Monday, 22 February 2021

जारी है संकलन : "पतंग और पतंगा" / मकरसंक्रांति : पतंग पर केंद्रित कविताएँ

जारी है संकलन : "पतंग और पतंगा"



 

 ◆"पतंग" पर केंद्रित कविताएँ◆


1.

 

पतंग : आलोक धन्वा

(एक)

उनके रक्तो से ही फूटते हैं पतंग के धागे
और
हवा की विशाल धाराओं तक उठते चले जाते हैं
जन्म से ही कपास वे अपने साथ लाते हैं

धूप गरुड़ की तरह बहुत ऊपर उड़ रही हो या
फल की तरह बहुत पास लटक रही हो-
हलचल से भरे नींबू की तरह समय हरदम उनकी जीभ
                                       पर रस छोड़ता रहता है

तेज़ आँधी आती है और चली जाती है
तेज़ बारिश आती है और खो जाती है
तेज़ लू आती है और मिट जाती है
लेकिन वे लगातार इंतज़ार करते रहते हैं कि
कब सूरज कोमल हो कि कब सूरज कोमल हो कि
कब सूरज कोमल हो और खुले
कि कब दिन सरल हों
कि कब दिन इतने सरल हों
कि शुरू हो सके पतंग और धागों की इतनी नाज़ुक दुनिया
 
(दो)

सबसे काली रातें भादों की गयीं
सबसे काले मेघ भादों के गये
सबसे तेज़ बौछारें भादों की
मस्तूतलों को झुकाती, नगाड़ों को गुँजाती
डंका पीटती- तेज़ बौछारें
कुओं और तलाबों को झुलातीं
लालटेनों और मोमबत्तियों को बुझातीं
ऐसे अँधेरे में सिर्फ़ दादी ही सुनाती है तब
अपनी सबसे लंबी कहानियाँ
कड़कती हुई बिजली से तुरत-तुरत जगे उन बच्चोंह को
उन डरी हुई चिड़ियों को
जो बह रही झाड़ियो से उड़कर अभी-अभी आयी हैं
भीगे हुए परों और भीगी हुई चोंचों से टटोलते-टटोलते
उन्होंने किस तरह ढूँढ लिया दीवार में एक बड़ा सा सूखा छेद !

चिड़ियाँ बहुत दिनों तक जीवित रह सकती हैं-
अगर आप उन्हें मारना बंद कर दें
बच्चेप बहुत दिनों तक जीवित रह सकते हैं
अगर आप उन्हें मारना बंद कर दें
भूख से
महामारी से
बाढ़ से और गोलियों से मारते हैं आप उन्हें
बच्चों को मारने वाले आप लोग !
एक दिन पूरे संसार से बाहर निकाल दिये जायेंगे
बच्चों को मारने वाले शासकों !
सावधान !
एक दिन आपको बर्फ़ में फेंक दिया जायेगा
जहाँ आप लोग गलते हुए मरेंगे
और आपकी बंदूकें भी बर्फ़ में गल जायेंगी

(तीन)

सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादों गया
सवेरा हुआ
ख़रगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ानेवाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके-
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला काग़ज़ उड़ सके-
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके-
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाज़ुक दुनिया

जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अक्सर
छतों के खतरनाक किनारों तक-
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वीन और भी तेज़ घूमती हूई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।

1976 , कविता संग्रह  : "दुनिया रोज़ बनती है" से

आलोकधन्वा

आलोकधन्वा

परिचय

जन्म : 2 जुलाई, 1948

भाषा : हिंदी

विधाएँ : कविता

मुख्य कृतियाँ

कविता संग्रह : दुनिया रोज़ बनती है

सम्मान

पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, प्रकाश जैन स्मृति सम्मान

फोन

09931611041



2.

पतंग


अपनी ही नदी के तरंगों में फंसी रेत की तरह

यह एक पतंग है 

जो पत्तों  में उलझकर फड़फड़ा रही है


यह नहीं है इसकी थकान

नए उड़ान की तैयारी है


हवा शिथिल है 

विषाक्त जीवाणुओं से भरे इस समय में 

शिशिर की कठुआती छुवन के बीच 

अभी भी खूब चटकदार हैं इसके रंग


वह जानती है कि बसंत की नर्म हवाओं के भीतर से 

उठेगा कोई हाथ 

जिसका तप्त स्पर्श पा

वह लहरा उठेगी 

एक नए समय में!

(©श्रीप्रकाश शुक्ल : 18/1/2021)


श्रीप्रकाश शुक्ल

श्रीप्रकाश शुक्ल

परिचय

जन्म : 18 मई 1965


भाषा : हिंदी

विधाएँ : कविता, आलोचना

मुख्य कृतियाँ

कविता संग्रह : अपनी तरह के लोग, जहाँ सब शहर  नहीं होता, बोली बात, रेत  में आकृतियाँ, ओरहन और अन्य कविताएँ
आलोचना : साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौंदर्य, नामवर की धरती 
संपादन : परिचय (साहित्यिक पत्रिका)

सम्मान

मलखानसिंह सिसोदिया पुरस्कार, नरेश मेहता कविता  पुरस्कार (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान)

संपर्क

909 काशीपुरम कॉलोनी, सीर्गोवर्धन वाराणसी, उत्तर प्रदेश -221005

फोन

09415890513

ई-मेल

shriprakashshuklabhu@gmail.com










3.

१).
पतंग : गोलेन्द्र पटेल


पीढ़ी दर पीढ़ी की पीड़ा
परित्रस्त पूर्वजों के पत्र में दर्ज
कन्नी खाती हुई 
मेरी पतंग पढ़ती है 
आसमान में मौन

आँसुओं की बूँदें टपकती हैं
खेतों की दरार में
जड़ें मिट्टी से सोख लेती हैं
किसानी का पसीना
हवा में फैल जाती है
श्रम की गंध
जीवन की डोर खिंचती है पतंग

उमंग उड़ रही है
संबंधों के सारे रंग
बिखर गये हैं
घास में

गेहूँ बिता भर 
बढ़ा है
ठिगना चना संग मटर
खड़ा है
बथुआ खोट कर 
चली है
बूढ़ी माँ घर की ओर
मेंड़ पर
सरसों फूली है
तरुणी तीसी की पत्ती हिल रही है
पास में

धूप खिल गयी है
पेड़ पर
रिश्ते की रेशमी रील
लिपट रहा हूँ
प्रेम के परेते में
चमकती हुई 
चेतना की चमकिदी गुड्डी उड़ रही है
आकाश में

जिस तरह भूख बढ़ने पर खूँटे से बँधी गाय
तोड़ डालती है मजबूत से मजबूत पगहा
ठीक उसी तरह उखड़ कर 
चिड़ियों के भाँति नापना चाहती है धरती 
मेरी पतंग

नहीं नहीं
यह संभव नहीं है
आत्मा पूछती है पीड़ा से
तुम कौन?

मेरी पतंग...!

