Saturday, 9 August 2025

फूलन देवी पर केंद्रित कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

 

फूलन — चंबल से संसद तक

बीहड़ों की साँसों में गूँजता था उनका नाम,
अन्याय के अंधेरों में चमकती थी उनकी आँखों की ज्वाला।
वो आई थीं, आँसू बहाने नहीं —
बल्कि इतिहास की दीवारों पर गोली से लिखने।

जिन्हें बचपन ने जंजीरों में बाँधना चाहा,
उन्हें चट्टानों ने तलवार बना दिया।
रात की दरिंदगी को दिन की अदालत में घसीटा,
और फैसले बंदूक की नली से सुनाए।

वो समझ चुकी थीं —
बाल्टी में बैठकर बाल्टी नहीं उठाई जाती।
इसलिए उन्होंने 
धर्म का वह झूठा आसमान छोड़ दिया
जहाँ चार रंगों में बाँटी जाती थी इंसान की रौशनी।
उन्होंने अपनाया बुद्ध का मार्ग,
जहाँ मानवता एक है और सम्मान जन्मसिद्ध अधिकार।

उनकी हर साँस चेतावनी थी —
कि पीड़ित जब उठता है,
तो सामंतों के महल हिल जाते हैं।
उनका हर कदम एक उद्घोष था —
"औरत सहने के लिए नहीं,
अन्याय मिटाने के लिए जन्म लेती है।"

टाइम मैगज़ीन ने नाम दिया "महान विद्रोही",
पर उनकी पहचान केवल किताबों में नहीं,
बल्कि उन आँखों में है
जो अब डर के साये में नहीं झपकतीं।

चंबल की रानी, संसद की शेरनी,
वो न गोली से डरती थीं,
न गिद्धों की गालियों से।
क्योंकि फूलन मिट्टी, लोहा, पत्थर, आग से बनी थीं—
और ऐसी चीज़ों को इतिहास कभी ख़ामोश नहीं करता।

आज, उनकी जयंती पर,
हम कसम खाते हैं —
ज़ुल्म सहना बंद करेंगे,
समानता का रास्ता चुनेंगे,
और हर फूलन के सपने को
आवाज़ देंगे।


फूलन घोषणापत्र

फूलन नाम नहीं—विद्रोह हैं!
बीहड़ों में जन्मीं, सत्ता को चीर गईं,
जाति के अहंकार को गोली में पिघला दिया,
मनुवादी मंदिर ढहा दिया।

बलात्कार का बदला लिया,
अन्याय की नींव हिला दी,
गाँव से संसद तक आग फैलाई,
वंचितों के लिए रास्ता बनाया।

बुद्ध की करुणा, रविदास का स्वप्न,
अंबेडकर का संविधान—
तीनों की ज्वाला बनकर जलीं,
और नारी के नवयुग को गढ़ा।

मनिपुर की चीखों से उठेंगी नई फूलनें,
दरिंदों का अंत करेंगी,
जंजीरों को तोड़ेंगी,
समानता की मशाल जलाएंगी।

हम कसम खाते हैं—
हर चिंगारी को फूलन बनाएंगे,
हर अन्याय का जवाब देंगे,
और इस धरती को बराबरी का घर बनाएंगे!

—गोलेन्द्र पटेल 


★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Thursday, 7 August 2025

‘स्त्री मुक्ति: ब्रालेस आंदोलन’ : गोलेन्द्र पटेल

 

स्त्री मुक्ति: ब्रालेस आंदोलन
—गोलेन्द्र पटेल 


1. बीजवपन:

देह न बंधन, देह न बोझा, 
देह न चुप रह जाए रोज़ा।
ब्रा न हो तो शिष्ट न मानी, 
कैसी यह मर्यादा प्रानी?

अमेरिका की लहर चली थी, 
सौंदर्य-बंधन हिलती डली थी।
“नो मोर मिस” का नारा फूटा, 
झूठी मर्यादा से नाता टूटा।

ब्रा नहीं तो कैसा शर्मीला? 
किसने बांधा स्त्री का जीला?
कॉर्सेट, मेकअप, ऐड़ी भारी, 
सब बंधन हैं तन की क्यारी।

‘फ्रीडम ट्रैश’ में फेंके धागे, 
टूटे तब जकड़े सब भागे।
शरीर न हो कैद-ख़यालों में, 
आज़ादी हो चाल-ढालों में।

भारत आया वह संदेशा, 
मगर यहाँ था भिन्न उपदेशा।
परिधान में बसी शालीनता, 
कपड़ों से मापी नारीता।

सोशल मीडीया ने स्वर लाया, 
कुछ ने ही वह ढाँचा हिलाया।
शहरों में थोड़ी चुप बग़ावत, 
गाँवों में अब भी विरासत।

बोल नहीं पर मौन विद्रोह है, 
निज इच्छा में जो अनुग्रह है।
नोब्रा, माईबॉडी बन नारा, 
स्त्रियों ने फिर सच उजारा।

पुरुष-दृष्टि की काई तोड़ी, 
लज्जा की सीमाएँ छोड़ी।
नारी अब अपनी परिभाषा, 
देह बने प्रतिकार की भाषा।

मुक्त नारी का तन है ध्वज सा, 
देह न हो झुकने लायक़ सा।
शरीर नहीं कोई अपराधी, 
लाज नहीं वह स्वप्न समाधि।

जो पहनें, उनकी भी वाणी,
जो न पहनें, उनकी कहानी।
चुप प्रतिकारों से यह धारा, 
बढ़ रही है नारी उजियारा।

2. आरंभ:

नारी मुक्ति का गीत सुनाऊँ,  
शरीर स्वतंत्रता की बात उठाऊँ।  
ब्रालेस आंदोलन उभरा जब,  
नारी अस्मिता ने पाया रब।  

साठ के दशक में पश्चिम जागा,  
मिस अमेरिका के बंधन भागा।  
स्वतंत्रता की कचरा पेटी में,  
ब्रा फेंक बेड़ी तोड़ी थी।  

पुरुष दृष्टि के मानदंड टूटे,  
नारी देह के बंधन रूठे।  
शालीनता की थोपी रीत,  
विरोध में उठी नारी प्रीत।  

भारत में यह लहर सीमित रही,  
रूढ़ि की दीवार ने रोकी सही।  
शहरी नारी ने उठाई बात,  
सोशल मीडिया पर जगी मुलाकात।  

आज़ादी की यह अलख जगाए,  
नारीवादी विमर्श को सजाए।  
शरीर पर हक़, स्वयं की चाह,  
नारी अस्मिता का नव परचम लहक।

ब्रालेस आंदोलन की बात निराली,  
नहीं बस ब्रा छोड़ने की गाली।  
स्त्री देह को यौनिकरण से मुक्ति,  
स्वायत्तता की चाह, स्वतंत्र भक्ति।  

भारत में परंपरा जड़ जमा गहरी,  
सामाजिक मानदंड बंधन की डोरी।  
यहाँ आंदोलन का रूप है न्यारा,  
स्वतंत्रता का सपना, मन उजियारा।

न केवल ब्रा से मुक्ति बात,  
देह न हो यौनिक सौगात।  
शारीरिक हो निज अधिकार,  
यह आंदोलन दे पुकार।

भारत में है रूप अनोखा,  
जहाँ नियमों ने गढ़ा रोखा।  
संस्कृति की गहरी हैं जड़ें,  
पर चेतनाएं रचें लहरें।

स्त्री देह को जिस्म समझाया,  
सभ्य दिखे, ऐसा ठहराया।  
ब्रा में बंधन, अस्मिता खोई,  
पितृसत्ता की जंजीरें रोई।

नारी को समझा तन का रूप,  
उसकी देह बनी है भूप।  
मात्र यौनता, केवल सौंदर्य,  
भोग्य बनी वह, छिन गया गौरव।

स्तनों को कसती ब्रा की पीर,  
बाँध दिए जो देह के तीर।  
स्वाभाविकता का वह हरण,  
पहनाया असहज आवरण।

दो कप सिले, बेमेल बनाए,  
स्त्रीत्व के प्रतीक घृणित सजाए।  
नारी हृदय की स्वतंत्र चाहत,  
ब्रा ठुँसे, दबे वह राहत।

3. वस्त्र और पितृदृष्टि:

देह सभ्य हो, यह चाहत क्यों?  
क्यों हर दृष्टि में दाहत क्यों?  
शब्द न बोले, बोली देह,  
इस मौन यंत्रणा की प्रेय।

सभ्यता की जो है परिभाषा,  
वह पितृसत्ता की अभिलाषा।  
कपड़े हों 'शालीन' सदा,  
कब तक ढोएँ ये विधि-खदा?

भारत देश में रूढ़ि गहरी,  
परंपराएँ बंधन की जंजीरी।  
साड़ी-कमीज में ब्रा अनिवार्य,  
स्वास्थ्य-आराम पर नियम भारी।

साठ के दशक, पश्चिम जागा,  
स्त्रीवादी लहर ने बंधन भागा।  
ब्रा बनी दमन का एक प्रतीक,  
जलाए गए, उभरा वह गीत।

4. ब्रालेस आंदोलन का स्वर:

ब्रालेस मूवमेंट, बंधन तोड़े,  
सामाजिक नियमों को झटकोरे।  
नारी स्वायत्त, स्वीकारे देह,  
सौंदर्य प्राकृत, न मानदंड नेह।

उठा सवाल यह स्त्रियों से,  
क्या ब्रा जरूरी है कद-कद से?  
कसावट, जलन, रक्त प्रवाह,  
स्वास्थ्य बना अब प्रतिरोध राह।

‘नो ब्रा डे’ की लहर चली,  
स्त्रियों की टोली में जली।  
‘फ्री द निप्पल’ हुआ प्रतीक,  
बोला ‘अब न सहें अधिक’।

मिस अमेरिका में विरोध हुआ था,  
दमनकारी वस्त्र जलाना चाहा।  
हालाँकि जलना था अतिशयोक्ति,  
स्वतंत्रता की थी वह सत्य भक्ति।

आइसलैंड में छात्राएँ जागीं,  
टॉपलेस होकर, बंधन को त्यागीं।  
नो ब्रा डे, तीस देशों में गाया,  
हैशटैग से नारी ने ठहराया। 

सबीना बोली, घुटन है ब्रा में,  
स्वतंत्र देह की चाहत सदा में।  
निप्पल सबके, शर्म कैसी आए,  
चुनाव नारी का, वह स्वीकार लाए।  

5. भारत में आंदोलन की गूंज:

भारत में चुनौती, नजरें ताने,  
‘अश्लील’ कह समाज ठहराने।  
सुरक्षा का डर, उत्पीड़न भारी,  
स्त्री की राह में रुकावट सारी।

परंपराओं की भूमि यह भारी,  
जहाँ लाज बनी है संसारी।  
साड़ी के भीतर भी अनिवार्य,  
ब्रा न हो तो अश्लील विचार।

घूरा जाता, कहा बेहया,  
स्त्री है क्या कोई दशा?  
‘संस्कृति’ का पहरा भारी,  
नारी कैसे हो खुदचारी?

