का होना आखिर

कितना आवश्यक है....

हरियाली के पीछे की जहर को

बस देख सकता है सह्रदय इंसान

हे पौधा! तुम्हें खाद के बजाय 

चाहिए श्रम-तप और प्रेम जिसमे

आग नहीं लगा सकता कोई ख़िलजी का वंश!

भूलो मत! किसान के पास विशाल ह्रदय के साथ होता हैं

आत्म स्वाभिमान को बचाने हेतु

धारेदार तेज हंसुआ-कैंची वगैरह

मेरे माटी मे फलेंगे-फूलेंगे पौधें

पर मुझे हर युग मे बचाना होगा

उन्हें म्लेच्छों से.....।


६.

बनारस से सटल गाउ भिखीपुर

जहवां मवेशियन के चरावत चचा..

चौंकचक अंदाज मे मुंह मे पान दबवले मोबाइल पर  विरहा सुनत रहलन

शुक्ला बउआ के बीएचयू से

डीयू भेजे के फिराक मे...

परीक्षा केंद्र तक पहुंचा के

सुस्तावें खातिर जगह ढूंढत रहली

तलाशे के बाद खेत के बीचोबीच

ट्यूब बेल मिल गईल

लगनी बइठ के नजारा निहारे

कबहु कजरी कबहु फाग गावे

देख के अगले-बगले हरियाली

मन सुनरकी के याद मे हेरा गइल

बीतल मुलाकात के दिन अंगुली

पर गिना गइल....

हवा सुरसुरायल मोर के पाख

हाथ लगल...

रहबू दूर कतनो तहर निशानी

साथ रहल...

भईल दुइ डिग्री जीवन कबे ले

साथ रही

पीएचडी कइला पर दुइ पल मे का रोजी-रोजगार मिली

माइ बाबू के जेई रहल अवकात निभ गइल...

दिखावे मे जमाना अबे सचमूच

बिक गइल...

मजे के बीतअ ता कह के आधे जिनगी बीत गइल।

७.

कमजोर नहीं मैं न अभी पस्त हुआ

क्रूर काल न तुझसे अभी अस्त हुआ

विधना तू भी पूर जोर लगा ले

रास्ते मे चहुंओर कांटे बिछा दे

हँस मत अपने बंजर ह्रदय पर

नाना रूप के पौधें उगाऊंगा...

लगेंगे सावन के झूले यहीं!

मेले-ठेले बीच त्योहार मनाऊंगा

याचक बन मैं तुझसे कुछ न मांगूंगा....

अंजनी-पुत्र बन मैं समुद्र लांघुंगा

पता है मंजिल बीच कालनेमि आएगा

अपनी माया से भ्रम फैलायगा

सुनो! सुनो! मुष्टि प्रहार से भ्रम

तोड़ेंगे

अवनि पर छाया तमस छंटेगा

घबराना क्या...

सूरज यहाँ भी एक रोज निकलेगा।

©कुमार मंगलम रणवीर




कवि कार्तिकेय शुक्ल की कोरोजीवी कविताएं :-
१.
तुम्हारे और उसके बीच...

तुम्हारे और उसके बीच
मझधार बीच नाव जैसे
फँसा हूँ मैं,

मैं अपने से ज्यादा
तुम्हारे ख़ुशियों को लेकर
संज़ीदा रहता था,

तुम भी जानते हो
मैं बदनसीबों के दुनिया से 
ताल्लुकात रखता हूँ,

मेरे ऊपर किसी का 
दबाव तो नहीं
लेकिन जान लो इतना
मैं अय्याश भी नहीं,

मैं छोड़ दूँगा उसको
बस तुम हाँ करो
नहीं तो तुम्हें
तुम्हारी ज़िन्दगी मुबारक़ हो!

तुम मेरे नहीं बन सके
तो फिर किसी और का
क्या बनोगे
ख़ैर तुम जहाँ भी रहो
ख़ुश रहो
यही दुआ है हमारी,

और हाँ कभी भी
मेरी जरूरत पड़े तो
बेझिझक याद करना
हमेशा के तरह 
तुम्हारे साथ होऊँगा।

२.
वे लोग
जो हर रोज़ 
निकल पड़ते हैं
हाथों में ले मोमबत्तियां
किसी पीड़िता के 
न्याय के वास्ते

वे लोग
वाक़ई में होते हैं
बहुत ही निराले
और सदाबहार

वे लोग
जो ख़ुद को कर नज़रंदाज़
बुलन्द करते हैं आवाज़
अपने लिए नहीं
औरों के लिए

वे लोग 
एक होते हुए भी
होते हैं बहुत
उनमें होती है 
दूसरों के लिए दर्द

वे लोग
जो होते हैं खड़े
किसी मज़लूम के
बन सहारे

वे लोग
हाड़ और माँस के नहीं
बल्कि बने होते हैं
ईंट और पत्थर के
उनमें होती है
एक गहरी जिजीविषा

वे लोग
जो कभी डर कर
 पीछे नहीं हटते
सच कहने से 
कभी मुँह नहीं मोड़ते

वे लोग
इंसानी रूप में
होते हैं फ़रिश्ता
जो मौजूद रहता है
हर पल उनके लिए
जिनके नहीं होते कोई और

३.
वे लड़कियाँ...

वे लड़कियाँ
जो करती हैं प्रेम
अक्सर करार दे दी जाती हैं बेशर्म

वे नज़रें 
उनमें निकालने लगती हैं खोट
जो नज़रों से ही 
कभी-कभार करती हैं बलात्कार

वे लड़कियाँ 
जो अपने जैसे एक लड़के में 
महसूस करती हैं अपनापन
उन्हें मंजूरी देना तो दूर
उन्हें उसके लिए दिया जाता है 
गुनहगार का तमगा

वे क़िताबें
जिनमें लिखी होती हैं
दुनिया बदलने की तमाम सारी बातें
वे भी इसे समझने लगती हैं पाप
और मुक़र्रर की जाती है सज़ा
कि फिर कोई ऐसा न करे
जघन्य अपराध

वे लड़कियाँ
जो लीक से हटकर
रखती हैं अपना विचार
उन्हें बदचलन कहने में 
नहीं की जाती है देर

वे बन्धन
जो मकड़ी के जाल से भी
ज्यादा हैं जकड़े
उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता कि
लड़कियाँ भी हैं
उसी समाज की एक हिस्सा
जिन्हें उसके कारण
रोज़ सहना पड़ता है दंश

वे लड़कियाँ
जो पाना चाहती हैं अपना अस्तित्व
उन्हें इसके लिए चुकानी पड़ती है
बहुत बड़ी क़ीमत
दूसरों के शरीर की भूख
और अपनी इज्ज़त

वे लोग
जो करते हैं मंचों से
अच्छे-अच्छे बात
वही भेड़िये
करते हैं उन मासूमों पर घात
कुचल देते हैं इनके पैर
और कतर देते हैं पर
जिससे ये कभी भी 
उठा न सकें अपनी अवाज़

४.
उनके लिए इंक़लाब...

सरेआम जो करते हैं क़त्लेआम
बहाते हैं दूसरों का ख़ून
वही लोग सर पे
काली पट्टी बांधकर
लगाते हैं इंक़लाबी नारा

उनके लिए इंक़लाब
एक ऐसा स्वप्न है
जिसे वे दुनिया के सभी लोगों में
साकार होते देखना चाहते हैं

वे चाहते हैं 
कि सारी की सारी दुनिया
लाल रंग में रंग जाए
हमारे विचारों का बहाव
सभी को एक ही दिशा में
यों समेटते चला जाए
जैसे तूफ़ान में कोई नाव

कोई ऐसा न हो
जो हमसे अलग स्वप्न देखे 
हमसे इतर सोच रखे
यहाँ तक कि हमारे अनुसार ही
ज़िन्दा रहने की जद्दोज़हद करे

ये दुनिया ही नहीं
वरन् समूचा ब्रह्मांड 
हमारे इशारों पर नाचे 
और गाए वही गीत 
जो हम अक्सर गाते हैं
बाज़ारों में

५.
इक कविता-सी आई तुम...

जब-जब मैं तन्हा हुआ,
आँखों में अंगड़ाई लेकर
मन्द-मन्द-सी मुस्कान को
चेहरे पर तरूणाई लेकर
कोयल-सी गाती हुई
मेरे सम्मुख आई तुम
होठों पर रागिनी लेकर
इक कविता-सी आई तुम।

ये धरती-ये आकाश क्या
पाप और पश्चाताप क्या
सारी सृष्टि का सृजन बन
अमृत-रस बरसाई तुम
जीवन को आलोकित करने
इक कविता-सी आई तुम।

पुष्प नहीं मकरंद सरीखे
सप्त-सागर के तरंग सरीखे
भावों का हिलोड़ लेकर
रजत नभ और व्योम सरीखे
पंक्षियों का कलरव लेकर
यों उछलती आई तुम
करने मुझे तृप्त जगत में
इक कविता-सी आई तुम।

जज्बातों का जवाब बन
नव युग का प्रभात बन
घने तिमिर को चीरते हुए
अरुण देव-सी आई तुम
प्रथम बेला की प्रथम रश्मि
घनी घन बन छाई तुम
इक कविता-सी आई तुम।

मेरे पथ की पथ प्रदर्शक
समग्र जीवन की तुम दर्शक
दुःखों के अन्तरतम-सी
पाँवों के घावों की मरहम
आघातों पर अश्रुपात करने
दूर गगन से आई तुम
ओ!मेरी सोनपरी
इक कविता-सी आई तुम।

६.
गाड़ी के दो पहिये...

जो भी पूछना चाहते हैं
पूछ सकते हैं आप
बशर्ते ख़्याल रहे इतना
कि मर्यादा न टूटे
और न ही वे अस्मिताएँ
जिन्हें धरोहर सरीखे
सहेजे हुए हैं हम अभी तक

आप मेरे मुरीद हैं कि नहीं
ये तो मैं नहीं जानता
लेकिन मेरा मन
कुछ ऐसा ही गवाही दे रहा है
कि शायद आप अज़नबी
होकर भी कोई अपने हैं
जो फिर एक बार 
मिलने और हालात जानने
को बेचैन है

वैसे सच जो भी हो
किंतु इस बात में कोई गुरेज़ नहीं
कि आप और हम 
एक ऐसे दुनिया में जी रहे हैं
जहाँ कल्पनाओं का संसार
इतना वृहद और व्यापक है
कि हम चाहकर भी
उनसे बच पाने में हैं असमर्थ

ख़ैर जो भी हो
मुझे आप और आपका लहज़ा
बेहद पसंद है
भले ही हम दोनों में 
कुछ मूलभूत अंतर ही क्यों न हो
लेकिन आप जितने अच्छे बाहर से हैं
शायद उतने ही अच्छे अंदर से भी
जिसकी पहचान क़रीब से क्या
बहुत दूर से भी 
अनायास हो ही जाती है

यों कहने लगें तो
समय कम पड़ जाए
लेकिन मेरे दोस्त 
इतना जरूर यक़ीन करो
कि हम एक-दूसरे के जरूरत नहीं
बल्कि एक-दूसरे के सहारे हैं
गाड़ी के दो पहिये
जिन्हें एक साथ ही चलना
और रुकना है

७.
सच से मुँह छिपाने के तलाश में...

