Thursday, 22 December 2022

किन्नर पर केंद्रित आठ कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

 किन्नर पर केंद्रित आठ कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल



1).


कविता में किन्नर


प्रिय दोस्त!

न स्त्री

न पुरुष

न ही अर्द्धनारीश्वर हो तुम


तुम कविता में किन्नर हो

यानी थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर

लफ़ंगों की भाषा में हिजड़ा

तुम्हारा गात

गोया गम का पिंजड़ा

पर तुम मुझे पसंद हो!...


इस सृष्टि में

तुम्हारी ताली

कुदृष्टि के लिए

गाली है

तुम भी उसी कोख से उत्पन्न हुए हो

जिससे मैं

तुम देश की संतान हो

मेरे दोस्त!

                    रचना : 20-12-2022

2).


ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


क्या कोई रोक पाया है कभी

आँखों से पकी पीड़ा का टपकना

माथे पर श्रम की बूँद का अंकुरित होना

देह में दर्द का खिलना

फिर कैसे रोक पायेगा

कभी कोई

ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


सुख में

पत्थर पर उग जाती है प्रसन्नता

जैसे 

रेत में रोती हुई दूब ;

जहाँ मर्द और औरत के बीच

नदी

किन्नर का संचित

आँसू है

जो अपने आप में धाँसू है!

                         रचना : 21-12-2022

3).


किन्नर-कथा


अस्तित्व की तलाश में शिखंडी

अपनी आत्मा को तब तक तपाया

जब तक कि भीष्म 

शरशय्या पर सो नहीं गये


मगर याद रहे

साधना के समय स्त्री रूप में था वह

तप के बाद हुआ पुरुष


उसने अर्द्धनारीश्वर रूप की नहीं

शंकर की तपस्या की

तुम भी कर रहे हो, दोस्त!

लेकिन तुम किन्नर हो

काश कि तुम्हारी प्रार्थना भी 

सुनते शिव!


तुम्हारी व्यथा की कथा

शायद नंदी के कानों में कहने से

शीघ्र सुन लें वे!


तुम जब भी ट्रेनों में या चौराहों पर

या किसी के द्वार पर

तालियाँ बजाते हुए

दिखते हो

तुम्हारे होंठों पर होते हैं

सोहर

मंगल गीत

शुभकामना के स्वर


जबकि तुम भीतर से बहुत दुखी होते हो

और बाहर से बहुत प्रसन्न

तुम अपने चेहरे पर इतनी प्राकृतिक प्रसन्नता

कैसे उगा लेते हो?

क्या है इसका राज़?

आज

मेरी कलम निस्तब्ध पड़ी है

मन के द्वार पर 

एक ट्रांसजेंडर मित्र की स्मृति खड़ी है


जो इस करुणामयी कविता में 

किन्नर-कथा को इन्नर की तरह 

परोस चुकी है!

रचना : 21-12-2022 


4).


हिजड़ों की फ़ौज़


बचपन से

सुनता आ रहा हूँ मैं

कि हिजड़ों की फ़ौज़ से

जंग 

जीती नहीं जाती है


जंग जीती जाती है

हौसलों से!

रचना : 21-12-2022

 5). 


किन्नर


कंठ से नहीं, कोख से फूटे

शब्द ने पूछा 

कि

इस धरती पर

उसकी जगह कहाँ है?

जो फूल

क्लीव है


वसंत का मौसम है

मगर रंगों का आयतन कम हो गया है

गंध गायब हो गयी है

भाषा से


हवा में केवल

किन्नर, मौगा, हिजड़ा, छक्का, थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर जैसे दर्दनाक

संबोधन हैं

ये कैसे उपवन हैं?


जहाँ सुनने वाला न पुरुष है

न स्त्री है

इन दोनों से भिन्न है!

रचना : 22-12-2022 


6).


किन्नर पर कविता


संसद की सड़क पर 

माँसपेशियों की मीठी महक ने कहा

कि वे न नारी हैं न नर!


उधर

एक कोई स्वर स्वयं को गाता आ रहा है

कोई समय सुनता जा रहा है उनको

कोई गमी उनकी गज़ल बन रही है

लेकिन उनकी लयबद्ध तालियाँ

मंगल के गीत हैं

उनके आँसू की आवाज़

सरसराहट में स्वप्न के संगीत हैं

वे सदियों से गाए जा रहे हैं

अपनी मानवीय स्मृति

इस धरती के लिए!


इधर

मैंने ट्रांसजेंडर साथियों से बातचीत करते हुए

महसूस किया है कि

लंबी हिचकियों के बीच

हृदय में हुलास मारता है दुःख

हड्डियाँ चरमरा जाती हैं 

और उनकी देह

उन्हें दर्द का गेह मालूम होती है


धूप, हवा और पानी प्रतिकूल हैं

पर अपनी पीड़ा

वे गूँथते जाएंगे अपनी धुन के धागे पर

अभिशप्त जीवन के लिए


जहाँ उनमें एक उम्मीद है

कि ऊसर में उनकी आत्मकथा उगेगी

जो चुप्पी के समाजशास्त्र का सप्रसंग व्याख्या करेगी


आह! आत्मा के अक्षर 

इतिहास के पन्नों पर अच्छे लग रहे हैं!


मेरे दोस्त!

यह सोहर में स्याह संवेदना व्यक्त करने का समय है

और तुम चुप हो


तुमसे दोस्ती है तुम हो इसलिए यह 

किन्नर पर कविता है 

जैसे कोई ठूँठ पेड़ सिर्फ़ इसलिए है

क्योंकि पंक्षियों की उड़ान भरने में

उसकी अहम भूमिका है! 

रचना : 22-12-2022

7).


तीसरा समाज


भले ही भारत-भूमि 

आदिकाल से तमाम जातियों की रही है

किन्तु ;

आज मैंने

दलित, आदिवासी, वृद्ध, विकलांग 

व किन्नर पर काम करते हुए

पाया कि

साहित्य में एक तीसरा समाज है!

रचना : 22-12-2022

8).


 किन्नर पर केंद्रित किताब


आज सुबह-सुबह कोयल की कूक नहीं

किसी हिजड़े के हृदय की हूक सुनी है मैंने

इन दिनों मैं पढ़ रहा हूँ

किन्नर पर केंद्रित किताब


अक्षरों के नीचे दबे दर्द को देख रहा हूँ मैं


सुना मैंने कई चैनलों पर ट्रांसजेंडरों के इंटरव्यू

शक़ हुआ उन पर

लिखे गये विमर्शों को लेकर

जहाँ ज़िन्दगी जिज्ञासा बन गयी


अँधेरे को चीरती चेतना

पेड़ का नहीं,

प्रसव पीड़ा का तना है

जो समंदर के शोक में सरिता की संवेदना है


वर्तमान के विमर्श यह नहीं देख रहे कि

उसमें समकालीन सच कितना है!


उनमें बस कागज़ पर उतने की होड़ लगी है

कोई आहत आत्मा आधी रात जगी है


अब जब कवि हवा में कुछ शब्द उछालते हैं

आलोचक उसे कविता कहते हैं

ऐसे में मतलब समझ ही गये 

कि मैं कहना क्या चाहता हूँ


उनके दुःख में दुखी होना चाहता हूँ मैं 

गीत की भाषा में रोना चाहता हूँ

ताकि वे सुन सकें

जिन तक चिखना-चिल्लाना-गुर्राना 

जैसी क्रियाएँ नहीं पहुँचती हैं


उनके अस्तित्व की आवाज़ें

रोक दी जाती हैं

जो तीसरे समाज के नागरिक हैं!

रचना : 23-12-2022

कवि परिचई :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल


उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान' , 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :


कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-


गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'गद्य कोश', 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट', 'सबलोग पत्रिका', 'वागर्थ', 'अमर उजाला', 'रणभेरी', 'हिंदुस्तान', 'दैनिक जागरण', 'परिवर्तन' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


लम्बी कविता : तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव


प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)


अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।


मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर और 'दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान' के संस्थापक हैं।


संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

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किन्नर पर केंद्रित छह कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल



1).


कविता में किन्नर


प्रिय दोस्त!

न स्त्री

न पुरुष

न ही अर्द्धनारीश्वर हो तुम


तुम कविता में किन्नर हो

यानी थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर

लफ़ंगों की भाषा में हिजड़ा

तुम्हारा गात

गोया गम का पिंजड़ा

पर तुम मुझे पसंद हो!...


इस सृष्टि में

तुम्हारी ताली

कुदृष्टि के लिए

गाली है

तुम भी उसी कोख से उत्पन्न हुए हो

जिससे मैं

तुम देश की संतान हो

मेरे दोस्त!