सोशल मीडिया ने दी नई सैर,  
फ्रीथेनिपल बनी आवाज़ गैर।  
नारी देह को यौनिकरण मुक्त,  
स्वायत्तता की राह बनी सुखद।

नाइजीरिया में नियम अनघट,  
ब्रा बिना परीक्षा में रट।  
आक्रोश जगा, बहस छिड़ी भारी,  
नारी स्वतंत्रता की पुकार सारी। 

भारत में धारा दो नौ चार,  
‘अश्लील’ कह, देती उत्पीड़न मार।  
उर्वशी बुटालिया, लेखन में बोली,  
देह पर नियंत्रण, पितृसत्ता खोली।

मिशेल रॉबर्ट्स ने ठहराया,  
ब्रा बंधन, समाज ने बनाया।  
कैद की कहानी, देह की सजा,  
नारी अस्मिता का दर्द बजा।

ब्रालेस होना, स्वतंत्रता गाना,  
देह को अपनाना, मुक्ति ठाना।  
स्त्री की चाहत, बिना बंधन जीना,  
प्राकृतिक सौंदर्य, उसे अपनाना। 

6. वस्तुकरण और प्रतिरोध:


स्तनों को बना जो बाज़ार,  
उनकी देखभाल बना व्यापार।  
सुंदरता की एक कसौटी,  
ब्रह्मण-पावन ब्रा की बोटी।

पर नारी ने यह ठाना,  
अब निज तन पर ही है थाना।  
न होंगे झुकाव से परिभाषित,  
न ही वस्त्रों से अनुशासित।

आइरिस यंग की बात सुनाए,  
ब्रा बाधा, देह को मिटाए।  
प्राकृतिक हिलन, स्तन का सौंदर्य,  
नारी की चाहत, बने वह मंदर।

7. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

कंचुकी पुरानी, क्रोचेट भारी,  
रीढ़ को तोड़े, देह को मारी।  
विश्वयुद्ध में धातु की कमी आई,  
कपड़े की ब्रा, तब मुक्ति लाई।।  

कारखानों में नारी ने गाया,  
ब्रा की जरूरत, सबने ठहराया।  
सूती-नायलॉन, रेशम की सैर,  
आत्मविश्वास की बनी वह गैर।

औशवित्स में कैदी की पीड़ा,  
बोरे से सिली, ब्रा की क्रीड़ा।  
एस.एस. ने सजा दी थी भारी,  
नारी देह पर पितृसत्ता सारी।

क्रोचेट, कंचुकी, तार-पिंजरा,  
ब्रह्मा ने यह कब चाहा ज़रा?  
रीढ़ दबे, पर देह दिखे,  
यही था सौंदर्य का निकष लिखे।

युद्धों में भी औरत जिए,  
बिना सुविधा, चुपचाप सहे।  
कैंपों की पीड़ा, बोरे की ब्रा,  
क्या यह मानवता की कथा?

8. स्त्री का आत्मबोध:

पहला हुक जो पुरुष खोले,  
स्मृति बनी वह तन-मन तोले।  
वह क्षण, वह अनुभव की आंच,  
देती है नारी को पहचान।

स्त्री जो देह को समर्पित करे,  
उसमें लाज नहीं, बस विश्‍वास भरे।  
वह प्रेम हो या आत्म-प्रसाद,  
देह न बने कोई अपवाद।

एम्मा वॉटसन ने दी थी हुंकार,  
स्त्रीवाद है विकल्प, न मार-संघार।  
स्वतंत्रता की राह, समानता आधार,  
स्तन से क्या, मुक्ति का संसार।

सवाना ब्राउन की यूट्यूब सैर,  
‘फ्री द निप्पल’ बनी पुकार गैर।  
लीना एस्को ने फिल्म बनाई,  
नारी मुक्ति की राह दिखाई।

9. विज्ञापन और संस्कृति का यथार्थ:

विज्ञापन कहते, ब्रा है जरूरी,  
‘अपूर्ण’ बिना इसके नारी पूरी।  
दोहरा मापदंड पुरुष-नारी में,  
लैंगिक असमानता सदा भारी में।

बिना ब्रा हो ‘अपूर्ण’ दिखाई,  
यह सोच बनी है साजिश भाई।  
स्त्रीत्व की बनावट झूठ,  
जिससे हो नारी सदैव लूट।

विज्ञापन का झूठा रूप,  
नारी को बाँध रहा है खूब।  
बाजार बना है निर्णयकर्ता,  
स्त्री बने बस उपभोक्ता।

फिर भी बदला, जागी नारी,  
स्वास्थ्य की राह, बनी सारी।  
डिजाइनर कपड़े, बिना ब्रा सजे,  
आराम-स्वतंत्रता, अब वह बजे।

10. पितृसत्ता और अपराधबोध:

ब्रा न पहनने पर हो दंड,  
पता चले कौन है प्रचंड।  
धारा 294 से दफा,  
पहनावा बना अपराध वफा।

घरों में कपड़े सुखाए छिपा,  
स्त्री दिखाए नहीं तन-निपा।  
पुण्य न देखे मातृत्व में,  
लाज खोजे बस वस्त्र में।

स्त्री की निर्वस्त्रता, दर्द गहरा,  
लज्जा ढँकी, पत्तों से पहरा।  
सभ्यता ने बंधन को अपनाया,  
नारी के सौंदर्य को ठहराया। 

पुरुष नग्नता, पौरुष का गान,  
स्त्री की लज्जा, बनी बाजार ठान।  
म्यूजियम में, वस्त्र ना दिखाए,  
नारी सम्मान को, मृत्यु में पाए।।  

11. आत्मनिर्णय की चेतना:

नारी कहे यह मेरा तन,  
न ही कोई है वस्त्र-बंधन।  
क्या पहनूँ और क्या न पहनूँ,  
इसका निर्णय स्वयं में गहनूँ।

पितृसत्ता कहे यह राजनीति,  
हर आंदोलन को कहे कृति।  
पर आत्मा की यह पुकार,  
तन पर अधिकार हो खुद धार।

प्रेमी के लिए, देह का उपहार,  
सम्मान में बंधा, स्नेह आधार।  
स्त्री की प्रकृति, प्रेम में जीना,  
पितृसत्ता को, उसने ना साधा।

12. भविष्य का आह्वान:

धीरे-धीरे बदलेगा समय,  
फूटेगा तम का अंतर्द्वंद्व।  
कपड़े नहीं बनेंगे परख,  
स्वीकृति होगी नारी स्वच्छ।

स्त्री बन सकेगी वह जो चाहे,  
बिना झिझक और बिना राहे।  
नारीवाद न हो सिर्फ़ बात,  
बने व्यवहार में नई जात।

ब्रा का हुक, पहला स्पर्श प्यारा,  
नारी हृदय में, स्मृति वह न्यारा।  
संतान को दूध, देह की सैर,  
आत्मविश्वास में, नारी गौरव गैर।

13. मुक्ति की पुकार:

स्त्री मुक्ति की राह बनाए,  
ब्रालेस मूवमेंट, बंधन मिटाए।  
नारी अस्मिता, स्वतंत्रता गाना,  
समानता का, सपना सजाना।  

नारी की देह न हो पहरा,  
उस पर हो उसका ही बसेरा।  
ब्रालेस हो या वस्त्रयुक्त,  
स्वतंत्रता का हो यह युक्त।

बोलो साथ – “अब देह हमारी”,  
नहीं किसी की निगरानी सारी।  
हमें न चाहिए स्वीकृति, शपथ,  
बस देह की हो निज़ामत स्पष्ट।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


संदर्भ ग्रंथ सूची:-

1.

2.

3.

4.

5.

Tuesday, 5 August 2025

गमछे का रंग (कविता) : गोलेन्द्र पटेल

 

♠[रूप—1]


**गमछे का रंग** 
 
जब मैं
सफ़ेद गमछा डाल निकलता हूँ,
लोग कहते— "यह तो अब कांग्रेसी हो गया है!"
भगवा लपेटूँ,
तो बोल उठते— "भाजपाई लग रहा है।"
लाल पहनूँ,
तो फुसफुसाहट होती— "सपाई निकला!"
नीला ओढ़ूँ,
तो तंज उभरता— "बसपा का प्रतीक है!"
हरा लहराए,
तो चुटकी बजती— "आरजेडी का समर्थक है!"
पीला बाँधूँ,
तो कोई कहता— "जनसुराज का एजेंट है",
कोई बोले— "राजभर का आदमी है।"
 
 
मैं
किसी भी रंग का गमछा ओढ़ लूँ,
हर बार
मुझे किसी न किसी पार्टी से जोड़ दिया जाता है।
 
 
अब तो
रंग भी संदेह बन गए हैं,
गमछा भी विचारधारा!
 
 
मैं
सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना करता हूँ—
इस रंगभेद की राजनीति से मुझे मुक्त करें।
क्योंकि मैं
सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं,
एक गाँव हूँ—
जिसके हर घर में हर रंग के लोग रहते हैं।

 

♠[रूप—2]
**गमछे का रंग**  
 
सफेद गमछा लहराऊँ,  
लोग चिल्लाएँ, "कांग्रेसी आया!"  
भगवा गमछा कंधे पर डालूँ,  
कहें, "यह तो भाजपाई हो गया!"  
 