(©गोलेन्द्र पटेल : 29-12-2020)


२). आसमान में पतंग 

चाह है कि 
पावन पर्व पर प्यार बढ़े
रोष की रस्सी टूटे
प्रसन्नता की पतंग तने आसमान में

चेहरे पर चेतना की चमक चढ़े
बुरी आदत छूटे
सभी सहृदय बने इंसान में

हर कोई खुद को गढ़े
मानवता की महक हरदम जूटे
जिंदगी के जहान में

हर कोई परोपकारिता का पाठ पढ़े
बच्चे खुशियाँ लूटे
समय के सीवान में।

(©गोलेन्द्र पटेल : 14/01/2021)

३).

पीड़ा की पंतग

तकलीफ़ की ताँत में बधी हुई
पीड़ा की पंतग
तनती है जब आसमान में
तब मेरी स्मृति का चाँद
ख़त पढ़ने के लिए
उतर आता है बादलों पर
पर बुरी नज़र की नख़
पढ़ने से पहले ही काट देती है
उसकी प्रसन्नता की पतंग!

रचना : 14-01-2022

गोलेन्द्र पटेल




परिचय

जन्म : 5 अगस्त 1999

भाषा : हिंदी

विधाएँ : कविता , कहानी, आलोचना, उपन्यास एवं अन्य विधाएँ।

संपर्क

ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत 221009

फोन

08429249326

ई-मेल

corojivi@gmail.com            





"पतंगा" पर केंद्रित कविताएँ

1.

एक पतंगा

इस लोह-खम्भ से एक पतंगा उड़ता हुआ
अभी-अभी टकराया है बुरीतरह

कुछ देर तड़पा और शांत हो गया
मुझे लगा शायद मर गया 

लेकिन नहीं,
थोड़ी देर बाद उसमें हुई थोड़ी हलचल 
खाई अलटी-पलटी पँख फैलाए कोशिश की उड़ने की
कई बार लुढ़का गश्त खाकर
फिर उठा और उड़ा कुछ देर
फिर उठा और उड़ा और कुछ दूर
फिर उठा और और उड़ा अधिक देर
अधिक दूर 

इस बार उठकर उड़ा तो निकल गया कहाँ-का-कहाँ
पता नहीं

कुछ देर बाद उड़कर आए लोह-खम्भ के आसपास 
कुछ वैसे ही पतंगें
कुछ लटके और कुछ जा बैठे लोह-खम्भ के शिखर पर
और नोंचने लगे पाँवों से खम्भ का लोहा

शिनाख़्त बहुत मुश्किल है, कि इनमें तो शामिल नहीं
मौत से टकराकर जीना सीखा है 
जिसने अभी-अभी
एक पतंगा !

                                                     -वसंत सकरगाए-
                                                       23/02/2021


*कवि परिचय : संक्षेप में*


कवि वसंत सकरगाए 2 फरवरी 1960 को हरसूद(अब जलमग्न) जिला खंडवा मध्यप्रदेश में जन्म। म.प्र. साहित्य अकादमी का दुष्यंत कुमार,मप्र साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी सम्मान,शिवना प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान तथा अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता के लिए ‘संवादश्री सम्मान।
-बाल कविता-‘धूप की संदूक’ केरल राज्य के माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल।
-दूसरे कविता-संग्रह ‘पखेरु जानते हैं’ की कविता-‘एक संदर्भ:भोपाल गैसकांड’ जैन संभाव्य विश्विलालय द्वारा स्नातक पाठ्यक्रम हेतु वर्ष 2020-24 चयनित।दो कविता-संग्रह-‘निगहबानी में फूल’ और ‘पखेरु जानते हैं’

संपर्क-ए/5 कमला नगर (कोटरा सुल्तानाबाद) भोपाल-462003


कवि : स्वप्निल श्रीवास्तव

पूर्वी उ प्र के जनपद सिद्धार्थनगर के एक गांव में 05 अक्टूबर 1954 को जन्म । शुरुवाती शिक्षा गांव में हुई । हाई स्कूल इंटर जनपद कुशीनगर के एक कस्बे में । गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम ए के साथ यल यल बी । उ प्र सरकार में एक अधिकारी के रूप में राज्य के अनेक जनपदों में तैनाती । कवि के साथ कहानी लेखन ।
 कविता संग्रह
ईश्वर एक लाठी है , ताख पर दियासलाई , मुझे दूसरी पृथ्वी चाहिए , जिंदगी का मुकदमा ,जब तक है जीवन
 कहानी संग्रह 
एक पवित्र नगर की दास्तान , स्तूप और महावत 
 संस्मरणों की किताब - जैसा मैंने जीवन देखा ।
 कविता के लिए , भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार के साथ फ़िराक सम्मान , केदार सम्मान , शमशेर सम्मान ।
   तथा रूस का अंतराराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान ।
  कविताओं के अनुवाद रूसी नेपाली , बंगाली , मराठी ,पंजाबी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में ।
 फिलहाल सेवानिवृत्त के बाद फैज़ाबाद में स्थायी निवास ।
सम्पर्क -510 -अवधपुरी कालोनी , अमानीगंज 
फैज़ाबाद -224001
मोबाइल - 9415332326


कविता

पतंग उड़ाते बच्चे : स्वप्निल श्रीवास्तव

टेलिफ़ोन के तारों के बीच फँसी हुई है पतंग
बच्चे डोर का आख़िरी सिरा खोज रहे हैं
वे उसे उड़ाएंगे नए आकाश में

पतंग बच्चों के हाथ में है
जिससे वे छुएंगे आकाश
और विद्युत की कंपन महसूस करेंगे अपने शरीरों में
बच्चों के शरीरों में आएगी स्फूर्ति
वे दौड़ेंगे-- इस छत से उस छत
पतंग के साथ

छत पर तमाम बच्चे हैं
आकाश में तमाम पतंगें
माता-पिता मना करते हैं बच्चों को
बच्चे परवाह नहीं करते
वे जोख़िम उठाने के लिए रहते हैं हर वक़्त तैयार

पतंग उड़ाते हुए वे नहीं सोचते कि
उनके पीछे कहाँ ख़त्म हो रही है छत
या ज़मीन पर कहाँ है अन्धा कुँआ
उनकी आँखों में है नीला आकाश
आकाश में तैरती हुई पतंगें
पतंगें-- जैसे ग्लास-टैंक में तैर रही हों
रंग-बिरंगी मछलियाँ

पतंग उड़ाते बच्चे आकाश को भेजते हैं संदेश
कि वे आकाश को जीतने आ रहे हैं

(साभार- कविता कोश)



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★ संपादक संपर्क सूत्र :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

{काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र}

ह्वाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


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◆ संकलन कर्ता : आलोचक अर्जुन◆



 


Saturday, 20 February 2021

मीरा के गुरु : सद्गुरु संत शिरोमणि रविदास(रैदास) | जयंती स्पेशल

 


मीरा के गुरु : सद्गुरु संत शिरोमणि रविदास(रैदास) 644 वां जयंती स्पेशल 2021 :- 27 फरवरी , शनिवार