अस्मिताएँ खो रही हैं
ख़ुद को रोज़-रोज़
ये दुनिया है कि मकड़जाल
किसको है परवाह
लेकिन ख़ैर दुःख है इस बात का
कि तिलस्मी होती जा रही 
इस जाल में फँस रहे हैं
लोग ऐसे जैसे फँसती हैं मछलियाँ 

कृत्रिम चकाचौंध में
नष्ट होती सन्ततियाँ
अपने कल को दे तिलांजलि
नष्ट कर रही हैं पीढ़ियाँ
कि वे गौरव न होकर
थीं कोई अभिशाप
जिससे निज़ात पाने की ललक
प्रलय की विकट छाया बन
दिन दूनी रात चौगुनी तेजी से
आ रही हो और करीब

सारी की सारी आकांक्षाएँ
धरी की धरी ही रह गईं
लोग एक दूसरे को
आदिम युग का समझ
नोच खाने को हो रहे हैं तैयार
मन की विकटता पर
बुद्धि का ज्यों हो प्रहार

और क्या इससे भी बुरा
कुछ और होगा
जब नश्वरता के नज़दीक
होकर भी विमुख होकर जी रहे
और सामने से आ रही
विपत्तियों से मुँह मोड़
गा रहे हैं गीत गगन के
कि हमारा क्या
हम कल भी थे
आज भी हैं
और रहेंगे कल भी

लेकिन अफ़सोस कि
सच से मुँह छिपाने के तलाश में
घोंट रहे हैं ख़ुद की गला
और दोष देते हैं किसी और को
जो कतई नहीं गुनेहगार
लेकिन इनका क्या
ये तो ऐसे ही करते 
आ रहे हैं अरसे से
अपने सर का भार
औरों पर थोपते हैं अक्सर
जैसे वासुदेव ने महाभारत का समर

और आज भी ये सिलसिला
चल रहा है बराबर
इतना होने के बाद भी
नासमझी है इस क़दर
कि मौत के मुँह में 
सिर दे सो रहे हैं 
ओढ़ के चादर।

©कार्तिकेय शुक्ल


सर्वेश सिंह राजन की कोरोजीवी कविता :-

१.
अट्टालिकाओं के महँगे गमलों में 
खिलते हैं,

राजनेताओं के जैकेट
की शोभा बढ़ाने 
वाले पुष्प ,

मगर नही खिल सकते 
प्रेम के प्रतीक,

कभी देखा है
सुंदरता का खेतों 
में उतरना
अनाज, सब्जियों के साथ
फूलों के रूप में

कभी आओ खेतों में
महसूस करो
किसानों के श्रम को,
कुदाल की कोड़ाई को,
फावड़े से डालने 
पड़ते है मेंड़
पशुओं से बचाने
को करनी पड़ती है घेराबन्दी,
लगाने पड़ते हैं बिजूके,
तब निकलते हैं कहीं सब्जियों से
पूर्व उनके आकर्षक एवं मोहक पुष्प,

 एक काँटेदार पुष्प
कैसे बन सकता है 
प्रेम का उपमान?

आख़िर

कहाँ वह रईस गुलाब
और कहाँ यह भिंडी का फूल।

© सर्वेश सिंह राजन


कवि जागेश्वर सिंह की कोरोजीवी कविताएं :-
१.
जब चुपके से तुझे देखने
पारो छत पर आ जाती है
जब छुटकी सीढ़ी चढ़ता देख
यूँ ही मशखरे उड़ाती है

जब पड़ोसन धुंधलके में 
टहलने निकल जाती है
जब शाम को बड़की भौजी 
मुन्ने को दुलराती हैं

वहां उसके गांव में भी
 तो तू दिखा होगा
कहो कि क्या वो अब भी
 वैसे ही मुस्कुराती है

२.
एक हमसफ़र हो आइने कि तरह

उसे देखूं और 
खुद को संवार लूं
 एक हमसफ़र हो 
आइने की तरह

कल कहूं और 
आज तक याद रह जाए
एक बात हो
शायरी की तरह

कहीं जाऊं और
उसका ही जिक्र करूं
हर एक शहर हो 
बनारस की तरह

ढलती शाम के 
फलसफे लिखूं हर रोज
एक जिंदगी हो 
डायरी की तरह

जिससे मिलूं और 
घुल सा जाऊं
एक रवानी हो
पानी की तरह

लहरों से बाते करूं 
किनारे पे बैठकर 
हर जगह हो 
गंगा घाट की तरह

इधर सोचूं और 
वो जान ले
एक खबरी हो
मन की तरह

३.
मैं .

मैं चला कहाँ था,मुझे तो चलाया गया था |
मैं ठहरा कहाँ था,मुझे ठहराया गया था |
मैं बिखरा नहीं था,मुझे बिखेरा गया था |
मैं टुटा नहीं था,मुझे तोड़ा गया था |
मैं पढ़ा कहाँ था,मुझे तो पढ़ाया गया था | 
मैं उतरा कहाँ था,मुझे तो उतारा गया था |
मैंने देखा नहीं था,मुझे दिखाया गया था |
मैंने सोचा नहीं था,मुझमे सोच थोपा गया था |

और शायद, 
चलूँगा अब खुद से,
ठहरूंगा मैं अब खुद से, 
बिखर जाऊंगा आसमाँ पर,
        खनकुंगा बेटियों के पायल की तरह 
             टूट जाऊँगा टुकड़ो में,
               आईने की तरह 
                     और लुंगा शिक्षा ज्ञान का |
उतरूंगा प्रेम के मैदान में ,
       जंग की तरह
            अब दिखाई दूंगा कईयों को,
                 जुगनू की तरह
सोचुंगा ख्यालों में उतरकर, 
       भरे समंदर की जलधाराओं की तरह

बशर्ते,
मेरी इस जहाँ तक पहूँचाने का आभार तुम्हारा है |
मैंने तमन्ना की थी, उसमें चाह तुम्हारा है |


४.
उसे जानते हुए

उसे समझते हुए मैंने जाना 
कि उसे समझना
खुद को खुद के प्रति
नासमझ बनाना तो नहीं है

उसका हैसियत जानते हुए
मैंने जाना
कि यह जानना 
खुद ही खुद की हैसियत 
जान लेने जैसा तो नहीं है

उसकी आई. डी. चलाते हुए
मैंने जाना
की उसकी
खुद की स्वाधीनता को
खत्म करने जैसा तो
नहीं है

उसे खत लिखते हुए मैंने जाना
की उसे लिखना
खुद ही खुद के प्रति
लिख देना तो नहीं है

उससे भागते हुए मैंने जाना
कि उससे भागना
खुद ही खुद से 
 पलायन करना तो नहीं है

उससे इजहार करते हुए 
मैंने जाना
कि उसे बताना 
खुद ही खुद को
इश्तेहार देना तो नहीं है

उससे विदा लेते हुए
मैंने जाना
  कि विदा होना
खुद ही खुद से अलग 
होना तो नहीं है।


५.
भाग एक.

युद्ध तब और अब -

होना ही था युद्ध को 
युद्ध ही था प्रारब्ध
द्रौपदी तो केवल उसकी ढाल बनी
सर्वथा ही बनता आया है
कोई ना कोई आधार
चाहे कि वो सीता
या कि चन्द्रगुप्त की मां नुरा
या हो भारत माता

फर्क बस इतना ही है
इस बार
इनकी तादाद ज्यादा है

नीचों के कुकर्म अगाध
और दृश्य
पहले से भी ज्यादा शर्मसार

सारा खेल नियति का है
समय तो केवल दर्शक है
कभी वह हाहाकार करता है
कभी खुश होता है
की निकल पड़ते हैं आंसू
 
कभी इतना दुःखी होता है कि 
नहीं बचे रह जाते
 निकलने को आंख से आंसू

वह पत्ते सा हिलता है
और पंखे कि तरह चलता भी है
उसने सैकड़ों गम झेले हैं
ना जाने कितनों कि चीखें सुने
ना जाने कितनों को देखा है 
अपना दुःख छुपाते

वह चुप सा हो जाता है कभी - कभी
जैसे युद्ध से पहले छा जाती है
शूरवीरों के शिविरों में चुप्पी

जैसे रात को कीट- पतंगे गाती हैं
निरवता के गान

समय का यह मौन उसकी विशेषता है
वह जब कुछ नहीं कर सकता तो
चुप हो जाता है
और नियति को केवल देखता रहता है
हजार - हजार आंखो से
जैसे देखता हो रात को कोई
अपनी छत के मुंडेर से
शहर की चुप्पी

एक एक जगह को देख लिया जाता है
पर ना जाने क्यों?
उसे क्यूं पसंद है भला
मौन होकर 
युद्ध के बाद के चीखों को
अभी महसूस लेना...

भाग 2.
युद्ध तब और अब

सच है जब घटित होना होता है कुछ
हिमगिरि, विंध्य पर्वत की आवाज बन जाती हैं बादलें

कहीं ये छ: महीने बंदी के
घरों की छतों पर,
पहाड़ की चोटियों पर
बादलों का अचानक उमड़ जाना
छट जाना
किसी अपशगुन का संदेश तो नहीं दे रहा है

भला की क्यों मौसम वैज्ञानियों ने
चेता दिया था,देश में भारी बारिश की संभावना
क्यों राज्य सरकारों ने स्कूलों ,संस्थानों को
उचित व्यवस्था पहले से बनाए रखने का
आदेश दे रखी थी

क्यों इस बरस गर्मी गर्मी सी नहीं रही
बरसात - बरसात सी नहीं थी
सावन - सावन सा नहीं था

अभी तक शहर में 
कम्बल बांटने कि खबर 
अख़बार में क्यों नहीं है

कौन जिम्मेवार है इसका
और किसे ठहराएगा इतिहास
इस युद्ध में दोषी
इस युग का धृतराष्ट्र
कहां से देख रहा है,युद्ध 
संजय की दिव्य दृष्टि से
कौन इस युद्ध का लीलाधारी है
क्या परिणति है युद्ध की

बाद इसके किसे होना है
सातासीन
जो युद्ध में धर्म के पक्षधरों
का राजा है

पर जवाब कौन ही देगा
अभी मौन है समय
और क्रियाशील है नियति
अभी महावीरों
और उनके योद्धाओं 
सैनिकों को लीन होना है अभी
 उनके कर्मानुसार

अभी की अभी - अभी गुजरा है नजदीक से
युद्ध का 270 वां दिन
अभी रचे जा रहे है षड्यंत्र
अपनों  के है खिलाफ
 और इस बार युद्ध
शायद,
      सच  छुपाने वालों का
सच कह देने वालो से है

६.
मै हर रोज तुमसे 
     करना चाहता हूं इजहार

कि इस मायावी दुनिया में 
       बन जाना चाहता हूं, 
             उत्कृष्ट श्रेणी का प्रेमी

प्रेम में चाहता हूं हर रोज करना , तुम्हारा दीदार

रोज चाहता हूं तुमसे करू खीर से भी मीठी
  और अमेरिका से भारत की दूरी से भी लंबी बातें 

जिंदगी के  रहस्य भरी सफर में 
 शाम की तरह उदास हो जाने पर  ..
चाहता हूं, रोज तुम्हारे साथ 
    आसमान को ताकते हुए, 
        अस्सी घाट की सीढ़ी पर 
              चढ़ आए पानी में 
                    आधा पैर रखकर बैठूं

जब कभी लाकडाउन लगे फिर धरती  पर 
मै चाहता हूं
अपनी खिड़की पर बैठकर
हर रोज करूं तुम्हारा इंतज़ार

 हाय! कि तुम रूठी हो
पर तुम्हें मनाने के लिए
मैं चांद तारे नहीं तोड़ सकता
तुम्हारे लिए सूरज को
           पूरब से नहीं उगा सकता
तुम्हारे लिए नहीं ला सकता मैं
स्वर्ग से अमूल्य वस्तु ...