                    रचना : 20-12-2022

2).


ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


क्या कोई रोक पाया है कभी

आँखों से पकी पीड़ा का टपकना

माथे पर श्रम की बूँद का अंकुरित होना

देह में दर्द का खिलना

फिर कैसे रोक पायेगा

कभी कोई

ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


सुख में

पत्थर पर उग जाती है प्रसन्नता

जैसे 

रेत में रोती हुई दूब ;

जहाँ मर्द और औरत के बीच

नदी

किन्नर का संचित

आँसू है

जो अपने आप में धाँसू है!

                         रचना : 21-12-2022

3).


किन्नर-कथा


अस्तित्व की तलाश में शिखंडी

अपनी आत्मा को तब तक तपाया

जब तक कि भीष्म 

शरशय्या पर सो नहीं गये


मगर याद रहे

साधना के समय स्त्री रूप में था वह

तप के बाद हुआ पुरुष


उसने अर्द्धनारीश्वर रूप की नहीं

शंकर की तपस्या की

तुम भी कर रहे हो, दोस्त!

लेकिन तुम किन्नर हो

काश कि तुम्हारी प्रार्थना भी 

सुनते शिव!


तुम्हारी व्यथा की कथा

शायद नंदी के कानों में कहने से

शीघ्र सुन लें वे!


तुम जब भी ट्रेनों में या चौराहों पर

या किसी के द्वार पर

तालियाँ बजाते हुए

दिखते हो

तुम्हारे होंठों पर होते हैं

सोहर

मंगल गीत

शुभकामना के स्वर


जबकि तुम भीतर से बहुत दुखी होते हो

और बाहर से बहुत प्रसन्न

तुम अपने चेहरे पर इतनी प्राकृतिक प्रसन्नता

कैसे उगा लेते हो?

क्या है इसका राज़?

आज

मेरी कलम निस्तब्ध पड़ी है

मन के द्वार पर 

एक ट्रांसजेंडर मित्र की स्मृति खड़ी है


जो इस करुणामयी कविता में 

किन्नर-कथा को इन्नर की तरह 

परोस चुकी है!

रचना : 21-12-2022 


4).


हिजड़ों की फ़ौज़


बचपन से

सुनता आ रहा हूँ मैं

कि हिजड़ों की फ़ौज़ से

जंग 

जीती नहीं जाती है


जंग जीती जाती है

हौसलों से!

रचना : 21-12-2022

 5). 


किन्नर


कंठ से नहीं, कोख से फूटे

शब्द ने पूछा 

कि

इस धरती पर

उसकी जगह कहाँ है?

जो फूल

क्लीव है


वसंत का मौसम है

मगर रंगों का आयतन कम हो गया है

गंध गायब हो गयी है

भाषा से


हवा में केवल

किन्नर, मौगा, हिजड़ा, छक्का, थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर जैसे दर्दनाक

संबोधन हैं

ये कैसे उपवन हैं?


जहाँ सुनने वाला न पुरुष है

न स्त्री है

इन दोनों से भिन्न है!

रचना : 22-12-2022 


6).


किन्नर पर कविता


संसद की सड़क पर 

माँसपेशियों की मीठी महक ने कहा

कि वे न नारी हैं न नर!


उधर

एक कोई स्वर स्वयं को गाता आ रहा है

कोई समय सुनता जा रहा है उनको

कोई गमी उनकी गज़ल बन रही है

लेकिन उनकी लयबद्ध तालियाँ

मंगल के गीत हैं

उनके आँसू की आवाज़

सरसराहट में स्वप्न के संगीत हैं

वे सदियों से गाए जा रहे हैं

अपनी मानवीय स्मृति

इस धरती के लिए!


इधर

मैंने ट्रांसजेंडर साथियों से बातचीत करते हुए

महसूस किया है कि

लंबी हिचकियों के बीच

हृदय में हुलास मारता है दुःख

हड्डियाँ चरमरा जाती हैं 

और उनकी देह

उन्हें दर्द का गेह मालूम होती है


धूप, हवा और पानी प्रतिकूल हैं

पर अपनी पीड़ा

वे गूँथते जाएंगे अपनी धुन के धागे पर

अभिशप्त जीवन के लिए


जहाँ उनमें एक उम्मीद है

कि ऊसर में उनकी आत्मकथा उगेगी

जो चुप्पी के समाजशास्त्र का सप्रसंग व्याख्या करेगी


आह! आत्मा के अक्षर 

इतिहास के पन्नों पर अच्छे लग रहे हैं!


मेरे दोस्त!

यह सोहर में स्याह संवेदना व्यक्त करने का समय है

और तुम चुप हो


तुमसे दोस्ती है तुम हो इसलिए यह 

किन्नर पर कविता है 

जैसे कोई ठूँठ पेड़ सिर्फ़ इसलिए है

क्योंकि पंक्षियों की उड़ान भरने में

उसकी अहम भूमिका है! 

रचना : 22-12-2022

कवि : गोलेन्द्र पटेल 

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

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Wednesday, 21 December 2022

किन्नर पर केंद्रित कविताएँ | कविता में किन्नर | ट्रांसजेंडर संतान का दुःख! | किन्नर-कथा | हिजड़ों की फ़ौज़ | गोलेन्द्र पटेल

   किन्नर पर केंद्रित कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

1).


कविता में किन्नर


प्रिय दोस्त!

न स्त्री

न पुरुष

न ही अर्द्धनारीश्वर हो तुम


तुम कविता में किन्नर हो

यानी थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर

लफ़ंगों की भाषा में हिजड़ा

तुम्हारा गात

गोया गम का पिंजड़ा

पर तुम मुझे पसंद हो!...


इस सृष्टि में

तुम्हारी ताली

कुदृष्टि के लिए

गाली है

तुम भी उसी कोख से उत्पन्न हुए हो

जिससे मैं

तुम देश की संतान हो

मेरे दोस्त!

                    रचना : 20-12-2022

2).


ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


क्या कोई रोक पाया है कभी

आँखों से पकी पीड़ा का टपकना

माथे पर श्रम की बूँद का अंकुरित होना

देह में दर्द का खिलना

फिर कैसे रोक पायेगा

कभी कोई

ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


सुख में

पत्थर पर उग जाती है प्रसन्नता

जैसे 

रेत में रोती हुई दूब ;

जहाँ मर्द और औरत के बीच

नदी

किन्नर का संचित

आँसू है

जो अपने आप में धाँसू है!

                         रचना : 21-12-2022

3).


किन्नर-कथा


अस्तित्व की तलाश में शिखंडी

अपनी आत्मा को तब तक तपाया

जब तक कि भीष्म 

शरशय्या पर सो नहीं गये


मगर याद रहे

साधना के समय स्त्री रूप में था वह

तप के बाद हुआ पुरुष


उसने अर्द्धनारीश्वर रूप की नहीं

शंकर की तपस्या की

तुम भी कर रहे हो, दोस्त!

लेकिन तुम किन्नर हो

काश कि तुम्हारी प्रार्थना भी 

सुनते शिव!


तुम्हारी व्यथा की कथा

शायद नंदी के कानों में कहने से

शीघ्र सुन लें वे!


तुम जब भी ट्रेनों में या चौराहों पर

या किसी के द्वार पर

तालियाँ बजाते हुए

दिखते हो

तुम्हारे होंठों पर होते हैं

सोहर

मंगल गीत

शुभकामना के स्वर


जबकि तुम भीतर से बहुत दुखी होते हो

और बाहर से बहुत प्रसन्न

तुम अपने चेहरे पर इतनी प्राकृतिक प्रसन्नता

कैसे उगा लेते हो?

क्या है इसका राज़?

आज

मेरी कलम निस्तब्ध पड़ी है

मन के द्वार पर 

एक ट्रांसजेंडर मित्र की स्मृति खड़ी है


जो इस करुणामयी कविता में 

किन्नर-कथा को इन्नर की तरह 

परोस चुकी है!

रचना : 21-12-2022 


4).


हिजड़ों की फ़ौज़


बचपन से

सुनता आ रहा हूँ मैं

कि हिजड़ों की फ़ौज़ से

जंग 

जीती नहीं जाती है


जंग जीती जाती है

हौसलों से!

रचना : 21-12-2022

कवि : गोलेन्द्र पटेल 

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Sunday, 18 December 2022

सुप्रसिद्ध युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दस कविताएँ

 सुप्रसिद्ध युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दस कविताएँ :- 


1).


