“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
कुँवारी लड़कियाँ बुआ कहलाती हैं
लेकिन कुँवारे लड़के फूफा नहीं
कुँवारे लड़के चाचा कहलाते हैं
लेकिन कुँवारी लड़कियाँ चाची नहीं
कुँवारे लड़के मामा होते हैं
लेकिन कुँवारी लड़कियाँ मामी नहीं
हाँ, दोनों कुँवारेपन में मौसी-मौसा हो सकते हैं।
कुँवारे लड़के अपने युवावस्था में कइयों के चाचा,
तो कइयों के दादा, तो कइयों के बुढ़ऊ बाऊ लगते हैं
जैसे हम अपने गाँव में।
खैर,
वे विवाहित स्त्रियाँ जो बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं हैं,
उन्हें समाज बाँझ की संज्ञा देता है
जो कि गलत है
क्योंकि वे मातृत्व से वंचित नहीं होती हैं
वे लोक में किसी न किसी की छुटकी या बड़की माई होती हैं
वे वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद देती हैं
(5)" प्रेमलता ", प्रेम लता सी "माँ", सदा लिपटी रहीं
सभी में रहीं बांटती स्नेह प्यार !
जीवन में हमेशा मुस्कुराती रहीं.....,
और लुटाया जी भरके अपना दुलार !!
(6) माँ " प्रेमलता ", की पावन स्मृति पर
हम सभी विनम्रता से हैं श्रद्धावनत !
चढ़ाकर मधुर स्मृतियों के पुष्प सुमन...,
कर रहे "माँ",को नमन प्रणाम शत-शत वंदन!!
-सुनीलानंद
जयपुर,
राजस्थान
■
6).
माँ के दिल जैसा दुनियाँ में कोई दिल नहीं
यदि हम वात्सल्य भाव की बात करते है तो उसमें माँ का प्रेम सर्वोपरि माना जाता है क्योंकि माँ सारे गुणों की खान होती हैं। बात यदि अपने बच्चों की आती है तो माँ कभी अनदेखा नहीं करती।
उस दौर में मैंने कई माताओं को देखा वो सभी कम संसाधन में काफ़ी व्यवस्थित रूप से बच्चों का लालन-पालन करती थी। पहले मोहल्ले की गली में बैठ कर सारी माताएँ मिल कर बच्चों के लिए क्या सही क्या गलत सब की चर्चा करती थीं। बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन जो घर का बना होता था, उस पर बल देती थी, बाहरी सामान से होने वाले नुकसान-फ़ायदे सब बताया करती थी। बच्चों की नज़र उतारना, भाई-बहनों को परिवार के साथ बैठाना, एकता बनायें रखने की काफी सीख देती थी। अब तो मोबाइल उपकरण आने से ये सारी व्यवस्था ही बदल गई है, ना कोई माँ के साथ बैठता है और ना परिवार के साथ सामंजस्य बैठा पाते है बच्चे!
संस्कार आज भी हैं लेकिन सब बदल गया।
आधुनिक युग में फायदे की बात लिखूं तो आज की माँ पहले से ज्यादा शिक्षित हैं और घर-ऑफिस सब संभाल रही है, सुगमता से सारे कार्य घर के मशीन से करने लगी हैं। अपने फैसले लेने में सक्षम है माँ-बहनें। कुरीतियां समाप्त हो चुकी हैं। अच्छी शिक्षा-दीक्षा बच्चों को दे पा रही है, सपने साकार हो रहे है। अब अत्याचार और उत्पीड़न का उत्तर देने में सक्षम हैं। जो सुविधाएं माँ खुद के लिए नही जुटा पाई आज अपने बच्चों की छोटी से छोटी इच्छा पूर्ण करने में सक्षम हैं, वो भी अकेले।
मुझे गर्व हैं हर माँ पर वो अब अबला नहीं सबला बन चुकी है वो सारे कार्य जो पुरुष कर सकते हैं, एक एकल मदर भी कर लेती है।
शादी-विवाह समारोह में एक एकल मदर पूरी ज़िम्मेदारी निभा रही हैं, हर क्षेत्र में नारी शक्ति इज्जत कमा रही है।
लेकिन आजकल पैसे की चकाचौंध और सुनहरे भविष्य की चाह ने भारतीय बच्चों को विदेश में खींच लिया है और उसके पीछे छूट गई है उसकी मां। मां का अकेलापन क्या होता है, उनका यादों में लिपटा हुआ जीवन बहुत तकलीफदेह होता है।
"मेरी आँखे रो पड़ी भीगा मां का आंचल।
मन से मन की बात पढ़ जानी दिल की बात!"
