Wednesday, 12 August 2020

ईदगाह : मुंशी प्रेमचंद

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी: -

"ईदगाह"


# पढ़िये_प्रेमचंद_जी_की_कहानी

# ईदगाह

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रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूरज देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की जीत दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दे। ईदगा से लौटते-लौटते दोपहर हो जायगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलने-भेंटना, दोपहर के पहले लौटना असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा खुश हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। ' रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। उनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रतेते थे, आज उसने जोड़ा। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते हैं। उन्हें गृहस्थी की गतिविधियों से क्या प्रक्रिया! सेजीवियों के लिए दूध ओर शकर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवेयाँ खायेंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर है कि चौधरी आँखें बदल देती हैं, तो यह सारा ईद मुहर्रम हो जाएगा। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से आंसर निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर से रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस, -बारह, उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं एंजिनती पैसों में एंजिनती चीजें लायेंगें- खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंदबाज और जाने क्या-क्या। और सबसे ज्यादा प्रसन्न हामिद है। वह चार-पाँच साल का गरीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गयी। किसी को पता है कि बीमारी क्या है कहती तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया था तो संसार से विदा हो गयी। अब हमीद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उसी तरह प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपये कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियाँ के बारे में आयेंगे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने वाले हैं, इसलिए हमीद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी बात है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पहाड़ बना लेती है। हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर वह भी प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें बारे आयेंगी, तो वह दिल से अरमान लेगा। तब देखोगे, मोहसिन, न्योर और सम्मी कहां से उतने पैसे निकालेंगे। अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता है, तो इसी तरह ईद आती है ओर चली जाती है! इस अंधेरे और निराशा में वह डूबी रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं है, लेकिन हमीद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दल-बल लेकर आये, हामिद की आनंद-भरी चितवन उसकी विध्वंस कर रही होगी।


हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है- आप डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आउंगा। बिल्कुल न डरना।


अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हमीद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे अकेले मेले जाने दे वह भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो गया तो क्या होगा? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्ही-सी जान! तीन कोस चले गए कैसे? पैर में छाले पड़ जायेंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहाँ से निवयाँ कौन पकायेगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहाँ तो घंटे चीजें जमा करते होंगे। माँगे का ही तो भरोसा रुक जाएगा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को विश्वास की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गयी तो क्या करती है? हामिद के लिए कुछ नहीं है, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने वाले पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटवे में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार है, अल्लाह ही बेदरा पार लगावे। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और वादिहारिन तो आयेंगी। सभी को सेवैयाँ चाहिए और थोड़ा किसी को लगता नहीं है। क्या-क्या सेंव मुँह चुरायेगी? और मुँह क्यों शैराये? साल भर का त्यौहार है। ज़िंदगी ख़ैरियत से रही, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखा, यें दिन भी कट जायँगे।


गाँव से मेला गया। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते हैं। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होने के साथ लोगों का इंतज़ार करते हैं। यह लोग क्यों बहुत धीरे-धीरे चल रहे हैं? हमीद के पैरो में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बाग हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और ली फसल लगी हैं। कभी-कभी कोई गायकेबेरी उठाकर आम पर मार्कर लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फर्लांग पर हैं। एसए हंसों रहे हैं। माली को कैसा उल्लू बनाया है।


बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालाज है, यह क्लब-घर है। इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ेंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जा रहे हैं। न जाने कब तक पढ़ा जाएगा और क्या पढ़ेगा! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हैं, बिल्कुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस स्थान पर भी उसी तरह के लोग होंगे। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहाँ मुर्दो की खोपड़ियाँ दौड़ती हैं। और बड़े-बड़े तमाशे होते हैं, पर किसी को अंदर नहीं जाना पड़ता है। और शाम शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हैं, मूँछो दाढ़ी वाले। और मेमेंट भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्माँ को यह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सकता। घुमाते ही लुढ़क जायँ।


महमूद ने कहा- हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँप लगे, अल्ला कसम।


मोहसिन बोला- चलो, मंस आटा पीस डालती हैं। ज़रा-सा बैट पकड़ लेंगी, तो हाथ काँप लगेंगे! सैकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पांच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी स्मृति को एक घड़ा पानी भरना पड़ता है, तो आँखों तले अँधेरा आ जाय।


महमूद- लेकिन दौड़ती तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकती।


मोहसिन- हाँ, अपल-कूद तो नहीं मयंक; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गयी थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्माँ इतनी तेज दौड़ीं कि मैं उन्हें न पाऊँ, सच।


आगे चले गए। हलवाईयों की दुकानें शुरू हुईं। आज कल सजी हुई थीं। तो मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होगा। सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दुकान पर जाता है और जैसा माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रूप में देता है, बिल्कुल ऐसे ही रूप।


हामिद को यकीन नहीं आया- ऐसे रु जिन्नात को कहां से मिल जाएंगे?


मोहसिन ने कहा- जिन्नात को रुपया की क्या कमी? जिस खजाने में चाहत चली गई। लोहे के दरवाजे तक उन्हें रोक नहीं सकते जनाब, आप कौन से फेर में हैं! हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों ने दे दिया। अभी यहीं बैठे हैं, पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जायँ।


हामिद ने फिर पूछा- जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं?


मोहसिन- एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाय तो उसका सिर आसमान से लगे हुए, लेकिन चाहे तो एक लोटे में घुस जाना।


हमीद- लोग उन्हें कितना खुश करेंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिन्न को खुश कर लूँ।


मोहसिन- अब यह तो मै नहीं जानता, लेकिन चौधरी साहब के ओवर में बहुत-से जिन्नात हैं। कोई चीज चोरी जाना चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता देंगे। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान होकर, कहीं न मिला तो झख मारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरन्त बताया, मवेशींच में है और वहीं मिला है। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।


अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास कितना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है।


आगे चले गए। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कनिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फोल्ड! रात को बेचारे घूमने-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जायँ। मोहसिन ने प्रतिवाद किया-यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं? केवल आप बहुत जानते हो अजी हजरत, यह चोरी करते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हैं, सब इनसे मिले रहते हैं।त्र को ये लोग चोरों से तो कहते हैं, चोरी करो और तुम दूसरे मुहल्ले में जाकर ते जते रहो! जते रहो! ' पुकारते हैं। केवल इन लोगों के पास इतने रुपए आते हैं। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हैं। बीस रूपया महीना पाते हैं, लेकिन पचास रुपये घर भेजते हैं। अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रुपए कहां से पाते हैं? हँसकर कहने लगे- बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही बोले-हम लोग चाहते हैं तो एक दिन में लाखों मारें। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।


हामिद ने पूछा- यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई उन्हें पकड़ता नहीं है?


मोहसिन उसकी नादानी पर दया करके बोला- अरे, पागल! कौन पकड़े! पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, उन्हें सजा भी बहुत देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गयी। सा लेई-पूँजी जल जोड़ा। एक रसोईघर तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोये, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिर न जाने कहां से एक सौ कर्ज लाई तो रसोई-भांडे आये।


हामिद-एक सौ तो पचास से ज्यादा होते हैं?


'कहाँ पचास, कहाँ एक सौ। इक्यावन थैली-भर होती है। सौ तो दो थैलियों में भी न आये?


