Saturday, 18 April 2020

COVID19 कोविड19 और भारत सरकार


भारत के मुख्य न्यायाधीश एस.ए बोबड़े को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा गया है। इस पत्र में सुप्रीम कोर्ट और बार काउंसिल से प्रार्थना की गई है कि वह उस स्थिति पर संज्ञान लें जिसमें वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण स्वतंत्र युवा अधिवक्ता भुखमरी के कगार पर हैं। पत्र में अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और अधिवक्ता कल्याण योजना, 1998 के प्रावधानों के अनुसार कोरोना वायरस (COVID-19) के प्रकोप के चलते एक आपातकालीन कोष के निर्माण की भी मांग की गई है। अधिवक्ता पवन प्रकाश पाठक और आलोक सिंह द्वारा भेजी गई इस पत्र-याचिका में कहा गया है कि अब तक भारत में 4000 से अधिक कोरोना के पॉज़िटिव मामले सामने आए हैं, जिसमें 114 की मौत हो चुकी है। इसके अतिरिक्त, लगभग 162 देशों में लगातार लॉकडाउन के कारण व्यवसाय वैश्विक वित्तीय बाजार आसन्न पतन के डर के साये में चल रहे हैं। पिछले वर्ष की सुस्त आर्थिक वृद्धि, बढ़ती बेरोजगारी, ब्याज दरों और राजकोषीय घाटे के कारण भारत की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आई है। वहीं रेटिंग एजेंसियों ने यह भी घोषित किया है कि यह महामारी भारत के लिए एक आर्थिक सुनामी साबित होगी, इसीलिए, 26 मार्च को, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 बिलियन डॉलर के पैकेज की घोषणा की थी जिसका उद्देश्य आर्थिक व्यवधान को कम करना था। एक दिन बाद आरबीआई ने भी ब्याज दरों में कटौती कर दी और घाटे में आ रहे व्यवसायों के लिए ऋण उपलब्ध कराने के लिए अपरंपरागत उपाय भी किए गए। इस पत्र-याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि- ''वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति को अनोखे संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह पूँजीवाद के विघटित संरचनात्मक संकट की जातीय स्थिति है। साथ में आय में बहुत ज्यादा असमानता, बेरोजगारी, श्रमिक वर्ग की उचित स्वास्थ्य देखभाल के लिए दुर्गमता, श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त करने में दुर्गमता और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए भी बहुत अधिक अंतर्जात स्थिति है।'' इसी के आधार पर, पत्र-याचिका में कहा गया है कि न्यायालय के अधिकारी अर्थात् अधिवक्ता, इस लॉकडाउन की चपेट में आ गए हैं और वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। आगे कहा गया कि ''... अगर लॉकडाउन आगे बढ़ता है, तो यह अधिवक्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है, जिनके पास उनकी आय का एकमात्र स्रोत मुकदमेबाजी है। यह समय है कि मौलिक और कानूनी अधिकारों के रक्षक इस जिम्मेदारी का ख्याल एक वर्ग (बार और बेंच)के रूप में रखें और इसके लिए राज्य या संघ से मिलने वाली राहत निधि की प्रतीक्षा न की जाए, क्योंकि सरकार को बड़े पैमाने पर अन्य व्यवसायों और नागरिकों का ध्यान भी रखना होगा।'' तथ्य यह है कि महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के चलते स्वतंत्र युवा वकीलों को एक कठिन समय का सामना करना पड़ा है। पत्र-याचिका में कहा गया है कि इन सभी को दिल्ली में सीमित काम के साथ रहना पड़ रहा हैं, और इसके बाद गर्मियों की छुट्टी होगी। जो उनकी वित्तीय स्थिति को और खराब कर देंगी। इसमें कहा गया कि ''... स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है और क्योंकि किराए के घर, भोजन और मेडिकल बिलों के भुगतान का अतिरिक्त बोझ है, जबकि आय के सीमित साधन हैं, इसलिए विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत किया गया कि हम इस बात की वकालत नहीं कर रहे हैं कि वर्तमान महामारी के दौरान ''वित्तीय सहायता'' हमारा ''मौलिक अधिकार'' है। तत्काल पत्र के माध्यम से हम केवल युवा स्वतंत्र अधिवक्ताओं की दुर्दशा साझा कर रहे हैं, जो समय के प्रकोप का सामना कर रहे हैं।'' इस पत्र-याचिका में राज्य बार एसोसिएशनों की नीतियों में एकरूपता या समानता की कमी पर भी प्रकाश डाला गया है, जिन्होंने अधिवक्ताओं के लिए विभिन्न ''वित्तीय सहायता'' योजनाएं बनाई हैं। यह भी कहा गया है कि यह उन अधिवक्ताओं के संबंध में एक संदेहापस्द विषय है, जो किसी भी संघ के साथ पंजीकृत न होने के कारण भगवान की दया पर छोड़ दिए गए हैं। यह भी कहा गया है कि बार काउंसिल ऑफ दिल्ली द्वारा प्रचारित नीतियों में अधिवक्ताओं को विभिन्न वर्गों में विभाजित कर दिया है। यह वर्गीकरण समझदारी से भिन्नता न करने की कमी के कारण समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। इसी तरह की नीति की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने भी की है। "तात्कालिक पत्र का उद्देश्य संबंधित राज्य बार संघों के प्रयासों और COVID-19 के संकट से लड़ने के उनके इरादे को हतोत्साहित करना नहीं है। यह विनम्रतापूर्वक बताया जा रहा है कि तत्काल पत्र केवल युवा स्वतंत्र अधिवक्ताओं की दुर्दशा को व्यक्त करने का प्रयास कर रहा है। जो किसी भी कोर्ट बार एसोसिएशन से जुड़े नहीं हैं और जिनको अभी भी स्टेट बार या बीसीआई से वित्तीय मदद की सख्त जरूरत है।'' पत्र-याचिका में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अधिवक्ताओं के लिए उपलब्ध कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बताया गया है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में रोल पर आए या पंजीकृत अधिवक्ताओं के अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा के लिए प्रावधान हैं। अधिवक्ता अधिनियम की धारा 6 (2) में भी अधिवक्ताओं के लिए आपातकालीन फंड का निर्माण करने का प्रावधान है। चूंकि सभी अधिवक्ताओं ने बार एसोसिएशनों की स्वैच्छिक सदस्यता के विपरीत अपनी पसंद वाले राज्य की बार काउंसिल के साथ पंजीकरण करवाया हुआ है , इसलिए वे उन कल्याणकारी योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता के हकदार हैं जिन्हें अधिनियम के तहत प्रख्यापित किया गया है। ''यह विनम्रतापूर्वक कहा गया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 अधिवक्ताओं के लिए वित्तीय निधि के निर्माण का प्रावधान करता है ताकि उनके अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा की जा सकें। इसलिए, विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की जाती है कि कृपया अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत उस पॉवर को लागू करें और उन युवा स्वतंत्र अधिवक्ताओं के लिए आपातकालीन कोष बनाया जाए, जिनको COVID-19 के दौरान वित्तीय सहायता की आवश्यकता है।'' पत्र-याचिका में शामिल किए गए सुझाव,जो इस प्रकार हैं- ''ए-बार और बेंच की मदद से एक समर्पित एकल आपातकालीन पूल फंड बनाया ला सकता है। बी- बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास सभी स्टेट बार एसोसिएशंस का डेटा है, इसलिए बीसीआई पूल फंड और वित्तीय सहायता की आवश्यकता वाले अधिवक्ताओं को यह फंड बांटने के लिए प्रबंधक निकाय बन सकता है। सी- प्रश्न उठता है कि कौन COVID-19 स्थिति के दौरान ''वित्तीय सहायता के लिए पात्र है?'' खैर, नियमों को बार के सदस्यों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है, जबकि हमारे सुझाव इस तरह होंगे- 1-अधिवक्ता जो अपने संबंधित राज्य की बार के साथ पंजीकृत हैं और उनके नाम राज्य रोल पर नामांकित हैं। दो-अधिवक्ता जो स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं और किसी भी कानूनी फर्म या चेम्बर्स या किसी अन्य स्रोत से वेतन/स्टाइफंड नहीं ले रहे हैं। तीन- उनकी घोषित आय के प्रमाण के रूप में आयकर रिटर्न ली जाए, जैसे हमारे मामले में कुल आय 2,50,000 रुपये से कम है। चार- अधिवक्ता जो अपने-अपने राज्यों में प्रैक्टिस कर रहे हैं और केवल आय के स्रोत के रूप में मुकदमेबाजी पर निर्भर हैं। पांच- COVID-19 के दौरान उनकी भोजन, आवास और चिकित्सा बिलों आदि की आवश्यकता को पूरा करने के लिए वित्तीय सहायता की में जरूरत के संबंध में स्व-प्रमाणित शपथ पत्र लिया जाए। हम पूल फंड कैसे एकत्रित कर सकते हैंः स्टेट बार एसोसिएशन ,भारत में लॉ फर्म, अन्य संस्थान या अधिवक्ता, जो इस फंड के लिए योगदान करने के इच्छुक हैं, योगदान दे सकते हैं। अधिवक्ताओं के लिए वित्तीय योजना- COVID-19 के दौरान सहायता की आवश्यकता वाले अधिवक्ताओं को मासिक या एक बार वित्तीय सहायता प्रदान की जा सकती है या एक निश्चित अवधि के लिए ऋण संवितरण के रूप में अधिवक्ताओं को सहायता प्रदान की जा सकती है, जो अदालत खुल जाने के पश्चात समय की एक निश्चित अवधि के बाद सहायता राशि उचित ब्याज के साथ वापिस कर देंगे। फिर आपातकालीन निधि को विभिन्न राज्य बार एसोसिएशनों या बीसीआई के बीच वितरित किया जा सकता है। जो कानूनी सहायता या किसी अन्य मानव जाति के उद्देश्य के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं। या जब वित्तीय सहायता लेने वाले अधिवक्ता उस पैसे को वापिस कर दें तो उसे उन वरिष्ठ अधिवक्ता, अधिवक्ता या कानून फर्म को वापिस किया जा सकता है,जिन्होंने इस निधि में अपना योगदान दिया था। इसलिए यह अधिवक्ताओं, कानून फर्मों को इस आपातकालीन निधि में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करेगा क्योंकि एक समय की अवधि के बाद उनका पैसा ब्याज सहित वापस कर दिया जाएगा। (इस विशेष योजना के लिए आरबीआई की अनुमति की आवश्यकता है) पत्र-याचिका के अंत में यह कहा गया है कि वकालत एक महान पेशा है और यह उन व्यक्तियों के लिए है जो दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ते हैं, महामारी ने कठोर स्थिति पैदा कर दी है, और इसके लिए शीर्ष न्यायालय के तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है।...
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अंधविश्वास और नायक संस्कृति से बना जनमानस : साहित्य में


