Saturday, 18 April 2020

कोरोना पर मृत्युंजय का पोस्ट


पंकज चतुर्वेदी
भारत में कोरोना टेस्ट के नाम पर रौरव नरक की यात्रा का रीयल आख्यान पढ़ें -
यदि किसी पर कोरोना का संदेह हो तो उस पर क्या बीतती है? यह पोस्ट पढ़ लें फिर समझ आएगा कि अनपढ़ों के मुहल्ले में आती अफवाहों और उससे उपजती आशंका और भय का आधार झूठा नहीं होता।
सुश्री प्योली जिन्होंने यह पोस्ट साझा किया है वे सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रेकॉर्ड हैं::-
कैसी भयावह स्थिति है ज़मीनी स्तर पर, पढ़िए इस पोस्ट को। यह नोएडा निवासी मृत्युंजय शर्मा नामक एक उच्च-मध्यवर्गीय व्यक्ति की आपबीती है, जो सत्ता समर्थक हैं। यह उनके साथ भी होना संभव है, जो ताली, थाली, दिया करते हुए हिंदू मुसलमान का ज़हर उगलते रहते हैं, पर सरकार से कोई सवाल नहीं पूछते और पूछने वालों को घेरते हैं। पढ़िए :
सबसे पहले मैं ये कहना चाहता हूं कि ये कोई पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है, आप मेरे ट्विटर और फेसबुक अकाउंट पर देख सकते हैं कि मैं मोदी सरकार का समर्थक रहा हूं.
लेकिन अब मुझे लगता है कि मोदी सरकार केवल मेकओवर कर रही है और केवल मीडिया हाउस को खरीद कर, टीवी और सोशल मीडिया पर अपना ब्रांड बना कर कैंपेन कर लोगों को मिसलीड कर रही है. इसकी कहानी शुरू होती है, पिछले सोमवार से. पिछले सोमवार से पहले मेरी वाइफ को पिछले एक हफ्ते से फीवर आ रहा था. शायद किसी दवाई की एलर्जी हो गई थी, मेरे घर के पास के ही अस्पताल में ही उसका ट्रीटमेंट चल रहा था. अचानक से उसे कफ की प्रोबलम भी होने लगी. फिजीशियन ने सलाह की कि आप सेफ साइड के लिए कोरोना का टेस्ट करा लो.
टीवी पर देख कर हमें लगता था कि कोरोना का टेस्ट बहुत आसान है और अमेरिका और इटली जैसे देशों से हमारे देश की हालत बहुत अच्छी है. सरकार ने सब व्यवस्था कर रखी है. इसी इंप्रेशन में हमने कोरोना का टेस्ट कराने की बात मान ली.
मुझे पता था कि सरकारी अस्पताल में इतनी अच्छी फेसिलिटी मिलती नहीं है, हमने कोशिश की कि कहीं प्राइवेट में हमारा टेस्ट हो जाए. हालांकि सभी न्यूज़ चैनल यह दिखा रहे थे कि सरकारी अस्पताल में बहुत अच्छी सुविधाएं हैं, लेकिन फिर भी मैंने सोचा कि प्राइवेट लैब में अटेंम्ट करता हूं. कोरोना के टेस्ट के लिए जितने भी प्राइवेट लैब की लिस्ट थी, मैंने वहां कॉन्टेक्ट करने की कोशिश की लेकिन वहां कांटेक्ट नहीं हो पाया. जहां कॉन्टेक्ट हो पाया, उन्होंने मना कर दिया कि वो कोरोना का टेस्ट नहीं कर रहे हैं.
अब मेरे पास आखिरी ऑप्शन बचा था कि गवर्नमेंट की हैल्पलाइन से मदद लेते हैं. मैंने वहां कॉल किया. गवर्नमेंट का सेंट्रल हैल्पलाइन, स्टेट हैल्पलाइन और टोल फ्री नम्बर तीनों पर हमारी फैमली के तीनों व्यस्क लोग, मैं, मेरा भाई और मेरी वाइफ, हम तीनों इन हैल्पलाइन पर फोन लगातार मिलाते रहे.
तकरीबन एक घंटे बाद मेरे भाई के फोन से स्टेट हैल्पलाइन का नंबर मिला. उस हैल्पलाइन से किसी सामान्य कॉल सेंटर की तरह रटा रटाया जवाब देकर कि आपको कल शाम तक आपको फोन आ जाएगा, वगैहरा कह कर फोन डिस्कनेक्ट करने की कोशिश की, लेकिन मैंने बोला कि सिचुएशन क्रिटिकल है, अगर किसी पेशेंट को कोरोना है तो उसे जल्द से जल्द ट्रीटमेंट देना चाहिए, ऐसी सिचुएशन में हम आपकी कॉल का कब तक कॉल करेंगे. हमने उनसे पूछा कि टेस्ट का क्या प्रोसीजर होता है, कॉल के बाद क्या होता है, इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था. मैं निराश हो चुका था.
मेरे पास डीएम गौतमबुद्ध नगर का फोन था. सुहास साहब, उनकी भी बहुत अच्छी ब्रांड है. उनको कॉल किया तो उनके पीए से बात हुई. मैंने उनको बताया कि मेरे घर में एक कोरोना सस्पेक्ट है और कोई भी नम्बर नहीं मिल रहा है, ये क्या सिस्टम बना रखा है, तो उनका कहना था कि इसमें हम क्या करें, ये तो हैल्थ डिपार्टमेंट का काम है तो आप सीएमओ से बात कर लो.
मैंने उनसे कहा कि आप मुझे सीएओ का नम्बर दे दो. उन्होंने कहा, मेरे पास सीएमओ का नंबर नहीं है. यह अपने आप में बड़ा ही फ्रस्टेटिंग था कि डीएम के ऑफिस के पास सीएमओ का नम्बर नहीं है, या डीएम के पीए को इस तरह से ट्रेन किया गया है कि कोई फोन करे तो उसे सीएमओ से बात करने को कहा जाए.
बहुत आर्ग्युमेंट करने के बाद उन्होंने मुझे डीएम के कंट्रोल रूम का नंबर दे दिया कि आप वहां से ले लो. फिर मैं इतना परेशान हो चुका था कि डीएम के कंट्रोल रूम को फोन करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई, फिर मैंने खुद ही इंटरनेट पर नंबर ढूंढ कर निकाला. इसके बाद मैंने सीएमओ को कॉल किया.
सीएमो को कॉल करने के बाद वहां से भी कोई सही जवाब नहीं मिला, उन्होंने कहा, इसमें हम क्या कर सकते हैं आप 108 पर एंबुलेंस को कॉल कर लो. और एंबुलेंस को ये बोलना कि हमें कासना ले चलो. वहीं हमने कोरोनावायरस का आइसोलेशन वार्ड बनाया हुआ है. जबकि मीडिया में दिन रात यह देखने को मिलता है कि नोएडा में कोरोना के इतने बड़े-बड़े अस्पताल हैं, फाइव स्टार आइसोलेशन वार्ड हैं वगैहरा लेकिन फिर भी उन्होंने हमें ग्रेटर नोएडा में कासना जाने को कहा.
फिर बहुत मुश्किल से 108 पर कॉल मिला और फिर घंटे भर की जद्दोजहद के पास 108 के कॉलसेंटर पर बैठे व्यक्ति ने एक एंबुलेंस फाइनल करवाया. जब मेरे पास एंबुलेंस आई उस समय रात के 10 बज चुके थे. मैं शाम के सात बजे से इस पूरी प्रक्रिया में लगा था. यूपी का लॉ एंड ऑर्डर देखते हुए रात के दस बजे मैं अपनी वाइफ को अकेले नहीं जाने दे सकता था.
मेरे घर में 15 महीने की एक छोटी बेटी भी है और घर में केवल एक मेरा एक भाई ही था जिसे बच्चों की केयर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, फिर भी मैं अपनी बच्ची को उसके पास छोड़कर वाइफ के साथ एंबुलेंस में बैठ गया और वहां से आगे निकले.
आगे बढ़ने के बाद ड्राइवर ने बोला कि हम ग्रेटर नोएडा नहीं जा सकते, मुझे खाना भी है, मैंने चार दिन से खाना नहीं खाया और वो बहुत अजीब व्यहवार करने लगा.
फिर वो हमें किसी गांव में ले गया, वहां से उसने अपना खाना और कपड़ा लिया और फिर वहां से दूसरा रूट लेते हुए हमें वो ग्रेटर नोएडा लेकर गया.
हमें गवर्नमेंट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ में हमें ले जाया गया. वहां एक कम डॉक्टर मिलीं जो ट्रेनी ही लग रहीं थीं, उन्होंने दूर से ही वाइफ से पूछा कि आपको क्या सिमटम हैं, वाइफ ने अपने सिमटम बताए, तो उन्होंने कहा कि आप दोनों को कोरोना का टेस्ट करना पड़ेगा. रिपोर्ट 48 घंटे में आ जाएगी. और अगर आप कोरोना का टेस्ट करवाते हैं तो आपको आईसोलेट होना पड़ेगा.
मैंने कहा कि मेरे लिए यह संभव नहीं है, मेरी 15 महीने की बच्ची है, मुझे वापस जाना पड़ेगा, आप बस मुझे वापस भिजवा दो. उन्होंने कहा कि हम वापस नहीं भिजवा सकते हैं. और अगर आप आइसोलेट नहीं होना चाहते हैं तो आप यहीं कहीं बाहर रात गुजार लो सुबह देख लेना आप कैसे वापस जाओगे. यह लॉकडाउन की सिचुएशन की बात है जिसमें कोई भी आने जाने का साधन सड़क पर नहीं मिलता है.
अचानक से उन्होंने किसी को कॉल किया और उधर से किसी मैडम से उनकी बात हुई और उन्होंने फोन पर कहा कि नहीं हम हस्बैंड को नहीं जाने दे सकते क्योंकि वो भी एंबुलेंस में साथ में आए हैं.
मैंने उनसे कहा कि 48 घंटे तो मेरा भाई मैनेज कर लेगा लेकिन आप पक्का बताइए कि 48 घंटे में रिपोर्ट आ जाएगी? इस पर उन्होंने कहा कि हां 48 घंटे में रिपोर्ट आ जाएगी आप अपना सैंपल दे दो. रात को ही हमारी सैंपलिंग हो गई और फिर से हमें एंबुलेंस में बिठाला गया.
एंबुलेंस में हमें तीन और सस्पेक्ट्स के साथ बिठाला गया और इसके पूरे चांस थे कि अगर मुझे कोरोना नहीं भी होता और उन तीनों में से किसी को होता, तो मुझे और मेरी बीवी को भी कोरोना हो जाता.
एक एबुंलेंस में पांच लोगों को पास-पास बिठाया गया. उनकी सैंपलिंग भी हमारे आस-पास ही हुई थी. इसके बाद हमें वहां से दो तीन किलोमीटर दूर एससीएसटी हॉस्टल मे आइसोलेशन में ले जाया गया.
मेरी सैंपलिंग होने के बाद भी ना मुझे कोई ट्रैकिंग नंबर दिया गया, ना मेरा कोई रिकॉर्ड मुझे दिया गया कि मैं कहां हूं मेरे पास कोई जानकारी नहीं थी. इसके पास मेरी वाइफ को लेडीज वार्ड भेज दिया गया और मुझे जेंट्स वार्ड.