अब बस्ती घनी होने लगी। ईदगाह जानेवालों की टोलियाँ नजर आने लगी। एक से एक भोरले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में रहने वाले, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते हैं और पीछे से बार-बार हसन की आवाज होने पर भी न तत। ” हमीद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।


सहसा ईदगा नजर आयी। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम बिछा हुआ है। और रोज़ेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक गयी गयी हैं, पक्की कतर के नीचे तक, जहाँ जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहां कोई धन और पद नहीं देखता है। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुंदर संचालन है, सुंदरी व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं, और एक साथ घनों के बल बैठ जाते हैं। कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ गई, और यही बिजली बच सकती है। कितने अपूर्व दृश्य थे, जिनके सामूहिक क्रियाकलाप, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, अभि और आत्मानंद से भरे हाथों थे,


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नमाज खत्म हो गयी है। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह समूह इस विषय में बालकों से कम आयु का नहीं है। यह देखो, हिंडोला के पास एक पैसा है। कभी आसमान पर जाते हैं मालूम पड़ने, कभी जमीन पर गिरते हुए। यह चढ़ी है, लकड़ी के हाथी, घोड़ों, ऊँट, छड़ों में लटके हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओर सम्मी इन घोड़ों ओर ऊँतों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक हिस्सा जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।


सब चर्सेस से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। इधर दूकानों की कतार लगी है। तरह-तरह के खिलौने हैं-सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबिन और साधु। वाह! कितने सुंदर खिलौने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता है, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधे पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता है, अभी कवायद किए गए आ रहा है। मोहसिन को भिक्षा पसंद आई। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखी हुई है। मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी उड़ेलना ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसे विद्वमता उसके मुखिया पर है! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिये हुए। मालूम होता है, अभी तक किसी भी अदालत से जिरह या बहस किए गए आ रहे हैं। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हमीद के पास कुल तीन पैसे हैं, कई महँगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट गया तो चूर-चूर हो जाय। जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाना। इस तरह के खिलौने वह क्या करेगा; क्या काम के!


मोहसिन कहते हैं- मेरा भिश्ती रोज़ पानी दे जायगा साँज़-सबेरे।


महमूद- और मेरा सिपाही घर का पहरा कोई चोर आयेगा, तो फौरन तोप से फैर कर देगा।


नूरे- और मेरा वकील हत्या मुकदमा लड़ेगा।


सम्मी- और मेरी धोबिन रोज कपड़े धोयेगी।


हामिद खिलौनों की निंदा करता है- मिट्टी ही के तो हैं, गिरें तो चकनाचूर हो जायँ, लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता है। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतनी त्यागी नहीं होते हैं, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद लालचता रह जाता है।


खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ ली हैं, किसी ने गुलाबजुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हमीद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। कुछ खाते क्यों नहीं? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है।


मोहसिन कहता है- हामिद रेवड़ी ले जा, कितना गुस्सादार है!


हामिद को संदेह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है।] मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हमीद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद, नूरे और सम्मी खुद्दार बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।


मोहसिन- अच्छा, अबकी जरूर करेंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जाव


हमीद- रहो रहो। मेरे पास क्या पैसे नहीं हैं?


सम्मी- तीन ही पैसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगे?


महमूद- हमसे गुलाबजाम ले जाव हामिद। मोहमिन बदमाश है


हामिद- मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं।


मोहसिन- लेकिन दिल में कह रहे होंगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?


महमूद- हम समझते हैं, इसकी चालकी। जब हमारा सारा पैसा खर्च हो जाएगा, तो हमें ललचा-ललखकर खायेगा।


मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली आभूषणों की। लड़कों के लिए यहां कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पर रूक जाता है। कई हंटरटे रखे गए थे। उसे खयाल आया, दाद के पास हंटरटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह प्रेमातो ले गो ग्रैंड को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगा! फिर उनकी कार्यप्रणाली कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जायगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई आंख उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जायेंगे या छोटे बच्चे जो मेले में नहीं आये हैं जिद कर के ले जायेंगे और तोड़ डालेंगे। कटाक्ष कितने काम की चीज है। रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो। कोई आग पसंदने आये तो चटपट चूल्हे से आग हटाकर उसे दे दो। अम्माँ बेचारी को कहाँ फुरसत है कि बाज़ार आयें और बहुत पैसे ही कहाँ मिलते हैं? रोजाना हाथ जलाने वाली लाती हैं।


हमीद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सब-के-सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं। तो मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलते हैं। मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछेंगे। खायें मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुन्सियाँ बाहर निकल जाएँगी, आप ही भाषण चटोरी हो जाएँ। तब घर से पैसे चुरायेंगे और मार खायेंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हैं। मेरा भाषण क्यों खराब होगा? अम्माँ लाशटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लैनगी और सागी-मेरा बच्चा अम्माँ के लिए हंटर लाया। कितना अच्छा लड़का है इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुःख देगा? बड़ों की दुआएं सीधी अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। मेरे पास पैसे नहीं हैं।तभी तो मोहसिन और महमूद यों मिजाज दिखाते हैं। मैं भी इनसे मिजाज दिखावागा। खिलौनों और खानों मिठाइयाँ खेलें। मै नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिजाज क्यों सहूँ? मैं सही हूँ, किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता। आखिर अब्बाजान कभी नान न कभी आयेंगे। अम्मा भी आयेंगी ही। फिर इन लोगों से पूछेंगे, हाउ टॉय पीपुल? एक-एक को टोकरियाँ खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जाता है। यह नहीं है कि एक पैसे की रेवड़ियाँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब लोग हँसेंगे कि हामिद ने लाशटा लिया है। हँसें! मेरी बला से। उसने दुकानदार से पूछा- यह लाशटा कैसे का है?


दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा- तुम्हारे काम का नहीं है जी!


'बिकाऊ है कि नहीं?'


'बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहाँ क्यों लाद लाई हैं? '


तो बताते हैं कि क्यों नहीं, पैसा पैसा का है? '


'छ: पैसे लगेंगे।'


हमीद का दिल बैठ गया।


'ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।'


हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा- तीन पैसे लोगे?


यह कहता है कि वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दी। कहकर हंटरटा दे दी। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाएँ करते हैं!


मोहसिन ने हँसकर कहा- यह लाशटा क्यों लाया पगले, यह क्या करेगा?


हामिद ने लाशटे को जमीन पर पटककर कहा- जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सा पसलियाँ चूर-चूर हो जायँ बच्चू की।


महमूद बोला-तो यह लाशटा कोई खिलौना नहीं है?


हमीद- खिलौना क्यों नहीं है! अभी कंधे पर रखे, बंदूक हो गयी। हाथ में ले लिया, फकीरों का लाशटा हो गया है। चाहूँ तो इससे मजीरे का काम ले सकता हूँ। एक लाशटा जमा दूँ, तो आप लोगों के सभी खिलौनों की जान निकल जाएगी। आपके खिलौने कितने ही जोर देने वाले हैं, मेरी लाशटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकता। मेरा बुरा शेर हंटरटा है।


सम्मी ने खँजरी ली थी। अनंत तक बोला- मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।


हामिद ने खँजरी की ओर से अनदेखी की- मेरी लाशटा चाहे तो आपकी खँजरी का पेट फाड़ पड़े। बस, एक कुत्ते की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाओ तो खत्म हो जाओ। मेरा बुरा लाशटा आग में, पानी में, आँधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।


लाशटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास हैं? फिर मेले से दूर निकल आये हैं, नौ कब के बाज अय्य, धूप तेज हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही है। बाप से जिद भी करें, तो लाशटा नहीं मिल सकता था। हमीद बड़ा चालाक है। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचाए रखे थे।


अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रार्थ हो रहा है। सम्मी तो विधायक हो गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने बारे में फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाय तो मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जायँ, मियाँ सिपाही मिट्टी की तोप को छोड़कर भागें, वकील साहब की नानी मर जाय, चोगे में मुँह छिपाकर जमीन पर लेट जायँ। लेकिन यह लाशटा, यह बग, यह रूस्तम-ना लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जायगा और उसकी आवाज़ लेगा।


मोहसिन ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर कहा- अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?


हामिद ने लाशटे को सीधा खड़ा करके कहा- भिश्ती को एक डाँट उल्लेखगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वादर पर छिड़कने लगेगा।


मोहसिन राष्ट्रस्त हो गए, महमूद ने कुमुक पहुँचाई- अगर बच्चा पकड़ जायँ तो अदालत में बँधे-बँधे फिर करेंगे। तब तक वकील साहब के पैर पड़ेंगे।


हमीद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सके। उन्होंने पूछा- हमें पकड़ने कौन आया?