अंधविश्वास और नायक संस्कृति से बना जनमानस-
     भारत में आम जनता के दो पहलू हैं जिनसे उसकी मानसिक संरचनाएं संचालित होती हैं,पहली संरचना है उसके पुराने विश्वास और अंधविश्वास,दूसरी संरचना है उसका नायक प्रेम। इसमें सिर्फ नायक ही नायक है, इसमें न देशप्रेम आता है और जनता के प्रति प्रेम आता है। आम जनता लंबे समय से नायक मोह की शिकार है।अंधविश्वास और नायकप्रेम का यह संबंध उसके हरेक व्यक्ति के फैसले को निर्धारित और प्रभावित करता है।बहुत कम लोग हैं जो इन दोनों से पूरी तरह मुक्त हैं। यह बीमारी वाम से लेकर दक्षिण तक फैली हुई है।इन दोनों फिनोमिना को हिन्दी सिनेमा और विज्ञापनों ने खाद-पानी दिया है।नायकप्रेम और अंधविश्वास को यथार्थ में परखने की आम जनता कोशिश ही नहीं करती,यह मान लिया गया है,प्रचार में जो दिख रहा है वह सही है।जो दिखाया जा रहा है,वह इसलिए दिखाया जा रहा है ,क्योंकि सच है या उसमें सच का अंश है। मसलन् ,यह कहा गया कि नेहरू-इंदिरा तो मुसलमानों और औरतों के हितैषी थे, लेकिन तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते,यह भी कहा गया कि पंचवर्षीय योजनाओं से गरीबी खत्म हुई ,तथ्य इसकी भी पुष्टि नहीं करते, इसी तरह पीएम मोदी ने कहा कि सबके अच्छे दिन आएंगे, लेकिन तथ्य हस दावे की भी पुष्टि नहीं करते। उनका वायदा था हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार दूंगा।लेकिन यथार्थ में हर साल दो करोड़ नौकरियां खत्म हुई हैं विगत चार सालों में इसलिए नायकप्रेम और उसके पक्ष में किए गए प्रौपेगैंडा को यथार्थ पर परखने की जरूरत है।हमने एक चीज नोटिस की है नायकप्रेम और अंधविश्वास इन दो का प्रचार सबसे अधिक आम जनता हजम करती है।ये दो चीजें आज भी सबसे जल्दी दिलो-दिमाग को सीधे प्रभावित करती हैं। आमतौर इन दोनों फिनोमिना के साथ किसी न किसी रूप में पापुलिज्म काम करता है।किसी न किसी तरह का इल्युजन काम करता है।खासतौर पर युवाओं और औरतों पर इन दोनों के प्रचार का दैनंदिन जीवन में गहरा असर होता है। उनको ही खासतौर पर निशाना बनाया जाता है।यह माना जाता है कि असली नायक वह है जो जनता के मनोभावों को व्यक्त करे। इस तरह की अभिव्यंजनाओं को देखकर ही आम जनता उम्मीद लगाए बैठी रहती है कि हो सकता है नायक आगे कुछ करे, इंतजार करो जरूर कुछ करेगा,नायक के कदमों पर उसकी अगाध आस्था होती है।वह यह मानकर चलती है नायक में तो हमारी इच्छाएं-आकाक्षाएं निवास करती हैं।त्रासदी यह कि अपने इस विभ्रम के बाहर निकलकर जनता कभी यथार्थ को देखने को तैयार नहीं होती।
  जब हम नायक को देखते हैं तो उसे एक मिथ की तरह देखते हैं।उसे दिवा- स्वप्न की तरह देखते हैं।इस रूप में देखते हैं कि वह जो कह रहा है उसे जरूर लागू करेगा।लेकिन यहीं पर उस नायक की त्रासदी निहित है, उसका अंत निहित है।क्योंकि आम जनता मिथ के बाहर नजर डालने के लिए तैयार ही नहीं है।वह हमेशा प्रचार की रोशनी में नायक को देखती है और प्रचार ही उसे वैध बनाता है, उसकी बातों को वैध बनाता है।वह मिथ और प्रचार के बाहर यदि यथार्थ की कसौटी,अपने आसपास के जीवन यथार्थ में जाकर यदि नायक के कहे की मीमांसा करे तो तस्वीर एकदम भिन्न नजर आएगी।असल में नायक के बनाए मिथ और यथार्थ में कैद रहकर वह सब चीजें देखती है इसलिए वह अन्य किस्म के आख्यान,यथार्थ,तर्क आदि को मानने,सुनने को तैयार नहीं होती। हमारा अब तक का मानव सभ्यता का इतिहास इस तरह के नायकप्रेम, नायकबोध और निर्मित यथार्थ के असंख्य आख्यानों से भरा पड़ा है। कायदे से जीवन के यथार्थ की कसौटी पर नायक,विचार और जन -आकांक्षाओं की परीक्षा होनी चाहिए।दैनंदिन जीवन और नायकीय आश्वासनों के बीच में जो बड़ा अंतराल होता है उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। अंधविश्वास और नायकप्रेम में दूसरी चीज है आलोचनात्मक विवेक का अंत। ये दोनों चीजें इसकी हत्या कर देती हैं। अंधविश्वास और नायकप्रेम में डूबा समाज कभी क्रिटिकली सोचता नहीं है। खासकर महा-संकट की अवस्था में तो ये दोनों चीजें और ज्यादा घनीभूत हो जाती हैं।दूसरी बात यह कि इन दोनों के उपभोक्ताओं के संख्याबल के आधार पर मीडिया अपनी राय बनाता है।इन दोनों की ताकत है इमेज प्रेम और छद्म अनुभूतियां।इनमें आम जनता लंबे समय तक बंधी रहती है।दिलचस्प बात यह है कि नायकप्रेम ही नायक की सबसे बड़ी कमजोरी भी है।नायक अपने द्वारा निर्मित मिथ्या संसार पर एक अवधि के बाद विश्वास करने लगता है।यहीं से उसकी असफलता की खबरें आनी शुरू हो जाती हैं।हरेक नायक के साथ कोई न कोई उपसंस्कृति के रूप जुड़े होते हैं और उन रूपों को संतुष्ट करने के लिए वह कुछ न कुछ हरकतें करता रहता है।यहां तक कि अपने अनुयायियों के उपद्रवों को वैधता प्रदान करता है।एक बड़ा परिवर्तन और घटा है कम्युनिकेशन को इन्फॉर्मेशन ने अपदस्थ कर दिया है। पहले हम कम्युनिकेट करते थे,अब कम्युनिकेट नहीं करते बल्कि सूचनाएं लेते और देते हैं।अब हम यथार्थ पर नहीं सूचनाओं पर विश्वास करने लगे हैं।यथार्थ को परखने,उलट-पुलट करके देखने की कोशिश नहीं करते।क्योंकि हम माने बैठे हैं कि हम सही हैं, हमारी सूचनाएं सही हैं,इसलिए यथार्थ को देखने की जरूरत नहीं है। अब हम अनुकरण करते हैं। अनुकरण और इमेजों को ही सच मानते हैं।जबकि ये सच नहीं होतीं।ये दोनों विभ्रम पैदा करती हैं और यथार्थ से दूर ले जाती हैं।यही वो परिदृश्य है जिसमें नए नायक की इमेज,नायकप्रेम और सामाजिक अहंकार पैदा हुआ है।उसने विभिन्न किस्म की प्रतिगामी विचारों और उप-संस्कृति के रूपों और उनके मानने वालों को पाला-पोसा है।फलतःजहां एक ओर हाइपररीयल जनता निर्मित हुई है वहीं दूसरी ओर हाइपररीयल नायक और उसकी संचालन प्रणाली विकसित हुई है।अब हम रीयल और अनरियल में नहीं हाइपररीयल में जी रहे हैं।हाइपर रीयल हमारी संवेदनाओं , भावदशाओं और दैनंदिन तर्कशास्त्र को निर्मित और प्रभावित कर रहा है।
     इसके अलावा छिपाने की कला का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है,उसने बंद समाज को और अधिक बंद बनाया है।अनुदार बनाया है।पारदर्शिता घटी है।झूठ बोलने,झूठ में जीने की आदत बढ़ी है।
     ‘भावोन्मत्त’ भाव में तीव्र कम्युनिकेशन की आदत बढ़ी है। हम ठहरकर सोचने और संवाद-विवाद करने को तैयार नहीं हैं। जब तक हम यह सब नहीं करते मुश्किलें आएंगी।
गिरीश मालवीय
आज सुबह एक मित्र ने एक पोस्ट लिखी जिसमे पिछले कुछ दिनों में हुई इंदौर शहर में बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज में हुई मौतो के कारण पुछा गया........अब शायद मित्र ने वह पोस्ट हटा ली है इस पोस्ट पर मैने एक छोटा सा जवाब लिखा............
'एक बड़ा कारण यह भी है कि किसी तरह का ईलाज उपलब्ध नही है शहर के अस्पतालों में, न कोई क्लिनिक खुला है अगर स्वास्थ्य की स्थिति जरा भी बिगड़ती है तो गंभीर होने में देर नही लगती, ओर इलाज न मिलने की दहशत ही आदमी को मार डालती है, कोरोना से भी मृत्यु हो रही है लेकिन सारी मौतें कोरोना से हो रही है यह कहना भी गलत होगा'
इस जवाब से पोस्टकर्ता मित्र आंशिक रूप से सहमत थे लेकिन उनका कहना था कि ऐसी ही कंडीशन तो सभी इंदौर वासियों की हो रही होगी लेकिन इस पर  शहर का मुस्लिम समाज क्यो ख़ामोश है। हाहाकार क्यो नही मच गया शहर में
इस बात पर मैंने Riz Khan को कमेन्ट बॉक्स में आमंत्रित किया......... रिज खान लंबे समय से शहर में पब्लिक हेल्थ सेक्टर में ही कार्यरत है उन्होंने जवाब में जो लिखा वो आप सब को एक बार पढना चाहिए.......
गिरीश भाई शुक्रिया... यह समझे हम एक बड़े विकट समय से गुज़र रहे हे... जिस तरह से क्वारानटिन के एरिए बढ रहे हे... अगर हर रोज़ 2000 लोगो के कम से कम  कोरोना 19 का जाँच नही हुई तो जेसा मैने अपनी पोस्ट मे लिखा था मेरे डाटा एनालिसिस की जो क्षमता हे वह हार जाए... जो मेरा अनुमान हे वह झुठा हो जाए... में झुठा हो जाऊ... पता है यह में क्यो लिख रहा हूँ... इसलिए भाई कि अगर हम गलती से इसकी चपेट मे आ गए तो उस समय तक महामारी फेल चुकी होगी...  सामाजिक रिश्तों के ताने बाने अभी ही टूट चुके हे लोग शवयात्राओ मे नही जा रहे हे... मेरे खुद के घर के मेनगेट पर ताला लग चुका हे... न कोई बाहर जा रहा हे न कोई अन्दर आने के लिए अलाव हे... दुध पीना सब्जी खाना छोड़ चुके हे... यह व्यवस्था 3 माह तक चला लेंगे एक ज्वाइंट परिवार मे करीब 60 सदस्य हे...  लेकिन उसके बाद??? अगले हफ्ते अम्मी की बी पी की दवा खत्म है उसका कोई जुगाड नही हो पा रहा हे...
यह जो 134 लोग मरे हे उन सब का पोस्टमार्टम होना चाहिए था... नही हुआ... इनमे से कोरोना पाज़ेटिव को - कर दै बाकी सब तो कुत्ते से खराब मोत मरे हे... (मुझे माफ करना इस शब्द के लिए) मरीज़ गम्भीर होने पर रिश्तेदार एक हास्पिटल से दुसरे ओर फिर 5 हास्पिटल तक लेकर गए हे ओर मरीज़ो ने रास्ते में, रिश्तेदारों की गोद मै हास्पिटल के मेन गेट तक मे पहुँच कर इलाज के अभाव मे दम तोड़ा हे... हास्पिटलस ने मरीज़ो को एडमिट ही नही किया ओर भगा रहे हे...  इसमे भी सबसे ज़्यादा दर्द नाक डिलीवरी की महिलाए  जिसके हम 8000 देते हे ओर आपरेशन कै 18000... खुद मेरी भांजी को उन 4  बडे हास्पिटलस ने मना कर दिया एडमिट करने से जिनके मेनेजर मालिको से खास संबंध हे... एक हास्पिटल ने किया आपरेशन करना पड़ेगा खान साब 65000 लगेगे दवा गोली अलग से... 18000 वाला आपरेशन का 65000... सोचिए एक गरीब मरीज़ होती तो क्या होता उसका... एक बार फिर यह जो मरे हे पोस्ट मार्टम हूआ नही मृत्यु का कारण अज्ञात??? इनकी अंतिम क्रिया मे सारा परिवार शामिल हूआ अगर उनमे से 10 भी कोरोना पॉजेटिव थे यदि तो इस शहर का ईश्वर अल्लाह ही निगहबान है...