जेंट्स और लेडीज़ दोनों का वॉशरूम कॉमन था. जब मुझे मेरा रूम दिया गया तो वहां चारपाई पर बेडशीट के नाम पर एक पतला सा कपड़ा पड़ा हुआ था और दूसरा कपड़ा मुझे दिया गया और बोला गया कि आप पुराना बेडशीट हटा कर ये बिछा लेना.
रात के एक बज रहे थे, जो खाना मुझे दिया गया वो खराब हो चुका था, लेकिन मैंने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया मैं बिना खाए वैसे ही सो गया.
उसके बाद मैं सुबह उठा मुझे फ्रेश होना था, मैं नीचे गया और हाथ धोने के लिए साबुन मांगा. मुझे जवाब मिला कि पानी से ही हाथ धो लेना. सैनिटाइजेशन के नाम पर जीरो था वो आइसोलेशन सेंटर. चारों तरफ कूड़ा फैला पड़ा था.
मुझे एक -दो घंटे कह कर पूरे दिन साबुन का इंतजार करवाया गया लेकिन मुझे साबुन नहीं मिला. इस चक्कर में ना मैंने खाना खाया औ ना मैं फ्रेश हो पाया. मैंने सोचा कि केवल 48 घंटे की बात है, काट लेंगे.
अगले दिन जब मैं फिर गया साबुन मांगने तो फिर मुझे आधे घंटे में साबुन आ रहा है कह कर टाल दिया गया. करीब 12 बजे मेरी उनसे बहस हो गई तो उन्होंने अपने लिक्विड सोप में से थोड़ा सा मुझे एक कप में दिया तब जाकर मैं फ्रेश हो पाया और मैंने खाना खाया.
वहां बिना कपड़ों और सफाई के हालत खराब हो रही थी, 48 घंटे के बाद मैं पूछने गया तो मुझे बताया कि इतनी जल्दी नहीं आती है रिपोर्ट 3-4 दिन इंतजार करना होगा. वहां उन्होंने बाउंसर टाइप कुछ लोग भी बिठा रखे हैं ताकि कोई ज्यादा सवाल जवाब ना करे. वहां मैंने देखा कि वहां चाहें आप नेगेटिव हो या पॉजिटिव हो किसी की भी 7-8 दिन से पहले रिपोर्ट नहीं आती है.
हर हाल में मरना है, सरकार आपके लिए वहां कुछ नहीं कर रही है. केवल आपको आइसोलेशन वार्ड में डाल दिया जाता है कि केवल सरकार की नाकामी छिप जाए. देट्स इट.
वहां पर 80% लोग जमात और मरकज वाले और उनके संपर्क वाले लोग थे. उनका भी यही हाल था. उनकी भी रिपोर्ट नहीं बताई जा रही थी.
करीब 72 घंटे बाद जब मैंने दोबार पूछा कि मेरी रिपोर्ट नहीं आ रही है तो वहां पर मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि हमें नहीं पता होता है कि आपकी रिपोर्ट कब आएगी. हमें केवल इतना पता है कि आपको यहां से जाने नहीं देना है जब तक आपकी रिपोर्ट नहीं आ जाती है.
मुझे लग रहा था कि उनके पास कोई इंफॉर्मेशन नहीं थी, कोई ट्रैकिंग की व्यवस्था नहीं थी. जो पहले आ रहा था वो बाद में जा रहा था, जो बाद आ रहा था वो पहले जा रहा था.
मैंने दोबारा डीएम के नंबर पर कॉल करना शुरू किया, फिर वो स्विच ऑफ हो गया और फिर वो आज तक वो नंबर बंद है, शायद नंबर बदल लिया है. फिर मैंने नोएडा के सीएमओ को कॉल करना शुरू किया, उन्होंने कॉल नहीं उठाया.
मैंने मैसेज किया कि मेरी 15 महीने की बेटी है जो मदर फीड पर है और फिलहाल मेरे भाई के साथ अकेली है, मुझे आपसे मदद चाहिए. लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं आया.
मुझे समझ नहीं आताा कि कोरोनावायरस के इतने क्रूशियल समय में आप कैसे 5-6 दिन में रिपोर्ट दे सकते हैं!
सीएमओ ने मेरा मैसेज पढ़ा और फिर मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया. फिर मैंने डिप्टी सीएमओ को भी कॉल किया लेकिन फोन नहीं उठा. मैंने काफी हाथ-पैर मारे, मेरा फ्रस्ट्रेशन बहुत बढ गया था. एक डॉक्टर आते हैं वहां नाइट ड्यूटी पर, उन्होंने कहा कि मेरे पास कोई इंफॉर्मेशन नहीं हैं यहां पर मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता, आप मुझसे कल सुबह बात करना.
मेरे साथ ही एक और लड़का आइसोलेट हुआ था, गंदगी और गर्मी के कारण वो कल मेरे सामने बेहोश हो गया. कोई उसे उठाने, उसे छूने के लिए, उसके पास जाने को राजी नहीं था.
वहां किसी भी पेशेंट की तबियत खराब हो रही थी तो कोई उसके पास नहीं जा रहा था. अगर किसी को फीवर है तो पैरासिटामोट देकर वार्ड के अंदर चुपचाप सोने को कहा जा रहा था. सीढियों के पास इतना कूड़ा इकठ्ठा हो रहा था कि बदबू के मारे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था.
सब केवल अपनी औपचारिकता कर रहे थे वहां. बड़े अधिकारी जो वहां विजिट कर रहे थे वो बाहर से ही बाहर निकल जा रहे थे, अंदर आकर हालात जानने की कोशिश किसी ने नहीं की.
आखिरकार कल शाम तक जब मेरी रिपोर्ट नहीं आई और मेरे साथ वालों की आ गई तो मैंने उनसे फिर पूछा कि मेरी रिपोर्ट क्यों नहीं आई अभी तक. क्यों कोई ट्रेकिंग सिस्टम नहीं है, क्यों किसी को कुछ पता नहीं है. तो उनका वही रटा रटाया जवाब मिला कि हम केवल आइसोलेट करके रखते हैं, हमें इसके अलावा और कोई जानकारी नहीं है. जब रिपोर्ट आएगी आप तभी यहां से जाओगे.
कोरोना आईसोलेशन वार्ड की यूज किया हुआ बिस्तर
इसके बाद मेरी वाइफ का फोन आया कि उन्होंने सुना है कि लेडीज को कहीं और शिफ्ट कर रहे हैं, किसी और जगह ले जाएंगे. मैं अपनी वाइफ के साथ नीचे गया और पता चला कि लेडीज को गलगोटिया यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर रहे हैं.
मैंने उनसे कहा कि मैं अपनी वाइफ को अकेले नहीं जाने दूंगा. वरना अगर इन्हें कुछ भी होता है तो आप रेस्पोंसिबल होगे. फिर उन्होंने मेरी बात मानी और कहा कि आपको भी इनके साथ भेज देंगे और फिर उन्होंने मुझे बाहर बुला लिया.
बाहर बुलाने के बाद में उन्होंने मेरे हाथ में पर्ची पकड़ाई कि ये इस वार्ड से उस वार्ड में आपका ट्रांसफर स्लिप है. मैंने पर्ची को देखा तो उसमें पहली लाइन में मुझे लिखा दिखा कि "मृत्युंजय कोविड -19 नेगेटिव".
इस पर मैंने उनसे कहा कि अरे जब मेरी रिपोर्ट आई हुई है तो आप मुझे दूसरे वॉर्ड में क्यों भेज रहे हो. इस पर उन्होंने मेरे हाथ से पर्ची ले ली और कहा कि शायद कोई गलती हो गई है. इतने गैरजिम्मेदार लोग हैं वहां पर.
फिर उन्होंने क्रॉसवेरिफाई किया और बाहर आकर कहा कि हां आपकी रिपोर्ट आ गई है. आपकी रिपोर्ट नेगेटिव है. आपकी वाइफ की रिपोर्ट नहीं आई है. इन्हें जाना पड़ेगा. आप इस एंबुलेंस में बैठो, आपकी वाइफ दूसरी एंबुलेंस में बैठेंगी.
मैंने उनसे सवाल किया कि मेरी वाइफ की सैंपलिंग मेरे से पहले हुई थी तो ऐसा कैसे पॉसिबल है कि मेरी रिपोर्ट आ गई लेकिन मेरी वाइफ की नहीं आई? मैंने सोचा ज़रूर कुछ गलती है.
मैंने एंबुलेंस रुकवा दी कि मैं बिना जानकारी के नहीं जाने दूंगा. फिर वो दो स्टाफ के साथ अंदर गए और फिर कुछ देर बाद बाहर आकर बताया कि हां आपकी वाइफ का भी नेगेटिव आया है.
वहां कोई प्रोसेस, कोई सिस्टम नहीं है, जिसके जो मन आ रहा है वो किए जा रहा है. किसी को नहीं पता कि चल क्या रहा है. फिर उन्होंने कहा कि आप दोनों अब घर जा सकते हो. वापस आते हुए भी एंबुलेंस में पांच और लोग साथ में थे.
वहां हाइजीन की खराब स्थिति के कारण पूरे चांस हैं कि अगर आपको कोरोना नहीं भी है आइसोलेशन वार्ड या एंबुलेंस में आपको कोरोना हो जाए. अगर आपको कोरोना नहीं भी है तो आप वहां से नहीं बच सकते हो.
पहले एंबुलेंस ड्राइवर ने हमें कहा कि वो नोएडा सेक्टर 122 हमें छोड़ देगा. लेकिन हमें निठारी छोड़ दिया गया. हमसे कहा गया कि आप यहां पर वेट करो , मैं दूसरी सवारी को छोड़ने जा रहा हूं. 102 नंबर की गाड़ी आएगी वो आपको लेकर जाएगी.
वहां आधा घंटा इंतजार करने के बाद जब मैंने वापस कॉल की और पूछा कि कब आएगी गाड़ी किया तो उन्होंने कहा कि हमारी जिम्मेदारी यहीं तक की थी. आगे आप देखो.
फिर हम वहां और खड़े रहे. लगभग आधा घंटा और बीता और बीता और जो एंबुलेंस का ड्राइवर हमें छोड़ कर गया था वो वापस लौटा.
हमें वहीं खड़ा देख कर रुक गया. कहने लगा कि अरे बाबूजी मैं क्या करुं मैं तो खुद परेशान हूं चार दिन से खाना नहीं खाया है, हालत खराब है. मेरे सामने ही उसने वीड मारी और कहने लगा कि 12 से ऊपर हो रहे हैं आप काफी परेशान हो, मैं आपको छोड़ देता हूं.
एंबुलेंस ड्राइवर अपने दो-तीन साथियों के साथ एंबुलेंस में बैठा और फिर वो रात के 1 बजे मेरी सोसाएटी से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर ही वो मुझे छोड़ कर चला गया.
यह कहानी बहुत कम करके मैंने बताई है, कि क्या सिस्टम जमीन पर है और क्या मीडिया में दिखता है. जब आप ग्राउंड लेवल पर आते हो तो कोई रेस्पोंसिबल नहीं है आपकी हैल्थ के लिए, आपकी सिक्योरिटी के लिए, आपके कंसर्न के लिए और आपकी जान के लिए.
  (मृत्युंजय की पोस्ट Pyoli Swatija की वॉल से।)