प्रेम में पड़ीं लड़कियाँ


माफ़ करना

मैंने नहीं मेरे गुरु देखे हैं

कि (पढ़ी-लिखी)

प्रेम में पड़ी हुईं लड़कियाँ

जन्मदिन पर 

प्रेमी का पाँव छूती हैं!


2).


पिछलग्गू


वे कैसे दिन थे 

जब लोग पहले परिणय करते थे

फिर प्रेम

अब तो

प्रेम परिणय का पिछलग्गू है!


3).


काली प्रेमिकाएँ


जंगल, पहाड़, समुद्र और कोयले में

जो पाई जाती हैं काली प्रेमिकाएँ

वे सिर्फ़ वासना की पूर्ति भर हैं

उनकी नज़र में 

जो उन्हें प्रेम कर के छोड़ देते हैं!


4).


ईश्वर नहीं नींद चाहिए


उनके व्यर्थ गए गुनाहों के बारे में

जब सोचती हूँ मैं

स्पर्शशून्य रस उमड़ता है भीतर

आँखें बोलती हैं

ईश्वर नहीं नींद चाहिए!


5).


संस्मरण


मुहब्बत वीणा की तरह 

मेरे हृदय में थी

तुम तो साधक थे!


अब संगीत में सना संस्मरण

मेरे दिल व दिमाग का गायक है!

(रचना : 16-12-2022)


6).


प्यार का इंतज़ार


नहीं हूँ किसी का भी भक्त मैं

पर प्रभु तुम्हारे मंदिर की सीढियों पर

करती हूँ अपने प्यार का इंतज़ार


वैसे ही

जैसे पृथ्वी करती है 

वसंत की प्रतीक्षा!

(रचना :15-12-2022)


7).


चिंतित समुद्र


उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की 

यात्रा से लौटे हैं प्रभु!

उनकी थकान की मात्रा 

मीडिया में मुस्कुरा रही है कि


रेगिस्तान में

जब उठती हैं लहरें

समुद्र चिंतित होता है

पर नदी प्रसन्न होती है

क्योंकि वह प्यास बुझाती है!

(रचना : 15-12-2022)


8).


मुक्ति के मार्ग


मुक्ति के लिए

न दर्शन के 

न कविता के मार्ग चुने मैंने


प्रभु! 

तुमने मेरी निष्ठा अनदेखी की

मैंने तुम्हारी मूर्ति में अपनी विष्ठा पोत दी

और तुम प्रकट हो गये!

(रचना : 15-12-2022)



9).


ईश्वर की भाषा में नहीं


सौंदर्य के साधक शब्दों को तब तक रगड़ते हैं

जब तक कि रंग हथेलियों में हथियार न बन जाए

और गंध हवा में गोली

पर, प्रभु!

धूप का धनुष धारा की दिशा में ढूँढ़ रही है

नई सदी की नदी


जहाँ बदी के विरुद्ध पतवार की प्रार्थना सुनकर

बादल नाव में उतर रहे हैं और

तट पर सुनाई दे रही है

कि जल ने मछलियों की हत्या की

उनकी चीख चिनगारी में बदल चुकी है


वे रेत की रोशनी हैं

मगर मौसम मौन है

मुर्दा हो चुका है मुल्क का मल्लाह

हिलोरें हवन कर रही हैं

तुम्हारे लिए, प्रभु!


उनकी आत्माओं की शांति के इस यज्ञ से धुआँ नहीं,

अमर, अपराजेय और अप्रतिहत गूँज उठ रही है

जो ईश्वर की भाषा में नहीं

इनसान की भाषा में कविता है, प्रभु!


प्रभु! तुम्हारी सत्ता के लिए सतह पर 

मछलियों का सुलगता सवाल है

कि नदी का क्या हाल है!


10).


पाँव से फूटी प्रार्थना


अब आस्था की छाँव में ईश्वर बड़े होते हैं

और आदमी छोटे

ऐसे में सत्य की समाधि पर

मैं हूँ

सूर्याभिमुखी अभिव्यक्ति

मेरी आँखों से आग की बूँदें

गिरीं जब धरती पर

तब पीड़ा की पौध में

आत्ममैथुन और आत्ममंथन के फूल खिले

पर प्रभु!

जो तुमने सुनी प्रार्थना

वह मेरे कंठ से नहीं

पाँव से फूटी थी!

(©गोलेन्द्र पटेल / रचना : 15-12-2022)

संक्षिप्त परिचय :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम/उपाधि :- 'गोलेंद्र ज्ञान' , 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : उत्तम देवी
पिता : नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।

विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।

ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'गद्य कोश', 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट', 'सबलोग पत्रिका', 'वागर्थ', 'अमर उजाला', 'रणभेरी', 'हिंदुस्तान', 'दैनिक जागरण', 'परिवर्तन' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।

लम्बी कविता : तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव 

प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर और 'दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान' के संस्थापक हैं।

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

■■■★★★■■■

--Golendra Patel
BHU , Varanasi , Uttar Pradesh , India

धन्यवाद!

■■★★■■

(दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए अनमोल ख़ज़ाना)

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Saturday, 29 October 2022

कुर्मी कौन हैं? हम कुर्मी एक हैं / मेरे नाम के साथ 'पटेल' क्यों लगा है? / गोलेन्द्र का अर्थ / Golendra Ka Arth / meaning of golendra / गोलेंद्र का मतलब / golendra ka matalab / Golendra Gyan / Golendra Patel / गोलेन्द्र पटेल / गोलेंद्र पटेल

 

मेरे नाम के साथ 'पटेल' क्यों लगा है? 

मुझे लगता है कि ऋग्वेद (3.10.3) में वर्णित "तुवि कूर्मि" का अर्थ है महान पराक्रमी, महान कर्मयोगी और अत्यन्त कार्यकुशल। इसी 'कूर्मि' से कुर्मि जाति का संबंध है। खैर, कृष् धातु से कृषक/कृष्ण की उत्पत्ति हुई है। जिसका अर्थ है कर्षण। इसी से कृषि/कृषक से कुटुम्ब/कुटुम्बिन/कुटुम्बिक की और कुटुम्ब से कुर्मि की उत्पत्ति हुई है। जिसका अन्य रूप कुनबी, कन्बी, कुम्बी, कुनवी, कुरमी, कुलमी, कूरम, कूर्म, कुलम्बी, कुणबी व कणवी आदि है। इनमें जो 'कूरम' शब्द है 'कु' अर्थात पृथ्वी और 'रम' अर्थात पति या बल्लभ। अतः कूरम शब्द का अर्थ है भूपति या पृथ्वीपति है जो कि क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। एक तरह से यह क्षत्रिय कुर्मि से जुड़ा है और 'कूर्म' शब्द भगवान विष्णु के कूर्मावतार से जुड़ा हुआ है।

ये सिंगरौर, उमराव, चंद्राकर, गंगवार, कम्मा, कान्बी, कापू, कटियार, कुलंबी, कुलवाड़ी, कुनबी, कुटुम्बी, नायडू, पटेल, रेड्डी, सचान, वर्मा, चौधरी और अवधिया, खंडागले, कम्मा ,लेवा, कड़वा, पाटीदार, मल्ल, सैंथवार, मोरे, मौर्य, मुराई, काछी, कोयरी, माली, कन्नौजिया, सिंगरौर, सिंगरौल, मोरासु, गहरवार, खंडायत, चंदेल, ठाकुर, राठौर, सालंके, इंग्ले, निरंजन, कम्मा, कापू, रेड्डी, नायडू , वक्कालिंगर (वोक्कालिगा), वेल्लालर, वाडीयार, कोडवा, बलीजा, जयसवार, जादौ, जाधव, राउत, रावत, सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, यदुवंशी, ऋषिवंशी आदि कुर्मी जाति (कूर्मक्षत्रिय) के अंतर्गत आते हैं। इसमें भी चननउन-फननउन, जयसवाल-फयसवाल और अथरिया-पथरिया आते हैं। कुर्मि के कुलनाम लगभग तीन सौ के आसपास हैं। संभवतः मेरे नाना क्षत्रिय कुर्मि हैं इसलिए मेरी माँ 'सिंह' लगाती हैं और संभवतः मेरे दादा-परदादा लौहपुरुष या गुजराती पटेलों से प्रभावित रहे होंगे वे सब 'पटेल' लगाते थे इसलिए मेरे पिता पटेल लगाते हैं और इस पितृसत्तात्मक समाज में मेरा भी सरनेम 'पटेल' है। वैसे मेरा मूल नाम 'गोलेन्द्र ज्ञान' है शायद मेरा मूल सरनेम 'ज्ञान' कुर्मियों के कुलनाम में नहीं है और एक मज़ेदार बात यह है कि कृषि की सुंदर तुक ऋषि है। लोग मुझे ऋषि भी कहते हैं।


गोलेन्द्र का अर्थ है

गोलेन्द्र
[सं. पु.]



