Wednesday, 10 August 2022

जिज्ञासा : गोलेन्द्र पटेल (poem : curiosity / poet : golendra patel)

 

जिज्ञासा


ओ उदात्त उच्चारण!

पृथ्वी, नदी, गाय व भाषा-साध्वी स्त्री सूचक संज्ञा

स्याह संवेदना के शब्द में डूब रही हैं

उनकी वेदना का विषय विचारणीय उदाहरण है

(शायद समुद्र का पानी मछलियों के रोने से खारा है

समय स्वयं हालात से हारा है)

आँसू के अर्थ को जानने की एक लंबी प्रक्रिया है

अँधेरे के आशिक आसमान में देखो

काल कवलित करुणा की क्रिया है

जहाँ औंधी नाव बादलों की धारा में बह रही है

लेकिन जिज्ञासा का जहाज़ विपरीत दिशा में जा रहा है!


सुबह की सरसराहट में सुलगते सपनों की साँसों के स्वर हैं

धूल के फूल चुप; रूप की धूप एकदम चुप 

सुनो, घुप संबंध के स्तूप पर आत्मा के अक्षर हैं

भूख की भूमि में भय, डर और ख़ौफ़ के जन्म होते रहे हैं

पूरी उम्र मन की मिट्टी में मनुष्यता का बीज बोते रहे हैं

रव के रवि; प्रेम के प्रिय कवि


हे दर्द के दोस्त! देखो! दुख के दर्पण में दुनिया की छवि

हे हवि के अवि! ध्यान से सुनो

आँखों में अँखुआयी बातें बर्फ की बारिश सह लेती हैं

पसीने की बूँदें श्रम के सौंदर्यशास्त्र की सूक्ति कह देती हैं

दोहरी दोहित देह की माँदगी जानती है कि

जिरह जिज्ञासा की जननी है

जिजीविषा जीवटता की 

किन्तु कहावत है कि जैसी करनी वैसी भरनी है!!


©गोलेन्द्र पटेल

कवि : गोलेन्द्र पटेल

संक्षिप्त परिचय :-


नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम/उपाधि : गोलेंद्र ज्ञान , युवा किसान कवि, हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय, काशी में हिंदी का हीरा, आँसू के आशुकवि, आर्द्रता की आँच के कवि, निराशा में निराकरण के कवि, दूसरे धूमिल, अनुप्रासाधिराज एवं दिव्यांगसेवी

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र।


मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर हैं।


संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


■■■★★★■■■


--Golendra Patel

BHU , Varanasi , Uttar Pradesh , India

धन्यवाद!

■■★★■■

https://youtube.com/c/GolendraGyan


https://www.facebook.com/golendrapatelkavi




Tuesday, 2 August 2022

प्रेमचंदनामा (प्रेमचंद का प्रशस्तिगान) : गोलेन्द्र पटेल / प्रेमचंद पर कविताएँ

 

प्रेमचंदनामा : प्रेमचंद का प्रशस्तिगान


 
गोलेन्द्र पटेल के 'प्रेमचंदनामा' से चार कविताएँ :-


1. प्रेम के प्रदीप प्रेमचंद


दुखिया चमार के चेहरे पर

दर्द का दाग है

उसे देखने वाली आँखों में आग है

जहाँ जड़ता की जड़ का फटना

सद्गति की सड़क पर अंतिम यात्रा करना है


संवेदना के श्यामपट पर लिखा है

सामंतवाद मुर्दाबाद!

प्रत्येक पंक्ति में प्रसव की पीड़ा है

कर्ज वह कीड़ा है

जो एक बार काट ले 

तो आदमी की मृत्यु निश्चित है

होरी इस बात का गवाह है


आज जो चरवाह है

वह सत्ता का चारा है

हर हलधर हालात का मारा है

आह! जीवन की रंगभूमि में खड़ा सूर

लाचार बेसहारा बेचारा है

मरजाद की बेड़ी से मुक्त किसान

हल्कू मजदूर

'पूस की रात' से हारा है


महाजनी व वर्णव्यवस्था का मुँह लाल है

जो क्रांतिकारिन धनिया के गाल का कमाल है

मालती व सोफिया प्रेम की ममतामयी मूर्ति हैं

मेहता व विनय की स्फूर्ति हैं

सिलिया वंचना के भीतर वंचना का शिकार है

विधवा झुनिया से गोबर को प्यार है

अपने मर्द द्वारा मार खाती स्त्री को 

उसकी छाती पर चढ़कर 

उसकी मूँछ उखाड़ने का अधिकार है


अब जब न्याय अमीर के लिए भोग है

गरीब के लिए रोग है

तब सब योग सोग है

यह शब्द और अर्थ का कैसा संयोग है!


बुधिया की चीख यह सीख है कि

भूख हर आदमी की मति हर लेती है

आह! घीसू और मावध 

असंवेदनशीलता की आँच में आलू भुनते रहें

शराब के नशे में कबीर के पद चुनते रहें


मुन्नी, गंगी, सोना, रूपा, सरोज, आनंदी, गोविंदी

मनोविज्ञान की दृष्टि से सार्थक पात्र हैं

सिमोन द बोउआर के प्रेमी-पथप्रदर्शक पॉल सा‌र्त्र हैं

(मालती व मेहता के बीच का संबंध

भारतीय व पश्चात संस्कृति की समन्वित गंध है)


'पंच परमेश्वर' के 'रामधन' का मन पढ़ना

असल में न्याय के पक्ष में खड़ा होना है

जाति और धर्म से मनुष्यता का बड़ा होना है


प्रेमचंद कहानी के छंद में प्रेम के प्रदीप हैं

करुणा की कसौटी पर कथा में कथ्य व कला की कीप हैं!

रचना : 31-07-2022


■


2. प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना


प्रिय धनपतराय!

अपनी पीढ़ी की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ

मेरा कवि मुझसे कह रहा है कि

काश कि सभी को पता होता कि

विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश है

पर भयभीत भाषा में यथार्थ का विनाश है!


हे रव के रवि!

क्या कथा में चरित्र की छद्म छवि

उद्देश्य की 'सौत' है?