फिर भी कहो तो तुम्हारे लिए
ये फेसबुक ,वॉट्सएप वगैरह चलाना छोड़ दूं

कहो तो पहाड़ कि सबसे ऊंची चोटी का पेड़ उखाड़ कर ला दुं

तुम कहो तो लाइट का सारा ताप सह लूं
कहो तो दीपक कि सारी रोशनी समेट लूं

तुम चाहो तो तुम्हारे लिए
मांझी कि तरह सारा पहाड़ तोड़ डालूं

कि अबकि मै चाहता हूं 
हर रोज तुमसे थोड़ा सा झगड लूं
फिर तुम्हे फिर से मना लूं

चाहने को तो ये भी चाहता हूं 
कि मै तुम्हे रोज बताऊं
कि तुम्हारा हंसता हुआ चेहरा
मेरी उदास क्षणों में
संबल देने का एकमात्र विकल्प है


७.

रेप और इतिहास

बहुत दिन तक ढूंढा मैंने इतिहास में 

क्या सुभाष बोस को नहीं जानकारी थी 
रेप जैसी समस्या के बारे में

क्या विवेकानन्द को नहीं ज्ञात था
इज्जत उतरती है सरे बाजार में
क्या गांधी नहीं जानते थे
कि मार डाली जाती है लड़कियां रेप के बाद

क्या नहीं मालूम था भीमराव को
नही बख्सी जाती है रात में अकेले पाई गई  लड़कियां

क्या नहीं मालूम था कलाम को
कुछ दिन ही जलाई जाती है इंडिया गेट पे मोमबत्तियां 

मै समझना चाहता हूं ...

क्या नहीं दिखा था तथागत को 
कई दिन तक बेटी के घर नहीं लौटने पर आंखो से नदी की तरह गिरते आसुवों वाला मंजर

क्या नहीं समझा था कृष्ण ने 
धर्म के नाम पर लूट जाएंगी बच्चियां

क्या नहीं पता था राम को
लांघ जाएंगे दरिंदे मर्यादा की बेड़ियां

क्या नहीं होता था मनु के काल मे किसी का घृणित विचार

मै खोज में हूं कब से....

मै खोजना चाहता हूं
चीखे सुन सुनकर झल्ला कर बोल उठे
दीवारों के कान
 
मै समझ लेना चाहता हूं
चन्द्रगुप्त के मगध में
किसी को मजबूर करके शिकार बनाने पे  चाणक्य का दण्ड विधान

मै की मै ढूंढ़ लेना चाहता हूं
आर्यागाथा में किसी पर हाथ फेर देने पर मत्यू देने का साक्ष्य

मै महसूस करना चाहता हूं...

आदिमानवों ने किसी की कुदृष्टि डालने के दण्ड के लिए बनाया था क्या कोई हथियार

अपने अतीत से पूछे सारे सवालों को वर्तमान की परिधि में बांधकर
मैं  पूछना चाहता हूं खुद से
क्यूं नहीं जाने देना चाहता अकेले 
अपनी बहनों को पढ़ने शहर
©जागेश्वर सिंह ' जख्मी '



कवि शिवम कुमार की कोरोजीवी कविताएं :-
१.
"कोरोना को भगाना हैं"
एक कोरोना ने समझाया
कोरोना से डरना नहीं
आत्म विश्वास हरना नहीं
एकजुट होकर है इसे भगाना
लाॅकडाउन को हैं अपनाना
सामाजिक दूरी हैं बढ़ाना
भीड़-भाड़ में नहीं हैं जाना
घर में ही अब हमें हैं रहना
बिना वजह नहीं हैं घूमना
दो गज की दुरी हैं अपनाना
बचने का यह है सहज ज्ञान
जब अपना फर्ज़ निभाएंगे
यह वैश्विक विपत्ति देख कर
इस शत्रु से कभी डरो ना
घबराना हैं कभी नहीं पर
सजग हमेशा ही रहना है
सच कहता हूँ भारत से
यह कोरोना हार जाएगा
इस विपदा में कष्ट मिला तो
उसको भी मिलकर है सहना
इस महामारी दुःख की घड़ी में 
एक साथ सब सेवा धर्म निभाएंगे
जिनका नहीं कोई हैं सहारा
उनका हम आधार बन जाएंगे
  कोरोना को दूर हैं भगाना
इस महामारी वायरस को भगाने में
हम सभी को हैं पूर्ण सहयोग करना
हम होगें कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास - पूरा है विश्वास
कोरोना को हराने में हम होगें कामयाब ।।

२.
"कोरोना को हराना हैं" 
कोरोना से डरना नहीं
आत्म विश्वास हरना नहीं
एकजुट होकर है इसे भगाना
लाॅकडाउन को हैं अपनाना
घर में ही अब हमें रहना है
बिना वजह नहीं घूमना है
सामाजिक दूरि को अपनाना है
कोरोना वायरस को भगाना है
हम सभी पूर्ण सहयोग करें
हमेशा माक्स एवं सेनेटाइजर
हम सभी हमेशा उपयोग करें
कोरोना वारियर्स का सम्मान करें
इनकी दिन-रात मेहनत से
कोरोना से हम सुरक्षित है
ऐसे सभी लोगों को नमन
यह हमें नहीं हैं भूलना
किसी से हाथ नहीं हैं मिलाना
नमस्कार से स्वागत है करना
हमारी भारतीय संस्कृति को
पूरा विश्व अपना रहा हैं
इस वैश्विक विपत्ति देख कर
घबराना हैं कभी नहीं पर
कोरोना के वैक्सीन का भी
  सब उपाय ढूँढ रहा हैं
संक्रमण की चेन को तोड़ना हैं
अपनी आदतों को अब मोड़ना हैं
हाथों को 20 सेंकड साफ करना हैं
मुँह पर मास्क जरूर लगाना हैं
जीवन है तो फिर से सब संभव है
जीवन है तो नित नए अनुभव हैं
घर में परिवार का साथ निभाना हैं
एकजुट होकर कोरोना को भगाना हैं
बुलंद हौसलों के साथ इससे लड़ना हैं।।

३.
"सरदार वल्लभ भाई पटेल"
'' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' '' ''
सरदार वल्लभ भाई पटेल की कहानी
सुना  रहा  हूँ  मैं  अपनी  जुबान
थे वह भारत के स्वतंत्रता सेनानी
देश को एकता करने को थानी
  देख  कर  दुश्मन  सब  कापे
शेर  की  तरह  था  हुंकार
अंग्रेजों के सपनों को तोड़ डालें
ऐसे थे हमारे सरदार वल्लभ भाई पटेल
सरदार वल्लभ भाई पटेल की छवि थी ऐसी
ना देखा, ना सोचा, ना सुना था कभी
एकता का इतिहास जो इन्होंने रचा
देश के मानचित्र पल भर में बदला
हम  किसानों  का  सरदार  थे  वो
अंग्रेजों  के  लिए  लोहा  थे  वो
हवा  के  तरह  बहते  थे  वो
शेरों  के  तरह  दहाड़ते  थे  वो
ऐसे थे हमारे सरदार वल्लभ भाई पटेल
इतिहास के पन्ने खोजते हैं, जिसे
ऐसे सरदार अब ना मिलते पूरे विश्व में,
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते थे वो
सरदार पटेल के अहिंसा के परिभाषा
हमें सफल जीवन का पथ दिखाता
मनुष्यों के जीवन को दिशा दिखाता
ऐसे थे हमारे सरदार वल्लभ भाई पटेल
कहें  जाते  थे  लौह  पुरुष  उनको
  एकता  ही  देश  का  बल  हैं,
एकता  में  ही  सुनहरा  पल  हैं,
  जब  तक  रहेगा  यह  गाठ
होता  रहेगा  देश  का  विकास
             जय हिंद - जय भारत - जय पटेल ।।
© शिवम कुमार
                भभुआ (कैमूर), बिहार





संपादक परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष ,पञ्चम सत्र का छात्र {हिंदी ऑनर्स}

सम्पर्क सूत्र :-

ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत। 221009

ह्वाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

नोट :-

दृष्टिबाधित(दिव्यांग) विद्यार्थी साथियों के लिए यूट्यूब चैनल लिंक : -

https://www.youtube.com/c/GolendraGyan

और फेसबुक पेज़ :-

https://www.facebook.com/golendrapatelkavi

🙏

इससे जुड़ें और अपने साथियों को जोड़ने की कृपा करें।

आत्मिक धन्यवाद!