आजकल यह लिखी हुई पंक्तियां भी कहीं धूमिल हो गई है। कितने साल गुजर जाते हैं एक बच्चे को पालने में मां के, उसके बाद पीढ़ी दर पीढ़ी सभी जवान हो जाते हैं और बदल जाता है उनका जीवन और उनकी जीवन शैली। आजकल बात करने के माध्यम, एक दूसरे की जानकारी के लिए भले ही इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध हो गई है फोन पर बात करना सरल हो गया हो और कई रिश्तें की भावना ने, संवेदना ने भले ही कई बार सांप की तरह केंचुली उतार ली हो, लेकिन मां-बेटे बेटियों का रिश्ता आज भी इस देश में गर्माहट के साथ मौजूद है। सभी की आकांक्षाएं और कामनाओं की लिस्ट बहुत लंबी है समय बहुत कम है और संघर्ष बहुत बड़ा। जीवन की परिभाषाओं में बहुत फेरबदल हुआ हो पर विदेश में बसा हुआ बेटा मां को बहुत याद करता है और कुछ बेटे अपनी मां को विदेश में बसने के बाद अकेला छोड़ दिए हैं। उनके पास अपनी मां के लिए वक्त ही नहीं। इतनी एडवांस तकनीक आने की वजह से कुछ नई संगत से बच्चों के व्यवहार भी बदल रहे है। बेटा और बेटियां कमाने के लिए बाहर चले जाते हैं अपने सपनों को पूरा करने के लिए, पैसे कमाने में उस मां को छोड़ जाते हैं। कुछ बच्चे वादा करते हैं कि वह लौटकर आएंगे और कुछ बच्चे विदेश में ही रहकर अपना घर बसा लेते हैं फिर वह भारत में रह रही मां के पास आना उचित भी नहीं समझते हैं। मां जिंदा है या मर गई है उन्हें परवाह भी नहीं होती है और बस डाक द्वारा पैसा भेज देते हैं यही बहुत होता है। कुछ बेटा-बेटियां रोजाना अपने मां के कांटेक्ट में रहते हैं और यह विश्वास दिलाते हैं कि अब हम आएंगे जरूर से आएंगे और मां तुम्हारा सपना हम पूरा करेंगे।
एक मां बचपन से अपने बच्चों की हर तकलीफ को समझती है। बेटा क्या खाता है? क्या पीता है? उसे बचपन में क्या पसंद था जब रूठ जाया करता था तो वह उसे कैसे मनाती थी और मां दूसरे कामों को निपटा कर अपने बच्चे की परवरिश में लग जाती थी। बच्चे कब बड़े हो गए पता ही नहीं लगा और चले गए अपनी मंजिल पाने। आज भी भारत वर्ष में ऐसी कई माऐं हैं जिनके आंसू थम नहीं रहे। वह अपने बेटे की आने की प्रतीक्षा में रोती रहती है उनकी व्यथा को समझने वाला कोई नहीं होता है। मां परिवार में कितना भी सबके साथ हंस बोल ले, लेकिन एक तन्हाई अपने बच्चों के लिए जरूर से उसके मन में होती है। मां बीमार हो जाती है तब चिट्ठियां भेजी जाती है, तब बच्चों के फोन आते हैं। उसके बाद भी कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो यह कहते हैं कि किसी कारणवश नहीं आ पाएंगे मां। अपना ख्याल रखना। सोचो उस समय उस मां पर क्या बीतती होगी। अकेले रहने वाली मां कितने भी डॉक्टर के चक्कर लगा ले, लेकिन अपने बेटा-बेटियों का विछोह बर्दाश्त नहीं कर पाती है।
कुछ बेटा-बेटी विदेश में अपनी मां को बहुत मिस करते हैं, उनके बनाए हुए खाने की याद उन्हें सताती है जब उन्हें विदेश में मां के जैसे बना हुआ भोजन नहीं मिलता है, तो वह अपनी मां को याद करते हैं और उन्हें हमेशा फोन करते रहते है। दिनभर की आपबीती वह अपनी मां से शेयर करते हैं और वीडियो कॉल करके अपनी मां को रूबरू देखते हैं, उनके लिए समय देते हैं जिससे मां को भी यह तसल्ली रहती है कि हमारे बच्चे जहां भी हैं सुरक्षित है और बेटा-बेटियों को भी तसल्ली हो जाती है कि हमारी मां किस हाल में है। कई बार ऐसा हुआ है कि त्यौहारों में बच्चे अपनी मां के पास नहीं आ पाते हैं, लेकिन जब भी आते हैं तो अपनी मां को गले से लगा लेते हैं, उनके सामने वही छोटे बच्चे बन जाते हैं और मां भी अपने बेटा-बेटियों को उनके मनपसंद का खाना खिलाती है जब तक वह घर में रहते हैं।
एक मां को चिंता रहती है कि जब मेरे बच्चे बाहर रहते हैं तो वह क्या खाते पीते हैं? कैसे रहते होंगें? इसलिए बेटा-बेटियों के आते ही उनकी आवभगत में मां लग जाती है। बस मैं इतना कहना चाहती हूं जो बच्चे बाहर जाकर अपनी मां से अलग रह रहे हैं, वह अपनी मां के संपर्क में सदा रहे। अपने परिवार से कांटेक्ट बनाए रखें ताकि घर में रह रही मां अकेली ना पड़े। मां से अच्छा दोस्त कोई नहीं होता है, यह बात बच्चे समझ ले तो विदेश में भी मां-बेटा बेटियों को एक दूसरे से अलग ना होना पड़े। प्रेम की भाषा सभी समझते है अपनें प्रेम पर आस्था बनाए रखें। भावुकता की नदी में बहती हुई मां हमेशा बच्चों का भला चाहती है और अपना दिल कठोर करके बच्चों को बाहर भेजती है पढ़ने के लिए। बच्चे इसका दुरुपयोग ना करें, अच्छी संगति करें, अच्छे लोगों के बीच में रहे। जितना हो सके मां के लिए विदेश से नई-नई चीजें भेजते रहें ताकि आपके भेजे हुए उपहार में मां आपका प्रेम महसूस कर सके। सभी त्यौहारों में फोन लगाकर मां से हंस बोल कर बात कर लेने से मां को इतनी खुशी मिलेगी इसकी कल्पना जैसे स्वर्ग मिल गया हो एक मां को। बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति ना भूले बीच-बीच में आकर अपनी मां की तकलीफ समझ कर उन्हें सुख प्रदान करें। छोटी-छोटी खुशियों में अपनी मां के साथ समय बिता लेना पर अपनी मां को कभी अकेला मत छोड़ना, क्योंकि मां की पीड़ा केवल मां ही जानती है, बस बच्चों को इसका एहसास होना अति आवश्यक है। यदि कार्य के कारण बच्चे व्यस्त हैं तो उससे ज्यादा वक्त अपने परिवार अपनी मां को दीजिए। दूर रहकर प्रेम की डोर को बांधे रखिए, तभी अपनी मां की पीड़ा को आप समझ पाएंगे! उनका प्रेम समझ पाएंगे। बस याद रखिए "सब पराये हो जाए, पर मां पराई कभी ना होए"!