गाँधी और अंबेडकर


जिस समय देश के स्वंतत्रता सेनानी एकजुट होकर साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ रहे थे, स्वंतत्रता आंदोलन निर्णायक भूमिका की तरफ कदम बढ़ा रहा था उस समय गाँधी और अंबेडकर में आजादी के स्वरूप को लेकर बहस भी चल रही थी। अंबेडकर अंग्रेजों के साथ ही जातिवादी और सामंतवादी ताकतों के शोषण से वंचित समाज की मुक्ति चाहते थे। ये वही ताकतें थी जिन्होंने वंचित समाज का सदियों से शोषण किया था। गाँधी इसको घर की आंतरिक समस्या मानकर बाद में इसके समाधान की बात कर रहे थे। अंबेडकर वंचित समाज की इस गुलामी को अंग्रेजों से मुक्ति के साथ ही खत्म करने की बात कर रहे थे और निरंतर वंचित समाज की आवाज बनकर संघर्ष कर रहे थे। उस समय यह देखना जरूरी हो जाता है कि साहित्य का आलोचक, इतिहासकार और चिंतक वंचित समाज के बीच से निकलकर आने वाली रचनाओं को किस रूप में देख रहा था। खासकर कबीर और रैदास की रचनाओं के प्रति उसका क्या रुख था। ये वही रचनाएँ हैं जो वंचित समाज की संवेदना और पीड़ा से परिचित कराती हैं। यदि चिंतक और इतिहासकार की दृष्टि में इनकी कविताएँ कविता की सीमा रेखा के बाहर नजर आती हैं तो उस इतिहास और चिंतन पर प्रश्न खड़े करना जरूरी हो जाता है। यदि उस समय का चिंतक और इतिहासकार वंचित समाज के कवियों से नहीं टकरा रहा है और उनकी संवेदना से कोई सरोकार नहीं स्थापित कर रहा है तो स्वाभाविक है कि वह नये तरह के साम्राज्यवाद को रचने की कोशिश कर रहा है। आज यह जरूरी हो जाता है कि उस समय के इतिहास और चिंतन का फिर से सचेत मूल्यांकन किया जाय और उसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किया जाय। इससे किसी को किसी तरह का परहेज नहीं होना चाहिए।
-गोलेन्द्र पटेल

