Thursday, 24 September 2026

अशोक वाजपेयी : कविता, सत्ता और सांस्कृतिक वर्चस्व के कठघरे में || गोलेन्द्र पटेल

अशोक वाजपेयी : कविता, सत्ता और सांस्कृतिक वर्चस्व के कठघरे में
(पोस्टर साभार: नवीन कुमार) 

अशोक वाजपेयी का प्रश्न केवल एक कवि के प्रश्न के रूप में नहीं देखा जा सकता। वे कवि होने के साथ-साथ प्रशासन, कला-संस्कृति, संस्थाओं और साहित्यिक आयोजनों की दुनिया से गहरे जुड़े रहे हैं। इसलिए उनके सार्वजनिक वक्तव्य, सांस्कृतिक मंचों पर उनकी उपस्थिति और साहित्यिक प्रतिष्ठान में उनकी भूमिका स्वाभाविक रूप से आलोचना के विषय बनती है। यहाँ मुद्दा यह नहीं कि अशोक वाजपेयी अच्छे कवि हैं या बुरे; मुद्दा यह है कि क्या साहित्यिक प्रतिष्ठा किसी लेखक को सामाजिक आलोचना से ऊपर उठा देती है? निश्चित ही नहीं। किसी कवि की काव्य-प्रतिभा का सम्मान करते हुए भी उसके सामाजिक दृष्टिकोण, सार्वजनिक वक्तव्यों और संस्थागत भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं। बल्कि जो व्यक्ति स्वयं सार्वजनिक बुद्धिजीवी की भूमिका में उपस्थित हो, उससे जवाबदेही की अपेक्षा और अधिक होती है। इसी संदर्भ में फेसबुक पर कृष्ण कल्पित की टिप्पणी बेहद तीखी है। वे अशोक वाजपेयी और अन्य साहित्यकारों को “अवसरवादी” कहते हुए लिखते हैं, “ये सब लिबरल कहलाते हैं लेकिन हैं अवसरवादी। अचूक अवसरवादी!” उनका आरोप है कि एक ऐसे आयोजन में साहित्यकार उपस्थित थे जहाँ, उनके अनुसार, सावरकर और गोडसे का महिमामंडन किया जा रहा था और उपस्थित साहित्यकारों ने उसका प्रतिवाद नहीं किया। कवि कृष्ण कल्पित की भाषा भले ही आक्रामक हो, लेकिन उसके भीतर एक गंभीर नैतिक प्रश्न छिपा है; साहित्यकार की वैचारिक प्रतिबद्धता की परीक्षा उसके लेखन से बाहर उसके सार्वजनिक आचरण में भी होती है या नहीं? यदि कोई लेखक लोकतांत्रिक, उदार और मानवीय मूल्यों का प्रतिनिधि होने का दावा करता है, तो यह पूछना असंगत नहीं कि वह किन मंचों पर जाता है, किन सांस्कृतिक शक्तियों के साथ खड़ा होता है और किन परिस्थितियों में मौन रहता है। हाँ, कृष्ण कल्पित द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार अथवा अन्य गंभीर व्यक्तिगत आरोपों को प्रमाण (साहित्यिक सीबीआई जाँच) के अभाव में तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन उन आरोपों से अलग भी सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न पूरी शक्ति से मौजूद रहता है। साहित्यकार मंच चुनता है तो मंच भी साहित्यकार को चुनता है; इसलिए मंच की वैचारिकी से स्वयं को पूरी तरह असंबद्ध घोषित करना हमेशा संभव नहीं होता। यहीं अशोक वाजपेयी के संदर्भ में कविता और सत्ता के बीच संबंध का प्रश्न उठता है। कविता यदि सत्ता से सवाल करती है, तो कवि का सत्ता-समीप सांस्कृतिक व्यवहार भी आलोचना के दायरे में आएगा और यदि कविता में लोकतांत्रिक संवेदना का दावा हो, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उसका व्यवहार उस दावे से असंगत दिखाई दे, तो आलोचक को उस अंतर्विरोध को रेखांकित करने का पूरा अधिकार है।