नूरे ने अकड़कर कहा- यह सिपाही तोपवाला।


हमीद ने मुँह चिढ़ाकर कहा- यह बेचारे हम बहादुर रूस्तम-हिं को पकड़ लेंगे! अच्छा लो, अभी जरा कुश्ती हो जाओ। इसकी सूरत देखकर दूर से भाग जाएगा। क्या कमज़ोर होगा!


मोहसिन को एक नए अंक में जोड़ा गया है।


उन्होंने समझा था कि हमीद लाजवाब हो जायगा, लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया- आग में बादल ही कूदते हैं जनाब, आपके यह वकील, सिपाही और अलंशी लौंडियों की तरह घर में घुस जायेंगे। आग में कूदना वह काम करता है, जो यह रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।


महमूद ने एक जोर लगाया- वकील साहब कुरसी-मेज पर बैठेंगे, तुम्हारा हंटरटा तो बावरचीख में जमीन गिर गई होगी।


इस तर्क में सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया गया! कितनी ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने! लाशटा बावरचील्ड में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?


हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धाँधली शुरू की- मेरा हंटरटा बावरचीशन में नहीं रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे, तो उन्हें जमीन पर पटक देंगे और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा।


बात कुछ बनी नहीं। खासी गाली-गलौज थी; लेकिन कानून को पेट में डालने वाली बात को जोड़ा गया। ऐसा मिश्रित जोड़ा कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलेचा कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गए हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज़ है। उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखता है। हमीद ने मैदान मार लिया। उसकी लाशटा रूस्तमे-हिन्द है। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती है।


विजेता को हारनेवालों से जोइट्स मिलो स्वाभविक है, वह हामिद को भी मिला। एंडों ने तीन-तीन, चार-चार आने वाले पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज न ले सकी। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जायँगे। हमीद का लाशटा तब बना रहेगा बरनोस?


संधि की परिभाषाएँ होने लगीं। मोहसिन ने कहा- जरा अपना लाशटा दो, हम भी देखें। आप हमारा अल्पांश के बारे में देखें


महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।


हामिद को इन शर्तों को मानने में कोई आपत्ति न थी। लाशटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आये। कितने सुंदर खिलौने हैं।


हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे- मैं तुमसे चिढ़ा रहा था, सच! यह लाशटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले।


लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। लाशटे का सिक्का खूब बैठ गया है। छड़ी हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।


मोहसिन- लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?


महमूद- दुआ को लिये फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्माँ जरूर सगी कि मेले में वह मिट्टी के खिलौने मिले?


हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होगी, जैसा कि ग्रैंड हंटरटे देखकर देखना होगा। तीन पैसों ही में तो उसे सब कुछ करना था उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी। फिर अब तो लाशटा रूस्तमें-हिन्द की ओर से सभी खिलौनों का बादशाह है।


रास्ता में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने खाना खाने को कहा। महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके दूसरे दोस्त मुंह ताकते रह गए। यह उस शगुन का प्रसाद था।


3


ग्यारह बजे गाँव में हलचल मच गयी। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जापली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रही और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दानों खुब रोये। उनकी अम्माँ यह शोर सुनकर बिगड़ीं और दोनों को ऊपर से दो-दो चारटे और लगाये।


मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके सेवानिवृत्तिुकुल इससे बहुत गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक पर तो बैठ नहीं सकते। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गयी। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजते हैं। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालतों में खस की टट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं। यहाँ क्या आधुनिक पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाती है कि नहीं? बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगे। मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंछ की चोटों से वकील साहब सुपगलोक से मृत्युलोक में आ रहे हैं और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गयी।


अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति नहीं तो, जो अपने पैरों को झुकता है। वह पालकी पर चला गया। एक टोकरी आयी, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाये गए, जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने दरवाजे का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह 'छोनेवाले, जते लहो' पुकारते हैं। रात को तो अँधेरी ही होनी चाहिए। महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बन्दूक के जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है।


महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला है जिससे वह टूटी टाँग को आनन-फानन जोड़ सकती है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जवाब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठो तो सकता है। एक टाँग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका उतना रूपांतर चाहना, कर सकता है। कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।


अब मियाँ हामिद का हालिटा। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में लाशटा देखकर वह चौकी।


'यह हंटरिटो कहाँ था?'


'मैंने मोल लिया है।


'कैद का पैसा?'


'तीन पैसे वाले।'


अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेअज़्ज़ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ बात न पिया। लाओ क्या, झाड़ू! 'सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का हंटरटा उठा लाया।


हामिद ने अपराधी भाव से कहा-तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे लिया।


बुढ़िया का गुस्सा तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रकटलभ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देती है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कैसा व्यवहार और कैसा विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना बाहर कैसे हुआ? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्घग हो गया है।


और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हमीद के इस शौक से भी ग्राफिक। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का भाग खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गयी। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएं देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती चली जाती थी। हमीद इसका रहस्य क्या है!

गोलेन्द्र पटेल

संपर्क सूत्र: -

corojivi@gmail.com


Monday, 10 August 2020

वरिष्ठ कवयित्री डॉक्टर रचना शर्मा मैम का १२ "कोरोजीवी प्रेम कविताएँ""

 ◆डॉक्टर रचना शर्मा मैम का 12 "कोरोजीवी कविता"

1.
यौवन की दहलीज़ पर
खड़ा मन
कैसे ढ़ो पाया होगा
सूखी लकड़ियों का गठ्ठर अपने  सिर पर
जब ओढ़नी चाहिए थी उसे
लाल चुनरिया गोटे वाली ।

उसके उम्र की लड़कियाँ
जब अपने बच्चे को  छाती से लगाये
सोती होंगी सर्द रातों में
अपनी ममता को संतुष्ट करती
चैन की नींद ।
उस उम्र में अन्तस के वात्सल्य को
आले में एक कोने में छुपा कर
कैसे रखा होगा उसने गठ्ठर
अपने सिरहाने ।

जब सब कस रहे थे
अपने सपनों को
श्रम की कसौटी पर
जी रहे थे भरपूर जीवन प्रिय की कोमल बाँहों में
वह चल रही थी लगातार
अपने जिस्म की आग को राख करती
गठरी और पगडंडी के बीच सामंजस्य बैठाती
उस रास्ते पर
जो किसी ठौर तक नहीं जाते थे।

बुधनी हो या मीता
दूसरों के लिए जीवन भर गठ्ठर ढोती स्त्री को
नहीं पता होता
वह स्वयं ही दे रही है
स्वयं को मुखाग्नि ।---------रचना।
2.
समय कब रूका है
किसी की मुँडेर ।

वह तो झप्प से उड़ जाता है
जैसे आँख खुलते ही
खट्ट से खो जाता है सपना
गुम हो जाता है तुम्हारा चेहरा ।

मैं फिर से करने लगती हूँ
रात होने की प्रतीक्षा
जी सकूँ
सुकून के दो पल तुम्हारे साथ ।

काश विरह भी होता समय की तरह
आँख खुलते ही
झप्प से उड़ जाता
हमारी मुँडेर से । -------रचना ।
3.
तुम्हारा प्यार
मुझमें असीमित संभावनाओं को जन्म देता है
जैसे मिट्टी जन्म देती है
सुन्दर फूलों और फलों को
बादल के बरसने पर ।

तुम्हारा प्यार
भरता है मुझमें सोंधी गन्ध
एक एहसास से ऊर्जित रहती हूँ
आस पास हरीतिमा भरते तुम्हारे शब्द
मुझमें स्पंदित रखते हैं
स्त्री होने के भाव को ।

प्यार में होना
जीवन की उच्चता में होना है । ------रचना ।

4.
मेघ आये द्वार हमारे
आओ चलें आँचल फैलायें
समेट लायें वर्षा की बूँदें |
तपते - तपते तन को मन को
शीतल - निर्मल करनेवाली 
रिमझिम - रिमझिम गिरती झरती
बर्फीली सी , कुछ शर्मीली
मुझको जीवन देती है |

धरती को रंग देने वाली
वृक्षों को धो देने वाली
नदियों में लहरें भर देती
मन में नया उमंग - उल्लास |
छोटी - छोटी पर बलवान
खुद में भर ताकत अपार
सब को जीवन दे जाती हैं |