जब भी देखा

जर्जर वस्त्र में देह का दीपक अधिक देखा

फटे जूते में अनंत 'समर-यात्रा' का पथिक देखा

शायद पिता अजायबराय प्रसिद्ध पोस्टमैन थे

बाल्यकाल में ही दुनिया के लेखकों से परिचित

कलम का सच्चा सिपाही देखा


जब भी सुना

'सूरा' और 'होरी' की तबाही सुना 

'गोबर' और 'धनिया' की गवाही सुना

'बुधिया' की चीख सुना

मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुना


और सुना

'सोजेवतन' में 'बलिदान' का गान 

सार्थक स्वर का स्वाभिमान

'अफसाना कुहन', 'कफ़न' ,'सद्गति', 'सेवादसदन', 'निर्मला' 

'प्रेरणा', 'कायाकल्प', 'सवा सेर गेहूँ', 'प्रेम-पचीसी',

'ईदगाह', 'पंच-परमेश्वर', 'परीक्षा' , 'बालक' , 'नमक का दरोगा', 'प्रेमाश्रम'

'बड़े घर की बेटी', 'दो बैलों की कथा', 'रंगभूमि', 'गोदान', 'गबन' व 'कर्बला'

'आत्माराम'! इनमें भारतीय आत्मा की आवाज़ है

सारे संसार की स्याह संस्कृति का संपूर्ण समाज है


तुम्हारी स्वतंत्रता की चाहत में 

एक अलग तरह का स्वराज है

'सोफिया' से लेकर 'मालती' तक, 'विनय' से लेकर 'मेहता' तक

सभी के बीच 'गोविंदी' के गुणों की चर्चा है

बहुत मिठी मिठाई मर्चा है

कुर्सी पर 'जॉन' की जगह 'जयसिंह' का परचा है

स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि

सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है

और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है

जहाँ विचारोत्कर्ष है सौंदर्य का वास्तविक शृंगार


'सर्वहारा वीर' तो तुम नहीं थे

दिशाहारा तो तुम नहीं थे

राहहारा तो तुम नहीं थे

हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!

थे तुम 'बलिदान-पथ' के चिरंजीवी चिंतक

तुम्हारे सोच की सृजन में शामिल रहे

'गोर्की' और 'लूशुन' के विचार


हे दलित के दीपक! हे गाँव के गायक!

हे नर के नायक!

दोस्त-दुश्मन की पहचान थी तुम्हें खूब

बूढ़ी महाजनी सभ्यता और 

मरजाद की बेड़ियों को काटने की कला

भला कौन नहीं सीखना चाहता है?

तुमने सीखाया क्रांति के पक्ष में खड़ा होना

तुमने सीखाया बुरे वक्त में बुद्धि से बड़ा होना


हे चेतना के चिराग!

तुमने लगाई शोषकों के महल में आग

तुमने गाया सदा रोशनी का राग

तुमने सीधी-साधी बात सीधी-साधी जनता को

सरल-सहज-सरस भाषा में समझाया


हे सत्य के साधक!

परिवर्तन के युद्ध के बुद्ध!

स्नेह, समता, न्याय से प्रतिबद्ध, साहित्य के सूर्य!

ज़िन्दगी की तान के तूर्य!

तुम्हारी कथा की धमनियों में धरती की धुन,

खेतों की ख़ुशबू, विविध फूलों के रंग, नदी की उमंग

और भोर का भक्त नक्त है, संवेदना सशक्त है

शहर का राजनीतिक रक्त है, वाया वक्त है


हे 'शतरंज के खिलाड़ी'!

अँधेरे में मानवता की मणि!

गगन भी गाता है तुम्हारा गौरव गीत, हे मुंशी मीत!

लमही से आ रही है जय की लय

तुम्हारे शब्द दुख की दुपहरी में वृक्ष बन गए

और तुम्हारी प्रोक्ति 'लाल फीता' का बंधन तोड़ने की 'प्रेम-प्रतिज्ञा'

तुमसे हर आदमी आदमी होने का हुनर हासिल करता है


हे 'प्रेम सरोवर' के अरुण कमल!

तुम स्वप्न, संघर्ष व साहस के स्रष्टा हो

तुम भविष्य द्रष्टा हो

तुमने बताया, 'एक गिलास पानी' का महत्व 

____'नवजीवन' का तत्व

चारों ओर दुविधा और दहशत का धुआँ है

'गंगी' के पति 'जोखू' के सामने मौत का कुआँ है

जी हाँ, जो एक 'ठाकुर का कुआँ' है


हे ऋषि-कथाकार प्रेमचंद!

कहानी के अद्वितीय छंद!

संकल्प के अभियान में तब्दील होना

असल में आगामी प्रलय की प्रयोगशाला में पुरखों को बोना है

हवा नहीं है अनुकूल

परिवेश है प्रतिकूल

मैं तुम को बो रहा हूँ कविता की क्यारी में किसान की तरह

तन-मन से बहुत जतन से, साधना के सपूत! 


हे मानस के हंस!

'नवनिधि' के 'मंगल सूत्र'!

नये 'संग्राम' में 'प्रेम की वेदी' पर चढ़ने की शक्ति दो मुझे!

मैं 'कर्मभूमि' में 'पूस की रात' का 'हल्कू' हूँ

'प्रेम-प्रमोद' की गोद में ले लो मुझे

आज 'प्रेम-पंचमी' है परसों नागपंचमी

'प्रेम-तीर्थ' के पथ पर 

मुझ अबोध पाठक की यही प्रार्थना है रोज़

कि हर सुबह हर घर खिले 'सप्तसुमन' व 'सप्त सरोज'!

रचना : 30-07-2022


■

3. यथार्थ के पार्थ प्रेमचंद


हे आकाशधर्मा अध्यापक! शिवरानी के सोहाग!
बहुत दिनों के बाद मिला है यह सौभाग्य
कि मैं लिखूँ काव्य में तुम्हारी रोशनी का राग
जाग! जाग!! महात्याग तू जाग!
अंतःकरण में आग लगी है लेकिन जल रही है लाग
भाग! भाग!! झाग तू भाग!
धारा की विपरीत दिशा में अनवरत
तैरने की कला है तेरे साथ
और हिम्मत के हाथ भी

हे उदात्त कलाकंद!
अवनि की आत्मा की आँख और आकाश का
पसंद---- प्रेमचंद!
तुम महाजनी मानसिकता एवं सामंती सोच के विरुद्ध
युद्ध हो
शांति की क्रांति का बुद्ध हो
जीवन के रंगमंच पर सामाजिक चित्त के चित्रकार हो
सांस्कृतिक टिप्पणीकार हो
भाषा में उदार हो
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के मंत्र हो
असली लोकतंत्र हो
प्रत्येक पाठक की पुतली हो

तुम्हारे सामने कल्पना और विचारधारा क्षुद्र सिद्ध हो चुकी हैं
आलोचना के अस्त्र-शस्त्र हो रहे हैं बेकार
तुम वेदना के वेत्ता व बुद्धि की वृष्टि हो
नवोन्मेषी इतिहास-दृष्टि हो
नवजागरण की सृष्टि हो

अंधेरे में 'आपका चित्र' आलोक है
'ख़ून सफे़द' दूध जैसा आर्यसमाज का श्लोक है
तुम्हारी लय का व्यापक लोक है
तुम प्रगतिशील जिज्ञासा के जहाज़ हो
तिमिर की तान के ताज हो