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार गुरु रविदास जयंती, माघ महीने में पूर्णिमा (माघ पूर्णिमा) के दिन पर मनाया जाने वाला गुरु रविदास का जन्मदिवस है। संत रविदास जयंती शनिवार को हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। रविदास के जन्म को रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है। जातिवाद और आध्यात्मिकता के खिलाफ काम करने के कारण रविदास पूजनीय हैं।वह एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे। काशी के सीर गोवर्धनपुर गाँव में जन्मे रविदास (रैदास) का समय 1482-1527 ई. के बीच हुआ माना जाता है। एक लोक मत के अनुसार , उनकी माता का नाम श्रीमति कलसा देवी और पिता का नाम श्रीसंतोख दास जी था। सर्वमान्य मत निम्नलिखित है :-

"चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास।"

पूरा नाम : संत रविदास
अन्य नाम : रामदास , गुरु रविदास , संत रैदास
जन्म : १३९८ ई. (लगभग)
जन्म भूमि : काशी , उत्तर प्रदेश
मृत्यु : १५१८ ई.
अभिभावक : रग्घु और घुरविनिया
पत्नी : लोना
कर्म भूमि : काशी
कर्म-क्षेत्र : कवि
विशेष योगदान : समाज सुधारक
नागरिकता : भारतीय
प्रसिद्ध वाक्य : मन चंगा तो कठौती में गंगा
रचनाएँ : 'रविदास के पद', 'नारद भक्ति सूत्र' और 'रविदास की बानी' 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, रविदास जी पिछले जन्म में एक ब्राह्मण थे। अपनी मृत्युसैया पर वह चमार जाति की एक महिला की ओर आकर्षित हो गये, और उन्होंने उस खूबसूरत महिला को अपनी माँ बनने की कामना की। मृत्यु के बाद, उन्होंने उसी स्त्री के गर्भ से रविदास जी के रूप में पुनर्जन्म लिया। वे कबीर जी के समकालीन थे, और अध्यात्म पर कबीर जी के साथ कई संवाद उपलब्ध हैं।

बचपन से ही रविदास साधु प्रकृति के थे और ये संतों की बड़ी सेवा करते थे। इस कारण इनके पिता रघु इन पर अक्सर नाराज हो जाते थे। इनकी संत-सेवा में सब कुछ अर्पित कर देने की प्रवृत्ति से क्रुद्ध होकर इनके पिता ने इन्हें घर से बाहर कर दिया और खर्च के लिए एक पैसा भी नहीं दिया। फिर भी रविदास साधुसेवी बने रहे. ये बडे अलमस्त-फक्कड़ थे। संसार के विषयों के प्रति इनमें जरा भी आसक्ति नहीं थी। ये अपनी गृहस्थी जूता-चप्पल बनाकर अत्यंत परिश्रम के साथ चलाते थे। इनकी पत्‍‌नी भी सती-साध्वी थीं।

भारत संतों की भूमि है। यहां समय-समय पर संतों और ज्ञानियों ने अपने ज्ञान से समाज में विकास की रफ्तार को मजबूत किया और एकता का प्रचार किया है। लेकिन संत बनना भी कोई आसान काम नहीं। इच्छाओं का अंत हो जाने पर ही मनुष्य संत की श्रेणी में आ सकता है।

संत रैदास के 40 सबद गुरूग्रंथ में : 


संत रविदास ने सभी को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने की सीख दी। संत रविदास के 40 सबद गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। जिसका सम्पादन गुरु अर्जुन सिंह देव ने १६ वीं सदी में किया था । उनकी एक कहावत ‘जो मन चंगा तो कठौती में गंगा' काफी प्रचलित है। इस कहावत को जोड़कर एक कथा भी है। कहते हैं कि एक बार एक महिला संत रविदास के पास से गुजर रही थी। संत रविदास लोगों के जूते सिलते हुए भगवान का भजन करने में मस्त थे।

रविदास जी कैसे बने संत

एक कथा के अनुसार रविदास जी अपने साथी के साथ खेल रहे थे। एक दिन खेलने के बाद अगले दिन वो साथी नहीं आता है तो रविदास जी उसे ढूंढ़ने चले जाते हैं, लेकिन उन्हे पता चलता है कि उसकी मृत्यु हो गई। ये देखकर रविदास जी बहुत दुखी होते हैं और अपने मित्र को बोलते हैं कि उठो ये समय सोने का नहीं है, मेरे साथ खेलो। इतना सुनकर उनका मृत साथी खड़ा हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संत रविदास जी को बचपन से ही आलौकिक शक्तियां प्राप्त थी। लेकिन जैसे-जैसे समय निकलता गया उन्होंने अपनी शक्ति भगवान राम और कृष्ण की भक्ति में लगाई। इस तरह धीरे-धीरे लोगों का भला करते हुए वो संत बन गए। सामाजिक जीवन में जाति व्यवस्था के अनुसार, नीची जाति में जन्मे रविदास जी के विचारों के वजह से पूरे भारत में उनके अनुयायी हैं



मीरा के गुरु थे संत रविदास-
संत रविदास भगवान कृष्ण की परमभक्त मीराबाई के गुरु थे। मीराबाई उनकी भक्ति भावना से प्रभावित होकर उनकी शिष्या बन गई। संत रविदास का मानना था कि अभिमान और बड़प्पन का भाव त्यागकर विनम्रतापूर्वक व्यवहार करने वाला व्यक्ति ही ईश्वर का भक्त हो सकता है। संत रविदास जी ने लोगों को बिना भेदभाव के आपस में प्रेम करने की शिक्षा दी।

मीराबाई ने स्वयं अपने पदों में बार-बार रविदास जी को अपना गुरु बताया है।

“खोज फिरूं खोज वा घर को, कोई न करत बखानी।
सतगुरु संत मिले रैदासा, दीन्ही सुरत सहदानी।।
वन पर्वत तीरथ देवालय, ढूंढा चहूं दिशि दौर।
मीरा श्री रैदास शरण बिन, भगवान और न ठौर।।
मीरा म्हाने संत है, मैं सन्ता री दास।
चेतन सता सेन ये, दासत गुरु रैदास।।
मीरा सतगुरु देव की, कर बंदना आस।
जिन चेतन आतम कह्या, धन भगवान रैदास।।
गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुर से कलम भिड़ी।
सतगुरु सैन दई जब आके, ज्याति से ज्योत मिलि।।
मेरे तो गिरीधर गोपाल दूसरा न कोय।
गुरु हमारे रैदास जी सरनन चित सोय।।”


मन चंगा तो कठौती में गंगा

संत रविदास की अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता इस उदाहरण से समझी जा सकती है एक बार की बात है कि रविदास अपने काम में लीन थे कि उनसे किसी ने गंगा स्नान के लिए साथ चलने का आग्रह किया। संत जी ने कहा कि मुझे किसी को जूते बनाकर देने हैं यदि आपके साथ चला तो समय पर काम पूरा नहीं होगा और मेरा वचन झूठा पड़ जाएगा। और फिर मन सच्चा हो तो कठौती में भी गंगा होती है आप ही जाएं मुझे फुर्सत नहीं। यहीं से यह कहावत जन्मी मन चंगा तो कठौती में गंगा।