 
लाल गमछा लूँ, सपाई ठहरूँ,  
नीला लूँ, बसपाई कहलाऊँ।  
हरा गमछा कंधे पर आए,  
"RJD का सिपाही!"—लोग चिल्लाए।  
 
 
पीला गमछा जो लहरा जाये,  
जनसुराज या राजभर का कहलाये।  
हर रंग में बँटता मेरा नाम,  
पार्टी का ठप्पा, बन गया मेरा काम।  
 
 
सर्वोच्च न्यायालय से गुहार लगाऊँ,  
रंगों की कैद से आज़ादी पाऊँ।  
न रंगों में बँटूँ, न पार्टी में बँधूँ,  
मैं सिर्फ़ इंसान हूँ, गाँव का गान हूँ।  

 

♠[रूप—3]
**गमछे का रंग**  
 
जब मैं सफेद गमछा लेकर निकलता हूँ
तो लोग कहते हैं कि यह तो कांग्रेसी हो गया है
जब मैं भगवा गमछा लेकर निकलता हूँ
तो लोग कहते हैं कि यह तो भाजपाई हो गया है
जब मैं लाल गमछा लेकर निकलता हूँ
तो लोग कहते हैं कि यह तो सपाई हो गया है
जब मैं नीला गमछा लेकर निकलता हूँ
तो लोग कहते हैं कि यह तो बसपाई हो गया है
जब मैं हरा गमछा लेकर निकलता हूँ
तो लोग कहते हैं कि यह तो RJD का हो गया है
जब मैं पीला गमछा लेकर निकलता हूँ
लोग कहते हैं कि यह तो जनसुराज का हो गया है
या फिर राजभर का आदमी हो गया है
मैं किसी भी रंग का गमछा लेकर निकलूँ
लोग मुझे किसी न किसी पार्टी से जोड़ दे रहे हैं 
 
मैं सर्वोच्च न्यायालय से निवेदन करता हूँ
कि वे इस गंभीर समस्या पर ध्यान दें
ताकि मैं किसी भी रंग का गमछा लेकर निकल सकूँ
और लोग मुझे पार्टी विशेष से न जोड़ें
मैं सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं, गाँव हूँ। 
 
—गोलेन्द्र पटेल

 

संपर्क: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Saturday, 2 August 2025

कल्कि (खण्डकाव्य)

 

“हमारा ‘कल्कि’ खंडकाव्य धार्मिक मिथकों को समकालीन संदर्भों में पुनर्व्याख्या करता है। यह काव्य केवल एक धार्मिक कथा का पुनर्पाठ नहीं है, बल्कि यह समाज, विज्ञान और संस्कृति के प्रति एक गहरी चेतना को दर्शाता है। हमारे कवि का वैचारिक दृष्टिकोण, जिसमें परंपरागत मिथकों की आलोचना, बौद्ध धर्म की पुनर्व्याख्या और सामूहिक नायकत्व पर बल दिया गया है, यह खंडकाव्य न केवल साहित्यिक दृष्टि से पठनीय है, बल्कि यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति भी है, जो पाठकों को सोचने और प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित करता है।

‘कल्कि’ एक ऐसी रचना है, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच एक संवाद स्थापित करती है और यह सिद्ध करती है कि साहित्य न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह समाज को दिशा देने और चेतना जगाने का भी एक शक्तिशाली माध्यम है। यह खंडकाव्य, आस्था के अनुकरण से आगे बढ़ते हुए, मानव विवेक के अवतरण की वकालत करता है — और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।”

कल्कि (खण्डकाव्य)

—गोलेन्द्र पटेल 

विष्णु के दस अवतार, जग में आए बार-बार,  

मत्स्य रूप धरा प्रभु ने, बचाया धरती का आधार।  

कूर्म वराह नरसिंह, वामन रूप अपार,  

परशुराम बलशाली, किए पापियों का संहार।  


राम कृष्ण जग विख्यात, बुद्ध शांति के अवतार,  

कल्कि आएंगे अंत में, मिटाएंगे जग का दुख भयंकर।  

दस रूप प्रभु के पावन, भक्तों के रखवाले,  

हर युग में रक्षा करते, विष्णु हैं जग के पाले।


मत्स्य बने जब प्रलय घनेरा, वेद बचाए धीर,

जलचर रूप लिए प्रभु ने, किया सृष्टि का पीर।

कूर्म रूप धरें जब धरणी, नीचे जाए धसे,

मंथन करता क्षीर सागर, अमृत वरषा बसे।


वराह उठाए भू अधो में, दैत्यों ने जो धँसाई,

धरती को पुनि स्थान दिया, उभरी जग की छाई।

नरसिंह बने खंभ फाड़ के, दैत्य हिरन्य संहारे,

भक्त प्रहलाद बचाए तब, धर्म सदा के तारे।


कल्कि अवतार, विष्णु के दसवें रूप महान,  

कलियुग अंत में आएंगे, करेंगे पाप निदान।  

देवदत्त घोड़े सवार, तलवार हाथ में धार,  

दुष्टों का संहार करें, स्थापित करेंगे प्यार।  


संभल ग्राम में जन्म लें, विष्णु यश पिता नाम,  

सुमति माता, धर्म रक्षक, करें सतयुग प्रणाम।  

अधर्म नाश, धर्म स्थापन, सतयुग लाएंगे साथ,  

कल्कि कथा भविष्य की, देती आशा और पाथ।  


कल्कि अवतार अंतिम हैं, विष्णु रूप की बात,

धर्म हेतु आना उन्हें, पापों की औकात।

जब कलियुग में पाप का, होगा प्रबल प्रवाह,

धरा धरेगा धर्म फिर, कर दुष्टों की थाह।


घोड़ा होगा देवदत्त, उज्ज्वल उसका रंग,

हाथ लिए तलवार को, करेंगे पाप भंग।

धर्म पुनः स्थापित करें, करें अधर्म नष्ट,

संघर्षों से जाग उठे, फिर से नीति-पृष्ठ।


संभल ग्राम कहलाएगा, पुण्य भूमि विशेष,

कल्कि वहीं जन्मेंगे, नव युग लाएँ शेष।

विष्णु यश होंगे पितृजन, मातृ नाम सुमति,

साधुजन के हित उठे, कल्कि रूप की गति।


जब कल्कि तलवार लिए, करें महा प्रहार,

सतयुग फिर से लौट आए, मिट जाए संहार।

शंख नहीं, ना पुष्प हैं, ना है कोई वेद,

धार लिए हैं तेज की, अब तलवार-वेद।


भविष्यदर्शी ऋषि कहें, यह सत्यावधान,

धर्म करेगा कल्कि से, फिर नव निर्माण।

यह आख्यान नहीं मात्र, चेतावनी की रेख,

पुनरुत्थान धर्म का, है कल्कि की लेख।


सफेद घोड़े पर सवार, कल्कि की बात,  

फिल्म यूट्यूब पे दौड़ती, करती सबको मात।  

घुड़सवारों की सेना संग, मुक्ति का संदेश,  

भक्तों के उद्धार को, चलता दिव्य विशेष।  


कुलीनतंत्र का सपना, छिपा विशेष में,  

कल्कि की प्रतीक्षा में, बैठे लोग निश्छल में।  

युक्ति का मखौल करें, कुदरत को भूल गए,  

करिश्मों की आँखें, अंधी होकर झूल गए।  


दिव्यांगों की मुक्ति को, बनता नव सन्देश,

पर सपनों में छिपा है, कुलीनों का क्लेश।

भविष्य की परिकल्पना, है विषैली बात,

कल्कि बना विशेषजन, भरे अहंकार घात।


जनसंख्या की भीड़ में, समाधान न दिखे,  

संतति-निरोध यंत्र, बनाया मनुज इच्छे।  

कुदरत के नियम को, नकारें लोग आज,  

विज्ञान की राहों को, ठुकराए बिन काज।  


युक्ति-तर्क को हँस रहे, बैठे चुप इन्सान,

देख न पाते चमत्कार, खो बैठे पहचान।

जनसंख्या सीमा की, न युक्ति मान पाएँ,

इच्छा बिना बने यंत्र, कैसे उसे अपनाएँ?


