Thursday, 12 November 2020

'उजास' के कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव अर्थात् "लोक में प्रेम के बीज रोपता कवि" : नीरज कुमार मिश्र ~ गोलेन्द्र पटेल


वरिष्ठ कवि जितेंद्र श्रीवास्तव

 युवा आलोचक नीरज कुमार मिश्र

     "लोक में प्रेम के बीज रोपता कवि "

                                                                                                            नीरज कुमार मिश्र
                                                                         
१९९० के आसपास का समय भारतीय राजनीति,सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन का दौर था।अपने समय में हो रहे इन बदलाओं की झलक उस समय के साहित्य में देखी जा सकती है।उस समय का साहित्य इन परिवर्तनों के बीच नयी साहित्यिक चेतनाओं और चेष्ठाओं का विकास करता दिखता है।इस साहित्यिक विकास की परख कविता से अच्छा कौन कर सकता है।इसीलिए इन साहित्यिक परिवर्तनों को एक कवि मन बहुत सूक्ष्मता से परखता है।कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ऐसे ही सजग कवि हैं।
जिन्होंने इन परिवर्तनों को बहुत शिद्दत से महसूस किया है।जिसके बाद उनका संबंध समाज से जुड़ता दिखता है।इस जुड़ाव के बाद कवि की अपनी कोई सत्ता नहीं रह जाती।जिसकी ओर शुक्ल जी ने इशारा किया है," कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है और जगत के बीच उसका आधिकारिक प्रसार करती हुई उसे मनुष्यत्व की उच्च भूमि पर ले जाती है।भावयोग की सबसे उच्च कक्षा पर पहुँचे हुए मनुष्य का जगत के साथ पूर्ण तादात्म्य हो जाता है,उसकी अलग भावसत्ता नहीं रह जाती,उसका हृदय विश्व-हृदय हो जाता है।" कवि  जितेन्द्र श्रीवास्तव का अभी हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह "उजास" इस कवि के  विश्व-हृदय में रूपायित होने की गाथा है।ये संग्रह "उजास" उनके तीन पहले के संग्रहों- 'अनभै कथा'(२००३),'असुंदर सुंदर'(२००८) और 'इन दिनों हालचाल' (2000,2011) का  संकलित रूप है।
              उजास वह शक्ति है जिसके माध्यम से हम समाज की प्रत्येक वस्तु को बहुत सूक्ष्मता से देखते परखते हैं।इस कविता संग्रह का नाम कवि ने उचित ही रखा है।क्योंकि जहाँ खुशी है वहाँ उजास है।'बेटियाँ' कविता में कवि इस बात को पुष्ट करता है-
"जितनी हँसी होती है बेटियों के अधर पर
उतनी उजास होती है पिता के जीवन में "
कवि खुद पिता है।हम जानते हैं कि पिता जिम्मेदारी का दूसरा नाम है।इसी अनुभूति का प्रतिफलन है कविता " पिता "
"पिता होना 
जिम्मेदार आदमी हो जाना है"
         जितेन्द्र श्रीवास्तव ऐसे कवियों में नहीं हैं,जो चली आ रही काव्य परंपरा की लीक पर चलते हों।वे ऐसे कवि हैं,जो समाज में घटित घटनाओं का संज्ञान लेते हुए,बदलते हुए समय के अनुसार अपनी कविताओं की भूमिका तय करते हैं।इस कवि ने समाज में परिघटित होती घटनाओं की सूक्ष्म पड़ताल करके अपनी कविताओं में ढाला है।यही वजह है कि उनकी कविताएं समाज के नए उद्देश्यों से जुड़ी हुई दिखती हैं।अच्छे रचनाकार वही होते हैं,जो देश काल की परिधि का विस्तार करते हैं।इनकी कविताएँ अनुभूति और विचार की उर्वर भूमि से उपजी हैं।ये कविता संग्रह कवि की कविता यात्रा के अनेक सोपानों को एक साथ लाता है।जिसके माध्यम से इस कवि के कविता की विकास यात्रा को ठीक से समझ सकते हैं।इनकी कविताएँ किसी कथावाचक की कथा नहीं हैं,बल्कि इनकी  कविताएँ सामाजिक,सांस्कृतिक, राजनैतिक अनुभव के ताप से पगी हैं।
           अनभै कथा का अर्थ ही है अनुभव की कथा।कवि समाज से मिले अनुभूत सत्य को कविताओं के माध्यम से पाठकों के सामने लाता है।ये कवि कागद की लेखी पर नहीं आँखिन देखी पर ज्यादा विश्वास करता है।इसीलिए ये कबीर के ज्यादा निकट दिखते हैं।इसी वज़ह से जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ सामाजिक और  सांस्कृतिक ताने बाने से बुनी  हैं।कवि अपने अनुभव को स्मृति के माध्यम से कविताओं में लाकर उसे अनुभूतिगत खरेपन में ढालता है।यही अनुभतिगत सत्य अच्छी कविता की कसौटी होती  है।कोई कविता अच्छी है या बुरी ये इसी कसौटी से परखी जानी चाहिए।जैसा अज्ञेय कहते हैं कि " वह कविता अच्छी है या बुरी,इस से मुझे मतलब नहीं है।मेरे निकट वह सच है,क्योंकि वह अनुभूति प्रसूत है,यही मेरे निकट महत्त्व की बात है।मैं कहूँ कि कृतिकार या कवि जब सत्य से ऐसा भीतरी साक्षात करता है तब मानो वह एक बलि-पुरुष की तरह देवताओं का मनोनीत हो जाता है।और काव्य-कृति ही उस का आत्म-बलिदान है,जिस के द्वारा वह देवताओं से उऋण हो जाता है।यही देवता से उऋण होने की छटपटाहट वह विवशता है जो लिखाती है।" इस विवशता का ही प्रतिफलन है कि इस कवि की कविताएँ स्वाति की बूँद की तरह गहन विश्लेषण के बाद मोती बनकर पाठकों के सामने आती हैं।
              आज जहाँ देखो बाज़ार और पितृसत्ता का गठजोड़ दिखाई देता है।दोनों की जुगलबंदी आज का भयावह सच है।ऐसे समय में स्त्री के मानवीय सौंदर्य की अनदेखी हो रही है।बाज़ार ने स्त्री को सिर्फ़ देह तक ही सीमित कर दिया गया हो-
"प्यार माने स्त्री
स्त्री माने देह
यही है दर्शन
यही है दृष्टि
बाज़ार की।"
उस समय बाज़ार की इस दृष्टि को जितेन्द्र श्रीवास्तव जैसा संवेदनशील कवि न केवल देखता,बल्कि अपनी कविता "स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को " के माध्यम से स्त्री सत्ता को प्रतिष्ठित भी करता  है-
"इस प्रकार एक अपरिचित शहर में
असमय मृत्यु से बचाती रही
स्मृतियों में बसी एक स्त्री
स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को "
ये कवि समाज की सभी स्त्रियों को ऐसे गाँव में ले जाना चाहता है।जहाँ स्त्री पूरी तरह से मुक्त हो।जहाँ अब भी बचा  हो उत्सव जीवन का।जहाँ 
" गाती  हैं स्त्रियाँ नाचती हैं स्त्रियाँ
सुख की बनी-बनायी परिभाषाओं को बदलते हुए
जहाँ जीवन को मिलता है नया अर्थ
चलो उस गाँव चलें "
कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं में स्त्री मुक्ति और उसकी स्वतंत्रता की कामना सर्वत्र देखी जा सकती है।यही वजह है कि इनके यहाँ स्त्रियां अपने जीवन के तमाम फ़ैसले स्वयं करना चाहती हैं। हम जिस स्त्री को आँखों में नींद और देह में थकान लिए पूरे घर की जिम्मेदारी का बोझ उठाते देखते हैं।वह सही मायने में तीस की उम्र में सैंतालिस की चिंताओं की घर होती है।समाज में स्त्रियाँ कई रूपों में अपनी जिम्मेदारी को एक साथ निभाती दिखती हैं।दिन-रात काम में खपती ये स्त्रियाँ अपने होने को लेकर कई बार बिलखती हुई विधाता को कोसती हैं-
" वे भाग्य की बात करती हुई
हँसती हैं विधाता पर
कभी कोसती हैं विधाता को
कहती हैं जो विधाता स्त्री होता
तो सोचो सखि, कैसा होता !"
जिस समय समाज में लगातार स्त्रियों पर अत्याचार और शोषण बढ़ रहा हो।पैदा होने से पहले ही बच्चियाँ पेट में मार दी जा रही हों।उस समय ये कवि अपने भीतर एक स्त्री की आत्मा को लाना चाहता है,जिससे उनके सुख को महसूस कर सके-
"कहाँ से लाऊँ
अपने भीतर एक स्त्री की आत्मा!
वह भी एक ऐसे समय में
जब बच्चियाँ मारी जा रही हैं कोख में ही।"
इस कवि की चाह है कि स्त्रियों पर किसी तरह का भी बंधन न हो।वे कहीं भी जा सकती हों,किसी से भी कहीं भी मिल सकती हों,खुलकर खिलखिला सकती हों।मनुष्य के भीतर का जो सच पुतलियों में अटका रहता है,उसे आँख में आँख डालकर देख सकती हों।कवि ये मानता है कि आजकल की स्त्रियाँ खूबसूरत पहाड़ नहीं होती,जिसकी कोई मर्जी ही न हो।समाज में सारे अनुभवों को संजोकर रखने वाली अनेक स्त्रियाँ रमिया जैसी भी हैं।जो पितृसत्तात्मक सत्ता को ही अपने अंदर बैठाये रखना चाहती हैं।वे अपने आत्मबल और अदम्य साहस को पहचान नहीं पातीं।यही वजह भी कि वे उत्तर आधुनिक युग में भी उससे मुक्त नहीं होना चाहतीं-
" रमिया पुरुष को महान मानती है
पुरुष के बिना जीवन बेकार मानती है
मर्द को औरत के मन का लगाम मानती है
अपना सब कुछ उसी का
उधार मानती है रमिया
रमिया और भी बहुत कुछ मानती है
लेकिन
अपने अंदर घुसे पुरुष को नहीं पहचानती।"
प्रचलित लोककथा को आधार बनाकर कवि अपनी कविता 'सोनचिरई' के माध्यम से समाज की उस बुराई पर चोट करता है,जो समाज में व्याप्त अंधविश्वास और अज्ञानता पर टिकी खोखली परंपरा अभी भी समाज में बनी हुई है।समाज की ये अज्ञानता ही है कि स्त्री के माँ न बनने पर पूरा दोष उसी का माना जाता है। इस लोककथा के माध्यम से आधुनिक स्त्री विमर्श के पक्ष में खड़ा कवि स्त्री की महत्ता को प्रतिष्ठापित करता है-
"वह स्त्री थी
और स्त्रियाँ कभी बाँझ नहीं होतीं
वे रचती हैं !
वे रचती हैं तभी हम-आप होते हैं
तभी दुनिया होती है
रचने का साहस पुरुष में नहीं होता
वे होती हैं तभी पुरुष
पुरुष होते हैं।"
इनकी कविताओं ' धारचूला की छात्राएं','सोनमछरी', 'सपने में लड़की','क़स्बे में प्रेमिका,'घास गढ़ती औरतें','तुम कहाँ हो सुलेखा','लड़कियाँ','आभा चतुर्वेदी''सोनचिरई','पुकार','जनवरी की एक सुबह उठी तीन स्त्रियाँ','दुख का पहाड़','जो विधाता स्त्री होता','किरायेदार की तरह','सपने में एक लड़की सोनमछरी',राय प्रवीन',आदि में स्त्री संघर्ष और उसकी मुक्ति के अनेक रूप आपको देखने को मिल जायेंगे।
 कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं  की स्त्री 'जायज बातों में खुश और नाजायज़ बातों पर साड़ी खूंटिया कर लड़ने को तैयार दिखती हैं।इसीलिए ये कवि स्त्री की मुक्ति की लड़ाई  सुलेखा जैसी स्त्रियों के साथ लड़ना चाहता है।सुख के पक्ष और दुःख के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई में कवि कविता को हथियार बनाता है।क्योंकि
"कविता बताती है
जब डूबा जाता है पूरा का पूरा
 तब इतिहास बनता है
और इतिहास को कनखियों से नहीं देखा जाता।"
इस संग्रह की स्त्रियाँ अपने अंदर सुलगती हुई राख रखती हैं,जिसकी आग को समय और परिस्थितियों के अनुसार उपयोग कर सकें -
"घास गढ़ती औरतें
सोने से पहले सुबह के लिए
 बोरसी की राख में छिपा कर
रख देती हैं थोड़ी सी आग।"