क्या वास्तव मे हम डर से मर रहे हे ? !
हमारे शहर मे हर रोज़ 6-8 मरीज़ो कै दिल के बायपास इतने ही ब्रेन के ओर ढेरो एमरजैंसी आपरेशन होते हे... अब नही हो रहे हे, लोगो को समय पर इलाज के लिए डाक्टर उपलब्ध नही हे... डायबिटीज़ बी.पी. केन्सर, प्रोस्टेट व युरो लाजी, कार्डियोलाजी व जीवनरक्षक दवाइया जो मरीज़ हर रोज़ ले रहे हे वह सब दवाइया, दवा बाज़ार तक  मे भी नही मिल रही हे...
ओर आप कहते हे लोग डर से मर रहे हे यह शर्मनाक बयान हे... आपको नही लिखना चाहिए यह शोभा नही देता हे... कई लोग जो दिन रात आपके साथ उठते बेठते हंसते खिलखिला कर अट्ठाहास लगाते हे... वह अन्दर से कइ बार बीमार होते हे ओर दिन भर मे 8-10 गोलियो के सहारै अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी चलाकर अपने को समाज के सामने खुश दिखाने की कोशिश करते हे...
इसलिए जब आप यह बोल रहे हे कि लोग "डर" से मर रहे है तो आप उनकी बे-इज़्ज़ती कर रहे हे!!! बन्द करिए यह बोलना... वह समय पर "उचित इलाज" ओर दवाइयो के अभाव मे मर रहे हे............
कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान मध्य प्रदेश के भिंड जिले में गरीब महिलाओं को प्रधानमंत्री जनधन योजना से 500 रुपये लेना महंगा पड़ गया. पुलिस ने सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन करने पर 39 गरीब महिलाओं को जेल में बंद कर दिया.
इतना ही नहीं, पुलिस ने महिलाओं पर धारा 151 के तहत कार्रवाई भी की. लिहाजा इन महिलाओं को 4 घंटे जेल में गुजारना पड़ा. इन महिलाओं को 10-10 हजार रुपये के मुचलके पर एसडीएम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद छोड़ा गया. इस कार्रवाई के दौरान पुलिस की भी लापरवाही सामने आई और पुलिस ने खुद सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया.
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दूसरों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराने वाली पुलिस ने इन 39 महिलाओं को हिरासत में लेकर एक ही वाहन में भरकर ले गई. इसके बाद इन महिलाओं को अस्थायी जेल में बंद कर दिया गया.
कोरोना कमांडोज़ का हौसला बढ़ाएं और उन्हें शुक्रिया कहें...
कोरोना वायरस को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन की वजह से लोगों का कामकाज ठप हो गया है और गरीबों को खाने के लाले पड़ रहे हैं. इसी के चलते सरकार ने गरीब लोगों के खाते में 500 रुपये डाले हैं, जिसे निकालने के लिए बैंक के बाहर एक लंबी लाइन लग गई.
लॉकडाउन के उल्लंघन की जानकारी जब पुलिस को लगी, तो पुलिस फौरन पहुंची और इन महिलाओं को समझाया कि वो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें. लेकिन ये महिलाएं नहीं मानीं. फिर इन पर एक्शन लिया और इनको हिरासत में ले लिया.(आजतक )
भाजपा के साइबर सैल  की पोल खोल-2 -
पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया में एक मैसेज वायरल किया जा रहा है। इसमें लिखा है- ‘आज रात 12 बजे से देशभर में डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट लागू हो चुका है। इसके बाद सरकारी विभागों को छोड़कर अन्य कोई भी नागरिक कोरोनावायरस से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी शेयर नहीं कर सकेगा। ऐसा करने पर कानूनी कार्रवाई होगी। वायरल मैसेज में वॉट्सऐप ग्रुप एडमिंस को भी सलाह दी गई है कि वे यह मैसेज अपने ग्रुप में फॉरवर्ड कर दें।’ इस मैसेज के साथ ही न्यूज वेबसाइट लॉइव लॉ की लिंक भी वायरल की गई है। लाइव लॉ ने खुद अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस वायरल दावे का खंडन किया है। वेबसाइट की तरफ से किए गए ट्वीट में लिखा है कि लाइव लॉ की रिपोर्ट के साथ एक फेक मैसेज वॉट्सऐप ग्रुप में वायरल किया जा रहा है। कृपया इसे साझा न करें।
दरअसल यह पूरा मामला तब शुरू हुआ, जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए कहा कि कोविड-19 से जुड़ी किसी भी खबर को प्रकाशित, प्रचारित या टेलीकास्ट करने के पहले पुष्टि की अनिवार्यता की जाए। सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए गए मैकेनिज्म में दावों की पड़ताल के बाद ही कोविड-19 से जुड़ी कोई भी जानकारी प्रचारित-प्रसारित हो।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च को इस संबंध में कहा, ‘महामारी के बारे में स्वतंत्र चर्चा में हस्तक्षेप करने का हमारा इरादा नहीं है, लेकिन मीडिया को घटनाक्रम की जानकारी आधिकारिक पुष्टि के बाद प्रकाशित-प्रचारित किए जाने के निर्देश हैं।’ सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने पाया, ‘लॉकडाउन के दौरान शहरों में काम करने वाले मजदूरों की बड़ी संख्या में फेक न्यूज के चलते घबराहट पैदा हुई कि लॉकडाउन तीन महीने से ज्यादा समय तक जारी रहेगा। जिन्होंने इस तरह की खबरों पर यकीन किया, उन लोगों के लिए माइग्रेशन (प्रवासन) अनकही पीड़ा बन गया। इस प्रक्रिया में कुछ ने अपना जीवन खो दिया। इसलिए हमारे लिए यह संभव नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट या सोशल मीडिया द्वारा फर्जी खबरों को नजरअंदाज किया जाए।’ हालांकि कोर्ट ने ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया है जो कोविड-19 से जुड़ी जानकारी साझा करने पर रोक लगाता हो। कोर्ट ने फर्जी खबरों पर चितां जरूर जताई है साथ ही मीडिया को रिपोर्टिंग में ज्यादा सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं।
कोरोना से संबंधित मैसेज शेयर न करने से संबंधित जानकारी की पुष्टि के लिए हमने भोपाल रेंज के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक उपेंद्र जैन से बात की। उन्होंने बताया कि सिर्फ कोरोना नहीं, बल्कि किसी भी तरह की भ्रामक जानकारी वायरल कर यदि भय का माहौल बनाया जाता है या आपसी सौहार्द बिगाड़ा जाता है तो पुलिस ऐसे व्यक्ति के खिलाफ एक्शन ले सकती है। उन्होंने कहा कि बिना पुष्टि के किसी भी जानकारी को वॉट्सऐप या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म पर शेयर नहीं किया जाना चाहिए।
भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने भी वायरल दावे का खंडन करते हुए ट्वीट किया कि, सरकार द्वारा कोविड-19 को लेकर किसी भी तरह की जानकारी शेयर करने पर रोक लगाने का दावा करने वाला मैसेज फर्जी है।
मुसलमानों के खिलाफ चल रहे असत्य अभियान को बेनकाब करो-3-
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें मुस्लिमों का एक समूह बर्तनों को चाटते हुए दिख रहा है। दावा है कि कोरोनावायरस को फैलाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हमारी पड़ताल में वायरल दावा झूठा निकला। कई यूजर्स इस वीडियो को दिल्ली के निजामुद्दीन का बता रहे हैं। निजामुद्दीन को हॉटस्पॉट के तौर पर चिन्हित किया गया है। यहीं तब्लीगी जमात के ढेरों लोग कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
रिवर्स सर्चिंग में पता चला कि वायरल वीडियो जुलाई 2018 का है। सर्चिंग में वायरल वीडियो हमें वीमो पर मिला। इसमें दी गई जानकारी के मुताबिक, वीडियो में दिख रहे लोग दाउदी बोहरा हैं जो बर्तनों में कुछ भी जूठा न छूटे इस मकसद से बर्तनों को साफ कर रहे थे। इसमें ये जानकारी भी दी गई कि, ऐसा दाऊदी बोहरा समुदाय के सर्वोच्च धर्मगुरू सैयदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन के आदेश पर किया गया था।
मुसलमानों के खिलाफ चल रहे असत्य अभियान को बेनकाब करो   -2-
कोरोनावायरस को लेकर कई अफवाहें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। इनकी सच्चाई भी लगातार सामने लाई जा रही है। अब न्यूज एजेंसी एएनआई द्वारा दी गई जानकारी को नोएडा के गौतम बुद्ध नगर के डीसीपी ने गलत बताया है। न्यूज एजेंसी 'एएनआई ने 7 अप्रैल को गौतम बुद्ध नगर के डीसीपी संकल्प शर्मा का हवाला देते हुए ट्वीट किया था कि, नोएडा के हरौला के सेक्टर 5 में जो तबलीगी जमात के सदस्यों के संपर्क में आए थे, उन्हें क्वारेंटाइन कर दिया गया है।'
न्यूज एजेंसी के इस ट्विट को एएनआई की एडिटर स्मिता प्रकाश ने भी ट्विट करते हुए लिखा था कि नोएडा में सुरक्षित रहें।
अब इस दावे को डीसीपी नोएडा द्वारा ही झूठा बताया गया है। डीसीपी नोएडा ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से एएनआई को टैग करते हुए लिखा कि,' ऐसे लोग जो कोरोना पॉजिटिव के संपर्क में आए थे, उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार क्वारेंटाइन किया गया। तब्लीगी जमात का जिक्र नहीं था। आप गलत हवाला देते हुए फर्जी खबरें फैला रहे हैं।'
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देवेन्द्र सुरजन : गोलेन्द्र पटेल