होठों पर स्मित सजल लिये, माँ मुझे बहुत याद आती है।।
पक्षी कलरव और पत्तों संग,
जब सड़क सजी सुस्ताती
है।
तब बांँट जोहती आँखो संग,
माँ मुझे बहुत याद आती
है।।
कोई शाख फलों का भार लिए, सर झुका नमन करती दिखती।
तब उचक देखती खिड़की से, माँ मुझे बहुत याद आती है।।
रिश्तों के कच्चे धागों संग,
बातें बदरंगी उलझ पड़ें।
तब अश्रु छिपाती, मुस्काती,
माँ मुझे बहुत याद आती
है।।
थकता, बोझिल, हर भाव लगे, कदमों की जब रफ्तार रूके।
लादे अनुभव की गठरी सी, माँ मुझे बहुत याद आती
है।।
अब रच पाऊँगी सपन नहीं,
ये सोच आँख मुँद जाती है।
बाँहें फैलाये जीवन सी..माँ
मुझे बहुत याद आती है।।
-रश्मि 'लहर'
इक्षुपुरी काॅलोनी
लखनऊ उत्तर प्रदेश
14).
जब एक माँ चूल्हा जलाती है
जब एक माँ चूल्हा जलाती है
मानों रोज यज्ञ करती है.
रोज अपने एक सपने की
आहुति देती है वह।
जब एक माँ, आँगन बुहारती है
तो कुछ कुछ बुदबुदाती रहती है
और बुरी बलाओ को ढूँढ
बुहार, बाहर फेंक देती है
जब एक माँ पूजा करती है
अपने दोनों हाथों से आँचल
फैला, बच्चों की सलामती
की दुआ माँगती है
जब एक माँ थककर बैठती है
बच्चों के लिये सपने बुनती रहती है
या फिर अच्छी यादों को सिलती रहती है
-मनोरमापंत, भोपाल
15).
ऐसी होती है मांँ
कौन कहता है
मेरी माँ मुझे छोड़कर चली गई
मैं कहता हूंँ
वह मुझे टोले-मुहल्ले से जोड़ कर गई है
मांँ की देन है कि कोई चाची बन जाती है
और वह अपनत्व दिखाती है
अपने खाने से पहले मेरे आगे
रोटी की थाली रख जाती है
कम नहीं होने देती कोई समान
कम नहीं होने देती कोई अरमान
जिससे कहता हूंँ मैं कि
मेरी माँ का वजूद बोलता है और,,,, और
मेरे अंदर से मेरी मांँ का
दूध बोलता है
माँ की बदौलत बढ़ते जा रहा हूंँ मैं
अपने जीवन पथ पर निरंतर।
ऐसी होती है माँ।
-विद्या शंकर विद्यार्थी
C/0- राजेश यादव (खटाल)
बंगाली टोला
रामगढ़, (झारखण्ड)
👉माँ से संबंधित अभिव्यक्तियों का सभी विधाओं में आत्मिक अभिनंदन है। माँ से संबंधित आप अपनी अभिव्यक्ति अपनी तस्वीर के साथ मुझे निम्नलिखित पते पर भेज सकते हैं।🙏
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
इस धरती की धड़कनें सांस्कृतिक स्वर की ऊँची अनुगूँज हैं
अपनी सनातनी अर्थ-प्रक्रिया में यह हिन्दुत्व के ध्वजोत्तोलन का समय है मैं हिन्दू हूँ मेरे आध्यात्मिक गुरु ऋषिचित्त हैं मैं शैशवावस्था से शाकाहारी हूँ माँ सरस्वती का भक्त हूँ और माँ दुर्गा का भी पर, मैंने सत्रह सालों तक शिव की उपासना की है कई सालों तक कतकी नहायी है मुझे जब से जानकारी है तब से रोज़ हनुमान का ध्यान करता आ रहा हूँ मैं उदार, उदात्त व धर्मनिरपेक्ष धार्मिक हूँ क्योंकि मैं सभी धर्मों के शक्ति-स्रोतों को मानता हूँ मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा जाता हूँ !