पूर्वजों ने शिशु रक्षा, खतना सा काम किया,  

विज्ञान आधारित उत्पाद, अब न स्वीकार किया।  

रोमांच की चाह में, प्रलय को देखें लोग,  

पर्यावरण नष्ट हो, समझ न आए भोग।  


खतना रीत पुरातन, कहते विज्ञानहीन,

अनुसंधान न माने, बौने उनके मीन।

प्रलय दिवस की चाह में, आँखें हैं बेकार,

जीवन-भू के नाश को, करते हैं स्वीकार।


वृद्धि मानव की सहे, संसाधन अब चुक,

तर्कों से डरते सभी, करते युक्ति की धुक।

युद्ध-विपद से बचाव को, बढ़ती है आबादी,

कुदरत को फोड़े रहें, व्यर्थ हवा की सादी।


रोग-युद्ध में मरने की, तुलना जो करें,  

संख्या-वृद्धि सुरक्षा, मध्यकाल बोध करें।  

कुदरत को अपराधी, बनाए यह विचार,  

सृष्टि चक्र फट जाए, जैसे पंप बेकार।  


चीथड़े में उड़े सृष्टि, देखें लोग यही,  

दंगाई भीड़ बन जाए, समाधान वही।  

कल्कि तलवार सवार, प्रलय की राह देखें,  

आत्महंता अंत की, कामना में रहें।  


ट्यूब फटेगा जल्द ही, पंप रहे भरते,

चीथड़ों में उड़ते खुद, हँस-हँस कर मरते।

घुड़सवार तलवार लिए, आए प्रलय समान,

भीड़ वही हल खोजती, जिससे मिटे जहान।


घुड़सवार की प्रतीक्षा, मन में भारी मौन,

कामना है एक साथ, अंत-आरंभ को पौन।

लेकिन इनके मध्य में, कल्कि स्वयं छिपा,

जो विज्ञान की लौ जला, हर संकट में टिका।


नया युग आरंभ की, प्रत्याशा मन में,  

कयामत का सपना, बस छाया जन में।  

पर बीच में छिपे हैं, वैज्ञानिक ऋषि-वर,  

टाटा-मस्क सा नायक, करता विश्व डगर।  


रतन टाटा, एलन हैं, कल्कि रूप धरते,

बचाने को धरा सभी, अपने कर्म करते।

संस्था में अवतार हैं, युग परिवर्तक आम,

नायक कोई एक नहीं, जनता ही भगवान।


यू-ट्यूब पर दौड़ रही, कल्कि बनी मिसाल,

रेल-सेना संग चला, घोड़े पर भूतलकाल।

नाम न जाने जो मगर, बदलें जग निर्माण,

उन अनाम कल्कियों से, चलता युग परिवर्तन।


वैष्णवी रूपांतरण, व्यापार सा चले,  

दुनिया बचाने का, हर जन को बल मिले।  

नहीं एक नायक पर, सारी जिम्मेदारी,  

हर आम जन के नाम, बदलने की कारी।  


मानव-जाति पैदा करे, कल्कि अनगिनत,  

सामूहिक अंशदान से, दुनिया बदले सतत।  

अनाम कल्कियों का, योगदान है महान,  

धरती की रक्षा का, हर जन का सम्मान।  


पांडुरंग वह नाम था, बुद्ध स्वरूप महान,

विष्णु कह कर ढाँप दी, ब्राह्मणवाद की जान।

निरंजन ही बुद्ध थे, ज्ञान रूप गुणगान,

विष्णु बना कर लेख में, बदल दिया विधान।


पांडुरंग, निरंजन, बुद्ध के नाम सुहाय,  

साजिश रच विष्णु संग, अवतार बताय।

विठ्ठल को विष्णु कह, रचा गया छल भारी,  

बौद्ध साहित्य मोल ले, मिटायी बात सारी।


बुद्ध कहा विष्णु अवतार, रचा गया यह खेल,

धर्मों की पहचान पर, साज़िश भारी ठेल।

तथागत के बाद में, आए जो मैत्रेय,

उन्हें कहा कल्कि फिर, यह भी चाल विद्रेय।


बुद्ध मतों की धार को, मोड़ा धर्म विष्णु,

बौद्ध विचारों पर पड़ा, पाखंडी पंज निश्छु।

मैत्री, करुणा, शांति के, प्रतिनिधि जो ठहरे,

उन्हें बना तलवारधारी, अर्थों को ही गहरे।।


कल्कि कहा मैत्रेय को, तोड़ा सत्य महान,

बुद्ध विरोधी सोच का, यह अंतिम प्रमाण।

बुद्ध न थे अवतार पर, कह दिया अवतारी।

चुप रहे विद्वान सब, कथा बनी सरकारी।


मैत्रेय का लोकपथ, करुणा से है युक्त,

घोड़े वाली कल्पना, बौद्ध भाव की वुक्त।

युवक कवि की चेतना, दे विचार का तेज,

तोड़े मिथक जाल सब, कहे नया सन्देश।


मैत्रेय बुद्ध अवतार, तथागत का अंत,  

भविष्य का बुद्ध कहें, पूजित सबके संत।  

विष्णु का नौवां रूप, बुद्ध को हिंदू मान,  

साजिश गहरी रच गई, कल्कि कहे सम्मान।


सत्य बौद्ध का गुम हुआ, मिथ्याओं का ताज,

विठ्ठल में बुद्ध लुप्त हैं, ब्राह्मणवाद की साज।

बुद्ध बने अवतार जब, खो गई वो चेत,

धर्म क्रांति की ध्वजा, झुकी गई अचेत।


जिन्हें कहा था शून्य स्वर, करुणा का संवाद,

उनको देव बनाकर अब, छिपा लिया उत्प्राद।

निरपेक्षता बुद्ध की, खो गई भक्तिवाद,

सत्य खोज को हर लिया, चालाक पुरोहितवाद।


गोलेन्द्र की दृष्टि में, यह इतिहास का भंग,

बुद्ध नहीं विष्णु कभी, न विठ्ठल पांडुरंग।

निरंजन विष्णु नहीं, बुद्ध सत्य पहचान,

मिथ्या बातों से ढँका, उनका तेज महान।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


Wednesday, 30 July 2025

प्रेमचंद पर केंद्रित 300 दोहे : गोलेन्द्र पटेल

कथा सम्राट प्रेमचंद के व्यक्तित्व व कृतित्व पर केंद्रित 300 दोहे : गोलेन्द्र पटेल 
गोलेन्द्र पटेल कलम के नहीं, बल्कि कुदाल के मज़दूर कवि हैं, इन दिनों वे कर्जों के बोझ तले दबे हुए हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई छूट गई है! बहरहाल, आज प्रेमचंद की जयंती के सुअवसर पर “प्रेमचंदनामा” से उनके 300 दोहे प्रस्तुत हैं। यदि कोई दोहा पसंद आये, तो आप उनके नंबर पर कुछ परिश्रमिक भेज सकते हैं, फिलहाल उनके पास फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं हैं। आप गूगल पे या फोन पे कर सकते हैं। ज़्यादा नहीं, सिर्फ़ 700₹।

मोबाइल नंबर: 8429249326


1.

कवि गोलेन्द्र की वाणी में, प्रेमचंद जीवंत।

सत्य, विचार, संघर्ष का, लेखन हो दर्पण॥

2.

जन्म दिवस पर नमन हो, लेखन-शक्ति महान।

जिसने खोली सवर्ण की, नारीवाद की जान॥

 3.

धनपतराय तुम्हें नमन, सत्य-पथिक की चाल।  

कथा-कवच में सत्य के, ढहते झूठ-बबाल॥

4.

विश्वासों के दीप से, चेतन ज्योति जलाय।  

डर की भाषा में बसा, यथार्थों का रुग्णाय॥

5.

फटे जूते पाँव में, चलता रहा समर।  

देह नहीं, हर साँस में, शब्द बने अक्षर॥

6.

सूरा, होरी, गोबरन, धनिया की परती।  

बुधिया की करुणा बसी, मानस में भरती॥

7.

कफ़न, सद्गति, बलिदान, सेवा-सदन विराट।  

ईदगाह में गूँजता, मानवीय संवाद॥

8.

रंगभूमि से गोदान तक, प्रेमाश्रम संजीव।  

प्रेमचंद की लेखनी, गाँव-गली समीप॥

9.

जयसिंह की दृष्टि में, कुर्सी बदले स्वभाव।  

सोफिया-मालती गुँथे, गोविंदी के भाव॥

10.

गद्य तुलसी तुम बने, कहानियों के शेर।  

बलिदानी हर सोच में, शामिल विचार फेर॥

11.

दलितों के दीप हो, गाँवों के इतिहास।  

क्रांति तुम्हारी राह है, न्याय तुम्हारी आस॥

12.

महाजनी चाल को, तुमने दी चुनौती।  

तोड़ मरजादों की बेड़ी, की जग में ज्योति॥

13.

स्नेह-समता न्याय से, जो जीते हर छंद।  

वह रचता है मौन में, परिवर्तन के बंद॥

14.

शब्द बने जो व्रक्ष से, दुख की दोपहरी।  

प्रेमचंद के गीत में, जनमन की गंभीरि॥

15.

जोखू-प्यासा देखता, ठाकुर का वो कुआँ।  

तुमने लिखा सत्य को, आँचल बना धुआँ॥

16.  

सत्-प्रेम के सरोवर में, अरुण-कमल खिले।  

सपनों की सौगंध से, यथार्थों को छिले॥

17. 

प्रेमपंचमी रोज़ हो, हर घर खिले सरोज।  

मानवता के मार्ग पर, हो साहित्य-प्रबोध॥

18. 

हल्कू की ठंडी तना, पूस की रात डरे।  

पर लेखनी प्रेम की, हिम्मत नई भरे॥

19.

लमही से जो उठ रही, जय की चिर धुनि तेज़।  

कहानी की क्यारी में, प्रेमचंद विशेष॥

20.

ऋषि-कथाकार प्रेम हो, शब्दों में संधान।  

साहित्य की साधना में, हो जीवन बलिदान॥

21.

रंगभूमि का सौ बरस, कैसी ये पहचान।

छिपा हुआ जो दीप है, बनता फिर से जान॥

22.

गोदान जैसा नामवर, पीछे डाल चलाय।

पर सूरदास आज भी, संकट में ललकाराय॥

23.

विस्थापन की कथा लिए, यह बहुधा उपदेश।

सुनता इसमें आज का, समाजिक संश्लेष॥

24.

अंग्रेजी आंधी चली, उजड़े गाँव नगर।

नील तंबाकू के लिए, कृषक हुआ बदतर॥

25.

सूरदास अंधा सही, पर भीतर प्रखर दृष्टि।

सत्य आदर्शों हेतु, उसमें रही सगर्व सृष्टि॥

26.

ठाकुर पूछे व्यंग्य से, विपदा है क्या आई।

सूरदास कहि चेतना, आज की बात सुनाई॥

27.

बोल उठे सूरे तभी, सेवा से जीवन धार।

तुम अपने घर में नहीं, करोगे बाहर भार॥

28.

प्रेमचंद को पढ़ सकें, वह सूत्र कहाँ मिलाय।

विवादों के शोर में, असली रूप छुपाय॥

29.

शहर-गाँव का द्वंद हो, स्त्री-मन की बात।

कभी कहें मन से दूर, कभी बाह्य प्रभात॥

30.

सूरदास, गंगी, होरी, जब लेखन में आय।

भूले-भटके लोगों की, नींव जरा डोलाय॥

31.

ब्राह्मण-विरोधी कहें, दलित कहें विरोध।

फिर भी जन का साथ है, यही सत्य निष्कोध॥

32.

गांधी जब गोरखपुर आए, प्रेमचंद बदलाय।

छोड़ी नौकरी तुरत ही, लेखन में रम जाय॥

33.

प्रगतिशील विचार का, नेता कहें उन्हें।

पर फिर भी उस खांचे में, बाँध सकें ना वेन॥

34.

हिंदू-पाठ मिला कहीं, कहीं समाजवाद।

कोई कहे राष्ट्रभक्त, कोई कहे फसाद॥

35.

इतने खांचे बीच में, प्रेमचंद क्यों प्रिय।

क्यों अब भी पाठक कहें, ‘वो तो है हमरीय’॥

36.

परसाई के चित्र में, फटा जूता है खास।

कहें कि जिसने ठोकर दी, जमी हुई हर घास॥

37.

जूता फटा क्यों भला, चलते फटे न जूति।

परसाई बोले तभी, ठोकी जम के भूमि॥

38.

मुक्तिबोध की माँ कहें, दुख वो ही बखान।

जो हमने भोगा वही, कह पाई उसकी जान॥

39.

अंगुलियों के फटे जूते, हवा खायें ठाठ।

प्रसाद संग फोटो में, प्रेमचंद की बात॥

40.

सीधा सादा भेस था, भीतर तीव्र ज्वार।

जन-संघर्षों के लिए, लेखन बना पुकार॥

41.

हिंदी के तुलसी कबीर, जैसे जन के बीच।

वैसे ही प्रिय प्रेमचंद, जिनसे जनता रीझ॥

42.

इसलिए यह पाठ है, प्रेमचंद को जान।

वर्ग-चिन्ह के पार हैं, भीतर से इंसान॥

43.

साहित्य की मशाल वे, राजनीति से तेज।

उनकी लेखनी बनी, जन-चेतन की सेज॥

44.

राजा-सा सम्मान पा, मन में भारी द्वंद।

बोलें तो श्रमवीर से, करें नहीं अनुबंध॥

45.

दया-दृष्टि की छाँव में, दबता रहा कृषक।

इजाफे की धार से, रीता उसका थक॥

46.

धर्म, दया और राज्य का, बँधा हुआ निर्माण।

प्रजा करे जब पूजना, तब करें उत्थान॥

47.

स्वर्गवासी पितृ छवि में, गौरवपूर्ण बखान।

अधिकार की बात पर, हो जाते हैरान॥

48.

ऊँचे सिद्धांतों का, करते हैं बखान।

मालती से प्रेम में, करते खुद अपमान॥

49.

प्रकृति-प्रेम के नाम पर, अस्वीकार सभ्यता।

लोकतंत्र, विज्ञान को, मानें मन की व्यथा॥

50.

वोटों को बतलाएं वे, मरीचिका का रूप।

नारी को लौटाते फिर, जंगल वाला धूप॥

51.

दर्शन भारी है बहुत, आचरण बिलकुल हल्का।

मालती कहती सही, विचार-व्यवहार खल्का॥

52.

मित्र बने रहना भला, न चाहें अधिकार।

प्रेम बिना परवश न हो, यही प्रथम विचार॥

53.

प्रणय-प्रस्ताव को ठुकरा, कहा नया इक पंथ।

साथ-सहेली भाव से, मिलकर जिएं संत॥

54.

दीन-दुखी की करुणा में, दे मन का समाधान।

शब्द नहीं, आचरण में, दिखलाए पहचान॥

55.

धनिया संगिनी बनी, होरी की पतवार।

जहाँ दिखे जब डगमगाए, पकड़े उसका धार॥

56.

होरी यदि चूकता कहीं, भूल करे निज कर्म।

धनिया चेताए उसे, समझाए धरम-धरम॥

57.

झुनिया को घर से निकाल, होरी चला दृढ़ ध्यान।

धनिया रोके प्रेम से, बदल गया विधान॥

58.