देवेन्द्र सुरजन
फर्जी खबरों का दुश्चक्र भारत को कोरोना से बड़ा नुकसान पहुंचाने जा रहा है. समाज का ​अपने ही लोगों के प्रति अविश्वास से भर जाना किसी महामारी में नहीं होता. कोरोना के बहाने भारत के नफरत के कारोबारियों ने अपना कारोबार आपात स्तर पर तेज कर दिया है.
रोज दो एक लेख लिखने के बावजूद मुझे लगता है कि मैं इसके खतरे को जितना समझ पा रहा हूं, उतना कह नहीं पा रहा हूं.
जब हम लिखना चाह रहे थे कि वायरल हुए दर्जनों वीडियो झूठे हैं, तब तक एक समुदाय के गरीब लोगों पर हमलों की तमाम खबरें आ गईं. पहाड़ से लेकर दक्षिणी राज्य कर्नाटक तक में यह मानकर हमले हुए कि मुसलमान कोराना फैला रहा है. हमारे झूठ के निरंकुश बाजार ने मुसलमानों को कोरोना का आविष्कारक बना डाला.
योगेंद्र यादव के स्वराज अभियान से जुड़े तबरेज और उनकी अम्मी बस्तियों में राशन बांट रहे थे. लोगों ने उन्हें ऐसा करने से रोका. कहा गया, "हिंदुओ को खाना मत बांटो, अपने लोगों को बांटो". इसके बाद भीड़ ने उन्हें पीटा. तबरेज़ के दाहिने हाथ और सिर पर टांके लगाए गए.
कर्नाटक के एक गांव में मछुवारों को पीटा गया. वे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहे हैं. भीड़ का आरोप है कि तुम्हारी वजह से कोरोना फैल रहा है. इन मछुआरों में हिंदू भी थे, मुसलमान भी.
हल्द्वानी के जावेद की दुकान हटवा दी गई, क्योंकि वे मुसलमान हैं. देश भर में लाखों दुकारदार जरूरी चीजों की सप्लाई कर रहे हैं, लेकिन जावेद से खतरा पैदा हो गया. दिल्ली में एक जगह से खबर आई कि मुसलमान विक्रेता को मुहल्ले में घुसने नहीं देना है.
जो ऐसा कर रहे हैं, उनकी गलती नहीं है. उन्हें ऐसा बताया गया है. मीडिया और सोशल मीडिया के जरिये.
मीडिया में खबर छपती है कि एक आइसोलेशन सेंटर में तब्लीगी जमात के लोग नंगे घूम रहे हैं और अभद्रता कर रहे हैं. इसी खबर के आधार पर, खून से लथपथ एक नंगे आदमी का वीडियो वायरल होता है. दावा किया जाता है कि देखिए, कोरेंटाइन सेंटर में तबलीगी ने आतंक फैला रखा है. वीडियो देखकर कमजोर दिल वाला सटक सकता है.
आल्टन्यूज इस वीडियो का सोर्स पता करता है. वीडियो पाकिस्तान से कराची का है. जहां एक व्यक्ति ऐसी अवस्था में मस्जिद में घुसा था. यह वीडियो  यूट्यूब पर अगस्त 2019 में अपलोड हुआ था, तब से इंटरनेट पर मौजूद है.
अमर उजाला और पत्रिका जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों ने खबर छापी सहारनपुर में तब्लीगियों ने मांसाहार न मिलने पर खाना फेंक दिया, खुले में शौच की, वगैरह वगैरह. इसे चैनलों ने भी चलाया. सहारनपुर पुलिस ने स्पष्टीकरण जारी किया कि मीडिया ने जो खबर प्रकाशित की है, हमारे यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ है. यह खबर फर्जी है.
पिछले दो हफ्ते में ऐसे सैकड़ों उदाहरण आ चुके हैं. कुछ एक तो आपको दिखे ही होंगे. हमारी वॉल पर ही तमाम दिखे होंगे. अगर इन पर कोई अध्ययन प्रकाशित करवाना हो तो कई हजार पेज की कई किताबें बनेंगी. हमारे झूठ का संसार बहुत बड़ा हो चुका है.
हम किस दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं, इसका अंदाजा आप ऐसे लगाइए कि हमारे केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह एक बड़े चैनल पर लॉकडाउन के बारे में कुछ डब्ल्यूएचओ का प्रोटोकॉल बताते हैं. मंत्री जी जो बता रहे हैं, वह एक फर्जी व्हाट्सएप फॉरवर्ड है. जब वे बता रहे हैं, उसके पहले आल्टन्यूज खबरें छाप चुका है कि फर्जी है, डब्ल्यूएचओ ने ऐसा कोई प्रोटोकॉल जारी नहीं किया है. यह व्हाट्सएप फॉरवर्ड कैंब्रिज के एक रिसर्च पर आधारित था, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन पर कुछ बातें थीं. लेकिन मंत्री जी ने अपनी सरकार से नहीं पूछा, अपने अधिकारियों ने नहीं पूछा, व्हाट्सएप पर डब्ल्यूएचओ का प्रोटोकॉल पढ़ लिया.
138 करोड़ लोगों की सरकार का मंत्री व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के फर्जीवाड़े के अथाह महासमंदर में कूद गया. बहुत संभावना है कि उनसे चूक हुई हो, लेकिन आप यह सोचिए कि मंत्री जैसे सुरक्षित पदों को फेक न्यूज ने अपने चंगुल में दबोच लिया है.
मसला यह नहीं है कि किसी जमाती ने ऐसा किया या नहीं, उनसे तो दो चार सिपाही लट्ठ बजाकर तुरंत निपट लिए होंगे. मसला यह है कि इन्हीं सैकड़ों फर्जी खबरों से हमारा मानस तैयार हो रहा है.
झूठी, दुर्भावनापूर्ण, सांप्रदायिक और विषैली सूचनाओं की रेत का एक बहुमंजिला महल है और हम सब उस पर चढ़ते जा रहे हैं....https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA




देवेंद्र सुरजन : गोलेन्द्र पटेल


देवेन्द्र सुरजन-।
सिपला के संस्थापक हमीद की कहानी
जब सिपला ने जेनेरिक दवाओं का उत्पादन शुरू किया तो अमरीका ने उस पर पेटेंट कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया था। उस वक़्त इन्दिरा गांधी मजबूती से सिपला के साथ खड़ी थीं। आज विडम्बना यह है कि वही अमरीका अब भारत से हाड्रोक्सीक्लोरोकुईन की मांग कर रहा है।
नेशनल हेराल्ड में प्रकाशित सुजाता आनंदन की रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद
 
एक ऐसे समय में जब देश में कुछ मीडिया समूह और भारतीय जनता पार्टी समर्थक भक्तों का एक तबका मुसलमानों को पैशाचिक रूप में प्रस्तुत कर उनके खिलाफ घृणा का माहौल बना रहा है, यह कहानी बहुत सारे लोगों के दिलों को राहत पहुंचाएगी।
बात वर्ष 1920 की है। एक रईस आदमी ने अपने बेटे को बेरिस्टरी की पढ़ाई करने के लिए बंबई से यूनाइटेड किंगडम की ओर जाने वाले जहाज में बैठा कर विदा किया। उस वक़्त देश के अधिकांश सम्पन्न परिवारों में यही प्रचलन था। लेकिन लड़के का दिल कानून की पढ़ाई में नहीं बल्कि रासायनिक विज्ञान में उलझा था, जिसमें उन दिनों कोई भविष्य नहीं माना जाता था।
लेकिन इस लड़के के पिता ने उसके सामने कोई विकल्प छोड़ा न था। बहरहाल जहाज ने जब बंदरगाह से लंगर छोड़ा उस वक़्त डेक पर खड़े हो कर पिता को विदाई में हाथ हिलाते ख्वाजा अब्दुल हमीद के मन में दूसरी ही उधेड़-बुन चल रही थी। वे बीच राह में इस जहाज से जर्मनी के तट पर उतर गए, जो विगत शताब्दी के उन आरंभिक दशकों में रसायन विज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में अग्रणी देश था। उन्होंने वहाँ से डिग्री हासिल की और एक जर्मन यहूदी और कम्युनिस्ट लड़की (दोनों ही पहचान ऐसी जिनसे नजियों को सबसे ज़्यादा नफरत थी) से शादी कर ली। इससे पहले कि एडोल्फ हिटलर के गेस्टापो उन्हें पकड़ पाते वे दोनों ही जर्मनी से निकल सुरक्षित भारत आ गए।
रसायनों की व्यापक समझ के साथ ख्वाजा हमीद ने वर्ष 1935 में केमिकल, इंडस्ट्रियल एंड फार्मास्युटिकल लबोरेट्रीज़ की स्थापना की। आज़ादी के कुछ दशकों के बाद इसी को CIPLA सिपला इस संक्षिप्त नाम से जाना गया।
ख्वाजा हमीद महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बड़े प्रशंसक थे और राष्ट्रवाद के सच्चे जज्बे के साथ उन्होंने जन सामान्य के लिए जनरिक दवाओं का उत्पादन कर बिलकुल कम दाम में उन्हें बेचना शुरू किया। इनमें सिर्फ मलेरिया और तपेदिक की दवाएं ही नहीं बल्कि अन्य श्वसन की तकलीफ़ों, हृदय रोग, मधुमेह और गठिया जैसी रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी सभी बामरियों की दवाएं शामिल थीं।
कभी 1970 के आसपास सिपला ने (यह नाम 1980 में रखा गया था) प्रोप्रानेलोल नामक दावा का उत्पादन शुरू किया। इसे एक बड़ी अमरीकी फार्मास्युटिकल कंपनी ब्रुकलिन, न्यू यार्क से पहले ही पेटेंट करा चुकी थी। यह दवा रक्तचाप, माइग्रेन, हृदय रोग और अन्य तकलीफ़ों के उपचार में काम में लाई जाती थी। उस वक़्त दो ध्रुवों में बंटी दुनिया में अमरीका भारत का मित्र देश नहीं था और वास्तव में महाशक्ति हुआ करता था। डोनाल्ड ट्रम्प की तरह उसे दुनिया के किसी देश से अपनी बात मनवाने के लिए धमकी देने की ज़रूरत नहीं थी।
अमरीका ने भारत सरकार को इस मामले में शिकायत की। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने उनके सामने घुटने नहीं टेक दिये जैसा कि गत सप्ताह नरेंद्र मोदी ने किया। बल्कि इन्दिरा गांधी ने ख्वाजा हमीद के बेटे युसुफ हमीद जो खुद उस वक़्त तक केंब्रिज से रसायन में स्नातक हो चुके थे और कंपनी का व्यवसाय संभाल रहे थे को अपने पास बुलवा भेजा। उन्होंने युसुफ को तलब किया कि वे कैसे अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कानून का उल्लंघन कर देश को संकट में डाल सकते हैं? इस पर युसुफ ने श्रीमती गांधी को अपने पिता की कहानी सुनाई और बताया कि उन्होंने किस तरह सामान्य भारतियों को कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता की दवाएं उपलब्ध कराने के लिए इस कंपनी की स्थापना की थी।
ख्वाजा ने अपने बेटे युसुफ को कंपनी का कार्यभार सौंपते हुए कहा था यह हिदायत दी थी कि इस कंपनी की स्थापना जिस मकसद के लिए की गई है उसे हमेशा याद रखना। “दुनिया की दूसरी फार्मास्युटिकल कंपनियों की तरह हम मुनाफा कमाने के लिए यह कंपनी नहीं चलाते हैं बल्कि हमारा उद्देश्य गरीबों तक स्वस्थ्य सेवाओं को पहुंचा कर उन्हें राहत पहुंचाना है। अच्छी और सस्ती दवाओं के अभाव में यह लोग मर सकते हैं।”
युसुफ ने इन्दिरा गांधी को बताया कि वे इसी मकसद से इस दावा का उत्पादन कर रहे हैं। इस दलील से प्रभावित इन्दिरा गांधी ने यह जानते हुए कि इसके नतीजे आसान नहीं होंगे, अमरीका के उस आदेश को मानने से इंकार कर दिया जिसके तहत भारत से इस दावा का उत्पादन बंद करने के लिए कहा गया था। अपने देशवासियों के हितों को सर्वोपरी रखने और अमरीकी आदेशों की अवहेलना के कारण इन्दिरा गांधी को अमरीकी सरकार नापसंद करती थी।
इतना ही नहीं युसुफ के सुझाव को ध्यान में रखते हुए इन्दिरा गांधी ने पेटेंट कानून में भी बदलाव करवाया, जिसके तहत दवा मात्र के पेटेंट की बजाय उनके उत्पादन की प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं होना चाहिए यह तय किया गया। इससे सिपला को यह छूट मिल गई कि वह जितनी चाहे उतनी उच्च गुणवत्ता की जनरिक दवाओं का उत्पादन कर उन्हें कम दामों में लोगों को उपलब्ध करा सके। तब से अब तक अन्य अनेक दवाओं के साथ ही सिपला ने HIV की सस्ती दवा उपलब्ध कराई है और कई अफ्रीकी देशों सहित अनेक विकासशील देशों में अपने काम का विस्तार किया है। इनमें ऐसे देश भी शमिल हैं जहां एक समय में सबसे बड़ी तादाद में गरीब और HIV के रोगी मौजूद थे।
यही वह कंपनी है जो हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन का उत्पादन करती है जिसका इस्तेमाल मलेरिया, ल्यूपस और संधिवात गठिया (rheumatoid arthritis) तक के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है जिसे अब मूर्ख ट्रम्प प्रशासन की एक धमकी के आगे घुटने टेकते हुए अब गरीब भारतीयों से छीन कर इतनी बड़ी तादाद में अमरीका को निर्यात कर दिया गया है।
ट्रम्प ने इस दवा के लिए भारत सरकार पर दबाव डालना शुरू किया उससे पहले ही  मुंबई के सैफी अस्पताल में संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हमीदुद्दीन परदावाला ने हम में से कुछ लोगों को इस बात पर गौर करने के लिए कहा था कि उन देशों में जहां मलेरिया और संभवतः तपेदिक का भी इतिहास रहा है वहाँ कोरोना वाइरस का असर उतना नहीं होगा जितना उन देशों में हुआ है जहां यह बीमारियाँ अस्तित्व में ही नहीं रही हैं।
मलेरिया कहाँ अस्तित्व में नहीं रहा? अमरीका, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, जर्मनी, स्पेन, कनाडा, आदि वे देश हैं जहां सब से ज़्यादा कोरोना का संक्रमण पाया गया। जब मैं जर्मनी के बारे में सोचती हूँ तो यह ख्याल आता है कि आज तमाम देश भारत के शुक्रगुजार हैं कि यहाँ से उन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन का निर्यात किया जा रहा है, यह सारे देश इस वक़्त क्या कर रहे होते यदि उस वक़्त ख्वाजा हमीद और उनकी पत्नी को हिटलर के गेस्टपो ने पकड़ कर किसी यातना शिविर में भेज दिया होता!
और कहीं ज़्यादा तल्खी के साथ इस देश के उन सारे कट्टरपंथियों से यह सवाल पूछने का मन है जिन्होंने मुसलमान समुदाय की पैशाचिक छवि बना कर बीमारी पर सांप्रदायिक रंग चढ़ा दिया है। ऐसे बहुत सारे लोग जिन्हें कभी मलेरिया हुआ होगा और उन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन के डोज़ दिये गए होंगे, जिससे उनके शरीर में कुछ ऐसी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई है कि वे कोविड-19 का प्रतिरोध करने में सक्षम हैं। इन्हीं में से कई लोगों को संक्रमण का शिकार होने पर इस कंपनी की बनाई दवा से उपचार कराना होगा। वे जानते भी न होंगे कि एक मुसलमान द्वारा स्थापित कंपनी की बनाई जाने कौन-कौन सी जनरिक दवाओं ने उनके रक्तचाप को नियंत्रित रखा होगा, और कितने मधुमेह के उपचार के लिए हमीद के कर्जदार होंगे!
बहुत ब्यौरों में जाने के बजाय मैं इसे काव्यात्मक न्याय कहना चाहुंगी। भारत में ही नहीं दुनिया में शायद ऐसी कोई कंपनी नहीं है जिसने सिपला की तरह स्वास्थ्य सेवाओं को गरीब की पहुँच में लाने की दिशा में काम किया होगा। इतना ही नहीं यह अपने अनुसंधान को दूसरी कंपनियों के साथ साझा करने में भी कंजूसी नहीं करती। सिपला देश में दूसरी फार्मास्युटिकल कंपनियों को सामाग्री और प्रक्रियाएँ भी उपलब्ध कराती है, ताकि वे अपने स्तर पर दवाओं का उत्पादन कर सकें।
देश के विभाजन के समय मुहम्मद आली जिन्ना उन्हीं सामाजिक समूहों में उठते-बैठते थे, जिनमें ख्वाजा हमीद का आना-जाना था और उन्होंने हमीद से भी पाकिस्तान चलने का अनुरोध किया था। लेकिन हमीद जानते थे कि उनकी पक्षधरता गांधी के साथ थी और उन्होंने भारत में ही रहना तय किया।
देश में मुसलमान हैं और ऐसे मुसलमान भी हैं जो निज़ामुद्दीन में तबलीगी जमात के सम्मेलन में गए थे। इसी तरह देश में हिन्दू हैं और ऐसे हिन्दू भी हैं जो अपनी असहमतियों या कट्टरपंथ के चलते दूसरे हिंदुओं की जान ले लेते हैं।
(ऐसा नहीं है देश में महामारी की आशंका के चलते और देशभर में बाकी सभी ने अपने धार्मिक कार्यक्रम रद्द कर दिये हों और ऐसा भी नहीं है और तबलीगी जमात को भी ऐसा ही सम्मेलन आयोजित करने की इजाज़त सब जगह मिल गई हो, मुंबई में नहीं दी गई थी।)
जैसे कुछ जाहिल हिंदुओं के कारण सब हिंदुओं को निशाने पर नहीं लिया जाता उसी तरह मुट्ठी भर तबलीगी जमात के लोग पूरे मुसलमान समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
हमें चंद मूर्खों की खता के एवज में पूरे समुदाय को बदनाम करना बंद करना होगा।
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अयोध्यायसिंह "हरिऔध" : जयंती