हे समय के शब्द! सत्य के स्वर!
मानवीय मशाल! स्मृति के बरगद विशाल!
काल-त्रिकाल सब मानते हैं कि तुम्हारी कृति अमर है
क्या ख़ूब किया तुम ने
समोज्ज्वल संवाद का इस्तेमाल!
सर्वप्रथम तुम ने देखा 'मनुष्यता का अकाल'
सत्ता से पूछा सवाल

हे संवेद्य, संवेदन, संवेदना व संवेदनशील के चतुष्टय!
अनुभव, ज्ञान, संकल्प व चेतनाधारी नज़र के नंद
--- प्रेमचंद!
मन की हिलोरें हँस रही हैं मंद-मंद
मैं डूब रहा हूँ तुम्हारे पसीने में जहाँ श्रम की सुगंध है
पहुँच गया हूँ 'कल्पकाया' के भीतर
ओ हो! यहाँ नीति और नीयत के बीच नियति है
मगर मष्तिष्क में मौजूद मति है

हे प्रयत्न के रत्न! यथार्थ के पार्थ!
तुम वैश्विक विश्वास हो
आधुनिक भारत का महाभारत लिखने वाले व्यास हो
सच कहूँ तो तुम एक अतृप्त प्यास हो
परम अभिव्यक्ति आलोकित आत्मा-सम्भवा हो
प्रत्येक पुनरुक्ति में पुनर्नवा हो

मैं चाहता हूँ____
तुम मुझे सृजन के 'संग्राम' में दाँव-पेंच सीखाओ!
मैं चाहता हूँ____
मैं तुम्हारे सम्मुख 'प्रेम प्रतिज्ञा' लूँ
कि अब 'नवजीवन' की 'कर्मभूमि' में श्रमरत रहूँगा!!

रचना : 01-08-2022


■

4. ॐ प्रेमचंदाय नमः


हे कहानी के प्रतिमान! हल के फाल!

लमही के छत्रसाल! युग ख़याल!

स्वप्नों की शीतल सहानुभूति के समस्वर, समताल!

मुझे दिख रहा है

रूप, रस, गंध व स्पर्श का फटाहाल

देश का दर्दनाक दृश्य

मैंने किया जाँच-पड़ताल

और पाया____ चमकती चाल


मेरा कवि मेरे पाठक पथिक से कह रहा है

यदि तुम मुझे सिक्का समझकर

ऊपर उछालोगे

तो एक तरफ निराला और

दूसरी तरफ प्रेमचंद

तुम्हें नज़र आयेंगे

लेकिन शर्त है कि शब्द नाचता हुआ

धरती पर खड़ा हो जाए

और अर्थ की आकृति आकाश में बन जाए

एक आवाज़___ भई! उठा दो कंधे पर जीवन का जुआ


अरे! अरे! निहाल

क्यों? निकाल रहे हो बाल के खाल

देखो! आ गया

आत्मा के शिल्पी 'अमृतराय' का ननिहाल

जरा रूको! ठहरो!

सामने देखो, ताल ही ताल

इधर देखो, हल्कू का खेत चर रही है नीलगाय

साथी, उधर होरी का ऊख उखाड़ रहा है हाथी


यह घास, फूस व बाँस का छाता-मचान

इसी पर पूस और माघ की रात में सोता है किसान

पास मेंड़ पर कोई दुखिया छील रहा है घास

मेरे साथ पगडंडियों पर यात्रा कर रहा है 

विश्व का श्वास यानी प्रेमचंदी विश्वास


मानो फ़सलें आपस में अठखेलियाँ कर रही हैं

गोधूलि में लौटते हुए चौपाये चोन्हरा रहे हैं

पतलो की आड़ में आनंदक्रीड़ा की आवाज़ उठ रही है

खैर, पैर अपने पथ को छोड़ना नहीं चाहते हैं

वे अरहर के बीच से नाप रहे हैं जाड़ा में डाड़ा

उन्हें पहुँचना है उस टीले पर जहाँ पहचान का पदचिह्न है

असल में वह प्रेमचंद की आत्मा का आवास है

मैंने सुना है कि जाति में जयंती की ज्योति ख़ास है

लेकिन कलम के मजदूर तो कलाकार हैं

उनकी जाति एक है और वह है मनुष्यता


हे वैश्विक विचार! अपूर्व कल्पकथाकार!

तुम्हारी प्रत्येक पंक्ति में बहुत दुखी इड़ा है

संभाव्य नाव्य की वाणी में महाकाव्य की पीड़ा है

तुम बहो मेरी रचना की धमनियों में, पर

मेरी कविता की सरिता में सविता की तरह

तुम रहो मेरे हृदय में पथप्रदर्शक पिता की तरह


मानवता का आवाहन 'मंत्र' है ॐ प्रेमचंदाय नमः

जिसे मैं मन से उच्चारण कर रहा हूँ बार-बार

भूख के भवसागर में पीड़ा की पतवार

भाषा खे रही है लगातार

आशा है मैं जल्द पहुँच जाऊँगा 

अरहर के उस पार!!

रचना : 02-08-2022


कवि : गोलेन्द्र पटेल

संक्षिप्त परिचय :-


नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम/उपाधि : गोलेंद्र ज्ञान , युवा किसान कवि, हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय, काशी में हिंदी का हीरा, आँसू के आशुकवि, आर्द्रता की आँच के कवि, निराशा में निराकरण के कवि, दूसरे धूमिल, अनुप्रासाधिराज एवं दिव्यांगसेवी

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र।


मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर हैं।


संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


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--Golendra Patel

BHU , Varanasi , Uttar Pradesh , India

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Saturday, 30 July 2022

प्रेमचंदनामा : गोलेन्द्र पटेल / प्रेमचंद पर कविताएँ / कथा सम्राट प्रेमचंद की 142 वीं जयंती पर स्मृति की कृति


 
प्रेमचंदनामा : गोलेन्द्र पटेल

1. प्रेम के प्रदीप प्रेमचंद


दुखिया चमार के चेहरे पर

दर्द का दाग है

उसे देखने वाली आँखों में आग है

जहाँ जड़ता की जड़ का फटना

सद्गति की सड़क पर अंतिम यात्रा करना है


संवेदना के श्यामपट पर लिखा है

सामंतवाद मुर्दाबाद!