कवि कँवल भारती इस प्रश्न को और गहरे सामाजिक धरातल पर ले जाते हैं। उनका आरोप है, “अशोक वाजपेयी की नज़र में ब्राह्मण होना ही आजकल साहित्यकार होने की सबसे बड़ी योग्यता है।” यह व्यक्तिगत आरोप है और इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस कथन के पीछे छिपे संरचनात्मक प्रश्न को टाला भी नहीं जा सकता; क्या हिंदी साहित्य का प्रतिष्ठान वास्तव में जाति-निरपेक्ष है? भारत में साहित्यिक प्रतिष्ठा केवल रचना की गुणवत्ता से नहीं बनती। विश्वविद्यालय, अकादमियाँ, पुरस्कार, प्रकाशन-संस्थाएँ, पत्रिकाएँ, आलोचक, साहित्यिक मंच, सांस्कृतिक संस्थाएँ और सामाजिक संपर्क; ये सभी मिलकर साहित्यिक पूँजी का निर्माण करते हैं। यदि इन संस्थाओं में सामाजिक प्रतिनिधित्व असंतुलित हो, तो “प्रतिभा” की चर्चा को सामाजिक संरचना से काटकर देखना अधूरा होगा। लेकिन जाति-विरोध की सबसे पहली शर्त यह भी है कि आलोचना जाति-व्यवस्था और जाति-व्यक्ति में अंतर करे। किसी व्यक्ति का ब्राह्मण होना अपने आप में उसके साहित्य को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। प्रश्न तब पैदा होता है जब जन्म से प्राप्त सामाजिक-सांस्कृतिक पूँजी को प्राकृतिक श्रेष्ठता समझा जाए या किसी सामाजिक पदानुक्रम को साहित्यिक योग्यता का अदृश्य प्रमाण बना दिया जाए। यहीं आचोलक डॉ. कमलेश वर्मा की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे अशोक वाजपेयी की विद्वत्ता को स्वीकार करते हुए लिखते हैं, “अशोक वाजपेयी विद्वान् हैं। उनके कला कोविद होने पर कभी किसी को संदेह नहीं रहा है।” लेकिन उसी के साथ वे कथित “भड़भूजा” संबंधी वक्तव्य को उनकी साख को कमजोर करने वाला बताते हैं। वे आगे कहते हैं कि यदि अपनी जाति के अभिमान और दूसरे की जाति के अपमान को हास्य का आधार बनाया जाए, तो ज्ञान “आत्मघाती” हो जाता है। यहाँ आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है; विद्वत्ता नैतिक प्रतिरक्षा-कवच नहीं है। किसी व्यक्ति ने कितनी पुस्तकें पढ़ी हैं, कितने पुरस्कार पाए हैं, कितने बड़े साहित्यकार उसके मंच पर आए हैं या उसने कितने बड़े पदों पर काम किया है; इन सबका अपना महत्व है; लेकिन इनमें से कोई भी उपलब्धि उसे सामाजिक पूर्वाग्रह से मुक्त होने का प्रमाणपत्र नहीं देती। ज्ञान की वास्तविक परीक्षा इस बात में होती है कि वह मनुष्य को अधिक मनुष्य बनाता है या नहीं। यदि जाति के आधार पर हास्य किया जाता है, तो यह देखना जरूरी है कि उस हास्य का निशाना कौन है और उसमें शक्ति-संबंध किसके पक्ष में काम कर रहा है। “मजाक” कह देने मात्र से सामाजिक अपमान का प्रभाव समाप्त नहीं हो जाता। विशेषतः उस समाज में जहाँ जाति केवल पहचान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता की संरचना रही है। यहीं युवा आलोचक डॉ. मोतीलाल की टिप्पणी नैतिक प्रश्न को और तीखा करती है। वे लिखते हैं, “निम्न