१. ज्ञान-संपन्न, ज्ञानी, अशोक, महास्थविर, बोधिसत्व, बुद्ध।

२. जिसका लक्ष्य इंद्र के समान हो।

३. इन्द्रियों को बस में करने वाला देवता।

४. सम्मानित व्यक्ति।

(दरअसल 'गोलेन्द्र' शब्द हिंदी का शब्द नहीं है। यह हंग्रेजी का श्लेष शब्द है, बहुअर्थी शब्द है। यह अंग्रेजी के 'गोल (Goal)'  और हिंदी के 'इंद्र' शब्द से बना है। इसमें संस्कृत के संज्ञा सूत्र 'अदेङ् गुणः' और विधि सूत्र 'आद्गुणः' का नियम है। अर्थात् इसमें गुण संधि है।)

1.गोलेन्द्र=गोल+इन्द्र;
 2.गोलेन्द्र=गोला+इन्द्र।
'इन्द्र' के साथ-साथ 'गोल' और 'गोला' भी हिन्दी के तत्सम(संस्कृत) शब्द हैं।
ये तीनों ही शब्द अनेकार्थक हैं।
'इन्द्र' का अर्थ 'स्वामी' और 'गोल' का अर्थ 'अंतरिक्ष' लेने पर 'गोल+इन्द्र' (गोलेन्द्र)का अर्थ होगा 'अन्तरिक्ष का स्वामी'। 
'गोला' का अर्थ 'दुर्गा'( देवी पार्वती)लेने पर 'गोला+इन्द्र' (गोलेन्द्र)का अर्थ होगा 'महादेव शङ्कर'

3.‘गोलेन्द्र’ शब्द के श्लेष के आधार पर ‘इन्द्रियों का स्वामी [गो=इंद्रियाँ]।’


नोट : इस अर्थ को 2018 में पालि-भाषा की अध्यापिका (बी.एच.यू. में) को पालि की कक्षा में बताया था। मैं सोच रहा हूँ कि अपने नाम पर शोध करूँ और 20-25 पेज़ लिख दूँ। आपकी नज़र में 'गोलेन्द्र' का क्या अर्थ है। ध्यान रहे कि आपके सार्थक जवाब को लेख में शामिल किया जाएगा। 


हम कुर्मी एक हैं  :-

(1) पटेल 
(2) अवधिया
(3) कोचईसा
(4) जयसवार
(5) शमसमार
(6) धानूक
(7) तेलन
(8) रमईया
(9) चेनऊथ
(10) कैवर्त
(11) अमाथ
(12) चंदेल
(13) घोड़चड़े
(14) अयोध्या
(15) सैथवार
(16) गुरूनानक
(17) ब्याहूत
(18) गंगोत
(19) ढेलफोरवा
(20) दोजवार
(21) पटनवार
(22) गड़ाईन
(23) चपड़िया
(24) घमईला
(25) वर्मा
(26) कटियार
(27) कनौजिया सिंह
(28) उत्तम
(29) सचान
(30) चौधरी
(31) परमार
(32) गंगवार
(33) स्कींधीया
(34) गैकवार इत्यादि।

महाजनपदी/ छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व के नागवंशी कुर्मियों को कूर्मक्षत्रिय समाज में किसने बाँटा है :-

*1) अंग महाजनपद -     चंदेल/समसवार
2) 2) मगध महाजनपद -          मराठा मोरे और 
                                      उससे भी पहले
                         प्राचीन युगीन कुरुवंशी चंदेल
3) काशी महाजनपद -              चंदेल
4) कोशल महाजनपद -         अवधिय
5) वज्जी/लिच्छवी महाजनपद-     अवधीय ब्रह्म और गंगवार
6) मल्ल महाजनपद -    सैंथवार
7) वंश महाजनपद -        कुरुवंशी कटियार
8) कुरु महाजनपद -       कौरव कटियार
9) पांचाल महाजनपद -   कुरूवंशी और मध्ययुगीन लव वंशी सचान
10) मत्स्य महाजनपद -   कर्नाटकी कोडवा चंदेल कुरुवंशी
11) शूरसेन -                 यदुवंशी जैसवार, जादौ
12) अशमक महाजनपद - सिर्फ सूर्यवंशी मराठा(भोंसले,पटनवार और सिंधिया)
13) अवंती महाजनपद (महिष्मति) - चेरा हैहय यदुवंशी कापू 
14) गंधार महाजनपद - पुरूवंशी कंबोज
15) कंबोज महाजनपद - पुरुवंशी कंबोज
16) चेदी महाजनपद - चंदेल कुरुवंशी

नोट: हम कुर्मी 250 से अधिक उपजातियों में विभाजित हैं। हम सब नागवंशी हैं। हम सब बुद्ध की धरती पर एक हैं। 



कवि : गोलेन्द्र पटेल

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर' एवं 'दिव्यांगसेवी'।





Wednesday, 21 September 2022

तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' के बहाने मनुष्यता की स्थापना : विनय विश्वा / हिंदी की सबसे लंबी कविता

 


"तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' के बहाने मनुष्यता की स्थापना"

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कोरोजयी कवियों में गोलेन्द्र पटेल का नाम कनिष्ठिकाधिष्ठित है। गोलेन्द्र पटेल जो वर्तमान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में परास्नातक के छात्र हैं, जिनमें काव्य प्रतिभा कूट- कूट कर भरी है। उनकी चिन्तन की भावधारा भूत,भविष्य को देखती हुई वर्तमान के कलेवर में हिन्दी साहित्य के लिए नए रंग भर रही है। उम्र कम है जरूर लेकिन साहित्य के जैसे पुरनियाँ, पुरोधा लगते हैं। इन्हें वर्तमान में प्रथम सुब्रमण्यम भारती सम्मान और साथ ही रविशंकर उपाध्याय स्मृति सम्मान मिल चुका है और देश के अन्यान्य महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाओं से एक नया हिन्दी लोक गढ़ रहे हैं। इनकी कविता की भाषा शुद्ध गंवई है और उनकी कविताओं में किसान, मजदूर, जंगरैत स्त्रियाँ, खेत,पशु-पक्षी, घास-फूस, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर तत्वों पर नजर पड़ती है जिस प्रकार नागार्जुन की कविताओं में है। ये अपनी परम्पराओं  जड़ता और अपने ही इर्द -गिर्द से अपनी कविता के लिए खनिज लेते हैं । ' आपकी कविता शब्दों की प्रयोगशाला है' औऱ वस्तुतः जहां प्रयोग होगा वहां खनिज प्रचुर मात्रा में होगी ही अगर नहीं होगी तो हवा(ऑक्सीजन, हाइड्रोजन) का मिश्रण कर जिस तरह जलधारा बनाई जाती है वैसे ही कवि गोलेन्द्र की हर एक कविताओं में नित नए शब्दों का प्रयोग हुआ है और यह यूँ ही नहीं है एक विशेष अर्थ भी छोड़ता है जो हिन्दी साहित्य शब्दकोश में बढियाती सार्थक शब्द नजर आती है।

     यहाँ हम  कवि गोलेन्द्र की हिन्दी साहित्य में अब तक की सबसे लम्बी कविता 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' की समीक्षात्मक वर्णन करेंगे। उससे पहले हम हिन्दी की परम्पराओं में जाएंगे और बहुत दूर नहीं आधुनिक समय में छायावादी कवियों से शुरू करते हैं । छायावादी कवियों में सुमित्रानंदन पंत से शुरुआत करते हैं, इनकी 'परिवर्तन' कविता जो पल्लव में 1924 ई में छपी है में कवि प्रकृति को मानवीकरण बनाते हुए अपने तत्सम रूपी शब्दों से एक नया सौंदर्य शब्दचित्र गढ़ते हैं जैसे- 

  "आधि,व्याधि,बहु वृष्टि,वात,उत्पात,अमंगल,

     वह्नि,बाढ़, भू-कम्प,-तुम्हारे विपुल सैन्य दल;

आहे निरंकुश! पदाघात से जिनके विह्वल 

    हिल- हिल उठता है टल-मल

    पद-दलित       धरा-तल!