सामाजिक भेदभाव का विरोध

संत रविदास ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जागरूकता लाने का प्रयास भी किया। सही मायनों में देखा जाए तो मानवतावादी मूल्यों की नींव संत रविदास ने रखी। वे समाज में फैली जातिगत ऊंच-नीच के धुर विरोधी थे और कहते थे कि सभी एक ईश्वर की संतान हैं जन्म से कोई भी जात लेकर पैदा नहीं होता। इतना ही नहीं वे एक ऐसे समाज की कल्पना भी करते हैं जहां किसी भी प्रकार का लोभ, लालच, दुख, दरिद्रता, भेदभाव नहीं हो।


ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन, पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीण : संत रविदास जी ने अपनी वाणी से हमेशा धर्म और जाति के नाम पर होने वाली असमानता को मिटाने की कोशिश की है। वैसे आज के समय में दूसरी जाति के लोगों के साथ असमानता में कमी तो आई है लेकिन स्थिति अब भी संतोषजनक नहीं है। ऐसे में रविदास जी का ये दोहा लोगों को जरूर समझना चाहिए। इस दोहे में उन्होंने कहा है कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके कर्म से होती है।


क्रोध करने से बनते काम भी बिगड़ जाते हैं: आज के समय में गुस्सा लोगों के नाक पर ही बैठा रहता है। ऐसे में रविदास जी का ये दोहा आपको बहुत कुछ सिखा सकता है। रैदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम, सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम। इस दोहे में संत रविदास भक्ति की शक्ति का वर्णन करते हैं। उनके अनुसार जिस हृदय में दिन-रात बस राम के नाम का ही वास रहता है, ऐसा भक्त स्वयं राम के समान हो ता है। राम नाम की ऐसी माया है कि इसे दिन-रात जपने वाले लोगों को न तो स्वयं गुस्सा आता है और न ही दूसरों के गुस्से से वो विचलित होते हैं।

रविदास साधु प्रकृति के होने के अलावा समाज के लिए भी बेहद सतर्क रहते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई।

इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग था, जिसका मानव धर्म और समाज पर अमिट प्रभाव पड़ता है।'रविदास के पद', 'नारद भक्ति सूत्र' और 'रविदास की बानी' उनके प्रमुख संग्रह हैं।


संत रविदास जी के प्रमुख दोहे-
-जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात, रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात 
-मन ही पूजा मन ही धूप, मन ही सेऊ सहज सरूप  
-करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की न तज्जियो आस, कर्म मानुष का धर्म है सत् भाखै रविदास  
-अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी  
-हरि सा हीरा छांड के, करै आन की आस

ऐसा चाहू राज मैं, मिले सभी को अन्न।
छोटे-बड़े समबसे, रैदास रहे प्रसन्न॥

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी / रैदास


प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै 'रैदासा॥

राम बिन संसै गाँठि न छूटै / रैदास

राम बिन संसै गाँठि न छूटै।
कांम क्रोध मोह मद माया, इन पंचन मिलि लूटै।। टेक।।
हम बड़ कवि कुलीन हम पंडित, हम जोगी संन्यासी।
ग्यांनी गुनीं सूर हम दाता, यहु मति कदे न नासी।।१।।
पढ़ें गुनें कछू संमझि न परई, जौ लौ अनभै भाव न दरसै।
लोहा हरन होइ धँू कैसें, जो पारस नहीं परसै।।२।।
कहै रैदास और असमझसि, भूलि परै भ्रम भोरे।
एक अधार नांम नरहरि कौ, जीवनि प्रांन धन मोरै।।३।।

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे / रैदास

।। राग आसा।।
  
हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।
हरि सिमरत जन गए निसतरि तरे।। टेक।।
हरि के नाम कबीर उजागर। जनम जनम के काटे कागर।।१।।
निमत नामदेउ दूधु पीआइया। तउ जग जनम संकट नहीं आइआ।।२।।
जनम रविदास राम रंगि राता। इउ गुर परसादि नरक नहीं जाता।।३।।

पांडे कैसी पूज रची रे / रैदास

।। राग सोरठी।।
  
पांडे कैसी पूज रची रे।
सति बोलै सोई सतिबादी, झूठी बात बची रे।। टेक।।
जो अबिनासी सबका करता, ब्यापि रह्यौ सब ठौर रे।
पंच तत जिनि कीया पसारा, सो यौ ही किधौं और रे।।१।।
तू ज कहत है यौ ही करता, या कौं मनिख करै रे।
तारण सकति सहीजे यामैं, तौ आपण क्यूँ न तिरै रे।।२।।
अहीं भरोसै सब जग बूझा, सुंणि पंडित की बात रे।।
याकै दरसि कौंण गुण छूटा, सब जग आया जात रे।।३।।
याकी सेव सूल नहीं भाजै, कटै न संसै पास रे।
सौचि बिचारि देखिया मूरति, यौं छाड़ौ रैदास रे।।४।।

नहीं बिश्रांम लहूँ धरनींधर / रैदास

।। राग विलावल।।
  
नहीं बिश्रांम लहूँ धरनींधर।
जाकै सुर नर संत सरन अभिअंतर।। टेक।।
जहाँ जहाँ गयौ, तहाँ जनम काछै, तृबिधि ताप तृ भुवनपति पाछै।।१।।
भये अति छीन खेद माया बस, जस तिन ताप पर नगरि हतै तस।।२।।
द्वारैं न दसा बिकट बिष कारंन, भूलि पर्यौ मन या बिष्या बन।।३।।
कहै रैदास सुमिरौ बड़ राजा, काटि दिये जन साहिब लाजा।।४।।

त्राहि त्राहि त्रिभवन पति पावन / रैदास

।। राग धनाश्री।।
  
त्राहि त्राहि त्रिभवन पति पावन।
अतिसै सूल सकल बलि जांवन।। टेक।।
कांम क्रोध लंपट मन मोर, कैसैं भजन करौं रांम तोर।।१।।
विषम विष्याधि बिहंडनकारी, असरन सरन सरन भौ हारी।।२।।
देव देव दरबार दुवारै, रांम रांम रैदास पुकारै।।३।।

जग मैं बेद बैद मांनी जें / रैदास


।। राग सारंग।।
  
जग मैं बेद बैद मांनी जें।
इनमैं और अंगद कछु औरे, कहौ कवन परिकीजै।। टेक।।
भौ जल ब्याधि असाधिअ प्रबल अति, परम पंथ न गही जै।
पढ़ैं गुनैं कछू समझि न परई, अनभै पद न लही जै।।१।।
चखि बिहूंन कतार चलत हैं, तिनहूँ अंस भुज दीजै।
कहै रैदास बमेक तत बिन, सब मिलि नरक परी जै।।२।।

माया मोहिला कान्ह / रैदास


।। राग कानड़ा।।
  
माया मोहिला कान्ह।
मैं जन सेवग तोरा।। टेक।।
संसार परपंच मैं ब्याकुल परंमांनंदा।
त्राहि त्राहि अनाथ नाथ गोब्यंदा।।१।।
रैदास बिनवैं कर जोरी।
अबिगत नाथ कवन गति मोरी।।२।।

राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ / रैदास

राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ ।
फल अरु फूल अनूप न पाऊँ ॥टेक॥

