विश्व मूलनिवासी दिवस : अस्मिता से अधिकार तक
9 अगस्त विश्व मूलनिवासी समुदायों की अस्मिता, संस्कृति, भाषा, परंपरा, पारंपरिक ज्ञान और मानवाधिकारों के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का दिन है। यह महज कैलेंडर पर अंकित एक दिवस नहीं, बल्कि उन समुदायों के इतिहास और अस्तित्व को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने पीढ़ियों से प्रकृति के साथ सहजीवन की ऐसी जीवन-पद्धतियाँ विकसित की हैं, जिनमें जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति के आधार हैं। उनकी लोकभाषाएँ, लोककलाएँ, स्मृतियाँ, रीति-रिवाज, सामुदायिक ज्ञान और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि मानव सभ्यता की साझा धरोहर हैं। इस दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी है। 9 अगस्त 1982 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के Working Group on Indigenous Populations की पहली बैठक हुई थी। मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों और उनकी विशिष्ट परिस्थितियों को वैश्विक स्तर पर रेखांकित करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को प्रस्ताव 49/214 के माध्यम से प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को International Day of the World’s Indigenous Peoples के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इस पहल का उद्देश्य मूलनिवासी लोगों के मानवाधिकारों, सांस्कृतिक विशिष्टता, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और उनके सामने उपस्थित चुनौतियों के प्रति विश्व समुदाय को जागरूक करना तथा उनकी गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए सहयोग को बढ़ाना था। मूलनिवासी अस्मिता का प्रश्न केवल पहचान का प्रश्न नहीं, बल्कि अधिकार और न्याय का प्रश्न भी है। किसी समुदाय की पहचान तभी सुरक्षित रह सकती है, जब उसकी भाषा जीवित रहे, उसकी संस्कृति को सम्मान मिले, उसके पारंपरिक ज्ञान को मूल्यवान माना जाए और उसे शिक्षा, आजीविका, प्रतिनिधित्व तथा निर्णय-प्रक्रिया में समान अवसर प्राप्त हों। इसलिए 9 अगस्त का संदेश केवल सांस्कृतिक गौरव तक सीमित नहीं रह सकता; इसे सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के व्यापक प्रश्न से जोड़ना आवश्यक है। पहचान सम्मान की अधिकारी है, संस्कृति संरक्षण की अधिकारी है और अधिकार किसी सत्ता की कृपा नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा का आधार हैं। मूलनिवासी समाज का सम्मान किसी दूसरे समाज के अपमान पर आधारित नहीं हो सकता। अस्मिता का अर्थ अलगाव नहीं, आत्मसम्मान है; स्वाभिमान का अर्थ द्वेष नहीं, बराबरी है। इसलिए इस दिवस की सार्थकता तभी है, जब सांस्कृतिक विविधता को संघर्ष का कारण नहीं, सह-अस्तित्व की शक्ति माना जाए। अपनी पहचान के प्रति सजग रहते हुए दूसरे की पहचान का सम्मान करना ही लोकतांत्रिक और मानवीय समाज की पहचान है। मूलनिवासी अधिकारों की आवाज किसी जाति, धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन सभी प्रकार के भेदभाव और असमानता के विरुद्ध होनी चाहिए जो मनुष्य की गरिमा को जन्म, वंश, जाति या सामाजिक स्थिति के आधार पर विभाजित करते हैं।
आज सबसे बड़ी चुनौती सांस्कृतिक विरासत को केवल स्मृति में सुरक्षित रखने की नहीं, बल्कि उसे जीवंत रखने की है। मातृभाषाओं के संरक्षण, लोकइतिहास के दस्तावेजीकरण, पारंपरिक ज्ञान के सम्मान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं की सक्रिय भागीदारी और महिलाओं के अनुभव तथा नेतृत्व को महत्व दिए बिना कोई भी सांस्कृतिक संरक्षण अधूरा रहेगा। जिस समाज की भाषा कमजोर पड़ती है, उसकी सामूहिक स्मृति भी क्षीण होने लगती है; और जब स्मृति मिटती है, तब अस्मिता पर संकट गहराता है। इसलिए शिक्षा और चेतना मूलनिवासी समाज के सशक्तीकरण के सबसे प्रभावी माध्यम हैं। वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस की थीम “Honouring Indigenous Midwives: Safeguarding Life and Well-being” रखी है। यह विषय मूलनिवासी समुदायों में पीढ़ियों से चली आ रही दाई-परंपरा और पारंपरिक ज्ञान को सम्मान देता है तथा मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य की सुरक्षा में मूलनिवासी दाइयों की भूमिका को रेखांकित करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मूलनिवासी ज्ञान केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए उपयोगी मानवीय ज्ञान-संपदा है। अतः 9 अगस्त को केवल बधाई और शुभकामनाओं तक सीमित कर देना इस दिवस की आत्मा को छोटा करना होगा। यह आत्मचिंतन, जागरूकता, शिक्षा, संगठन और अधिकार-चेतना का अवसर है। हमें अपनी भाषाओं, संस्कृतियों, इतिहास और पारंपरिक ज्ञान को बचाने के साथ-साथ प्रकृति और संसाधनों के संरक्षण के लिए भी सजग होना होगा। लोकतांत्रिक मूल्यों के भीतर समानता, न्याय और सम्मान की आवाज को मजबूत करना होगा। अंततः मूलनिवासी समाज का सम्मान केवल किसी एक समुदाय का सम्मान नहीं है; यह मानव विविधता, प्रकृति, श्रम, संस्कृति और साझा सभ्यता के सम्मान का प्रश्न है। जब कोई समाज अपनी जड़ों को पहचानते हुए समानता और मानवता की ओर बढ़ता है, तभी उसकी अस्मिता अधिकार में और उसका अधिकार गरिमा में बदलता है। 9 अगस्त हमें इसी यात्रा का स्मरण कराता है—अस्मिता से अधिकार की ओर, अधिकार से सम्मान की ओर और सम्मान से समान मानवता की ओर।
जय जोहार।
जय मानवता।
जय समानता।
★★★
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
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#संक्षिप्त_परिचय:-
नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि', 'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : श्रीमती उत्तम देवी
पिता : श्री नन्दलाल
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :
कविताएँ और आलेख - 'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस', 'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।
प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)
काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।
सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023", "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।
संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव
संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


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