कोटि के विचार महान आत्माओं के हृदय में पैदा नहीं होते हैं। वे क्षुद्र हृदय में ही पैदा होते हैं।” उनके द्वारा उद्धृत गीता-वाक्य (क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोतिष्ठ परन्तप!) का आशय भी तुच्छ दुर्बलता से ऊपर उठने की प्रेरणा से जुड़ा है। इस कॉमेंट को किसी व्यक्ति की अंतिम नैतिक पहचान मान लेना उचित नहीं होगा; लेकिन इसका प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है; क्या महान साहित्यिक प्रतिभा लेखक को नैतिक छूट दे देती है? यदि ऐसा होता, तो साहित्य का समूचा नैतिक विवेक समाप्त हो जाता।

कवि कितना भी बड़ा हो, उसके शब्दों की सामाजिक परिणति पर प्रश्न उठेंगे। रचनाकार कितना भी प्रतिष्ठित हो, उसके सार्वजनिक वक्तव्यों की आलोचना होगी। साहित्यिक उपलब्धियाँ किसी मनुष्य को आलोचनातीत नहीं बनातीं और यहीं युवा कवि मोहन मुक्त की टिप्पणी इस पूरे विवाद को कविता से उठाकर श्रम, वर्ग और अर्थव्यवस्था के प्रश्न तक पहुँचा देती है। उनका तीखा सवाल है, “हम अन्न खाते हैं या कविता???” और फिर वे पूछते हैं, “ये 21 लाख रुपए किसके श्रम से पैदा होते हैं?” इन प्रश्नों को शाब्दिक अर्थ में लेकर कवि और श्रमिक को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना उचित नहीं। समाज को अन्न भी चाहिए और कविता भी; भौतिक श्रम भी चाहिए और सांस्कृतिक श्रम भी। लेकिन मोहन मुक्त जिस असमानता की ओर संकेत करते हैं, वह गंभीर है; सांस्कृतिक सम्मान और आर्थिक गरिमा का वितरण इतना असमान क्यों है? एक कवि को इक्कीस लाख रुपये का पुरस्कार मिलना अपने आप में श्रमिक के श्रम का अपमान नहीं है। लेकिन उसी समय यह पूछना पूरी तरह जायज़ है कि पुरस्कार-व्यवस्था किस सामाजिक प्राथमिकता का प्रतिनिधित्व करती है, साहित्यिक प्रतिष्ठा किन वर्गों तक अधिक आसानी से पहुँचती है और श्रमजीवी समाज को उसकी बुनियादी गरिमा क्यों नहीं मिल पाती। इसलिए सही प्रश्न यह नहीं कि “कवि अधिक जरूरी है या श्रमिक?” सही प्रश्न यह है कि ऐसा समाज क्यों नहीं बनाया जा सकता जिसमें कवि को उसकी रचना का सम्मान और श्रमिक को उसके श्रम की गरिमा—दोनों मिलें? कवि श्रमिक का विकल्प नहीं है; लेकिन कवि श्रमिक से अलग कोई विशेषाधिकार-संपन्न मनुष्य भी नहीं है। यहीं साहित्यिक सौंदर्यबोध का प्रश्न भी सामने आता है। यदि कविता केवल अभिजात सांस्कृतिक स्वाद, संस्थागत प्रतिष्ठा और पुरस्कारों के संसार में घूमती रहे और खेत, कारखाने, ईंट-गारा, भूख, जातिगत अपमान, स्त्री, दलित, आदिवासी और श्रमजीवी मनुष्य उसके सौंदर्यशास्त्र के बाहर छूटते जाएँ, तो उस सौंदर्यबोध पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। साहित्य का सौंदर्य मनुष्य से बड़ा नहीं हो सकता। यही कारण है कि “ब्राह्मण सौंदर्यबोध” जैसी अवधारणा को केवल जातिगत गाली समझकर खारिज करने के बजाय उसके सामाजिक आशय की जाँच जरूरी है। प्रश्न किसी जन्मना समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक संरचना के विरुद्ध होना चाहिए जिसमें कुछ अनुभव “साहित्यिक” और कुछ अनुभव “गैर-साहित्यिक” मान लिए जाते हैं; कुछ भाषिक संस्कार “उच्च” और लोकभाषाएँ “निम्न” समझी जाती हैं; कुछ जीवनानुभव सार्वभौमिक और कुछ हाशिये के अनुभव घोषित कर दिए जाते हैं।