थन तर दूध जो बछरू जुठारी ।
पुहुप भँवर जल मीन बिगारी ॥१॥

मलयागिर बेधियो भुअंगा ।
विष अमृत दोउ एक संगा ॥२॥

मन ही पूजा मन ही धूप ।
मन ही सेऊँ सहज सरूप ॥३॥

पूजा अरचा न जानूँ तेरी ।
कह रैदास कवन गति मोरी ॥४॥

सो कत जानै पीर पराई / रैदास

।। राग सूही।।
  
सो कत जानै पीर पराई।
जाकै अंतरि दरदु न पाई।। टेक।।
सह की सार सुहागनी जानै। तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै।
तनु मनु देइ न अंतरु राखै। अवरा देखि न सुनै अभाखै।।१।।
दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी। जिनि नाह निरंतहि भगति न कीनी।
पुरसलात का पंथु दुहेला। संग न साथी गवनु इकेला।।२।।
दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ। बहुतु पिआस जबाबु न पाइआ।
कहि रविदास सरनि प्रभु तेरी। जिय जानहु तिउ करु गति मेरी।।३।।

मेरी प्रीति गोपाल सूँ जिनि घटै हो / रैदास

।। राग धनाश्री।।
  
मेरी प्रीति गोपाल सूँ जिनि घटै हो।
मैं मोलि महँगी लई तन सटै हो।। टेक।।
हिरदै सुमिरंन करौं नैन आलोकनां, श्रवनां हरि कथा पूरि राखूँ।
मन मधुकर करौ, चरणां चित धरौं, रांम रसांइन रसना चाखूँ।।१।।
साध संगति बिनां भाव नहीं उपजै, भाव बिन भगति क्यूँ होइ तेरी।
बंदत रैदास रघुनाथ सुणि बीनती, गुर प्रसादि क्रिया करौ मेरी।।२।।

ऐसी मेरी जाति भिख्यात चमारं / रैदास


।। राग आसा।।
  
ऐसी मेरी जाति भिख्यात चमारं।
हिरदै राम गौब्यंद गुन सारं।। टेक।।
सुरसुरी जल लीया क्रित बारूणी रे, जैसे संत जन करता नहीं पांन।
सुरा अपवित्र नित गंग जल मांनियै, सुरसुरी मिलत नहीं होत आंन।।१।।
ततकरा अपवित्र करि मांनियैं, जैसें कागदगर करत बिचारं।
भगत भगवंत जब ऊपरैं लेखियैं, तब पूजियै करि नमसकारं।।२।।
अनेक अधम जीव नांम गुण उधरे, पतित पांवन भये परसि सारं।
भणत रैदास ररंकार गुण गावतां, संत साधू भये सहजि पारं।।३।।

आज दिवस लेऊँ बलिहारा / रैदास

आज दिवस लेऊँ बलिहारा ।
मेरे घर आया रामका प्यारा ॥टेक॥

आँगन बँगला भवन भयो पावन ।
हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥१॥

करूँ डंडवत चरन पखारूँ ।
तन-मन-धन उन उपरि वारूँ ॥२॥

कथा कहै अरु अरथ बिचारैं ।
आप तरैं औरन को तारैं ॥३॥

कह रैदास मिलैं निज दासा ।
जनम जनमकै काटैं पासा ॥४॥


निष्कर्षतः :-
असल में संत रविदास को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब इस भारत भूमि पर सभी वर्णों, जातियों, समाजों और वर्गों के लोग एक मार्ग पर चलें। रविदास जी के संदेश आज भी हमें समाज कल्याण का मार्ग दिखाते है। संत रविदास ने अपने जीवन के व्यवहार से यह प्रमाणित किया है कि इंसान चाहे किसी भी कुल में जन्म ले लेकिन वह अपनी जाति और जन्म के आधार पर कभी महान नहीं बनता है। इंसान महान तब बनता है जब वह दूसरों के प्रति श्रद्धा और भक्ति का भाव रखते हुए समाज के प्रति अपना जीवन न्योछावर कर दे।

2022 , 2023 ,2024 में रविदास जयंती :-
माघ शुक्ल पूर्णिमा की तिथि अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार गुरु रविदास की 645वाँ जन्म वर्षगाँठ 16 फरवरी 2022 ,बुधवार को है इसलिये इसी दिन गुरु रविदास जी का 645 वाँ जन्म वर्षगाँठ मनाया जाएगा , 646वाँ जन्म वर्षगाँठ 5 फरवरी 2023 रविवार को और 647 वाँ जन्म वर्षगाँठ 24 फरवरी 2024 ,शनिवार को मनाया जाएगा।


मोची का मंत्र || संत शिरोमणि रविदास जयंती

राम रट में खपे जवानी
सद्गुरु रैदास बाबा की वाणी
मन चंगा तो कठौती में गंगा की पानी। 

सड़क के किनारे
एक वृक्ष पर बैठे दो पंक्षी
ताक रहे हैं
नीचे बैठे मोची की ओर
जूते का गंध फैली 
भीतर --- बाहर
काँप रहे हैं
चाम
और पास आ रहा है
माया रूपी मोटर का शोर
सफ़र शेष है
चप्पल का
चार कोस पर है ठहराव 
जानी-पहचानी
कह रहे हैं 
ज्ञानी-ध्यानी

राम रट...

उड़ता है जो 
वो चखता है फल
शांत बैठा है जो
वो लखता है कल
मोची के पास खड़े आदमी का
जूता सिल गया
उसका धैर्य
उपर्युक्त वृक्ष की तरह है
और उसका शील
शांत पंक्षी की तरह
मोची गुनगुना रहा है
संत रैदास की वाणी

राम रट....।
©गोलेन्द्र पटेल

संदर्भ :-
1.गूगल 
2. विकिपीडिया
3. भिन्न भिन्न ई-न्यूज़पेपर एवं ई-पत्र-पत्रिकाएं
4. सलेब्स बुक
5. एवं अन्य।

नोट :- उपर्युक्त लेख कोई स्वतंत्र लेख न हो कर ; संकलन है जिसे आप नोट्स की तरह पढ़ सकते हैं।



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नाम : गोलेन्द्र पटेल
{काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र}
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Monday, 15 February 2021

" महामारी में निराला और उनकी रचनाएं " : आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल || प्रस्तुति : आर्यपुत्र दीपक & मनकामना शुक्ल पथिक || गोलेन्द्र पटेल



कवि आलोचक व आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल

     निराला जयंती : 2021
 

 " साहित्य बीसवीं सदी को सूक्ष्मानुओं और शब्द के संघर्ष की सदी के रूप में देखता है इस दृष्टि से निराला बीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर के बड़े रचनाकार हैं। "

                                         - प्रो० श्रीप्रकाश शुक्ल


प्रगतिशील लेखक संघ, उत्तर प्रदेश के आमुख पटल पर हिंदी के ख्यात कवि और हिंदी विभाग, बीएचयू के आचार्य प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल का 'निराला की 122 वीं जयंती'  पर आयोजित विशेष तीन दिवसीय व्याख्यान के तहत प्रथम दिन " महामारी में निराला और उनकी रचनाएं " विषय पर व्याख्यान कल देर शाम सम्पन्न हुआ । इसका संयोजन और संचालन प्रयागराज के प्रकर्ष मालवीय विपुल ने किया । जिन्होंने लेखक का संक्षिप्त परिचय के साथ व्याख्यान का औपचारिक शुरूआत किये।