प्रत्येक पंक्ति में प्रसव की पीड़ा है

कर्ज वह कीड़ा है

जो एक बार काट ले 

तो आदमी की मृत्यु निश्चित है

होरी इस बात का गवाह है


आज जो चरवाह है

वह सत्ता का चारा है

हर हलधर हालात का मारा है

आह! जीवन की रंगभूमि में खड़ा सूर

लाचार बेसहारा बेचारा है

मरजाद की बेड़ी से मुक्त किसान

हल्कू मजदूर

'पूस की रात' से हारा है


महाजनी व वर्णव्यवस्था का मुँह लाल है

जो क्रांतिकारिन धनिया के गाल का कमाल है

मालती व सोफिया प्रेम की ममतामयी मूर्ति हैं

मेहता व विनय की स्फूर्ति हैं

सिलिया वंचना के भीतर वंचना का शिकार है

विधवा झुनिया से गोबर को प्यार है

अपने मर्द द्वारा मार खाती स्त्री को 

उसकी छाती पर चढ़कर 

उसकी मूँछ उखाड़ने का अधिकार है


अब जब न्याय अमीर के लिए भोग है

गरीब के लिए रोग है

तब सब योग सोग है

यह शब्द और अर्थ का कैसा संयोग है!


बुधिया की चीख यह सीख है कि

भूख हर आदमी की मति हर लेती है

आह! घीसू और मावध 

असंवेदनशीलता की आँच में आलू भुनते रहें

शराब के नशे में कबीर के पद चुनते रहें


मुन्नी, गंगी, सोना, रूपा, सरोज, आनंदी, गोविंदी

मनोविज्ञान की दृष्टि से सार्थक पात्र हैं

सिमोन द बोउआर के प्रेमी-पथप्रदर्शक पॉल सा‌र्त्र हैं

(मालती व मेहता के बीच का संबंध

भारतीय व पश्चात संस्कृति की समन्वित गंध है)


'पंच परमेश्वर' के 'रामधन' का मन पढ़ना

असल में न्याय के पक्ष में खड़ा होना है

जाति और धर्म से मनुष्यता का बड़ा होना है


प्रेमचंद कहानी के छंद में प्रेम के प्रदीप हैं

करुणा की कसौटी पर कथा में कथ्य व कला की कीप हैं!


(©गोलेन्द्र पटेल

31-07-2022)

■


2. प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना


प्रिय धनपतराय!

अपनी पीढ़ी की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ

मेरा कवि मुझसे कह रहा है कि

काश कि सभी को पता होता कि

विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश है

पर भयभीत भाषा में यथार्थ का विनाश है!


हे रव के रवि!

क्या कथा में चरित्र की छद्म छवि

उद्देश्य की 'सौत' है?


जब भी देखा

जर्जर वस्त्र में देह का दीपक अधिक देखा

फटे जूते में अनंत 'समर-यात्रा' का पथिक देखा

शायद पिता अजायबराय प्रसिद्ध पोस्टमैन थे

बाल्यकाल में ही दुनिया के लेखकों से परिचित

कलम का सच्चा सिपाही देखा


जब भी सुना

'सूरा' और 'होरी' की तबाही सुना 

'गोबर' और 'धनिया' की गवाही सुना

'बुधिया' की चीख सुना

मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुना


और सुना

'सोजेवतन' में 'बलिदान' का गान 

सार्थक स्वर का स्वाभिमान

'अफसाना कुहन', 'कफ़न' ,'सद्गति', 'सेवादसदन', 'निर्मला' 

'प्रेरणा', 'कायाकल्प', 'सवा सेर गेहूँ', 'प्रेम-पचीसी',

'ईदगाह', 'पंच-परमेश्वर', 'परीक्षा' , 'बालक' , 'नमक का दरोगा', 'प्रेमाश्रम'

'बड़े घर की बेटी', 'दो बैलों की कथा', 'रंगभूमि', 'गोदान', 'गबन' व 'कर्बला'

'आत्माराम'! इनमें भारतीय आत्मा की आवाज़ है

सारे संसार की स्याह संस्कृति का संपूर्ण समाज है


तुम्हारी स्वतंत्रता की चाहत में 

एक अलग तरह का स्वराज है

'सोफिया' से लेकर 'मालती' तक, 'विनय' से लेकर 'मेहता' तक

सभी के बीच 'गोविंदी' के गुणों की चर्चा है

बहुत मिठी मिठाई मर्चा है

कुर्सी पर 'जॉन' की जगह 'जयसिंह' का परचा है

स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि

सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है

और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है

जहाँ विचारोत्कर्ष है सौंदर्य का वास्तविक शृंगार


'सर्वहारा वीर' तो तुम नहीं थे

दिशाहारा तो तुम नहीं थे

राहहारा तो तुम नहीं थे

हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!

थे तुम 'बलिदान-पथ' के चिरंजीवी चिंतक

तुम्हारे सोच की सृजन में शामिल रहे

'गोर्की' और 'लूशुन' के विचार


हे दलित के दीपक! हे गाँव के गायक!

हे नर के नायक!

दोस्त-दुश्मन की पहचान थी तुम्हें खूब

बूढ़ी महाजनी सभ्यता और 

मरजाद की बेड़ियों को काटने की कला

भला कौन नहीं सीखना चाहता है?

तुमने सीखाया क्रांति के पक्ष में खड़ा होना

तुमने सीखाया बुरे वक्त में बुद्धि से बड़ा होना


हे चेतना के चिराग!

तुमने लगाई शोषकों के महल में आग

तुमने गाया सदा रोशनी का राग

तुमने सीधी-साधी बात सीधी-साधी जनता को

सरल-सहज-सरस भाषा में समझाया


हे सत्य के साधक!

परिवर्तन के युद्ध के बुद्ध!

स्नेह, समता, न्याय से प्रतिबद्ध, साहित्य के सूर्य!

ज़िन्दगी की तान के तूर्य!

तुम्हारी कथा की धमनियों में धरती की धुन,

खेतों की ख़ुशबू, विविध फूलों के रंग, नदी की उमंग

और भोर का भक्त नक्त है, संवेदना सशक्त है

शहर का राजनीतिक रक्त है, वाया वक्त है


हे 'शतरंज के खिलाड़ी'!

अँधेरे में मानवता की मणि!

गगन भी गाता है तुम्हारा गौरव गीत, हे मुंशी मीत!

लमही से आ रही है जय की लय

तुम्हारे शब्द दुख की दुपहरी में वृक्ष बन गए

और तुम्हारी प्रोक्ति 'लाल फीता' का बंधन तोड़ने की 'प्रेम-प्रतिज्ञा'

तुमसे हर आदमी आदमी होने का हुनर हासिल करता है


हे 'प्रेम सरोवर' के अरुण कमल!