'परिवर्तन' कविता निराशा की  केंद्रीय मनोदशा को अनेक मुक्तक छंद में परोसती है। आगे जैसे बढ़ते हैं 'जयशंकर प्रसाद' की लम्बी कविता 'प्रलय की छाया' (1933,लहर से) जिसमें  नाटकीयता ,ऐतिहासिक इतिवृत्त पर आधारित है  जो आख्यानपरक है,वही 'राम की शक्तिपूजा'(1937,अनामिका से) रामकथा के आख्यान से अपना उपजीव्य ग्रहण करती है।

    शब्दों के समायोजन से भी हिन्दी की उत्तरोत्तर विकास को देखा जा सकता है -

    "लौटे युग-दल। राक्षस -पतदल पृथ्वी टलमल"

                                                        - राम की शक्तिपूजा

यह शब्दांश 'परिवर्तन' में भी आई और उसके बाद की कविता 'राम की शक्तिपूजा ' में भी देखी जा सकती है वैसा ही शब्दों का मेल मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' और गोलेन्द्र पटेल की कविता 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' में देखने को मिलेगी भले ही उसका अर्थ- विन्यास अलग हो पर उपजीव्यता ,परम्परा को जोड़ते हुए एक नया वितान रचना ही एक रचनाकार की सफलतम उपलब्धि है।

इसी लम्बी कविता की श्रृंखला में अज्ञेय की 'असाध्य वीणा'(1961 ई) जो आख्यान के रूप में हैं और प्रयोगवाद के प्रारंभिक दौर और कुछ समय पश्चात नई कविता का दौर आता है तो कविताएं अब यहां पूरी तरह धरातल पर हो जाती है और जनतंत्र की बातें कवि अपनी कविताओं में धड़ल्ले से करते हैं। साठोत्तरी के समय गजानन माधव मुक्तिबोध की लंबी कविता 'अंधेरे में ' एक नए कलेवर में हिन्दी कविता में आती है, जो आत्मचेतस, कविता में कविता ,फ्लैश बैक/फंतासी होते हुए देश, जनतंत्र, मनुष्य की बातें रखते हैं और उससे आगे धूमिल के यहाँ 'पटकथा' में कविता पूरी तरह से  खुल जाती है और यह लम्बी कविता की श्रृंखला राजकमल चौधरी(मुक्ति-प्रसंग), रघुवीर सहाय(आत्महत्या के विरुद्ध), लीलाधर जगूड़ी(बलदेव खटिक) से होते हुए गोलेन्द्र पटेल (तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव) तक आती है।

'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' अब तक की  हिन्दी की सबसे लम्बी कविता है जिसकी रचना वर्ष 2020 है, उस वक्त गोलेन्द्र स्नातक के छात्र थे। जो कोरोजीवी की उपज है, जो अपनी परम्पराओं और सभ्यता को जोड़ते हुए चलती है। यह कविता एक यात्रा की तरह है जिसमें कई पात्र और पड़ाव है, जो मनुष्यता का बोध कराती हैं। एक व्यक्ति जो बुजुर्ग है वो अपनी सभ्यता-परम्परा  को ढोने वाला है,  वहीं आगे चलकर शोधार्थी के आरेखों में  भी दिखाई देता है, जो कहीं न कहीं नए को अपनी  पुरातनता को याद और उससे जुड़ने की बात करता है । इस कविता को पढ़ने के पश्चात ऐसा लगता है कि यह मुक्तिबोध की कविता'अंधेरे में' की अगली कड़ी है, वहां 'फंतासी' है यहां 'फ्लूअन्सि' है। समाज में जो घटनाएं घटित हो रही है देश, समाज, जनता ,जनतंत्र हर एक पर दृष्टि पड़ी है कवि की।भौतिकता, काम-वासना, प्रेम इत्यादि बिम्बों का वितान देखने को मिलता है । यह कविता संवाद रूप में  चलती है और  वह भी एक प्रौढ़ पढा-लिखा शोधार्थी के रूप में जो अपनी सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल करने निकला है जो  भारत देश में अब हम खुद उसे कहीं न कहीं छोड़ रहे हैं इस बाज़ारवाद में । उसी विरासत को सहेजने की एक सफल कोशिश कवि करते हैं इस  उजाड़ होती सभ्यता ,संस्कृति, भयावह होता घर-परिवार, खतरनाक होती राजनीतिक मूल्यों को।

कविता की कुछ पंक्तियों को उधृत करते हुए देखेंगे पहली ही पंक्तियों  में अपनी सभ्यता और संस्कृति को समन्वित करने की बात होती है, एक शोधार्थी के द्वारा जो नए जमाने का है ,और उस रास्ते में अब इतनी कँटीली झाड़ियां उग आई हैं कि उसे साफ करने में समय लगेगा पर विश्वास  है। वह कँटीली झाड़ियां (जो प्रतीक है), असभ्य होता समाज,भाषा, मानवीय मूल्य सभी ओर इंगित करता है ,खासकर भाषा की बड़ी ही दुर्दशा हुई है जिसके कारण कँटीली झाड़ियाँ उग आई हैं जो राह चलते देह को छिल देती है पहली ही पंक्ति में कवि समस्या को खड़ा करते हैं और उसके निदान के लिए जो आत्मा,चेतना ठहर सी गई है उसे एक नई दृष्टिबोध के द्वारा जाग्रत होने की बात करते हैं इससे पता चलता है कि कवि कितना जाग्रत अवस्था में हैं।

"सभ्यता और संस्कृति की समन्वित सड़क पर/ निकल पड़ा हूँ शोध के लिए /झाड़ियों से छिल गई हैं देंह / थक गए हैं पाँव कुछ पहाड़ों को पारकर/सफर में ठहरी है आत्मा/ बोध के लिए"


यहां मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' का एक अंश देखते हैं -

   "वह रहस्यमय व्यक्ति /अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है/पूर्ण अवस्था वह / निज- सम्भावनाओं,निहित प्रभावों ,प्रतिमाओं की मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव /हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह/आत्मा की प्रतिमा"।

यहाँ ज्ञान का तनाव हृदय में रिस रहा है और आत्मा प्रतिमा में स्थापित हुई है ,जबकि 2020 में गोलेन्द्र की कविता में अब वह बुद्धि को लिए हुए लिखे का शोध करने जा रही है नए दृष्टिकोण से जो परिपक्वता की निशानी होगी,जहां सहेजना ,समेटना,कुछ खुरदुरे को चिकना करना होगा।


मुक्तिबोध के यहाँ बरगद का पेड़ है और गोलेन्द्र के यहाँ भी जो बरगद एक प्रतीक है वट- वृक्ष पूरा राष्ट्र भारत है ,जहां मुक्तिबोध के यहाँ व्यक्ति खड़ा है ,नौजवान है पर यहाँ अब वहीं बरगद (विशाल वृक्ष) है लेकिन वह व्यक्ति अब बूढा हो गया है बैठा है जंग लग गया है उसे एक सहारे की जरूरत है जहाँ गोलेन्द्र की कविता में एक शोधार्थी के रूप में मौजूद है।

  "मैं इस बरगद के पास खड़ा हूँ

   कंधे पर बैठ गया बरगद पात एक

बरगद-आत्मा का पत्र है वह क्या?

      कौन सा इंगित"?

                         - मुक्तिबोध

"बरगद के नीचे बैठा कोई बूढा पूछता है 

      अजनबी कौन है?

 जी, मैं एक शोधार्थी हूँ"।

                            - गोलेन्द्र

'शोधार्थी' जिसके कन्धों पर बड़ी जिम्मेदारी है। वह उस प्रथम प्रेम का साक्ष्य ढूंढ रहा है जो कबीर के ढाई आखर प्रेम में था जो इस आधुनिकता/भौतिकतावादी/बाजारी दुनियां में कहीं खो गई है उसे वह बेचैनी से ढूंढ रहा है क्योंकि नए पीढ़ी पर बड़ी जवाबदेही है इसलिए उसे अब सजग रहना होगा। कवि की जड़े इतनी गहरे होते जा रही हैं जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिना अपने अतीत अपनी जड़ों में गए वर्तमान को सुदृढ़ नहीं कि जा सकती जो दस्तावेज रूप में है उसे उलट-पुलट कर देखनी होगी क्योंकि अतीत की ही प्रतिकृति वर्तमान है।

 "सोच के आकाश में/देख रहा है/अस्थियों के औज़ार/ पत्थरों के बने हुए औज़ारों से मजबूत है।"


कवि की चेतना इस कविता में हर उस पहलू को स्पर्श करते चलती है जो एक स्वस्थ राष्ट्र समाज के निर्माण में महत्ती भूमिका होती है जिसमें (समाज, वातावरण, पर्यावरण, जनतंत्र, हासिए के लोग,नैतिक मूल्य, राष्ट्र) और भविष्य की ओर निगाहें हैं।