मैं बुद्ध को ख़ूब पढ़ता हूँ पर, मैं बौद्ध नहीं हूँ मैं महावीर स्वामी को ख़ूब पढ़ता हूँ पर, मैं जैन नहीं हूँ मैं कबीर को भी ख़ूब पढ़ता हूँ पर, मैं कबीरपंथी नहीं हूँ मैं तुलसी को भी ख़ूब पढ़ता हूँ पर, मैं रामनामी नहीं हूँ न ही मैं भगवाधारी हूँ
मैं ग्रामदेवता को पूजता हूँ प्रकृति की पूजा करता हूँ माँ का पाँव छूता हूँ पिता का पाँव छूता हूँ गुरु का पाँव छूता हूँ पुरखों का पाँव छूता हूँ मैं वादियों का पढ़ता हूँ पर, मैं वादी नहीं हूँ सिवाय इसके कि मैं स्पष्टवादी हूँ जो कहना होता है वो मुँह पर कह देता हूँ
मैं अपनी दायीं आँख से जितना देखता हूँ उतना ही बायीं आँख से मेरी नज़र में न कोई सिर्फ़ दायें पैर से लंबी यात्रा कर सकता है न कोई सिर्फ़ बायें पैर से लंबी यात्रा कर सकता है न ही कोई सिर्फ़ दायें हाथ से ताली बजा सकता है न ही कोई सिर्फ़ बायें हाथ से ताली बजा सकता है
मैंने हिन्दू जीवन मूल्य को समझते हुए यह महसूस किया है, भारत में सहल ही सहज है, सरस है, सरल है, सुलभ है और सुंदर भी जहाँ जाति से ऊपर धर्म भारतीयता के लिए ज़रूरी चीज़ है पर, इसकी कुत्सित राजनीति सभी के लिए घातक है धर्म की राजनीति और राजनीति के धर्म में फ़र्क है न?
मैं भाषा के महारूपकों को जीता हूँ पर, उनका अंध अनुसरण नहीं कर करता हूँ अनुकरण तो कतई नहीं मैं धार्मिक मिथकों के नये मतलब को समझने का प्रयास करता हूँ मैं जन्म से हिन्दू हूँ किसी शब्द के अनुस्वार या नुक़्ता या चन्द्रबिन्दु जैसा!
यदि मैं अपने बारे में यह कहूँ कि मैं किसी का अंधभक्त नहीं हूँ, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है
👉अहिंन्दी भाषी साहित्यिक साथियों के ब्लॉग पर आपका सादर स्वागत है।✍️
संपादक : गोलेन्द्र पटेल (कवि व लेखक)
संपर्क :
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पिन कोड : 221009
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'क्या यह मित्रता को मुहब्बत में तब्दील करने की_____
भावना में वासना भरने की____
छद्मवेश धरने की_____
वस्तु है?'
'ना , भाई , ना ,
प्रेम____
व्यक्तित्व में
उदात्त होने का तथास्तु है!'
२).
उसने परिणय से पूर्व पूछा—
“प्रेम संभोग है?”— ‘नहीं’
“प्रेम रोग है?”— ‘नहीं’
“प्रेम वियोग है?”— ‘नहीं’
“प्रेम संयोग है?”— ‘नहीं’
“प्रेम योग है?”— ‘हाँ’
किन्तु ,
किसका?
उत्तर— ‘मन से मन का
हृदय से हृदय का
और
कुछ लोग हैं
कि इसे सोग कहते हैं!’
३).
सुनो!
यदि प्रेम अनंत है
तो संभोग क्षणिक
और यह सृष्टि के लिए
ज़रूरी चीज़ है!
४).
प्रेम का प्रथम लक्ष्य सेक्स है
क्योंकि वह परिणय का पिछलग्गू है
५).
मुक्ति के मार्ग में
सेक्स घृणा नहीं,
बल्कि प्रेम है
और उसके बिना सेक्स
विष है
यह जीवन की
थीसिस है!
■
2).
प्रेम
कल स्वप्न में जिस लड़की से मेरा ब्याह हुआ
आज मैंने उससे कहा कि मित्र,
यह सच है
कि प्रेम करने की कोई उम्र नहीं होती है
पर, जीवन के पूर्वार्द्ध का प्रेम ही प्रेम की संज्ञा को साकार करता है
बाकी, उत्तरार्द्ध का प्रेम तो वैसे भी
अपनी उदात्तता में भक्ति है
प्रेम—
मानव जीवन की सबसे मूल्यवान चीज़
जहाँ कहीं भी मिल जाये
शेष सभी चीज़ें सस्ती हो जाती हैं
प्रेम शब्द का मतलब
समाज के उन मानवों से है
जो आज भी जाति, धर्म व देह से परे जा कर
बेइंतहा प्यार करते हैं
उनकी भाषा में घृणा, नफ़रत और ईर्ष्या जैसी मनोवृत्तियों के लिए
कोई जगह नहीं है,
वे शब्दों के फूलों से सामने वाले का स्वागत करते हैं
उसकी पहुनाई में पूरी पृथ्वी समर्पित कर देते हैं
उन्हें बस प्रेम करना आता है
उनकी वजह से जीवन कड़वा होने से बचा है
और नदी सूखने से बची है
उनकी नज़र में प्रेम ही परमात्मा है
प्रेम—
उन्हें तूफ़ानों में भयमुक्त रखता है
उन्हें लहरों से लोहा लेने की शक्ति देता है
उनकी नाव को चट्टानों से टकराने से बचाता है
वे सागर में नहीं, प्रेम में डूबते हैं
वे लड़ते हैं प्रेम के लिए
वे अकाल में किसी पत्थर पर उगी घास हैं
वे बेस्वाद समय में स्वादिष्ट सच हैं
उनके दर्शन से आत्मा हरी हो जाती है
उनकी संगत से अंतर्मन अपनी ऊँचाई छूता है
उन्हीं से प्रेम का अस्तित्व है
प्रेम—
अपराजेय-अपरिभाषित-अमर शब्द है
प्रेम स्वतंत्रता के स्वर का साथ देता है
पर, प्रेम में प्रेम निःशब्द है
वह आज़ादी, न्याय, सच्चाई, स्वाभिमान
और सुंदरता से भरी ज़िंदगी चाहता है
वह मानवता के लिए बंदगी चाहता है
उसी से सद्भावना है
उसी से नये जीवन की सम्भावना है
वह वासना के अँधेरे में प्रदीप है,
नया सौंदर्यशास्त्र रचने वाला शिल्पकार है
आत्मा का शिल्पी है
उसके गाने से
पत्थर-दिल डर जाते हैं
और उसके गीतों से भी!