भाग्य, धरम, मर्यादा में, सब कुछ है स्वीकार।

झूठे आदर्शों तले, सच करता भी प्यार॥

59.

गाय गई, घर रीता हुआ, भाई था अपराधी।

फिर भी अपना मानकर, निभाए रक्षा साधी॥

60.

होरी की संघर्ष-गाथा, स्वप्नों का अनुराग।

टूटे जीवन में रचा, सामूहिक अनुराग॥

61.

सिद्धांतों के नाम पर, करते कुटिल प्रयोग।

पत्र लिखें, ब्लैकमेल कर, बनते हैं सुत जोग॥

62.

खन्ना बोले अंत में, 'मैंने सब कुछ खोया।

रिश्वत ली, नीति मरी, तब जाकर यह रोया॥'

63.

धर्म-दया की आड़ में, गला काटते लोग।

पाखंडों की भीड़ में, क्या संन्यासी भोग॥

64.

धर्म बना व्यापार जब, गाय बने औजार।

होरी के गोदान से, टूटा वह व्यापार॥

65.

'गोदान' में गाय नहीं, बीस आना का मोल।

गाय अभी भी राह में, अधूरा उसका बोल॥

66.

रूपा ने जो भेज दी, पूरी नहीं व्यवस्था।

पर दिखा दी प्रेम में, आशा की सद्दृश्यता॥

68.

धर्म-जाल में फँस रहे, भोले-भाले लोग।

प्रेमचंद ने व्यंग्य से, की कटुता संजोग॥

69.

गांधी ने खोजा सदा, धर्मों का आधार।

प्रेमचंद ने देख ली, उसमें केवल भार॥

70.

‘गोदान’ में नहीं कही, लेखकीय मनभाव।

पात्र स्वयं के ताप से, गढ़ते कथा प्रभाव॥

71.

राय साहब के वक्तव्य, लगे बहुत सुनाम।

किन्तु उन्हीं पर मेहता ने, कर डाली नाकाम॥

72.

गाँव-नगर के बीच में, दूरी कम थी यार।

राय साहब का भाव यह, दिखलाता आकार॥

73.

दया, उदारता, दिखावटी, पूजित हो अधिकार।

जब तक जनता कह सके, राजा है अवतार॥

74.

कहें विचार उच्चतम, करें व्यवहार भिन्न।

मेहता जैसे पात्र भी, रहते नहीं सुनिश्चित मन॥

75.

दान करें तो भाव वह, नीति से मेल न खाय।

मालती पूछे तब यही—'क्यों यह छल रह जाय?'॥

76.

मालती ने प्रेम को, कहा न उच्च ध्येय।

मित्र बने रहना भला, न हो सकें पर गे॥

77.

होरी के ही रूप में, मिली विचार-ठौर।

जिसका जीवन सत्य था, संकट में भी गौर॥

78.

गाय गई, खेत गया, फिर भी न छोड़ा धर्म।

होरी खड़ा सत्य पर, जब टूटा भी कर्म॥

79.

भाई के अपराध पर, तन-मन कर दे दान।

होरी उसमें हारता, जीत भी है जान॥

80.

बीस आने की थैली से, हो गया गोदान।

गाय न आई फिर कभी, छूट गया सम्मान॥

81.

रूपा गाय लिए चली, आस अभी भी शेष।

प्रेमचंद ने ठेंगा दिखा, पाखंडों को क्लेश॥

82.

प्रकृति-तंत्र के प्रेम में, करते जन-विरोध।

मुक्ति-संग्रामों को कहा, हिंसा, कलह, प्रपंच॥

83.

नर-नारी संबंध में, पशु-जैसा व्यवहार।

मेहता की यह दृष्टि भी, देती है झंकार॥

84.

होरी का संघर्ष है, महाकाव्यिक रूप।

मरे मगर न हारता, संकल्पों का कूप॥

85.

झुनिया, गोबर, धनिया, मंगल हों सहचार।

नई व्यवस्था में रहे, पूरा परिवार॥

86.

वंदन उनको प्रेम से, जिनकी लेखन-धार।

शोषण के प्रतिकार में, बने जनाधार॥

87.

हिंदू राष्ट्र घुसाय दे, अब उनके विचार।

जिनसे डरती थी सदा, पाखंडों की मार॥

88.

जिनके शब्द करुणामय, जिनकी दृष्टि विशाल।

उन पर झूठा थोपते, आज विभाजन-जाल॥

89.

ब्राह्मण-द्रोह न लेखनी, सत्य के संग जंग।

पाखंडों से प्रेमचंद, रहे सदा बेढंग॥

90.

कहा स्वयं उन्होंने यह, घृणा नहीं इंसान।

पाखंडों से घृणा रखो, हो जग का कल्याण॥

91.

धर्मोपजीवी दल बने, कोढ़ सरीखा रोग।

टकेपंथियों से लड़े, थे वे जलते लोग॥

92.

‘महाजनी सभ्यता’ से, किया मुखर संधान।

मानवता के मार्ग पर, बोले सत्य बयान॥

93.

प्रगतिशील लेखन हेतु, हुआ लखनऊ यज्ञ।

जहाँ प्रेमचंद अध्यक्ष, बोलें स्पष्ट पंथ॥

94.

‘हंस’ पत्रिका में छपा, था वह घोषणपत्र।

मंच से बोले: लेखनी, ना हो केवल तंत्र॥

95.

“देशभक्ति की पंक्ति में, साहित्य न पड़े पाँव।

बल्कि बने वह मशाल जो, दे आंदोलन थाम॥”

96.

उर्दू भाषण लिख लिया, बोले प्रेमचंद।

पढ़ा सभा में भाव से, मंत्रमुग्ध हर छंद॥

97.

सज्‍जाद ज़हीर साथ में, सबने की तस्दीक।

रौशनाई लेख से, मिली तथ्य की भीत॥

98.

बनारस में शाख हेतु, प्रेमचंद प्रयास।

गोरखपुर, पटना गए, किया स्वयं प्रकाश॥

99.

अज्ञेय ने बाद में कहा, भाषण था मौखिक।

पर न थे वे सम्मेलन में, तो क्यों कहें लिख?॥

100

चालीस मिनट प्रेम ने, पढ़ा लिखित संवाद।

सुन सब रह गए चुपचाप, छू गई हर बात॥

101.

राजनीति से दूर थे, यह अज्ञेय विचार।

पर प्रेमचंद का सत्य था, जनसंघर्ष अपार॥

102.

रचते भाषण जब हुआ, चेतनता संधान।

क्यों नहीं मानी गई, लेखनी की जान?॥

103.

सत्ता से कुछ लेखनी, पाने लगी प्रसाद।

सत्य से नित छेड़ती, करती शब्द प्रह्लाद॥

104.

‘कलम का सिपाही’ ग्रंथ, करता सत्य उद्घाट।

अब उस ग्रंथ को भी बनाय, झूठों की बारात॥

105.

झूठ चले अब मंच पर, लेकर भगवा राग।

बन गए प्रेमचंद भी, व्हाट्सएप का जाग॥

106.

संघर्षों के शब्द थे, पीड़ा जिनका स्रोत।

उन्हें बना दिया मूक अब, कर डाला विरोध॥

107.

‘हल्दी की गांठों’ से अब, बिकता ज्ञान-विचार।

काव्य नहीं अब बच रहा, केवल झूठ का वार॥

108.

राह दिखाओ प्रेम की, फिर से धार तलवार।

जन-संघर्ष की लेखनी, दे नव दृष्टि-धार॥

109.

रचना में जो क्रांति हो, वह साहित्य धर्म।

जो पाखंडों से लड़े, वही कलम का कर्म॥

110.

साहित्य है वह मशाल, जो करे उजास।

न हो चाटुकारिता, न हो झूठा पास॥

111.

गांधी, नेहरू, अम्बेडकर, जिनसे थे सहमत।

प्रेमचंद का नाम भी, शामिल उस क्रमवत॥

112.

मित्रवर्ग की पीर से, उपजी थी संवेद।

जिससे निकले शब्द जो, करें क्रांति रेद॥

113.

अंधकार में दीप थे, पीड़ित जन की आस।

आज उन्हें ही चुरा रहे, झूठों की प्यास॥

114.

सत्य वही जो आज भी, दे जन को आधार।

नही झुके सत्ता तले, न दे झूठी धार॥

115.

पुनः रचो वह लहर जो, करे अन्याय समाप्त।

प्रेमचंद की लेखनी, बन जाए प्रतिपात्र॥

116.

कलम, करुणा, क्रांति से, जीवन गढ़ते रहे।

उनके लिखे हुए में ही, हम मानवता गहें॥

117.

जग के झूठे रंग में, न बिसरायें मीत।

प्रेमचंद हैं दीप-से, सत्य हेतु गीत॥

118.

आओ फिर से बाँध लें, सच्चाई के बंध।

लेखन हो प्रतिरोध में, जन की हो हर छंद॥

119.

सत्य कहें जो क्रांति से, उसको मान दो।

जो सत्तामद में झुके, उनसे ध्यान लो॥

120.

वामपंथ का खण्डहर भी, देता सीख अनेक।

छद्म विमर्शों में न हो, इतिहासों का क्षय॥

121.

गौरव है वह आदमी, जो सच कहे सटीक।

प्रगतिशील प्रेमचंद का, हो फिर से संगीत॥

122.

झूठ भले जितना कहे, तथ्य रहे मुखर।

कागज़ देंगे हम वहीं, जहाँ न हो प्रपंच॥

123.

लेखक वह जो झुके नहीं, चाहे मिले न मान।

प्रेमचंद उस लोक के, थे सबसे प्रधान॥

124.

पुनः सजाएँ मंच को, सत्य, साहस, दान।

लेखन को आंदोलन दो, दो विचारों जान॥

125.

कवि गोलेन्द्र रच रहे, यह विचार का राग।

चेतना के संग चलो, मत मानो विराग॥

126.

सत्य बचे साहित्य में, क्रांति रहे संज्ञान।

तभी बचें प्रेमचंद और, बचे सृजन विधान॥

127.

प्रेमचंद के नाम पर, झूठा रचें प्रचार।

हिंदू-राष्ट्र घुसाय दे, लिखत-कलम के द्वार॥

128.

जिनसे काँपे पाखंड के, कंगूरे पतवार।

उन्हीं को करने लग पड़े, भगवाधारी सार॥

129.

घृणा नहीं इंसान से, घृणा पाखंडाचार।

धर्म-नक़ाब में जो करे, जनता का संहार॥

130.

ब्राह्मणत्व न धिक्करे, पर करे संधान।

जो पाखंडी ढोंग से, करे राष्ट्र अपमान॥

131.

कहा प्रेमचंद ने यही, पंडा पूजक वर्ग।

कोढ़ हिंदू जात का, चूसे उसका मर्ग॥

132.

न केवल संयोग था, वह सम्मेलन क्षण।

प्रेमचंद की दृष्टि में, था नवयुग का रण॥

133.