                     इस अवसर पर बोलते हुए प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि बहुलांश आलोचकों के अनुसार आज महाप्राण निराला का 122 वीं जयंती मना रहें हैं। 

                            आचार्य शुक्ल निराला के महामारी के मानस पर अपना व्याख्यान केंद्रित करते हुए कहते हैं कि निराला के रचनात्मक मानस के पीछे बीसवीं सदी की महामारी का बड़ा योगदान रहा है । उनके यहां जो महामारी का संदर्भ मिला खासकर महामारी और बसंत का जो संदर्भ मिला उसमें गद्य और पद्य दोनों के संदर्भ जुड़ते है। क्योंकि दोनों में ही कवि का बासंतिक मन सक्रिय रहकर महामारी पर विजय की कोशिश करता  रहा है। यह उनके भीतर लगातार संघर्ष की प्रेरणा देता रहा है और यह जो बासंतिक मानस है वह उस समय के महामारी के पृष्टभूमि को इंगित करती है।

                                     1920 के आरंभ में निराला का कवि कर्म उनका रचना संसार जिस रूप में बनता है उसके ऊपर महामारी की छाया मुखरता से देखी जा सकती है क्योंकि  एक तरफ यह समय प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय का है जिसमें एक तरफ प्लेग की महामारी समाप्त हो रही होती है और दूसरी तरफ स्पेनिश फ्लू भारत में दस्तक दे रहा होता है। निराला की  कृतियों से गुजरते हुए इन सब स्थितियों का  पता चलता है । यहां कहने का ये मतलब है कि निराला का रचनात्मक मानस महामारी की पीड़ा से विकसित होता है। निराला इन कठिन जीवन स्थितियों के बीच रचने वाले कवि रहे हैं।

                    निराला के 'अलका'(1935 ) उपन्यास के माध्यम से आपने इनफ्लुएंजा महामारी और उस दौर में निराला जिस रूप में इससे प्रभावित हुए इसके बारे में भी एक गम्भीर चर्चा किया । इस अवसर पर आपने विस्तार से 'कुल्ली भाट' (1939) नामक कृति की भी चर्चा की।

आगे आपने कहा कि जब हम उनकी कविता की बात करते हैं तो 1920 से निराला का रचना संसार शुरू होता है साथ है, "जूही की कली" से हम उनका रचनात्मक शुरुआत मानते है तो प्रथम दौर की कविताएं 1920 से 1932 तक यानी गीतिका के प्रकाशन के पहले आती हैं।यह  दौर महामारी की पृष्ठभूमि में निराला के आहत मन का दौर होता है जो उनके कविताओं में दिखाई देता है लेकिन साथ-साथ उनको उस बीमारी के दबाव के भीतर से बसंत की अनुगूंजे भी सुनाई देती है ।

                             निराला में बीमारी और बसंत दोनों के बीच एक गहरा सामंजस्य है और इसीलिए निराला में बीमारी के दबाव तो है ही लेकिन बसंत के विविध स्वरूप देखने को मिलता है जो किसी अन्य कवि में दिखाई नहीं देता । इस नाते बसंत के नाना रूपों की सक्रियता से एक तरफ जहां निराला का कवि मानस बनता है तो वहीं पर महामारी का संत्रास और उसके दबाव से भी उनका कवि मानस निर्मित होता है ।

ऐसे दौर में अगर देखें तो 1935 में प्रकाशित 'अलका' उपन्यास उसके बाद 1939 में प्रकाशित  'कुल्ली भाट'  रेखाचित्र है लेकिन 'अलका उपन्यास' में  इन्फ्लूएंजा महामारी का जिस प्रकार वे जिक्र करते हैं वह रोंगटे खड़े करने वाला है और इस पृष्ठभूमि में जब निराला की समग्र रचनाओं मूल्यांकन करते हैं ।

                                   हमें नहीं भूलना चाहिए कि बीसवीं सदी को 'महामारी की सदी' कहा गया है। बीसवीं सदी की शुरुआत ही पोलियो, सार्स , इबोला , फ्लू और जीका जैसे विनाशकारी एवं भयावह वाइरस से होता है। संदर्भ स्वरूप आपने 'मार्क होनीबोम' , चिनमय  तुंबे व  रोमिन जॉन बेंलगु की  पुस्तकों के आधार पर बताया कि   युद्ध और महामारी के बीच बहुत गहरा रिश्ता रहा है। 1918 में इन्फ्लूएंजा के महामारी जो हिंदुस्तान में हुआ उसके पीछे भी युद्ध का बहुत गहरा प्रभाव था । 

                            आगे लुईस पाश्चर को संदर्भित करते हुए कहते हैं - " it is the microbes , that will hide the last word in the 20th century ." यानी ये रोगाणु ही होगें जो बीसवीं सदी में निर्णय की अंतिम स्थिति में होगें । लुईस पाश्चर के एक और उद्धरण का जिक्र करते हुए आप कहते हैं " Microbes that will rule the world ." प्रसंगवश उन्होंने 5वी सदी ईसा पूर्व एथेंस की महामारी का भी ज़िक्र किया। इसी संदर्भ में महामारी के भयावहता को देखते हुए ग्रीक इतिहासकार थूशी राइड के उद्धरण का जिक्र कहते हुए आप ने कहा कि " कोई ऐसा घर ना था जिसमें लाश ना रह रहा हो । " संभवतः ये स्थिति एथेंस और स्पार्टा के बीच हुए भयंकर युद्ध से उत्पन्न हुई प्लेग और अन्य महामारी का परिणाम था ।

               महामारी में साहित्य की भूमिका पर बात करते हुए आप ने कहा कि महामारी का भयजनित प्रभाव कई बार महामारी से ज्यादा भयावह और भयानक होता है और इस भयावहता को समझने और सुलझाने का काम उस समय का साहित्य करता आया है।

                  बीसवीं सदी में मनुष्य और प्रकृति के बीच जो असंतुलन आया उसी का परिणाम बीसवीं सदी में आयी तमाम महामारियां है । ठीक वहीं स्थिति 21 सदी के प्रारंभ में भी देखने को मिल रही है । जिसमें हम कोरोना , इबोला और जीका जैसे खतरनाक वाइरस से लड़ रहें हैं।

         आगे आप ने कहा कि परिवेश, पर्यावरण और मानव व्यवहार की सर्वाधिक चिंताएं अगर कहीं है तो वह साहित्य में दिखाई देती है जहां से साहित्य अपना स्रोत ग्रहण करता है जहां से वह शब्द संपदा को विकसित करता है । इसी संदर्भ में ' द प्लेग ' नामक प्रसिद्ध उपन्यास के रचनाकार अल्बर्ट कामू के माध्यम से कहते हैं कि " ये महामारियां है तो अपूर्वानुमय लेकिन बार बार आती रहेंगी ।" 