Friday, 17 April 2020

उत्तर कोरोना : प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल


उत्तर - कोरोना...... (Post-Corona)
(आत्माएं होंगी,आत्मीयता न होगी!)
@श्रीप्रकाश शुक्ल)
मैने तुम्हें फोन किया और तुम मुझसे उत्तर मांग रहे हो
समय सुबह का है
सूरज की चमक थोड़ी गाढ़ी हुई ही थी
कि नदियों के स्वच्छ होते जल और वातावरण में बढती हुई आक्सीजन के बीच 
आसमान में निचाट सन्नाटा  है
और तुम कहते हो
यह उत्तर- कोरोना तो नहीं है!
कितना विकट समय है कि जब दुनिया का सारा विज्ञान एक रोएं के हजारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है
लगभग एक ब्रह्म की सूक्ष्म सत्ता की तरह इधर उधर छिटक रहा है
अपने स्वरूप को लगातार बदलता हुआ हर क्षण धरती का खून पी रहा है
तुम मुझसे उत्तर की अपेक्षा कर रहे हो
अब जबकि वर्तमान से बाहर आने की उम्मीद  कम ही  बची  है
चिडियों की बढ़ती चहचहाहट  के बीच
दुनिया के सारे देवता असहाय व असुरक्षित हो गए हैं
अल्लाह,ईसा ,मूसा और ईश्वर
सबके सब मुंह बांध कर अपने अपने कमरे में कैद हैं
और पुतलियों की जाती हुई गति से दुनिया को आते  हुए देख रहे हैं
तुम कोरोना के उत्तर से उत्तर -कोरोना की बात क्यों कर रहे हो
क्या तुम जानते हो
यह आस्थाओं के फड़फड़ाने का दौर है
जिसमें संत कवियों की एक बार फिर से वापसी हो रही है
जब उन्होंने कहा था कि इस जगत में एक ही ब्रह्म की सत्ता है
बाकी सब मिथ्या  है!
ठीक इसी जगह पर दुनिया बदल रही है
और बदलते हुए कोरोना के चरित्र में
खुद के लिए एक उत्तर खोज रही है
शायद उत्तर कोरोना का उत्तर-----
जहाँ अभिव्यक्तियाँ होंगी
लेकिन आस्वाद न होगा
लोग लौट रहे होंगे
लेकिन लौटने के लिए कुछ न होगा
आत्माएं होंगी आत्मीयता न होगी
एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी
यह चिंताओं व शंकाओं  के संघर्ष का दौर होगा
जिसमें हर कुछ एक भय की  तरह समर्पित होगा
जहां स्वीकारने के अलावा और कुछ न होगा
और संघर्ष के मोर्चे पर हर बार विवेक ही मारा जायेगा
आदतें कुछ ऐसी होंगी
एक खास जंग के जैसी होंगी
जीवन निर्वात होगा
संघर्ष हवाओं का होगा
सत्ताएं उदार होंगी
शासन सख्त होगा
देश का हर आदमी लड़ेगा सिपाही की तरह
लेकिन हर बार मारा जाएगा एक नागरिक के मोर्चे पर
शासक बहुत उदार होंगे
लेकिन उनमें सब कुछ को पाने की एक जल्दी होगी
लगभग इस समय की वाचाल मीडिया की तरह
जहाँ ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीखता है
अद्भुत होगा यह समय की अद्भुत जैसा कुछ नही होगा
केवल एक पुरातन की स्मृति होगी
और सभ्यता के एक वायरल इफेक्ट जैसा
खोने व पाने का संघर्ष होगा
हर नए विकल्प को  अनचाही आस्थाओं का आदिम स्वर देता हुआ
यह असहाय कथाओं के सर्जन का समय होगा
जिसमें कथाएं तो बहुत होंगी
काव्यत्व उतना ही कम होगा
स्मृति में मनोरंजन की सुविधाएं होंगी
आकांक्षा में ढेर सारी दुविधाओं के बीच
यह एक दूसरे की तारीफ का दौर होगा
जिसमें सराहनाएं भी शातिर होंगी
जहां एक ताकत दूसरे को आजमा  रही होगी
खोए हुए को पाने की जिद में
दुनिया दौड़ रही होगी
जिसकी जद में  आयी हुई सभ्यता
अपनी संपूर्णता में कराह रही होगी
यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा
क्या तुम जानते हो
वायरस का कोई पूर्व काल नहीं होता
उसका सिर्फ एक वर्तमान होता है
जो सदा एक उत्तर में बदल रहा होता है
यह विचार नहीं
व्यवहार समझता है
और तुम्हारा व्यवहार है कि इसकी आकंठ उलाहनाओं के बीच
पूंजी  की ताकत के सामने सदा झुका रहता है
एक स्थायी विनम्रता की तरह!
@श्रीप्रकाश शुक्ल-12-4-2020)

कोरोना और उसके बाद (साहित्य में कोरोना वायरस) -/- गोलेन्द्र पटेल


**कोरोना और उसके बाद**

हे स्त्री!
मैं पुरुष हूँ
मेरे पैरों में
बाँधो घुँघरू ;
क्योंकि
मुझ में
पुरुषत्व नहीं!
न ही कोई
विकल्प
न ही कोई
संकल्प ;
न ही कोई
संवेदना
न ही कोई
चेतना।
भरी दोपहरी में
चौंधियाई आँखों से
रूप पर पडे़ धूप देख
एक नदी कहती
समुद्र के भीतर समन्वय है
तरंग और उमंग का
स्वप्न और संघर्ष का
रंग और जंग का
धन्य और अन्य का....
यह नदी
उन युवतीयों के नयन नीर का
जो सदियों से
दो रूप में रोती हैं :
विरहिणी या विधवा
तवे पर तले ताज़े तकदीर को
विरहाग्नि से खौलते अदहन में
मैंने पकाना-खाना जाना
वक्त से पहले बन दिवाना
लॉकडाउन के कहर में घर
अब आह उह का स्वर
सुबह दोपहर शाम आधी रात
या आठों पहर में जहर
लगने लगे हैं : सामाजिकता के विरुद्ध
न मुझ में प्रेम है न वासना
बस परिवर्तन का रोग है खाँसना
स्पर्श शब्द से नफ़रत है हँसना
चुंबन के चंगुल में नहीं फँसना
समय का सच्चा प्यार है या न्याय
अच्छा तो क्या कह रहे थे
मेरी आँखें लग थीं : पुनः दोहराओ अपनी बात
कैसे दोहराऊँ लिख कर थोड़े लाया था
बस कुछ संकेत करता हूँ
समय के अभाव में
मैं जीना नहीं चाहता
अपने बच्चों के पेट में उठी दर्द का शंखनाद देख-सून
और तुम्हारे गर्भ में भूख से तड़पते भावी बच्चे को भी
द्वीप का दीप बुझ रहे हैं धीरे धीरे
एक मैं हूँ अकेला नदी के तीरे तीरे
जलीय जीवों के तलाश में भटकता
न मच्छली न घोंघा न सीप न अन्य
कुछ भी नहीं पकड़ पाया काव्यसरिता में
मुझे पहना दो चुड़ियाँ
कर्षित प्रेम कविता में
"अकाल और उसके बाद" में एक उम्मीद थी
पर "कोरोना और उसके बाद" में केवल ख़ौफ़
जो भयंकर डर ,भय ,त्रासदी ,सन्नाटा.....आदि को
जीवन के विरुद्ध जन्म दे रहा है इन दिनों
-गोलेन्द्र पटेल
**कोरोना और उसके बाद** से
मौत का तांडव,