एक पंक्ति देख सकते हैं आज की भयावहता को लेकर जो सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है जलवायु परिवर्तन  जो पुरी दुनिया में असर डाले हुए हैं अभी ताजा उदाहरण पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भीषण बाढ़ के रूप में देखी जा सकती है और वही ग्लेशियर का पिघलना ,मौसम का बदलना,सूखा पड़ना ये सारी समस्याओं को अपनी कविता में दर्ज करते हैं जो मानव विकास की अंधी दौड़ में इतना सरीक हो गया है कि वह अपने घर को ही भूल गया है जो एक कवि चिंता कर रहा है पर्यावरण को बचाने की कोशिश-

"जंगल के विकास में/इतिहास हँस रहा है/पेड़-पौधे कट रहे हैं/पहाड़-पठार टूट रहे हैं/ नदी-झील सूख रही है/ सड़कें उलट रही है/सागर सहारा का रेगिस्तान हो रहा है"।

कहीं ऐसा प्रकृति का  प्रकोपभाजन न हो जाय की दूसरा 'मृतकों का टीला' बन जाए,इस पर गम्भीरता से पूरी मानव जाति को विचार करनी होगी तभी एक स्वस्थ समाज और राष्ट्र का निर्माण हो सकता है, क्योंकि प्रकृति बची रहेगी तो मानव जाति बनी रहेगी।

कवि का चिंतन व्यापकत्व के कैनवास पर अपने शब्दों से एक वृत्तचित्र बनाते नज़र आती है जो सभ्यता और संस्कृति के समन्वित सड़क पर चलते हुए मनुष्य को मनुष्य बनाने की जो पहल है उन सारे दृश्यों को अपनी लेखनी से उकेरने की एक सफल कोशिश की गई है।

"प्रकृति से होते हुए नारी/पुरुष तक,आदिवासी समाज(हासिए के लोग) से होते हुए शिष्ट समाज तक,गुरु से होते हुए शिष्य और सच्चे मित्र तक" आते हैं जो मनुष्य को मनुष्य होने के लिए पर्याप्त है।

कवि संदिग्ध इतिहास में न जाते हुए सीधे वर्तमान में उतरते हैं जो आवश्यक है जिस 'आदिवासी-विमर्श', जल-जंगल-जमीन की बात होती है वहाँ से शुरुआत करते हैं आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी उनकी स्थिति वैसी ही है यह सोचने का विषय है। 

कवि उनके बारे में बताने की सफल कोशिश करते हैं कि आदिवासी समाज कितना सच है जो हम अपने आपको शिष्ट समझते हैं उनकी भाषा रहन-सहन पर हँसते हैं जबकि हम खुद को देवता कहते हैं जो कि सत्य नहीं है हम कितने असभ्य हैं ये हम खुद ही जानते हैं (हमे सुधरना होगा ) यहां एक प्रकार से व्यंग करते हैं-

   "ये वनजाति

(अर्थात आदिवासियों के पूर्वज)

हम देखने में देवता हैं

   ये राक्षस

   लेवता हैं

खैर,ये सच्चे इंसान हैं।"

हमें इन आदिवासी, पिछड़े समाज को लेकर चलने की बात करते हैं उनपे हँसने की बजाय।

वर्तमान समय में पितृसत्तात्मक(पुरूष वर्चस्ववादी) समाज में जिस तरह 'नारी-विमर्श'की बातें हो रही है आए दिन,उस नारी समाज को पकड़ने की कोशिश अपनी कविताओं में करते हैं,आज एक बड़ा प्रश्न-चिन्ह खड़ा होता है कि लड़कियां अपनी संस्कृति को भूलकर सात्विक प्रेम को भुलाकर दैहिक(मांसलवाद) सुख की ओर प्रवृत्त हो रही हैं और ऐसा पुरुष समाज भी कर रहा है जो एक सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है। उसे स्वस्थ (सुधार की जरूरत)होने की बातें कहते हैं ।

             " माँ से

    क्या आप मुझे जीने देंगी

      अपनी तरह

   क्या मैं स्वतंत्र हूँ?

अपना जीवनसाथी चुनने के लिए

       आपकी तरह।

मुहब्बत के मुहूर्त में मिलना है पिछवाड़े

            प्रियतम से

       आड़े- आड़े......


कवि गोलेन्द्र उस नारी-शक्ति की बात करते हैं जो आए दिन घरों में,तलाक को लेकर कचहरियों में ,पुरुष समाज से प्रताड़ित होते देखी जाती है जो स्वस्थ समाज के लिए जघन्य है, जिसे प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों, कहानियों, में स्थापित करने की कोशिश की औऱ उसी विषय को उत्तर छायावादी रचनाकार राष्ट्रकवि दिनकर अपने निबन्ध 'अर्धनारीश्वर'में उठाते हैं और आधुनिक महिला साहित्यकार भी इस मुद्दे पर जोर दी हैं ,उसी समस्या को एक बार फिर अपनी कविता के माध्यम से 'कोरोजीवी',किसान कवि गोलेन्द्र पटेल उठाते हैं और सभ्य कहने मानने वाले पुरुष पर चोट करते हैं और मनुष्य को मनुष्य होने की बात करते हैं।

"एक असुर का कहना है/ की पत्नी का क़ातिल होना/ असल में आदमी की आदमियत की मृत्यु होना है/कम से कम इस संदर्भ में /हमारी जाति/अभी कलंकित नहीं हुई है/यानी हमें देवत्व का दम्भ त्याग कर /असुरों की अच्छाई अपनाना चाहिए/तभी/हम सही अर्थ में मनुष्य हो पाएंगे।"


मनुष्यता का अब न होना चिंता सता रही है, और मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए समर्पित हो लेकिन कवि को विश्वास है कि जो शेष बचे हैं वही इस धरा-धाम पर मनुष्यता को गढ़ सकते हैं, इसमें कवि का अपना जीवन संघर्ष भी है और सुपथमार्गी मित्र का होना भी जीवन में जरूरी बताते हैं।

 "सपनों का मरना/ जीते जी जिंदा लाश हो जाना है"

कवि की जड़ता की यह पहचान है कि वे अपने लोक/परम्परा को मजबूती से पकड़े हैं वे प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध, धूमिल तक जाते हैं और भक्ति काल में जायसी,तुलसी,कबीर तक जाते हैं-"नाव में नदी को लेकर"।

प्रेम के सहारे पाप-पुण्य तक जाना जो जीवन की अंतिम परिणति है वहाँ तक कवि जाते हैं अपने वेद उपनिषद में जहां से दर्शन लेते हैं -

"वासना के वृक्ष पर बैठे /दो पंक्षी/ देखते हैं कि/वे अपनी बेचैनी को बाँध कर/बहा दिए हैं/नदी में।"

यहाँ प्रतीक के माध्यम से एक दर्शन है , वासना रूपी शरीर जो एक वृक्ष है जिसपर दो पंक्षी बैठा है एक शीर्ष पर और एक नीचे,शीर्ष पर वाला साक्षी है वह सिर्फ देखता है जबकि नीचे वाला वह कर्ता है वह बेचैन है कि क्या कमा लूं, क्या बना लूं, क्या बचा लूं आदि इस भौतिक सुख के लिए उसे तृप्ति नहीं है। 

धर्म का एक नैतिक रूप है जो नीचे की पंक्षी को बदलने की कोशिश करता है, और धर्म का परम रूप आध्यात्मिक होगा।

"धर्म का जो अध्यात्म है वह कहता है कि तुम्हारे भीतर एक साक्षी (देखने वाला)है  क्योंकि साक्षी का जन्म नहीं होता,यह तो कर्ता है जो जन्म में भटकता है, क्योंकि मरते वक्त तुम्हारी वासना तृप्त नहीं होती।

'वासना की डोर तुम्हें नये जन्म में ले जाती है उसी नदी की तरह'।

प्रेम की पराकाष्ठा  जहां सूफी दर्शन है और साथ ही जो ज्ञान में परिवर्तित होता है जो कबीर के यहाँ दिखता है।

 कवि बार-बार अपनी जड़ों से खनिज लेकर नए प्रयोग नए साहित्य को गढ़ रहे हैं।

इक्कीसवीं सदी का सबसे भयावह समय कोरोना महामारी का समय लॉकडाउन की स्थिति और नदियों में जो लाशें बह रही थी। जिसकी चीत्कार हर घर में दहाड़ मार रही थी, जो इस भयावह समय की याद दिलाती रहेगी, इसी समय बहुत से मजदूर लौट रहे हैं