किसी भी कवि की कविता का मज़बूत धरातल होता है लोक।लोक ऐसा तत्त्व है जिससे कविता कालजयी बनती है।विद्यापति,कबीर,सूर,तुलसी से लेकर त्रिलोचन,नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल आदि कवियों की कविताएँ शास्त्रों के पांडित्य प्रदर्शन की वजह से नहीं,बल्कि लोक चित्रण की वजह से कालजयी हैं।इसके लिए सबसे जरूरी है लोक को जानना,उसको जीना,उसको महसूस करके उनमें रचना-बसना।    

कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने लोक को जिया भी है और उसे भोगा भी है।यही वजह है कि इस कवि ने लोक को अपनी कविता में विस्तार दिया है।इनकी कविताओं में लोक केवल ग्रामीण जनमानस और उसकी संस्कृति तक सीमित नहीं है,बल्कि उसमें शहरी जनमानस भी शामिल है।जिनमें कहीं न कहीं लोक मौजूद है।हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक शब्द को विस्तार देते हुए उसे जनमानस से जोड़ा है-"लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है,जिसके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है।ये लोग नगर में परिष्कृत जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता की जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएँ आवश्यक होती हैं उन्हें उत्पन्न करते हैं।" जितेन्द्र श्रीवास्तव भी आचार्य द्विवेदी की तरह लोक विस्तार के हिमायती हैं।इसीलिए इस कवि की कविताओं में श्रम की आँच में तपे अनेक चेहरों से बना लोक का चेहरा आप स्पष्ट देख सकते हैं-
" यदि कोई देखना चाहे 
हमारे लोक का चेहरा 
वह देख सकता है
श्रम की आँच में तपे इनके चेहरे
इनके चेहरों पर
हमारी साँवली आभा के साथ
दिपदिपाता है हमारा लोक।"
लोक के ये चेहरे ही हमारी मिट्टी की पहचान हैं।ये ही हमारे विश्वास के सच्चे पहरुवे हैं।इनकी कविताओं में लोक-जीवन के विविध रूप सतरंगी आभा के साथ प्रतिबिंबित होते दिखते हैं।
इसकवि को लोक-जीवन से इतना लगाव है कि उसने धतूरा,भुट्टा,खुरपी,कुदाल,बँसला,बैल,कछार,बधुआ,बेना,नवान्न,लूंगी आदि अनेक लोक-जीवन से जुड़े शब्दों को लेकर कविताएँ रची हैं।
इनकी कविता में आया गवई पीढ़ा महज लकड़ी का टुकड़ा नहीं है बल्कि साम्प्रदायिकता का प्रतीक है।
 वह कवि की माँ की सबसे प्रिय किताब है।जिसमें माँ का जीवन संघर्ष और पिता के सपने जुड़े हैं।इनके यहाँ रामखिलावन और रामबचन भगत जैस सक्रिय देह वाले लोग भी हैं,जिनके लिए नींद उत्सव की तरह होती है। क्योंकि 'नींद बिछौने को नहीं,देह को आती है'।जो जानते हैं कछार को वो ऐसे कितने सक्रिय देह वाले किसानों के जीवन को जानते होंगे,जो बार बार बर्बाद होती फसलों के बाद भी ये मन नहीं हारते।बल्कि-
"तन-मन-धन से
धरती की कोख भरने में जुटे
ये किसान
हर बार बीज के साथ बोते हैं उम्मीद भी।"
सही मायने में कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव लोक-जीवन ,उसकी विडंबनाओं और सक्रिय देह के पक्ष में खड़े रहने वाले कवि हैं।यही वजह है कि ये कवि केदारनाथ सिंह की परंपरा के ज्यादा नज़दीक लगते हैं।केदारनाथ सिंह जी की कविताओं में आये लोक-जीवन से जुड़े अनेक शब्दों जैसे कुदाल,बोरसी आदि को अपने अलग रूप में आप इनकी कविताओं में भी देख सकते हैं।यदि एक तरफ केदार जी के सामने कुदाल के विस्थापन के दर्द से उठे कई सवाल हैं-
"अन्त में कुदाल के सामने रुककर
मैंने कुछ देर सोचा कुदाल के बारे में
सोचते हुए लगा उसे कंधे पर रखकर
किसी अदृश्य अदालत में खड़ा हूं
पृथ्वी पर कुदाल के होने की गवाही में
पर सवाल अब भी वहीं था
वहीं जहां उसे रखकर चला गया था माली
मेरे लिए सदी का सबसे अधिक कठिन सवाल
कि क्या हो-अब क्या हो कुदाल का
क्योंकि अंधेरा बढ़ता जा रहा था
और अंधेरे में धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था
कुदाल का क़द
और अब उसे दरवाज़े पर छोड़ना
ख़तरनाक़ था
सड़क पर रख देना असंभव
मेरे घर में कुदाल के लिए ज़गह नहीं थी।"
तो दूसरी तरफ कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कुदाल सोचती भी है और जरूरी सवाल भी करती है-
"प्रजातंत्र के मतदाता
और किसान की कुदाल में
होना ही चाहिए कोई मूलभूत अंतर
खेत की मेड़ पर खड़ी कुदाल
सोच रही है
और लोग चिंतित हैं
कि कुदाल सोच रही है।" समाज में यदि मजदूर और श्रमिक सोचने लगता है तो लोग चिंतित होने लगते हैं।ये तय है कि जो सोचेगा वही तो सवाल करेगा।सवाल करने वालों से सत्ता भी डरती है।ये कवि गवई खुशबू और उनके स्वाद को अच्छे से जानता-पहचानता है।इसीलिए वह कामना करता है कि फसल कटने से पहले सभी घरों में नवान्न का उत्सव होना चाहिए।इस संग्रह की कविता "भुट्टा "-
"मक्के की देह में
कमर में कटार की तरह
तनी है बाल।" केदारनाथ अग्रवाल की कविता "एक बीते के बराबर ठिगना चना" की याद दिलाती है।विकास की अंधी दौड़ ने शहरीकरण को बहुत बढ़ावा दिया है।ये शहरीकरण मनुष्य के मन के रसायन को कब बदल देता है पता ही नहीं चलता।उस रसायन बदलने से बहुत सारे बदलाव दिखाई पड़ते हैं।जिन लोक के शब्दों की उँगली पकड़कर भाषा को सीखकर दुनियाँ पहचानी।वही शब्द इस रसायन के प्रभाव से या तो गँवारू लगने लगते हैं या वो बिला ही जाते हैं।कवि इसी बात से दुःखी है कि-
"बहुत दिन हुए
किसी के मुँह से
नहीं सुना 'तरकारी'।"

कवि की चिंता वाज़िब है कि इस दौर में बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं लोक और कस्बों के हाव-भाव।बाज़ार के तंत्र ने सबको अपनी ओर आकर्षित किया है।जिससे यहाँ की संस्कृति में भी अपरिचय की भावना बढ़ती जा रही है-
"अब कस्बों में बहुत दिनों तक
चल नहीं पाता काम
विश्वास और भरोसे पर
अब वहाँ अपना अर्थ बदल रहे हैं मुहावरे
समा रहे हैं तेज़ी से बाज़ार के पेट में।"
गाँव और कस्बों से शहरों की तरफ आमजन का
पलायन करवाकर अब पूँजी और बाज़ार ने अपनी पैनी नज़र शहरों पर गड़ा रखी हैं।इस नज़र को ये कवि बख़ूबी पहचानता है।उसे डर है कि बाज़ार की चमक में अब शहर भी न बिला जायें-
"मेरे लिए यह विषाद की घड़ी है
इस समय ठकुआ गया हूँ मैं
वैसे कहाँ हैं आप !
जरा पलट कर देखिए
कहीं बिला तो नहीं रहा 
आपका भी शहर !"
आज पूँजी, बाज़ार और राजनैतिक गठजोड़ ने ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी है।इस व्यवस्था की भाषा में कहें कि मामूली से आदमी का समाज के हित में सोचना अपराध माना जाता है।ऐसे मामूली से आदमी को रघुवीर सहाय के रामदास की तरह मार दिया जाता है।कविता " वह जो चाहता था " रामदास की याद दिलाती है-
"कल हत्या हुई जिसकी बीचोबीच शहर में.....
वह चाहता था अपने और अपने जैसे लोगों के लिए
अँजुरी भर उजास
चेहरा भर लालिमा
आँख भर चमक
और होंठ भर मुस्कान।"
आज के समय में प्रेम की बहुत जरूरत है।प्रेम को लेकर इस कवि ने अनेक कविताएं लिखीं हैं।प्रेम के अनेक पहलुओं को इस संग्रह की कविताओं में देख सकते हैं।प्रेम करने वाले केवल प्रेम नहीं करते बल्कि एक-दूसरे को रच रहे होते हैं।क्योंकि जहाँ प्रेम है वहीं सृजन है-
"प्रेम करते हुए हमने जाना
प्रेम करते हुए लोग
रचते हैं कविताएँ एक-दूसरे में
एक-दूसरे का होना
उनकी कविता का पूरा होना है।" 
कवि ये मानता है कि प्रेम पर ही दुनिया टिकी है।दुनिया को बचाने के लिए हथियारों की नहीं प्यार की जरूरत है।क्योंकि विरोध के दिनों में प्यार की इच्छा बलवती हो जाती है।आज कबीर के "प्रेम न खेती ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।" को बाज़ार और पूँजीवादी गठजोड़ ने झूठा सिद्ध कर बिकाऊ बना दिया है।कवि इसी बात से चिंतित है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में लोग धीरे-धीरे भूलने न लगें कि प्रेम जैसी भी कोई बात होती थी।कहीं इस विकट समय में प्रेम गूलर का फूल न हो जाये-
"इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर चढ़ रहे समाज में
इससे बड़ी त्रासदी न होगी
कि प्रेम एक वर्जित फल बन जाए।"
इनकी कविताओं में आया प्रेम वासनाजन्य प्रेम नहीं है बल्कि ये प्रेम विश्वास,आस्था और समानता के सहचर से उपजा है।यहाँ आपको दाम्पत्य प्रेम के अनेक रूप देखने को मिलेंगे।इनकी कविताओं में आया प्रेम क्षणिकता का बोध नहीं है बल्कि वह जीव की अनवरत यात्रा की तरह है।जो दूर रहकर भी उसके अहसास को हमेशा जगाये रहता है-
"मैं तुम्हें पहचानता हूँ
अपनी हथेली की तरह
तुम्हारे माथे पर
उभर आयी रेखाएँ
मेरे हाथ की लकीरों जैसी दिखती हैं।"
जितेन्द्र श्रीवास्तव जितने अच्छे कवि हैं,उतने ही अच्छे आलोचक हैं।लेकिन न कवि में आलोचक हावी होता और न ही आलोचक में कवि हावी होता दिखता।बल्कि ये दोनों के दूसरे की उंगलियों को पकड़े एक एक दूसरे को संबल देते हुए साहित्यिक यात्रा करते हैं।
ये कवि भाषा के प्रति बहुत सजग है।कविता की पृष्ठभूमि और देशकाल के अनुसार ये अपने शब्दों को चुनते हैं।लोक से जुड़ाव के कारण उनकी कविताओं में लोक के शब्द वहाँ की गंध के साथ जाते हैं।अभिधात्मकता इनकी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है।ये अपने शब्दों पर विश्वास करने वाला है।
इस संग्रह को पढ़ने के बाद कह सकते हैं कि जितेन्द्र 
श्रीवास्तव उम्मीद और सपनों को जगाने वाले कवि हैं।

 कविता-संग्रह :- उजास
कवि :- जितेन्द्र श्रीवास्तव
प्रकाशक :- सेतु प्रकाशन,दिल्ली
संस्करण -2019
मूल्य :- ₹ 300
पेज़ :- 328


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ह्वाट्सएप : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Sunday, 8 November 2020

युवा कवि "गौरव भारती" की दस कोरोजीवी कविताएं : गोलेन्द्र पटेल


युवा कवि गौरव भारती की कुछ कोरोजीवी कविताएँ :-


१.

वापसी

___________

घर छोड़ने के बाद

घर लौटने का अंतराल 

साल दर साल बढ़ता ही गया


बहुत दिनों बाद

घर पर हूँ

पलट रहा हूँ एल्बम

और देख रहा हूँ हँसते खिलखिलाते चेहरे

लेकिन नहीं ढूंढ़ पा रहा हूँ अपनी एक भी तस्वीर

मैं नहीं हूँ इन तस्वीरों में कहीं

मेरा बिस्तर भी कैमरे की फ्रेम से बाहर है 

मेरी जुटाई स्मृतियाँ अनमने भाव से एक जगह पड़ी हैं


मैंने छोड़ा था घर

घर ने भी छोड़ दिया है मुझे

अपनी वापसी पर हैरान 

सोच रहा हूँ -

मैं कौन हूँ? 