तुम स्वप्न, संघर्ष व साहस के स्रष्टा हो

तुम भविष्य द्रष्टा हो

तुमने बताया, 'एक गिलास पानी' का महत्व 

____'नवजीवन' का तत्व

चारों ओर दुविधा और दहशत का धुआँ है

'गंगी' के पति 'जोखू' के सामने मौत का कुआँ है

जी हाँ, जो एक 'ठाकुर का कुआँ' है


हे ऋषि-कथाकार प्रेमचंद!

कहानी के अद्वितीय छंद!

संकल्प के अभियान में तब्दील होना

असल में आगामी प्रलय की प्रयोगशाला में पुरखों को बोना है

हवा नहीं है अनुकूल

परिवेश है प्रतिकूल

मैं तुम को बो रहा हूँ कविता की क्यारी में किसान की तरह

तन-मन से बहुत जतन से, साधना के सपूत! 


हे मानस के हंस!

'नवनिधि' के 'मंगल सूत्र'!

नये 'संग्राम' में 'प्रेम की वेदी' पर चढ़ने की शक्ति दो मुझे!

मैं 'कर्मभूमि' में 'पूस की रात' का 'हल्कू' हूँ

'प्रेम-प्रमोद' की गोद में ले लो मुझे

आज 'प्रेम-पंचमी' है परसों नागपंचमी

'प्रेम-तीर्थ' के पथ पर 

मुझ अबोध पाठक की यही प्रार्थना है रोज़

कि हर सुबह हर घर खिले 'सप्तसुमन' व 'सप्त सरोज'!


(©गोलेन्द्र पटेल

30-07-2022)

■

3. यथार्थ के पार्थ प्रेमचंद


हे आकाशधर्मा अध्यापक! शिवरानी के सोहाग!
बहुत दिनों के बाद मिला है यह सौभाग्य
कि मैं लिखूँ काव्य में तुम्हारी रोशनी का राग
जाग! जाग!! महात्याग तू जाग!
अंतःकरण में आग लगी है लेकिन जल रही है लाग
भाग! भाग!! झाग तू भाग!
धारा की विपरीत दिशा में अनवरत
तैरने की कला है तेरे साथ
और हिम्मत के हाथ भी

हे उदात्त कलाकंद!
अवनि की आत्मा की आँख और आकाश का
पसंद---- प्रेमचंद!
तुम महाजनी मानसिकता एवं सामंती सोच के विरुद्ध
युद्ध हो
शांति की क्रांति का बुद्ध हो
जीवन के रंगमंच पर सामाजिक चित्त के चित्रकार हो
सांस्कृतिक टिप्पणीकार हो
भाषा में उदार हो
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के मंत्र हो
असली लोकतंत्र हो
प्रत्येक पाठक की पुतली हो

तुम्हारे सामने कल्पना और विचारधारा क्षुद्र सिद्ध हो चुकी हैं
आलोचना के अस्त्र-शस्त्र हो रहे हैं बेकार
तुम वेदना के वेत्ता व बुद्धि की वृष्टि हो
नवोन्मेषी इतिहास-दृष्टि हो
नवजागरण की सृष्टि हो

अंधेरे में 'आपका चित्र' आलोक है
'ख़ून सफे़द' दूध जैसा आर्यसमाज का श्लोक है
तुम्हारी लय का व्यापक लोक है
तुम प्रगतिशील जिज्ञासा के जहाज़ हो
तिमिर की तान के ताज हो

हे समय के शब्द! सत्य के स्वर!
मानवीय मशाल! स्मृति के बरगद विशाल!
काल-त्रिकाल सब मानते हैं कि तुम्हारी कृति अमर है
क्या ख़ूब किया तुम ने
समोज्ज्वल संवाद का इस्तेमाल!
सर्वप्रथम तुम ने देखा 'मनुष्यता का अकाल'
सत्ता से पूछा सवाल

हे संवेद्य, संवेदन, संवेदना व संवेदनशील के चतुष्टय!
अनुभव, ज्ञान, संकल्प व चेतनाधारी नज़र के नंद
--- प्रेमचंद!
मन की हिलोरें हँस रही हैं मंद-मंद
मैं डूब रहा हूँ तुम्हारे पसीने में जहाँ श्रम की सुगंध है
पहुँच गया हूँ 'कल्पकाया' के भीतर
ओ हो! यहाँ नीति और नीयत के बीच नियति है
मगर मष्तिष्क में मौजूद मति है

हे प्रयत्न के रत्न! यथार्थ के पार्थ!
तुम वैश्विक विश्वास हो
आधुनिक भारत का महाभारत लिखने वाले व्यास हो
सच कहूँ तो तुम एक अतृप्त प्यास हो
परम अभिव्यक्ति आलोकित आत्मा-सम्भवा हो
प्रत्येक पुनरुक्ति में पुनर्नवा हो

मैं चाहता हूँ____
तुम मुझे सृजन के 'संग्राम' में दाँव-पेंच सीखाओ!
मैं चाहता हूँ____
मैं तुम्हारे सम्मुख 'प्रेम प्रतिज्ञा' लूँ
कि अब 'नवजीवन' की 'कर्मभूमि' में श्रमरत रहूँगा!!

(©गोलेन्द्र पटेल
01-08-2022)



कवि : गोलेन्द्र पटेल

🙏संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


Friday, 29 July 2022

प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना : गोलेन्द्र पटेल / प्रेमचंद पर कविता


 *प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना*

प्रिय धनपतराय!
अपनी पीढ़ी की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ
मेरा कवि मुझसे कह रहा है कि
काश कि सभी को पता होता कि
विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश है
पर भयभीत भाषा में यथार्थ का विनाश है!

हे रव के रवि!
क्या कथा में चरित्र की छद्म छवि
उद्देश्य की 'सौत' है?

जब भी देखा
जर्जर वस्त्र में देह का दीपक अधिक देखा
फटे जूते में अनंत 'समर-यात्रा' का पथिक देखा
शायद पिता अजायबराय प्रसिद्ध पोस्टमैन थे
बाल्यकाल में ही दुनिया के लेखकों से परिचित
कलम का सच्चा सिपाही देखा

जब भी सुना
'सूरा' और 'होरी' की तबाही सुना 
'गोबर' और 'धनिया' की गवाही सुना
'बुधिया' की चीख सुना
मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुना

और सुना
'सोजेवतन' में 'बलिदान' का गान 
सार्थक स्वर का स्वाभिमान
'अफसाना कुहन', 'कफ़न' ,'सद्गति', 'सेवादसदन', 'निर्मला' 
'प्रेरणा', 'कायाकल्प', 'सवा सेर गेहूँ', 'प्रेम-पचीसी',
'ईदगाह', 'पंच-परमेश्वर', 'परीक्षा' , 'बालक' , 'नमक का दरोगा', 'प्रेमाश्रम'
'बड़े घर की बेटी', 'दो बैलों की कथा', 'रंगभूमि', 'गोदान', 'गबन' व 'कर्बला'
'आत्माराम'! इनमें भारतीय आत्मा की आवाज़ है
सारे संसार की स्याह संस्कृति का संपूर्ण समाज है