लखनऊ अधिवेशन को, किया अध्यक्षत्थान।

प्रगतिशील लेखन किया, जीवन का अभियान॥

134.

‘हंस’ में पहले ही लिखा, घोषणापत्र विचार।

लेखन के नवस्वप्न को, समझे नव-संहार॥

135.

उर्दू में भाषण रचा, सबको मंत्रमुग्ध।

तर्क, भावना, दृष्टि में, शब्द-ध्वनि संयुक्त॥

136.

गठित हुआ संघ जब, खुद गोरखपुर गये।

बनारस में शाख हेतु, लेखकों से कहे॥

137.

अज्ञेय कहें भाषण नहीं, पढ़ा वहाँ पर यार।

लेकिन क्यों, किस हेतु यह, मिथ्या करे प्रचार?॥

138.

क्यों न मानी गई कभी, आंखों देखी बात?

सज्‍जाद ने जो लिख दिया, क्या वह भी है घात?॥

139.

न माने 'कलम का सिपाही', न माने दस्तावेज़।

अब तो कागज़ मांगते, भगवे झूठ फरेब॥

140.

जो भाषण कहता रहा, ‘साहित्य मशाल’।

उसे हटाकर लेखनी, बनती आज दलाल॥

151.

सत्य यही कि प्रेमचंद, थे संघर्षशील।

महाजनी के काल में, शब्द बने शमशीर॥

152.

प्रेमचंद को मत बनाओ, WhatsApp का ज्ञान।

संघर्षों की स्याही से, लिखें न्याय विधान॥

153.

मूल्य-बोध औ चेतना, लेखन में था गूढ़।

साहित्यकार वही सच्चा, जो न झुके, न रूठ॥

154.

आओ फिर से जान लें, वह भाषण, वह सत्य।

झूठ की दीवार को, गिरा बनायें पथ्य॥

155.

मित्रों अब है काल यह, कागज़ फिर से दो।

प्रगतिशील दीप को, सामूहिक नित रो॥

156.

मालती रूपी नारी, बौद्धिकता का जाल।

शरीर-केंद्रित सोच में, सीमित उसका काल॥

157.

ईर्ष्या-द्वेष में डूबी, छिछला उसका भाव।

नारीवाद बनाय रखा, केवल अपना चाव॥

158.

श्रमिक नारी से दूरी, रखती मुँह बिचकाय।

कहती 'कलूटी गंवार', करुणा कभी न आय॥

159.

साहस, श्रम, करुणा लिए, वन में जो बेटी।

बनती रोटी, पकाए पक्षी, दूध गुनगुना देती॥

160.

कुएँ से लाए पानी, जड़ी-बूटी उपहार।

फिर भी उस पर मालती, करती ताना-प्रहार॥

161.

मेहता करते विरोध पर, चुप है आत्मा-राग।

मालती अपनी जाति की, कैसे छोड़ें त्याग?

162.

सद्गति में बाभन रखा, दुखिया सामने।

मंत्र कथा में भगत के सम्मुख चढ्ढा ठाने॥

163.

गोदान की वन-बाला, आदिवासी वीर।

उसे बना कर पात्र ही, किया हृदय में पीर॥

164.

नारीवाद के नाम पर, चलता छल का खेल।

प्रेमचंद ने खोल दी, हर नकली की बेल॥

165.

जाति-वर्ण की ग्रंथि में, जकड़ा भारत देश।

प्रेमचंद ने खोल दी, यथार्थों की रेश॥

166.

गोदान कथा-प्रवाह में, नाभिक सत्य प्रकट।

हिंद समाज की धुरी में, वर्ण-व्यवस्था घट॥

167.

होरी धनिया श्रम करें, जलते अग्नि समान।

उत्पादक दलित-पिछड़े, पर जीवन है त्राण॥

168.

पंडित, ठाकुर, कायस्थ, पटवारी-संहति।

शोषक हैं, पर माने गए, समाज की गरिमा सृजति॥

169.

रायसाहब स्वराज में, जेल गए सौ बार।

गांव में वही कराएं, बेगार और वार॥

170.

तंखा, ओंकार, मेहता, ऊँची जाति प्रतीक।

गांधी का मुख ओढ़कर, करते रहे रतिक॥

171.

पटेश्वरी बेगार में, सिंचाई करवाय।

बस्ती थर-थर कांपती, सत्ता वही चलाय॥

180.

झिंगुरी का खेत बड़ा, दातादीन पुजारी।

सूदी-जमींदारी की, गठजोड़ें लाचारी॥

181.

सिलिया, भोला, होरिया, धनिया धूप सहें।

श्रम से जग को पालते, पर सुख दूर गहें॥

182.

गोदान कहता यही, वर्ण शृंखला जाल।

जो मेहनत करता सदा, वह क्यों रहे बेहाल?

183.

अनुत्पादक जातियां, करें सदा षड्यंत्र।

ढोंग-पाखंड-पाखरी, उन पर पूरा मंत्र॥

184.

मालती हो या राय हों, वर्ग-जाति के ध्वज।

आजादी के बाद भी, नहीं बदलते बज॥

185.

होरी जैसे जन रहे, झूठे धर्म के चूर्ण।

बैल बिके पर स्वप्न में, देखे गोदान पूर्ण॥

186.

जाति-वर्ग की बुनावट, ‘गोदान’ ने खोली।

आंबेडकरी चेतना, इस कृति में भी डोली॥

187.

‘जाति का विनाश’ ज्यों, विमर्शों की धार।

‘गोदान’ भी बहा रहा, वही यथार्थ विचार॥

188.

बेलारी से सेमरी, ग्राम कथा के धूर।

वर्ण-शोषण गाथिका, रची प्रेम की पूर॥

189.

जन-कवि की यह दृष्टि में, चेतनता की आग।

सत्ता के हर कोर में, जाति की लगी झाग॥

190.

जाति-वर्ग गठजोड़ से, देश बनेगा स्वर्ण?

या फिर दलितों-पिछड़ों, को ही मिलेगा मर्ण?

191.

उपन्यास महाकाव्य है, जब बोले इतिहास।

तब समझो गोदान भी, सत्य गूढ़ प्रकाश॥

192.

गोदान में प्रेमचंद ने, दी वह दृष्टि उदार।

जो न केवल कथा कहे, खोले यथार्थ द्वार॥

193.

प्रेमचंद गुज़रे ज़मां, फिर भी हैं वे साथ।

उनकी लेखनी बनी, समाज-चिंतन बात॥

194.

न थमा समय का प्रवाह, न ही बढ़ा विकास।

उनकी अब भी प्रासंगिकता, देती है उदास॥

195.

काशी-बनारस पास था, गांव लमही ठौर।

वहां न बौद्धिक दृष्टि थी, न परिवर्तन भोर॥

196.

कर्मकांड की धुंध में, था समाज ठिठकाय।

प्रेमचंद ने देखकर, शब्दों में लिख जाय॥

197.

कबीर, तुलसी थे विचार, जिनसे युग था तेज।

प्रेमचंद ने भी रचा, चिंतन का सन्देश॥

198.

ना तो केवल राष्ट्र के, वे वाहक थे भाई।

किसान, दलित, मजदूर ही, उनकी लेखी छाई॥

199.

ना गांधी से ग्रस्त थे, ना ही नेहरू-भीत।

सत्य खोजते वर्ग में, ना करते थे प्रीत॥

200.

न्याय नहीं जो दे सके, वह राष्ट्र कैसा हो।

स्वतंत्रता के हेतु को, वह लिखते बिन मोह॥

201.

बोल्शेविक से मर्म ले, चौरी से उद्वेल।

मन-मन में सामाजिकता, भरते गए प्रेमेल॥

202.

ब्राह्मणवाद, सामंतता, उनके दो थे शत्रु।

उन पर शब्दों के प्रहार, करते प्रेम निष्कपट॥

203.

'ठाकुर का कुआँ' कथा, 'सवा सेर' संवाद।

‘सद्गति’ से फूटता, वर्णशोष का नाद॥

204.

ब्राह्मणों का पाखंड जो, समाज को झुलसाय।

प्रेमचंद ने उस तरह, साहस से दिखलाय॥

205.

कहते थे, न ब्राह्मण वह, जो लूटे विश्वास।

सेवा-त्यागी जो रहे, वह ब्राह्मण इतिहास॥

206.

तुलसी पर भी कह दिया, पढ़ा नहीं जस मान।

आस्था के मोह में, डूबे नहीं श्रीमान॥

207.

छायावाद जब मौन था, राष्ट्रवाद का शोर।

प्रेमचंद तब खोजते, वर्ण-श्रम का छोर॥

208.

कहते थे, बिना समाज बदले न हो आज़ाद।

राजनीति बिन न्याय के, केवल खोखलाद॥

209.

उनका हर संपादकीय, करता दृष्टि उजास।

दलित, गरीब, किसान की, रखता था बात खास॥

210.

आंबेडकर, नेहरू सभी, उनसे थे सम्बंध।

प्रेमचंद के चिंतन में, दृष्टि और विवेक बंध॥

211.

गांधीवाद नहीं उन्हें, पूरी तरह रुचाय।

नेहरूवादी सोच से, कुछ साम्य झलकाय॥

212.

हंस-पत्रिका के स्वर में, बहता न्याय-प्रवाह।

सच की बातें, श्रमजन की, रचते साहित्य-राह॥

213.

प्रेमचंद थे धन्यजन, खाते थे बैंकों में।

203, चार हजार भी, जमा दिखे अंकन में॥

214.

बम्बई से चेक दे, फिराक का ऋण चुकाय।

प्रेस चलाने हेतु भी, वर्मा को धन भिजवाय॥

215.

धन से था संबंध पर, न था दिखावा गर्व।

उनका जीवन लोक में, था सेवा का पर्व॥

216.

शैलेश जैदी ने लिखा, धनी थे श्रीमान।

पर न जानें कौन हैं, जो कहते निर्धन जान॥

217.

लमही गया दो बार मैं, देखा जीर्ण मकान।

टपकी छत, टूटी ज़मीं, बिखरा था सम्मान॥

218.

फिर देखा कुछ वर्ष में, रंगरोगन साफ।

125वीं जयन्ति पर, सरकार ने दिया लाफ़॥

219.

अतिथि भवन सामने, प्रेक्षागृह भी साथ।

बीएचयू और प्रशासन के, जिम्मे उसका बात॥

220.

पर साहित्य नहीं वहाँ, न पुस्तकें उपलब्ध।

प्रेक्षागृह में मौन है, भावनाओं का रंध॥

221.

एक सज्जन प्रेम में, करते सेवा काम।

मानदेय न पास है, फिर भी श्रद्धा थाम॥

222.

आज ज़रूरत इस घड़ी, उठे वही आवाज़।

प्रेमचंद के सोच से, हटे सांप्रदायिक राज॥

223.

हिंदुत्व के प्रतिविम्ब में, हो उनका प्रतिबिम्ब।

उनके शब्द उठायें हम, जैसा उनका निबंध॥

224.