कहाँ हूँ? 


२.

 तुम्हारे जाने के साथ ही नहीं मरा था मैं

________________________________


तुम्हारे जाने के साथ ही नहीं मरा था मैं

मैं मरता रहा धीरे-धीरे

सबसे पहले

मेरी भाषा मरी

फिर मरे मेरे सारे ख़्वाब

धीरे-धीरे

मेरी यादें मरी

इच्छाएं मरी

और फिर एक दिन 

मर गया मेरा शरीर |


३.
हॉस्टल के इस नियत कमरे में
पर्याप्त जगह है मेरे लिए
आसमानी दीवारें हैं
घड़ी है
बिस्तर है
किताबें हैं
सिर्फ़ नींद नहीं है
जिसे समेटने के लिए 
मैं सड़कें नापता हूँ... 

४.
वह किसी उपन्यास का नायक जरूर हो सकता है
_____________________________________
खिड़की
दीवार
किवाड़
और ख़ुद से निराश हो 
हर रोज़ 
जब सूरज ढ़ल रहा होता है
मैं अपने कदमों को सायास ठेल रहा होता हूँ
चाय-दूकान की ओर
जहाँ कई अपरिचितों के बीच एक चेहरा ऐसा है
जिसे मैं परिचित मान सकता हूँ
वह मेरी आदतें जानता है
मेरे स्वाद की पूरी खबर है उसे
मुझे खाँसता देख 
बढ़ा देता है अदरक की मात्रा मेरी चाय में

कभी-कभी
सुबह जागते ही 
चेहरे के बासीपन को धोकर
पहुँच जाता हूँ वहाँ
मैं देखता हूँ
उसे दूकान सजाते हुए
सोयी हुई सीढ़ियों को झाड़ू मारकर वह जगाता है
उसने सुनाई है मुझे
अपनी यात्राओं की कई कहानियाँ
जिसे सुनकर मुझे लगता है
अब वह देश का प्रधान न सही 
किसी उपन्यास का नायक जरूर हो सकता है... 

५.
माँ ने नहीं देखा है शहर
__________________

गुज़रता है मोहल्ले से
जब कभी कोई फेरीवाला
हाँक लगाती है उसे मेरी माँ

माँ ख़रीदती है
रंग-बिरंगे फूलों की छपाई वाली चादर 
और जब कोई परिचित आने को होता है शहर
उसके हाथों भिजवा देती है 

माँ ने नहीं देखा है शहर 
बस टेलीविजन पर देखती रहतीं हैं खबरें
सुनती रहती हैं किस्सा 
बड़ी-बड़ी इमारतों का 
लंबी-चौड़ी सड़कों पर चारपहिए की कतारों का
शहर से लौटा कोई आदमी
जब नहीं करता है बात 
आकाश, चिड़ियाँ, वृक्षों, घोसलों और नदियों की
उन्हें लगता है-
शहर में नहीं खिलतें हैं फूल
उगतीं हैं सिर्फ इमारतें यहाँ

६.
पिता
_________

इस साल जनवरी में
नहीं रहे मेरे पिता के पिता

उनके जाने के बाद
इन दिनों
पिता के चेहरे को देखकर
समझ रहा हूँ पिता के जाने का दुःख

दुःख, पसर गया है पिता की पुतलियों में 
जिसे देख कर भयभीत हूँ मैं
दुःख, उपस्थित है पिता की दिनचर्या में
जिसने साँझ की परिभाषा बदल दी है

मैं देखता हूँ
दीवार पर टंगी तस्वीरों को 
और सोचता हूँ-
मनुष्य संबंधों की एक श्रृंखला में जन्म लेता है
और उसी में मरता है
जगह का ख़ालीपन 
भरा जा सकता है सामानों से 
लेकिन मन की रिक्तता मनुष्य ही खोजती है ।

७.
याद
______

एक वक़्त के बाद
नींद नहीं आती
बस! तुम्हारी याद आती है

तुम्हारी याद में 
मैं गुड़हल सा खिलता हूँ
महुए सा टपकता हूँ
भरता हूँ नदी की तरह
और मोगरे सा महकता हूँ

तुम्हारी याद में 
चलता हूँ तुम्हारे साथ भींगते हुए
और बहुत प्यार से लेता हूँ 
तुम्हारा नाम

हाँ, तुम्हारे नाम का एक अर्थ है मेरे जीवन में
जहाँ से मैं परिभाषित हो सकता हूँ ।

८.
समय का शोक गीत 
_________________

बहुत उम्मीद से
मोबाइल को देखता हूँ
व्हाट्सएप्प खोलता हूँ
चेक करता हूँ मैसेंजर 
हो आता हूँ ईमेल के इनबॉक्स तक
दिनभर में कितनी ही बार

उम्मीद लिए जाता हूँ
इंतज़ार लिए लौटता हूँ

ख़ाली बैठे-बैठे सोचता हूँ
न जाने किस समय में फँस गया हूँ
कोई मुझ तक नहीं पहुँचता
न मैं ही ठीक-ठीक पहुँच पा रहा हूँ कहीं 

ख़ाली सड़क पर 
ख़ुद की चहलकदमी को सुनते हुए
झींगुरों को अपने क़रीब, बेहद क़रीब पाता हूँ
झींगुर गा रहा है 
समय का शोक गीत...

९.
मैं खुद को हत्यारा होने से बचा रहा हूँ
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बहुत ही लापरवाह रहा हूँ मैं
अपनी देह को लेकर
पहनने ओढ़ने का शऊर भी नहीं रहा कभी
मुझे ध्यान नहीं रहता 
कब बढ़ जाते हैं मेरे नाख़ून 
झड़ने लगे जब बाल
मुझे लगा, शहर मुझे चाट रहा है
आँखें जब हुईं कमज़ोर
मुझे लगा, धूल ने स्थायी जगह बना ली है मेरी पुतलियों में 
पहली बार जब लेटा हरी चादर पर ईसीजी के लिए
मुझे लगा, मेरी धड़कनों पर हवाई जहाज़ का असर है

मेरा जितना साथ शहर की तंग गलियों ने दिया
उतना साथ नहीं दिया मेरे जूतों ने
एक जैसी रंगी, बिछी हुईं सड़कें 
मुझे अक्सर गुमराह कर जातीं हैं

मैं नहीं लड़ता 
खाने के स्वाद को लेकर अब
नमक उठाकर 
छिड़क लेता हूँ कभी दाल में
कभी हल्का सा गर्म पानी मिलाकर 
खा लेता हूँ सब्जी
स्वाद के लिए लड़ना 
भूख का मजाक उड़ाना है
जिसकी इजाजत मुझे मेरा देश नहीं देता 

मेरी दुनिया हमेशा से बहुत छोटी रही
मैं नहीं संभाल पाता अधिक रिश्तें
हमारा समाज जो बहुत जल्दी किसी निर्णय पर पहुँच जाता है
उस समाज से मुझे कुछ ही लोग चाहिए
जो ठहरना जानते हों

जब भीतर शोर होता है
आदमी बहरा हो जाता है
और कई बार गूंगा भी
भीतर का शोर किसी और को सुनाई नहीं देता
शोर कैसा भी हो
उसे सुना नहीं समझा जाना चाहिए

सच कह रहा हूँ:
हम बहुत हिंसक होते जा रहें हैं
हमारी सभी इंद्रियाँ पहले से कहीं ज्यादा हमलावर हुईं हैं 
हर जगह उग आएँ हैं नाखून
ऐसे हिंसक समय में
लगातार कोशिश करते हुए
मैं खुद को हत्यारा होने से बचा रहा हूँ... 

१०.
शिकायतें
________

अब तो ज़माना नहीं रहा चिठ्ठियों का
लेकिन अब भी 
समय-समय पर
पढ़ने को मिल जातीं हैं
छोटे-छोटे काग़ज़ों पर 
लिखीं गईं तुम्हारी शिकायतें

तुम्हारी शिकायतें
फुटनोट्स की तरह
मेरा मार्गदर्शन करती हैं । 

©गौरव भारती



संपादक परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू~बीए}
संपर्क सूत्र :-
ईमेल : corojivi@gmail.com
मो.नं. : 8429249326

"हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य" {संपादक ~ आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल} / वक्ता : कवि मदन कश्यप + आचार्य ओमप्रकाश सिंह + प्रो.कमलेश वर्मा

सेतु प्रकाशन


  

"भौतिकता की पक्षधरता के आचार्य थे  हजारी प्रसाद द्विवेदी" मदन कश्यप


पिछले दिनों सेतु प्रकाशन के फ़ेसबुक पेज पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल जी द्वारा संपादित "हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य" नामक आलोचनात्मक पुस्तक पर एक व्यापक परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसके आयोजक व संचालन संस्था के सचिव व आलोचक अमिताभ राय जी थे। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में युवा आलोचक वाराणसी कमलेश वर्मा जी व जे०एन०यू० से हिंदी के विद्वान ओमप्रकाश सिंह जी व महत्वपूर्ण कवि मदन कश्यप जी थे। उन्होंने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि यह हमारे कार्यक्रम के  श्रृंखला की तीसरी कड़ी का महत्वपूर्ण आयोजन है। इसके श्रृंखला में हमने बाबूलाल की किताब व दूसरी श्रृंखला में कवि अशोक बाजपेयी जी की पुस्तक पर  इस तरह का आयोजन किया था। और यह हमारे श्रृंखला की तीसरी कड़ी है जिसमे हम आज श्रीप्रकाश शुक्ल जी द्वारा संपादित इस महत्वपूर्ण पुस्तक पर इन विद्वानों के बीच चर्चा व परिचर्चा कर रहा हूँ, और यह हम सबके लिए सुखद भी है।



उन्होंने बताया कि यह पुस्तक दस से बारह दिनों में छप कर हमारे पाठकों तक पहुंच जाएगी। पर इससे पहले सेतु प्रकाशन इस महत्वपूर्ण पुस्तक पर परिचर्चा करने हेतु प्रमुख विद्वानों को आमंत्रित किया है। आगे आने वाले समय मे हम और इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करते रहेंगे। इसके पहले आज आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य नामक पुस्तक पर परिचर्चा आयोजित हुई है। इस पुस्तक में अनेक महत्वपूर्ण विद्वानों के लेख संकलित हैं। जो कि परिचय पत्रिका के 2007 के विशेषांक से संवर्धित है। पर इसे इसका पुनर्प्रस्तुति न समझा जाए।

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संवाद की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शताब्दी वर्ष पर 'परिचय' पत्रिका ने अपना विशेषांक निकाला था इस पुस्तक में अनेक विद्वानों के लेख, निबंध आदि संकलित थे, जिसे संपादक ने अपने सार्थक शाब्दिक अभिव्यंजना के द्वारा इसे संवर्धित व ऊर्जस्वित करते हुए आगे बढ़ाया है। हम इस कार्यक्रम में इस किताब के माध्यम से यहाँ द्विवेदी जी पर चर्चा करने के लिए आज इकट्ठे हुए हैं।

वैसे द्विवेदी जी का महत्व हिंदी साहित्य में अनेक कारणों से रहा है, यह एक विशेष जो लोक के प्रति उनकी अखण्ड आस्था को दर्शाता है। और अगर आज की आलोचनात्म भाषा मे मैं बात करूं तो द्विवेदी जी आधुनिकता के सम्भवतः पहले आलोचक रहे हैं। इस पुस्तक में नित्यानंद तिवारी सत्तमी दुबे, शिवकुमार मिश्र, शंभूनाथ जी व खगेन्द्र ठाकुर के लेख हैं।

इस पुस्तक में द्विवेदी जी के व्यक्तित्व के साथ कृतित्व का जो महत्वपूर्ण है, उसे इसमें संजोया गया है। इसमे सत्रह निबंध हैं। इस तरह यह पुस्तक हम सभी पाठकों के लिए बेहद मूल्यवान है।

**************************प्रतम वक्ता के रूप में बोलते हुए श्री कमलेश वर्मा ने कहा कि जब यह पत्रिका छपी थी तो द्विवेदी जी मौजूद थे, और जब जब उनपर यह किताब छप रही है तो वे इस संसार मे नही हैं। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी आधुनिकता के पहले आलोचक हैं। उनको सांस्कृतिक परंपरा की पूरी जानकारी थी। आलोचना के मानदण्डों के पीछे उनका देशज होना है। जिन अर्थों में हम द्विवेदी जी के लिए यह पद इस्तेमाल करते हैं वैसा नही है। आप इस पूरी पुस्तक को सुरु से अंतिम तक देखेंगे तो पाएंगे कि  सांस्कृतिक परंपरा में उन शब्दों को प्वाइंट करते हुए इनके इर्द गिर्द जो निबंध है उनका विश्लेषण करते हुए जितने मात्रा में निबंध आये हैं शायद वो इन बातों की एक छोटी सी गवाही हो। यह किताब द्विवेदी जी का मूल्यांकन तो करती ही है और जिन पर पहले विचार हुए थे उन पर फिर विचार करती है और कुछ नए पक्षों को भी लेकर हमारे सामने आती है।