प्रेम—
पाप और पुण्य से परे मनुष्य को मनुष्य बनाता है
उसकी तलाश में
मैंने पूरी पृथ्वी का कई बार चक्कर लगाया
पर, वह नहीं मिला
नहीं मिला कहीं भी
फिर भी वह मेरे जीवन का लक्ष्य है
उसी से मेरी मुक्ति है
क्योंकि
मुक्ति का दूसरा नाम है प्रेम
वह मेरी बात कितनी समझी
मुझे नहीं मालूम
मगर, मुझे यह मालूम है
कि वह मेरी भाषा से अनजान है
मेरे स्वप्न के बाहर
मुझसे बेहतर इनसान है!
■
3).
पवित्र प्रेम
चल रही है विरह की परीक्षा
इश्क की इमारत में इंगुर पहन रही है इच्छा
दृष्टि! सृष्टि में सम्पन्न हुई दिशा की दीक्षा
शिक्षा है कि उम्मीद की उड़ान उपज्ञा है
परन्तु पृथ्वी पर पवित्र प्रेम प्रज्ञा है
■
4).
जिससे प्यार करूँ
मैं जिससे प्यार करूँ
वह तन से नहीं
मन से सुंदर हो
उसे कलह नहीं
कला प्रिय हो
उसकी भुजा में नहीं
भाषा में बल हो
वह मेरा आज नहीं
कल हो!
■
5).
रूह की रोशनी
देखा जब आँसू के आईने में अपने को
तब जाना कि दिल में दर्द के दाग हैं
दिमाग ने नेह की देह पर लिखा
आँख और आँत में आग के राग हैं
मैं ढो रहा हूँ तुम्हारी बातों का बोझ
अब जिह्वा पर तीन अक्षर बेलाग हैं
रीढ़ की हड्डियों में हुस्न की हँसी
पवित्र प्रेम में समर्पण और त्याग हैं
नसों में रक्त नहीं, रूह की रोशनी
पतझड़ के विरुद्ध मन के बाग हैं!
■
6).
गुज़रने पर
प्रेम-कविता से गुज़रने पर
कोई याद आती है
आँखों से चूतीं बूँदें
कहती हैं कि
जिस देह का आधार स्नेह नहीं
वह गम का गेह है
हवा में उड़ती हुई
खारी ख़ाक रेह है!
■
7).
प्रेम में पड़ीं लड़कियाँ
माफ़ करना
मैंने नहीं मेरे गुरु देखे हैं
कि (पढ़ी-लिखी)
प्रेम में पड़ी हुईं लड़कियाँ
जन्मदिन पर
प्रेमी का पाँव छूती हैं!
■
8).
पिछलग्गू
वे कैसे दिन थे
जब लोग पहले परिणय करते थे
फिर प्रेम
अब तो
प्रेम परिणय का पिछलग्गू है!
■
9).
काली प्रेमिकाएँ
जंगल, पहाड़, समुद्र और कोयले में
जो पाई जाती हैं काली प्रेमिकाएँ
वे सिर्फ़ वासना की पूर्ति भर हैं
उनकी नज़र में
जो उन्हें प्रेम कर के छोड़ देते हैं!
■
10).
ईश्वर नहीं नींद चाहिए
उनके व्यर्थ गए गुनाहों के बारे में
जब सोचती हूँ मैं
स्पर्शशून्य रस उमड़ता है भीतर
आँखें बोलती हैं
ईश्वर नहीं नींद चाहिए!
■
11).
संस्मरण
मुहब्बत वीणा की तरह
मेरे हृदय में थी
तुम तो साधक थे!
अब संगीत में सना संस्मरण
मेरे दिल व दिमाग का गायक है!
■
12).
प्यार! प्यार!! प्यार!!!
प्रिये!
तुम्हारे स्पर्श ने मुझे ज़िन्दा रखा है
मुझे नयनों से नयनों का गोपन
संभाषण पसंद है
उनका मारना नहीं
जब भी तुमने मारीं आँखें
मैं घायल हुआ
तन से, मन से
और मुझ पर
पर्वतराज, सिंधु व सिंह हँसें
जो कि अभिव्यक्ति के अखाड़े में
मुझसे पराजित होते रहे हैं
बार-बार
यदि तुम मेरी प्रेरणा बनोगी
मैं रच डालूँगा
प्रेम का सबसे सुंदर छंद
होगा उसमें
इस जीवन का सार
प्यार! प्यार!! प्यार!!!
■
13).