तुम्हारी स्वतंत्रता की चाहत में 
एक अलग तरह का स्वराज है
'सोफिया' से लेकर 'मालती' तक, 'विनय' से लेकर 'मेहता' तक
सभी के बीच 'गोविंदी' के गुणों की चर्चा है
बहुत मिठी मिठाई मर्चा है
कुर्सी पर 'जॉन' की जगह 'जयसिंह' का परचा है
स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि
सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है
और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है
जहाँ विचारोत्कर्ष है सौंदर्य का वास्तविक शृंगार

'सर्वहारा वीर' तो तुम नहीं थे
दिशाहारा तो तुम नहीं थे
राहहारा तो तुम नहीं थे
हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!
थे तुम 'बलिदान-पथ' के चिरंजीवी चिंतक
तुम्हारे सोच की सृजन में शामिल रहे
'गोर्की' और 'लूशुन' के विचार

हे दलित के दीपक! हे गाँव के गायक!
हे नर के नायक!
दोस्त-दुश्मन की पहचान थी तुम्हें खूब
बूढ़ी महाजनी सभ्यता और 
मरजाद की बेड़ियों को काटने की कला
भला कौन नहीं सीखना चाहता है?
तुमने सीखाया क्रांति के पक्ष में खड़ा होना
तुमने सीखाया बुरे वक्त में बुद्धि से बड़ा होना

हे चेतना के चिराग!
तुमने लगाई शोषकों के महल में आग
तुमने गाया सदा रोशनी का राग
तुमने सीधी-साधी बात सीधी-साधी जनता को
सरल-सहज-सरस भाषा में समझाया

हे सत्य के साधक!
परिवर्तन के युद्ध के बुद्ध!
स्नेह, समता, न्याय से प्रतिबद्ध, साहित्य के सूर्य!
ज़िन्दगी की तान के तूर्य!
तुम्हारी कथा की धमनियों में धरती की धुन,
खेतों की ख़ुशबू, विविध फूलों के रंग, नदी की उमंग
और भोर का भक्त नक्त है, संवेदना सशक्त है
शहर का राजनीतिक रक्त है, वाया वक्त है

हे 'शतरंज के खिलाड़ी'!
अँधेरे में मानवता की मणि!
गगन भी गाता है तुम्हारा गौरव गीत, हे मुंशी मीत!
लमही से आ रही है जय की लय
तुम्हारे शब्द दुख की दुपहरी में वृक्ष बन गए
और तुम्हारी प्रोक्ति 'लाल फीता' का बंधन तोड़ने की 'प्रेम-प्रतिज्ञा'
तुमसे हर आदमी आदमी होने का हुनर हासिल करता है

हे 'प्रेम सरोवर' के अरुण कमल!
तुम स्वप्न, संघर्ष व साहस के स्रष्टा हो
तुम भविष्य द्रष्टा हो
तुमने बताया, 'एक गिलास पानी' का महत्व 
____'नवजीवन' का तत्व
चारों ओर दुविधा और दहशत का धुआँ है
'गंगी' के पति 'जोखू' के सामने मौत का कुआँ है
जी हाँ, जो एक 'ठाकुर का कुआँ' है

हे ऋषि-कथाकार प्रेमचंद!
कहानी के अद्वितीय छंद!
संकल्प के अभियान में तब्दील होना
असल में आगामी प्रलय की प्रयोगशाला में पुरखों को बोना है
हवा नहीं है अनुकूल
परिवेश है प्रतिकूल
मैं तुम को बो रहा हूँ कविता की क्यारी में किसान की तरह
तन-मन से बहुत जतन से, साधना के सपूत! 

हे मानस के हंस!
'नवनिधि' के 'मंगल सूत्र'!
नये 'संग्राम' में 'प्रेम की वेदी' पर चढ़ने की शक्ति दो मुझे!
मैं 'कर्मभूमि' में 'पूस की रात' का 'हल्कू' हूँ
'प्रेम-प्रमोद' की गोद में ले लो मुझे
आज 'प्रेम-पंचमी' है परसों नागपंचमी
'प्रेम-तीर्थ' के पथ पर 
मुझ अबोध पाठक की यही प्रार्थना है रोज़
कि हर सुबह हर घर खिले 'सप्तसुमन' व 'सप्त सरोज'!

(©गोलेन्द्र पटेल
30-07-2022)

नाम : गोलेन्द्र पटेल
🙏संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com




Monday, 18 July 2022

कुर्मी समाज : एकता की राह—श्रेष्ठता-बोध से समता-बोध तक || जागो कुर्मियों, जागो! || गोलेंद्र पटेल