तो जाहिर सी बात है कि जब पाठक के हाँथ में यह किताब आएगी तो लगेगा कि कुछ हमने नया भी जाना है। व पुराने पक्षों पर पुनर्विचार नही करती बल्कि हमने नया भी कुछ जाना है।

इस तरह कुछ नए पक्ष व कुछ पुराने पक्ष ही इस किताब की खूबसूरती है।

श्रीप्रकाश जी ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि बनारस को और बीएचयू के हिंदी विभाग को और और उस विभाग में काम करने वाले लोगों को जिसमे श्रीप्रकाश जी खुद शामिल हो सकते हैं जबकि द्विवेदी जी तो खुद शामिल हैं ही

ये लालित्य बहुत है। इस पुस्तक में विभाग द्वारामें हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के लेखन लालित्य पर भी खूब चर्चा हुई है।

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जे०एन०यू० के हिंदी विभाग के प्रो० ओम प्रकाश सिंह ने अपने पहले वक्तव्य में ही इस जागतिक विषय पर अपना पक्ष रखते हैं और कहते हैं कि श्रीप्रकाश जी ने बड़े ही परिश्रम से इस किताब को तैयार किया है। क्योंकि जिस तरह से जागतिक व अन्य शब्दों को लेकर चौका

उसी तरह श्रीप्रकाश जी भी इन शब्दोँ  से चौके थे इसका प्रमाण उनकी भूमिका में भी मिल जाता है।

उनका जागतिक की बात जगत और जागृत के रूप में जुड़ता है। इस सन्दर्भित  उन्होंने पुस्तक की भूमिका लिखने पर श्रीप्रकाश की जम कर तारीफ भी करते हैं। और कहते हैं कि ज्यादेतर संपादक इससे भागते हैं। पर श्रीप्रकाश जी ने उन पक्षों को समूल रूप से उद्घाटित किया हैं

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस पपुस्तक में तीन तीन पीढ़ी के रचनाकार एक साथ सक्रिय हैं जो कि सुखद है ।

उन्होंने सूरसागर का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी रचनाकार के विवेचन व विश्लेषण के संदर्भ में लगातार नए पक्ष जुड़ते जा रहे हैं। इसी बीच वे द्विवेदी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर भी व्यापक चर्चा करते हैं। और कहते हैं कि आचार्य द्विवेदी का लेखन कार्य आलोचना में भी है और साहित्य के इतिहास में भी है, परंपरा में भी है, और उसके सांस्कृतिक साहित्य पर भी है और निबंधों में भी है। इस तरह वे कहते हैं कि शुक्ल जी द्वारा संपादित यह पुस्तक बेहद महत्वपूर्ण है जो द्विवेदीजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व का विश्लेषण करती है। उनके इस समय के रचनाकार के प्रभाव की सबसे बड़ी विशेषता है यह है कि हम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी व उनके साहित्य का जब भी मूल्यांकन में प्रवित्त होंगे और उनपर बात चीत करेंगे तो उसमें कुछ न कुछ नया जुड़ता जाएगा।

उन्होंने कहा कि परिचर्चा के इस क्रम में इस तरह कुछ न कुछ छूटता जाता है । और इस छूटन को समेट लेना ही संपादक का कार्य है। इस कार्य को श्रीप्रकाश जी ने किया है। लिए मैं उनको साधुवाद व बधाई देता हूँ।

आज जब आलोचना की पुस्तकें कम लिखी जा रही हैं तो ऐसे दौर में श्रीप्रकाश जी द्वारा इस तरह की पुस्तक पर कार्य करना बेहद महत्वपूर्ण है।

अपने वक्तव्य में समय के महत्वपूर्ण कवि मदन कश्यप जी ने कहा कि श्रीप्रकाश शुक्ल जी मेरे प्रिय कवि भी हैं। वे हमेशा कुछ न कुछ अलग करते हुए चौंकाते रहते हैं। इसी बीच उन्होंने उनकी एक कविता प्रधानमंत्री के नाम जनता का संदेश नामक कविता का भी जिक्र करते हैं। यहीं नही इस कोरोनाकाल मे लिखी जा रही कोरोजीवी कविता की सैद्धान्तिकी का श्रेय भी उन्ही को देते हैं।

इस तरह वे कहते हैं कि श्रीप्रकाश जी कोरोजीवी कविता की अवधारणा के जनक हैं। इस किताब के सन्दर्भों पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि किताब को पढ़ने पर मुझे लगा कि आचार्य द्विवेदी जी ने इसे जैसा समझा और श्रीप्रकाश जी ने उसे उसी हिसाब से रखा भी है। इस तरह वे जगत और जागृत दोनों के अर्थ को लेते हैं। इसी बीच वे अपने गुरु आलोक शास्त्री जी के संदर्भों को रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि कोई भी शब्द पर्यायवाची नही होता हर शब्द का अपना एक अलग अर्थ होता है। संसार, विश्व और जगत ये तीनों ही पर्यायवाची हैं लेकिन सांसारिकता इसका एक दूसरा अर्थ है और वैश्विकता का भी एक अलग अर्थ है। और जागृत का तीसरा और एक अद्भूद अर्थ है। बल्कि इस पर चर्चा करने के पहले वे आचार्य द्विवेदी जी के दो किताबों पर चर्चा करते हैं, देश परदेश'  और दूसरी परंपरा की खोज इस तरह व कहते हैं कि एक सांसारिक आचार्य के रूप में द्विवेदी जी का जो व्यक्तित्व है। उसे सबसे पहले विश्वनाथ त्रिपाठी जी रखते हैं और उसके माध्यम से उनके विचार यात्रा तक चलते हैं।

उन्होंने कहा कि ठीक इसके पहले नामवर जी उन्हें एक वैश्विक आचार्य के रूप में मान्यता दी है।

इस तरह सिर्फ द्विवेदी जी के जीवन है नही बल्कि उन परंपरा, आलोचना की बात करते हैं।और ये जो जागतिक शब्द की अर्थ अंतर्निहित हो जाते हैं।

जागतिक वह है जो सांसारिक भी है और वैश्विक भी द्विवेदी जी ने अपनी इस भूमिका में बहुत ही सम्पूर्णता में लिया है। और लेखन को समझने के लिए बहुत सारे श्रोत निकाले हैं। जिसे श्रीप्रकाश जी ने भी निकाला है। उनके लेखन के आधार पर विस्तृत चर्चा उन्होंने अपनी भुमिका में किया है। जिसका जिक्र ओमप्रकाश जी भी करते हैं। आचार्य द्विवेदी जी भौतिकता की पक्षधरता के वे आचार्य थे और भारत की आध्यात्मिक परंपरा व सांस्कृतिक परंपरा का जितना गहरा ज्ञान उन्हें था उतना हूत कम लोगों के पास है।

 था वे भौतिकता के पक्षधर भी रहे हैं। और उन्होने कयी बार कहा भी है जिसका विस्तार इस भूमिका में भी मिलता है।

इस तरह सौन्दर्य की सुंदरता की नई व्याख्या जो संघर्ष की अवधारणा में निहित है।

यहाँ वे समाज व व्यक्ति के सन्दर्भों पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि समाज व व्यक्ति का सच एक जैसा होना चाहिए।

लेकिन द्विवेदी जी ने उसको कैसे समझा था उसे श्रीप्रकाश शुक्ल जी ने अपनी भूमिका में लिखा है  कि व्यक्ति मनुष्य और समष्टि मनुष्य  दो रूपों के माध्य्म से

व्यक्ति और समाज के अंतर्संबंधों को भी नहीं समझा है। उसकी व्यापकता को अवधारणा के भीतर समेटने की जो कोशिश द्विवेदी जी ने की है।उसकी शुक्ल जी ने अच्छे से व्याख्या की है।

दूसरी चीज यह कि यह भारतीय परंपरा पूर्णतः आध्यात्मिक परंपरा है। द्विवेदी जी बार-बार उससे सामंजस्य बैठाते हैं। इस पक्ष का भी विश्लेषण शुक्ल जी ने दो से तीन पैरा में ही इस पुस्तक में किया है।

जिसे मदन जी खुद महत्वपूर्ण मानते हैं। इस भूमिका में कुछ काट भी है जैसे अविछिन्नता कि अवधारणा जिसमे जाहिर है कि अविछिन्नता का मतलब समग्रता भी है। और अपनी तरफ से इस अवधारणा की  व्याख्या भी जो द्विवेदी जी के पक्ष से एक अपनी नई व्याख्या शुक्ल जी ने इस पुस्तक में की है।

इसी बीच वे द्विवेदी जी के महत्वपूर्ण वाक्यों को भी दुहराते हैं। जैसे मंत्र वेद होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है आत्मवेद होना।

इससे पता चलता है कि उस पूरी कर्मकाण्डी परंपरा के बूते वे खड़े होते हैं इस तरह इंशानी चीजों को देखने के लिए श्रीप्रकाश जी ने अपनी भूमिका में अच्छा लिखा है। कि वे संस्कार से परंपरावादी और मन से आधुनिक थे यह द्विवेदी जी को समझने के लिए महत्वपूर्ण सूत्र है। इस तरह वे आधुनिकता व परंपरा के माध्यम से द्विवेदी जी को समझा जा सकता है।

वे कहते हैं कि आत्मवेद में चैतन्य है, जागरण है और मंत्रवेद में कर्मकांड है 

जहाँ द्विवेदी जी मष्तिष्क के साथ रीढ़ के होने की बात करते हैं जो आज के संदर्भों में ज्यादे जरूरी भी है।

इस तरह वे कहते हैं कि ज्ञान के साथ साहस का होना जरूरी है।

श्रीप्रकाश जी लिखते हैं कि ठंढ से नही मरते शब्द मर जाते हैं साहस की कमी से

इस तरह उन्होंने इस पक्ष को जोड़कर उसे परंपरांगत चिंतन विचारों से जो मध्ययुगीन विचारों वाले लोग हैं उनसे बिल्कुल अलग आधुनिक विवेक से ज्ञान को जोड़ा है। जिसमे ज्ञान का उपयोग परंपरांगत ज्ञान में परिवर्तन व बदलाव किया जाना अपेक्षित है।

इस तरह इस भूमिका को पढ़ने से लगता है कि  इस भारतीय संस्कृति एवं परंपरा व द्विवेदी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व को समझने के लिए यह पुस्तक महत्वपूर्ण है।

वे कहते हैं कि मैं इस पुस्तक की भूमिका के इस पक्ष को देख रहा हूँ कि यह एक ऐसा पक्ष है जिसमे हम उनके जटिलता के साथ-साथ भारतीय सांस्कृति की जटिलता को भी समझने की एक  खिड़की खोलती है। इस प्रकार से हम पाते हैं कि इस पुस्तक पर उन्होंने काफी परिश्रम से उपयोगी कार्य किया है। मैं इस  महत्वपूर्ण कार्य के संपादन हेतु उन्हें साधुवाद व बधाई देता हूँ।

इसी बीच वे सेतु प्रकाशन की प्रकाशकीयता पर भी विस्तार में प्रकाश डालते हैं और तारीफ भी करते हैं। और कहते हैं कि सेतु प्रकाशन के लिए यह पुस्तक आलोचना के रूप में सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक होगी।

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बतौर संपादक के तौर पर अपनी बातों को निष्पक्ष रूप से रखते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल जी ने कहा कि कमलेश जी ने बहुत ही सार्थक वक्तव्य दिया, और आदरणीय ओमप्रकाश जी ने सुचिंतित वक्तव्य दिया और मदन कश्यप जी ने बहुत ही व्यवस्थित वक्तव्य दिया। इस प्रकार सार्थक, सुचिंतित व व्यवस्थित इन तीनों विद्वानों के वक्तव्य के उपरांत मेरे लिए कुछ भी कहना कठिन है। इसी बीच वे आयोजन के सचिव अमिताभ जी का व संस्था के प्रति अभवादन व आभार प्रकट करते हुए कहते हैं कि उन्होंने इस कोरोनाकाल मे भी इस पुस्तक पर प्री बुकिंग परिचर्चा जो पश्चिम की बुक लॉन्चिंग सेरेमनी आय कह सकते हैं जो कि जोड़ा उन्होंने इसके बाद पुस्तक प्रकाशित होगी इसपर फिर चर्चा भी होगी इसके पूर्व और हम इस पुस्तक के बारे में बार-बार सुनेंगे जानेंगे इसके पूर्व हम इस विद्वानों की टिप्पणियों के माध्यम से हम इस पर जानेंगे।

उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी की इस पुस्तक का संपादन 2007 में उनकी शताब्दी वर्ष के अंतर्गत हुवा था, इस तरह यह एक ऐतिहासिक पत्र है। जी शांतिनिकेतन से शिवालिक तक उनके षष्ठ  कुर्ति पर 1967 में प्रकाशित हुई थी और परिचय का यह विशेषांक 2007 में उनके शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित हुवा था। जी कि यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष का विषय है की सेतु प्रकाशन इस पुस्तक का प्रकाशन कर रहा है तो उस हिंदी विभाग का शताब्दी वर्ष भी है जिस हिंदी विभाग में द्विवेदी जी कभी कार्यरत थे। और इसी में मुझे वर्तमान में सेवा करने का अवसर मिला है।

कुल मिलाकर शांतिनिकेतन से शिवालिक तक के1967 से लेकर परिचय 2007 के प्रकाशन से होते हुए 2020 तक के इस सफ़र की जो तिथियाँ हैं इन तिथियों का अपना महत्व रहा है।

आचार्य द्विवेदी जी की चर्चा तो पुस्तक आने के बाद आगे भी होती रहेगी पर मेरी कोशिश ये रही है कि तब और अब भी कि द्विवेदी जी के सभी पक्षों पर कुछ न कुछ यहाँ पर जरूर राखूं जिससे शोधार्थियों शिक्षकों और छात्र-छात्राओं को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाया जा सके। सर्जक और लेखक तो लाभान्वित होते ही रहते हैं।

आगे वे कहते हैं कि द्विवेदी जी बहुत ही शुद्ध व मेधी लेखक रहे हैं। पर किसी कारण से बहु- विधात्मक लेखन भी किये हैं। जैसे आलोचना, निबंध, कविता, जयोतिष आदि बहुत सारी विधाएं, इस तरह उनके व्यक्तित्व को देखा जाए तो जाहिर सी बात है कि इनकी एक-एक विधाओं पर बड़ी से बड़ी चर्चा हो सकती है।

इस पुस्तक में  कुल 28 अठ्ठाईस लेख हैं कहीं भूमिका को छोड़कर के और उआँ 28 लेखों ने निश्चित रूप से बहुत सामग्री ऐसी मिलेगी जो द्विवेदी जी पर अबतक उपलब्ध नही हो पायी है।

 वे यह भी कहते हैं कि परिचय पत्रिका का जो विशेषांक आया था, उसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ सामग्री इसमे जोड़ी गई है। जैसे काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग तथा बनारस का उनसे अन्तर्सम्बन्ध खासकर उनके कार्यकाल में विभाग से जुड़े प्रसंग आदि उसे भी जोड़ा गया है।

इस तरह द्विवेदी जी के शांतिनिकेतन से शिवालिक तक कि यात्रा व फिर बनारस वापसी व अन्यान्य अंतर्संबंधों पर भी व्यापक चर्चा की गई है।

उन्होंने यह भी कहा की जब मैं 2005के बनारस बीएचयू में आया तो उसके तुरंत बाद मेरी मुलाकात  हजारी प्रसाद द्विवेदी जी से हुई, उसके बाद मेरी प्रगाढ़ता बढ़ती ही गयी और उनके प्रति मेरा रुझान भी बढ़ता गया। उसका एक कारण यह भी था कि वे मुझे अत्यधिक स्नेह भी देते थे। इसी बीच वे ।जूझे अपने घर भी ले गए इस तरह वे द्विवेदी जी के साथ बिताए पल के तमाम संस्मरणों को भी सुनाते हैं।

और कहते हैं कि मेरे मन मे द्विवेदी जी के प्रति पहला व्यवस्थित रूप से सुरु करने का विचार  मुकुंद जी के संपर्क में आने के बाद हुवा, ख़ासकर एक बात जो मेरे मन मे बार बार उठती है कि बनारस में सबकुछ है बीएचयू आचार्य शुक्ल शोध संस्थान लेकिन इस बात को लेकर मुझे पीड़ा होती रही कि आचार्य द्विवेदी जी को लेकर कोई भी संस्थान यहां नही है।

सोचता हूँ कि जो व्यक्ति जीवन के जागतिक पक्ष पर जीव जगत व प्रकृति व मनुष्य के संबंधों पर संघर्षों पर बराबर सोचता रहा उस पर पूरे बनारस में कोई हलचल नही थी। इसी बात को लेकर जो मेरे मन मे बात उठी उसी को लेकर मैन एक भूमिका लिखी है। और मैन कोशिश भी की है उसमे उनकी पीड़ा को भी मैंने लिखी है। 

वैसे उसकी भूमिका थोड़ी लंबी है पर आप पुस्तक को पढ़ेंगे तो बहुत कुछ पाएंगे।

वे यह भी कहते हैं कि मेरा इस महान पुस्तक पर लिखने का कोई महान इरादा नही था और आज भी नही है, पर आज जो पुस्तक सेतु प्रकाशन से आ रही है इसमे आपको कुछ नई चीजें मिलेंगी। इस तरह वे चर्चा करते हैं कि मुझे शीर्षक को लेकर जो सूत्र मिला वो मुझे इस तरह द्विवेदी जी पर कुछ अलग ही सोचने के लिए बाध्य किया जिसे चिंतन के दौरान मुझे इस पुस्तक के शीर्षक को लेकर सूत्र मिला।

इस तरह यह द्विवेदी जी पर साधारण तरीके से उनके असाधारण व्यक्तित्व के बारे में सोचने की मैंने कोशिश जरूर की है और इतना विशाल व्यक्तित्व है आचार्य द्विवेदी व आचार्य शुक्ल जी का कि हम लोग कहीं से सुरु करेंगे तो पहुंचेंगे उन्ही के यहाँ।

इस तरह की जो समस्याएं हैं या जो भिन्नताएं हैं उनपर कोई नही जानता पर उनके जागतिक पक्ष पर सोच रहा था कि द्विवेदी जी के बारे में में जो उनकी पुस्तक लालित्य तत्व है, तो लालित्य तत्व में उनका एक वाक्य आता है जिसे वहीं से आरंभ किया था मैंने जब वो लालित्य तत्व पढ़ा था लेकिन मुकुंद द्विवेदी से जब मेरी बात होती थी तो लालित्य तत्व पर होती थी क्योंकि उन्होंने मुझे इसकी पूरी सूची दी थी।

1936 में आचार्य द्विवेदी जी की पहली पुस्तक सूर साहित्य प्रकाशित हुई थी वहां से लेकर लालित्य तत्व की पूरी सूची मुझे दी थी और मुझसे कहते थे कि द्विवेदी जी को समझना ही तो क्योंकि वे जसनते थे कि मैं कविताएँ लिखता हूँ  और मैं बनारस में आ गया हूँ।  क्योंकि इसके पूर्व मैं यहां नही था उनसे इतना संपर्क भी नही था अतः वे कहते थे कि आप लालित्य तत्व को पढ़िए क्योकि उससे आपके कवि मन को प्रेरणा भी मिलेगी।और द्विवेदी जी को समझने की पूँजी भी।

उनके इस वाक्य पर मेरा ध्यान गया। जब पढ़ना सुरु किया था तो 2006 के आस पास आज के करीब 14 वर्ष पहले उसमे एक वाक्य आता है कि स्थूल जगत को छोड़कर मनुष्य जी नही सकता और अपने देशकाल की सीमाओं से अस्पृश्य रहकर कोई शिल्प सृष्टि नही कर सकता।

अब ये अस्पृश्यता जगत को छोड़कर कोई मनुष्य जी नही सकता क्योंकि इसमें जो जगत की स्थूलता है, ये द्विवेदी जी के यहाँ बार-बार अति है। उनके उपन्यासों में भी आती है और निबंधों में भी आती है। तो ये जो जगत है असल मे  इसमे जगत के व्यापने का भाव ही समाहित है। और वहीं प्राणी जगत अगर है तो उसमें गति अवश्य है। इस तरह गति को छोड़कर के जगत को नही समझा जा सकता , ये समझ मेरी दद्विवेदी जी को पढ़ने व पढ़ाने की प्रक्रिया में ही बनी है और वहीं मेरी इस पुस्तक 'आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य' पुस्तक की प्रेरणा स्रोत रही है। और इसमे तुलसी की याद का आना स्वाभाविक है कि सबसे भले विमूढ़......जनहिं न व्यापति जगत गति।।

अब जो जगत गति है यानी कि तुलसी जी शुक्ल जी के साथ द्विवेदी जी के भी प्रिय रहे हैं। तो जगति गति की जो व्यपकता है यानि कि जगति नही जगत गति की जो व्यापकता है यह द्विवेदी जी के यहाँ तुलसी जी के माध्यम से जिस तरह से आई और उसके पीछे की जो परंपरा है, तो जिनहिं न व्यापहिं जगत गति में मुझे जिस प्रकार जगत के गति की सम्भावना दिखाई देती है। वो मुझे बडी नयी दृष्टि लगी थी। द्विवेदी जी को पढ़ते समय....! और जिसमे गति की गूंज हो तो मैंने साफ-साफ सुनने की कोशिश की है। क्योंकि गति के बगैर ये जो जगत है, रूढ़ है या रूढ़ हो जायेगा, ठहर जाएगा इसकी समझ मुझे द्विवेदी जी की रचनाओं से मिली। वे बार-बार लिखते हैं कि मानवी आदान-प्रदान इन्हीं जागती प्रपंचों के बाद चलता है। अब ये जागतिक प्रपंच है मानवीय व्यापार यहीं जगत गति है। ये बार-बार द्विवेदी जी के यहां दिखाई देता है। यहीं से द्विवेदी जी की सबसे बड़ी व्यवस्थित समझ है। कि पश्चिम की भारत व्याकुल आध्यात्मिकता को अपनी रचना में रखते हैं और सम्बंधों को वे समझने की कोशिश वे करते हैं। और भारत के सांस्कृतिक व्यवस्था के  भारत निर्माण को समझने की कोशिश करते हैं।

आप उसमे व्यवस्थित चित्त की बात देखिए कि जगत में गति आई और गति में समष्टिगत चेतना है। तो जगति गति के माध्यम से समष्टिगत चित्त की ओर हमेशा अग्रसर होता रहता है

 और यह जोवैज्ञानिक शब्दावली है ये जो समष्टिगत चित्त है उसमें भारतीय मनीषा काम जिसे मैं कहता हूँ कि यह सामान्यकोटि है और यहीं से जो है जिसका माध्य्म से सामान्य मनुष्य अपना समूल तत्वों का विकाश भी करता रहता है। इस तरह यह जागतिक शब्द से जागतिक में बदला जा सकता है। लेकिन ये मुझे जागतिक शब्द का प्रयोग उनकी रचनाओं में दिखाई दिया। इस तरह मैं जो सोच रहा था द्विवेदी जी वे ही सोच रहे थे। इस प्रकार उनके सोचने व मेरे सोचने 

में एक खास दृष्टि का अंतर नही था।

इसी बीच वे उनके निबंध अशोक के फूल से संकलित भारत मे वर्ण की सांस्कृतिक समस्या पर भी चर्चा करते हैं। और कहते हैं कि इस जागतिक व्यवस्था ने जनता को उदासीन बना दिया है। यह शुद्ध वाक्य है जो भक्तिकाल को समझने का आधार देता है। ये जो जागतिक शब्द का सर्वाधिक संकेत या प्रयोग द्विवेदी जी ने किया है ऐसा भारत की सांस्कृतिक समस्या में दिया है।

ये जो जगत है, मनुष्य है उसके साथ जो प्रकृति है मनुष्य व प्रकृति के संघर्ष में उस सौन्दर्य का सृजन होता है। जिससे इस साहित्य का स्वर कहीं न कहीं शामिल रहता है।

क्योंकि यहां पर जगत भी है, विवेक भी है और बोध भी..!