🙏👉शेष कवियों को अगले दिन इस संकलन में समलित कर दिया जायेगा। आप सभी सादर स्वागत है। आप भी अपनी कविताएं हमारे ह्वाट्सएप नं. या ईमेल पर भेज सकते हैं इस काव्य संकलन के लिए।

इस पेज़ से जुड़े अहिंदी भाषी साथियों किसी भी कविता का अंग्रेजी या अपनी मातृभाषा में अनुवाद करने से पहले "कविता के मूल कवि" से अनुमति लेने के लिए उक्त संपर्क सूत्र संपर्क कर सकते हैं।

Sunday, 1 November 2020

कोरोजीवी कविताओं की प्रवृतियाँ : संजीव कुमार तिवारी {कवि व आलोचक}

 


कवि व आलोचक संजीव कुमार तिवारी :-

कोरोजीवी कविताओं की प्रवृतियाँ

*******************************

एक खास दौर की प्रवृतियाँ समय के साथ कम होने लगती है तो कुछ नयी प्रवृतियों का जन्म होने लगता है।डॉ.नामवर सिंह ने इसे ही एक को क्षीयमाण तो दूसरे को वर्धमान कहा था।यह प्रक्रिया निरतर चलती रहती है और एक समय ऐसा आता है जब पहले की केंद्रीय प्रवृति नेपथ्य में चली जाती है तो नेपथ्य की प्रवृति केंद्र में आकर उस युग की मूल प्रवृति बन जाती है।यही वह ऐतिहासिक समय होता है जब उस प्रवृति के नाम से उस युग को जाने जाना लगता है और इसतरह उसका नया नामकरण हो जाता है।लॉन्ग नाइन्टीन के बाद समकालीन कविता में एक ठहराव आने लगता है। एकतरफ समकालीन कविता की मुख्य धारा में कथ्यों की दुहराव की बाढ़ आ जाती है, शिल्प के स्तर पर भी नए प्रयोग बंद हो जाते है तो दुसरी तरफ अन्य समानांतर धाराएँ जैसे दलित साहित्य,नारी साहित्य या अन्य वंचित साहित्य भी एक बन्द झील में गिरकर रुद्ध हो जाती है।दलित साहित्य मकड़ी की तरह अपने बनाये फार्मेट में ही उलझकर असामयिक मौत को प्राप्त हो जाती है तो नारी साहित्य अत्यधिक नारेबाजी के चंगुल में आकर दशक के अंत तक अपनी जीवन्तता खो देती है।कुल मिलाकर यह दौर साठोत्तरी कविता के चुकने का समय है।

          अब प्रश्न उठता है कि क्या ये सारे परिवर्तन अचानक हो गए या इनकी पटकथा तत्कालीन परिस्थितियों द्वारा लिखी जा रही थी। यूपीए सरकार द्वारा लाया गया दूसरा आर्थिक सुधार जिसमे और खुलापन था पूरा विश्व आर्थिक रूप से इतने एक दूसरे से जुड़ गए कि सरकारों का बनना बिगड़ना खुले रूप में कारपोरेटो द्वारा तय होने लगा।गठबंधन की सरकारों में क्षेत्रीय पार्टियां इतनी महत्वपूर्ण होने लगी की उनके छोटे छोटे निजी हितों के कारण नीतिगत निर्णयों में भी हेर फेर होने लगा। भ्रष्टाचार की नदी में पूरी व्यवस्था आपादमस्तक लिप्त हो गई।इसी बीच आरटीआई जैसे कुछ ऐसे कानून भी आये जिससे कुछ ऐसी बातों की भी जानकारी जनता को होने लगी जिसे वे पहले नही जान पाते थे।आरटीआई एक्टिविस्ट लोगों में अपनी पैठ बनाने लगे। जल्द ही केंद्रीय सरकार का एक ऐसा चरित्र सामने आया कि जनता तत्कालीन सरकार से घृणा करने लगी।

          अन्ना आंदोलन ने देशव्यापी एक ऐसा माहौल बनाया जिसमे शिरकत न करनेवाले लोग उसी तरह अपने को अभागे समझने लगे जैसे फ्रांसीसी क्रांति के समय उसमे न शामिल होनेवाले बुद्धिजीवी अपने को समझते थे।पूरा भारत परिवर्तन के लिए व्यग्र हो गया पर इन आंदोलनकारियों के पास न तो इस तरह का सामर्थ्य था और न ही संसाधन।परिणाम यह हुआ कि जिस किसी व्यवस्था ने इस अंधेरे के खिलाफ विकल्प देने का वादा किया जनता उसके साथ हो गई।2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और जनता अपनी हसरतो के लिए एक बार फिर अपनी ही चुनी गई सरकार के द्वारा छली गई।जनता अमन चाहती थी,विकास चाहती थी,जीरो टॉलरेंस भ्र्ष्टाचार चाहती थी पर बदले में एक ऐसी बहुरूपिया सरकार मिली जो दावे तो बड़ी बड़ी करती थी पर उसका इरादा कुछ बेहतर करने के बजाय अपने सरकार को दीर्घजीवी बनाये रखने में ज्यादा थी। फिर एक के बाद एक कौतूहल सृजित करने वाले कार्य मसलन तीन तलाक खत्म करना,धारा 370 को विलोपित करना किया गया।संवैधानिक संस्थाओं को धीरे धीरे कमजोर करने का कार्य किया गया।जब देश अर्थव्यवस्था की विकट परिस्थितियों से गुजरता था तो रिजर्व बैंक अपनी पूरी क्षमता के साथ सामने आकर उसका निदान निकालता,,वह एक ऐसी संस्था थी जो सरकार के आगे आगे चल कर देश के आर्थिक हितों को ध्यान रखता था पर उसे सरकार के पीछे पीछे चलने वाला एक पिछलग्गू निकाय बना दिया गया।


  स्थितियाँ विकट थी।सामान्य जन अभी किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे पर बुद्धिजीवियों में आगत संकट को अनुभव कर अपना विरोध प्रकट करना शुरू कर दिया।जबाब में हमेशा की तरह सरकार ने अपना लोकहित के पीछे छिपी अपने दमनकारी चरित्र को हथियार बनाया।

तभी अचानक देश एक ऐसे विश्वव्यापी संकट कोरोना के चपेट में आ जाता है जिसके लिए सीधे तौर पर बहुसंख्यक जनता नही बल्कि कुछ खास तबका ही जिम्मेदार था।संकट भी ऐसी कि पहले कभी नही देखी गई।अचानक पुर्र देश की गति थम जाती है।जो जहाँ है वही उसको रुक जाना पड़ता है।एक अदृश्य दुश्मन जिसे न तो देखा जा सकता है और न ही छुआ जा सकता है मानवजाति के हरेक कर्म को छिन्न भिन्न कर देता है।जीवन का हर पक्ष बुरी तरह प्रभावित होता है,क्या सामाजिक,क्या आर्थिक क्या मनोवैज्ञानिक सभी इसके चपेट में आ जाते है। चूँकि सबसे ज्यादा उम्मीदे सरकारों से थी इसलिए सबसे पहले मोहभंग भी इसी से होता है। कोरोना काल की रचनाओं की सबसे महत्वपूर्ण प्रवृति स्थापित सरकारों के प्रति आमजनों का मोहभंग के रूप में सामने आता है।चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें हो पहली प्रतिक्रिया अपना पल्ला झाड़ने के रूप में सामने आया।एक के द्वारा दुसरो पर दोषारोपण कर अपनी जिम्मेदारियों से बचने का प्रयास किया गया। परिणाम यह हुआ कि कवियों ने अपनी कविताओं से सीधे सीधे सत्ता के दोगलेपन को अपना विषय बनाया।एक तरफ प्रधानमंत्री टेलीविजन और रेडियो पर मन की बात करने के लिये नियमित रूप से आते रहे।दूसरी तरफ कवियों ने उनकी कही बातों से ही उनके चरित्र को व्याख्यित करना शुरु कर दिए। आत्मनिर्भरता, लोकल में वोकल, जैसे शब्दों को ठोक ठोक कर ऐसा शब्द निकाल गया जिससे इसके वास्तविक लक्ष्य से दूरी स्प्ष्ट रूप से सबको नजर आने लगी। बोधिसत्व की 'आत्मनिर्भरता'शीर्षक से लिखी कविता आत्मनिर्भरता के नए मायने और नए अर्थ खोल देती है


कोरोना काल की भयावहता जब बढ़ी तो सरकारों के भी हाथ पांव फूलने लगे। उन्हें जब कोई उपाय नही सुझा तो उन्होंने लांकडाउन का रास्ता अपनाया। लाँक डाउन का अर्थ कर्फ्यू अर्थात लोगो का अपने अपने घरों में बंद होना। जब लोग घरों में बंद रहने के अभिशप्त हुए तो उनकी निगाह अपने घरों के सदस्यों पर पड़ी।रोज रोज के भागदौड़ वाली जिंदगी में जिस चीज को वह नही देख पाए थे,लगातार घर मे रहने से वह दिखाई देने लगी।उन्हें अपने बेटे बेटियों का बढ़ता वय दिखने लगा। उन्हें लगा कि जिस बच्चे को वह अभी छोटा समझ रहे थे वह कैसे अपनी जवानी की ओर बढ़ रहा है।बेटी जो बात बात पर अपनी बात मंगवाने के लिए जिद करती थी कैसे गम्भीर होने लगी है। पत्नी का भी एक नया रूप जो उसके ऑफिस जाने की चिल्लपो में नही दिख पाता था,दिखने लगता है।पति को बरबस ही उसपर प्यार उमड़ने लगता है।दाम्पत्य प्रेम इस कोरोना काल की एक महत्वपूर्ण प्रवृति बन कर उभरती है।श्रीप्रकाश शुक्ला इस काल मे इस प्रवृत्ति के उन्नायक कवि के रूप में उभरते है। कोरोना में किचेन उनकी ऐसी ही एक हल्की फुल्की कविता है जो दाम्पत्य प्रेम को अपने केंद्र में रखती है।

       जब लोग अपने अपने घरों में बंद हो गए ।सारे आवागमन के साधन रुक गए,गरल उगलती चिमनियाँ मन्द हो गई तो प्रकृति अपने को करेक्ट करने में लग जाती है।क्या ताल क्या पोखर क्या नदियाँ, सभी के पानी झक झक दिखने लगते है।जो काम सरकार करोड़ो अरबो रुपये खर्च कर नही कर पाई वह मानव के घरों में कैद होते ही अपनेआप ठीक होने लगी।महानगरों की विजीविलिटी इतनी बढ़ गयी कि की की किलोमीटर दूर की चीजें साफ साफ दिखने लगी।लगा कि मानव आँखो पर कोई जमा मैल अचानक साफ हो गई हो।लोगो को भरोसा ही नही हो रहा था कि उनके आस पास की प्रकृति इतनी खूबसूरत हो सकती है।कवियों जब प्रकृति पर मुग्ध हुए तो उन्होंने अपनी कविताओं में भी इनका भरपूर चित्रण किया। कई बड़े कवियों ने अपनी कविताओं में इसको केंद्रीय प्रवृति के रूप में दिखाया।


    कोरोना काल की एक प्रमुख समस्या थी प्रवासियों की समस्या। आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि अपने ही देश मे अपने लोग प्रवासी कहे गए।अमानवीयता का ऐसा नग्न नृत्य हुआ कि सभ्य समाज काँप उठा। वही मजदूर जिन्होंने नगरों को बसाया,उनको सजाया,उनमे गति पैदा की को जब सहायता की जरुरत पड़ी, नगरों ने हाथ खड़ा कर दिए। परिणाम यह हुआ कि महानगरों से गाँवो की तरफ पलायन का एक ऐसा दौर शुरू हुआ जिसमें कई नैतिकताएं ध्वस्त हो गई।जो जहाँ था वही से अपने गाँव को चल दिया।क्या स्त्री क्या पुरुष,क्या बच्चे सभी गांवों की तरफ इसतरह दौड़ पड़े मानो गाँव पहुंचते ही उनका दुख दर्द खत्म हो जाने वाला हो।पलायन के इस दंश को लगभग सभी कवियों ने अपना वर्ण्य विषय बनाया। आ