कुर्मी समाज : एकता की राह—श्रेष्ठता-बोध से समता-बोध तक

कुर्मी समाज की सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान अत्यंत विस्तृत और विविध है, जिसमें अलग-अलग प्रदेशों, भाषाई परंपराओं, ऐतिहासिक परिस्थितियों तथा स्थानीय सामाजिक संरचनाओं के कारण अनेक जाति-सूचक नाम, उपनाम, शाखाएँ, उपाधियाँ और क्षेत्रीय संबोधन प्रचलित दिखाई देते हैं। कुर्मी, कुनबी/कुणबी/कणबी, कुलमी/कुल्मी, कुम्भी, कूर्म, कूर्मवंशी, कुडुम्बी, कुडुम्बर, कुडुम्बि, कुटुम्बी, कुंबी, कुम्बि, कुरु, कुरुम, कुरुम्बा, कुरुम्बि, कुरुमनायक, कुलुम्बि, कापू, कम्मा, वेलमा, रेड्डी, नायडू, वोक्कालिगा/वक्कलिगार, गौड़ा/गौर, खंडायत, कुडुमी, पटेल, पाटीदार, लेवा पाटीदार, कड़वा, पाटील, पवार, मराठा/मराठे, कुनबी-मराठा, भोंसले, गायकवाड़, शिंदे/सिंधिया, होल्कर, चव्हाण, मोरे, सावंत, देशमुख, देसाई, वानखेड़े, वाघेला, बघेल, चौहान, चंदेल, चंद्रवंशी, चंद्राकर/चंद्रराकर, चंद्रौल, चंद्रनाहू, राठौर, परिहार, बैस/बैसवार, जैसवार/जयसवार, बंसवार, बारवार, समसवार, सैंथवार, सिंगरौर/सिंगरौल, गंगवार, गंगापारी, सचान, कटियार, कन्नौजिया/कनौजिया, अवधिया, पटनवार, पतरिहा/पतरिया, पुरबिया, चनऊ/चनउ, कोचैसा/कुचैसा, घमैला/घमालिए, मनवा/मनवार, महतो/मेहतो, धाकड़, उमराव, वर्मा, चौधरी, राय, राव, रावत, राजवाड़े, मल्ल, मुराव, लोधा-कुर्मी, महालोधी, धानुक, गंगौता, कोलीय, शाक्य, मौर्य, कश्यप, सिंह, निरंजन, राघव, यदुवंशी, जादौन/जादौनवंशी, लिच्छबी, गहोई, महापात्रा, महेसरी, उत्तम, गबेल/गवेल, खुरासिया/खुरसिया, खाटी, कौसिक, आर्य, कुरुसेन्य, केराती, ब्रजवासी, कच्छवार, कछार, कछवाहा, ठाकुरिया, मल्लीथारू, जिचकर, जोशवर, कांत, कोप्पिकर, मेने, मोहंती, तिहाड़, सनाड्य, सनोडिया, अथरिया, सरेठी, पटोले, पांनड़ी, कुसमरिया, मलैया, चोल, उसरेठा/उसरठा, खरबिंद, अजुदया, कटवार, रारह, चांदपुरिया, अकरेठिया, औधार, बाछर/बाछिल, बेहमनिया, बर्धिहा/बर्दिया, बरगेयान, बाथवा, भंडारी, भुकारसी, भुर/भर, भरती, बिरतिया, बोट/बोटा/भोट, घोई, गोइट, गोंडाल, हार्दिया/हार्दिहा, हरदबारी/हरदवरिया, जरूहार, जामैया, झुरा, कारजवा, खापरिबंध, लकारिया, लोहट, मेवार, पत्थारिहा, सहजन, सकरवार, समाना, संसोयल, संकट/संकटा, संखवार, संधाउवा, सिम्मल, सिरकीबंद, तरमला, तोगड़िया और घुड़चढ़े आदि नाम विभिन्न सूचियों तथा क्षेत्रीय संदर्भों में मिलते हैं। इनमें से कुछ नाम व्यापक जातीय पहचान को व्यक्त करते हैं, कुछ क्षेत्रीय या भाषाई पहचान हैं, कुछ पारिवारिक उपनाम अथवा सामाजिक उपाधियाँ हैं और कुछ ऐसे नाम भी हैं जो अन्य समुदायों में समान रूप से प्रचलित हैं; इसलिए केवल उपनाम के आधार पर किसी व्यक्ति की जातीय पहचान निर्धारित करना उचित नहीं है तथा उपर्युक्त सभी नामों को स्वतः कुर्मी समाज की स्वतंत्र और सर्वमान्य उपजातियाँ मानना भी ऐतिहासिक दृष्टि से सावधानी की अपेक्षा रखता है। इसी प्रकार ‘कुर्मी (खत्तिय) वंश की 1488 उपशाखाओं’ का उल्लेख ‘Castes and Tribes’ जैसे स्रोतों के संदर्भ में किया जाता है, किंतु इस संख्या की प्रामाणिकता के लिए मूल ग्रंथ, संस्करण, खंड और संबंधित पृष्ठ का सत्यापन आवश्यक है। वस्तुतः इतनी व्यापक नाम-विविधता कुर्मी समाज के लंबे सामाजिक इतिहास, क्षेत्रीय विस्तार और आंतरिक विभाजन की जटिलता को सामने रखती है; अनेक स्थानों पर अलग-अलग उपजातीय और क्षेत्रीय समूह अपनी विशिष्ट पहचान को प्राथमिकता देते हैं तथा कभी-कभी उनमें पारस्परिक श्रेष्ठता-बोध भी दिखाई देता है, जिसके कारण व्यापक सामुदायिक एकता और संगठन का निर्माण कठिन होता है। समस्या केवल उपनामों की अधिकता नहीं, बल्कि उन नामों को लेकर विकसित होने वाला ऊँच-नीच, श्रेष्ठता और अलगाव का भाव है; जब कोई उपसमूह स्वयं को दूसरे से अधिक श्रेष्ठ समझता है, तब साझा सामाजिक पहचान कमजोर होती है और समाज संगठनात्मक रूप से बिखरा हुआ दिखाई देता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि उपनामों और उपशाखाओं को विभाजन का आधार बनाने के बजाय उन्हें ऐतिहासिक एवं क्षेत्रीय विविधता के रूप में स्वीकार किया जाए तथा समानता, शिक्षा, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारस्परिक सम्मान को व्यापक एकता का आधार बनाया जाए। कुर्मी समाज अपने गौरवशाली पुरखों और महापुरुषों—राष्ट्रसंत तुकाराम महाराज, छत्रपति वीर शिवाजी महाराज, राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज, भारतरत्न लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और महामना रामस्वरूप वर्मा—के जीवन, विचारों, संघर्षों और सामाजिक सरोकारों को केवल जातीय गौरव के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि समानता, स्वाभिमान, शिक्षा, सामाजिक न्याय और मानव-मुक्ति के प्रेरक स्रोत के रूप में आत्मसात करे। यदि समाज इन साझा मूल्यों को अपनी सामूहिक चेतना का आधार बनाता है, तो उपजातीय श्रेष्ठता-बोध से ऊपर उठकर समता-बोध विकसित किया जा सकता है और बिखरी हुई सामाजिक पहचान को संगठित, शिक्षित तथा प्रगतिशील सामुदायिक शक्ति में बदला जा सकता है। इस दृष्टि से कुर्मी समाज की वास्तविक एकता उपनामों की समानता में नहीं, बल्कि समान सम्मान, समान अवसर, साझा हित, सामाजिक न्याय और समतामूलक चेतना में निहित है।

कुर्मी समाज की एकता केवल जातीय पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, समान हित, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अधिक टिकाऊ बन सकती है। इसके लिए कुछ ठोस कदम महत्वपूर्ण हैं:

  1. साझी पहचान विकसित हो — अलग-अलग उपजातियों, शाखाओं और क्षेत्रीय उपनामों को लेकर श्रेष्ठता-बोध छोड़कर “हम सब एक व्यापक कुर्मी समाज का हिस्सा हैं” की भावना विकसित हो।

  2. उपनाम और उपशाखा को श्रेष्ठता का आधार न बनाया जाए — पटेल, कुनबी, सचान, कटियार, गंगवार, सैंथवार आदि नामों को लेकर आपसी ऊँच-नीच के बजाय उनके ऐतिहासिक और क्षेत्रीय संदर्भों को समझा जाए।