मत रोको अब खुद को घर में ,
आँगन में आओ सब भींगो
बूंदों से तुम जीना सीखो 
सबको जीवन देना सीखो | ..................... रचना |
5.
मेरे लिए तुम्हारे आँखों की  घृणा
मेरी उपलब्धियों पर तुम्हारी ख़ामोशी
कुछ भी श्रेष्ठ मेरे पास न हो इसकी कामना
कोई भी मुझसे प्यार न करे इसकी प्रार्थना
और मेरे आस-पास के लोगों में
मेरे प्रति घृणा भरने की कोशिश
मुझे कोई कुछ न दे यह भावना 
इन सब ने मुझे योग्य और मजबूत बनाने में
बड़ी भूमिका निभायी है
मैं तुम्हारी घृणा और तुम्हारे असहयोग के लिए
तुम्हारी उतनी ही ऋणी हूँ
जितना कोई सुडौल घड़ा
होता है ऋणी
कुम्हार के प्रति ।

मैं अब तैयार हूँ और भी ज्यादा
आग में तपाये जाने के लिए
मेरी प्रार्थना है
मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया जाये 
मुझमें नमी रहेगी तो मैं
नव सृजन करूँगी
कर्मठता होगी तो
अन्तिम साँस तक लड़ूँगी । ---------रचना।
6.
उसकी महफिल में मेरे जाने पर इतनी पाबन्दियाॅ थीं
हमारी मुलाकात भी होती तो किस तरह होती  
मिल जाता गर  कोई शख्स रस्ते में आता जाता
पूछ लेती हाल उसकी बीमारियों का मैं 
रहना फिक्रमंद मेरी आदत तो न थी कभी    
वो शख्स ऐसा था कि फिर फिर याद आता था---   रचना
7
वह मेरे भाल  पर लिखता रहा अपना नाम
मैं खामोश चुपचाप 
उसके कंधे पर  सिर टिकाए बैठी रही ।

कई दिनों तक यूं ही ख़ामोश
जैसे कोई शब्द ना हो मेरे पास ।

ऊँनींदी सी  उन आंखों को मैं
खोलना भी नहीं चाहती थी
पलकों पर रखे  ख्वाब खहीं गिर ना जाए
जबकि मैं कहना चाहती थी बहुत कुछ
बहुत कुछ पूछने और जानने के लिए भी था मेरे पास
पर सच है
कुछ क्षण ख़ामोशी में ही
जिये जाने चाहिए
प्रेम
खामोशी में भी बहुत कुछ कहता है।-------रचना ।
8.
पर्यावरण दिवस पर विशेष।

मुट्ठी भर छावं  .................

यहाँ से वहाँ तक
फैली धरती पर
अनगिनत संख्या में लगे हैं
वृक्ष |
पर कोई घना छायादार नहीं
कुछ की ऊँचाई तो
आश्रितों से भी कम
कुछ इतने ऊँचे
कि
आश्रयदाता हो ही नहीं सकते |

शायद
वातावरण में फैली विसंगतियों ने
मनुष्य के साथ ही
छीन लिये हैं
वृक्षों के भी संस्कार |

या फिर
लोगों ने ही
बंद कर दिये हैं लगाने
ऊँचाइयों से
धरती की ओर जानेवाले
जड़ों से युक्त
वटवृक्ष |

आओ
हम सब प्रण करें
और लगायें
मात्र एक ऐसा वृक्ष
जिसकी जड़ें
धरती में गहरा जाएँ
और जो
भविष्य में हमें दे सके
निर्मल निश्छल
मुट्ठी भर छावं |.................रचना |
9.
कुछ अलग सी बस्तियों में
दोस्त अब रहने लगे हैं
जो कभी हमनवा थे
अजनबी लगने लगे हैं |

डरी हुयी आँखें हैं सबकी
मुस्कुराहटें ठहरी हुयी हैं
खोयी खिलखिलाहटें हैं सबकी
मुलाकातें अजनबी हुयी हैं |

मौत के डर से हैं सहमें
चाहतों के सिलसिले
जो गले लगते थीं हरदम
बाहें वो अजनबी हुयी हैं |

कुछ अलग सी बस्तियों में
दोस्त अब रहने लगे हैं
जो कभी हमनवा थे
अजनबी लगने लगे हैं |---------------रचना |
10.
जैसे किसी ने लूट लिया हो
मेरा खजाना
ऐसा था माँ
तुम्हारा जाना ।

***********************
नहीं पहुँच पाता था
कोई आघात
मुझ तक
तुम
कवच थी माँ ।

************************

दुःख
लांघते नहीं थे देहरी
जब
तुम साथ थी माँ ।

***************************
जब-जब
ठण्डी हवा चली
तुम बहुत याद आयी
माँ ।                         -------------------------रचना ।
11.
कभी साथ तेरे
दीप दो
गंगा में प्रवाहित कर सकूँ
कर सकूँ मैं आचमन
संग में तुम्हारे
और मेरे भीगे ललाट पर तुम
रक्तिम चंदन की टिकुली लगा
शेष मेरी माँग में छुआ दो
पूर्ण समझूँगी उसी दिन शिवार्चन को ।-------रचना।
12.
एक शाम
आँख में रुका सपना ढलक गया
सिन्दूरी रंग बिखर गया
शाम के धुँधलके में
एक साया जो अलग हुआ
अपनी सुगन्ध छोड गया
भटकती रह गयी मैं
जैसे मृग ।--------रचना ।

साहित्यिक परिचय :-

            बनारस में जन्मी,पली बढी और वर्तमान में बनारस के  ही राजकीय महिला महाविधालय में बतौर एसोसिऐट प्रोफेसर अध्यापन कर रही कवयित्री रचना शर्मा ने स्नातकोत्तर डिग्री करने के बाद पी-एच डी की। बनारस में जन्मी,पली बढी हैं, जाहिर है साहित्य और संस्कृति से लगाव पैदाइशी है। रचना शर्मा की कविताएं और लेख हिन्दुस्तान, कादम्बिनी,सोच विचार, गर्भनाल,क‍विताम्भरा,प्रज्ञा पथ,उत्तर प्रदेश आदि पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है ।अभी तक उनके तीन कविता संग्रह अंतर पथ(2012), नींद के हिस्से में कुछ रात भी आने दो (2015) तथा नदी अब मौन है(2019)  प्रकाशित हो चुके है। इसके अलावा एक निबन्ध  संग्रह पुरातन संस्कृ्ति अधुनातन दृष्टि (2019) तथा काशी के पौराणिक इतिहास पर आधारित पुस्तक काशीखण्ड और काशी प्रकाशित (2010)हो चुकी है । रचना शर्मा 70 राष्ट्रीय  एवं 20 अर्न्तराष्ट्रीय स्तर की संगोष्टियों में प्रतिभाग कर चुकी है तथा उनके तीस से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके है। रचना शर्मा को 

साहित्य श्री सम्मान 2014

मातृ शक्ति सम्मान 2015 भारतीय भाषा सम्मान 2015 शब्द साधना सम्मान 2016 (इनाल्को यूनिवर्सिटी पेरिस में प्रदत्त )

उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान द्वारा शब्द शिल्पी सम्मान 2018 से नवाजा जा चुका है ।



रचना शर्मा की रचना धर्मिता के बारे में ख्यात समीक्षक ओम निश्चल कहते है कि कवयित्री रचना शर्मा के तीन संग्रह अंतर पथ, नींद के हिस्से में कुछ रात भी आने दो तथा नदी अब मौन है प्रकाशित हो चुके है । अंतर पथ उनके सहृदय‍ चित्त की बानगी देने वाला संग्रह था तो नींद के हिस्से  में कुछ रात भी आने दो स्त्री मन की भावनाओं का ज्ञापन,जिसमें छोटी छोटी रचनाओं में प्रश्नानकुलता के साथ वे जीवन जगत के अपने अनुभवों को संवेदना की शीतल पाटी पर उकेरती है। नदी अब मौन है संग्रह में कवयित्री का मन पर्यावरण और प्रकृति के साहचर्य में अपनी कल्पना के ताने बाने बुनता है तो जीवन में सहज ही आयत्त प्रेम की कल्पनाओं में डूबता भी है । जीवन जितना कुदरत से दूर होता जा रहा है उतना ही प्रेम से रिक्त। रचना शर्मा की कविताएं जीवन को प्रेम और कुदरत के साहचर्य से संवलित करने का उपक्रम है। उनकी कविताओं में स्त्री की तमाम कोमल अभिलाषाएं है तो प्रीत की डोर में बंधने से लेकर नदियों के कूल किनारे ,प्रकृति के मंडप तले परिणय रचाने की उत्कंठा भी ।

👆👇

एसोसिऐट प्रोफेसर, संस्कृत 

राजकीय महिला महाविद्यालय,

डी.एल.डबल्यू,वाराणसी 

इ.मेल : rachanasrachana@gmail.com. 