              आगे आप स्टालिन के एक वाक्य का संदर्भ लेते हुए कहते हैं कि " एक व्यक्ति की मृत्यु तो संवेदना हो सकती है लेकिन अनेकों की मृत्यु आंकड़ों से अधिक कुछ भी नहीं .." यहां कहने का मतलब है दुनिया में महामारी जब भी आयी है मनुष्यता को तिल तिल कर मारा है । इस संदर्भ को कोरोना महामारी में भी देख सकते हैं। 

              कोरोना महामारी में प्रशासन के लापरवाही और दबंगई पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि " आपदा में आदेश देने का रोग बहुत सनातन है । " जिसे हाल के वर्षों में आयी महामारी में वैश्विक परिदृश्य में देख सकते हैं । 

                             महामारी के मनोजगत को वगैर उस समय के साहित्य को पढ़े नहीं जाना जा सकता है । इस क्रम में जब निराला की  दो प्रमुख रचनाओं पर आते हैं तो जिनमें प्लेग महामारी और इन्फ्लूएंजा महामारी का जिक्र आता है एक तो 'कुल्लीभाट' जिसकी इस करोना काल में भी जिक्र होता रहा लेकिन 'अलका' नामक उपन्यास में महामारी के मानस का जैसा चित्रण उन्होंने किया है जो 1935 में लिखा उपन्यास है उसकी चर्चा बहुत कम सुनाई दी।

                          'अलका' उपन्यास महामारी के दबाव में लिखा गया उपन्यास है और किसानों और कुलियों की शिक्षा की अवस्था में मदद करने वाला भी उपन्यास है । आज 2020 के किसानों के आंदोलन और महामारी के संदर्भ में 'अलका' उपन्यास महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आज इसकी जरूरत है । रोचक बात यह है कि स्थितियां लगभग इसमें वही है जो आज कोरोना काल में मिलती हैं। 

            इस अवसर पर उनकी कविताओं की विस्तृत चर्चा करते हुए  आपने कहा कि निराला के यहां बीमारी का संघर्ष और महामारी का संत्रास दोनों मिलता है। निराला के लेखन का पर्याप्त हिस्सा महामारी के मानस के बीच लिखा गया है । जीवन के आरंभ में ही महामारी से मृत्यु का जो तांडव  निराला ने देखा था उससे वह जीवन भर मुक्त नहीं हो सके । उनमें एक भय हमेशा बना रहा जिसका उन्होंने बहुत साहस के साथ मुकाबला किया। उनका जो व्यक्ति भय था उसे उन्होंने कविता की समष्टिगत लय से  तिरोहित करने की कोशिश की और यही कारण है कि उनका कवि हमेशा उनके हर सामाजिक संबंधों पर भारी दिखाई देता है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 'सरोज स्मृति' है जो अपने इसी समष्टिगतलय से विकसित होती है।

                        इस प्रकार कवि निराला प्रकृति के भीतर से बसंत को चुनते हैं और कवि की जिम्मेदारी की भूमिका में आकर के व्यथा के बरक्स बसंत को चुनते हैं और इसी बसंत से वह जीवन को ऊर्जावान बनाते हैं और जिससे वे बसंत के माध्यम से वेदना को विदीर्ण ही नहीं करते , उसे बदल भी देते हैं ।ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि निराला स्वयं बसंत की उपज थे। 

                              निराला बसंत को अपने जीवन की तरह बचाना चाहते थे उसे रखते हुए उसके माध्यम से जीवन को बचाना चाह रहे थे और उसके विविध रंगों से जीवन को ऊर्जावान बनाये  रखने की कोशिश कर रहे थे । वह भय से विजय प्राप्त करने की कोशिश में बसंत के बहुत करीब पहुंच गए और निराला इस बसंत के विविध रंगों में रंग गए ।

नोट:- इस रपट का कुछ अंश बड़ी बहन रंजना गुप्ता के पोस्ट से लिया गया है।

                          @दीपक आर्यपुत्र

शोधार्थी , हिंदी विभाग , बीएचयू।



"निराला का दुःखबोध ही उनकी कविताओं का प्राणतत्व है"

           प्रो०श्रीप्रकाश शुक्ल


महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 122वीं जयंती बसंत पंचमी के पावन पर्व की पूर्वसंध्या पर प्रगतिशील लेखक संघ उत्तर प्रदेश। द्वारा प्रायोजित एक वेबिनार का आयोजन किया गया। जिसका विषय था "महामारी में निराला व उनकी कविताएँ" जिसके मुख्य वक्ता थे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिंदी के कवि, आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल जी।


बताते चलें कि इसके पूर्व वे प्रेमचंद, तुलसी, रैदास, अरुण कमल, व मदन कश्यप जैसे अन्य कालजयी रचनाकारों पर अपना सात महत्वपूर्ण वक्तव्य भी दे चुके हैं। उन कवियों के दौर में महामारी का कैसा प्रभाव था वे अपने वक्तव्यों में बताते रहे हैं। इसी कड़ी में वे कल निराला पर बोल रहे थे।


वे महामारी में निराला को अलग तरीके से देखने की कोशिश भी करते हैं। और कहते हैं, मैं इस बात को बार-बार महसूस करता हूँ कि निराला का चाहे गद्य हो या पद्य (कविता) पर उनका बासंतिक मानस लगातार सक्रिय रहा है, जो उनके भीतर लगातार उन्हें संघर्ष करने की प्रेरणा भी देता है।


वे कहते हैं कि जब प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति होती है, तो एक तरफ प्लेग महामारी समाप्त हो रही होती है। वहीं दूसरी ओर स्पेनिश-फ्लू भारत मे दस्तक दे रहा होता है।

निराला के तमाम साहित्यिक संदर्भों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि 1918 में इंफ्यूएंजा महामारी से निराला के साहित्य का गहरा सम्बंध रहा है। जिसमे 22 वर्ष के उम्र में ही उनकी पत्नी व परिवार के कई लोग दिवंगत हो जाते हैं। इस पीड़ा ने उनके साहित्य पर गहरा प्रभाव डाला। जहाँ उनकी कविताओं में बीमारी का असर भी दिखाई देता है।


वे बोलते हैं कि निराला में बीमारी से उपजे इस पीड़ा को वे बसंत के उल्लास से दूर करने की कोशिश भी करते हैं। यहीं कारण है कि उनकी रचनाओं में बीमारी व बसन्त का द्वंद्व देखने को मिलता है।

वे बताते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत बाहर से अपने देश लौटे सैनिक जो मोर्चे पर थे, उनके साथ ही यह बीमारी भी भारत मे आयी। वे बताते हैं कि उस वक्त लगभग पांच करोड़ लोग इसी बीमारी में कालकवलित हो गए थे। जिसमें अकेले 2 करोड़ हिंदुस्तान से थे।

उन्होंने कहा कि 1920 से 1030 तक का जो निराला का रचना संसार है उसमें महामारी की छाया को बड़ी उग्रता से देखा जा सकता है। इसी बीच वे निराला के उपन्यास 'अलका'