  3. महापुरुषों को साझा विरासत माना जाए — राष्ट्रसंत तुकाराम, छत्रपति वीर शिवाजी महाराज, राजर्षि शाहूजी महाराज, सरदार वल्लभभाई पटेल, महामना रामस्वरूप वर्मा, सोनेलाल पटेल और नीतीश कुमार जैसे व्यक्तित्वों को किसी एक उपसमूह की संपत्ति न मानकर उनके सामाजिक विचारों, संघर्षों और योगदान को व्यापक रूप से पढ़ा जाए।

  4. संगठन जाति-विरोधी नहीं, भेदभाव-विरोधी हो — समाज के भीतर उपजातीय भेदभाव, ऊँच-नीच और आपसी श्रेष्ठता की मानसिकता को समाप्त करना एकता की पहली शर्त हो।

  5. शिक्षा को केंद्रीय आधार बनाया जाए — विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, प्रतियोगी परीक्षा मार्गदर्शन, डिजिटल शिक्षा और शोध-संस्थानों का निर्माण किया जाए।

  6. आर्थिक सहयोग बढ़े — किसान, मजदूर, उद्यमी, कर्मचारी और पेशेवर एक-दूसरे के आर्थिक हितों में सहयोग करें। सहकारी संस्थाएँ और सामुदायिक विकास मंच इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।

  7. महिलाओं और युवाओं की बराबर भागीदारी हो — केवल पारंपरिक नेतृत्व के भरोसे संगठन मजबूत नहीं होता। महिलाओं और युवाओं को निर्णय लेने की वास्तविक भूमिका मिलनी चाहिए।

  8. वैचारिक मतभेद को दुश्मनी न बनाया जाए — अलग-अलग राजनीतिक विचार रखने वाले लोग भी सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर साथ काम कर सकते हैं। संगठन किसी एक राजनीतिक दल का उपकरण बनने के बजाय समुदाय के दीर्घकालिक हितों पर केंद्रित रहे।

  9. साझे कार्यक्रम बनाए जाएँ — अलग-अलग क्षेत्रों के संगठनों को जोड़कर शिक्षा सम्मेलन, किसान सम्मेलन, साहित्यिक आयोजन, युवा संवाद और सामाजिक सुधार अभियान चलाए जाएँ।

  10. सोशल मीडिया पर संयम और संवाद — उपजातीय विवाद, अपमानजनक भाषा और श्रेष्ठता के दावों को बढ़ाने के बजाय इतिहास, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक एकता से संबंधित प्रमाणित सामग्री साझा की जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात: कुर्मी समाज की एकता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सभी लोग एक जैसा सोचें; बल्कि इसका अर्थ यह होना चाहिए कि मतभेदों के बावजूद समान सम्मान, समान अधिकार और साझा हितों के लिए साथ खड़े होने की क्षमता विकसित हो।

एक प्रभावी सूत्र हो सकता है:

“उपनाम अलग हो सकते हैं, क्षेत्र अलग हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं; लेकिन सम्मान, शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए हमारा साझा मंच एक हो।”

 

लेखक: गोलेन्द्र पटेल (अध्ययनरत, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Monday, 6 June 2022

अर्जुन और गोलेन्द्र का युद्ध


 
अर्जुन और गोलेन्द्र का युद्ध


यह किंवदती सुना है

कि द्रोणाचार्य के शिष्य को शस्त्र और शास्त्र का

दंभ होता है


उनके एक सौ छह शिष्यों ने

आपस में प्रतिस्पर्धा की

अंत में धनुर्धर विजयी हुए


इस प्रतियोगिता का परिणाम है 

कि कर्ण मारे जा चुके हैं

भीष्म मारे जा चुके हैं

और द्रोणाचार्य भी मारे जा चुके हैं


एक दिन दक्षिण की यात्रा में

कृष्ण से विजेता धनुर्धर ने कहा

कि अब संसार में कोई भी नहीं है

जो मुझे पराजित कर सके


तब कृष्ण इतना हँसे इतना हँसे

कि सप्तसागर की हिलोरें हँसने लगीं

धरती कंपित होने लगी

आकाश गरजने लगा


आख़िर अर्जुन पूछे कि प्रभु

इसमें हँसने की क्या बात है


रथ स्थिर हुआ

समाने महर्षि अगस्त्य मुनि के शिष्य गोलेन्द्र 

महेंद्र पर्वत को शिक्षा दे रहे थे

कि सर्वश्रेष्ठ वही है जो....


कथन सुनते ही

अर्जुन और गोलेन्द्र के बीच बहस हुई

बहस बाहुबल पर पहुंच गई


दोनों के बीच युद्ध हुआ

अर्जुन जितने भी दिव्यास्त्र छोड़ते थे

गोलेन्द्र उसकी दिशा अर्जुन की ओर ही मोड़ देते थे

अर्जुन को दिव्यास्त्र वापस लेना पड़ता था

अंत में अर्जुन ने कृष्ण से कहा 

कि प्रभु आज पहली बार परास्त हुआ मैं

ये कौन हैं?


उत्तर ----- ये गोलेन्द्र हैं

भगवान महर्षि अगस्त्य मुनि के शिष्य।


©गोलेन्द्र पटेल

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Friday, 8 April 2022

कवयित्रियों के कलाम (खंड-1) : गोलेन्द्र पटेल

वेदना-जल स्वप्न-शतदल : महादेवी वर्मा
"कवयित्रियों के कलाम" अंक के प्रथम खण्ड की कवयित्रियाँ :-

1). महादेवी वर्मा (संक्षिप्त परिचय)
2). अनिता रश्मि
3). अनुराधा ओस
4). मीनल
5). नीलम गुप्ता
6). वंदना मिश्रा
7). मीता दास


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◆आप कवयित्रियों से बातचीत सकते हैं।
◆प्रिय दोस्तो! मेरे पास पिछले एक सप्ताह में लगभग 200 कवयित्रियों की कविताएँ आई हैं। आशा है कि और भी आएंगी। मैं पाँच-छह कवयित्रियों की कविताएँ आप तक पहुँचने की कोशिश करूंगा। प्रत्येक पोस्ट में वरिष्ठ, कनिष्ठ व नवोदित तीनों तरह की कवयित्रियाँ होंगी। आप लोग धैर्य बनाए रखिए। परीक्षा बाद नियमित रूप से नये व पूराने सभी रचनाकारों को, आपके इसी साहित्यिकी ब्लॉग हम सब साथ पढ़ेंगे। धन्यवाद!
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शिक्षा से होगा उद्धार || बहुजन मुख्यधारा की कविता || अर्जक कविता

शिक्षा से होगा उद्धार मृत्यु स्वीकार है, दोस्त! पर दासता स्वीकार नहीं करूँगा। ईश्वर के आगे शीश झुकाकर अपने विवेक की हत्या नहीं करूँगा! तथागत...