आज अयोध्यासिंह 'हरिऔध' का जन्मदिन है-
खड़ी बोली को काव्य भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले कवियों में अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (जन्म- 15 अप्रैल, 1865, मृत्यु- 16 मार्च, 1947) का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में 1890 ई. के आस-पास अयोध्यासिंह उपाध्याय ने साहित्य सेवा के क्षेत्र में पदार्पण किया।
इनका जन्म ज़िला आजमगढ़ के निज़ामाबाद नामक स्थान में सन् 1865 ई. में हुआ था। हरिऔध के पिता का नाम भोलासिंह और माता का नाम रुक्मणि देवी था। अस्वस्थता के कारण हरिऔध जी का विद्यालय में पठन-पाठन न हो सका अतः इन्होंने घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी, बांग्ला एवं अंग्रेज़ी का अध्ययन किया। 1883 में ये निज़ामाबाद के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर हो गए। 1890 में क़ानूनगो की परीक्षा पास करने के बाद आप क़ानून गो बन गए। सन् 1923 में पद से अवकाश लेने पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने।
हरिऔध जी को  जीवनकाल में यथोचित सम्मान मिला था। 1924 ई. में इन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधान पद को सुशोभित किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने इनकी साहित्य सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए इन्हें हिन्दी के अवैतनिक अध्यापक का पद प्रदान किया। एक अमेरिकन 'एनसाइक्लोपीडिया' ने इनका परिचय प्रकाशित करते हुए इन्हें विश्व के साहित्य सेवियों की पंक्ति प्रदान की। खड़ी बोली काव्य के विकास में इनका योगदान निश्चित रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि 'प्रियप्रवास' खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है तो 'हरिऔध' खड़ी बोली के प्रथम महाकवि।
     उन्होंने अपने कवि कर्म का शुभारम्भ ब्रजभाषा से किया। 'रसकलश' की कविताओं से पता चलता है कि इस भाषा पर इनका अच्छा अधिकार था, किन्तु इन्होंने समय की गति शीघ्र ही पहचान ली और खड़ी बोली काव्य-रचना करने लगे। काव्य भाषा के रूप में इन्होंने खड़ी बोली का परिमार्जन और संस्कार किया। 'प्रियप्रवास' की रचना करके इन्होंने संस्कृत गर्भित कोमल-कान्तपदावली संयुक्त भाषा का अभिजात रूप प्रस्तुत किया। 'चोखे चौपदे' तथा 'चुभते चौपदे' द्वारा खड़ी बोली के मुहावरा सौन्दर्य एवं उसके लौकिक स्वरूप की झाँकी दी। छन्दों की दृष्टि से इन्होंने संस्कृत हिन्दी तथा उर्दू सभी प्रकार के छन्दों का धड़ल्ले से प्रयोग किया। ये प्रतिभासम्पन्न मानववादी कवि थे। इन्होंने 'प्रियप्रवास' में श्रीकृष्ण के जिस मानवीय स्वरूप की प्रतिष्ठा की है, उससे इनके आधुनिक दृष्टिकोण का पता चलता है। इनके श्रीकृष्ण 'रसराज' या 'नटनागर' होने की अपेक्षा लोकरक्षक नेता हैं।
एक बूँद
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से।
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।।
सोचने फिर फिर यही जी में लगी।
आह क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।।
दैव मेरे भाग्य में क्या है बढ़ा।
में बचूँगी या मिलूँगी धूल में।।
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी।
चू पडूँगी या कमल के फूल में।।
बह गयी उस काल एक ऐसी हवा।
वह समुन्दर ओर आई अनमनी।।
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला।
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।।
लोग यों ही है झिझकते, सोचते।
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर।।
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें।
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।।.....

-Golendra Patel

https://youtu.be/Ics_zgp89bw

छिपाने और छल की कला और कोविद-19


छिपाने और छल की कला और कोविद-19
        इस समय एक लाख बीस हजार के करीब डोमेन हैं। इनसे आम लोग कोरोना संबंधी सूचनाओं के लिए आ-जा रहे हैं। इनमें अनेक पोर्टेल के मालिक ठगई कर रहे हैं, छल कर रहे हैं।अनेक किस्म के घोटाले हो रहे हैं।मसलन्, मास्क,कर्ज,बेकारी,वेक्सीन,क्योर आदि को लेकर जबर्दस्त धंधा चल रहा है।अनेक कंपनियों ने तो कुछ खास पदबंधों की खोज के जरिए उनके पोर्टेल में प्रवेश करने वालों पर पाबंदी लगा दी है।इसके बावजूद सोशलमीडिया में मिस-इन्फॉरेमेशन का प्रवाह जारी है।सारी कंपनियां जानती हैं लेकिन अभी तक मिस इन्फॉर्मेशन का प्रवाह रोकने में वे असमर्थ रहे हैं।
      उल्लेखनीय है फेसबक,गूगल,यू ट्यूब,माइक्रोसॉफ्ट, ट्विटर आदि कंपनियों ने मार्च के मध्य में एक साझा बयान जारी किया था जिसमें कोविद-19 से संघर्ष करने वायदा किया गया।यह एक चलताऊ किस्म का साझा बयान था जो इन कंपनियों ने दिया था। इस बयान में मिस इन्फॉर्मेशन से लड़ने और प्रामाणिक सूचनाएं देने का वायदा किया गया था।लेकिन अभी तक ये कंपनियां अपने इस वायदे का पालन नहीं कर पायी हैं।बल्कि इस बीच में उलटा हुआ है।कोरोना से लड़ने के नाम पर अंट-शंट दवाओं के नाम विभिन्न तथाकथित शोधपत्रों में गूगल में प्रकाशित हो रहे हैं। एक ही उदाहरण काफी होगा।
    इंटरनेट पर विशेषज्ञों के एकदल ने ‘‘कोरोना वायरस क्योर’’ के तहत गूगल पर सर्च किया तो पाया कि वहां अनेक तथाकथित शोधपत्र भ्रमण कर रहे हैं लोग बड़ी संख्या में पढ़ रहे हैं और उनकी गलत-सलत सूचनाओं का दुरूपयोग कर रहे हैं। ये पत्र ट्विटर पर भी सर्कुलेट किये जा रहे हैं। इसी तरह का एक शोधपत्र तकनीकी व्यवसायी एलॉन मास्क ने गूगल डॉकूमेंटस में साझा किया । कहा गया यह वैज्ञानिक रिसर्च पेपर है।इसे स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के कैलीफॉर्निया स्थित स्कूल ऑफ मेडीसिन में कार्यरत वैज्ञानिक सलाहकार ने तैयार किया है। इस पेपर के इंटरनेट पर प्रकाशित होते ही दूसरे ही दिन फॉक्स टीवी चैनल ने इस पेपर के आधार फीचर बनाया और कहा कि कोरोना से बचने की दवा है ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’। इस दवा से कोरोना 100फीसदी खत्म हो जाएगा।इसी तरह फ्रांस से एक लघु शोधपत्र सामने या जिसमें दावा किया गया कि ‘‘क्वीनाइन’’ और ‘‘ टॉनिक वाटर’’ और ‘‘मलेरिया ड्रग’’को इंटरनेट पर खोजने वालों की बाढ़ आ गयी।देखते ही देखते बाजार में ये दवाएं और प्रोडक्ट हाथों हाथ बिक गए। इसका अर्थ है इंटरनेट पर जो लिखा जा रहा है उसे जनता पढ़ रही है।सुन रही है।
    फॉक्स टीवी चैनल से कार्यक्रम आने के बाद स्टैंनफोर्ड विश्वविद्यालय ने बयान देकर कहा कि फॉक्स ने जिस व्यक्ति को हमसे जोड़कर पेश किया है उसका हमसे कोई संबंध नहीं है और वह व्यक्ति उनके विश्वविद्यालय के किसी रिसर्च कार्यक्रम में शामिल नहीं रहा है।इस घटना के बाद ट्विटर पर भयानक तूफान आ गया,बड़ी संख्या में डाक्टरों और वैज्ञानिकों ने इस तरह के डिस इनफॉर्मेशन कैम्पेन की आलोचना की।लोगों ने यहां तक लिखा कि इस दवा की अचानक कमी हो गयी और इस दवा को डाक्टर की सलाह के बिना लेने से यह शरीर को नुकसान पहुँचा सकती है।इस तूफान के बाद ट्विटर ने निर्णय लिया और ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’ दवा से संबंधित सैंकड़ों ट्विट हटा दिए। ये सारे ट्विट दक्षिणपंथियों के थे। वे लोग मिस इनफॉर्मेशन फैलाकर जश्न मना रहे थे। जो जश्न मना रहे थे उनमें फॉक्स चैनल की हॉस्ट लोरा इनग्राहम,डोनाल्ड ट्रंप के एटॉर्नी रूड़ी गुईलियानी और कंजरवेटिव पंडित चार्ली के नाम खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। इसके बाद ट्रंप ने इस दवा को लेकर जमकर उत्साह दिखाया.इससे बाजार में केमिस्टों से लेकर पीएम मोदी तक इसका दवाब देखा गया।इससे एक बात पता चलती है कि विज्ञान के बारे में मिस इनफॉर्मेशन फैलाया जाए तो उससे कितने व्यापक स्तर पर नुकसान हो सकता है।इस घटना ने वैज्ञानिकों पर भी दवाब बनाया कि वे कोरोना के लिए दवा न बनाएं।इस तरह के माहौल से राजनेताओं का कोई खास नुकसान नहीं हुआ लेकिन आम जनता और विज्ञान की क्षति जरूर हुई है।
     किसी भी खुले और स्वतंत्र समाज पर थोपे गए देश,जनता के दिमाग का मेनीपुलेशऩ और अग्राह्य को ग्राह्य कराने की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। कोरोना के महासंकट काल में यही सब हो रहा है।बड़े पैमाने पर कोरोना की सच्चाई छिपायी जा रही है।मरीजों की संख्या,नामकरण,मृत्यु,बड़े स्केल पर जनता की निगरानी,असहमति व्यक्त करने पर हमले या पाबंदी,जबरिया कोरेंटाइन या फिर वैक्सीन लगाने की कोशिश आदि चीजें सामने आ रही हैं।यह एक तरह से जनता के नॉर्मल जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश है।इस दौर में
लॉक डाउन में मनुष्य तो किसी तरह अपना इलाज आपात काल में करा ले रहे हैं, लेकिन पशुओं के पास ऐसी सुविधा कहां है। ऐसे में वो मरने को विवश हैं। इसका सबसे बुरा असर पशुपालकों पर पड़ रहा है। वो अपने पशुओं को बीमार अवस्था में देख कर दुखित है, लेकिन कुछ नहीं कर पा रहे हैं। गांवों की स्थिति यह हो गई है कि झोला छाप डाक्टर भी लॉक डाउन में नहीं मिल रहे हैं।
कोई पशुओं के लिए मोबाइल अस्पताल की सुविधा नहीं होने से पशुपालकों काफी परेशान हैं। वो अपना दुखड़ा बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के प्रसार विभाग के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को सूना रहे हैं, लेकिन यहां के डॉक्टर भी कुछ करने में असमर्थ हो रहे हैं। फोन पर ही पशुपालक अपने पशु की समस्या को बताते हैं और डाक्टर उन्हें फोन पर ही दवा का नाम बताते हैं। यदि वो दवा मिल जाती है तो ठीक है अन्यथा अपने पशुओं को परेशान होते देखते रहते हैं पशुपालक।
गर्भधारण कराने में भी आ रही है दिक्कत
सिर्फ इलाज कराने में ही पशुपालकों को समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है, बल्कि अपने पशुओं को गर्भधारण कराने में भी दिक्कत आ रही है। लॉक डाउन की वजह से कृत्रिम गर्भधारण कराने वाले गांव में नहीं आ रहे हैं।
श्रीराम तिवारी
माननीय ,
श्री नरेंद्र मोदीजी,प्रधानमंत्री
भारत सरकार, नई  दिल्ली !
मान्यवर,
'अत्र कुशलं तत्रास्तु'
श्रीमानजी टीवी पर आज आपका कोरोना संबंधित भाषण सुना,अच्छा भाषण था!लगा कि आप बाकई देश की आवाम के लिये बहुत फिक्रमंद हैं!आपने लॉकडाऊन का समय बढ़ाया तो तमाम जनता आपके इस निवेदन को कठोर इलाज समझकर स्वीकार कर लेगी!किंतु यथार्थ के धरातल पर इसके विपरीत परिणाम भी हो सकते हैं! जिन की ओर आपका ध्यानाकर्षण बहुत जरूरी है!
उदाहरण के लिये,मैं एक रिटायर सीनियर सिटीजन(पेंशनर) हूँ!हमारे टेलीकाम विभाग में वेतन समझौता 2017 में हो जाना चाहिये था!तब आप ही प्रधानमंत्री थे!किंतु अब तक नही हुआ! इस बाबत संसद में माननीय संचार मंत्री श्री रविशंकरप्रसाद ने बताया है  कि घाटे के कारण वेतन वृद्धि नही की जा रही है! यूनियनों ने घाटे की वजह भी आप को बताई थी,किंतु मदद करने के बजाय  आपने  BSNLको 4G से बंचित रखा! इसके विपरीत जियो (अंबानी) को आपका आशीर्वाद मिला! इससे हमारा सरकारी उपक्रम घाटे में आ गया और वेतन समझौता नही हो पाया!इस वजह से हम पेंसनर्स को बहुत नुकसान हो रहा है!मेडीकल सुविधा लगभग बंद है!मामूली पेंशन सिर्फ दवाई में खत्म हो जाती है! जबकि लाकडाऊन के कारण बाजार में हर चीज की कालाबाजारी और मेंहगाई का जोर है! जब केंद्र सरकार के रिटायर कर्मचारियों की यह हालत है,तब दैनिक वेतन भोगी मजदूरों का हाल क्या होगा? और ठेका मजदूरों की बदहाली का अनुमान आप खुद लगा सकते हैं!
मैं 10 साल से ब्रांकल अस्थमा का मरीज हूँ, पत्नी को भी सुगर,फेंफड़े थाइराइड की बीमारी है! जिस डॉक्टर से मेरा इलाज चल रहा है,वह खुद क्वारेंटाईन में है!अधिकांस अस्पतालों में स्टाफ के न आने से सन्नाटा पसरा है!यदि कोरोना वायरस से हम बच भी गये तो दवा के अभाव में क्रानिक बीमारी से कौन कैसे बचाएगा?
मान्यवर,
कोरोना की भयानक मारक क्षमता का मुकाबला करने के लिये 3 मई तक तो क्या हम बुजुर्ग लोग 3 जून तक लॉकडाऊन में रह लेंगे!लेकिन सरकार कोई ऐंसी व्यवस्था तो करे कि फल सब्जियां और किराना सामान खरीद सकें! अभी तो ये हाल है कि मेडीकल स्टोर्स पर दवाईयां खत्म! उधर खेतों में सब्जियां सड़ रही हैं, क्योंकि शहर ले जानी संभव नहीं! इधर शहर में सड़ी गली सब्जी भी चोरी छुपे 100 रुपया किलो बिक रही है!सरकार को  चाहिये कि बाजिब दामों पर खाद्यान्न और सब्जियां उपलब्ध कराए!लॉकडाऊन का समय बढ़ाना तभी सफल होगा,जब घरों में बंद लोगों को जिंदा रहने के लिये न्यूनतम  संसाधन उपलब्ध हों! हर एक को दवाइयां, राशन पानी,सब्जी और भोजन मिले!यदि  कदाचित कोई भूख से या अन्य बीमारी से घर में मर गया तो कोरोना से बचाव की कुर्बानी बेकार जाएगी!
प्रधानमंत्री जी को मालूम हो कि कुछ जमातियें-तब्लीगियों को छोड़ अधिकांस जनता केंद्र सरकार,राज्य सरकार,स्थानीय प्रशासन के निर्देशानुसार कोरोना से बचने के लिये कष्ट उठाने को तैयार है, किंतु सरकार की ओर से उचित सहयोग अपेक्षित है!
जय हिंद
भवदीय :श्रीराम तिवारी,इंदौर मध्यप्रदेश.
-Golendra Patel