न छेड़ें एजेंडा कभी, जो गोयनका लाय।

पाँचजन्य की चाल में, प्रगतिवादी न जाय॥

225.

प्रेमचंद की दृष्टि में, वर्ग-धर्म थे द्वंद्व।

सत्यनिष्ठता में रहा, लेखन का अनुबंध॥

226.

उनके चिंतन पर रखें, हम आलोचना न्याय।

कृपया न बनें आज हम, एजेंडावादी दाय॥

227.

ग़रीबी को गौरव कहो, अपमानित जनधार।

सपनों से भी दूर है, जनता का संसार॥

228.

प्रेमचंद का जो रहा, वह घर आज महान।

हम जैसे बहुजन लिए, अब भी स्वप्न-स्थान॥

229.

छत पक्की, बैठक बड़ी, आँगन, द्वार, उबाल।

हममें कितनों को मिले, जीवन भर ये हाल?॥

230.

संघर्ष था उनका भी, पर था वर्ग विशेष।

मध्यवर्ग के दुःख से, ना बहुजन का क्लेश॥

231.

क्यों बुनकर के पुत्र को, कहें प्रेम समकक्ष?

जिसने देखा झोंपड़ी, पेट कटे जो पक्ष॥

232.

तथ्य यही, कह दो इसे, ना हो इसमें डर।

प्रेमचंद का कष्ट भी, था सीमित भीतर॥

233.

झोंपड़पट्टी की दशा, उनसे दूर बहुत।

गरीबों के स्वप्न में, न वह द्वार, न छत॥

234.

सम्मान हो लेखनी को, पर हो सत्य उदघाट।

कष्ट, गरीबी, संघर्ष – न हों शब्दों के खेल मात्र॥

235.

प्रेमचंद जयंती समय, चेतकाला-धाम।

हिंदी की संवेदना, संस्कृति का प्रणाम॥

236.

प्रेमचंद पर सोचना, खुद को जाननहार।

हिंदी की सच्चाइयों, से मिलती पुकार॥

237.

उनके रचे साहित्य में, हिंदी का संवाद।

कमियाँ, ताक़तें सभी, मिलतीं हैं आधार॥

238.

हाशिये का व्याख्य है, प्रेमचंद का व्रत।

राष्ट्र बने जब साथ में, दलित, किसान, स्त्रत॥

239.

संवादों को तोड़कर, जब–जब हुआ प्रयास।

भारत की उस चुप गली, ने लिख दिया इतिहास॥

240.

धर्म रहें पर छल नहीं, वैश्विक हो विस्तार।

पर हो सीमित स्वार्थ में, न स्वेच्छाचार॥

241.

हर उपन्यास प्रेम का, जन संघर्ष समेट।

आज लड़ाई चिह्न की, करती जनता रेट॥

242.

धर्म-जाति-प्रांत के, बंटे हुए हैं द्वार।

सच की कोई बात हो, दिखती नहीं पुकार॥

243.

जब तक जनता बाँटती, अपनी शक्ति व्यर्थ।

तब तक झूठ प्रतीकों का, करता जीत अर्थ॥

244.

हामिद, गोबर, मिठुवा, थे आंगन में साथ।

कथा-साहित्य छोड़कर, चल पड़ा किस पथ-राथ?॥

245.

बचपन जैसे खो गया, हिंदी के मैदान।

नई कहानी ढूँढती, बचपन की पहचान॥

246.

बेटी कोई वस्तु है? क्यों हो दान-जुहार?

कन्यादान प्रथा करे, नारी का तिरस्कार॥

247.

पत्नी जब कन्यादान कर, रीति निभा रही।

मूर्तिमान बन प्रेमचंद, मौन वेदना सहीं॥

248.

बेटी अब चुप क्यों रहे, मुखर करे उद्घोष।

स्त्री विमर्श की बात हो, दहेज रहे न दोष॥

249.

प्रेमचंद जयंती बने, नवसंवाद प्रतीक।

हिंदी की चेतावनी, हो अब और समीप॥

250.

हमसे पीछे छूट गए, सब अपने ही लोग।

देख न पाते मुड़ कभी, रिश्तों के संजोग॥

251.

ना कॉलेज की देहरी, ना ही ज्ञान की छांव।

विश्वविद्यालय दूर थे, सपनों से भी दाव॥

252.

प्रोफेसर न बन सके, न ही जज-डीएम।

पत्रकार, ठेकेदार से, उनका क्या परचम॥

253.

मंत्री-संत्री दूर थे, दलाली भी दूर।

कविता की माला न थी, शब्दों की थी भूर॥

254.

रोटी की खातिर सदा, तन-मन देते दांव।

मजदूरी में बदलते, जीवन का हर पांव॥

255.

बाल-बच्चों की खातिर, करते रोज जतन।

छांव न पाए पसीने, फिर भी करें रटन॥

256.

खून पसीना बहे जो, वो ही सुनें गाल।

अबे-तबे की मार में, टूटा उनका भाल॥

257.

हम तो सब में व्यस्त हैं, जीवन में मस्त।

वे सवाल बन रह गए, चुप रहते शरमस्त॥

258.

एक नजर भी फेर लो, उनकी ओर कबीर।

जो हैं भारत की धरा, इंडिया से ही हीन॥

259.

ईद पड़ी है आज फिर, याद 'ईदगाह' आई।

हामिद का चिमटा कहे, व्यथा पुरानी छाई॥

260.

प्रेमचंद का लेख है, मन की भीत सजाय।

जाति-धर्म की भीत से, कथा बहुत ऊपर जाय॥

261.

मेला बिखरे भाव का, चीज़ें चकाचौंध।

हामिद लाया जो घर, उसमें छुपा विरोध॥

262.

खिलौने सब छोड़कर, चिमटा जब वो लाया।

बाज़ारवाद पर चोट की, विवेक दीप जलाया॥

263.

'जरूरी' की बात है, न 'प्रलोभन' का मोह।

हामिद ने दिखला दिया, क्या सही क्या द्रोह॥

264.

अमीना की आंख में, आँसू बनकर प्यार।

चिमटा नहीं वस्तु है, भावों का उपहार॥

265.

त्योहारों के नाम पर, मोल-भाव का दौर।

दिल नहीं बस जेब है, बजता वहीं सौर॥

266.

धर्म हुआ संकीर्ण अब, राजनीति की ढाल।

बाज़ार बन बैठा है, हर उत्सव का काल॥

267.

अक्षय तृतीया आज है, शुभ का यह आधार।

पाँचजन्य की जगह पर, मन का हो उभार॥

268.

पात्र जो था सूर्य से, पांडव को जो प्राप्त।

हृदय मनुज का वैसा ही, अनंत भाव संपात॥

269.

पर्व बने व्यापार अब, खोलो बस बटुआ।

धार पकड़ जो दिल की हो, वही सच्चा जुआ॥

270.

हृदय मनुज का अक्षय है, टूटे लाख प्रयास।

विवेक-वृक्ष सदा हरा, यही मनुज की आस॥

271.

विकास की इस दौड़ में, पीछे जो हैं छूट।

उन पर भी मुस्कान दो, जिनसे जीवन रूट॥

272.

भोला हलवाहा खेत में, जीवन जैसे जोत।

'अलग्योझा' की पीर है, जिसमें करुणा रोत॥

273.

तलसी की सुभागिनी, दलित वेदना धार।

हाकिम की कुत्सित नज़र, उजड़े सपनों सार॥

274.

झूरी काछी भाव से, बैलों संग जुड़ जाय।

'दो बैलों की कथा' में, मानवता उपजाय॥

275.

झींगुर महतो बुद्धिधर, गड़ेरिया बुद्धू साथ।

‘मुक्ति-मार्ग’ में खोजते, श्रमिक जन की बात॥

276.

रामधन अहीर सदा, सेवा में संलग्न।

‘बाबाजी का भोग’ में, ढोंगी धर्म चितंग॥

277.

शंकर कुरमी का हृदय, भूख से न थमता।

‘सवा सेर गेहूँ’ कथा, यथार्थ से जमता॥

278.

सुजान महतो भक्त था, सच्ची श्रद्धा नाथ।

‘सजान भगत’ प्रेम की, बुनता मर्मिल बात॥

279.

‘पंच परमेश्वर’ कहे, अलगू की पहचान।

चौधरी पर न्याय जब, उतरत जाति वितान॥

280.

‘पूस की रात’ मौन है, हल्कू की संज्ञा।

जाति नहीं बतलाई पर, दर्द कहे हर व्यंजना॥

281.

शिवरानी थीं संगिनी, जीवन संग संघर्ष।

प्रेमचंद के साथ में, सृजन रहा उत्कर्ष॥

282.

श्रीपत, अमृत पुत्र थे, लेखन में अनुराग।

कमला जैसी पुत्रियाँ, घर की रहीं सुहाग॥

283.

घर-परिवार समर्पित, साहित्यिक परिवेश।

प्रेमचंद के भाव में, संस्कारों का लेश॥

284.

लहरतारा से उठे, लहमी तक आलोक।

कबिरा गुरु प्रेमचंद के, शब्द बने संजोक॥

285.

कबिरा ज्यों ज्वाला जले, भेद मिटाए जात।

प्रेमचंद ने शब्द से, की जनमन की बात॥

286.

साधु और लेखक जुड़े, भाषा बनी पुलिन।

गुरु शिष्य के रूप में, जल बिन जैसे नील॥

287.

लहरतारा की लहर, पहुँची लहमी द्वार।

साहित्य की नाव में, बहे कबीर विचार॥

288.

जनमन का जो ताप था, दोनों ने ही तापा।

एक तुलसी बोल में, दूजा कथा-कथापा॥

289.

कबिरा बोला सत्य को, प्रेमचंद ने गाढ़ा।

गोलेन्द्र ने वक्त से, जोड़ा जनसंवादा॥

290.

तीन धुरी विचार की, ज्यों दीपक के बाती।

जनमन के अंधियार में, जगी जनों की भाती॥

291.

ध्रुव तारे से मिल गई, कलमों की हर चाल।

कबीर-प्रेमचंद का, सत्य बुनें संजाल॥

292.

कबिरा ज्यों ध्रुव सत्य हैं, प्रेमचंद प्रकाश।

गोलेन्द्र स्वर जनमन का, तीनों एक विकास॥

293.

वाणी में कबिरा बसे, कलम प्रेम की धार।

गोलेन्द्र संकल्प बन, करें विवेक संचार॥

294.

लहरतारा की ज्योति से, लमही में उजास।

खजूरगाँव शब्द बन, बोले जन विश्वास॥

295.

प्रेमचंद की बात में, श्रम का दुख-संवाद,

प्रसाद भाव में झंकृत हुआ, गोलेन्द्र की आवाज।

296.

प्रसाद की कविता थिरकती, मानस-सरोवर-धार,

गोलेन्द्र की लेखनी में, फिर से जागे तार।

297.