उत्तर-कोरोना काल || uttar corona kal


**उत्तर-कोरोना काल**

साहित्य में कोरोना का स्थान
सबसे ऊँचा सदैव रहेगा ;
इसके सामने झुकेगा हर महान
व्यक्ति ,क्रांति ,युद्ध व शुद्ध बुद्ध ज्ञान
ऐसा मैं नहीं
आज का वर्णन कहेगा।
मैं समय से पहले ही
अपने प्रिय आलोचकों से पूछा था ;
सत्र दो हजार दस के बाद के रचनाओं को
किस संज्ञा से पुकारा जाएगा?
कोई कुछ कहा तो कोई कुछ
लेकिन अब स्पष्ट है उत्तर : "उत्तर-कोरोना"
यह इस लिए नहीं कह रहा हूँ कि
यह शीर्षक हमारे काव्यगुरु की है
बल्कि यह इस लिए कह रहा हूँ कि
आपके सामने साहित्यिक यथार्थ है
जिसका प्रमाण सोशल मीडिया है
और कनिष्ठ से वरिष्ठ साहित्यकार
दोनों महायुद्ध हो या हमारे बुद्ध
या हमारे गाँधी या कोई इतिहास
सबसे आगे होगा कोरोना : कथाओं में ,
कविताओं में ,आलोचनाओं में व अन्य विधाओं में
सम्पूर्ण संवेदना समाज के श्यामपट्ट पर
रेखांकित करेगा : भय ,त्रासदी ,सन्नाटा ,......आदि।
और अद्भुत दृश्य दर्द का दर्पण
"स्पर्श" सृष्टि का सत्यानाशी महाविनाशी
ख़ौफ़नाक "घृणित साक्ष्य-शब्द" से भयभीत
ईश्वर ,अल्लाह ,ईसा ,मूसा और गॉड इन दिनों
अपने आँख-कान-नाक-जिह्वा-त्वचा बचाए
छिप गए हैं अज्ञात एकांतवास में
और "त्राहि-त्राहि" का शंखनाद बंद किवाड़ से
टकरा आदमी के पास वापस आ-जा रहा है
सुबह शाम उलाहना पहूँचे देश के रक्षकों के पास
शोक व शंकाएँ आत्माभिव्यक्ति का आधार
चिंता व चेतना मानव जीवन का लम्ब
समय व संघर्ष जगत का कर्ण
इसी आधार लम्ब कर्ण पर टिका है :
पिरामिड या परिवार या रचना संसार
जहाँ से चिड़ियों को चावल के दाने मिलते थे
चारों तरफ चहचहाहट के चम्मच बजते थे
वहाँ अब चुप्पी के खिलाफ हवाओं में
चुल्हों के रूदन स्वर गूँज रहे हैं
जिसे सून शून्य हो सभी सुमन झड़ पडे़ पेड़ से
कोलाहल ही कोलाहल है
चमकते धूप में
बदलते स्वरूप में
मिडिया के चीख मे
उम्र को उम्मीद है
विज्ञान के अविष्कार में
कुछ ऐसा है कि ऐसा कुछ भी नहीं
जिसे ढूँढ न पाए वह
विकल्प के विस्तार से तंग
तरंग भंग हुआ नदी बीच
अद्भुत आशा का नाव जब रूका अचानक
कहर का लहर चारो ओर दौड़ गया
समुद्र-सा सपाट होता हुआ साहित्य में
धीरज धरते धरती के सदस्य में
कोविड नाइंटीन की कथा सड़क से संसद में
धुम मचाया : "लॉकडाउन टाउन से शहर में"
गाँव का भूख चढ़ा हिमालय के उतुंग शिखर
मजदूर वर्ग जो रोज़ कुआँ खोद के पानी पीते हैं
उनके नवजात शिशु दूध के जगह माड़ पीते हैं
या माँ का रक्त निचोड़ सूखी छाती से पीते हैं
अब वे सब रोते रोते पिता के आँसू पी रहे हैं
हे राजनीति के खुदा! हे भारत भाग्य विधाता!
तेरे बच्चे भूखे-कलपते-तड़पते हुए जी रहे हैं
द्वार पर खड़े हैं असहाय महराज यमराज
आत्मा को समय से पहले देह छोड़ते देख
ब्रह्म देव हताश हैं ; स्वयं का पढ़ पूर्व लेख
नारदजी का थम गया नारायण-नारायण जाप
लेखनी चले कैसे कागज़ रूए कलम रहा काप
अपनों से अजनबी का व्यवहार कर रहे हैं हम-आप
सूनो!सामाजिकता या सामूहिकता हुआ अभिशाप
सामुहिक प्रयास से कोरोना लेगा अपना रास्ता नाप
इस महामारी के कष्टमयी रात में राजनीति का भाप
भूख के जमीन से उठ ऊपर जन्नत में चला चुपचाप
योंही चलता रहा तो न मानव होगा न जीवन
बस वायरस होगा लोकतंत्र के दुनिया में
कोरोना को बीजेपी वाले कहेंगे काँग्रेस
काँग्रेस बीजेपी को कहेंगे कोविडनाइंटीन
कवि ,लेखक ,गीतकार ,कलाकार व पत्रकार
अपने क्रोध को कोरोना से जोड़ कर प्रस्तुत करेंगे
राजनीति के विरुद्ध बुलंद आवाज़ों में
जनता जन्म से दो वक्त की भोजन चहती
नहीं मिलेगा तो चिल्लाते-चिल्लाते चुप हो जाएगी
लाचार असहाय प्यासे मरुस्थलीय पंक्षियों के भाँति
अन्ततः कोई खेत में गिरेगा कोई रेत में
कोई कोरोना के कहर से किसी शहर में
यदि जीना चाहते हो तो जगना ही होगा
कोरोना रूपी राजनीतिक अंधकार में.....।
-गोलेन्द्र पटेल
रचना :16-04-2020

Friday, 10 April 2020

कवि के भीतर स्त्री : गोलेन्द्र पटेल // स्त्री -/- स्त्री चेतना -/- स्त्री साहित्य -/- कविता में स्त्री -/- स्त्री विमर्श

**कवि के भीतर स्त्री**
 भोजपुरी अध्ययन केंद्र 【बीएचयू】 में
अर्चनीय आचार्यों से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए गोलेन्द्र पटेल : प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल , प्रो.विजयनाथ मिश्र , प्रो.सुमन जैन , प्रो.चम्पा सिंह, वरिष्ठ नवगीतकार डॉ.इंदीवर जी , डॉ.अभय ठाकुर एवं अन्य।

एक नदी भीतर बहती
एक नदी बाहर

प्रेम गली में कहती
गीत गज़ल चलती
कविता में दुःखी रहती
संघर्ष सुख सहती

द्वीप बीच अकेला हँसती
धूप में धूल महती
डाहती दुनिया से दहती
कर्षित माँ बन वसुमती!!
और नदी त्रासदी में पति
समुद्र के संभोग से रति

शब्द रहस्य पुत्र प्राप्ति
सती समय की गति
समझती सृष्टि में स्त्री यति
सत्यमुर्ति करती ऋति

सरस्वती-सी उसकी मति
बह्मांड ॐ नारी नति
दया करुणा स्नेह ज्योति
भक्ति शक्ति सर्वोन्नति! !
सुबह शाम पूण्य प्रगति
परमार्थ पथ पद्धति

वाष्पित विज्ञप्ति विरचित
प्रकाशित शीर्षक  स्पंदित
स्मृति में आई बन व्यक्ति
उम्मीद ऊपर स्थित

उर्वशी श्रद्धा इड़ा रति
उत्तम उच्च उचित
उदाहरण प्रस्तुत चरित
महाकाव्य में वर्णित!!
प्रसाद व दिनकर कथित
साहित्य निधि कंपित

उपनिषद् की उपस्थित
स्त्री सत्य उपेक्षित
उपदेश वचन-प्रति
आज का नवोदित

प्रगीत नई चेतना चित्त
मीरा सुभद्रा वर्मा हित
चाहती उज्जवल उत्साहित
प्रकृति के साथ रेखांकित!!
सुबह ओस सुधा से
खिली कली  कर्षित

शाम तक रूपरस से
सूरज को  आकर्षित
कर धीरे धीरे अपने
देह को बुढ़ी  करती

सूख  जाते हैं  सपने
भौरों के ,तरंग तैरती
उमंग संग सहानुभूति
रंग   अनंत   अनुभूति।।
लाती लाद पीठ पर
गाती गाद दीठ दर

दुःख व दर्द असहनीय
यथार्थ दृश्य अकथनीय
वैसे घाव है हरती
जैसे नाव है धरती

स्त्री सूचक शब्द अनेक
एक यहाँ से एक वहाँ से फेंक
कभी नीचे से कभी ऊपर से केक
ग्लोबल के गुरिया से काव्य-माला नेक।।
भविता के स्त्रीत्व को पहनाती
नदी नारी पृथ्वी के पास जाती

संवेदना के सुमन का सुगंध सूँघने
या धूप से सूखते शहद को सोखने
साहित्य वाटिका में वटवृक्ष पर
एक विशाल बनाना चाहती घर

जिसे दुनिया कहती मधुमक्खियों की छत्ता
वास्तव में वृक्ष के एकैक कली फूल व पत्ता
समय के संदेश कटोरी में
चापलूसी शब्दों के चोरी में।।
भौरों को भोजन परोस
सुबह शाम परम संतोष

पा ,पाप-पुण्य का युद्ध
भयंकर भूख के विरुद्ध
कर ,काव्य की कहानी
मकरंद-सी मिठी पानी

बन सहृदय उपवन की
प्यास बुझाती मन की
सड़क के रोरी में
माँ की लोरी में।।
स्नेह व ममत्व भरी
आँचल के ओरी में

नवजात के लिए धरी
नव चाशनी डोरी में
ऊषा से आगे अरुणोदय ने
प्रातःकाल उठ महोदय ने

अपने औरत के आँसू ओस
प्रेमरश्मि के किरणों से पोंछ
एक स्त्री का पुरुष से नाता
तीन रूप में गाता विधाता।।
ओ कभी किसी की बेटी
तो कभी किसी की पत्नी

तो कभी किसी की माता
जो नारी से ही नर है आता
वही इन्हें जहाँ-तहाँ परिवार में
पितृसत्तात्मक सत्ता से सताता

जैसे नदी को यहाँ-वहाँ संसार में
औद्योगीकरणवाद के आधुनिक नाले
और भगवती पृथ्वी को प्लास्टिक
भूख के जमीन पर भूखों को काले...।।

न करुणा किसी में न दया
न परोपकार भाव न हया

बस वासना का नामकरण
पहले प्रेम फिर पाणिग्रहण
स्वागत में पति का समर्पण
नयी नवेली दुल्हन का चरण

गृह में लाते ही हर क्षण
प्रताड़ना का पुष्प अर्पण
कुछ दिन में शुरू किया
ससुर ने जो जख्म दिया।।
उसे देखकर स्वर्गीय
सास का साँस अटक गया

स्वर्ग में पुनः एकबार
जैसे मैं आज बनी उनकी असली बेटी
पूर्वजों के पावन धरती पर
निर्दयी निर्लज्ज नाहक ही पटक गया