कोरोना और सच की महत्ता : COVID19 【Wuhan Virus~Coronavirus】


कोरोना और सच की महत्ता -
     सच बोलना अपराध हो गया है।सिर्फ राज्य स्वीकृत बातें ही बोल सकते हैं।इससे पता चलता है  जिंदगी का अब स्वतंत्र अस्तित्व खतरे में है। इस ऑरवेलियन नियंत्रित छली समाज व्यवस्था की ट्रंप ने शुरूआत कर दी और धीरे धीरे वे लोग इस रास्ते पर चल निकले हैं जो ट्रंप के यार हैं।छल और नियंत्रण के नए शासन का आरंभ सूत्र है कोरोना के इलाज के बाद जारी होने वाला स्वास्थ्य प्रमाण पत्र। अमेरिका में यह आवाज उठी है अपने चुने गए नुमाइंदों को जनता अपना संरक्षक न समझे।वे जनता के हितों और अधिकारों के संरक्षक नहीं हैं।खासकर पश्चिम में तो ऐसा कोई संरक्षक नहीं है।
ट्रंप प्रशासन ने कोरोना संक्रमण से पीड़ितों के लिए कोविद-19 इम्युनिटी सर्टीफिकेट प्रमाण पत्र जारी करने का प्रस्ताव जारी किया है। मसलन् जिनका कोरोना टेस्ट लिया गया और वे जब रिकवर कर लेते हैं तो उनको एक प्रमाणपत्र दिया जाता है कि वे स्वस्थ हैं उनके शरीर में कोरोना के कोई लक्षण अब नहीं हैं।जिससे वे नौकरी पर लौट सकें।यह प्रमाण पत्र अमेरिका का ‘‘नेशनल इंस्टूट्यूट ऑफ हेल्थ एंड फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’’ जारी करेगा।  
इस प्रमाणपत्र को लेकर अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं।यह प्रमाणपत्र सबको जरूरी होगा।इससे जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी। इस तरह के प्रमाणपत्र को लेकर कोरोना के नेगेटिव और पॉजिटिव मरीजों की संख्या और उनके रजिस्ट्रेशन को लेकर विवाद होगा।उनकी सही संख्या को लेकर मेनीपुलेशन शुरू हो चुका है।कोरोना के टेस्ट को लेकर जो असल समस्या है वह यह कि इसके सही टेस्ट करने के लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।इसके टेस्ट के लिए पीड़ित मनुष्य के शरीर से छोटा सा टीशू का अंश लिया जाता है।उसको विश्लेषण के लिए विस्तारित करते हैं।लेकिन इस प्रक्रिया में यह बताना मुश्किल होता है कि यह वायरस शरीर में कहां कहां फैल गया है।इससे भी अधिक खतरनाक है जबरिया टॉक्सिंग वैक्सीनेशन और उसके बाद दिया जाने वाला प्रमाण पत्र।इस तरह का वैक्सीनेशन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।अनिवार्य वैक्सीनेशन और उसके जरिए कोरोना मुक्त प्रमाणपत्र मुश्किलभरा काम है। यह भी कहा जा रहा है कोरोना के टेस्ट के लिए जो किट इस्तेमाल हो रहे हैं वे अधिक भरोसेमंद नहीं हैं। अमेरिका में ये किट बेहतर प्रिफ़ॉर्म नहीं कर रहे।अभी तक विज्ञानसम्मत कोई टेस्ट कोरोना के लिए सामने नहीं आया है।अब कहा जा रहा है सब लोग टेस्ट कराओ और वैक्सीनेशन लो।सभी लोगों के लिए यह नियम खतरनाक है।
    अब सारी दुनिया में कोरोना को लेकर वैक्सीनेशन कराने की मुहिम सामने आई है। इसकी क्रोनोलॉजी समझने की कोशिश करें-
      कोविद-19 के लिए ‘‘कॉयलेशन फॉर प्रिपेयर्डनेस इन्नोवेसन( सीइपीआई) नामक संगठन का विश्व आर्थिक मंच डावोस, बिल एवं मेलिंडा गेटस फाउंडेशन के प्रायोजन में गठन किया गया है। इस क्रम देखें-
-- सन् 2019 में कोव वैक्सीन की डावोस आर्थिक मंच के सम्मेलन में घोषणा की जाती है।इसके एक सप्ताह बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करता है। यह आपातकाल ऐसे समय घोषित किया जाता है जब चीन के बाहर कन्फर्म केस मात्र 150 थे, इनमें अमेरिका में 6 केस थे।इसके बाद 11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया।सीइटल में मार्च 18 को पहला टेस्ट होता है जिसमें मानवीय स्वयंसेवक भी शिरकत करते हैं।सारी दुनिया में  सीइपीआई के तहत प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप में वैक्सीनेशन की मुहिम चलाने की अपील की जाती है। यह संगठन इस मामले में अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है,इस काम में ‘‘इननोविओ’’ और क्विंसलैंड विश्वविद्यालय आस्ट्रेलिया एक पार्टनरशिप पर साइन करते हैं। उल्लेखनीय है इन दोनों के बीच एक साझा समझौते के तहत पहले से काम चल रहा है।हमारे कुछ मित्र जो आस्ट्रेलिया भक्त हैं वे इस समझौते से अनभिज्ञ हैं और इसके पीछे कार्यरत राजनीतिक-आर्थिक शक्तियों की अनदेखी कर रहे हैं।इन्नोविओ और क्लींसलैंड विश्वविद्यालय के साझे काम को 23 जनवरी को सीइपीआई एक बयान जारी करके पुष्ट करती है।साथ ही कहती है कि उसने इस काम में मॉडर्ना और आईएनसी कंपनियों के साथ यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्टीयस डिजीज को भी इस गठबंधन में शामिल किया है।इन सबके नेतृत्व में अमेरिका में फीयर और पेनिक अभियान चलाया गया है। यह कैम्पेन मौसमी फ्लू के खिलाफ चलाए गए प्रचार अभियान से दस गुना अधिक है।
      जॉन हॉपकिंस इंस्टट्यूट के अनुसार यह एक तथ्य है कि कोरोना के इलाज का बेहद सिम्पल है।सिर्फ उसमें रिकवरी की समस्याओं को जोड़ देना ही पर्याप्त होता। लेकिन टीवी चैनलों की हेडलाइन निरंतर पेनिक क्रिएट करती रही हैं।मीडिया के उन्माद प्रचार के जरिए कोरोना के बारे में विज्ञानसम्मत राय के प्रचार पर कम ध्यान दिया गया।
कोरोना का सत्य वह है जो बीमारी या संक्रमण के रूप में है।दूसरा अघोषित सत्य यह है कि कोरोना के कारण विश्वव्यापी लॉकडाउन चल रहा है। इसके कारण बेकारी,दिवालियापन,भयानक गरीबी और अभाव पैदा हुआ है। इससे अमीरों और भ्रष्टनेताओं को लाभ हो रहा है। छोटे-मंझोले पूंजी के धंधे चौपट हो गए हैं।सिर्फ बड़ी पूंजी के धंधे बचे हैं।पूंजी का केन्द्रीकरण बढा है।यह एक तरह ने बायोलॉजिकल नयी विश्व व्यवस्था की शुरूआत है।इसने मानवीय अधिकारों, जीने अधिकारों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर दिया है।अनेक देशों में आपातकाल और मार्शल लॉ लागू किया जा चुका है।
   असल में जब झूठ को सत्य में बदल दिया जाए तो आप पीछे सत्य की ओर नहीं लौट सकते। इसलिए कोरोना से लड़ने साथ झूठ से लड़ना सबसे बड़ी
चुनौती है। हर स्तर पर झूठ का खेल चल रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर सकता है कोविड-19
इंसानी पहलू - श्यामल मजूमदार /  April 12, 2020
कई लोगों के लिए यह एक अनजानी अनिश्चितता का डर है कि उन्हें कितने दिन तक अपने रोजमर्रा के कामकाज को स्थगित रखना पड़ेगा। कई अन्य को आशंका है कि कहीं वे कोरोनावायरस के संपर्क में न आ जाएं या फिर कहीं यह उनकी वित्तीय हालत को नुकसान न पहुंचाए। परंतु बात केवल इतनी नहीं है। बहुत बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है जिनको आशंका है कि उनका रोजगार छिन सकता है। इसके बाद एक बड़ी चिंता यह है कि लोगों के वेतन में कटौती हो सकती है।
दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कोविड-19 संकट ने आर्थिक और वित्तीय अस्थिरता का एक मिश्रण तैयार किया। इसमें दो राय नहीं कि मौजूदा आशंकाएं सच हैं। लोगों के सामान्य जीवन में भारी उथलपुथल उत्पन्न हो गई है। जाहिर है इसका असर लोगों के भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा। उदाहरण के लिए लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में लोगों ने घबराहट में किराने की जमकर खरीदारी कर ली। यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे अस्थिरता और अनिश्चितता की आशंका में लोग अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। हकीकत में संक्रमित होने का खतरा कई लोगों में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर की आशंका पैदा कर चुका है।
सबसे बड़ी आशंका यह है कि यह महामारी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डाल सकती है। यह कई तरीके से हो सकता है। उदाहरण के लिए घर से काम करना जो शुरुआती दिनों में वरदान प्रतीत हो रहा था वह धीरे-धीरे अरुचिकर प्रतीत होने लगा है। एक आशंका तो यह है कि लगने लगेगा कोई काम है ही नहीं। वहीं दूसरी ओर लोगों में ज्यादा काम करने की प्रवृत्ति पैदा होने लगी है। उन्हें लगने लगा है कि उन्हें लंबे समय तक काम करना चाहिए ताकि वे अपने सहकर्मियों और बॉस को दिखा सकें कि वे काम करते समय दूसरों की तुलना में अधिक उत्पादक रह सकते हैं। जब लोग घर से काम करते हैं और समय पर कोई फोन नहीं उठा पाते या ईमेल का जवाब नहीं दे पाते तो सहकर्मियों को ऐसा लग सकता है कि वे काम को गंभीरता से ले भी रहे हैं या नहीं। आम जीवन में तनाव सामान्य बात है। परंतु एक बात जिसने जाने-अनजाने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालना शुरू कर दिया है वह यह है कि वैश्विक स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियों में नोवेल कोरोनावायरस ने लाखों लोगों को भौतिक रूप से शेष दुनिया से अलग-थलग कर दिया है। भविष्य के अज्ञात भय के साथ मिलकर यह बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अधिकारी के मुताबिक शारीरिक दूरी, पृथक्करण के उपाय, स्कूलों और कार्यालयों का बंद होना आदि कदम खासतौर पर चुनौती भरे हैं। क्योंकि ये कदम उन कामों को प्रभावित करते हैं जो हमें पसंद हैं, हमारे साथियों को हमसे दूर करते हैं।
अकेलापन दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण जोखिमों में से एक है। अब जबकि अनेक लोगों की आजादी से घूमने फिरने की गतिविधियों पर अंकुश लग गया है तो समस्या और बिगड़ गई है। खासतौर पर बुजुर्गों के लिए जिनका सामाजिक जीवन भी सीमित है। यहां डिजिटल युग हमारी सहायता कर सकता है। आखिरकार इससे पहले कभी अपने प्रिय लोगों से जुड़ा रहना इतना आसान नहीं रहा। कम से कम वीडियो कॉल के माध्यम से करीब होने का भ्रम तो होता है। ऐसा लगता है कि हम जिनसे बात कर रहे हैं वे हमारे आसपास हैं।
इस पृथक्करण का लाभ लेने का एक तरीका यह है कि हम उन चीजों की प्राथमिकता तय कर सकते हैं जो हमें पसंद हैं लेकिन जिनके लिए हम अब तक समय नहीं निकाल पा रहे थे। इस एकाकीपन को दूर करने के लिए लोगों को अपने जीवन के उन पहलुओं पर विचार करना चाहिए जिन पर वे अब तक ध्यान नहीं दे पाए थे।
मनोवैज्ञानिक जो सलाह दे रहे हैं उनमें से एक यह है कि कोविड-19 के बारे में कम से कम खबरें देखें, सुनें या पढ़ें क्योंकि वे हमें निराश करती हैं। बस दिन में एक या दो बार इसके बारे में जानकारी जुटाएं। अचानक इस बीमारी के बारे में खबरों की बाढ़ किसी को भी चिंतित कर सकती हैं।
इस समय बच्चों पर ध्यान देना अत्यावश्यक है। बच्चे संवेदनशील हैं और जब वे बड़ों को निराशाजनक ढंग से वायरस के बारे में बात करते देखते हैं तो वे परेशान हो जाते हैं। इसका आगे चलकर उनके मनोविज्ञान पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
अंत में, अब जबकि कोविड-19 के बाद छंटनी और वेतन कटौती अपरिहार्य है तो ऐसे में कंपनियों को ज्यादा सावधानी बरतनी होगी ताकि वे इससे उपजे तनाव से निपट सकें। इससे निपटने के तरीके को जितना पारदर्शी रखा जाए उतना ही अच्छा। हर कोई इसकी वजह से परिचित है लेकिन सभी चाहते हैं कि उनके साथ सम्मान से और समानुभूति से पेश आया जाए। संस्थान से बाहर जा रहे लोगों के साथ आप जिस तरह का व्यवहार करते हैं, उसे संस्थान के बाकी लोग बहुत गौर से देखते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि कोरोनावायरस की महामारी से लडऩा और निपटना केवल शारीरिक या स्वास्थ्यगत चुनौती नहीं है बल्कि यह मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है।(बिजनेस स्टैंडर्ड)
मजदूर और मालिकों का संकट गहराया-
पहले चरण में तीन हफ्ते के लॉकडाउन की घोषणा की गई थी उसके दो दिन पहले ही 23 मार्च को राष्टï्रीय राजमार्ग पर बेलगाचिया से हावड़ा के बीच लगभग लगभग 200 फैक्टरियां शाम 5 बजे बंद हो गईं। बनारस रोड के साथ लगे छोटे और मझोले कारखानों में कमोबेश देश के दूसरे हिस्से जैसा ही नजारा है। यहां सुरक्षा गार्ड और कतार में खड़े ट्रक नजर आते हैं और यहां से नजदीक रहने वाले कामगार गलियों में बैठे सुस्ता रहे हैं।
एक कलपुर्जे कारखाने में काम करने वाले कर्मचारी जलधर सिंह को लॉकडाउन से पहले के सप्ताहांत में वेतन मिला था। यहां करीब 200-250 लोगों को रोजगार मिला हुआ है लेकिन सवाल यह है कि क्या लॉकडाउन की अवधि के लिए पैसा मिलेगा? यह सवाल सिंह के मन में भी बना हुआ है। एक निर्माण इकाई में ठेके पर काम करने वाले कर्मचारी दीपक मंडल की तुलना में सिंह काफी बेहतर हैं जहां साप्ताहिक आधार पर भुगतान किया जाता है। यह पैसा उसके बैंक खाते में जमा हो गया। मंडल को लॉकडाउन के बाद पहले हफ्ते का भुगतान मिला लेकिन उसके बाद से वह अपने फोन पर भुगतान के लिए बैंक का एसएमएस अलर्ट चेक कर रहे हैं लेकिन कोई संदेश नहीं मिला है।