यहां चलना क्रिया और लौटना क्रिया की अच्छी पड़ताल की गई हैं, वहाँ लौटना इतिहास में लौटना था जिसका इतिहास मनुष्यता की लहू से लिखा जा रहा है और एक तरफ चलना क्रिया जीवन की सार्थक क्रिया है जब चलेंगे नहीं तो इतिहास कैसे बनाएंगे।

' मनुष्यता की लहू से इतिहास का लिखना'

आज जनतंत्र का राजा जिन्न बन के खड़ा है जो सभी को अपनी माया से जला रहा है।

यहां मनुष्य की उत्कट जिजीविषा ही है जिससे कोरोजीवी सार्थक है । इस महामारी में पूरी कायनात बदल रही है जिसमें भाषा ,शब्द,अर्थ,मुहावरे इत्यादि के बदलते स्वरूप दिखाई दे रहे हैं और नए-नए विमर्श खोले जा रहे हैं। गोलेन्द्र पटेल की कोरोजीवी कविता में नई सम्वेदना,रागानुरागी प्रवृत्ति, जनपक्षधरता,मुक्ति मार्ग,मन-मस्तिष्क में नई ऊर्जा संचार भरते हुए चलती है एक बेचैनी है बदलाव की "कोरोजीवी से कोरोजयिता तक"।

कवि जिस गुरु से सीख रहे हैं उस परम्परा को बरकरार रखना चाहते हैं न की शिक्षक दिवस मना कर भूलने जैसी बात। कवि सृजनात्मक साधना अर्थात कर्म पर ध्यान देने की बात करते हैं क्योंकि सार्थक कर्म ही जीवन की सार्थक उपलब्धि है। श्रद्धा,भक्ति बाद में पहला कर्तव्य कर्मरत/श्रमशील शिष्य होना । अगर शिष्य गुरु मानता है तो उनके सच्चे और अच्छे विचारों को लेकर चलना ही जीवन की सार्थकता है। जैसे स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस उस गुरु शिष्य परम्परा का होना जीवन की सर्वोत्तम शिष्य परम्परा है अपने और राष्ट्र के लिए।

"शिष्य सर्जक की भूमिका में/गुरु की रचना से गुजरते हुए केवल और केवल सृजनात्मक साधना पर ध्यान दे/ न कि साधन और साधक पर/न कि श्रद्धा और भक्ति पर /न कि शिष्य के प्रति उनकी सहजता पर।"

इस संसार का सबसे अनमोल रिश्ता 'मित्रता'है  कवि चलते-चलते उस रिश्ते को अपनी कविता में रेखांकित करते हैं। हम मनुष्य अपनी अंतरतम की बातें, यादें एक सच्चे मित्र से ही कहते हैं चाहे वह घोर निराशा वाली बातें हो या खुशी की बातें। मित्रता को 'तिमिर में ज्योति ' की उपमा दे रहे हैं और एकाकार हो जाने की बातें करते हैं।

    "तुम्हारा होना 

    असल में मेरा होना है"

कोई भेद रह ही नहीं जाता है कितना विराट हृदय है कवि का।

'मित्रता और मुहब्बत' इस संसार में मानव के लिए अनमोल ख़जाने की तरह है जिसे मिल जाए तो दुनियां सच में जन्नत हो जाए। उस मित्रता और मुहब्बत में 'विश्वास' रूपी एक डोर है जो पूरी सृष्टि को बाँधे रखती है।


हिंदी साहित्य के इतिहास में लम्बी कविताओं का जब भी जिक्र किया जाएगा तब इक्कीसवीं सदी के कोरोजयी कवि 'गोलेन्द्र पटेल' का नाम जरूर लिया जाएगा। यह कविता कवि के चिंतन की सर्वश्रेष्ठ उपज है जो  दूषित होती मनुष्यता,पर्यावरण, परिवेश, लोक,जनतंत्र, समाज आदि मूलभूत चीजों को ध्यान में रखते हुए एक सम्पूर्ण जन्नत भरी लोक रचते हैं जहाँ सिर्फ मनुष्य ही नहीं पर्यावरण, पशु-पक्षी,प्रकृति, रिश्ते हर जगह साम्य, सौम्यता, प्रेम हो। 

जिस प्रकार रैदास 'बेगमपुरा' की कल्पना करते हैं, कबीर  तोड़-फोड़ कर सुधार करने की कोशिश करते हैं ,सुदामा पांडेय धूमिल एक नए 'प्रजातंत्र' की बात करते हैं ठीक उसी प्रकार कवि गोलेन्द्र पटेल एक नए समाज, राष्ट्र,लोक की बात करते हैं अपनी कविता 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' में। यह मात्र एक रचना कृतिकार को स्थापित करने में काफी है, जैसे बिहारी 'बिहारी के दोहे' लिखकर अमर हो गए। फिर भी रचनाकार बैठता कहां है।  उसकी चिंतन तो नए-नए आयामों को छूते रहती है।

'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' यह शीर्षक ही अपने आप में कुछ कह जा रही है, जो हमारे भारतीय परम्परा संस्कारों में निहित है जब हम किसी (आत्मीय) को आशीर्वाद देते हैं तो अपनत्व की भाव जन्म लेती है ।

जैसे बड़े बुजुर्ग(पुरखें) आशीर्वाद देते हैं- बनल रहअ।

यह लम्बी कविता आख्यानों,काव्य खण्ड की तरह न होकर वर्तमान परिस्थितियों  घटनाओं को लेकर रूपक की तरह चलती है कविता में कविता  गढ़ते हुए जिसमें भावों की अभिव्यक्ति, अभिव्यंजना है जहाँ भाषा ,शब्द,अर्थ सबका रूप बदलता हुआ जान पड़ता है। कविता नदी की धारा की तरह प्रवाहित होती चली जा रही है। कहीं ठहराव नहीं है। जिसका उत्स सभ्यता, संस्कृति, परम्पराओं में निहित है, जिसका उत्स और उत्कर्ष यति में नहीं, गति में है। यह कविता हमारे समय का प्रत्याख्यान और हमारी चेतना का मानचित्र बन चुकी है । दूसरे शब्दों में, "गोलेन्द्र पटेल की काव्यभाषा उनकी विचार-संवेदना की सच्ची अनुगामिनी है। वे भाषा का नया मुहावरा गढ़ने वाले कवि हैं। कोरोजीवी कविता में उनकी संवेना और सोच जनपक्षधरता और उसकी मुक्ति की आकांक्षा है। उनकी कविताओं से गुज़रने के बाद हम अपने मन-मस्तिष्क में नवीन ऊर्जा को महसूस करते हैं। अतः 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' गोलेन्द्र पटेल की कविता हमारे समय के स्वभाव और स्वरूप का केंद्रीय रूपक या प्रतिनिधि पाठ है।"


सभ्यता और संस्कृति का समन्वय अपनी जड़ों की ओर जाना वहां से खनिज लेते हुए प्रकृति का सानिध्य प्राप्त करना जहां लोग प्रकृति से कटते जा रहे हैं। इस वर्तमान समय में आजादी के पचहत्तर सालों बाद भी आदिवासी ,हासिए के समाज पर ध्यान न देना उन्हें असभ्य समझना ,जिसको लेकर कवि सभ्य औऱ असभ्य(आदिवासी) समाज को स्थापित करना चाहते हैं। इस संसार का सबसे अनमोल व्यक्ति(नर-नारी) में मेल कराना जो 'अर्धनारीश्वर' बन जाए इसकी स्थापना, गुरु-शिष्य की स्थापना(मूल रूप से कर्तव्य) और सच्ची मित्रता स्थापित करना यह कवि का अपना कैनवास है ।

कवि की भाषा सहज और सरल है अपने गंवई (देशज) परम्पराओं से ली हुई शब्दों को स्थापित करने की कोशिश है, अनुप्रास अलंकार ,बदलता मुहावरा, और नए शब्दों का निर्माण बखूबी देखी जा सकती है। जैसे- लोचन की लय में लेह,आह रे माई,प्रेम की 

पईना, घास,आड़े-आड़े,नेह, मेह ,भँवर के भाव में व ताव में, रेह,गेह,बेना, सेना,सरसराहट, हम देखने में देवता हैं ये राक्षस लेवता हैं, नाउन, मेहरारू, इतवार,लीख, बलम,होलापात,गठरियाँ, चपलवा,खटिया,बाधी,पाटी, भरकुंडी, ढीठ,छाँह,रहिया,हमार हिरवा,जैसे अनगिनत शब्दों का प्रयोग हुआ है यह कवि का खनिज है जहाँ से लेते हैं।

यहां कवि, रैदास की तरह सहज और सरल भाषाई अर्थों में अपनी बातें कहते हैं  कबीर व धूमिल की तरह प्रतिरोधी नहीं।

'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' हिंदी साहित्य की एक मुकम्मल लम्बी कविता है जो सही अर्थ देती है जिसमें मानवीय मूल्यों की सजग अभिव्यक्ति हुई है, मनुष्य होने की सर्वश्रेष्ठ रचना है।

                   © विनय विश्वा

     

'परिचय'

विनय विश्वा/विश्वकर्मा

ग्राम- मोहनियां, जिला-कैमूर(भभुआ),बिहार,

       भारत

शिक्षा-काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी,(हिंदी विभाग)

वर्तमान में- शिक्षक सह शोधार्थी

देश के महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित




Wednesday, 7 September 2022

कवितांश : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' से

 


क्या आज घूमने चलना है अजंता और एलोरा की गुफाएँ?
या फिर कोणार्क मंदिर?
मुँह क्यों लटकाए हो?
क्या हुआ?
बोलते क्यों नहीं?
चुप क्यों हो?
चुपचाप
उसने देश का प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्र
दिया मेरे हाथों में

दृश्य दर्दनाक है!