इस दौर की एक खास विशेषता यह थी कि लोगो ने आधुनिक सुविधाओं के भरोसा रहना छोड़ अपने निज बाहुओं पर भरोसा करना ज्यादा उचित समझे।बस बन्द थी,ट्रेन बन्द थी तो लोगो इससे हतोत्साहित नही हुए बल्कि पैदल ही घर को निकल पड़े। सवारी के रूप में साइकिल एक ऐसा वाहन उभर कर सामने आया जिसे खरीद कर लोग एकतरफ अपने पैसे का सही उपयोग के रूप में देख रहे थे तो दूसरी तरफ आधुनिक आवागमन के साधनों के विकल्प के रूप में। मानव अपने साहस के बल पर बड़ी बड़ी दूरियों को तय करने में सक्षम हुए।आम आदमी से नायक का भी जन्म हुआ। ज्योति लड़कियों के लिए आइकॉन बन गयी।सुभाष राय जी ने अपनी एक कविता में ज्योति की ही सीधा सीधा सम्बोधित किया है।

      लाकडाउन का एक बड़ा असर यह हुआ कि देश की अधिकांश जनसँख्या को अपने अपने घरों में कैद होना पड़ा। बाहर न निकलने की स्थिति में लोगो के दिनचर्या में खाना,सोना और मनोरंजन ही मुख्य शगल बन गया पर जल्द ही लोगो का मन इससे उबने लगा।लोग कुछ अलग करने की सोचने लगे।उनकी हॉबी, उनकी छिपी प्रतिभा जो समय के थपेड़े के साथ अप्रसांगिक सी लगने लगी थी,खाली समय्य मिलते ही पुनः अकुलाने लगी। कोई गीत गाकर तो कोई वाद्ययंत्र बजाकर, कोई मिमिक्री कर अपना वीडियो सोशल मीडिया पर लोड करने लगा इसी क्रम में कुछ लोग साहित्यिक सृजन की तरफ अग्रसर हुए, खासकर कविताओं के क्षेत्र में तो बाढ़ आ गई।क्या महिला क्या पुरुष,क्या स्कूली बच्चे सभी अपनी अपनी कविताएँ सोशल मीडिया पर शेयर करने लगे,हर तीसरा व्यक्ति कवि होने लगा।प्रतिभा का जैसे बिस्फोट हो गया हो।आजादी के बाद कभी भी एक साथ इतनी कविताएँ नही लिखी गई।अचानक आये बाढ़ से स्थापित कवि सहम गए,उन्हें इसकी गुणवत्ता की चिता सताने लगी।जल्द ही कवियों का दो वर्ग बन गया।एक वर्ग आचार्य(कोतवाल) की भूमिका में आ कविताओं के निकष और कवि के कर्तव्य गढ़ने लगा तो दूसरा किसी तरह के बंदिशों को न मानते हुए स्वतंत्र रूप से कविता रचने को महत्व देने लगा। इसतरह इस काल की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति में कवि -कर्म मसलन उसके कर्तव्य,उसके चरित्र आदि पर चर्चा को समझ जा सकता है।

..... 


               जब जब महामारी जैसी आपदा आती है इसका अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध जरूर खोजा जाता है।कोरोना भी इसकी अपवाद नही रही। चूँकि कोरोना वायरस की शुरुआत चाइना के वुहान शहर से हुई इसलिए अन्तराष्ट्रीय पटल पर चाइना को इसका मुख्य विक्टिम बनाया गया। दुनिया जो शीत युद्ध की समाप्ति तक दो ध्रुवों में बटी हुई नजर आ रही थी फिर से दो भागों में नजर आने लगी। अंतर इतना बस हुआ था कि अब रूस की बजाय चीन अमेरिका के सामने आ गया था।आपस की कटुता में डब्लूएचओ जैसी संस्थाओं के चरित्र पर प्रश्न उठने लगा।अमेरिका ने डब्लूएचओ में अपनी हिस्सेदारी खत्म करते हुए अपने को अलग कर दिया।


          इस युग की एक उल्लेखनीय प्रवृति थी पाश्चात्य विचारधारा एवं रीति रिवाजों की जगह भारतीय विचारधारा एवं रीति रिवाजों की स्थापना।चाहे वह परस्पर अभिवादन की मुद्रा हो,या साफ सफाई का मुद्दा हो,या खान पान का मुद्दा हो भारतीय रीति रिवाजों को ही अपनाया गया। एक तरफ जहाँ इस महामारी से निपटने में अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं को देखकर हम हीन ग्रन्थि से ग्रसित हो रहे थे वही दुनिया द्वारा अपने विचारों को अपनाते देखकर गर्व की भी अनुभूति हो रही थी।


       महामारी के चपेट में क्या खास क्या आम सभी आ रहे थे। पैसा,सम्पत्ति,सम्बन्ध सभी अपना महत्व खोने लगे।जिस पैसा को हम बरसो से संच कर रखे थे जरूरत के दिनों में हमारा सहारा न बन सकी। जिस सम्बन्ध की दुहाई देते हम अघाते न थे मुसीबत की घड़ी में हमसे मुँह मोड़कर अलग खड़ी हो गई। तड़क भड़क की निस्सारता,जीवन की नश्वरता जैसे विचार लोगो के दिलो दिमागों में छाने लगे। जीवन मे ग्लैमर एवं पैसा के प्रति मोहभंग होना इस युग की एक मुख्य प्रवृति थी।बहुत से कवियों ने इस प्रवृत्ति को अपने काव्य का विषय बनाया।


         जहाँ अंधकार होता है वही प्रकाश की भी जरूरत होती है।कोरोना काल निराशा रूपी अंधकार का काल है।यह एक ऐसी महामारी का काल है जहाँ व्यक्ति की सारी आशाएं वैक्सीन के आने से जुड़ी हुई है।इस घोर निराशा के काल मे लोग तरह तरह के मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझ रहे है।नौकरी के खोने से, परिजन के कोरोना संक्रमित होने से, बाहरी सहायता न मिलने से लोग तनावग्रस्त होते जा रहे है।ऐसे में कवि चुपचाप देख नही सकता क्योंकि कवि की जिम्मेदारी केवल सृजन कार्य तक ही नही है बल्कि समाज के पथप्रदर्शक का भी है।अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए वह सुंदर भविष्य को अपना विषय बनाते हुए आशा की उम्मीदों का संचार करते है। अतः सकारात्मकता का संदेश भी इस काल की महत्वपूर्ण प्रवृतियों में से एक है।


     हालांकि इस काल का विश्व, व्यक्ति,समाज ,देश,पर क्या प्रभाव पड़ा का आकलन अभी जल्दबाजी होगी पर इतना जरूर है कि इस काल को एक ऐसे स्थापना बिंदु की तरह समझा जा सकता है जहाँ से मानव को एक नए सिरे से सफर करना है। इस काल के प्रतिनिधि कवियों में मदन कश्यप,निलय उपाध्याय,बोधिसत्व,श्री प्रकाश शुक्ल सुभाष राय और संजय कुंदन का नाम उल्लेखनीय है।

अपूर्ण--

©संजीव कुमार तिवारी



【प्रकाशक का】

संपर्क सूत्र :-

ह्वाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल :-corojivi@gmail.com


दीपक शर्मा{©Deepak Sharma} की कोरोजीवी कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू}

 

दीपक शर्मा

कवि परिचय-दीपक शर्मा का स्थाई निवास जौनपुर के ग्राम-रामपुर(पो.-जयगोपालगंज केराकत) उत्तर प्रदेश में है। आप काशी हिंदू विश्वविद्यालय से वर्ष २०१८ में परास्नातक पूर्ण करने के बाद पद्मश्री पं.बलवंत राय भट्ट भावरंग स्वर्ण पदक से नवाजे गए हैं। फिलहल विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं।आपकी जन्मतिथि २७ अप्रैल १९९१ है। बी.ए.(ऑनर्स-हिंदी साहित्य) और बी.टी.सी.( प्रतापगढ़-उ.प्र.) सहित एम.ए. तक शिक्षित (हिंदी)हैं। आपकी लेखन विधा कविता,लघुकथा,आलेख तथा समीक्षा भी है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ व लघुकथा प्रकाशित हैं।  शर्मा जी की लेखनी का उद्देश्य-देश और समाज को नई दिशा देना तथा हिंदी क़ो प्रचारित करते हुए युवा रचनाकारों को साहित्य से जोड़ना है।विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आपको लेखन के लिए सम्मानित किया जा चुका है।

कविताएँ :-

१.

होरियों ! सावधान हो जाओ


देश के होरियों !

सावधान हो जाओ।

"फैसला तुम्हारे हित में हुआ है"

मन की बात नहीं सुनी तुमने? 

न्यूनतम समर्थन मूल्य

निजी कम्पनियां तय करेंगी अब। 

तुम्हारे ही खेत में

वे जब चाहेंगे चाय उगवायेंगे

जब चाहेंगे काॅफी, जूट,  मशालें

तुम जीओगे उन्हीं की शर्तों पर

हुकूमत हमेशा कहती रही

"भला होगा तुम्हारा"

इस झूठे छलावे में

झँसते और फँसते रहे हर बार तुम। 

राय साहब तो एसी में बैठे हैं

वे क्या जाने तुम्हारे खून पसीने की कमाई

वे तुम्हारी आत्महत्या को भी

देशहित के मापदंड से देखेंगे

आय दोगुनी तो दूर

अपनी सोना और रूपा की शादी के लिए 

पैसे भी नही जुटा पाओगे खेती से

गोबर से कहो

परदेश में ही रहे वो। 

धनिया मूर्ख नहीं थी

जो तुम्हें 

चापलूसों से हर बार सावधान करती रही। 

क्या तुम नहीं जानते

सरपंच का फैसला सर्वोपरि ही होता रहा है हमेशा

सच या झूठ। 


२.

इन्द्र देवता हैं?


इन्द्र देवता हैं? 

नहीं! 

मर गया था

उनका उसी दिन देवत्व 

जिस दिन 

अवैध रूप से किया था उन्होंने

अहिल्या के घर में प्रवेश 

किया था उनके साथ दुराचार।

उनका वह कर्म 

छल,  कपट व एक स्त्री के इच्छा के विरुद्ध था

किंतु वे स्वर्ग के राजा थे

इसीलिए स्वर्ग की कामना करने वाले लोग

ऋषि,  मुनि,  गंधर्व, देवता,  पंडित,  पुरोहित 

किसी ने नहीं किया इन्द्र से सवाल

किसी ने नहीं की उनकी तीखी आलोचना

किसी ने नहीं दिया उन्हें कठोर दण्ड

किसी ने नहीं समझा उनके कुकृत्यों को पाप

उल्टे अहिल्या को ही शाप देकर

बना दिया गया उन्हें पत्थर

जबकि वह निर्दोष थी

ऋचाओं में गाया गया-

यत्र नार्यस्तु पुज्यंते,  रमंते तत्र देवता। 

हमारे पुरोहित 

यज्ञ में,  पुजा में,  कथा और प्रवचन में

गाते हैं इन्द्र की महिमा का गान

जबकि अहिल्या की पूजा उन्होंने कभी नहीं की। 


३.