हावड़ा कास्टिंग, मशीन पाट्र्स असेंबल्ड पाट्र्स का केंद्र है और यह देश के साथ दुनिया की जरूरतें पूरी करता है। एक सामान्य गणना के मुताबिक इस क्षेत्र में 400-500 इकाइयों द्वारा 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये का वार्षिक निर्यात किया जाएगा। सिंह और मंडल कारोबारी पदानुक्रम में सबसे नीचे हैं लेकिन हावड़ा में लॉकडाउन से फैक्टरी मालिकों को काफी नुकसान हो रहा है। निर्यात ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं जिसकी वजह से इन इकाइयों को भारी नुकसान हुआ है।
कैलाश अग्रवाल की कंपनी जेपीके मेटालिक्स मैनहोल कवर बनाती है जिसकी आपूर्ति पश्चिम एशिया, यूरोप और आयरलैंड में की जाती है। अग्रवाल के पास पूरा माल भरा हुआ है और उन्हें डर है कि जब तक लॉकडाउन खत्म होगा तब तक निर्यात के ऑर्डर रद्द कर दिए जाएंगे। उन्हें एक महीने में 15 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। जेपीके में करीब 150 अनुबंध वाले संविदा कर्मचारी हैं। ठेकेदार को कर्मचारियों को भुगतान करने के लिए एकमुश्त राशि का भुगतान किया गया है। उन्होंने कहा, 'इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।'
भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद के चेयरमैन रवि सहगल ने कहा कि अगर 15 अप्रैल के बाद भी फैक्टरियों में काम शुरू नहीं हुआ तब बड़ी तादाद में निर्यात ऑर्डर रद्द किए जा सकते हैं। सहगल ने कहा, 'चीन, ब्राजील, तुर्की और मैक्सिको ऐसे देश हैं जहां कारोबार प्रभावित नहीं होता। अमेरिका में भी जहां देश में लॉकडाउन है लेकिन उद्योगों में काम चल रहा है। पश्चिम बंगाल निर्यात के लिए विनिर्माण इकाइयों, विशेष रूप से इंजीनियरिंग क्षेत्र में 50 फीसदी उपस्थिति के साथ परिचालन फिर से शुरू करने की अनुमति देकर अगुआई कर सकता है । हावड़ा परीक्षण का केंद्र बन सकता है।'
सहगल ने कहा कि अगर देश का इंजीनियरिंग क्षेत्र जरूरतों को पूरा करने में असफल रहता है तब आपूर्ति ऑर्डर दूसरे देशों को किया जा सकता है। अप्रैल ऐसा समय है जब ज्यादातर खरीदार छह महीने की खरीदारी की योजना बनाते हैं।
फैब्रिकेशन यूनिट दयाल इंजीनियर्स के मालिक एच के शर्मा को उम्मीद नहीं है कि लॉकडाउन हटाए जाने के बाद कारोबार तुरंत सामान्य हो जाएगा। उन्होंने कहा, 'अगले दो से चार महीने काफी उथल-पुथल वाले रहेंगे। यह एक लेन-देन पर आधारित उद्योग है। जब तक पैसा वापस नहीं आ जाता तक तक चीजें आसान नहीं होंगी।'  शर्मा दरअसल नकदी प्रवाह का जिक्र कर रहे हैं। दयाल इंजीनियर्स फाउंड्री (ढलाईखाना) के लिए स्पेयर पाट्र्स बनाते हैं जो इस वक्त संकट में हैं। जब तक कोई फाउंड्री भुगतान नहीं करता तब तक दयाल उन वेंडरों को भुगतान नहीं कर सकते हैं जो इलेक्ट्रोड और ऑक्सीजन की आपूर्ति करते हैं। यह एक ऐसा चक्र है जिसे चलते रहने की जरूरत है ।
शर्मा को अब भी अपने मजदूरों का भुगतान करना है। उन्होंने पहले ही खुराकी या दैनिक भत्ता सीधे अपने मजदूरों के खातों में ट्रांसफर किया है। लेकिन जब कारखाने खुलेंगे तब उन्हें उनकी मांग भी पूरी करनी होगी। उन्होंने कहा, 'मुझे पैसे की व्यवस्था करनी होगी नहीं तो वे दूसरी जगह काम करने चले जाएंगे।'
हावड़ा चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (एचसीसीआई) के महासचिव संतोष उपाध्याय ने कहा कि अगर सरकार मदद नहीं करती है तब हावड़ा में ज्यादातर खाते फंसे कर्ज में बदल जाएंगे। एचसीसीआई 1,000 से अधिक कारोबारियों और एमएसएमई सदस्यों का प्रतिनिधित्व करता है और इसने पहले से ही प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर राहत देने की गुहार लगाई है।
मांगी गई राहतों में जीएसटी के देर से दाखिल होने पर ब्याज और दंडशुल्क से छूट देने, पूरे लॉकडाउन अवधि के दौरान दीर्घावधि ऋण और कार्यशील पूंजी ऋण पर बैंकों से ब्याज की कुल छूट जैसी मांग शामिल है। चैंबर चाहता है कि ब्याज दर छह महीने के लिए न्यूनतम छह प्रतिशत तक सीमित रहे और रेलवे बोर्ड तथा सरकारी क्षेत्र के तहत चल रहे संयंत्रों को सुझाव दिया जाए कि मार्च में खरीदे गए सामान पर देर से भुगतान के लिए ब्याज न वसूला जाए।
पिछले 5-6 साल में कामगारों और नकदी की कमी के चलते कम से कम 200 इकाइयां बंद कर दी गईं। हालांकि यहां अब भी लोहा और स्टील इकाइयों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब दो लाख कामगार जुड़े हुए हैं।(बिजनेस स्टैंडर्ड,15अप्रैल2020)
छिपाने और छल की कला और कोविद-19
        इस समय एक लाख बीस हजार के करीब डोमेन हैं। इनसे आम लोग कोरोना संबंधी सूचनाओं के लिए आ-जा रहे हैं। इनमें अनेक पोर्टेल के मालिक ठगई कर रहे हैं, छल कर रहे हैं।अनेक किस्म के घोटाले हो रहे हैं।मसलन्, मास्क,कर्ज,बेकारी,वेक्सीन,क्योर आदि को लेकर जबर्दस्त धंधा चल रहा है।अनेक कंपनियों ने तो कुछ खास पदबंधों की खोज के जरिए उनके पोर्टेल में प्रवेश करने वालों पर पाबंदी लगा दी है।इसके बावजूद सोशलमीडिया में मिस-इन्फॉरेमेशन का प्रवाह जारी है।सारी कंपनियां जानती हैं लेकिन अभी तक मिस इन्फॉर्मेशन का प्रवाह रोकने में वे असमर्थ रहे हैं।
      उल्लेखनीय है फेसबक,गूगल,यू ट्यूब,माइक्रोसॉफ्ट, ट्विटर आदि कंपनियों ने मार्च के मध्य में एक साझा बयान जारी किया था जिसमें कोविद-19 से संघर्ष करने वायदा किया गया।यह एक चलताऊ किस्म का साझा बयान था जो इन कंपनियों ने दिया था। इस बयान में मिस इन्फॉर्मेशन से लड़ने और प्रामाणिक सूचनाएं देने का वायदा किया गया था।लेकिन अभी तक ये कंपनियां अपने इस वायदे का पालन नहीं कर पायी हैं।बल्कि इस बीच में उलटा हुआ है।कोरोना से लड़ने के नाम पर अंट-शंट दवाओं के नाम विभिन्न तथाकथित शोधपत्रों में गूगल में प्रकाशित हो रहे हैं। एक ही उदाहरण काफी होगा।
    इंटरनेट पर विशेषज्ञों के एकदल ने ‘‘कोरोना वायरस क्योर’’ के तहत गूगल पर सर्च किया तो पाया कि वहां अनेक तथाकथित शोधपत्र भ्रमण कर रहे हैं लोग बड़ी संख्या में पढ़ रहे हैं और उनकी गलत-सलत सूचनाओं का दुरूपयोग कर रहे हैं। ये पत्र ट्विटर पर भी सर्कुलेट किये जा रहे हैं। इसी तरह का एक शोधपत्र तकनीकी व्यवसायी एलॉन मास्क ने गूगल डॉकूमेंटस में साझा किया । कहा गया यह वैज्ञानिक रिसर्च पेपर है।इसे स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के कैलीफॉर्निया स्थित स्कूल ऑफ मेडीसिन में कार्यरत वैज्ञानिक सलाहकार ने तैयार किया है। इस पेपर के इंटरनेट पर प्रकाशित होते ही दूसरे ही दिन फॉक्स टीवी चैनल ने इस पेपर के आधार फीचर बनाया और कहा कि कोरोना से बचने की दवा है ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’। इस दवा से कोरोना 100फीसदी खत्म हो जाएगा।इसी तरह फ्रांस से एक लघु शोधपत्र सामने या जिसमें दावा किया गया कि ‘‘क्वीनाइन’’ और ‘‘ टॉनिक वाटर’’ और ‘‘मलेरिया ड्रग’’को इंटरनेट पर खोजने वालों की बाढ़ आ गयी।देखते ही देखते बाजार में ये दवाएं और प्रोडक्ट हाथों हाथ बिक गए। इसका अर्थ है इंटरनेट पर जो लिखा जा रहा है उसे जनता पढ़ रही है।सुन रही है।
    फॉक्स टीवी चैनल से कार्यक्रम आने के बाद स्टैंनफोर्ड विश्वविद्यालय ने बयान देकर कहा कि फॉक्स ने जिस व्यक्ति को हमसे जोड़कर पेश किया है उसका हमसे कोई संबंध नहीं है और वह व्यक्ति उनके विश्वविद्यालय के किसी रिसर्च कार्यक्रम में शामिल नहीं रहा है।इस घटना के बाद ट्विटर पर भयानक तूफान आ गया,बड़ी संख्या में डाक्टरों और वैज्ञानिकों ने इस तरह के डिस इनफॉर्मेशन कैम्पेन की आलोचना की।लोगों ने यहां तक लिखा कि इस दवा की अचानक कमी हो गयी और इस दवा को डाक्टर की सलाह के बिना लेने से यह शरीर को नुकसान पहुँचा सकती है।इस तूफान के बाद ट्विटर ने निर्णय लिया और ‘‘हाइड्रोक्सीक्लोरो क्वीन’’ दवा से संबंधित सैंकड़ों ट्विट हटा दिए। ये सारे ट्विट दक्षिणपंथियों के थे। वे लोग मिस इनफॉर्मेशन फैलाकर जश्न मना रहे थे। जो जश्न मना रहे थे उनमें फॉक्स चैनल की हॉस्ट लोरा इनग्राहम,डोनाल्ड ट्रंप के एटॉर्नी रूड़ी गुईलियानी और कंजरवेटिव पंडित चार्ली के नाम खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। इसके बाद ट्रंप ने इस दवा को लेकर जमकर उत्साह दिखाया.इससे बाजार में केमिस्टों से लेकर पीएम मोदी तक इसका दवाब देखा गया।इससे एक बात पता चलती है कि विज्ञान के बारे में मिस इनफॉर्मेशन फैलाया जाए तो उससे कितने व्यापक स्तर पर नुकसान हो सकता है।इस घटना ने वैज्ञानिकों पर भी दवाब बनाया कि वे कोरोना के लिए दवा न बनाएं।इस तरह के माहौल से राजनेताओं का कोई खास नुकसान नहीं हुआ लेकिन आम जनता और विज्ञान की क्षति जरूर हुई है।
     किसी भी खुले और स्वतंत्र समाज पर थोपे गए देश,जनता के दिमाग का मेनीपुलेशऩ और अग्राह्य को ग्राह्य कराने की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। कोरोना के महासंकट काल में यही सब हो रहा है।बड़े पैमाने पर कोरोना की सच्चाई छिपायी जा रही है।मरीजों की संख्या,नामकरण,मृत्यु,बड़े स्केल पर जनता की निगरानी,असहमति व्यक्त करने पर हमले या पाबंदी,जबरिया कोरेंटाइन या फिर वैक्सीन लगाने की कोशिश आदि चीजें सामने आ रही हैं।यह एक तरह से जनता के नॉर्मल जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश है।इस दौर में
कोरोना त्रासदी-2-
पुलिस के मुताबिक 30 वर्षीय मुकेश बिहार के गया जिले के बारा गांव का रहने वाला था। गुरूग्राम सेक्टर-53 में बनी झुग्गियों में परिवार के साथ रहता था। वह सफेदी का काम करता था। मृतक की पत्नी पूनम ने बताया काम नहीं होने के कारण उनके पास रुपये नहीं थे। इसी कारण वह कारण काफी परेशान रहता था।
फोन बेचकर लाया था राशन
पूनम ने बताया कि गुरुवार को मुकेश में ढाई हजार में अपना फोन बेचा था। उन रुपये से वह खाने की आटा, दाल सहित राशन लेकर आया था। इसके अलावा गर्मी से बचने के लिए पंखा भी लेकर आया। 400 रुपये पत्नी को दिए थे। उसके बाद वह झुग्गी में जाकर लेट गया। उसके दो लड़के और दो लड़कियां बाहर खेल रही थीं, जबकि पत्नी पूनम पास में ही रहने वाले पिता के पास गई थी। ऐसे में गुरुवार दोपहर को झुग्गी में फंदा लगाकर आत्महत्या  कर ली।
रुपये जुटाकर दाह संस्कार
मुकेश ससुर उमेश का पैर टूटा हुआ है। वह चल फिर नहीं पा रहा है। उन्होंने बताया कि मुकेश कई दुकानों से राशन का सामान उधार लेकर आता था और रुपये आने पर चुकाता था। अब दुकानदार भी उधार सामान नहीं दे रहा था। परिवार आर्थिक तंगी से  गुजर रहा था। उन्होंने बताया दाह संस्कार के लिए भी रुपये नहीं थे। झुग्गियों मे रहने वालों ने रुपये एकत्रित किए और उसके बाद दाह संस्कार किया।(दैनिक हिन्दुस्तान)
कोरोना त्रासदी-1-
शुक्रवार को सालारपुर ब्लाक के गांव मोहदीन नगर की राशन गांव निवासी शमीम बानो (40 वर्ष) पत्नी मैकू अली एक किलोमीटर चलकर प्रहलादपुर में राशन की दुकान पर चावल लेने पहुंची थी। तीन घंटे तक शमीम धूप में लाइन में लगे रहने के कारण बेहोश होकर गिर पड़ी। सूचना पर पहुंचे परिजन उसे लेकर कुंवरगांव पहुंचे। यहां डाक्टर ने महिला को बदायूं रेफर कर दिया लेकिन रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया।
ये है मोदी सरकार के मजदूर विरोधी चरित्र की आने वाली झलक
रेल मंत्रालय लॉकडाउन के चलते होने वाले घाटे को पाटने के लिए 13 लाख से अधिक अधिकारियों व कर्मचारियों के वेतन और भत्ते पर कैंची चलाने की योजना बना रहा है। इसके तहत टीए, डीए सहित ओवर टाइम ड्यूटी के भत्तों को समाप्त किया जाएगा।
रेल ड्राइवर-गार्ड को ट्रेन चलाने पर प्रति किलोमीटर के हिसाब से मिलने वाला भत्ता भी नहीं दिया जाएगा। रेलवे का तर्क है कि ड्यूटी करने के लिए कर्मचारियों को भत्ता क्यों दिया जाए। रेलवे पहले ही गंभीर आर्थिक तंगी से गुजर रही है। लॉकडाउन से हालत ओर पतली हो गई है। इसे देखते हुए ओवर टाइम ड्यूटी के लिए मिलने वाले भत्ते में 50% कटौती करने की जरूरत है।
35 फीसदी तक वेतन कम: मेल-एक्सप्रेस के ड्राइवर-गार्ड को 500 किलामीटर पर मिलने वाले 530 रुपये भत्ते में 50% कमी का सुझाव है। रेलकर्मियों के वेतन में छह माह तक कैंची चलाने की सिफारिश की गई है। इसमें 10 फीसदी से 35 फीसदी तक की कटौती की जाएगी।

50% की कटौती संभव: यात्रा, मरीज देखभाल, किलोमीटर समेत नॉन प्रैक्ट्रिस भत्ता में एक वर्ष तक 50% कटौती होनी चाहिए। कर्मचारी एक महीने ऑफिस नहीं आता है तो परिवहन भत्ता सौ फीसदी कटे। बच्चों के पढ़ाई भत्ता के लिए 28 हजार मिलते हैं। इसकी समीक्षा होगी।(दैनिक हिन्दुस्तान)
कोरोना का प्रत्युत्तर.....गोलेन्द्र पटेल!

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि — गोलेन्द्र पटेल

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि इन दिनों आँखें बंद होने पर तथागत बुद्ध नज़र आ रहे हैं और खुली होने पर कबीर मैं भाषा में ही नहीं भूमि पर...