बीस पार
यह कहना कि मैं प्रेम नहीं करता
सही नहीं होगा
हर किसी की तरह मैं भी देखता हूँ दुनिया
मुझे आकाश होना है
किसी ख़ास चिड़िया के लिए
शायद उसने उम्मीद की उड़ान भरना
सीख ली है
वह मेरी चेतना है
पंखों की लम्बी अनुपस्थिति में
धरती की धुन सुनीं
मेरी आँखें
मैंने महसूस किया कि मेरी हथेलियों की रेखाएँ
मेरे मस्तक पर पढ़ी जा सकती हैं
मैं उसके गीत में उतरना चाहता हूँ
जैसे फूल के रंग
उसकी गंध के राग हैं
मैं वैसे ही उसके शब्द का अर्थ हूँ
मेरे हृदय के स्वर
उदात्त संबंधों के नये अनुराग हैं
मैंने अपने खेतों में प्रेम रोपा है
नयी सदी के लिए
मेरी फ़सलें
पुरखों की संचित मानवीय संवेदनाएँ हैं
मेरे जीवन के वन में असंख्य यादों के पेड़ हैं
जहाँ समय संवाद और सवाल करता है
मेरे भूत, वर्तमान और भविष्य से
और मुझे उसकी उपस्थिति की अनुभूति होती है
तन-मन की हरियाली से
लेकिन लताएँ
नदी की ओर जाती हुई हवा से कहती हैं
कि मैं बीस पार हो चुका हूँ
मुझे सागर से सीख लेने की आवश्यकता है!
■
14).
प्यार का इंतज़ार
नहीं हूँ किसी का भी भक्त मैं
पर प्रभु तुम्हारे मंदिर की सीढियों पर
करती हूँ अपने प्यार का इंतज़ार
वैसे ही
जैसे पृथ्वी करती है
वसंत की प्रतीक्षा!
■
15).
चिंतित समुद्र
उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की
यात्रा से लौटे हैं प्रभु!
उनकी थकान की मात्रा
मीडिया में मुस्कुरा रही है कि
रेगिस्तान में
जब उठती हैं लहरें
समुद्र चिंतित होता है
पर नदी प्रसन्न होती है
क्योंकि वह प्यास बुझाती है!
■
16).
भावना-भूख
मैंने प्रेम किया अपने उम्र से
मुझसे प्रेम कर बैठी बड़ी उम्र
स्नेह के स्तन से फूट पड़ी दूध की धार
लोग कहते हैं इसे हुआ है तुझसे प्यार
दुनिया देख रही है दिल में दर्द-ए-दुख
दृश्य दृष्टि से बाहर दौड़ रहा है निर्भय
देह की दयनीय दशा दर्पण में मुख
ममत्व का मन निहार रहा है वात्सल्य
नादान उम्र नदी बीच नाव पर है भावनाभूख
हिमालय पर हवा का होंठ चूम रहा है हृदय
संवेदना सो रही है शांत सागर में चुहकर ऊख
वासना बेना डोला रही है अविराम मेरे हमदम!
मैंने प्रेम किया.....
(रचना : 2017)
■
17).
चेहरे पर चेतना की चाँदनी का चुम्बन
संभावना के स्वर में
सुबह गा रही है उम्मीद का गीत
हे सखी!
शाम आ रही है
नाव पर
धारा के विपरीत पतवार खेओ!
तरंग टकरा रही है तन से
नदी उचक-उचक कर उर छू रही है मन से
हवा की गंध तैर रही है सतह पर
तकलीफ़ों के तूफ़ान पर फतह कर
तकदीर उत्साहित है
मछली की तरह ;
आशाएँ आती हैं आकाश से
मछुआरिन की कीचराई आँखें चमक उठती हैं
चेहरे पर चेतना की चाँदनी चूमती है
प्रेम का तुहिन ताप बुझाता है
तरुणी की तरणी पहुँच जाती है किनारे
भव सागर के पार!
(रचना : ३०-१०-२०२०)
■
18).
आवाज़
मैं जिनकी आवाज़ हूँ ,
उन्हें मालूम है
कि मैं उनकी कितनी आवाज़ हूँ
कैसी आवाज़ हूँ!
■
19).
एक अथाह अर्थ में आह
मुझ पर विजय पाने के लिए
तुम्हारा भगीरथ प्रयास व्यर्थ है
मुझे मालूम है
तुम्हारी मुस्कान का क्या अर्थ है?
तुम्हारी आँखों का अस्त्र
मुझे घायल करने में असमर्थ है
तुम्हारे होंठों की शक्ति
मुझे पराजित करने में असमर्थ है
ओ भावना!
मैं भाषा में प्यार नहीं
विचार हूँ!!
तुम्हारा समर्पण सराहनीय है
लेकिन मेरे पास
एक अथाह अर्थ में आह है
सुगबुगाता संबंध
तुम्हारी चाह की राह में डाह है
रव की रुकावट
बेवजह बुद्धि का ब्रेकर
सत्य के सफ़र में
राग को रोक रहा है
समय का शब्द
स्वर को टोक रहा है
तुम्हारी मुहब्बत में मोड़ अधिक है
तुम्हारा मन स्वयं पथिक है
तुम्हारी बात
रात में बस की बर्थ है
ओ वासना!
मैं देह की परिभाषा में मोच नहीं
नयी सोच हूँ!!
■
20).
परीक्षा केंद्र पर प्रेम
आजकल धर्मपुरी में धूपाग बरस रही है
विद्युत के लाले पड़े हैं
सड़कों के तपन-राग गाँव के नंगे पाँव गुनगुना रहे हैं
जहाँ प्रबुद्ध पेड़ पक्षियों का डैना नहीं,
पंखों का डैना देखते हुए दिन काट रहे हैं
उनकी रात मत पूछो कैसे कटी, पद्मिनी!