द्विवेदी जी इस जगत के माध्यम से वे जगत का ही बोध नही कराते बल्कि विवेक और वैराग्य की भी बात करते हैं।

इस तरह द्विवेदी जी केवल जगत के जागतिक बोध प्रबंध की बात करते हैं। जिसे समझने की ही बात नही करते, वे कहते हैं कि बोध हो गया तो विवेक आयेगा, जो आधुनिक चेतना है उसके बाद वैराग्य आएगा, को आगे की जितना है आधुनिकता का जो परिष्कृत रूप है

इस प्रकार मैं कहना चाहूंगा कि द्विवेदी जी का जो व्यक्तित्व था ओ कबीर के विद्रोह व सुर के प्रेम और तुलसी के ऐश्वर्या से भी बना हुवा है। उसमे मानव जीवन में जो मिश्रण था वे इन्हीं रचनाकारों के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं।📚✍️

प्रस्तुति : मनकामना शुक्ल 'पथिक'

संपादक संपर्क सूत्र :-
ईमेल : corojivi@gmail.com

मो.नं. : 8429249326

Friday, 6 November 2020

"महामारी में मदन कश्यप' : श्रीप्रकाश शुक्ल" / प्रस्तुति : गोलेन्द्र पटेल {भाग-३}

"महामारी में मदन कश्यप' : श्रीप्रकाश शुक्ल" 

भाग-१

https://golendragyan.blogspot.com/2020/11/blog-post_3.html

भाग-२

https://golendragyan.blogspot.com/2020/11/blog-post_4.html



 भाग-३:


एक कवि के रूप में ही मदन कश्यप कह सकते हैं कि 

"जब आदमी

उम्मीद से

आसमान की ओर

देखता है


तब

इस धरती का रंग

बदलने लगता है।"


यह कितनी ताकतवर पंक्ति है। कोई भी इम्पूनिटी इस कविता का विकल्प नहीं हो सकता है। इसी नाते वैचारिक लोगों की जो इम्पूनिटी होती है , वो किसी भी सामान्य नागरिक से जादे समृद्ध होती है साथ ही महत्वपूर्ण होती है। इस कोरोनाकाल के इस आपदा के समय में एक कवि के रूप में मदन कश्यप की भूमिका कुछ ऐसी ही रही है।और यहाँ कहना चाहता हूँ कि महामारी के बीच कविता के भूमिका के बारे में मेरे सोचने की शुरुआत भी इन्हीं से होती है।


मार्च २०२० में जब लाकडाउन हुआ और कोरोना की महामारी एक विकराल रूप लेने लगी , तो मदन कश्यप को छोटी-सी कविता , जिसे कोरोना त्रिपदी के रूप में उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था तो मुझे(शुक्ल जी) पढ़ने को मिली। और ये तीन पंक्तियां मेरे इस पूरे व्यख्यान श्रंखला का मूलाधार रही हैं। ये पंक्तियां मुझे मार्च से नये तरिके से सोचने के लिए प्रेरित किया और मैं(शुक्ल जी) नयी दिशा में सोचने की कोशिश करने लगा। जो निम्नलिखित हैं :- 


"वह एक तुम्हारा स्पर्श ही तो था

कि जिससे होती थी ईश्वर की अनुभूति

इस कोरोना ने मुझे निरिश्वर बना दिया।"

-मदन कश्यप


रविदास जैसे व्यक्ति जब निरिश्वर होते हैं तो क्या उस निरिश्वरता के पीछे उनकी समसामयिकता या उनके युग का कोई असर था क्या? ईश्वर से उम्मीद हर युग में रही है। और  निरिश्वरता भी एक तरह का समकालीन दबाव भी है।क्योंकि युग ने अपने समय में एक अपने ईश्वर बना लिया। और जब उस ईश्वर को लड़खड़ाता हुआ देखा। मानव हित में बिखरता हुआ देखा तो कवियों ने कहीं न कहीं उसे प्रश्नांकित करने की कोशिश की है।


इसका मतलब व्यक्तिगत आस्था थी कि नहीं थी।वह मुद्दा ही नहीं है। मुद्दा ये है कि सामुहिकता में जो चिंतन विकसित हो रहा था। उसका निरिश्वरता से क्या संबंध था अपने युग के आपदा और महामारी को लेकर के। मैं यह महसूस किया कि अपने समय में आपदा और महामारी के दबाव में हर युग में कवियों , रचनाकारों ने ईश्वर को प्रश्नांकित हैं।यही कारण था कि रविदास से लेकर के तुलसीदास से होते हुए। प्रेमचंद से होते हुए और मदन कश्यप तक की लम्बी श्रृंखला पर मैंने(शुक्ल जी) व्यख्यान दिया है।संभवतः उस महामारी शृंखला का यह आठवां व्यख्यान है।बगैर इस दबाव के कवि अपने निजी के स्वर को नहीं पा सकता था।



और वह संभव नहीं था। संत कवियों की जो निरिश्वरता एक नये कवि के साथ हमारे युग में अचानक पूरे आवेग से फूट पड़ी है।और लगा की मदन कश्यप की इस छोटी सी कविता ने बीच के इस ५०० साल के अंतराल को लगभग बाट दिया है।यहाँ पर मुझे मदन कश्यप की कविताओं के भीतर से "एक व्याकुल संत की वाणी की फूटने का अहसास हुआ।" जिसका प्रमुख आधार यह  समझ ही है कि जीवन आनंद की तलाश नहीं है। जीवन महज आनंद की तलाश नहीं है बल्कि पीड़ा का अनुभव है। यह पीड़ा का अनुभव ही मदन जी को रविदास से जोड़ता है।


जिसे चिंताधारा हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में "चिंताधारा मानवीय चिंताधारा का स्वभाविक विकास कह सकते हैं।" तो रविदास की जो यह पीड़ा थी। उस समय की पीड़ा थी। मदन कश्यप में भारतीय चिंताधारा का स्वाभाविक विकास के रूप में यहाँ पर दर्ज कर सकता हूँ। इन्हीं के भीतर से मैंने(शुक्ल जी) कोरोजीवी कविता की कुछ सूत्र तलाशने की कोशिश की है। जो "आजकल" के  नवम्बर अंक में प्रकाशित है। 


मदन कश्यप ने २०१५ में "इबोला" महामारी को संदर्भित कर एक कविता लिखी है "नाम' की कविता"। जिससे यह पता चलता है कि ये अपने समय के आपदा को लेकर ये शुरू से ही सचेत रहे हैं। आरंभ से ही ये ऐसे ही कवि हैं। महामारी पर कविता लिखना महामारी का अनुवाद भर नहीं है। बल्कि महामारी का गहरा अहसास भी है। जहाँ से सबसे अधिक बदलते सामाजिक संबंधों का पता चलता है। तो बदलते सामाजिक संबंधों का पता चलने का जो बौद्धिक विकल्प रचते हैं मदन कश्यप अपनी कविताओं में , वह इन्हें एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में हमारे सामने समोपस्थित करता है।


और इन बदलते सामाजिक संबंधों ने मनुष्य का रिश्ता न केवल परिवेश व व्यवस्था से बदलता है बल्कि अपने पड़ोस के ईश्वर से भी बदलता है। और कह सकते हैं कि हर महामारी संबंध टूटने की भयावहता का अहसास लेकर आती है और टूटने में ईश्वर से भी रिश्ता टूटा ही है और अपनों से भी।कई रिश्ते ऐसे टूटती है कि जहाँ धैर्य धारण करने की जरूरत है , वहाँ लोग धमकाने लगते हैं।


अब समस्या यह है कि हम कहे आप धैर्य रखिए , आप धमकाएं। बीच में कोरोना है। कोई करे क्या? तो उसमें दोष भी किसी का नहीं है। बगल का आदमी चाहता है कि मैं आऊं , मेरा भय है कि मैं कैसे जाऊं , बीच में कोरोना फैला है।स्थिति इतनी भयावह हो चूकी है कि हम ईश्वर से संबंध तोड़ते ही हैं। कहते हैं सब बेकार हो गया ,खुद क्वारंटाइन हो गए ईश्वर , मुँह छुपाकर के मंदिर में बैठा हुआ है। तो हमारा भला क्या करेगा?


लेकिन सबसे जरूरी यह होता है। पड़ोस से रिश्ते टूट जाते हैं। ऐसी महामारी की जो विकरालता है , वह पड़ोसी से रिश्तों के टूटने में है। सब संकट में होते है और हम कुछ नहीं कर पाते हैं। ऐसे में कवि चूकी संवेदनशील होता है वह अपने पड़ोस के बारे में सोचता है। अपने ईश्वर के बारे में सोचता है।अपने बहुत कुछ के बारे में सोचता है। ऐसे में जो कवि की मुखरता होती है। वह अपने व्यक्ति के ऊपर उसका गहरे आत्मविश्वास में रूपांतरित हो जाती है।


खुद पर भरोसा उसका बढ़ता है। खुद पर भरोसा करना वह सीखता है लेकिन इसी के भीतर जब वह खुद पर भरोसा करता है तो उसकी रचनात्मकता भी अंकुरित होने लगती है।जहाँ एकांत भी होता है।चुप्पी भी होती है लेकिन इसी के भीतर जिंदगी के स्वर भी फूटते हैं। संवेदनशील कवि , लेखक व रचनाकार संबंधों के टूटने पर विचार करते हैं।जबकि सामान्य आदमी टूट जाता है। महामारी का एकांत हर कवि के लिए अनेकांत से जुड़ने का एक विकल्प लेकर आता है।


आवाजों को सुन पाता है जो अन्यथा सुनाई नहीं देती थी। या देती है। यह सब केवल कवि की अनुभूति की बात होती है कि वह जीवन की खोए हुए सत्व वापस ला पाता है और हर अमानवीय मानव व्यवहारों को रेखांकित कर पाता है। मदन कश्यप का कवि भी यही करता आया है। नाम की कविता :-

"इस महामारी का नाम इबोला क्यों?

वाइट हाउस या पेंटागण क्यों नहीं?

जहाँ से फैलती है 

दुनिया की तमाम बड़ी महामारियां।"

-२०१५


इबोला एक सुंदर नदी है।जिसे एक वायरस क्यों कर दिया? "कोरोना" लैटिन शब्द है जिसका मतलब है 'हार' या 'मुकुट'।इसी से बना है "कोरोनेशन" जिसका मतलब है 'राज्याभिषेक'।


उक्त कविता यह कहना चाहती है कि महामारियों के नाम के पीछे भी एक गहरी वैश्विक राजनीति होती है। जिसे एक कवि ही पहचानता है और यह कवि ही कह सकता है कि "नाम" से हम किसी को पहचान नहीं दे रहे होते । बल्कि उसकी उपयोगिता को पहचान रहे होते हैं। यह किसी महामारी का सबसे महत्वपूर्ण एक्सरे  है।इसे एक कवि के रूप में मदन कश्यप ने लक्षित किया है। असल में आँकड़ों के महासागर में टैजटी की पहचान है और उससे बाहर आने की कठिन कोरोजीवी कोशिश है। यही एक कवि का प्रतिरोध भी है और प्रदत्त व्यवस्था से गहरी असहमति भी।

प्रस्तुति : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू


संपादक परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष ,पञ्चम सत्र का छात्र {हिंदी ऑनर्स}

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Wednesday, 4 November 2020

"महामारी में मदन कश्यप' : श्रीप्रकाश शुक्ल" / प्रस्तुति : गोलेन्द्र पटेल {भाग-२}





भाग-१
लिंक :-





भाग -2

नब्बे के दशक में विश्व भर के वर्णहाउस की शुरुआत थी। तो इसे लक्षित करनेवाले मांटिन क्यूँ जूनियर ने जिस वर्ण हाउस परिकल्पना की थी।जो आज 2020 में कोरोना की महामारी ने पूर्णता प्रदान कर दी है। प्रकारांतर से यह वह समय था जब हम एक दूसरे से अलग होकर भी एक दूसरे के समस्याओं को समझ रहे थे।या कि समझने की हम भरपूर कोशिश कर रहे थे। यहाँ से विजेता और विजित के विभाजन के बावजूद आप देखें कि यहाँ यही पर , जो विश्व बाजार आ रहा था। नब्बे के दशक में। यहाँ विजेता और विभाजन के बावजूद इसे कह सकते हैं।
"टूटे हुओं के बीच एकता"

टूटे हुओं के बीच जो एकता की शुरुआत हो रही थी और यह उसी विश्व बाजार की परिणत है कि आज २०२० की कोरोना महामारी तक पहुँच गए हैं। यह विश्व बाजार की देन है। यह तकनीक की देन है। महामारियाँ पहले भी आती रही हैं। यह कोरोना की महामारी की आज जो कैरेक्टर है , जो लक्षण है , वो अन्य महामारियों से एकदम अलग है। विश्व की जितनी भी महामारियां हैं उससे इसका अलग एक कैरेक्टर(चरित्र) ही है। जिसमें विश्व बाजार और तकनीक का सहमेल है। गठबंधन है , इसी वजह से उसके समाधान के भी शिघ्र निकलने की सम्भावना है।

लेकिन उसकी समस्या के उत्तरोत्तर जटिल होते जाने की भी सम्भावना है। दोनों बातें हैं , हो सकता है। कोरोनाकाल का वैक्सीन आ जाए। लेकिन वैक्सीन जब तक आए तब तक इतना न्यूरोटेशन हो चूके रहें। कोरोना (अर्थात् कोविड१९) के वायरस में , इतना न्यूरेट हो चूके रहे हैं कि चरित्र ही समझ में न आये। पता चले की एक तरह की संकट हमारे सामने बना रहे।