लक्ष्मी रूपी कच्चा घड़ा को
ऐसे हैं लाज समाज का सड़क पर लेटी


अकेल असहाय गीरे पत्तियों के भाँति
एक चतुर चिड़िया के घोसला में भाति।।
सूखी पत्तियाँ विपरीत परिस्थितियों में
तूफानी बारिश से शिशुओं को बचाती 

वही सूखी पत्तियाँ जो सड़क पर गिरी थी
पतझड़ से पहले ही लकड़हारे के जुल्म से
तंग होकर निःसहाय धरने के लिए
स्त्रियों के साथ घोर अन्याय हो

और पेड़ पर पड़ी रहें चुपचाप पत्तियाँ
यह अब हो नहीं सकता क्योंकि
शिक्षित हैं हरी पत्तियाँ सूखी पत्तियों के स्थान पर
एकजुट हो धरना प्रदर्शन की आन-बान-शान पर।।
नई राजनीति के रास्ते
मान-सम्मान के वास्ते

चुल्हा चौका का ज्ञान
छुपा नहीं सका पहचान
चूरते चावल का अनुभव
शंखनाद की कर्कश रव

सीधे मुख के बाणों पर बैठ
रे मंंतव्य गंतव्य पथ पर ऐंठ
चला परिधि से केंद्र की ओर
रे सन्नाटे में ख़ूब मचा है शोर।।
बात बात में बात को चखी
उल्लू कहती चुप रह सखी

शिघ्र रात ढ़लेगी होगी भोर
देख आया राष्ट्रीय पक्षी मोर
बुलबुल एकटक निहारी उसको
पकड़ रही है बारी बारी नस को

बोली जो पी रही बेचारी रस को
बहेलिया आने वाला है घसको
इस पेड़ से दूर निर्जन जंगलों में
कौन देखेगा दुनिया के दंगलों में।।
सताई हुई स्त्रियों के दर्द को
कौन अच्छा कहेगा मर्द को

जो चिड़ीमार है परिवार में
जो डूब गया है अहंकार में
सो रहे हैं पिता पुत्र पति पोढ़
पुरुष पुरुषार्थ का चादर ओढ़

प्यासे पक्षियों का गागर फोड़
मोक्ष रूपी परम आनंद छोड़
और कुछ नहीं चाहते तिनों
महात्मामहर्षिमर्द इन दिनों।।
लोकतंत्र का खेत कोड़
महामंत्र का जाप जीतोड़

कर रहे हैं महायज्ञ में हवि छोड़
स्त्री चेतना का साहित्य में होड़
इक्कीसवीं सदी का उत्थान है
इतिहासिक पन्नों पर ध्यान है

भावभूमि भविष्य का भान है
स्त्रीत्व इस कविता का जान है
सभ्यता का आचरण औरत
संस्कृति के शरण में बहुमत।।
सत्य वरण भरण-पोषण कर्ता
जगत जननी है दया-धर्म धर्ता

हड़प्पाकालीन मूर्ति मातृसत्ता
मानव विकास का प्रथम पता
पुरातात्विक उत्खनन आदि खोज
कागज़ पर कलम की ताकत रोज़

सत्यविचार-विमर्श व्यक्त कर रहा है
विनय-विवेक विशेष वक्त धर रहा है
समाज के श्यामपट्ट पर धीरे धीरे
माँ-बेटी बच गई खाईं में गीरे गीरे।।
घूँघट के लाज घिग्घी बँधना
कुटुंब नाव का लग्घी रखना

सहधर्मिणी के हाथ खेवाना
नदी बीच पत्नीव्रता ने ठाना
अवनि-अंबर का चुंबन क्षितिज
स्वयं अकेला गवाह बना भिज

प्रेमवर्षा के बूंदाबूंदी में ताक रहा
देखो कैसा परिवर्तन है काप रहा
थरथर-२ ,पुरूरवा गोधूलि वेला में
और पुरुषार्थ प्रेमक्रिड़ा के मेला में।।...

-युवा कवि गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिन्दू विश्वविद्यालय विद्यार्थी साहित्यकार】
नोट : उपर्युक्त रचना पक्तियाँ लम्बी कविता "कवि के भीतर स्त्री" से उद्धृत हैं। इस सम्पूर्ण कविता को पढ़ने के लिए इस नंबर 【+918429249326】 पर ह्वाट्सएप करें या golrndrapatel4512@gmail.com पर ईमेल करें।👉🇮🇳🤳निःशुल्क में पढ़ने के लिए आप तक लिंक भेज दिया जाएगा।

रचना प्रकाशित दिनांक : 10-04-2020

जन्म : 05-08-1999

शिक्षा : बी.ए.【बी.एच.यू.】

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल पटेल

काव्यगुरु : प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल【BHU】

आशीर्वाद : माता-पिता-गुरु एवं आपका।
रचनाएँ : कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ , साहित्य से संस्कार , बैरों से बदला (आत्मकथा) , घास एवं अन्य।
Facebook Page : 🙏🤳📱🇮🇳 https://www.facebook.com/golendrapatelkavi/
YouTube Channel : 🙏🤳📱🇮🇳 https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA
Blogger Page : 🙏🤳📱🇮🇳 https://golendragyan.blogspot.com/?m=1
स्थाई पता :
ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली ,उत्तर प्रदेश ,भारत।
अन्ततः आप सभी साहित्य प्रेमियों से साहित्यिक सहृदय सविनय निवेदन है कि आप उपरोक्त पेज़ व चैनल को लाईक व सब्सक्राइब कर ; इसे दिव्यांग विद्यार्थियों तक पहूँचाने का कृपा करें।

आत्मीय धन्यवाद!