मिट्टी का चूल्हा


        1

जब आया था

मेरे घर में

उज्ज्वला योजना के तहत

गैस सिलेंडर और चूल्हा

तब हमने भी देखा था

आधुनिक भारत के विकास का सपना

कि लकड़ी पर 

मिट्टी का तेल गिराकर 

मिट्टी का चूल्हा 

अब नहीं जलाना पड़ेगा

मुँह और नाक से 

कालिख और धुआं नहीं खाना पड़ेगा

शर्द में गोइठे पर भूसी छिड़कर

आंच नही बढ़ाना पड़ेगा

ताल वाले पोखरा से

पोतनी मिट्टी लाकर

हर बरस नया चूल्हा 

नहीं बनाना पड़ेगा

मेरी अम्मा और दादी को

गोहरी, गोइठा,  खोइया, संठा, रहट्ठा

और बगीचे से लकड़ियां

नहीं जुहाना-जुटाना पड़ेगा

जैसा कि जुहा-जुटाकर 

और उसे सुखाकर

रखती थी वे 

बड़े जतन से

घर की अटारी पर

जैसे रखी जाती है 

कुण्डा और भूसा में अनाज,

मसहरी और पलंग के नीचे

विछाकर सुखी सब्जियां

जाड़े और बरसात में

मिट्टी का चूल्हा जलाने में 

यही ईधन बड़ा काम आता था। 


अब आये दिन दिख जाती है अखबार में

गैस सिलेण्डर के दाम बढ़ने की 

मोटी-मोटी सुर्खियां

तब लगता है माँ को

घर में

मिट्टी का चूल्हा ही कारगर था

क्योंकि गैस के चूल्हे पर खाना बनाना

अपने हर दिन के 

घरेलू खर्च से कटौती करना है। 


      2

जब पहली बार

आदिमानवों ने खोजी होगी आग

तब उन्होंने सबसे पहले बनाया होगा

मिट्टी का चूल्हा और मिट्टी का वर्तन

उनकी सभ्मता की यह नीव

आज गैस सिलेंडर के ज़माने में भी

कायम है

कारगर  है

और ताकतवर भी। 


४.

किराये पर कमरा


मैं बनारस पढ़ने आया था

शहर के एक मकान में 

किरायेदार था

और आंटी जी मालिकिन

मकान का नियम सख़्त था

जैसा अरब के देशों में होता है कानून

रात में समय से आ जाना

कमरे से आँगन तक गंदगी तनिक न हो

पानी और विजली कम खर्च करना

हमेशा चमकता रहे शौचालय 

मकान के भीतर पार्टियों पर प्रतिबंध

गुटखा,  सिगरेट, गांजे पर प्रतिबंध

प्रेस,  कूलर,  हिटर पर प्रतिबंध 

छत पर देर तक फोन से बात करने पर प्रतिबंध

आसपास किसी लड़की से 

मिलने पर प्रतिबंध

मांस-मदिरा वर्जित

तेज आवाज में गाना-बजाना वर्जित

बगैर अनुमति किसी को 

कमरे पर बुलाना वर्जित

ये सारे नियम मौखिक थे

जो आरम्भ में ही हमें बता दिया गया था

इसमें से एक भी नियम टूटने पर

आंटी जी हिटलर की तरह हाज़िर हो जाती थीं

या छत से ही बकबकाना

शुरू कर देती थीं

साफ-सफाई रहने पर भी 

कुछ न कुछ नुस्खे निकाल ही लेती थी

मुझसे मिलने कोई कमरे पर आता

तो पूछती-

कौन आया था

क्यों आया था

कहाँ से आया था? 

आंटी की नजर हम पर

हमेशा रहती थी

हम कब सो रहे

कब जाग रहे हैं

कब खा रहे हैं

कब बाथरूम जा रहें

कब क्या कर रहे हैं

आदि

इन नियमों के विरुद्ध 

मैंने कई बार ऐतराज किया

विवाद हुए

झगड़े हुए

और हर बार मुझे मिली

मकान खाली करने की धमकियां

मैंने अन्यत्र कमरे देखें

किंतु हर जगह नियम ऐसे ही थे

या किराया ज्यादा था

मेरी अवकात से ज्यादा

मेरे पास पैसे कम थे

इसलिए उसी कमरे में 

रहने के  लिए मजबूर था


५.

मेरे स्कूल के बगल से नदी


मेरे स्कूल के बगल से

एक नदी बहती है

जो इनऊझ ताल से 

आदिकेशव घाट तक पहुंचने में 

कई बार थकती है

कई बार रुकती है


इस गांव में

दस-बीस घरों में

केवल एक ही हैंडपंप मिलता है

जिसका पानी सिर्फ पीने के लिए ही 

उपयोग में लाया जाता है

शेष आपूर्ति नदी के जल से होती है

मल-मुत्र-गोबर के बावजूद

उनके लिए जीवनदायिनी है यह नदी

जो शहर तक पहुंचते-पहुंचते

नाले में तब्दील हो जाती है


मेरे स्कूल के बच्चे

अक्सर ही मिलते हैं 

नदी के पास

वे स्कूल से भी चले जाते वहां

शौच के बहाने

या रेसस में,

आते-जाते वे

अक्सर ही दिख जाते हैं 

नदी में नंगे नहाते हुए

या मछली पकड़ते हुए

उनकी देह से आती है

मछली की गंध

मुझे आश्चर्य होता है

इतनी छोटी-सी उम्र मे

तैरते हुए

ये बच्चे कैसे पार कर जाते हैं नदी

नाव चलाने में भी कुशल हैं वे

किनारे पर

बाल सुखाती

या कपड़ा कचारती हुई

दिख जाती हैं कुछ औरतें

बरसात के दिनों में

जब उफान मारती है नदी

तब भी

इन बच्चों और उनकी मांओं को

नहीं लगता भय

उन्हें विश्वास होता है कि

नदी की धार उन्हें नहीं डूबोयेगी


इस नदी में

जवान,  वृद्ध महिलाएं भी नहाती हैं

नदी के आसपास 

झुरमुट और झाड़ियां हैं

औरते और लड़कियां

झुरमुट की आड़ में

कपड़े बदल लेती हैं

इन झाड़ियों को

कभी काटा नहीं जाता

क्योंकि उनके शौच के लिए

यही एक मात्र उपयुक्त स्थान है


कभी-कभी 

इन झाड़ियों में छिपकर

कोई कुंती

किसी कर्ण को 

दे जाती है 

चुपके से जन्म


झाड़ियों के पीछे कभी-कभी

सुनाई दे जाती है

दुर्धर्ष इंसानी जानवरों द्वारा

हत्या और बलात्कार जैसी कुछ अप्रत्याशित घटनाएं

घटना के बाद 

खून नदी के गंदले पानी में समा जाता है

मुंह में कपड़े ढूंसकर 

दबा दी जाती है चीख 

दिन में भी नहीं पहचाने जाते 

हत्यारों के चेहरे

खबर अदालत या कचहरी तक नहीं जा पाती


६.

बिटिया के लिए तीज


आषाढ़ बीतने के बाद

शुरू होता है सावन

माँ चढ़ा आती है

मन्दिर मन्दिर पूड़ी और हलवा

हर साल की तरह।

पेड़ों पर पड़ जाते हैं झूले

रिमझिम फूहारोः के बीच

मेरे गाँव की युवतियां 

झूला झूलते हुए गाती हैं कजरी 

इस बीच माँ को 

बिटिया की बहुत याद आती है

वर्षों पहले जिसे

अपने द्वार से 

डोली में बिठाकर 

विदा कर चुकी होती हैं,

वह जुटाने लगती है

बिटिया के लिए तीज का सामान

वह खरीद लाना चाहती है

बाजार से

सबसे अच्छी लगने वाली साड़ी

सबसे महंगी विदिया,  कुमकुम, लिपस्टिक 

तेल, साबुन,  काजल, क्रीम

अंदरसा, फल, मिठाई

और बहुत-सी चीज़ें 

जिसे देने की अभिलाषा कभी पूरी नहीं हुई,

ताकि बिटिया ससुराल में खुश रह सके


यह समय होता है

मेरा और छोटे भाई के एडमिशन का

स्कूल से फीस रसीद आते ही

आ जाती है

माँ के सिर एक और जिम्मेदारी


हर बार की तरह

इस बार भी

बिटिया के लिए

माँ की इच्छा अधूरी रह जाती है


        2

बिटिया को तीज का सामान

बाँथते हुए

माँ ने दिखायी मुझे

अटैची और पोटली

ये कहते हुए कि

कल जब मैं 

नहीं रहूंगी इस संसार में

तुम बहन को

ऐसे ही बाँधकर 

ले जाना तीज। 


७.

सुनसान त्रिवेणी का तिराहा


बहुत दिनों से 

सुनसान है त्रिवेणी का तिराहा 

जहाँ

गाहे-बगाहे

अक्सर ही दिख जाते हैं

एक लड़का और एक लड़की

करते हुए प्रेमालाप

उस तिरहे से गुजरने वाले लोग

घंटो करते हैं

वहाँ का महिमामंडन

किसी पुलिया पर

कैंटीन में

या हाॅस्टल में 

बैठकर 

दोस्तों के साथ ।


त्रिवेणी का तिराहा जानता है

युवा मनोभाव

और जन-आलोचना 

वह जान चुका है 

कैसे बनायी जाती है

प्रेम की भूमिका

हर रोज उसने देखा है

एक प्रेमी और प्रेमिका

कैसे खींचे चले आते हैं

एक-दूसरे के पास?

कैसे छू लेते हैं 

एक-दूसरे का हाथ? 

और कैसे पहुंच जाता है

धीरे-धीरे 

एक-दूसरे के होठों पर होठ? 

अब वह नहीं देख रहा

उनकी हँसी और खिलखिलाहट

वह नहीं देख रहा

एक -दूसरे का पोछते हुए आँसू

वह नहीं देख रहा

किसी युवती को 

जमीन पर रगड़ते हुए एड़ियां

वह नहीं देख रहा

वहाँ किसी के इंतजार में 

किसी को दाँत से काटते हुए नाखून

वह नहीं देख रहा

किसी लड़की के

उभरे उरोज और नितंब  की 

गोलाइयों पर

टकटकी लगाये 

किसी लड़के का छिछोरापन

बस वह देख रहा है 

उदास सड़के

उदास कलियाँ

और उदास पंछी


और सच कहूँ तो 

त्रिवेणी तिराहा भी बहुत उदास है।

८.