पीछले ३० वर्षों का यह जो निष्कर्ष हमारे सामने आया है। ऐसे में नब्बे के दशक था। वह असल में , इसकी सबसे बड़ी बुनियादी विशेषता थी। वह एक जिम्मेदार कवि के आरम्भ का समय था और कवियों के जिम्मेदार होने का भी समय था। यह जो नब्बे की दशक आया उसके पहले की कवियों की उतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं थी। उतनी बड़ी सामाजिक और राजनैतिक जिम्मेदारी नहीं थी। जितनी बड़ी जिम्मेदारी नब्बे या नब्बे के बाद के कवियों के सम्मुख प्रकट हुई।

क्योंकि पूरी तरह प्रतिबद्धताएं टूट रही थीं। वैचारिक दृढ़ता टूट रही थी। विश्व बाजार आ रहा था। पूँजीवाद का एक तरह का विकृत रूप भी आ रहा था। तकनीक का संयोजन , तो ये सब सारे चीजें थीं। तो ऐसे में , ये जो जिम्मेदार कवि के आरंभ का समय था। और जहाँ जो जिम्मेदारी का बोध था। जिसमें कवि के आत्म को दिशा दे रहा था। ये जो जिम्मेदारी बोध था । वो हर एक कवि के आत्म को दिशा दे रहा था।

जिसमें एक तरफ उम्मीद थी कि फिर भी बहुत कुछ अच्छा होगा। दूसरी तरफ स्थानीयता के ताकत की पहचान भी थी। जो समाप्त होती हुई पहचानों को स्वर दे रहा था। आप देखें कि स्थानीयता के पहचानों के समाप्त होने के लिए व्यवस्था व्यवस्थित भी हो रही थी। व्यवस्था लगातार आईडेंटिटी के आईशोलेशन के उसकी पहचानों को समाप्त होने के लिए दबाव भी बना रही थी और समानांतर रूप से जो पहचाने थी। जो अस्मिताएँ थी। वह अपनी चेतना में उद्गद भाव से प्रकट कर के सम्मुख हमारे आ रही थी। अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही थी। तो जो नब्बे(९०) का दशक था । इतने सारे यांत्रिक दबाओं की बीच यह *आईडेंटिटी ऑफ दी आईशोलेटेड* बहिष्कृत की पहचान का समय भी था।

मैं(श्रीप्रकाश शुक्ल जी) कहना चाहता हूँ कि मदन कश्यप इसी उम्मीद और स्थानीकता के दौर में "आईडेंटिटीऑफ दी आईशोलेटेड" की प्रतिनिधि कवि रहे हैं। जिनमें इनकी पीढ़ी की अन्य कवियों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिसमें कुमार अंबुज , अनामिका , बद्रीनारायण व स्वप्निल श्रीवास्तव जैसे कवियों का नाम  लेना यहाँ पर चाहूँगा। इन सभी कवियों में एक तो विविधता है। जीवन की बहुयायामिकता है। और "दूसरे के दूसरेपन" के प्रति गहरा सम्मान भाव है। अर्थात् अन्य की अन्यता से जुड़ने की भाव।

अन्य की अन्यता के बगैर "आईडेंटिटी ऑफ दी आईशोलेटेड" की नब्बे की दशक में पहचान सम्भव नहीं थी और इसका नेतृत्व किया है , अपने समय में मदन कश्यप ने। इसका मुझे(शुक्ल जी को) गौरव है , इसका मुझे गर्व भी है। तो इस पृष्ठभूमि में आप देखेंगे कि जब मदन कश्यप की कविताओं से गुजरता हूँ या इस पीढ़ी से गुजरता हूँ , तो एक खास मुझे , जो लक्षित करनी है। जो ये है कि इस पीढ़ी ने , नब्बे के दशक के कवियों ने अपने ठीक पहले की निकटतम पूर्ववर्ती पीढ़ी की जहाँ गहरी आलोचना की है । साथ ही उसे आत्मसात भी किया।

एक तरफ गहरी आलोचना है तो दूसरी तरफ आत्मसातीकरण भी है। कोरोना के महामारी में मदन कश्यप ने अपनी कवि को न केवल सक्रिय बनाए रखा है बल्कि अपने कविता के आधार को भी बचाए रखा है। "अब कवि को सक्रिय बनाये रखना और कविता के आधार को बचाये रखना।" ये बातें बहुत महत्वपूर्ण होती है। और इस रूप में आप देखेंगे कि संकट के समय में बनाये रखना और बचाये रखना दोनों ही चुनौती पूर्ण रहा है और यही से किसी कवि के लाईफ वाईटर (जीवद्रव्य) का पता चलता है। और मदन कश्यप के लाईफ वाईटर/जीवद्रव्य का पता चलता है और मदन कश्यप की लाईफ वाईटर(जीवद्रव्य) की सिनाख्त करने की शुरुआत मैं(शुक्ल जी) यहीं से करना चाहता हूँ।

और यह भी है कि एक सचाई है कि जब कोई भी महामारी आती है तो हर महामारी अपने साथ साथ विकल्प और संकल्प लाती है। हर महामारी सत्ता के भय एवं दमन को लेकर के आती है। इसके अन्तर्गत दो तरह के भाव पैदा होते हैं। या तो संटुष्टी जनता की ओर से , कोरोनाकाल में भी यही हुआ। जनता की ओर से दो तरह की स्थितियाँ पैदा होती हैं। या तो वह संटुष्ट हो जाती है या फिर अनुकूलता कर लेती है।

यानी संटुष्टी और अनुकलन हर महामारी के दो ऐसे कैरेक्टर रहे हैं और यह १५ वीं सदी से लेकर के समय समय पर जो महामारियों का इतिहास रहा है। जिसमें की हर तरह की जनता अपने को राज्य के हवाले कर देती है और उसके दो परिणाम होते हैं। एक तो व्यक्ति स्तर पर आईशोलेशन अर्थात् अलगाव हो जाता है और दूसरा राज्य स्तर पर लाकडॉउन लग जाता है।

"आईशोलेशन और लाकडाउन" ये दोनों हर महामारी की बुनियादी विशेषता है और ये दोनों शब्द सदियों से जनता को डराते रहे हैं। और आज तक डरा रहे हैं। यहाँ पर डाटा के स्तर पर आज एक नयी बीमारी जुड़ी है।
*राइजिंगस्पाइंज*

अब सामाजिक सम्पर्क का आनलाईन रूपांतरण भी कहीं न कहीं एक तरह का यातना दायक स्थिति का जन्म देता है। तो आज की जो महामारी है। उसका चरित्र तकनीक के कारण पूरी तरह बदल गया है। कैसे बदला है???

यहाँ अब संबंध है लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं है। केवल हमारे पास धैर्य है और कुछ नहीं बचा है। समझ है लेकिन कोई क्रियाएँ नहीं हैं। मृत्यु है लेकिन कोई सम्मान नहीं है। आज स्थितियां इतनी भयावह है कि हम पड़ोसी के मृत्यु में शोक प्रकट करने की बात तो छोड़ें। उसके घर के सामने से गुजरने में भी परहेज करते हैं। डर लगता है कि पता नहीं क्या हो जाये।ऐसे में जीवन एक तरह का रिक्तता का एहसास करता है। जीवन शून्यता से भर जाता है।और यह शून्यता का बोध परिवेश पर भी दबाव बनाता है लेकिन इसी समय में यह भी अहसास करता है कि जीवन केवल दुखों का सागर नहीं है।

बल्कि उम्मीद का आकाश भी है। यह एक तरह का बौद्धिक विकल्प है। मैं(शुक्ल जी) कहना चाहता हूँ कि महामारी में ये जो सारी स्थितियां आई है , तो इसी ने बौद्धिक विकल्प भी दी है। यही दस वर्ष बाद हमारी दस्तावेज होगा। जिसमें हमारी धड़कने सुनाई देंगी। अन्यथा सरकारी दस्तावेजों में केवल आँकड़े रहेंगे। जो आने वाले कई सदी तक हमें डराते रहेंगे।

तो उन आँकड़ों के समानांतर संवेदना का जो साहचर्य है। संवेदना का जो हस्तक्षेप है और उसके माध्यम से जो बौद्धिक विकल्प दिया जा रहा है। बौद्धिक वर्ग के द्वारा , चिंतको के द्वारा , लेखकों के द्वारा , कवियों के द्वारा और विचारशील नागरिकों के द्वारा। यह हमारे सोचने समझने का आज एक बहुत बड़ा अवसर है। यहाँ तक जब बात आती है तब लगता है। जीवन केवल दुःखों का सागर नहीं है। उम्मीद का आकाश भी है।

और उम्मीद के इसी आकाश को दिखाते हुए , दिखाते रहना । किसी भी रचनात्मकता की कसौटी हुआ करती है। जिसे हर समय के कवियों और बुद्धजीवियों ने किया है और आज भी कर रहे हैं। इस पर अमेरिकी कवियों की एक एंथ्रोपोलॉजी प्रकाशित है। जिसका नाम है - "टूगेदर इन ए सडस्ट्रंज्नेशन"। जिसका संपादन अमेरिका के कवयित्री 'एललिसक्वेन' ने किया है। जो मसहूर कवि पाब्लो नेरुता की कविता पंक्ति है :-
"कीप इन क्वाइज.....।"

आने वाले समय में हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक अरुण होता के संपादन में सेतु प्रकाशन से कोरोनाकाल के "कोरोजीवी कविताओं" का संकलन प्रकाशित होगा।

इस महामारी के अंधेरे में उम्मीद का अलख जगाये रखना जिन कवियों का दायित्व है। वे कवि इस बात को जानते हैं कि जीने की कला का मूलाधार सर्जनात्मकता ही होती है। जीने की विज्ञान से आगे की बातचीत है। जीने की कला और जीवन की कला। हम जीने की विज्ञान में धँसे-फँसे हुए हैं। विज्ञान जहाँ समाप्त होता है। कला वहाँ से शुरू होती है। विज्ञान की असफलता में कला का कल सामिल है। इसलिए मानव जीवन की रचनात्मक जिंदादिली है या फिर कुछ नहीं।

मानव जीवन की रचनात्मक जिंदादिली का अलख जगाये रखना कवियों का दायित्व है। उस समय के लेखों का दायित्व है। यह अलख हमारे समय के कविय जगा रहे हैं। जगाने की कोशिश कर रहे हैं। यह रचनात्मक जिंदादिली परिवेशगत संलग्नता के भीतर से आती है। यह परिवेशगत संलग्नता का अहसास करवाती है और परिवेशगत संलग्नता का यह अहसास असल में कुछ और नहीं है। कवि के जिम्मेदारी का अहसास ही है।

नब्बे के दशक में जब मैं(शुक्ल जी) जिम्मेदार कवियों के आरंभ की बात करता हूँ , तो यह मैं जिम्मेदारी के अहसास की बात कर रहा हूँ। और जिम्मेदारी की अहसास की बात करता हूँ , तो इसका मतलब ये है कि एक खराब समय में या बुरे समय में कुछ नया करने की इच्छा ही है। जो रचनात्मक जिंदादिली का वृहत्तर आयाम रचती है। कुछ नये तरीके से सोचना या सोचने के जजबे को बनाये रखना ही रचनात्मक जिंदादिली है और यह एक प्रकार से मृत्यु की ओर जीवन के बारे में सोचना ही है।

जिस पर कभी कुँवरनारायण ने "वाजस्वा के बहाने" नामक संग्रह में संभव किया था। यही जीने की कला है। जिस पर अभी हाल ही में एक किताब आई है। "द  करेज टू एक्सिट्स" ।यह दार्शनिक 'रामे जॉनवैन्गलूँ' द्वारा लिखी गई है जिसको ब्लैस्वा ने प्रकाशित किया है। इसमें दार्शनिक आधार पर जीवन को बचाने की , जीने की कला को बहुयायामिकता की बाते कही गई हैं।

और जब हम जीने की कला की बातें करते हैं तो इसके प्रमुख कुछ आधार हुआ करते हैं एक प्रमुख आधार है- 
'प्रतिरोध की चेतना' यानी जो आजादी का वास्तविक आधार हुआ करती है। यानी रचनात्मक बौद्धिक जिंदादिली और उसकी आजादी का जो रचनात्मक आधार है वह प्रतिरोध की चेतना है। और यह एक प्रकार से जीवन की अर्थहीनता के खिलाफ सोचना है। जहाँ न तो संटुष्टी है , न तो अनुकलन है और न औसतपन है।