हे पद्मिनी!
कल, पांडेयपुर की काली माता के मंदिर में
परीक्षा के बहाने मिलते हैं
लेकिन याद रखना इस बार
न किसी का सर कटेगा
न हाथ
न कोई कपिलदेही देवदत्त कहलायेगा
न कोई देवदत्त-शरीरी कपिल
एक जन्म पुरुष चार अनुपस्थित रहेगा
पर, समस्या वही रहेगी
तुम्हारे वक्ष पर वेदना रहेगी
जाँघों पर परम प्रेमी
आँखों में मशाल
और कौमार्य के खुले अधरों पर
कामदेव-रति का नृत्य होगा
कोई मुखौटा नहीं
हृदय को सब स्पष्ट दिखेगा
मैं तुम्हारे केशों को केशव की तरह प्यार करूँगा,
तुम राधा की तरह चेहरे पर मन की मुस्कान लेकर
आओगी न, पद्मिनी?
आ गयी पद्मिनी
काली-मंदिर के भीतर
पसीना से तरबतर
तुम्हारे साथ ये सिपाही कौन हैं, पद्मिनी?
"पिताजी"
ओह!, अब क्या होगा?
परीक्षा शुरू होने से पहले ही चले जाएंगे
तब ठीक है
पद्मिनी, ये सब परीक्षार्थी नहीं, प्रेमी हैं
और
आँखों के अंतर्वैयक्तिक सम्प्रेषण
सिर्फ़ प्रेमी समझते हैं!
ज़रा सावधानी से सब इधर ही देख रहे हैं
"वे देख नहीं रहे हैं,
अपनी आँखें सेंक रहे हैं!"
जानती हो पद्मिनी?
पुरुष कथ्य किसी से भी सीख सकता है
लेकिन जीवन का शिल्प तो वह अपनी स्त्री से ही सीखता है
और एक बात, यह सरासर गलत है
कि स्त्री के प्रेमतंत्र में बुद्धि और ज्ञान की कोई जगह नहीं है
प्रेम में मान और महत्व के बीच
कुछ पाना
कुछ खोना है
क्योंकि वह आत्मा को जागृत करता है
मेरा घर-द्वार व ज़मीन-जैजात सब कुछ बिक गया है
मैंने अपने आँख-कान व किडनी-गुर्दा आदि अंगों का दान कर दिया
मतलब मेरे पास सिर्फ़ बचा है ईमान-धर्म
जो तुम्हारा पेट नहीं भर सकता, पद्मिनी!
न मुझे भूत की चिंता
न भविष्य की
मुझे वर्तमान में जीने की आदत है, पद्मिनी!
पद्मिनी, प्रेम का कोई धर्म नहीं होता है
कोई जाति नहीं होती है
लेकिन परिणय का धर्म होता है न?
पद्मिनी, हम इस समय जिस अवस्था में है
इसमें भावुकता प्रधान है
हमें गंभीरता और संयम से सोचने की आवश्यकता है।
लो, परीक्षा-कक्ष में परिवेश के लिए
घंटी बज गयी
तुम्हें पता है पद्मिनी
रट्टा और रचनात्मकता एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं
अर्थात्
परीक्षा रटना क्रिया का पक्षधर है
पर प्रतिभा रचना क्रिया का
इन दोनों क्रियाओं में श्रेष्ठ कौन हैं, पद्मिनी?
पद्मिनी, यह परीक्षार्थियों की भाषा में पीएचडी का प्रश्न है
मैंने तुम्हारी साँसों के स्वाद से जाना
ज़िस्म के जश्न पर रूह क्यों मौन है?
पद्मिनी, हमें पुरखे कवियों व लेखकों के बारे में
कुछ नया कहने लिए
उन पुरखों व पूर्ववर्तियों से अधिक सोचना है
उन से अधिक मानसिक श्रम करना है
जो उन पर कुछ नया कह चुके हैं
नया के बाद कुछ नया कहना
पुनर्नवा है
और यह पुनर्नवा परंपरा पर प्रश्नचिह्न लगाता है
क्योंकि इसमें परिवर्तन की शक्ति निहित होती है, पद्मिनी!
पद्मिनी, साहित्य का सूरज पश्चिम में उगता है
उसके पूरब में उगने का अर्थ है
उसे किसी राहु-केतु से भय नहीं है
उसे किसी अग्नि-परीक्षा की चिंता नहीं है
क्योंकि वह स्वयं आग का गोला है न?
ओह हो, तुम्हारी सीट उस कक्ष में है
मेरी सीट इस कक्ष में है
परीक्षा के बाद गेट पर मिलते हैं!
पेपर कैसा रहा पद्मिनी?
ठीक रहा,
परंतु परीक्षक पिछले कुछ वर्षों से
पेपर कठिन बनाने के चक्कर में प्रश्न ही गलत बना दे रहे हैं
मुझे लग रहा है ये-ये प्रश्न गलत हैं
चलो, गलत हैं तो उसके फ़ायदे भी तो हैं
फ़ायदा क्या घंटा?
गलत प्रश्न आगामी प्रश्न के उत्तर को प्रभावित करते हैं
और उनके प्रभाव में
आगामी प्रश्न के गलत होने की संभावना बढ़ जाती है
खैर, तुम्हारा कैसा गया?