मेड़ बनाती धनिया


जब घर में

बहू बनकर आयी झूनिया

बीमार होने की डर से

बारिश में भीगकर

बाहर नहीं निकलना नहीं चाहती 

तब

वह पैसठ बरिस की धनिया

साड़ी का पल्लू मोड़कर

धान के खेत में

बना रही होती है मेड़ |

खेत का पानी

कहीं दूसरे के खेत में

न उतर जाये

इसलिए वह जल्दी-जल्दी 

चलाती है 

अपना झूर्रियों वाला हाथ

वह घंटे दो घंटे तक

काम में लगी रहती

पर नहीं थकती

उसे धान रोपने

या खेत से पानी 

उतर जाने से ज्यादा चिंता है

घर में

नाती-पोतों के पेट भरने की

उनकी पढ़ाई और दबाई के खर्च की

क्योंकि 

वह

जानती है कि

परदेश में रहने वाले 

गोबर की कमाई से

परिवार का खर्च

नहीं चलता।


९.
पहुंच जाने दो हमें हमारे गाँव

हम सड़कों पर 
सैर करने नहीं निकले हैं साहेब
हम जाना चाहते हैं अपने गाँव
मेरी पत्नी के पेट में
बहुत दर्द है
उसे थोड़ा विश्राम चाहिए 
मेरा शिशु भूखा है बहुत
उनकी माँ के स्तन में
दूध नहीं बचा है 
चलते-चलते मांसपेशियां छिल गयी है
पड़ गये हैं पैरों में छाले
धूप से चेहरे हो गये हैं काले
जल गयी है देह की खून
हड्डियों की बदौलत
खींच रहे हैं हम धरती

लाठियाँ रख दो साहेब
यहीं तो बचा है मेरे पास
बस आदमी जिंदा है

खिच लो मेरी तस्वीर
अच्छा तो नहीं आयेगा
लेकिन अच्छा जरूर लगेगा
क्योंकि इससे आपकी खबरें
हाईलाइट होगी

कहते हो रुक जाये यही? 
रुके तो थे दो महीना
क्या मिला? 
कमाये जितना
वह भी सफा हो गया
कितने दिन दिया गया हमें खाना? 
कितने दिन दिया गया हमें पानी? 
बस सोते रहे हम
आसमान की छत ओढ़कर जमीन पर
जाने दीजिए साहेब
पहुँच जायेंगे हम 
कुछ दिनों में अपने गाँव
हुक्मरान मेरी सुने न सुने
लेकिन मेरे पड़ीसी
मुझे दो रोटी देने में
संकोच नहीं करेंगें 

"किराया नहीं लिया जायेगा
मजदूरी मिलती रहेगी
दवा पहुँचती रहेगी"
रहने दो साहेब
आपकी केवल एक बात मानेंगे-
आत्मनिर्भर बनेंगे
हाँ,  आत्मनिर्भर ही बनेंगे
बस किसी तरह
पहुँच जायें अपने गाँव

लाॅकडाउन टू प्वान्ट जीरो
लाॅकडाउन थ्री प्वान्ट जीरो
लाॅकडाउन फोर प्वान्ट जीरो
टेलीविजन की ये बहस
सबसे अश्लील चित्र लगने लगी है

इस बार
मुनिया के लिए
खिलौना नहीं खरीद पायें
न ही खरीद पाये
बाबूजी के लिए चप्पल 
न माँ के लिए साड़ी

कल शराबी ट्रक का ड्राइवर
पाँच सौ किमी यात्रा का
पाँच हजार माँग रहा था
बीबी ने मंगल-सुत्र उतार दी
किंतु मेरा सफर
पूरा नहीं हुआ साहेब

विशेष वाहन विशेष लोगों के लिए है

आसमान से फूल बरसाती जहाजें
मेरे घिसटतें पाँवों को 
चिढ़ा रही हैं
खिड़कियों से बजती तालियां
मेरे कानों को बेध रही है

मेरा वो साथी
जो सोया था
रेल पटरियों पर 
भोर की नींद में
टुकड़ों में बटा है
उसकी बूढ़ी माँ
कलेजा पीट रही है
और उनकी कुँवारी बहन
उन्हीं की बदौलत
देख रही थी सुहाग के सपने
रधवा के काका
अधमरा पड़ें है सड़क पर
उनकी सांसे फूल रही है
गोद को तरसता बच्चा
ट्राली पर ही सो गया है

कैसे-कितना-क्या बतायें साहेब
पहुँच जाने दो बस
हमें हमारे गाँव। 

१०.
दम तोड़ता पिता

दम तोड़ते हुए 
पहली बार एक पिता ने कहा -
"छोटकी बड़ी हो गयी है!"

बेटे ने पहली बार सुनी
पिता के कंठ से 'आह' का स्वर

पहली बार अहसास हुआ
जिम्मेदारी का बोझ। 


११.
जुलिया नहीं जान पाई प्रेम

जुलिया जवान हो चुकी है
प्रेम करने की उम्र में
वह उठाती है गोबर
माँ के साथ 
मनरेगा में करती है मजदूरी 
बाबू-बाबुवानों की
काटती है गेहूँ
ढोती है बोझा
रोपती है धान 
काटती है सरसो
खीचती है सगड़ी
शादी-व्याह में उठाती है पत्तल
धोती है जूठे वर्तन
पर नहीं सोचती कभी प्रेम

उसे किताबों से तो
पाला ही नहीं पड़ा कभी
सो तर्क करना नहीं जानती
सिद्धांत गढ़ना नहीं जानती
और नहीं समझती ज्ञानियों की भाषा
उसके नानी के यहाँ से फोन
पड़ोस के मोबाइल पर ही आती है
मैंने उसे
न कभी हँसते देखा है
न रोते देखा है
देखता हूँ उसे हमेशा
जीवन के प्रति उदासीन
किसी की नजरे उसे आकर्षित नहीं करती
भद्दी गालियां और गंदी बाते सुनना 
उसके जिंदगी के साथ चलती है
नहा-धोकर कभी
ठीक-ठाक कपड़े पहन लेती
तो छुछमाछर गिद्ध लड़के
उसके आस-पास रेउछियाने लगते हैं
पर नहीं करता
कोई उससे प्रेम

स्कूटी से स्कूल जाती लड़कियों-सी 
ललक नहीं उसमे
न ही मन में आया कभी
बाहों में बाहें डालकर
किसी प्रेमी के साथ
पार्क में बैठने का सपना
सच तो यह है 
कि सपना देखने का
अवसर ही नहीं मिला उसे
जैसे कोख में ही
किसी ने 
मिटा दी हो उसके भाग्य की रेखा

जुलिया जवान हो चुकी है
किंतु नसीब नहीं होता उसे
महावरी में पैड
उसके देह पर वही कपड़े हैं
जिसे बाबू-बाबुवानों की बेटियाँ 
सैकड़ों बार पहन कर 
देह से उतार चुकी होती हैं

जुलिया की माँ ने 
शादी की सिर्फ पहली रात
जाना था प्रेम
महसूस किया था
माथे पर चुम्बन
उसी दिन वह पहनी थी
अपने जीवनकाल का
सबसे सुंदर वस्त्र
लगायी थी माथे पे बिंदी
बालोंं मे जूरा
आँख में काजल
हाथ में मेहदी
पैरों में महावर
किंतु अब तक
जुलिया नहीं जान पाई
किसी प्रेमी का निश्छल प्रेम

१२.
ये मजदूर औरतें -दीपक शर्मा, जौनपुर, उत्तर प्रदेश-मजदूर दिवस विशेष
 
ये मजदूर औरतें
दिन रात करती हैं काम
नहीं जानती आराम
चलाती हैं फावड़ा
खोदती हैं मिट्टी
पाथती हैं ईंट
छाती के बल खीचती हैं सगड़ी
दूधमूँहें बच्चे को
लादकर पीठ पर
ढोती हैं ईंट,
खाती हैं खैनी
पीती हैं बीड़ी,

ये मजदूर औरतें
न जाने किस काठ की बनी होती हैं
ईंट को ट्रैक्टर पर लादती हैं
उसे गंतव्य स्थान तक पहुँचाती हैं
यही काम बार-बार दोहराती है
फुरसत मिलते ही
फिर पाथने लगती हैं ईंट
इनके नंग-धड़ंग बच्चे
गिली मिट्टी
या धूल में
बहलाते हैं मन
रोते हैं जब
वे काम रोककर
पिला आती हैं
दूध,
या पानी,
और सुला आती हैं
जमीन पर
किसी भीत की छांव में।

ये मजदूर औरतें
बीमार नहीं होतीं
होतीं भी हैं तो
इनकी सुधि कौन लेता है
और बीमार नहीं होते
इनके बच्चे
प्रसव पीड़ा में
इनके साथ कौन होता है?
इनके बच्चों के मरने से
दुःख किसको होता है?

हम दिखाते हैं
देश को विकास का माॅडल।

ये मजदूर औरतें
करती हैं खुले में
शौच और स्नान,

इनके मालिक
बुझा लेते हैं
इनके जिस्म से
अपने जिस्म की प्यास,

इनकी बेटियाँ
व्याही नहीं जाती
अक्सर,
किसी दलाल के हाथों
बेच दी जाती हैं,
भगा ली जाती हैं,
चुरा ली जाती हैं,
या उठा ली जाती हैं,
यौवन झर जाने के बाद
वापस आ जाती हैं,
किसी भट्ठे पर करने मजदूरी,़

इनके यहाँ
रश्म रिवाज नहीं होता
बिना दिशाशूल जाने कहां-कहां
चली जाती हैं
एक गाँव से दूसरे गाँव,

इन्हें माना गया है अछूत,
नहीं पीते हैं कई इनके हाथ का पानी,
वे भूल जाते हैं,
मन्दिर की ईटें,
और उनके आलीशान बंगले से
चिपका होता है
किसी मजदूर स्त्री का श्रम,
हड़प्पा,  मोहनजोदड़ों की सभ्यता के विकास में
था किसी मजदूर स्त्री का योगदान,
लाल किला,  कुतुबमिनार,  ताजमहल
और संसद की दीवारों से
आती है इनके पशीने की बू,
स्कूल की दीवारें इसलिए नहीं हिलती
क्योंकि इसमें सना होता है
किसी तपित मजदूर स्त्री का लहू,

ये मजदूर स्त्रियाँ
रहती हैं सदैव हाशिए पर,
पर इनके बिना
विकास का रास्ता नहीं खुलता,
पर, इन्हें नहीं मिलता
लाॅकडाउन में कोई मुआवजा।
इन्हें नहीं मिलता
विधवा या वृद्धा पेंशन
कहने को तो ये भी कहती हैं –
सरकार माई-बाप हैं
सरकारे आती हैं
सरकारे जाती हैं
मगर ये पाथती रहती हैं
किसी भट्ठे पर ईंट दर ईट।


१३.
कुछ ही दिनों की तो बात है

कोरोना
वुहान से चलकर
विश्व-भ्रमण करते हुए 
आया जो भारत
जहाज में बैठकर। 
और दे दिया हमें 
चुपचाप 
युद्ध की चुनौती।
हम लड़ेगे
और उसे हरायेंगे
विना किसी बारूद के
अपने घरों में बैठकर। 