दूसरा है कि 'उत्कृष्टता के साथ सोचना'। यह वह उत्कृष्टता होती है जो एक नैतिक मूल्य हुआ करती है। जो बुद्धगम्य होती है और असल में बात यह है कि यह उत्कृष्टता ही मनुष्य को सामान्य दुख से परे ले जाती है। और इस संदर्भ में चौथी सदी ई.पू. एक ह्यूमन दार्शनिक हुआ करते थे "सेनका"। 'अबुद्धिगम में आनंद मृत्यु के समान है!' यानी आनंद भी बौद्धिक कर्मों से संचालित होना चाहिए। और आनंद को बुद्धि भी दिशा देती रहनी चाहिए।

आनंद भी बुद्धि द्वारा संचालित होकर मानव मुक्ति के पक्ष में होना चाहिए। यदि आनंद में पक्षधरता नहीं है तो यह केवल और केवल व्यसन है। उत्कृष्टता को नैतिक दायरे में समझने की कोशिश जिन कवियों ने इस कोरोजीवी काल(कोरोनाकाल) में की है उसमें मदन कश्यप  अग्रणी कवियों में हैं। उनकी एक कविता "शब्द" है जो "दूर तक चुप्पी" नामक संग्रह में संकलित है।

"आज जबकि / अपने उत्पीड़ित युग के इस हताश मोड़ पर / नैतिकता का मूकता के हद में / सिमट गई है / मैं शब्दों के साथ /नैतिक होने का साहस करता हूँ....।

मदन कश्यप के कवि की पहचान शब्दों के नैतिक साहस होने के रूप में ही पहचान , पहचानी जा सकती है। उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि किसी भी महामारी में कवियों की भूमिका बढ जाती है। क्योंकि एक वैकल्पिक संसार की संभावना की निर्मित उसी के द्वारा होती है। कवि के द्वारा होती है। जो परिवेश की आंतरिक शून्यता को शब्दों की उम्मीद भरी चमक से रौशन कर देता है। मदन कश्यप ऐसे ही कवियों में है। जिन्होंने कोरोनाकाल के परिवेशगत आंतरिक शून्यता को शब्दों की उम्मीद भरी चमक से रौशन कर दिया है। यह कवि ही है जो हमें सोचने की नयी तरीकों से परिचित करवाता है और दुनिया को बहुत करीब से समझने के लिए संकल्प लेता है।

(वीडियो का 17 से 44 मीनट के बीच के वक्तव्य निधियों का प्रस्तुति : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू ~ बीए तृतीय वर्ष।)

शेष अगले दिन

 संपादक परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष ,पञ्चम सत्र का छात्र {हिंदी ऑनर्स}

सम्पर्क सूत्र :-

ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत। 221009

ह्वाट्सएप नं. : 8429249326

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Tuesday, 3 November 2020

"महामारी में मदन कश्यप : श्रीप्रकाश शुक्ल" / प्रस्तुति : गोलेन्द्र पटेल {भाग-१}



 

शरद पूर्णिमा के दिन "चिंतन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था : अंशु चौधरी" के फेसबुक पेज पर "महामारी में मदन कश्यप" नामक विषय पर वरिष्ठ कवि , आलोचक व आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल के वक्तव्य निधियों का संक्षेप में प्रस्तुतिकरण :-


गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल इस महत्वपूर्ण व्यख्यान का श्रीगणेश 'अर्थववेद' के निम्नलिखित सूक्त से करते हैं-


"पश्येम् शरदम् सतम्

 जिवेम् शरदम् सतम्।।"


अर्थात् आप सौ वर्ष तक जीयें और देखें।

निराला ने भी अपनी एक कविता में शरद पूर्णिमा के विदाई में १९२३ ई. में लिखी गई है , जिसकी कुछ पंक्ति निम्न हैं-

"कुछ भी हो तू ठहर

देख लूँ भर नजर

क्या जाने

क्या हो इस जीवन का

तू ठहर....।"


मदन कश्यप : नब्बे का जो दशक है खास कर के जो बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध की कविता का सबसे उर्वर व विविध वर्णनीय दशक रहा है।यह अपने जिन कवियों पर गर्व कर सकता है उसमें मदन कश्यप बहुत ही अग्रणी और आक्रांत कवि हैं।वे कवि रूप में अपनी कविता में वक्रोक्ति गंभीर और स्वभाव में अन्य के दोष दर्शन से परांग विमुख हैं।अर्थात् उनकी कविता की जो विशेषता है वो वक्रता स्वभाव में जैसा की बहुतों के यहाँ दिखाई देता है।वह अन्य दोष दर्शन से बहुत परहेज करते हैं।जिसे परांग विमुख शुक्ल जी कहते हैं।वे गहरे अर्थों में सांस्कारिक व लोकसमत कवि हैं।जिनका पूरा जीवन ही काव्यमय है।


एक ऐसे समय में जहाँ पर सत्ता और व्यवस्था की चाकरी करना हम सबकी अनिवार्यता है।उन्होंने एक पूर्णकालिक कवि के रूप में अपना विगत जीवन जिया है और उस पूर्णकालिकता में कभी भी सम्मान से , स्वाभिमान से समझौता नहीं किया है।इस रूप में आप देखें सत्ता व्यवस्था की चाकरी से सर्वदा मुक्त रहे हैं , खास कर ऐसे लोगों के लिए भी मदन जी उदाहरण हैं जो नौकरी करते हैं । नौकरी में बहुत कुछ पा चूके हैं। बड़े पद पा चूके हैं फिर भी बडे़ पद पाने की लिप्सा आज तक नहीं गई है।इसके बावजूद भी वे कवि होना चाहते हैं और कवि बनने के लिए जीतोड़ मेहनत और कोशिश करते हैं।तो ऐसे लोगों के सम्मुख मदन जी विरल और विलक्षण उदाहरण हैं।


इन्होंने कभी भी सत्ता की चाकरी न तो की , न ऐसे कोई सत्ता के निकट पहुंने की कोशिश की।शुक्ल जी को इस बात का हमेशा गर्व रहता है कि वे कवि रूप में उनके निकटतम पूर्ववर्ती हैं । जिनके माध्यम से हमने न केवल अपने समय को समझा है।बल्कि हमें हिंदी कविता की जो सम्पूर्ण परंपरा है।उसको समझने में भी काफी मदद मिलती है।उनसे बातचीत के माध्यम से हिंदी कविता की जो समुचित परंपरा रही है।उसको समझने का अवसर मिला है।मैं(शुक्ल जी) कुछ लोगों में से हूँ जिनका उन्हें स्नेह मिलता रहा है।जिनसे खुलकर संवाद होता रहा है।यह अवसर हमारे के लिए(खास कर शुक्ल जी के लिए) खास है कि आज अपने निकटतम पूर्ववर्ती कवि पर कुछ बात कहने के लिए आप सबके सम्मुख उपस्थित हूँ।


मदन कश्यप की बायोडाटा बताने की जरूरत नहीं है लेकिन इतना जरूर है कि उनकी छः कविता संग्रह प्रकाशित हैं।जो निम्नलिखित हैं :-


१.लेकिन उदास है पृथ्वी(१९९२ई.)

२.नीम रोशनी में

३.कुरूज

४.दूर तक चुप्पी

५.अपना ही देश

६.पनसोखा है इंद्रधनुष (२०१९ में सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हो कर के अत्यंत चर्चा में रही है।)


"लेकिन उदास है पृथ्वी" से लेकर"पनसोखा है इंद्रधनुष" तक की मदन कश्यप की कविताओं की कविता/काव्य यात्रा अगर हम देखे तो उनकी कविता यात्रा उर्द्धमुखी यात्रा रही है , मदन जी ने लगातार अपने को परिस्कृत किया है।वे पैसठ (६५) पार हैं , ६५ के पार में जहाँ बहुत सारे कवि चूक जाते हैं।वहीं आज भी वे बहुत डटकर हिंदी काव्य जगत को शानदार रचनाएँ(कविताएँ) दे रहे हैं ।(अर्थात् सृजनात्मकता में निरंतरता बनी है।)


यह जो उनकी सक्रियता है।यह भी हम सबको बहुत आकर्षित करती है।और सक्रियता ही नहीं , कि केवल कविता लिखने के लिए लिख रहे हैं बल्कि वे अपने समय से मुठभेड़ करने वाले कवियों में अग्रणी हैं।इतने ही तरोताजा और इतने ही समकालीन हैं कि तय कर पाना ये मुश्किल होता है कि मदन जी का जो काव्य बोध है । उसका स्त्रोत उनका समकालीन समाज है , उनकी स्मृति है या वे सब लोग हैं जो किसी न किसी रूप में उनके कवि के निर्माण में अपना योगदान देते रहे हैं।


लेकिन यह भी निश्चित है कि इनके सभी संग्रह इनके पक्षधरता के प्रमाण हैं और इनकी पक्षधरता संस्कृतनिष्ठ पक्षधरता है।केवल न नारेबाजी है , न राजनैतिक है , न लोक सम्मति है।...संस्कृतनिष्ठ पक्षधरता का मतलब यह होता है कि वे यह कहने की कोशिश करते हैं जो आज तक अनकहा है या जो कहने की अभूतपूर्व संभावना है।वे उनके काव्य खनिज होते हैं।जहाँ से वे अपनी कविताओं का निर्माण करते हैं।आज हमारे लिए यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि हिंदी कविता की जो विरासत इन्हें मिली है।उससे जुड़ते हुए।ये वर्तमान को समझने वाले सर्वथा मौलिक कवियों में सामिल हैं।इधर कोरोनाकाल में मैंने(शुक्ल जी ने) देखा कि इन्होंने अपने कविता के स्वदेश को ठीक से संवारा है जिसपर मैं आगे चर्चा करूंगा।



इनके ठीक पूर्ववर्ती कवियों में यदि आप देखें , थोड़ा परंपरा को देखें तो मदन कश्यप के ठीक पूर्ववर्ती जो कवि हैं ।उसमें प्रमुख हैं :-

राजेश जोशी / ज्ञानेन्द्रपति / अरुण कमल / मंगलेश डबराल / विरेंद्र अग्रवाल एवं अन्य।


उक्त पाँचों कवियों के साथ रहकर मदन जी संवाद किया है , साथ रहकर के सीखा है , साथ रहकर के कविता के बारे में समझा है और उनको समझते हुए अपने मार्ग की तलाश की है। समय थोड़ा आगे पीछे हो सकता है।ये कवि अस्सी (८०) के दशक के महत्वपूर्ण कवि हैं।जिन्हें शुक्ल जी असी के दशक की हिंदी कविता की *पञ्चवाणी* कहते हैं।और आप सब जानते हैं कि भक्तिकाल की परंपरा में पंचवाणीयों का बड़ा महत्व रहा है।पंचवाणी का प्रसंग केवल इतना है कि यह मदन जी के निकटतम पूर्ववर्ती भी हैं और समकालीन भी।


इन पंचवाणी कवियों के पूर्ववर्ती कवियों में मुक्तिबोध / रघुवीर सहाय / केदारनाथ सिंह की *त्रयी* है।जिनके खुद के मूल में निराला है।और निराला का एकल स्वर है।उनका "काव्यबीज" है , इन सब कवियों के बीच में नागार्जुन , त्रिलोचन , शमशेर की त्रयी भी है।जो स्वयं एक तरफ निराला से सीखते हैं तो दूसरी तरफ अस्सी के दशक के कवियों के प्रेरणा स्त्रोत भी रहे हैं।


तो यह 'नब्बे(९०) की दशक' जिसका जिक्र कवि मित्र बद्रीनारायण ने बहुत पहले ही "तद्भव" के एक लेख में किया था।तो मदन कश्यप के अर्लीनाइंटिन के पूर्व जो परंपरा थी।खास कर स्वाधीन भारत और अस्सी के बीच की , उसके बारे में संक्षेप में पृष्ठभूमि तैयार करते हुए शुक्ल जी आगे कहते हैं कि नब्बे की दशक की बदलती स्थितियों में आधुनिक हिंदी कविता के परंपरा पर जो दबाव रहता है उसमें अपने वर्तमान से जुड़ने की गहरी बेचैनी दिखाई देती है।


क्यों???


क्योंकि उदारीकरण , विश्व बाजार और तकनीक के बढते दबाव में ये सब जो स्थितियां आई ९० के दशक में स्थानीकता की वैश्विकता जो विकसित हो रही थी।नब्बे के दशक में स्थानीकता के दबाव में जो वैश्विकता आ रही थी।इन कवियों को उसे समझना भी था और उसे रोमांटिक आग्रहों से मुक्त भी होना था।और बहुत बड़ी चुनौती थी।

"वर्णहाउस" का जिक्र मांटिन क्यूँ जूनियर ने किया था।....

वीडियो का केवल 17 मिनट का प्रस्तुति : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू - बीए , तृतीया वर्ष}

 

शेष अगले दिन


संपादक परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष ,पञ्चम सत्र का छात्र {हिंदी ऑनर्स}

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