-गोलेन्द्र पटेल

**एक नदी भीतर बहती** एक नदी भीतर बहती एक नदी बाहर प्रेम गली में कहती गीत गज़ल चलती कविता में दुःखी रहती संघर्ष सुख सहती द्वीप बीच अकेला हँसती धूप में धूल महती डाहती दुनिया से दहती कर्षित माँ बन वसुमती!! और नदी त्रासदी में पति समुद्र के संभोग से रति शब्द रहस्य पुत्र प्राप्ति सती समय की गति समझती सृष्टि में स्त्री यति सत्यमुर्ति करती ऋति सरस्वती-सी उसकी मति बह्मांड ॐ नारी नति दया करुणा स्नेह ज्योति भक्ति शक्ति सर्वोन्नति! ! सुबह शाम पूण्य प्रगति परमार्थ पथ पद्धति वाष्पित विज्ञप्ति विरचित प्रकाशित शीर्षक स्पंदित स्मृति में आई बन व्यक्ति उम्मीद ऊपर स्थित उर्वशी श्रद्धा इड़ा रति उत्तम उच्च उचित उदाहरण प्रस्तुत चरित महाकाव्य में वर्णित!! प्रसाद व दिनकर कथित साहित्य निधि कंपित उपनिषद् की उपस्थित स्त्री सत्य उपेक्षित उपदेश वचन-प्रति आज का नवोदित प्रगीत नई चेतना चित्त मीरा सुभद्रा वर्मा हित चाहती उज्जवल उत्साहित प्रकृति के साथ रेखांकित!! सुबह ओस सुधा से खिली कली कर्षित शाम तक रूपरस से सूरज को आकर्षित कर धीरे धीरे अपने देह को बुढ़ी करती सूख जाते हैं सपने भौरों के ,तरंग तैरती उमंग संग सहानुभूति रंग अनंत अनुभूति।। लाती लाद पीठ पर गाती गाद दीठ दर दुःख व दर्द असहनीय यथार्थ दृश्य अकथनीय वैसे घाव है हरती जैसे नाव है धरती स्त्री सूचक शब्द अनेक एक यहाँ से एक वहाँ से फेंक कभी नीचे से कभी ऊपर से केक ग्लोबल के गुरिया से काव्य-माला नेक।। भविता के स्त्रीत्व को पहनाती नदी नारी पृथ्वी के पास जाती संवेदना के सुमन का सुगंध सूँघने या धूप से सूखते शहद को सोखने साहित्य वाटिका में वटवृक्ष पर एक विशाल बनाना चाहती घर जिसे दुनिया कहती मधुमक्खियों की छत्ता वास्तव में वृक्ष के एकैक कली फूल व पत्ता समय के संदेश कटोरी में चापलूसी शब्दों के चोरी में।। भौरों को भोजन परोस सुबह शाम परम संतोष पा ,पाप-पुण्य का युद्ध भयंकर भूख के विरुद्ध कर ,काव्य की कहानी मकरंद-सी मिठी पानी बन सहृदय उपवन की प्यास बुझाती मन की सड़क के रोरी में माँ की लोरी में।। स्नेह व ममत्व भरी आँचल के ओरी में नवजात के लिए धरी नव चाशनी डोरी में ऊषा से आगे अरुणोदय ने प्रातःकाल उठ महोदय ने अपने औरत के आँसू ओस प्रेमरश्मि के किरणों से पोंछ एक स्त्री का पुरुष से नाता तीन रूप में गाता विधाता।। ओ कभी किसी की बेटी तो कभी किसी की पत्नी तो कभी किसी की माता जो नारी से ही नर है आता वही इन्हें जहाँ-तहाँ परिवार में पितृसत्तात्मक सत्ता से सताता जैसे नदी को यहाँ-वहाँ संसार में औद्योगीकरणवाद के आधुनिक नाले और भगवती पृथ्वी को प्लास्टिक भूख के जमीन पर भूखों को काले...।। न करुणा किसी में न दया न परोपकार भाव न हया बस वासना का नामकरण पहले प्रेम फिर पाणिग्रहण स्वागत में पति का समर्पण नयी नवेली दुल्हन का चरण गृह में लाते ही हर क्षण प्रताड़ना का पुष्प अर्पण कुछ दिन में शुरू किया ससुर ने जो जख्म दिया।। उसे देखकर स्वर्गीय सास का साँस अटक गया स्वर्ग में पुनः एकबार जैसे मैं आज बनी उनकी असली बेटी पूर्वजों के पावन धरती पर निर्दयी निर्लज्ज नाहक ही पटक गया लक्ष्मी रूपी कच्चा घड़ा को ऐसे हैं लाज समाज का सड़क पर लेटी अकेल असहाय गीरे पत्तियों के भाँति एक चतुर चिड़िया के घोसला में भाति।। सूखी पत्तियाँ विपरीत परिस्थितियों में तूफानी बारिश से शिशुओं को बचाती वही सूखी पत्तियाँ जो सड़क पर गिरी थी पतझड़ से पहले ही लकड़हारे के जुल्म से तंग होकर निःसहाय धरने के लिए स्त्रियों के साथ घोर अन्याय हो और पेड़ पर पड़ी रहें चुपचाप पत्तियाँ यह अब हो नहीं सकता क्योंकि शिक्षित हैं हरी पत्तियाँ सूखी पत्तियों के स्थान पर एकजुट हो धरना प्रदर्शन की आन-बान-शान पर।। नई राजनीति के रास्ते मान-सम्मान के वास्ते चुल्हा चौका का ज्ञान छुपा नहीं सका पहचान चूरते चावल का अनुभव शंखनाद की कर्कश रव सीधे मुख के बाणों पर बैठ रे मंंतव्य गंतव्य पथ पर ऐंठ चला परिधि से केंद्र की ओर रे सन्नाटे में ख़ूब मचा है शोर।। बात बात में बात को चखी उल्लू कहती चुप रह सखी शिघ्र रात ढ़लेगी होगी भोर देख आया राष्ट्रीय पक्षी मोर बुलबुल एकटक निहारी उसको पकड़ रही है बारी बारी नस को बोली जो पी रही बेचारी रस को बहेलिया आने वाला है घसको इस पेड़ से दूर निर्जन जंगलों में कौन देखेगा दुनिया के दंगलों में।। सताई हुई स्त्रियों के दर्द को कौन अच्छा कहेगा मर्द को जो चिड़ीमार है परिवार में जो डूब गया है अहंकार में सो रहे हैं पिता पुत्र पति पोढ़ पुरुष पुरुषार्थ का चादर ओढ़ प्यासे पक्षियों का गागर फोड़ मोक्ष रूपी परम आनंद छोड़ और कुछ नहीं चाहते तिनों महात्मामहर्षिमर्द इन दिनों।। लोकतंत्र का खेत कोड़ महामंत्र का जाप जीतोड़ कर रहे हैं महायज्ञ में हवि छोड़ स्त्री चेतना का साहित्य में होड़ इक्कीसवीं सदी का उत्थान है इतिहासिक पन्नों पर ध्यान है भावभूमि भविष्य का भान है स्त्रीत्व इस कविता का जान है सभ्यता का आचरण औरत संस्कृति के शरण में बहुमत।। सत्य वरण भरण-पोषण कर्ता जगत जननी है दया-धर्म धर्ता हड़प्पाकालीन मूर्ति मातृसत्ता मानव विकास का प्रथम पता पुरातात्विक उत्खनन आदि खोज कागज़ पर कलम की ताकत रोज़ सत्यविचार-विमर्श व्यक्त कर रहा है विनय-विवेक विशेष वक्त धर रहा है समाज के श्यामपट्ट पर धीरे धीरे माँ-बेटी बच गई खाईं में गीरे गीरे।। घूँघट के लाज घिग्घी बँधना कुटुंब नाव का लग्घी रखना सहधर्मिणी के हाथ खेवाना नदी बीच पत्नीव्रता ने ठाना अवनि-अंबर का चुंबन क्षितिज स्वयं अकेला गवाह बना भिज प्रेमवर्षा के बूंदाबूंदी में ताक रहा देखो कैसा परिवर्तन है काप रहा थरथर-२ ,पुरूरवा गोधूलि वेला में और पुरुषार्थ प्रेमक्रिड़ा के मेला में।।... -युवा कवि गोलेन्द्र पटेल 【काशी हिन्दू विश्वविद्यालय विद्यार्थी साहित्यकार】 नोट : उपर्युक्त रचना पक्तियाँ लम्बी कविता "कवि के भीतर स्त्री" से उद्धृत हैं। इस सम्पूर्ण कविता को पढ़ने के लिए इस नंबर 【+918429249326】 पर ह्वाट्सएप करें या golrndrapatel4512@gmail.com पर ईमेल करें।👉🇮🇳🤳निःशुल्क में पढ़ने के लिए आप तक लिंक भेज दिया जाएगा। रचना प्रकाशित दिनांक : 10-04-2020 जन्म : 05-08-1999 शिक्षा : बी.ए.【बी.एच.यू.】 माता : श्रीमती उत्तम देवी पिता : श्री नन्दलाल पटेल काव्यगुरु : प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल【BHU】 आशीर्वाद : माता-पिता-गुरु एवं आपका। रचनाएँ : कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ , साहित्य से संस्कार , बैरों से बदला (आत्मकथा) , घास एवं अन्य। Facebook Page : 🙏🤳📱🇮🇳 https://www.facebook.com/golendrapatelkavi/ YouTube Channel : 🙏🤳📱🇮🇳 https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA Blogger Page : 🙏🤳📱🇮🇳 https://golendragyan.blogspot.com/?m=1 स्थाई पता : ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली ,उत्तर प्रदेश ,भारत। अन्ततः आप सभी साहित्य प्रेमियों से साहित्यिक सहृदय सविनय निवेदन है कि आप उपरोक्त पेज़ व चैनल को लाईक व सब्सक्राइब कर ; इसे दिव्यांग विद्यार्थियों तक पहूँचाने का कृपा करें। आत्मीय धन्यवाद! -गोलेन्द्र पटेल


**एक नदी भीतर बहती**
एक नदी भीतर बहती
एक नदी बाहर

प्रेम गली में कहती
गीत गज़ल चलती
कविता में दुःखी रहती
संघर्ष सुख सहती

द्वीप बीच अकेला हँसती
धूप में धूल महती
डाहती दुनिया से दहती
कर्षित माँ बन वसुमती!!
और नदी त्रासदी में पति
समुद्र के संभोग से रति

शब्द रहस्य पुत्र प्राप्ति
सती समय की गति
समझती सृष्टि में स्त्री यति
सत्यमुर्ति करती ऋति

सरस्वती-सी उसकी मति
बह्मांड ॐ नारी नति
दया करुणा स्नेह ज्योति
भक्ति शक्ति सर्वोन्नति! !
सुबह शाम पूण्य प्रगति
परमार्थ पथ पद्धति

वाष्पित विज्ञप्ति विरचित
प्रकाशित शीर्षक  स्पंदित
स्मृति में आई बन व्यक्ति
उम्मीद ऊपर स्थित

उर्वशी श्रद्धा इड़ा रति
उत्तम उच्च उचित
उदाहरण प्रस्तुत चरित
महाकाव्य में वर्णित!!
प्रसाद व दिनकर कथित
साहित्य निधि कंपित

उपनिषद् की उपस्थित
स्त्री सत्य उपेक्षित
उपदेश वचन-प्रति
आज का नवोदित

प्रगीत नई चेतना चित्त
मीरा सुभद्रा वर्मा हित
चाहती उज्जवल उत्साहित
प्रकृति के साथ रेखांकित!!
सुबह ओस सुधा से
खिली कली  कर्षित

शाम तक रूपरस से
सूरज को  आकर्षित
कर धीरे धीरे अपने
देह को बुढ़ी  करती

सूख  जाते हैं  सपने
भौरों के ,तरंग तैरती
उमंग संग सहानुभूति
रंग   अनंत   अनुभूति।।
लाती लाद पीठ पर
गाती गाद दीठ दर