व 'कुल्लीभाट' का भी विशेष जिक्र करते हैं।


प्रो०शुक्ल जी निराला व उनके साहित्यिक संदर्भों की चर्चा इन्हीं उपन्यासों को आधार बनाकर करते भी हैं। और प्लेग व इन्फ्लूएंजा की महामारी के प्रभावों का सोदाहरण विवेचन भी करते हैं। और कहते हैं कि बीमारी की विकरालता के बीच निराला के यहाँ बसन्त के बहुत से रंग हैं, जो उनको भय व पीड़ा से मुक्ति देते हैं।


निराला अपने काव्य में शिल्प को नैतिक आधार प्रदान करते हैं।

"वह एक और मन रहा राम का जो न थका"

निराला के यहाँ एक तरफ अवसाद मिलता है तो दूसरी तरफ़ आस्वस्ति भी मिलती है। निराला का मन ही बासंतिक मन है।


निराला अपने दुःख के दौर में दरकते व टूटते मन को बचाने की कोशिश भी करते हैं और हद तक सफल भी होते दिखाई देते हैं।


उन्होंने कहा कि निराला के यहाँ संघर्ष है, विसाद है व उससे बाहर निकल आने की कोशिश भी है। बीमारी के प्रभाव के भीतर से बसंत की अनुगूंजें भी उनकी रचनाओं में सुनाई देती है। उनकी रचनाधर्मिता में बीमारी व बसन्त एक दूसरे से घुले मिले दिखाई देते हैं।

इस तरह बीमारी व बसंत का ऐसा द्वंद्व निराला के यहाँ स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि निराला के यहाँ बीमारी का दबाव तो है ही साथ ही उनकी रचनाओं में बसन्त के जितने भी रूप हैं वे सभी उनके यहाँ विद्यमान हैं।


आगे वे कहते हैं कि समय-समय पर प्लेग, हैजा, इंफ्यूएंजा, चेचक , एड्स जैसी अनेक महामारियों ने दुनिया को अलग-अलग ढंग से प्रभावित किया है, नुकसान पहुंचाया है। इसी क्रम में बीसवीं सदी में स्पैनिश फ्लू आई और पूरी दुनिया को अपने प्रभाव में ले लिया। वे थोड़ा पीड़ा के साथ कहते हैं कि इसे बीमारी नही बल्कि हम इस सदी की सबसे भयावह त्रासदी कह सकते हैं, जहाँ एक तरफ घरों में मातम छाया है और दूसरी तरफ घर के दरवाजे पर दीपक जलाने का क्रम चल रहा है। उसी क्रम में ताली व थाली की हाहाकारी दृश्य भी देखने को मिलता है। उससे भी भयावह स्थिति है कि सिपाहियों द्वारा घूम-घूम कर यह देखना कि किसके दरवाजे पर दीपक जल रहा है किसके नही...! इस हाहाकारी दृश्य पर तंज भी कसते हैं, और वे कवि धूमिल की प्रतिवाद के रूप मे पंक्तियों का पाठ भी करते हैं।


इसी क्रम में वे अलग-अलग सदी मे आये अलग अलग बीमारियों का भी जिक्र करते हैं। और तमाम उदाहरण भी देते हैं।


उन्होंने निराला का 22 वर्ष की सबसे कम उम्र में पत्नी का खोना उनके समय की सबसे बड़ी त्रासदी बतलाया। उन्होंने निराला की इस साहित्य व संघर्षों की यात्रा को अवसाद से आश्वस्तता की यात्रा बतलाया। तथा वे निराला को अवसाद से आश्वस्तता की यात्रा करने वाला कवि कहा।


वे कहते हैं कि निराला के यहाँ जितना अवसाद है, बसन्त का उतनी ही विविधकारी भाव दिखाई देता है। बीमारी और बसन्त का रिस्ता निराला के यहाँ अनिवार्य है। बसंत को जिस दृष्टि से निराला ने देखा है वैसा किसी भी कवि ने नही देखा न ही समझा।

निराला का बसंत एक उल्लास नही है, बल्कि उनके जीवन का संघर्ष है।


उनके यहाँ पतझड़ में पलायन नही है बल्कि पहचान की नई दृष्टि है। उन्होंने निराला की कविताओं को भव, भय का हरण करने वाली कविताएँ कहा। वे कहते हैं कि निराला ऐसे ताक़तवर कवि हैं जो विषय को कविता में रूपांतरित करने की सामर्थ्य रखते हैं।

निराला अपने 1932 ई० से 35 के दौर की पीड़ा को छुपाते नही बल्कि उस दौर के विरह को अपनी रचनाओं में दर्शाते भी हैं और विजय की कामना भी करते हैं।


इसी बीच वे निराला की 'बासन्ती' 'अधिवास' और 'गीतिका' का भी जिक्र करते हैं। जिसमे वे बीमारी के अवसाद से मुक्त हो कर बसंत का आवाह्न भी करता हुवा कवि मन दिखाई देता है। उनके यहाँ वेदना, बसंत उसके साथ विकल प्रार्थना के स्वर से भरी कविता प्रवित्ति दिखाई देती है।

महामारी ने निराला के मानस को जिस तरह से प्रभावित किया है। उसमें उनके प्रार्थना के गीत संकलित हैं। अवसाद की ऐसी स्थिति निराला के समय मे भी हुई थी और आज कोरोनाकाल में भी तमाम कवियों ने लिखी है।

वे बताते हैं कि निराला के जीवन का पर्याप्त हिस्सा बीमारी में बिखर गया। महामारी में मृत्यु का जो ताण्डव उन्होंने देखा था उसे वे जीवन भर नही भूल पाए, लेकिन उन्हें एक भय हमेशा बना रहा जिसका उन्होनें बड़े साहस के साथ मुकाबला किया। उनका जो व्यक्ति भय था उसे उन्होनें अपनी कविता में समष्टि के रूप में वर्णित किया है।

'गीत गाने दो मुझे तुम वेदना के स्वर'

उनका बीतता दुख उनकी चढ़ती जवानी का दुःख था जिसमे आवेग रहता है और स्वीकार्यता भी होती है। निराला का जो संघर्ष है वो विषाद है जिससे वे बाहर आने की कोशिश भी करते हैं।


शुक्ल जी ने निराला द्वारा 1934 में लिखी कविता "अभी न होगा मेरा अंत अभी-अभी ही तो आया है, मेरे जीवन मे मृदुल बसंत।" और 'मैं ही बसंत का अग्रदूत' तथा 1961 में लिखी उनकी अंतिम कविता 'पत्रोत्कंठित' का पाठ भी करते हैं। साथ ही महाप्राण निराला की कई महत्वपूर्ण कविताओं का सस्वर पाठ भी करते हैं। और कवि निराला की स्मृति को प्रणाम करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव संजीव श्रीवास्तव का विशेष आभार प्रकट करते हैं। साथ ही ऑनलाइन कार्यक्रम में शामिल श्रोताओं दर्शकों का भी अभिवादन करना नही भूलते। इस महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम का सफल संचालन प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े तेज तर्रार युवा प्रकर्ष मालवीय ने किया।

  @ मनकामना शुक्ल पथिक


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