मेरा??
मेरा क्या?
मैं मस्त रहता हूँ
मुझे परीक्षा-वरीक्षा की चिंता नहीं रहती है
वैसे भी अब तक मैंने जितने साहित्यकारों को पढ़ा है
उनमें से अधिकांश के पास मुझसे कम डिग्री है
वे अपने समय के कबीर हों
या फिर निराला
या फिर कोई और
उधर देखो, पद्मिनी!
तुम्हें तुम्हारे सिपाही बुला रहे हैं
इधर मुझे मेरी सड़क!
■
21).
नई सुबह
नई सुबह का स्वर -
हवा , धूप व बारिश वृक्ष के अधीन हैं
धरती आसमान से पूछ कि प्रेम क्या है ?
क्या अब भी वे उड़ने में लीन हैं ?
जो पंक्षी बीज बोते हैं
उसकी छाया में सुस्ताते वक्त
तुम्हारी आँखों में अपना चेहरा देखना
असल में अंतर्मन को सेकना है !
संक्षिप्त परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल
उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान' , 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि', 'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से नेट।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।
ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-
गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'गद्य कोश', 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट', 'सबलोग पत्रिका', 'वागर्थ', 'अमर उजाला', 'रणभेरी', 'हिंदुस्तान', 'दैनिक जागरण', 'परिवर्तन', 'मातृभाषा. कॉम', 'न्यूज़ बताओ' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।
लम्बी कविता : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' एवं 'दुःख दर्शन'
अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित
काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।
सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023", "मानस काव्य श्री सम्मान 2023" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।
मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर और 'दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान' के संस्थापक हैं।
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
आह से उपजी कोई पीड़ा
रोशनी में राह से क्यों भटक जाती है?
कवि जिस मकान में रहता है
उसकी न कोई दीवार होती है
न कोई छत
दिन के अँधेरे में मकान की दीवारें
आपस में बतियाती हैं कि मकान मोह से शुरू होकर
मोहभंग पर ख़त्म होता है
इसकी नींव में सदियों की नींद दफ़नी है
इसके छत पर
मरी हुई भाषा में आसमान रोता है
इसकी ज़मीन पर आँसू के धब्बे हैं
इसके रोशनदान में गौरैया का खोता है
पर, उसमें कोई चहक नहीं, कोई हलचल नहीं
तभी तो, एक दीवार ने सामने की दीवार से कहा
कि बहन तुम्हारी पीठ पर लिखा है
आदमी जैसे-जैसे बड़ा होता है
उसका घर
वैसे-वैसे छोटा होता है
बिल्कुल जंगल की तरह छोटा हो जाता है
आँगन के पेड़ को साँप सूँघा है
समय शून्य है
और कमरा सुन्न, उसमें नहीं कोई धड़कन, नहीं कोई धुन
फिर एक दीवार ने सामने की दीवार से पूछा
कि बहन तुम्हारे पेट में कोई बात पचती क्यों नहीं है!
सुनो न, अपनी परछाईं के किस्से कितने अजीब हैं
कोई ठोंकता है हमारी छाती में कील
कोई पोतता है हमारे चेहरे पर ख़ून,
कोई थूकता है रंगीन बलगम
कोई मूतता है हमारे ऊपर
हमारे ऊपर कोई कुछ लिखता है, कोई कुछ लिखवाता है
कोई कुछ बनाता है, कोई कुछ बनवाता है...
देखो न, हम गरीब हैं, कला के करीब हैं
हम कई दिनों से चुप्पी पी रहे हैं
हमारी मालकिन कहाँ गयी हैं?
गहरे उच्छवास के साथ एक दीवार ने बोला
कि काश कि हम चल पाते बहन!
तो ज़रूर ढूँढ़ते मालकिन को
और मालिक को भी
मालिक हमें हर दीवाली पर नई साड़ी गिफ़्ट करते हैं न!
फिर एक दीवार बोली,
बहन! क्या इस दीवाली पर हमें नई साड़ी नहीं मिलेगी?
अगल-बगल के मकानों की दीवारें नई साड़ियाँ पहन रखी हैं
वे इठला रही हैं, चमक रही हैं, अँगूठा दिखा रही हैं
हमारी हँसी उड़ा रही हैं
हमें अपने मालिक को खोजना चाहिए
नहीं तो ये मूतभुसौलिन दीवारें हमें खड़ी रहने नहीं देंगी
हमें एक साथ ज़ोर से मालिक को बुलाना चाहिए
दीवारों की पुनर्पुकार मालकिन के लिये है
मालकिन के बिना मकान वैसे भी मकान नहीं होता है
हाय, इस मुल्क में मकानों के मुहावरे मौसम के मारे हैं
उनकी दीवारों पर
जीवन के कुछ नारे हैं
जो आदमी को नये परिचय की ओर लेकर
चल रहे हैं और
यह बता रहे हैं कि
पहले मकान का 'म' गायब हुआ, फिर 'कान'!
दरवाज़े-खिड़कियों के संवाद में दीवारों की चर्चा है
जहाँ दुख उन्हें खुरोचा है
एक मकान बनाने में बहुत ख़र्चा है
दीवारें लोकमंगल के दिन दुखी हैं, बहुत दुखी हैं
हाय-हाय करते-करते मालिक चल बसे हैं
एक भावभीनी दीपांजलि मालिक के नाम
इस दीपोत्सव के दिन!