प्रेमचंद की लेखनी, बोले जन के बोल,

प्रसाद रचे सपनों सरीखे, गोलेन्द्र की ढोल।

298.

कथा, काव्य और क्रांति के, ये तीनों आधार,

हिंदी भू पर फूल-से, फैले तीनों सार।

299.

मंद हुआ है विवेक पर, बुझा नहीं है दीप।

गोलेन्द्र कहें– नाश हो, जब तक है यह चीप॥

300.

गोलेन्द्र की लेखनी, बोले सधा विचार।

साहित्य की साँझ में, हो उजियारा सार॥

---

संपर्क: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


Monday, 28 July 2025

मैं एक धनुष हूँ : गोलेन्द्र पटेल

 


मैं एक धनुष हूँ

मैं किसी के हाथों में पिनाक कहलाया
तो किसी के हाथों में कोदंड
तो किसी के हाथों में शार्ङ्ग
तो किसी के हाथों में पौलत्स्य
तो किसी के हाथों में गाण्डीव
तो किसी के हाथों में विजय
तो किसी के हाथों में पुष्पक
तो किसी के हाथों में गांधरी
तो किसी के हाथों में वायव्य
मैं एक धनुष हूँ।

—गोलेन्द्र पटेल



कविता: मैं एक धनुष हूँ
कवि: गोलेन्द्र पटेल
---

🌿 सप्रसंग व्याख्या:

यह कविता समकालीन कवि गोलेन्द्र पटेल की एक अत्यंत बोधगम्य और प्रतीकात्मक रचना है, जिसमें ‘धनुष’ को केंद्रबिंदु बनाकर इतिहास, पौराणिकता और मानवीय भूमिका का विश्लेषण किया गया है। इस कविता में कवि ने विभिन्न योद्धाओं और देवताओं के हाथों में आए धनुषों के नाम के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की है कि कोई भी अस्त्र या शक्ति अपने आप में न तो शुभ है न अशुभ — उसका स्वरूप उसके प्रयोगकर्ता के संकल्प, दृष्टिकोण और लक्ष्य से तय होता है।
---

🔱 प्रसंग:

मानव इतिहास और पुराणों में धनुष न केवल युद्ध का उपकरण रहा है, बल्कि न्याय, धर्म, अहंकार, ज्ञान और कर्तव्य का प्रतीक भी बना है। शिव, राम, कृष्ण, रावण, कर्ण, अर्जुन, भीष्म, लक्ष्मण, मेघनाद जैसे महापुरुषों के हाथों में यह धनुष भिन्न-भिन्न नामों से जाना गया। कवि इसी ऐतिहासिक एवं प्रतीकात्मक विविधता को एक सूत्र में बांधता है — "मैं एक धनुष हूँ।"
---

🧠 पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या:

> "मैं किसी के हाथों में पिनाक कहलाया"
— जब मैं शिव के हाथ में था, मेरा नाम पिनाक पड़ा। मैं संहार और समाधि का प्रतीक बना। मेरे द्वारा त्रिपुरासुर का विनाश हुआ।

> "तो किसी के हाथों में कोदंड"
— जब मैं राम के हाथ में था, मैं कोदंड कहलाया। मैं धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का माध्यम बना। राम ने मेरे सहारे अहंकारी रावण को हराया।

> "तो किसी के हाथों में शार्ङ्ग"
— जब मैं विष्णु या कृष्ण के हाथ में था, मैं शार्ङ्ग कहलाया। यह सृष्टि के पालन और संतुलन का प्रतीक बना। कृष्ण ने अधर्म के खिलाफ अर्जुन को इसी भाव से प्रेरित किया।

> "तो किसी के हाथों में पौलत्स्य"
— रावण के हाथ में जब मैं था, मेरा नाम पौलत्स्य पड़ा। मैं शक्ति, अहंकार और भोग के साथ जुड़ा और अंततः विनाश का कारण बना।

> "तो किसी के हाथों में गाण्डीव"
— अर्जुन के हाथ में मैं गाण्डीव था। मैंने धर्मयुद्ध में न्याय की स्थापना के लिए बाण छोड़े। मैं युद्ध में नैतिकता का प्रतीक बना।

> "तो किसी के हाथों में विजय"
— जब मैं कर्ण, परशुराम या शत्रुघ्न के पास गया, तो मैं विजय बना। मैं वीरता, तपस्या और संघर्ष का प्रतिनिधि बना।

> "तो किसी के हाथों में पुष्पक"
— मेघनाद के हाथों में मैं पुष्पक था। यहाँ मैं रावण की संतति में युद्ध कौशल और दिव्यता का उदाहरण बना, किंतु अंततः पराजय का साक्षी भी।

> "तो किसी के हाथों में गांधरी"
— लक्ष्मण के हाथ में मैं गांधरी था। मैं राम की छाया बनकर धर्म की रक्षा के लिए समर्पित रहा।

> "तो किसी के हाथों में वायव्य"
— जब भीष्म पितामह ने मुझे उठाया, तो मैं वायव्य कहलाया। मैं संयम, त्याग और शौर्य का प्रतीक बन गया।

> "मैं एक धनुष हूँ।"
— यह अंतिम पंक्ति आत्मचिंतन है। मैं एक साधन हूँ, जो केवल अपने प्रयोगकर्ता के इरादों और मूल्य-बोध से परिभाषित होता हूँ। न मैं स्वयं शुभ हूँ, न अशुभ — मैं हूँ एक माध्यम, एक साक्षी।

---

🪶 मुख्य संदेश:

शक्ति तटस्थ होती है।

कर्म और संकल्प उसे दिशा देते हैं।

एक ही वस्तु (धनुष) जब-जब भिन्न हाथों में गई, उसका स्वरूप और उद्देश्य बदल गया।

कवि आत्मबिंब की तरह स्वयं को भी 'धनुष' मानता है, यह दर्शाते हुए कि हम सब समाज और समय के हाथों में एक माध्यम हैं।
---

🧭 निष्कर्ष:

यह कविता केवल पौराणिक नामों की सूची नहीं है, बल्कि यह सभ्यता की चेतना, कर्तव्य और नैतिकता पर आधारित गहन आत्मचिंतन है। गोलेन्द्र पटेल की यह रचना मानवता और शक्ति के उपयोग के प्रश्न को अत्यंत संवेदनशीलता से उठाती है।

कविता की यह व्याख्या न केवल साहित्यिक दृष्टि से, बल्कि नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणात्मक है।
---

रेडियो पर पाठ्य रूपांतरण (एक):-

मैं एक धनुष हूँ...

मैं किसी के हाथों में पिनाक कहलाया...
शिव के संहार में मेरे डोर से ब्रह्मांड कांप उठता था...

मैं किसी के हाथों में कोदंड था...
राम के हाथों धर्म की लकीर बन गया...

मैं शार्ङ्ग बना, जब विष्णु ने मुझे थामा...
सृष्टि के संतुलन की एक मौन रेखा बन गया मैं...

मैं पौलत्स्य कहलाया...
जब रावण ने मुझे उठाया — मैं शक्ति का अहंकार बन गया...

मैं गाण्डीव था अर्जुन के हाथों में...
धर्मयुद्ध की नैतिकता का अनमोल साक्ष्य...

मैं विजय बना —
कभी कर्ण के हाथों, कभी परशुराम के,
तो कभी शत्रुघ्न के...
मैं वीरता, क्रोध और तपस्या का मिश्रण था...

मैं पुष्पक बना, जब मेघनाद ने मुझे थामा...
मैं देवास्त्रों की गरिमा और राक्षसी जिद का संगम बन गया...

मैं गांधरी था —
लक्ष्मण के कंधे पर
मर्यादा की दूसरी परछाई...

मैं वायव्य बना भीष्म के करों में...
त्याग, प्रतिज्ञा और अनुशासन की तेज धार...

[थोड़ी देर ठहराव के साथ...]

मैं एक धनुष हूँ...

न मैं शिव हूँ,
न राम...
न रावण...
न अर्जुन...

मैं तो बस एक साधन हूँ...

जिसके हाथ गया...
उसके इरादों का प्रतिबिंब बन गया...

मैं एक धनुष हूँ...

___

रेडियो पर पाठ्य रूपांतरण (दो):-

मैं एक धनुष हूँ...
मैं किसी के हाथों में पिनाक कहलाया...
शिव के संहार में मेरे डोर से ब्रह्मांड कांप उठता था...
मैं किसी के हाथों में कोदंड था...
राम के हाथों धर्म की लकीर बन गया...
मैं शार्ङ्ग बना, जब विष्णु ने मुझे थामा...
सृष्टि के संतुलन की एक मौन रेखा बन गया मैं...
मैं पौलत्स्य कहलाया...
जब रावण ने मुझे उठाया — मैं शक्ति का अहंकार बन गया...
मैं गाण्डीव था अर्जुन के हाथों में...
धर्मयुद्ध की नैतिकता का अनमोल साक्ष्य...
मैं विजय बना — कभी कर्ण के हाथों, कभी परशुराम के, तो कभी शत्रुघ्न के...
मैं वीरता, क्रोध और तपस्या का मिश्रण था...
मैं पुष्पक बना, जब मेघनाद ने मुझे थामा...
मैं देवास्त्रों की गरिमा और राक्षसी जिद का संगम बन गया...
मैं गांधरी था — लक्ष्मण के कंधे पर मर्यादा की दूसरी परछाई...
मैं वायव्य बना भीष्म के करों में...
त्याग, प्रतिज्ञा और अनुशासन की तेज धार...
मैं एक धनुष हूँ...
न मैं शिव हूँ, न राम... न रावण... न अर्जुन...
मैं तो बस एक साधन हूँ...
जिसके हाथ गया...
उसके इरादों का प्रतिबिंब बन गया...
मैं एक धनुष हूँ...


---
विशेष:-

1. शिव के धनुष का नाम है - पिनाक

2. विष्णु के धनुष का नाम है - शार्ङ्ग

3. राम के धनुष का नाम है - कोदंड

4. रावण के धनुष का नाम है - पौलत्स्य

5. कर्ण के धनुष का नाम है - विजय

6. अर्जुन के धनुष का नाम है - गाण्डीव

7. भीष्म पितामह के धनुष का नाम है - वायव्य

8. मेघनाद के धनुष का नाम है - पुष्पक

9. लक्ष्मण के धनुष का नाम है - गांधरी

10. द्रोणाचार्य के धनुष का नाम है - अंगिरस

11. भरत के धनुष का नाम है - पिनाक 

12. शत्रुघ्न के धनुष का नाम है - विजय

13. एकलव्य के धनुष का नाम है - गोलेन्द्र

14. परशुराम के धनुष का नाम है - विजय

15. कृष्ण के धनुष का नाम है - शारंग


नोट: धनुष शोषित वर्ग की सामूहिक शक्ति का प्रतीक है। इस संदर्भार्थ में ‘मैं एक धनुष हूँ’ कविता की दूसरी व्याख्या की जा सकती है।

संपर्क: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...