प्रकाशित  पस्तकें 05

1. काशीखण्ड और काशी ( काशी के पौराणिक इतिहास  पर आधारित  पुस्तक )

 2. अन्तर-पथ (कविता  संग्रह  )

 3. नींद के हिस्से में कुछ रात भी आने दो (कविता संग्रह  )

4.पुरातन संस्कृति अधुनातन  दृष्टि ।( निबन्ध संग्रह )

5. नदी अब मौन है ( कविता संग्रह )


प्रकाशित शोध –पत्रों की संख्या - 30


क्रियेटिव राइटिंग ---- हिन्दुस्तान, कादम्बिनी  ,सोच-विचार,गर्भनाल,कविताम्बरा ,प्रज्ञा-पथ,

 उत्तर प्रदेश ,आदि पत्र पत्रिकाओं में कवितायेेँ एव॔ लेख  प्रकाशित ।


अंतर-राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय संगोष्ठीयों में प्रतिभाग और प्रस्तुत शोध पत्र ।

कुल 90 संगोष्ठियों में प्रतिभाग ।

अंतर-राष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रस्तुति----------------20

राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुति ---------------------70

राज्य स्तरीय संगोष्ठी में प्रस्तुति  -----------------09

पुरस्कार एवं सम्मान  

1.तमिलनाडु हिन्दी अकादमी द्वारा सम्मान 2014.

 2. साहित्य श्री सम्मान  2014 

 3. मातृ शक्ति सम्मान  2015 

 4. भारतीय भाषा सम्मान  2015

 6. शब्द साधना सम्मान  2016 शुलभ इंटरनेनल द्वारा इनालको यूनिवर्सिटी  पेरिस, फ्रांस में प्रदत्त ।

7. शब्द शिल्पी सम्मान 2018 उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान ,लखनऊ ।

9450183026


सम्पर्क सूत्र :-

corojivi@gmail.com


मो.नं. : 🇮🇳 8429249326




Saturday, 8 August 2020

Biodata of Shri Prakash Shukla....Kavi Shri Prakash Shukla

Shri Prakash Shukla :-

Shri Prakash Shukla,
(Born 18 May 1965 in Village Barwan,Sonbhadra District of UP,India)  ,Is a  renowned  Poet ,Critique and Travelogue writer   of Hindi Language  .Many of his poems have been translated into English Language.Presently working as Professor of Hindi Literature in BHU,Varanasi since 2005.He  belongs to the period of 1990s, a decade that is one of the most magnificent and important for the history of hindi poetry.He  receives  his insights from the traditions and his poetic resources and assets from his surroundings . He gains his wisdom from science and inspiration from the society. His poetic world is diverse and significant. He has 7 book of Poetry in Hindi ,BOLI -BAAT ,ORHAN AND ANY KAVITAYEN,KSHIRSAGAR MEN NEED being widely read, and  with each of his newly published work he serves his readers a new set of ideas. By his nature he is very accommodating and student friendly and capable enough to understand the creative verve of the younger generation. He is one of the most enthusiastic and communicative poet of his generation. To converse with him is like visiting a different domain of knowledge. One of the most celebrated poet of his time, he addresses the contemporary hindi poetry by the name of Corojivi Poetry . He has written many good and outstanding poems during the Corona period. He has got credit to write  the’ Post -Corona’ poem at the time when this term  was unheard in the hindi poetic sphere in April 2020. Along with a magnificient  poet ,he is also an outstanding orator and contributed a lot in the field of Travelogue and Bhakti Poetry .He has mesmerized his audience by contributing a lot in the field of criticism by connecting Pandemic and creativity  in the historical process.
He has many literary awards at his disposal and Currently working as Professor of Hindi, in Banaras Hindu University and is also the Coordinator of Bhojpuri Adhyayn Kendra,BHU . 

Life –
Shri Prakash Shukla Was born on 18th May 1965 in Village Barwan , district of Sonbhadra (Uttar Pradesh ) .He is the youngest among all five brothers andhas been  brought up in rural environment. He graduated from Allahabad university in science discipline  and due to deep involvement in hindi literature,Did his MA and Ph.D in Hindi Literature.Before joining in BHU as Professor in 2005, in the Dept of Hindi,He worked as Asstt Professor In Govt girls College,Ghazipur from 1998 -2000 and in the same position in P G College,Ghazipur from 2000 to 2005.
He married to sunita Shukla who worked as a English Teacher In various schools of Varanasi and he has one daughet Darshita Shukla and One Son Aagat Shukla .
He is presently settled in Varanasi. 
Published Works—
Collection of Poems-
”Apni Tarah Ke Log ”,(A Booklet Of Hindi Poems)”Jahan Sab Shahar Nahin Hota ”(Lok Bharati Prakashan ,Allhabad 2001) ,”Boli -Baat ” ,(Rajkamal Prakashan,New Delhi -2007)”Ret men AAkritiyan ”(Bhartiya Jyanpeeth,New Delhi -2012), ”Orhan aur Any Kavitayen ”. (Rajkamal Prakashan,New Delhi 2014)“Kavi Ne Kaha” .(Kitabghar Prakashan,New Delhi -2016)
‘Ksheersagar Men Neend  .(setu Prakashan ,New Delhi,2019)

Literary Criticism - ”Saathottari Hindi Kavita Men Lok Saundarya “,(Lokbharati Prakashan,Allhabad ) “Namvar ki Dharati  “(Adhar Prakashan,Chandigrah)

Editor – A bi -Annual Journal “Parichay”

Awards – 
Malkhan Singh Sisodia  Poetry Award for his collection of Poetry -BOLI -BAAT 
Naresh Mehta  Poetry Award of  Uttar pradesh Hindi sansthan for” Ret Men Aakritiyan” 
Vijay Dev Narayan Shahi Poetry Award of Hindi Sansthan ,Uttar Pradesh for ‘Orhan Aur  any Kavitayen.’

E-Mail - shriprakashshuklabhu@gmail.com


Thursday, 6 August 2020

विश्व कवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय - वाराणसी। "गोलेन्द्र पटेल"

 १.मनुष्य से ऊपर कुछ नहीं । मनुष्य की सब नस्लें जहां मिलती हैं वहां जागो 'रवीन्द्र नाथ टैगोर 


विश्वकवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर : पंडित मदन मोहन मालवीय के एक पत्र पर काशी आए थे गुरुदेव
वाराणसी [जेएनएन/कुमार अजय]। गुरु रवींद्रनाथ टैगोर जयंती (जन्म 7 मई 1861, मृत्यु 7 अगस्त 1941) काशी ने प्राचीन से अर्वाचीन काल तक न केवल देश-दुनिया को विद्वता का प्रमाण दिया अपितु मेधाओं को सर्वदा नमन भी किया। विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) को मान देते हुए 1935 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट उपाधि से अलंकृत किया। इस आयोजन के बाद वह प्रयागराज चले गए थे। तब महामना मदन मोहन मालवीय ने स्वयं पत्र लिखकर गुरुदेव को काशी बुलाया था।
अभिलेखों के अनुसार, गुरुदेव तीन बार (1925, 1927 व 1935) काशी आए। इनमें अंतिम दो बार उनके आगमन का कारण महामना का मनुहार भरा आमंत्रण बना। इसी क्रम में उनका एक प्रवास 1927 में काशी में हुआ। इसमें भी उन्होंने बीएचयू के तत्कालीन इंजीनियरिग कॉलेज बेंको (अब आइआइटी बीएचयू) में फार्मेसी पाठ्यक्रम का उद्घाटन किया था।
बंगीय समाज काशी के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक कांति चक्रवर्ती के अनुसार, गुरुदेव इससे पूर्व 1925 में भी काशी आए। इस बार उनका उद्देश्य बंगीय साहित्य व संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन था। इसी क्रम में उन्होंने काशी में प्रवासी बंग साहित्य सम्मेलन की स्थापना की।