इसी अर्थ में अशोक वाजपेयी का प्रश्न व्यक्तिगत सीमा से बाहर जाकर हिंदी साहित्यिक प्रतिष्ठान का प्रश्न बन जाता है। कृष्ण कल्पित का “अवसरवाद”, कँवल भारती का “जात्याभिमान”, कमलेश वर्मा का “आत्मघाती ज्ञान”, मोतीलाल का “क्षुद्र हृदय” और मोहन मुक्त का “श्रम के प्रश्न” पर ज़ोर देने वालीं टिप्पणियाँ भिन्न कोणों से एक ही बड़ी समस्या की ओर संकेत करती हैं: क्या साहित्य अपनी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी से बचकर केवल प्रतिष्ठा, पुरस्कार और सांस्कृतिक प्रभाव का संसार बन सकता है? यहीं अशोक वाजपेयी की सबसे कठोर आलोचना संभव है। उनकी कविता का साहित्यिक मूल्य अपनी जगह है। उनकी विद्वत्ता और सांस्कृतिक सक्रियता भी अपनी जगह है। लेकिन कवि होना आलोचना से मुक्ति-पत्र नहीं है। जितनी बड़ी सार्वजनिक प्रतिष्ठा, उतनी ही बड़ी सार्वजनिक जवाबदेही। साहित्य में किसी लेखक की वास्तविक ऊँचाई केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने बड़े संस्थान उसे सम्मानित करते हैं; बल्कि इस बात से भी कि उसकी भाषा समाज के कितने अदृश्य मनुष्यों को दृश्य बनाती है। यदि किसी साहित्यिक प्रतिष्ठान में जाति, वर्ग, सत्ता, पूँजी और संस्थागत पहुँच साहित्यिक मान्यता को प्रभावित करते हैं, तो उस प्रतिष्ठान की आलोचना जरूरी है। यदि किसी मंच पर लेखक अपनी घोषित मानवीय प्रतिबद्धताओं के विपरीत शक्तियों के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो सवाल जरूरी है। यदि किसी वक्तव्य में किसी जाति या श्रमजीवी समुदाय की गरिमा चोटिल होती है, तो प्रतिवाद जरूरी है और यदि साहित्यिक पुरस्कारों की चमक के सामने श्रमजीवी मनुष्य की बुनियादी गरिमा अदृश्य हो जाती है, तो साहित्य को अपने आईने में स्वयं को देखना होगा। इसलिए अशोक वाजपेयी की आलोचना किसी कवि को गिराने की कवायद नहीं होनी चाहिए। यह उस सांस्कृतिक सत्ता की आलोचना होनी चाहिए जो साहित्यकार को इतना प्रतिष्ठित बना देती है कि उसके शब्दों और व्यवहार पर सवाल उठाना ही असभ्यता समझ लिया जाता है। साहित्य में सबसे बड़ी पूँजी पुरस्कार नहीं, विश्वसनीयता है। सबसे बड़ा पद कवि का नहीं, मनुष्य का है और साहित्य की अंतिम कसौटी यह नहीं कि वह कितनी ऊँची संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि यह है कि वह समाज के सबसे नीचे धकेले गए मनुष्य की गरिमा को कितनी ऊँचाई देता है। जिस साहित्य में कवि की प्रतिष्ठा मनुष्य की प्रतिष्ठा से बड़ी हो जाए, वहाँ कविता को नहीं, पूरे साहित्यिक प्रतिष्ठान को कठघरे में खड़ा करना चाहिए।
★★★
टिप्पणीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
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