कुछ ही दिनों की तो बात है
नहीं मिलेंगे किसी दोस्त से
नहीं खेलेंगे स्टेडियम में क्रिकेट मैच
नही जायेंगे सिनेमाहाल
नवरात्रि का समय है
घर में ही करेंगे 
देवी माता की आराधना
फूरसत का पल है
आलमारी मे रखी हुई सारी किताबें
पढ़ डालेंगे
भाई की शादी के लिए कपड़े 
बाद में बनवा लेंगे
इस बार बिट्टी के जन्मदिन पर
केक नहीं काटेंगे। 

कुछ ही दिनों की तो बात है 
तब तक दोस्तों से
फोन पर ही करते रहेंगे बाते
घर में ही बच्चों को सिखायेंगे
हिंदी-अंग्रेजी वर्णमाला
उनके साथ खेलेंगे लूडो
और गुड्डा-गुडी का खेल
दादा-दादी से कहेंगे-
"पड़ोसी के घर न जाकर
देखिये टेलीविजन पर रामायण
सुनाइये बच्चों को कहानियाँ"

और हे प्रिये! 
तुम्हें शिकायत रहती थी न
कि मैं समय से घर नहीं आता हूँ 
छुट्टियों के दिन भी गायब रहता हूँ 
अब सारा दिन करूंगा 
तुमसे बाते
तुम्हारी आँखों का काजल
माथे की विदिया 
और कानों की बाली को
देर तक निहारूँगा
तुम्हारे जुरे को
गाछना सीख जाऊँगा
मेरे विखरे हुए बालों को
तुम भी संवार दो ना

कुछ ही दिनों की तो बात है 
हम फिर मिलायेंगे
गर्मजोशी से हाथ
और देखेंगे
प्रेमी जोड़े में
घास पर गिरा हुआ गोल चुम्बन
कैंटिंग में बैठकर 
फिर उड़ायेंगे हँसी के फव्वारे
सजायेंगे महफिल 
कर सकेंगे 
कवि सम्मेलन 
प्रातःकालीन बेला में
चलो सिवान घूम आते हैं 
देख आते हैं
गेहूँ के खेतों में 
मृदुल हवा के साथ
झूमते हुए बालियों को
महकते हुए धनिये को
फिर वही से मापेंगे
धरती-आसमान के बीच की दूरी
और पगडण्डी पर बैठकर
लिखेंगे सुंदर-सी कविता

कुछ ही दिनों की तो बात है 
ये महामारी चली जायेगी
हम सब का संकट कट जायेगा
तब तक अपने घर के 
खिड़कियों से देखिये
विचरण करते हुए पंछियों को
और पता करते रहिए
कि हमारे पड़ोस में
कोई भूखा तो नहीं 
ज़रूरतमंद को
पहुंचा आइये
अनाज और सब्जियां 
फल और साबून
और रखिये देश को खुशहाल

कुछ ही दिनों की तो बात है 
स्कूल,  दफ़्तर, दुकाने , कारखाने
सब खुल जायेंगे
रेलगाड़ियों के पहिये
जो थम गये हैं
फिर से दौडने लगेंगे
अपनी पटरियों पर
और हम लोग भी 
आ जायेंगे सड़क पर
लेकर साइकिल 
सिर आसमान पर उठाकर
देख सकेंगे उड़ते हुए जहाजों को
और गायेंगे गीत-
"विजयी विश्व तिरंगा प्यारा।"


१४.
नेताजी

मंच पर बैठे नेता जी
सुनकर मेरी कविता
खूब मुस्कुरायें, 
खिलखिलायें.
तालियाँ बजायें,
फिर बुलाकर मुझे मंच पर 
थपथपायें मेरी पीठ,
थमाकर सौ रुपये का नोट 
बढ़ाये मेरा हौसला।
फिर धीरे से बोले :
"ये लो मेरा कार्ड
पड़े जब जरुरत
नि:संकोच करना मुझे याद
मैं जरुर आउँगा आपके काम।"

मैं हो गया गदगद
सुनकर नेताजी की बात
सोचा -
जरुर करुँगा 
नेताजी से मुलाकात।

एक दिन 
समय निकालकर
मैं नेताजी के घर आया, 
उन्हें एक अर्जी-पत्र थमाया, 
पत्र विना पढ़े 
नेताजी ने किया सवाल- 
"आपके घर कितने सदस्य हैं जनाब? 
इलेक्शन में
हमें कितने वोट दिलवा सकते हैं आप? 
अपने परिवार से
हित, नात, परिचित, रिश्तेदार से।"
मैंने कहा -
"सिर्फ एक ..."
नेताजी अर्जी-पत्र दिए फेक ।


१५.
तेरहवीं का विहान

कल मेरे पड़ोसी
गंगू चाचा के पिताजी की तेरहवीं थी
ब्रह्मभोज में भीड़ खूब जुटी थी
पहले ब्रह्मणों ने भोग लगाया
दक्षिणा ग्रहण किया
फिर देर तक चलता रहा भोज
गाँव के खड़ंजे पर
साइकिल, मोटर साइकिल,  पैदल
कार, स्कार्पियो के आने जाने से चहल-पहल थी
खद्दरधारी,  काले कोट,  सायरन 
व नीली बत्ती वालों के लिए
वीआईपी व्यवस्था थी
अंत में 
उत्तीर्ण कहने के बाद
सबने कहा - मृतक आत्मा को शांति मिली

सुबह घर के पिछवाड़े 
जुठे पत्तलें
चाटते हुए कुत्ते दिखें
विखरे अन्न को 
टोड़ से उठाते पंछी
और खिड़की के पीछे
शराब की अनेक खाली बोतलें
हलवाई नशे में अब तक बुत्त पड़ा है
रग्घू काका का पैंट पेशाब से
खराब हो गया था
यह बात उन्हें सुबह मालूम हुई

गाँव के दक्षिणी टोला में
मुसहरों की बस्ती थी
हाथ में लोटा,  थाली,  भगोना लेकर
औरतें और बच्चे
द्वार पर आ चुके थे
जिन्हें कल के भोज में 
निमंत्रण नहीं था
उनमें कुछ डेरा डालकर
रहने वाले वासिंदे थे
वे झारखण्ड या छत्तीसगढ़ से
पलायन आदिवासी हैं
दाल में खटास आ गया था
पर वे लेने से मना नहीं कर रहे थे
सब्जी में गिरे कॉकरोच को
सावधानी से निकालकर 
बाहर फेक दिया गया था
पुड़ियाँ कठोस हो गयी थी
चावल लिजलिजाने लगा था
किंतु उन्हें लेने में हिचक न थी
वरन् अत्यधिक प्रसन्नता थी
बुनिया के डेग को ढककर
ओसारे में खिसका दिया गया था
जो कि मुसहरों के हिस्से में न था

उत्तरी टोला के लिए
जो भोजन 
बेकार और बेस्वाद हो चुका था
दक्षिणी टोला के लिए वही भोजन
विशेषाहार था
आज उन्हें रोटी के लिए
सोचना नहीं पड़ेगा
गेहूँ के खलिहान में
मुसकइल में हाथ डालना नहीं पड़ेगा
पेड़ पर बैठी पंछी पर
गुलेल से निशाना लगाना नहीं पड़ेगा
बच्चों को आगे करके
किसी के आगे
हाथ फैलाकर गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा
आज जो मजदूरी कर लेंगे वे
उनकी एक दिन की बचत होगी। 


१६.
जनता और जन प्रतिनिधि 

कुछ लोग 
मंच पर बैठे हैं
और कुछ लोग 
मंच के नीचे थे
मंच पर बैठे लोग
जन-प्रतिनिधि थे
और मंच के नीचे 
आम जनता थी
जन-प्रतिनिधि लोग
बता रहे थे
इतिहास में दर्ज
अपने पुरुखों की कहानियाँ
दिखा रहे थे 
फ्रेम में मढ़ाये उनके चित्र
और चित्र के नीचे उनके स्वर्णिम नाम
वे नाम
राजा के थे
मंत्री के थे
सलाहकार और मनीषी के थे

एक दूसरा मंच था
जिस पर बैठे
कविगण, लेखक और दार्शनिक 
उनकी महिमा का
प्रशस्ति-गान कर रहे थे

मौन जनता
उन चित्रों में
इतिहास में
गायन में
ढूँढ़ रही थी
अपने पुरुखों का नाम
जिन्होंने सबसे आगे बढ़कर
सबसे ज्यादा दी थी कुर्बानियाँ
वे प्रजा थी
आम सैनिक थे
सेवक थे
वे तब भी
मंच के नीचे थे
और आज भी नीचे ही हैं
विभिन्न शिलाओं और इतिहास के पन्नों पर
उनके नाम
न तब थे
न अब हैं। 


१७.
भुट्टा 

भुट्टे तो हमने
बाजार में बहुत खाये हैं
ढेलों,  चट्टी,  चौराहों पर
इसके लिए भीड़ लगी रहती है
अब लोग
भूट्टे भूख के लिए नहीं
अपितु,  शौकियां खाते हैं

मगर घर पर 
जब माँ
बोरसी में
गोइठे की आग पर
भूँगती है भुट्टे के बाल
बहन पीसती है
सीलबट्टे पर नमक,  मिर्च, अदरक
और दादी बताती है
देश में गेहूँ आने से पहले
पेट के लिए 
भुट्टे का महत्व
तो मन
भुट्टे-सा
दुधिया हो जाता है। 


१८.
अलग अलग चेहरा

मैंने देखा है 
इंसानों का अलग-अलग चेहरा
उनकी मूँछों के भीतर छुपी गम और हँसी
चेहरे ढकने वाले लोग
हमारे सैलून पर आकर
हटा लेते हैं
चेहरे का नकाब
जो कुछ स्पष्ट नहीं होता
साबुन से धोकर
उस्तरे से मैल की परत हटाकर
पढ़ लेता हूँ
उनके चेहरे का भाव
बिल्कुल साफ-साफ

एक नाई के अलावा 
इंसानों के चेहरे का असली रंग 
कौन जानता है? 

चेहरे की छुर्रियों और चमक को
पढ़कर जान लेता हूँ
मनुष्य का अंतःकरण

मैंने इंसानों के चेहरे पर
गोलियाँ और चुम्बन का निशान
दौनो एक साथ देखा है। 
©दीपक शर्मा
जौनपुर उत्तर प्रदेश




संपादक परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष ,पञ्चम सत्र का छात्र {हिंदी ऑनर्स}

सम्पर्क सूत्र :-

ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत। 221009

ह्वाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

नोट :-

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आत्मिक धन्यवाद!

महाकाव्य : "राहुल-चरित: ज्ञानदीप" — गोलेन्द्र पटेल

महाकाव्य : "राहुल-चरित: ज्ञानदीप" —गोलेन्द्र पटेल   प्रथम सर्ग : मंगलाचरण:  ज्ञानदीप वंदौं ज्ञान-विवेक को, सत्य-करुण आधार।  तम हरन...