भारत कला भवन से जुड़ाव :-

बीएचयू के संग्रहालय भारत कला भवन के स्थापना काल से ही गुरुदेव का उससे जुड़ाव रहा। इसके संवर्धन के लिए गठित परामर्शदात्री समिति के गुरुदेव प्रथम अध्यक्ष रहे। भवन के निदेशक प्रो. अजय कुमार सिंह बताते हैं कि गुरुदेव सहित उनके परिवार के सदस्यों द्वारा बनाए दर्जनों स्केच व तैलचित्र अब भी भवन की शोभा बढ़ा रहे हैं। काशी के विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने महामना की प्रेरणा से गुरुदेव के शांति निकेतन में सेवाएं दी थीं।

काशी से रहा नाता :-

गुरुदेव का काशी से भी नाता रहा है। अशोक कांति चक्रवर्ती के अनुसार टैगोर परिवार की संपत्तियां काशी में भी स्टेट के रूप में रही हैं। अर्दली बाजार व भोजूबीर का टैगोर स्टेट कभी समृद्ध हुआ करता था। टैगोर विला का सौदा तो हाल ही में हुआ।
गाजीपुर में लिखी थीं मानसी की अधिकांश कविताएं
रवींद्रनाथ टैगोर ने 1888 में छह महीने तक प्रवास किया और यहां का छोटा सा इतिहास भी लिखा। यहीं पर मानसी की अधिकांश कविताएं व नौका डूबी के कई अंश लिखे। उनके प्रवास स्थान पर एक पार्क है। रवींद्र नाथ टैगोर अपने दूर के रिश्तेदार गगनचंद्र राय के यहां गोराबाजार आवास पर ठहरे थे। यहां रहते गुरुदेव की घनिष्टता एक अंग्रेज सिविल सर्जन से हो गई। रवींद्रनाथ अपनी कविताओं का अनुवाद उन्हेंं सुनाया करते थे। गुरुदेव यहां लार्ड कार्नवालिस समाधि उद्यान में शाम को घूमने जाया करते थे।

1925 से भी पहले 1905-07 के दरमियान भी कवि का आगमन काशी में हुआ था। चौखंबा स्थित मित्र परिवार में ठहरे थे। 1920 के आस - पास काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के अध्यापक फणीभूषन अधिकारी की पुत्री तो कवि गुरु के लेखनी की मुरीद थी। उन्हें खत से अपनी प्रतिक्रिया देती थी। कवि गुरु भी अपने इस नन्हीं पाठक मित्र के खतों का जवाब देते थे। बाद में ये नन्ही पाठिका शांतिनिकेतन पढ़ने गई। 1925 में विवाह हुआ कोलकता के रईस से और ये कहलाईं लेडी राणु मुखर्जी।

गुरुदेव का भारत कला भवन से बड़ा भावनात्मक जुड़ाव था। वे इस संस्थान के आजीवन अवैतनिक सभापति रहे। कला भवन नाम उन्हीं की देन है।

पहले हर पढ़ा लिखा व्यक्ति रविंद्रनाथ व के. एम. मुंशी को अवश्य पढ़ता था। आज का युवक इन महापुरुषों, महान लेखको के नाम तक नहीं जानता। मुंशी के ऐतिहासिक उपन्यास (जय सोमनाथ, पाटन का प्रभुत्व आदि ) व टैगोर के उपन्यास, कहानियाँ,  नाटक व लेख जितनी गहराई लिए हुए है उतनी गहराई संत साहित्य मै भी नहीं है। गहराई मै ले जाने वाला साहित्य हमारे जीवन में भी गहराई लाता है जबकि छिछोरा साहित्य हमारे जीवन की गहराई को खत्म कर देता है।
आज का युवक जिस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पीछे दौड़ रहा है वहा से छिछोरेपन के अलावा कुछ भी मिलने वाला नहीं है। अगर जीवन को बदलना चाहते है,जीवन में गहराई में उतरना चाहते है तो कम से कम टैगोर की एक पुस्तक खरीद कर अवश्य पढ़े।


चबूतरे पर संवाद जारी: "पहले सत्य फिर आत्मरक्षा"
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मालवीय चबूतरे ने एक दिन पहले ही 'गुरुदेव' रवीन्द्रनाथ टैगोर के 'महात्मा' को याद किया है।कल  सत्य ,अहिंसा और सभ्यता के समीक्षक महात्मा गांधी की जयंती है।गांधी ने हमें सत्याग्रह की महान शिक्षा दी थी।यह अनायास नहीं है कि बीएचयू के कुलगीत को वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर ने सर्वप्रथम न केवल उर्दू में लिखा बल्कि 'पहले सत्य फिर आत्मरक्षा' का गांधीवादी पाठ पढ़ाया।।    आजकल चारों ओर झूठ और आत्मरक्षा का बोलबाला है।झूठ ताल ठोंक कर सत्य का पहरेदार होने का दावा कर रहा है,स्वार्थ अपनी कुर्सी,पद,पदोन्नति,यश,सुविधा और भोग के लिए करुणा का गला घोंट रहा है,अँधेरा डिटर्जेंट का विज्ञापन
करते हुए उजाला उजाला चिल्ला रहा है।
       आजकल सत्य को प्रायोजित और झूठ को सत्यापित बताया जा रहा है।विचार धुंध का शिकार है।ज्ञान ने कायरता का कोट पहन लिया है।सिर्फ तालों और फाटकों में बंद आवाज़ें हैं जो खुले आकाश और बहती हवाओं में फैलना चाहती हैं।वे आवाज़ें हरे पत्तोंवाली टहनियां  और नीले
पंखों वाली चिड़ियाँ होकर 'फ्री विल' को विस्तार देना चाहती हैं।
            आज इतवार है।लेकिन मालवीय चबूतरा पहले की तरह गुलजार नहीं।अधिकांश विद्यार्थी दुर्गा को पूजने और रावण को जलाने अपने घर जा चुके हैं।चाय दूकानदार ने बिक्री का रोना रोते हुए चूल्हा ठंडा कर लिया है।बाहरी तत्वों का भी कम ही भीतर आना हुआ है।सिर्फ नगर के व्यापारियों और प्रायवेट अस्पतालों के सैकडों बाहरी कर्मचारियों ने मालवीय बगिया की भरपूर ऑक्सीजन पी और घर से लाये हुए चाय का वीटी भोज किया।
            मैं जब पहुंचा तो नगर के सेवानिवृत शिक्षकों और कैम्पस के सेवामुखी शिक्षकों का टोटा था।मोबाइल लगाया तो प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल का मोबाइल नॉट रिचेबल था।गांधीवादी डा दीनबंधु तिवारी ने पहले ही गांधी चर्चा से मना कर दिया था।बूढ़े वाचस्पति बेटे के साथ कुल्लू की कूल कूल फ़िज़ा का आनंद ले रहे हैं।सेवामुक्त बंबइया प्रो सत्यदेव त्रिपाठी ने सत्य का इज़हार किया कि सर्दी जुकाम और गाँव ने जकड़ लिया है।गतिशील प्रो वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी कहीं नारायण यात्रा पर होंगे और प्रगतिशील प्रोफ़ेसर लोग लेट से सोकर उठते हैं।एक दो शोधार्थी दिखे और एक दो जासूस जो कुछ और ही मूल्य की खोज में होंगे।
           इस बीच अनेक तरह की
मनोयात्राओं से गुज़र रहा था कि प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल आधे घन्टे लेट से प्रकट भए।...फिर शुरू हुआ इतवारी चबूतरा संवाद...
       