अख़बार का कोई चित्र
चिर रहा है दिल

दुख दुसाध्य है जो
मुक्ति की शिक्षा देता है
बुरे वक्त में परीक्षा लेता है
अपनों का अपने वह

दुखहरन दृष्टिकोण में
मित्र!
जूते बताते हैं
कैरेक्टर
जैसे चप्पलें बताती हैं
चरित्र

निःसंदेह
देह का दर्शन है विचित्र!

मन में बहुत रेह है
रूह की ऊह नेह की भाषा में
गेह की कूह है

लोकलय और शब्द के अध्ययन का प्रतिमान
संगीत में संस्कृति का गान है
आँखों की बारिश में अंतःकरण की कौंध
पीड़ा की पौध है

आँसू की बूँदों के इंतज़ार में
पसीने की बूँदें
आह की राह तक रही हैं
साँसें सन्नाटे में बहक रही हैं

आसमान में आत्मा की आकृति है
धरती पर खड़े
सदी के बड़े चित्रकार की
जो कभी-कभी जीवन के रंगमंच पर
किसी भावी नाटक का नायक घोषित होता रहता है

अँधेरे में मुसाफ़िर के माथे पर
पाथेय का प्रदीप जलाना
अपने पुरखों के पास जाना है
समुद्री चश्मे से देख रहा हूँ मैं
मछलियाँ जल के भीतर
सोने में असमर्थ हैं

कबूतर का अपने खोते में लौटना
बाज़-चील-गिद्ध को खलता है
शहर की प्रार्थना सुनकर
बरफ़ का पर्वत पिघलता है
और गाँव डूब जाता है
जहाँ अपना सपना जलता है
और प्रश्नों के पट पर पटकथा चलने लगती है
इस धरती के जीवन की और इस धरती की!

तो क्या
आज घूमने नहीं चलोगे?
घूमना! घू...म...ना!!
घूम तो हम रहें
पर,
कर्ज की कील की नोक पर
रोज़ मर-मर
डर-डर
हम किसान-मजबूर है न!

किसानों का घूमना केवल मेंड़ पर
लिखा है
और मजदूरों का घूमना मजदूरमंडी में
या फिर मकान के मुरेड़ पर
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या गिरजाघर में नहीं
वहाँ तो वे जाते हैं जो मोटे हैं
हम तो छोटे हैं

हमारे घूमने का अर्थ है
अपने बच्चों का पेट काटना!

यह क्या इस पृष्ठ पर तो खेल खेलने वालों को
नौकरी देने की चर्चा है
एक क्रिकेटर को सेनापति
एक पहलवान को रेल का अधिकारी
एक हॉकी प्लेयर को इंस्पेक्टर
इस खेल के खिलाड़ी को यह पोस्ट
उस खेल के खिलाड़ी को वह पोस्ट
किसान को केवल खेत
और मजदूर को केवल बेत
वाह रे सरकार!

मित्र!
इस यात्रा में बहुत खर्चा है
मैं नहीं चलूँगा
मेरे जिगर के जेब में सदियों पुरानी
बेगमपुर की चिट्ठी
और रामराज्य का पर्चा है
जिसे आज पढ़ना है
स्वयं को गढ़ना है

सत्ता से शब्द को लड़ना है
लड़ना है लड़ना है लड़ना है...!!

बिना कहे भी जानते हैं शब्द
कि उसकी पीठ पर सूरज
कितना तपता है
कि उसकी कई क्रियाओं की किरणें
दिन-दिन भर
दुखते हुए द्वीप पर कई विशेषण के साथ
गतिशील हैं, अक्सर
उसका अर्थ आकाश छूता हुआ
नज़र आता है
उम्र की ढलान से ऊपर एकदम ऊपर
उम्मीद से ताकने पर

किसी ठूँठ पेड़ पर दो-चार पत्तों का हिलना
भाषा में सम्भावना के सुमन का खिलना है
उसकी नंगी डाल से झूलता हुआ
बुद्ध पूर्णिमा का चाँद
गोया गाय की नाँद में रो रहा है

क्या आप विश्वास करेंगे
खूँटे से खुर की दूरी
हवा में हड़प्पाकालीन हड्डियों के हँसने की मजबूरी है
तत्सम को तदभव में रूपांतरित करने
से पहले जरूरी है
कि कारक की बेचैनी कोई बात हो
जुगनुओं की रात अपनी रात हो

मैं पूरी ताकत के साथ फेंकना चाहता हूँ
दोस्त का दुखड़ा
उस दिशा में उधर
जिधर मुक्ति का मार्ग जाता है
समय स्वयं कोई गीत गाता है
गूँगे स्वर में गूँजहीन तिमिर की तान
इस ज्योति की जान है

बिजलियाँ बारिश के विरुद्ध हैं
आँधी चल रही है
घड़ी की सुई लौट रही है बार-बार
लगातार
अपने बजने के बहाने
दिशा की निश्चित धुरी पर
जहाँ कोई स्याह चेहरा है
चमकती हुई चेतना चट्टान से टकरा रही है
चिनगारियाँ उत्पन्न हो रही हैं

उन्हें जनहित के लिए
संसद की सड़क पर लंबी दूरी तय करनी है
उनको पसंद हैं छंद के द्वंद्व
उनको पसंद हैं पिजड़े में बंद
शेर, भालू व चीता
जर्जर रामायण, महाभारत व गीता

उनमें गहन अग्नि के अधिष्ठान हैं
परंपरा के प्रकाश प्राणवान हैं
उनमें आधुनिक सभ्यता की सुबह का संदेश है
यह कैसा देश है?

कि घूमती संस्कृति के सोच
नोच रहे हैं जीती गाय को
असहाय को, आह! मैं देख रहा हूँ
देखता रहा हूँ
देखता रहूँगा कब तक?
कब तक?
यह मेरा स्वयं से सवाल है दोस्त!

प्रगाढ़ प्रेम परिभ्रमण करता रहेगा जीवन भर
एक आदमी से दूसरे आदमी में
अनवरत-निरंतर
नित्य नींद में सफलता की सीढ़ी
चढ़ रही है मेरी पीढ़ी
मगर
महामारी में मुहावरों की मौत
कवि के लिए चिंता का विषय है
चारों ओर भय है
पर, नीति निर्भय है

ज़हरीली हो रही है हवा
मुस्कुरा रहा है पत्थर
और
ख़ून के अँधेरे में आश्वासन के अक्षर
या यों कहें
कि संकल्प-धर्मा चेतना का लहुलूहान स्वर
कि लय के लश्कर
सड़क पर चलता हुआ आदमी
अपनी छाया में कैद है
कविता में
दिमाग दिल का वैद्य है
ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से भीतर

मानवी अंतर्कथाएँ जन्म ले रही हैं
तुम्हारी आँखों में दोस्त
हृदय के घाव हरे-भरे हैं
नींद में निर्भार होने लगी है नज़र

बस अनस्तित्व का समुद्र उमड़ा है
दोस्त, तुम्हारी नसों के अंदर

मैं चाहता हूँ
कि तुम रोशनी ढोता जिस्म सा
जीव के रूप में पूरी रात मेरे साथ रहना
मैं लालसा और घृणा से भर देने वाली चमक से कोसों दूर हूँ
एक संबोधन उपजा है
तुम्हारे लिए सिर्फ़ तुम्हारे लिए
कि तुम
सत्य हो बाकी सब मिथ्या
हे आत्मस्थ विचार!!

©गोलेन्द्र पटेल

(शुक्रवार, 27-11-2020 / कवितांश : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' से)

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com




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बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...