दुःख व दर्द असहनीय
यथार्थ दृश्य अकथनीय
वैसे घाव है हरती
जैसे नाव है धरती

स्त्री सूचक शब्द अनेक
एक यहाँ से एक वहाँ से फेंक
कभी नीचे से कभी ऊपर से केक
ग्लोबल के गुरिया से काव्य-माला नेक।।
भविता के स्त्रीत्व को पहनाती
नदी नारी पृथ्वी के पास जाती

संवेदना के सुमन का सुगंध सूँघने
या धूप से सूखते शहद को सोखने
साहित्य वाटिका में वटवृक्ष पर
एक विशाल बनाना चाहती घर

जिसे दुनिया कहती मधुमक्खियों की छत्ता
वास्तव में वृक्ष के एकैक कली फूल व पत्ता
समय के संदेश कटोरी में
चापलूसी शब्दों के चोरी में।।
भौरों को भोजन परोस
सुबह शाम परम संतोष

पा ,पाप-पुण्य का युद्ध
भयंकर भूख के विरुद्ध
कर ,काव्य की कहानी
मकरंद-सी मिठी पानी

बन सहृदय उपवन की
प्यास बुझाती मन की
सड़क के रोरी में
माँ की लोरी में।।
स्नेह व ममत्व भरी
आँचल के ओरी में

नवजात के लिए धरी
नव चाशनी डोरी में
ऊषा से आगे अरुणोदय ने
प्रातःकाल उठ महोदय ने

अपने औरत के आँसू ओस
प्रेमरश्मि के किरणों से पोंछ
एक स्त्री का पुरुष से नाता
तीन रूप में गाता विधाता।।
ओ कभी किसी की बेटी
तो कभी किसी की पत्नी

तो कभी किसी की माता
जो नारी से ही नर है आता
वही इन्हें जहाँ-तहाँ परिवार में
पितृसत्तात्मक सत्ता से सताता

जैसे नदी को यहाँ-वहाँ संसार में
औद्योगीकरणवाद के आधुनिक नाले
और भगवती पृथ्वी को प्लास्टिक
भूख के जमीन पर भूखों को काले...।।

न करुणा किसी में न दया
न परोपकार भाव न हया

बस वासना का नामकरण
पहले प्रेम फिर पाणिग्रहण
स्वागत में पति का समर्पण
नयी नवेली दुल्हन का चरण

गृह में लाते ही हर क्षण
प्रताड़ना का पुष्प अर्पण
कुछ दिन में शुरू किया
ससुर ने जो जख्म दिया।।
उसे देखकर स्वर्गीय
सास का साँस अटक गया

स्वर्ग में पुनः एकबार
जैसे मैं आज बनी उनकी असली बेटी
पूर्वजों के पावन धरती पर
निर्दयी निर्लज्ज नाहक ही पटक गया

लक्ष्मी रूपी कच्चा घड़ा को
ऐसे हैं लाज समाज का सड़क पर लेटी


अकेल असहाय गीरे पत्तियों के भाँति
एक चतुर चिड़िया के घोसला में भाति।।
सूखी पत्तियाँ विपरीत परिस्थितियों में
तूफानी बारिश से शिशुओं को बचाती 

वही सूखी पत्तियाँ जो सड़क पर गिरी थी
पतझड़ से पहले ही लकड़हारे के जुल्म से
तंग होकर निःसहाय धरने के लिए
स्त्रियों के साथ घोर अन्याय हो

और पेड़ पर पड़ी रहें चुपचाप पत्तियाँ
यह अब हो नहीं सकता क्योंकि
शिक्षित हैं हरी पत्तियाँ सूखी पत्तियों के स्थान पर
एकजुट हो धरना प्रदर्शन की आन-बान-शान पर।।
नई राजनीति के रास्ते
मान-सम्मान के वास्ते

चुल्हा चौका का ज्ञान
छुपा नहीं सका पहचान
चूरते चावल का अनुभव
शंखनाद की कर्कश रव

सीधे मुख के बाणों पर बैठ
रे मंंतव्य गंतव्य पथ पर ऐंठ
चला परिधि से केंद्र की ओर
रे सन्नाटे में ख़ूब मचा है शोर।।
बात बात में बात को चखी
उल्लू कहती चुप रह सखी

शिघ्र रात ढ़लेगी होगी भोर
देख आया राष्ट्रीय पक्षी मोर
बुलबुल एकटक निहारी उसको
पकड़ रही है बारी बारी नस को

बोली जो पी रही बेचारी रस को
बहेलिया आने वाला है घसको
इस पेड़ से दूर निर्जन जंगलों में
कौन देखेगा दुनिया के दंगलों में।।
सताई हुई स्त्रियों के दर्द को
कौन अच्छा कहेगा मर्द को

जो चिड़ीमार है परिवार में
जो डूब गया है अहंकार में
सो रहे हैं पिता पुत्र पति पोढ़
पुरुष पुरुषार्थ का चादर ओढ़

प्यासे पक्षियों का गागर फोड़
मोक्ष रूपी परम आनंद छोड़
और कुछ नहीं चाहते तिनों
महात्मामहर्षिमर्द इन दिनों।।
लोकतंत्र का खेत कोड़
महामंत्र का जाप जीतोड़

कर रहे हैं महायज्ञ में हवि छोड़
स्त्री चेतना का साहित्य में होड़
इक्कीसवीं सदी का उत्थान है
इतिहासिक पन्नों पर ध्यान है

भावभूमि भविष्य का भान है
स्त्रीत्व इस कविता का जान है
सभ्यता का आचरण औरत
संस्कृति के शरण में बहुमत।।
सत्य वरण भरण-पोषण कर्ता
जगत जननी है दया-धर्म धर्ता

हड़प्पाकालीन मूर्ति मातृसत्ता
मानव विकास का प्रथम पता
पुरातात्विक उत्खनन आदि खोज
कागज़ पर कलम की ताकत रोज़

सत्यविचार-विमर्श व्यक्त कर रहा है
विनय-विवेक विशेष वक्त धर रहा है
समाज के श्यामपट्ट पर धीरे धीरे
माँ-बेटी बच गई खाईं में गीरे गीरे।।
घूँघट के लाज घिग्घी बँधना
कुटुंब नाव का लग्घी रखना

सहधर्मिणी के हाथ खेवाना
नदी बीच पत्नीव्रता ने ठाना
अवनि-अंबर का चुंबन क्षितिज
स्वयं अकेला गवाह बना भिज

प्रेमवर्षा के बूंदाबूंदी में ताक रहा
देखो कैसा परिवर्तन है काप रहा
थरथर-२ ,पुरूरवा गोधूलि वेला में
और पुरुषार्थ प्रेमक्रिड़ा के मेला में।।...

-युवा कवि गोलेन्द्र पटेल

【काशी हिन्दू विश्वविद्यालय विद्यार्थी साहित्यकार】
नोट : उपर्युक्त रचना पक्तियाँ लम्बी कविता "कवि के भीतर स्त्री" से उद्धृत हैं। इस सम्पूर्ण कविता को पढ़ने के लिए इस नंबर 【+918429249326】 पर ह्वाट्सएप करें या golrndrapatel4512@gmail.com पर ईमेल करें।👉🇮🇳🤳निःशुल्क में पढ़ने के लिए आप तक लिंक भेज दिया जाएगा।

रचना प्रकाशित दिनांक : 10-04-2020

जन्म : 05-08-1999

शिक्षा : बी.ए.【बी.एच.यू.】

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल पटेल

काव्यगुरु : प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल【BHU】

आशीर्वाद : माता-पिता-गुरु एवं आपका।
रचनाएँ : कविता का कर्षित कृषक पुत्र हूँ , साहित्य से संस्कार , बैरों से बदला (आत्मकथा) , घास एवं अन्य।
Facebook Page : 🙏🤳📱🇮🇳 https://www.facebook.com/golendrapatelkavi/
YouTube Channel : 🙏🤳📱🇮🇳 https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA
Blogger Page : 🙏🤳📱🇮🇳 https://golendragyan.blogspot.com/?m=1
स्थाई पता :
ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली ,उत्तर प्रदेश ,भारत।
अन्ततः आप सभी साहित्य प्रेमियों से साहित्यिक सहृदय सविनय निवेदन है कि आप उपरोक्त पेज़ व चैनल को लाईक व सब्सक्राइब कर ; इसे दिव्यांग विद्यार्थियों तक पहूँचाने का कृपा करें।

आत्मीय धन्यवाद!

-गोलेन्द्र पटेल

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि — गोलेन्द्र पटेल

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि इन दिनों आँखें बंद होने पर तथागत बुद्ध नज़र आ रहे हैं और खुली होने पर कबीर मैं भाषा में ही नहीं भूमि पर...