         ...एक शिक्षक होने के नाते हम दोनों ने शिक्षा और परिवेश से जुडी ढेर सारी घटनाओं को शेयर किया।हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि मालवीय चबूतरा 'पहले सत्य फिर आत्मरक्षा' के प्रेरक गांधी और मालवीय के विचार को ज़िंदा रखेगा।
           एक शिक्षक का प्रथम कार्य ज्ञान उत्पादन और छात्र हित के बारे में सोचना है।हमारे लिए जितना महत्वपूर्ण किसी एकलव्य का प्रश्न है उतना ही अहम किसी गार्गी का सवाल।शिक्षक किसी खूंटे में बंधा बैल या थाने का सिपाही नहीं जो लाठी की भाषा बोलने के लिए मजबूर हो।किसी भी शिक्षा संस्थान का एक शिक्षक और छात्र से ज्यादा बड़ा शुभचिंतक कोई नहीं हो सकता।
           कभी कभी सत्ता से चाटूकारिता और अनैतिक लाभ के लिए कुछ शिक्षक पथभ्रष्ट होते रहे हैं जिसकी परम्परा द्रोणाचार्य से आजतक जारी है।ऐसे शिक्षक सुकरात याज्ञवल्क्य बुद्ध और मालवीय की परम्परा के विरुद्ध शिक्षा के चेहरे पर कलंक की तरह हैं।वे वेतनजीवी हो सकते हैं बुद्धिजीवी नहीं।

-वरिष्ठ कवि व आचार्य रामाज्ञा शशिधर 

मनुष्य से ऊपर कुछ नहीं । मनुष्य की सब नस्लें जहां मिलती हैं वहां जागो 'रवीन्द्र नाथ टैगोर

आज मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालयबांग्ला विभाग महिला महाविद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और सबद संवाद के उद्यम से आयोजित गुरुदेव रवीन्द्रनाथ  टैगोर जयंती के अवसर पर रवींद्र साहित्य में रचे बसे अवधेश प्रधान ने उन्हें बहुत मूल्यवान ढंग से उद्धृत किया। उन्होंने कहा कि उनकी संकल्पना में विश्व मानव है।क्षमा करुणा सख्य और प्रेम से बना विश्व मानव ।वे सच्चे अर्थ में पृथ्वीर कवि थे। गुरुदेव ने कहा कि सबकी बाहें जहां खुलती हैं वहीं मेरा ह्रदय है। उपनिषद बाउल और संत साहित्य आयत्त कर उनका सृजन चिंतन और सरोकार निर्मित हुए हैं।प्रो प्रधान ने बताया कि खासकर बाउल गीतों के भीतर के लोकदर्शन ने उन्हें आकृष्ट किया। गांधी के साथ विरोध और असहमति के बावजूद उनकी मैत्री अक्षुण्ण थी।उनका स्वर स्वाधीनता का सच्चा स्वर था। यह आधुनिक भारत का स्वर था। गीतों में उन्होंने शब्द को महिमा दी और उनका समूचा साहित्य गीत की तरह ही आत्मा में गूंज छोड़ता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता की प्रो बलिराज पांडेय ने। उन्होंने गुरुदेव के धर्म दर्शन कला की मनुष्य से संबद्धता के पक्ष को रेखांकित किया। डॉ ध्रुव कुमार सिंह ने बीसवीं शताब्दी के दो महापुरुषों का संदर्भ देते हुए बताया कि ये हैं गांधी और रवींद्र नाथ टैगोर। दोनों योरोपीय राष्ट्र राज्य अवधारणा के विरूद्ध थे।डॉ सिंह ने रेखांकित किया कि टैगोर ने ही रुरल विश्वविद्यालय की संकल्पना को साकार किया।पहला अंतर्राष्ट्रीय ज्ञानकेंद्र शांतिनिकेतन में खुलता है। उनका विश्वास था कि ग्राम जीवन ही वैज्ञानिक जीवन है। आत्मनिर्भर ग्राम कैसे बने इसके बारे में सोचा। डॉ सोमा दत्ता ने उनके साहित्य का विस्तृत परिप्रेक्ष्य लेकर चर्चा की । डॉउत्तम गिरि ने उनकी विराट भावभूमि सहित  उनके सृजन का वैशिष्ट्य रेखांकित किया। 
मालविका और साथियों ने सांगीतिक प्रस्तुति दी।उत्तम गिरि ने भी गीतांजलि से चुनी रचना का सस्वर पाठ किया।


नोट : उपर्युक्त वक्तव्य निधि फेसबुक से प्राप्त किया हूँ ,इस लेख को पोस्ट करनेवाले आचार्यों व साहित्य स्नेहियों के प्रति आत्मीय आभार प्रकट करते हुए मैं उनका अभिवादन करता हूँ और आप सभी का इस पेज़ पर सादर स्वागत करता हूँ।

कामेंट में विश्वकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से संबंधित सार्थक टिप्पणी करें।जिसे इस संग्रह में संकलित किया जा सके....

-प्रार्थी : गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू 

https://www.youtube.com/c/GolendraGyan

Tuesday, 4 August 2020

राजभाषा की विशेषताएँ // राजभाषा हिन्दी की विशेषताएँ // राजभाषा की प्रवृत्तियाँ // राजभाषा हिंदी // राजभाषा

 1.राजभाषा हिंदी की विशेषताएं


साहित्यिक हिंदी में जहाँ अभिधा, लक्षणा और व्यंजना के माध्यम से अभिव्यक्ति की जाती है। राजभाषा हिंदी में केवल अभिधा का ही प्रयोग होता है।

साहित्यिक हिंदी में एकाधिकार्थता-चाहे शब्द के स्तर पर हो चाहे वाक्य के स्तर पर, काव्य-सौन्दर्य के अनुकूल मगण जाते हैं। इसके विपरीत राजभाषा हिंदी में सदैव एकार्थता ही काम्य होती है।

राजभाषा अपने अपभाषिक शब्दों में भी हिंदी की अन्य प्रयुक्तियों से पूर्णत: भिन्न है। इसकी अधिकांश शब्द संभावना: कार्यालयी प्रयोगों के लिए ही उसके अपने अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। जैसे:

आयुक्त = आयुक्त 

निविदा = निविदा 

विवाचक = मध्यस्थ 

आयोग = आयोग 

प्रशासककी = प्रशासनिक 

मन्त्रमाला = मंत्रालय 

उन्मूलन = उन्मूलन 

आबंटन = सर्व आदि। 

हिंदी में लेखन: समस्रोय घटकों से ही शब्दों की रचना होती है। जैसे संस्कृत शब्द निर्धन + संस्कृत भाव वाचक संज्ञा प्रत्यय = ता ’= निर्धनता। किन्तु अरबी-फारसी शब्द गरीब + ता = गरीबियत। किन्तु अरबी-फ़ासी शब्द गरीब + अरबी-फ़ासी भाव वाचक संज्ञा प्रत्यय 'ई' = गरीबी। हिंदी में न तो निर्धन + ई = निर्धनी बनेगा और न ही गरीब + ता = गरीबियत। लेकिन राजभाषा में काफी सारे शब्द प्रतिकूल भाष्य घटकों से बने है। जैसे:

उपनयन = उप-देने वाला 

जिलाधिकारी = कलेक्टर 

उपजिला = उप-जिला 

अरुद्दीन = बेपर्दा 

असत्यन्ते = बिना रुके 

अपंजीकृत = अपंजीकृत 

मुद्राबन्द = सील 

राशन-अधिकारी = राशन-अधिकारी… आदि। अंग्रेजी, फ्रेंच, चीनी, रूसी आदि समृद्ध भाषाओं में एक ही शैली मिलती है, पर राजभाषा हिंदी में एक ही शब्द के लिए कई शब्द हैं। जैसे

कार्यालय -दफ़र - कार्यालय

 न्यायालय-अदालत-कोर्ट-कचहरी

शपथ-पत्र-हलफनामा-एफिडेविट

विवाह-विवाह-निकाह आदि।

राजभाषा हिंदी का प्रयोग राजतन्त्र का कोई व्यक्ति करता है जो प्रयोग के समय व्यक्ति न हो कर तंत्र का एक अंग होता है। इसलिए वह वैयक्तिक रूप से कुछ न कहकर निर्वैयक्तिक रूप से कहता है। यही कारण है कि हिंदी की अन्य प्रयुक्तियों में जबकी कतर्ृवाच्य की प्रधानता होती है, राजभाषा हिंदी के कार्यालयी रूप में कर्मवाच्य की प्रधानता होती है। इसमें कथन व्यक्ति-सापेक्ष न होकर व्यक्ति-निरपेक्ष होता है। जैसे: 'सर्वदेश को इंगित किया जाता है', 'कार्यवाही की जाए', 'स्वीकृति दी जा सकती है' आदि।


 जहाँ तक 'राजभाषा हिंदी' के क्षेत्र का प्रश्न है, इसके प्रयोग के तीन क्षेत्र हैं: 1. विधायिका, 2. कार्यपालिका और 3. न्यायपालिका। ये राष्ट्र के तीन प्रमुख अंग हैं। 

राजभाषा के कार्य क्षेत्रों को अधिक स्पष्ट करते हुए आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ने 'राष्ट्रभाषा हिंदी: समस्याएँ और समाधान' में लिखा है: 'राजभाषा का प्रयोग मुख्यत: चार क्षेत्रों में अभिप्रेत है-शासन, विधान, न्यायपालिका और कार्यपालिका। ये चारों में किस भाषा का प्रयोग उसे राजभाषा सगा करते हैं। राजभाषा का यही अभिप्राय और उपयोग है। '


Thursday, 23 July 2020

कबीर के विषय में प्रसिद्ध कथनों का संकलन : गोलेन्द्र पटेल


"कबीरदास" पर प्रमुख साहित्याचार्यों का निम्नलिखित वक्तव्य निधि :-
◆कबीर के विषय में प्रसिद्ध कथन◆ :-

कबीर संत पहले थे, कवि बाद में - रामकुमार वर्मा

कबीर एक अच्छे संत और समाज सुधारक थे - रामशंकर शुक्ल रसाल 

संतमत के समस्त कवियों में कबीर सबसे अधिक प्रभावशाली एवं मौलिक थे - डॉ नगेंद्र

जिनकी जाति नहीं होती, कबीर ऐसे थे - ग्रियर्सन

"कबीर दार्शनिक न होकर आध्यात्मिक पुरुष मात्र हैं - पीतांबर दत्त बड़थ्वाल

"संत कवियों में कबीर के बाद के कवि वैसे ही दिखाई पड़ते हैं जैसे चंद्रोदय के बाद नक्षत्रमालिकाएँ l"- बच्चन सिंह 

"हिन्दुओ और मुसलमानो की साम्प्रदायिक सीमा को तोड़कर उन्हें एक ही भावधारा में बहाने की शक्ति कबीर में है"-डॉ रामकुमार वर्मा

 कबीर धर्मोपदेशक थे - शुक्ल
प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी - शुक्ल

*तार्किकता के क्षेत्र में अत्यंत शुष्क,तीक्ष्ण एवं हृदय हीन प्रतीत होने वाले कबीर भक्ति की भावधारा  में बहते समय सबसे आगे दिखाई पड़ते हैं और अपनी निरक्षरता की खुले आम घोषणा करते हुए भी जब आवेश में आते हैं तो रूपको अलंकारों  और प्रतीकों की ऐसी  झड़ी लगा देते हैं मानो वे सारे काव्य शास्त्र में पारंगत हो । वे युगावतार की विशेष क्षमता लेकर अवतरित हुए थे* - गणपति चन्द्र गुप्त

कबीर प्रधानत :उपदेशक और समाज सुधारक थे - लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय

यह कहना कि वे समाज सुधारक थे ग़लत है l यह कहना कि वे धर्म सुधारक थे और भी गलत है l यदि सुधारक थे तो रैडिकल सुधारक - डॉ बच्चन सिंह

" हिंदी साहित्य के हज़ार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई उत्पन्न नही हुआ।महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है - तुलसीदास।"-हजारी प्रसाद (कबीर)

कबीर मस्तमौला थे l जो कुछ कहते थे साफ कहते थे - हजारी प्रसाद द्विवेदी

कबीरदास मुख्य रूप से भक्त थे l वे उन निरर्थक आचारों को व्यर्थ समझते थे जो असली बात को ढँक देते हैं और झूठी बातों को प्राधान्य दे देते हैं - हजारी प्रसाद जी

कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे - हजारी प्रसाद जी

वे मुसलमान होकर भी असल मुसलमान नहीं थे l वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे l वे साधु होकर भी साधु नहीं थे l वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे l वे योगी होकर भी योगी नहीं थे l वे कुछ भगवान् की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे - हजारी प्रसाद जी

वे (कबीर) भगवान् के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे - हजारी प्रसाद जी

कबीर में काव्य - कम काव्यानुभूति अधिक है - लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय

कबीर रहस्यवादी संत और धर्मगुरू होने के साथ साथ वे भावप्रवण कवि भी थे - डॉ बच्चन सिंह

ये महात्मा बड़ी स्वतंत्र प्रकृति के थे l ये रुढ़िवाद के कट्टर विरोधी थे - बाबू गुलाब राय

कबीर पढ़े लिखे नहीं थे, उन्हें सुनी सुनाई बातों का ज्ञान था, वे मूलतः समाज सुधारक थे - एेसी उक्तियाँ कबीर के विवेचन और मूल्यांकन में अप्रासंगिक बिंदु है - रामस्वरूप चतुर्वेदी

"कबीर के समकक्ष गोस्वामी तुलसीदास है l"-डॉ बच्चन सिंह

कबीर में, कई तरह के रंग है, भाषा के भी और संवेदना के भी l हिंदी की बहुरूपी प्रकृति उनमें खूब खुली है l -रामस्वरूप चतुर्वेदी‘‘

कबीर   सच्चे   समाज   सुधारक   थे  जिन्होंने दोनो   धर्मों   हिन्दू - मुस्लिम   की   भलाई   बुराई   देखी   एवं   परखी   और   केवल   कटु   आलोचना   ही   नहीं   की   अपितु   दोनों धर्मावलम्बियों   को   मार्ग   दिखलाया।   जिस   पर   चलकर   मानव   मात्र   ही   नहीं   समस्त   प्राणी   जगत   का   कल्याण   हो   सकता   है।-द्वारिका प्रसाद सक्सेना

वे साधना के क्षेत्र में युग - गुरु थे और साहित्य के क्षेत्र में भविष्य के सृष्टा - हजारी प्रसाद द्विवेदी

"लोकप्रियता में उनके (कबीर) समकक्ष गोस्वामी तुलसीदास है l तुलसी बड़े कवि हैं, उनका सौंदर्यबोध पारम्परिक और आदर्शवादी है l कबीर का सौंदर्यबोध अपारंपरिक और यथार्थवादी है l"- डॉ बच्चन सिंह

कबीर ही हिंदी के सर्वप्रथम रहस्यवादी कवि हुए - श्याम सुंदर दास

" आज तक हिंदी में ऐसा जबर्दस्त व्यंग्य लेखक नहीं हुआ " - हजारीप्रसाद द्विवेदी

कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे - हजारी प्रसाद

"समूचे भक्तिकाल में कबीर की तरह का जाति - पाँति विरोधी आक्रामक और मूर्तिभंजक तेवर किसी का न था l जनता पर तुलसी के बाद सबसे अधिक प्रभाव कबीर का था l"-बच्चन सिंह

कबीर पहुँचे हुए ज्ञानी थे l उनका ज्ञान पोथियों की नकल नहीं था और न वह सुनी सुनाई बातों का बेमेल भंडार ही था -श्याम सुंदर दास
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●नोट :-

इस संकलन में समकालीन साहित्याचार्यों का कबीर पर विशेष सूक्ति या कथन संकलित करना है।कृपया आप अवश्य बताएँ , कामेंट में।

"प्रार्थी"
युवा कवि गोलेन्द्र पटेल
बीएचयू~बीए ,द्वितीय वर्ष


बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...